मानव सभ्यता के उषाकाल में वस्तुओं, पशुओं और अन्न के भण्डार को गिनने की आवश्यकता ने संख्याओं को जन्म दिया। जैसे-जैसे व्यापार, खगोलशास्त्र, भूमि मापन और भौतिक विज्ञान का विस्तार हुआ, संख्या प्रणाली का दायरा निरंतर बढ़ता गया। गणित में संख्याओं के इस क्रमिक विकास को हम विभिन्न सुपरिभाषित समुच्चयों (Sets) के रूप में वर्गीकृत करते हैं:
- 1. प्राकृत संख्याएँ (Natural Numbers, N):
गणना में प्रयुक्त होने वाली सभी धनात्मक संख्याएँ प्राकृत संख्याएँ कहलाती हैं।
N = {1, 2, 3, 4, 5, ...}
सबसे छोटी प्राकृत संख्या 1 है। प्राकृत संख्याओं का कोई सबसे बड़ा मान (अंत) नहीं होता। - 2. पूर्ण संख्याएँ (Whole Numbers, W):
जब प्राकृत संख्याओं के परिवार में 'शून्य' (0) को भी सम्मिलित कर लिया जाता है, तो प्राप्त समुच्चय को पूर्ण संख्याएँ कहते हैं। शून्य की खोज प्राचीन भारतीय गणितज्ञों (आर्यभट एवं ब्रह्मगुप्त) का विश्व को अमर योगदान है।
W = {0, 1, 2, 3, 4, ...} = N ∪ {0}
सबसे छोटी पूर्ण संख्या 0 है। प्रत्येक प्राकृत संख्या एक पूर्ण संख्या होती है, किंतु प्रत्येक पूर्ण संख्या प्राकृत संख्या नहीं होती (क्योंकि 0 प्राकृत नहीं है)। - 3. पूर्णांक (Integers, Z):
जब व्यापार में घाटा, तापमान में हिमांक से नीचे का स्तर अथवा विपरीत दिशाओं को दर्शाने की आवश्यकता पड़ी, तो ऋणात्मक संख्याओं का उदय हुआ। पूर्ण संख्याओं के साथ सभी प्राकृत संख्याओं के ऋणात्मक रूपों को मिलाने पर पूर्णांकों का समुच्चय बनता है। इसका प्रतीक Z जर्मन शब्द 'Zahlen' (जिसका अर्थ 'संख्याएँ' है) से लिया गया है।
Z = {..., -4, -3, -2, -1, 0, 1, 2, 3, 4, ...}
यहाँ {1, 2, 3, ...} धनात्मक पूर्णांक (Z+) हैं, {-1, -2, -3, ...} ऋणात्मक पूर्णांक (Z-) हैं, तथा 0 एक ऐसा पूर्णांक है जो न तो धनात्मक है और न ही ऋणात्मक। - 4. परिमेय संख्याएँ (Rational Numbers, Q):
दैनिक जीवन में जब किसी वस्तु को विभाजित करने या भागों में बांटने की बात आई (जैसे आधा सेब, तीन-चौथाई हिस्सा), तो भिन्न अस्तित्व में आए। इसका प्रतीक Q अंग्रेजी शब्द 'Quotient' (भागफल) से आया है तथा Rational शब्द 'Ratio' (अनुपात) से बना है।
मानक गणितीय परिभाषा: ऐसी सभी संख्याएँ जिन्हेंविशेष टिप्पणी: क्या शून्य (0) एक परिमेय संख्या है? हाँ! क्योंकि 0 को 0/1, 0/2, 0/(-5) के रूप में लिखा जा सकता है, जहाँ p = 0 और q = 1 ≠ 0 दोनों पूर्णांक हैं।
p/qके रूप में व्यक्त किया जा सकता है, जहाँpऔरqदोनों पूर्णांक (p, q ∈ Z) हैं, हर शून्य नहीं है (q ≠ 0) तथाpवqपरस्पर सह-अभाज्य (Co-prime) हैं अर्थात् उनका महत्तम समापवर्तकgcd(p, q) = 1है, परिमेय संख्याएँ कहलाती हैं।Q = { p/q : p, q ∈ Z, q ≠ 0 तथा gcd(p, q) = 1 }
इन सभी समुच्चयों के मध्य एक स्पष्ट अंतर्निहित संबंध होता है, जिसे उपसमुच्चय प्रतीक (⊂) द्वारा इस प्रकार दर्शाया जाता है:
अर्थात्: प्रत्येक प्राकृत संख्या एक पूर्ण संख्या है; प्रत्येक पूर्ण संख्या एक पूर्णांक है; प्रत्येक पूर्णांक एक परिमेय संख्या है; और प्रत्येक परिमेय संख्या एक वास्तविक संख्या है। किंतु इसका विलोम सदैव सत्य नहीं होता (उदाहरणार्थ: -3 एक पूर्णांक है पर पूर्ण संख्या नहीं है; 2/5 एक परिमेय संख्या है पर पूर्णांक नहीं है)।
| संख्या समुच्चय | प्रतीक | अवयव / रूप | न्यूनतम संख्या | संवृत्त संक्रियाएँ (Closed Under) |
|---|---|---|---|---|
| प्राकृत संख्याएँ | N | {1, 2, 3, 4, ...} | 1 | योग (+), गुणन (×) |
| पूर्ण संख्याएँ | W | {0, 1, 2, 3, ...} | 0 | योग (+), गुणन (×) |
| पूर्णांक | Z | {..., -2, -1, 0, 1, 2, ...} | कोई नहीं (-∞) | योग (+), व्यवकलन (-), गुणन (×) |
| परिमेय संख्याएँ | Q | p/q, q ≠ 0, gcd(p,q)=1 | कोई नहीं | योग (+), व्यवकलन (-), गुणन (×), भाग (÷ अशून्य) |
पूर्णांकों के समुच्चय में किन्हीं दो क्रमागत पूर्णांकों (जैसे 3 और 4) के बीच कोई अन्य पूर्णांक नहीं होता। किंतु परिमेय संख्याओं की प्रकृति इससे सर्वथा भिन्न और आश्चर्यजनक है।
a और b के मध्य अनंत (अपरिमित) परिमेय संख्याएँ स्थित होती हैं। संख्या रेखा पर परिमेय संख्याएँ अत्यंत घनी (Dense) रूप से फैली होती हैं।
दो दी गई परिमेय संख्याओं a और b के मध्य n परिमेय संख्याएँ ज्ञात करने की दो प्रमुख विधियाँ:
- माध्य विधि (Average / Mean Method):
यदि
a < bहो, तो उनके ठीक मध्य की परिमेय संख्या:q₁ = (a + b) / 2
इसके पश्चातaऔरq₁के बीचq₂ = (a + q₁) / 2, तथाq₁औरbके बीचq₃ = (q₁ + b) / 2ज्ञात कर सकते हैं। यह विधि 1 या 2 संख्याएँ ज्ञात करने के लिए उपयुक्त है, किंतु अधिक संख्याओं के लिए जटिल हो जाती है। - सार्व-अंतर सूत्र विधि (Common Difference Method - बोर्ड परीक्षा हेतु सर्वोत्तम):
यदि हमें
aऔरb(जहाँa < b) के मध्य ठीकnपरिमेय संख्याएँ ज्ञात करनी हों, तो सार्व-अंतरdका मान निम्न सूत्र से ज्ञात करते हैं:d = (b - a) / (n + 1)तबaऔरbके मध्य की अभीष्टnपरिमेय संख्याएँ क्रमशः होंगी:(a + d), (a + 2d), (a + 3d), ..., (a + nd) - समान हर विधि (Equivalent Denominator Method):
दी गई दोनों भिन्नों के हरों को समान बनाकर अंश और हर को
(n + 1)से गुणा करने पर उनके बीच कीnसंख्याएँ सीधे अंशों को 1-1 बढ़ाकर प्राप्त की जा सकती हैं।