1.1 वायु की अदृश्यता का रहस्य: एक पारदर्शी गैसीय आवरण
वायु हमारे चारों ओर सर्वत्र उपस्थित है, किंतु हम इसे अपनी आंखों से सीधे नहीं देख सकते। इसका मुख्य भौतिक कारण यह है कि स्वच्छ वायु एक अत्यंत विरल, रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन एवं पारदर्शी (Transparent) गैसीय माध्यम है। प्रकाश की किरणें वायु में से बिना किसी अवशोषण, परावर्तन या अपवर्तन के सीधी रेखा में गुजर जाती हैं, जिसके कारण मानव नेत्रों को वायु की कोई प्रत्यक्ष छवि दिखाई नहीं देती।
यद्यपि वायु अदृश्य है, किंतु हम इसकी भौतिक उपस्थिति का अनुभव अपने दैनिक जीवन के अनगिनत क्रियाकलापों में निरंतर करते हैं:
- गतिक अनुभव: जब तीव्र हवा चलती है, तो हम अपने चेहरे, त्वचा और बालों पर हवा के ठंडे थपेड़ों का स्पष्ट यांत्रिक दबाव महसूस करते हैं।
- दृष्टिगोचर प्रभाव: हम वृक्षों की पत्तियों को खड़खड़ाते, भारी शाखाओं को झूमते, आंगन में टंगे गीले कपड़ों को तेजी से फहराते, तथा धूल के बवंडरों को ऊपर उठते हुए देखते हैं।
- वायुदाब के प्रमाण: जब कमरे में छत का पंखा चालू किया जाता है, तो मेज पर खुली रखी पुस्तक के पन्ने तेजी से फड़फड़ाने लगते हैं। आकाश में ऊंची उड़ती पतंगें वायु के ऊपर उठने वाले दबाव (Updrafts) के सहारे ही तैरती हैं।
भौतिक विज्ञान के अनुसार, वायु कोई काल्पनिक शून्यता नहीं है, अपितु यह पदार्थ की गैसीय अवस्था है जो स्थान (आयतन) घेरती है, द्रव्यमान (भार) रखती है, तथा सभी दिशाओं में समान रूप से दाब आरोपित करती है।
1.2 गतिमान वायु (पवन), फिरकी एवं वात-सूचक यंत्र
शांत अवस्था में वायु का अनुभव नहीं होता, किंतु जब ताप और दाब के अंतर के कारण वायु एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर बहने लगती है, तो इस गतिमान वायु को 'पवन' (Wind) कहा जाता है।
[सूर्य की ऊष्मा द्वारा धरातल का असमान तापन]
↓
[गर्म वायु फैलकर हल्की होती है और ऊपर उठती है]
↓
[आसपास की ठंडी, सघन वायु उस रिक्त स्थान को भरने दौड़ती है]
↓
[धरातल पर वायु का क्षैतिज प्रवाह = 'पवन' (WIND)]
1. फिरकी (Pinwheel) का प्रायोगिक निर्माण (क्रियाकलाप 1)
- फिरकी बच्चों का एक अत्यंत लोकप्रिय पारंपरिक वैज्ञानिक खिलौना है, जिसे कागज के एक चौकोर टुकड़े के चारों कोनों को तिरछा काटकर और मोड़कर एक पतली तीली पर आलपिन की सहायता से बनाया जाता है।
- जब आप फिरकी को हाथ में पकड़कर किसी शांत कमरे में खड़े रहते हैं, तो उसकी पंखुड़ियां बिल्कुल स्थिर रहती हैं।
- किंतु जैसे ही आप फिरकी को लेकर आगे की ओर तेजी से दौड़ते हैं, अथवा किसी खुले मैदान में जाते हैं जहाँ हवा चल रही हो, तो फिरकी के पंखे अत्यंत तीव्र गति से गोल-गोल घूमने लगते हैं।
- वैज्ञानिक सिद्धांत: गतिमान वायु के कणों में गतिज ऊर्जा ($\frac{1}{2}mv^2$) होती है। जब यह गतिशील वायु फिरकी की तिरछी पंखुड़ियों से टकराती है, तो वह उन पर एक यांत्रिक बल आरोपित करती है। तिरछी बनावट के कारण यह बल घूर्णन बल (Torque) में बदल जाता है, जिससे फिरकी तेजी से घूमने लगती है।
2. वात-सूचक (Weather Vane / Wind Vane) की संरचना एवं कार्यप्रणाली
- वात-सूचक मौसम विज्ञान का एक प्राचीन एवं प्रामाणिक यंत्र है, जिसका उपयोग यह ज्ञात करने के लिए किया जाता है कि किसी विशिष्ट समय पर पवन किस भौगोलिक दिशा से बहकर आ रही है।
- इसमें एक तीक्ष्ण ऊर्ध्वाधर कीलक (Pivot) पर एक क्षैतिज तीर संतुलित रूप से लगा होता है, जो बिना किसी घर्षण के $360^\circ$ स्वतंत्रतापूर्वक घूम सकता है।
- तीर के पिछले सिरे पर एक चौड़ा, चपटा पंख लगा होता है, जबकि अगला सिरा एक नुकीला बाण होता है।
- जब पवन चलती है, तो वह तीर के पिछले चौड़े पंख पर अधिक वायुगतिकीय खिंचाव (Aerodynamic Drag) डालती है। इससे पिछला भाग हवा के बहाव के साथ आगे झुक जाता है और तीर का नुकीला सिरा सदैव उस दिशा की ओर मुड़ जाता है जिधर से पवन आ रही होती है।
1.3 वायु स्थान घेरती है: उल्टी खाली बोतल का प्रयोग (क्रियाकलाप 2)
क्या एक खुली "खाली" बोतल वास्तव में खाली होती है? एक अत्यंत सरल विद्यालयी प्रयोग यह सिद्ध करता है कि प्रत्येक तथाकथित रिक्त पात्र वायु से खचाखच भरा होता है:
प्रारंभिक स्थिति: बोतल को सीधा दबाया गया तिरछी स्थिति: बुलबुले बाहर निकले!
पानी बोतल में प्रवेश नहीं करता पानी तेजी से भीतर भर गया!
+--------------------+ +--------------------+
| पानी की बाल्टी | | पानी की बाल्टी |
| | | o o O <-- वायु के
| +------+ | | / बुलबुले
| | फंसी | | | +------+ |
| | हुई | | | | पानी | |
| | वायु | | | | भीतर | |
| | | | | | भरा | |
| +==--==+ | | +==--==+ |
| ▼ | | / |
+~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~+ +~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~+
प्रायोगिक प्रक्रिया:
- कांच अथवा पारदर्शी प्लास्टिक की एक सूखी, खाली बोतल लें।
- एक गहरी बाल्टी या कांच के बड़े टब को पानी से तीन-चौथाई भर लें।
- बोतल के खुले मुंह को ठीक नीचे की ओर रखें और बोतल को बिल्कुल सीधा (ऊर्ध्वाधर) रखते हुए पानी की सतह के नीचे गहराई में दबाएं।
- प्रेक्षण 1: पानी बोतल के भीतर प्रवेश नहीं करता। बोतल के मुंह के पास पानी का स्तर रुक जाता है और भीतर की बोतल पूरी तरह सूखी रहती है।
- वैज्ञानिक कारण: बोतल खाली नहीं है; वह पूर्णतः वायु से भरी हुई है। चूंकि बोतल को बिल्कुल सीधा दबाया गया है, अतः भीतर फंसी हुई वायु को बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं मिलता। जब तक वायु बाहर नहीं निकलेगी, तब तक जल भीतर प्रवेश नहीं कर सकता, क्योंकि दो भौतिक पदार्थ एक ही समय में एक ही स्थान नहीं घेर सकते।
- अब बोतल को पानी के भीतर ही धीरे से थोड़ा सा तिरछा (Tilt) करें।
- प्रेक्षण 2: बोतल के मुंह से अचानक बड़े-बड़े चमकदार वायु के बुलबुले गड़गड़ाहट के साथ बाहर निकलते हैं और पानी की सतह पर आकर फूट जाते हैं। उसी क्षण, बाहर का पानी तेजी से बोतल के भीतर भर जाता है।
- निष्कर्ष: वायु स्थान (आयतन) घेरती है तथा हमारे आसपास की प्रत्येक खाली दिखने वाली वस्तु वास्तव में वायु से भरी होती है।
1.4 वायुमंडल (Atmosphere): परिभाषा, ऊर्ध्वाधर विस्तार एवं घनत्व प्रवणता
हमारी पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए वायु के इस विशाल, घने और सतत गैसीय आवरण को वायुमंडल (Atmosphere) कहा जाता है। यह वायुमंडलीय आवरण पृथ्वी की सतह से ऊपर अंतरिक्ष की ओर कई सौ किलोमीटर की ऊंचाई तक फैला हुआ है और पृथ्वी के शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा धरातल से बंधा रहता है।
1. गुरुत्वाकर्षण और ऊंचाई के साथ वायुदाब व घनत्व में कमी
- वायु में भार होता है। अतः वायुमंडल की ऊपरी परतों का अपार भार नीचे की परतों पर भारी दबाव डालता है।
- इसके परिणामस्वरूप, समुद्र तल (Sea Level) पर वायु का घनत्व और वायुदाब सर्वाधिक होता है (लगभग $101.3\text{ kPa}$)। यहाँ वायु के अणु एक-दूसरे के अत्यंत निकट होते हैं।
- जैसे-जैसे हम धरातल से ऊपर पहाड़ों और आकाश की ओर बढ़ते हैं, हमारे ऊपर की वायु का भार घटता जाता है। वायु के अणु दूर-दूर बिखर जाते हैं। इस प्रकार, ऊंचाई बढ़ने के साथ वायु विरल (पतली) होती जाती है और वायुमंडलीय दाब तेजी से घटता जाता है।
ऊंचाई (पर्वतीय स्तर) वायु अणुओं का घनत्व व दाब
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ऊपरी वायुमंडल (> 10 किमी) | · · · · · · (अत्यधिक विरल / निम्नतम दाब)
माउंट एवरेस्ट शिखर (8,848 मी)| · · · · · · · · (समुद्र तल का मात्र ~33% दाब)
मध्यम पहाड़ी क्षेत्र (2,000 मी) | · · · · · · · · · · · · (मध्यम विरल वायु)
समुद्र तल (धरातल 0 मी) | ······················· (अधिकतम सघनता व वायुदाब)
2. पर्वतारोही ऊंचे पर्वतों पर ऑक्सीजन सिलेंडर क्यों ले जाते हैं?
जब साहसी पर्वतारोही हिमालय के उत्तुंग शिखरों—जैसे माउंट एवरेस्ट ($8,848\text{ मीटर}$)—पर चढ़ाई करते हैं:
- अत्यधिक ऊंचाई पर वायु इतनी विरल (पतली) हो जाती है कि वहां का वायुदाब समुद्र तल के सामान्य दाब का मात्र एक-तिहाई ($\approx 33\%$) रह जाता है।
- यद्यपि वायु में ऑक्सीजन का प्रतिशत रासायनिक रूप से $21\%$ ही रहता है, किंतु विरल वायु के कारण प्रति सांस फेफड़ों में जाने वाले ऑक्सीजन अणुओं की वास्तविक संख्या में $60\%$ से अधिक की भारी कमी आ जाती है।
- इस अत्यंत विरल वायु में सामान्य सांस लेने से मानव रक्त में ऑक्सीजन का स्तर खतरनाक रूप से गिर जाता है। मस्तिष्क और हृदय को पर्याप्त ऑक्सीजन न मिलने से पर्वतारोही तीव्र सिरदर्द, भ्रम, उल्टी, फेफड़ों में पानी भरने (High Altitude Pulmonary Edema - HAPE) और कोमा का शिकार हो सकते हैं।
- अतः अपने जीवन की रक्षा करने तथा शरीर की जैविक कोशिकाओं को निरंतर ऊर्जा प्रदान करने के लिए पर्वतारोही पीठ पर भारी स्टील या मिश्रधातु के सिलेंडरों में संपीडित ऑक्सीजन गैस साथ ले जाते हैं और चेहरे पर मास्क लगाकर कृत्रिम रूप से सांस लेते हैं।