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BSEB • कक्षा 6 • Science • अध्याय 11
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

हमारे चारों ओर हवा (Air Around Us)

बिहार राज्य विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB) के कक्षा 6 विज्ञान पाठ्यक्रम का अध्याय 11 'हमारे चारों ओर वायु' वायुमंडलीय भौतिकी, गैसीय रसायन एवं पर्यावरणीय जीवविज्ञान की आधारशिला रखता है। इस अध्याय में विद्यार्थी सरल प्रयोगों द्वारा यह प्रमाणित करते हैं कि वायु एक वास्तविक भौतिक पदार्थ है जो स्थान घेरती है, भार रखती है और प्रत्येक तथाकथित रिक्त पात्र में विद्यमान रहती है। अध्ययन की शुरुआत वायुमंडल की परिभाषा, ऊंचाई के साथ वायुदाब व घनत्व में कमी तथा पर्वतारोहियों द्वारा ऑक्सीजन सिलेंडर ले जाने के कारणों से होती है। इसके पश्चात वायु को एक गैसीय मिश्रण के रूप में विश्लेषित किया गया है, जिसमें नाइट्रोजन (78%), ऑक्सीजन (21%), कार्बन डाइऑक्साइड (0.04%), जलवाष्प, तथा धूल और धुएं के कणों की भूमिका का विस्तार से परीक्षण किया गया है। जलती मोमबत्ती के ऊपर गिलास उलटने का ऐतिहासिक प्रयोग यह सिद्ध करता है कि ऑक्सीजन दहन में सहायक है और वायु के कुल आयतन का लगभग एक-पंचमांश (20%) भाग घेरती है। अध्याय में जलीय जीवों (गलफड़ों द्वारा जल में घुली ऑक्सीजन) एवं मृदा में रहने वाले जीवों (मिट्टी के रंध्रों में फंसी वायु द्वारा केंचुए का त्वचीय श्वसन) की श्वसन अनुकूलताओं का प्रायोगिक प्रमाण प्रस्तुत किया गया है। हरे पौधों के प्रकाश संश्लेषण और जंतुओं के श्वसन के बीच चक्रीय संतुलन को स्पष्ट करते हुए यह समझाया गया है कि वायुमंडल में ऑक्सीजन कभी समाप्त क्यों नहीं होती। अंत में, गतिमान वायु (पवन) के विविध उपयोगों (पवन चक्की, नौकायन, बीजों का प्रकीर्णन) तथा बिहार के मैदानी भागों में शीतकालीन स्मॉग व ईंट-भट्ठों से उत्पन्न वायु प्रदूषण की रोकथाम हेतु 'जल-जीवन-हरियाली' जैसे संरक्षण प्रयासों को रेखांकित किया गया है।

क्या आपने कभी सोचा है?

हम इसे अपनी आंखों से देख नहीं सकते, इसे छूकर पकड़ नहीं सकते और न ही इसका कोई स्वाद चख सकते हैं, फिर भी पृथ्वी का प्रत्येक प्राणी इसके बिना कुछ ही मिनटों में दम तोड़ देगा। जब आप किसी खाली कांच की बोतल को उल्टा करके पानी की बाल्टी में सीधा नीचे दबाते हैं, तो पानी बोतल के भीतर जाने से साफ इंकार क्यों कर देता है? और जैसे ही आप बोतल को थोड़ा सा तिरछा करते हैं, पानी के भीतर से बुलबुले गड़गड़ाते हुए बाहर क्यों भागते हैं? तपती गर्मियों में जब मेज पर रखे बर्फ के ठंडे गिलास को देखा जाता है, तो उसकी बाहरी सूखी दीवार पर पानी की नन्हीं-नन्हीं बूंदें अचानक कहाँ से टपकने लगती हैं? जब मूसलाधार मानसूनी बारिश से खेत जलमग्न हो जाते हैं, तो मिट्टी के भीतर रहने वाले केंचुए अचानक घबराकर जमीन पर बाहर क्यों रेंगने लगते हैं? हमारे ग्रह को चारों ओर से घेरे हुए अदृश्य गैसीय महासागर—अर्थात वायु—के भीतर इन सभी आश्चर्यजनक प्राकृतिक रहस्यों के उत्तर छिपे हैं। इस अध्याय में हम वायुमंडल की बनावट, जीवनदायिनी गैसों के संघटन, भूमिगत व जलीय जीवों के श्वसन तथा वायु के संतुलन से जुड़े प्रत्येक वैज्ञानिक नियम का गहन अनुशीलन करेंगे।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

वायु केवल सांस लेने का माध्यम नहीं है, अपितु यह संपूर्ण पृथ्वी का सुरक्षात्मक कवच है। यह सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों को रोकती है, वैश्विक तापमान को नियंत्रित करती है, जलचक्र का संचालन करती है और हमारे वार्तालाप हेतु ध्वनि तरंगों के संचरण का भौतिक माध्यम बनती है। कक्षा 6 के स्तर पर वायु के रासायनिक संघटन, श्वसन प्रणालियों और वायुमंडलीय संतुलन का वैज्ञानिक ज्ञान विद्यार्थियों को बिहार में सर्दियों के दौरान गहराने वाले स्मॉग संकट, पराली जलाने की समस्या तथा औद्योगिक प्रदूषण के प्रति जागरूक बनाता है और एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा देता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • पदार्थ की तीन मूलभूत अवस्थाओं (ठोस, द्रव, गैस) एवं उनके सामान्य लक्षणों की समझ।
  • सजीवों में सांस लेने (ऑक्सीजन ग्रहण करने तथा कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ने) की बुनियादी अवधारणा।
  • अध्याय 4 में पढ़े गए पौधों के भोजन निर्माण (प्रकाश संश्लेषण) और पत्तियों की भूमिका का ज्ञान।
  • अध्याय 3 में पढ़े गए जलचक्र (वाष्पीकरण एवं संघनन) के मूलभूत सिद्धांतों का स्मरण।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • सरल गतिविधियों द्वारा यह सिद्ध करना कि वायु स्थान घेरती है, भार रखती है और हमारे चारों ओर प्रत्येक रिक्त स्थान में उपस्थित है।
  • वायुमंडल की संरचना को समझना तथा यह स्पष्ट करना कि ऊंचाई बढ़ने पर वायुदाब व घनत्व घटने के कारण पर्वतारोहियों को ऑक्सीजन सिलेंडर की आवश्यकता क्यों होती है।
  • वायु के प्रमुख गैसीय घटकों (नाइट्रोजन 78%, ऑक्सीजन 21%, कार्बन डाइऑक्साइड 0.04%, जलवाष्प, धूल व धुआं) की पहचान एवं उनके अनुपातों का विश्लेषण करना।
  • जल में जलती मोमबत्ती के प्रयोग द्वारा यह सिद्ध करना कि ऑक्सीजन दहन की पोषक है तथा यह वायु के लगभग 1/5 भाग को घेरे रहती है।
  • प्रायोगिक रूप से प्रदर्शित करना कि जल में घुली वायु द्वारा जलीय जीव तथा मिट्टी के रंध्रों में फंसी वायु द्वारा भूमिगत जीव (केंचुआ) श्वसन करते हैं।
  • प्रकाश संश्लेषण और श्वसन के पारस्परिक चक्रीय संबंध को समझना जिसके कारण वायुमंडल में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का संतुलन स्थिर रहता है।
  • गतिमान पवन की गतिज ऊर्जा के उपयोगों (पवन चक्की, पाल नौकायन, परागण, बीजों का प्रकीर्णन, ध्वनि संचरण) का वैज्ञानिक विवेचन करना।
  • बिहार के संदर्भ में वायु प्रदूषण के प्रमुख कारणों (ईंट-भट्ठे, पराली दहन, वाहन उत्सर्जन, शीतकालीन स्मॉग) की पहचान करना तथा 'जल-जीवन-हरियाली' मिशन जैसे निवारक उपायों को अपनाना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 मॉड्यूल 1: हमारे चारों ओर वायु: भौत...
2 मॉड्यूल 2: वायु किससे बनी है? रासाय...
3 मॉड्यूल 3: ऑक्सीजन एवं दहन: जल में...
4 मॉड्यूल 4: जल एवं मिट्टी में रहने व...
5 मॉड्यूल 5: वायुमंडल में ऑक्सीजन का...
6 मॉड्यूल 6: गतिशील वायु (पवन), गतिज...
7 मॉड्यूल 7: वायु प्रदूषण, वातावरणीय...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

मॉड्यूल 1: हमारे चारों ओर वायु: भौतिक गुण, प्रयोग एवं वायुमंडल

1.1 वायु की अदृश्यता का रहस्य: एक पारदर्शी गैसीय आवरण

वायु हमारे चारों ओर सर्वत्र उपस्थित है, किंतु हम इसे अपनी आंखों से सीधे नहीं देख सकते। इसका मुख्य भौतिक कारण यह है कि स्वच्छ वायु एक अत्यंत विरल, रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन एवं पारदर्शी (Transparent) गैसीय माध्यम है। प्रकाश की किरणें वायु में से बिना किसी अवशोषण, परावर्तन या अपवर्तन के सीधी रेखा में गुजर जाती हैं, जिसके कारण मानव नेत्रों को वायु की कोई प्रत्यक्ष छवि दिखाई नहीं देती।

यद्यपि वायु अदृश्य है, किंतु हम इसकी भौतिक उपस्थिति का अनुभव अपने दैनिक जीवन के अनगिनत क्रियाकलापों में निरंतर करते हैं:

  1. गतिक अनुभव: जब तीव्र हवा चलती है, तो हम अपने चेहरे, त्वचा और बालों पर हवा के ठंडे थपेड़ों का स्पष्ट यांत्रिक दबाव महसूस करते हैं।
  2. दृष्टिगोचर प्रभाव: हम वृक्षों की पत्तियों को खड़खड़ाते, भारी शाखाओं को झूमते, आंगन में टंगे गीले कपड़ों को तेजी से फहराते, तथा धूल के बवंडरों को ऊपर उठते हुए देखते हैं।
  3. वायुदाब के प्रमाण: जब कमरे में छत का पंखा चालू किया जाता है, तो मेज पर खुली रखी पुस्तक के पन्ने तेजी से फड़फड़ाने लगते हैं। आकाश में ऊंची उड़ती पतंगें वायु के ऊपर उठने वाले दबाव (Updrafts) के सहारे ही तैरती हैं।

भौतिक विज्ञान के अनुसार, वायु कोई काल्पनिक शून्यता नहीं है, अपितु यह पदार्थ की गैसीय अवस्था है जो स्थान (आयतन) घेरती है, द्रव्यमान (भार) रखती है, तथा सभी दिशाओं में समान रूप से दाब आरोपित करती है।


1.2 गतिमान वायु (पवन), फिरकी एवं वात-सूचक यंत्र

शांत अवस्था में वायु का अनुभव नहीं होता, किंतु जब ताप और दाब के अंतर के कारण वायु एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर बहने लगती है, तो इस गतिमान वायु को 'पवन' (Wind) कहा जाता है।

[सूर्य की ऊष्मा द्वारा धरातल का असमान तापन]
                     ↓
[गर्म वायु फैलकर हल्की होती है और ऊपर उठती है]
                     ↓
[आसपास की ठंडी, सघन वायु उस रिक्त स्थान को भरने दौड़ती है]
                     ↓
[धरातल पर वायु का क्षैतिज प्रवाह = 'पवन' (WIND)]

1. फिरकी (Pinwheel) का प्रायोगिक निर्माण (क्रियाकलाप 1)

  • फिरकी बच्चों का एक अत्यंत लोकप्रिय पारंपरिक वैज्ञानिक खिलौना है, जिसे कागज के एक चौकोर टुकड़े के चारों कोनों को तिरछा काटकर और मोड़कर एक पतली तीली पर आलपिन की सहायता से बनाया जाता है।
  • जब आप फिरकी को हाथ में पकड़कर किसी शांत कमरे में खड़े रहते हैं, तो उसकी पंखुड़ियां बिल्कुल स्थिर रहती हैं।
  • किंतु जैसे ही आप फिरकी को लेकर आगे की ओर तेजी से दौड़ते हैं, अथवा किसी खुले मैदान में जाते हैं जहाँ हवा चल रही हो, तो फिरकी के पंखे अत्यंत तीव्र गति से गोल-गोल घूमने लगते हैं।
  • वैज्ञानिक सिद्धांत: गतिमान वायु के कणों में गतिज ऊर्जा ($\frac{1}{2}mv^2$) होती है। जब यह गतिशील वायु फिरकी की तिरछी पंखुड़ियों से टकराती है, तो वह उन पर एक यांत्रिक बल आरोपित करती है। तिरछी बनावट के कारण यह बल घूर्णन बल (Torque) में बदल जाता है, जिससे फिरकी तेजी से घूमने लगती है।

2. वात-सूचक (Weather Vane / Wind Vane) की संरचना एवं कार्यप्रणाली

  • वात-सूचक मौसम विज्ञान का एक प्राचीन एवं प्रामाणिक यंत्र है, जिसका उपयोग यह ज्ञात करने के लिए किया जाता है कि किसी विशिष्ट समय पर पवन किस भौगोलिक दिशा से बहकर आ रही है।
  • इसमें एक तीक्ष्ण ऊर्ध्वाधर कीलक (Pivot) पर एक क्षैतिज तीर संतुलित रूप से लगा होता है, जो बिना किसी घर्षण के $360^\circ$ स्वतंत्रतापूर्वक घूम सकता है।
  • तीर के पिछले सिरे पर एक चौड़ा, चपटा पंख लगा होता है, जबकि अगला सिरा एक नुकीला बाण होता है।
  • जब पवन चलती है, तो वह तीर के पिछले चौड़े पंख पर अधिक वायुगतिकीय खिंचाव (Aerodynamic Drag) डालती है। इससे पिछला भाग हवा के बहाव के साथ आगे झुक जाता है और तीर का नुकीला सिरा सदैव उस दिशा की ओर मुड़ जाता है जिधर से पवन आ रही होती है।

1.3 वायु स्थान घेरती है: उल्टी खाली बोतल का प्रयोग (क्रियाकलाप 2)

क्या एक खुली "खाली" बोतल वास्तव में खाली होती है? एक अत्यंत सरल विद्यालयी प्रयोग यह सिद्ध करता है कि प्रत्येक तथाकथित रिक्त पात्र वायु से खचाखच भरा होता है:

    प्रारंभिक स्थिति: बोतल को सीधा दबाया गया        तिरछी स्थिति: बुलबुले बाहर निकले!
          पानी बोतल में प्रवेश नहीं करता               पानी तेजी से भीतर भर गया!
          +--------------------+                     +--------------------+
          |    पानी की बाल्टी   |                     |    पानी की बाल्टी   |
          |                    |                     |        o o O  <-- वायु के
          |      +------+      |                     |       /       बुलबुले
          |      | फंसी |      |                     |      +------+          |
          |      | हुई  |      |                     |      | पानी |          |
          |      | वायु |      |                     |      | भीतर |          |
          |      |      |      |                     |      | भरा  |          |
          |      +==--==+      |                     |      +==--==+          |
          |         ▼          |                     |       /                |
          +~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~+                     +~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~+

प्रायोगिक प्रक्रिया:

  1. कांच अथवा पारदर्शी प्लास्टिक की एक सूखी, खाली बोतल लें।
  2. एक गहरी बाल्टी या कांच के बड़े टब को पानी से तीन-चौथाई भर लें।
  3. बोतल के खुले मुंह को ठीक नीचे की ओर रखें और बोतल को बिल्कुल सीधा (ऊर्ध्वाधर) रखते हुए पानी की सतह के नीचे गहराई में दबाएं।
  4. प्रेक्षण 1: पानी बोतल के भीतर प्रवेश नहीं करता। बोतल के मुंह के पास पानी का स्तर रुक जाता है और भीतर की बोतल पूरी तरह सूखी रहती है।
  5. वैज्ञानिक कारण: बोतल खाली नहीं है; वह पूर्णतः वायु से भरी हुई है। चूंकि बोतल को बिल्कुल सीधा दबाया गया है, अतः भीतर फंसी हुई वायु को बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं मिलता। जब तक वायु बाहर नहीं निकलेगी, तब तक जल भीतर प्रवेश नहीं कर सकता, क्योंकि दो भौतिक पदार्थ एक ही समय में एक ही स्थान नहीं घेर सकते।
  6. अब बोतल को पानी के भीतर ही धीरे से थोड़ा सा तिरछा (Tilt) करें।
  7. प्रेक्षण 2: बोतल के मुंह से अचानक बड़े-बड़े चमकदार वायु के बुलबुले गड़गड़ाहट के साथ बाहर निकलते हैं और पानी की सतह पर आकर फूट जाते हैं। उसी क्षण, बाहर का पानी तेजी से बोतल के भीतर भर जाता है।
  8. निष्कर्ष: वायु स्थान (आयतन) घेरती है तथा हमारे आसपास की प्रत्येक खाली दिखने वाली वस्तु वास्तव में वायु से भरी होती है।

1.4 वायुमंडल (Atmosphere): परिभाषा, ऊर्ध्वाधर विस्तार एवं घनत्व प्रवणता

हमारी पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए वायु के इस विशाल, घने और सतत गैसीय आवरण को वायुमंडल (Atmosphere) कहा जाता है। यह वायुमंडलीय आवरण पृथ्वी की सतह से ऊपर अंतरिक्ष की ओर कई सौ किलोमीटर की ऊंचाई तक फैला हुआ है और पृथ्वी के शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा धरातल से बंधा रहता है।

1. गुरुत्वाकर्षण और ऊंचाई के साथ वायुदाब व घनत्व में कमी

  • वायु में भार होता है। अतः वायुमंडल की ऊपरी परतों का अपार भार नीचे की परतों पर भारी दबाव डालता है।
  • इसके परिणामस्वरूप, समुद्र तल (Sea Level) पर वायु का घनत्व और वायुदाब सर्वाधिक होता है (लगभग $101.3\text{ kPa}$)। यहाँ वायु के अणु एक-दूसरे के अत्यंत निकट होते हैं।
  • जैसे-जैसे हम धरातल से ऊपर पहाड़ों और आकाश की ओर बढ़ते हैं, हमारे ऊपर की वायु का भार घटता जाता है। वायु के अणु दूर-दूर बिखर जाते हैं। इस प्रकार, ऊंचाई बढ़ने के साथ वायु विरल (पतली) होती जाती है और वायुमंडलीय दाब तेजी से घटता जाता है।
ऊंचाई (पर्वतीय स्तर)                      वायु अणुओं का घनत्व व दाब
-------------------------------------------------------------------------
ऊपरी वायुमंडल (> 10 किमी)    |  ·   ·   ·   ·   ·   ·  (अत्यधिक विरल / निम्नतम दाब)
माउंट एवरेस्ट शिखर (8,848 मी)|  ·  ·  ·  ·  ·  ·  ·  · (समुद्र तल का मात्र ~33% दाब)
मध्यम पहाड़ी क्षेत्र (2,000 मी) | · · · · · · · · · · · · (मध्यम विरल वायु)
समुद्र तल (धरातल 0 मी)        | ······················· (अधिकतम सघनता व वायुदाब)

2. पर्वतारोही ऊंचे पर्वतों पर ऑक्सीजन सिलेंडर क्यों ले जाते हैं?

जब साहसी पर्वतारोही हिमालय के उत्तुंग शिखरों—जैसे माउंट एवरेस्ट ($8,848\text{ मीटर}$)—पर चढ़ाई करते हैं:

  • अत्यधिक ऊंचाई पर वायु इतनी विरल (पतली) हो जाती है कि वहां का वायुदाब समुद्र तल के सामान्य दाब का मात्र एक-तिहाई ($\approx 33\%$) रह जाता है।
  • यद्यपि वायु में ऑक्सीजन का प्रतिशत रासायनिक रूप से $21\%$ ही रहता है, किंतु विरल वायु के कारण प्रति सांस फेफड़ों में जाने वाले ऑक्सीजन अणुओं की वास्तविक संख्या में $60\%$ से अधिक की भारी कमी आ जाती है।
  • इस अत्यंत विरल वायु में सामान्य सांस लेने से मानव रक्त में ऑक्सीजन का स्तर खतरनाक रूप से गिर जाता है। मस्तिष्क और हृदय को पर्याप्त ऑक्सीजन न मिलने से पर्वतारोही तीव्र सिरदर्द, भ्रम, उल्टी, फेफड़ों में पानी भरने (High Altitude Pulmonary Edema - HAPE) और कोमा का शिकार हो सकते हैं।
  • अतः अपने जीवन की रक्षा करने तथा शरीर की जैविक कोशिकाओं को निरंतर ऊर्जा प्रदान करने के लिए पर्वतारोही पीठ पर भारी स्टील या मिश्रधातु के सिलेंडरों में संपीडित ऑक्सीजन गैस साथ ले जाते हैं और चेहरे पर मास्क लगाकर कृत्रिम रूप से सांस लेते हैं।

मॉड्यूल 2: वायु किससे बनी है? रासायनिक संगठन एवं प्रमुख गैसीय घटक

2.1 ऐतिहासिक दृष्टिकोण: एकल तत्व से गैसीय मिश्रण तक का सफर

18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक संपूर्ण विश्व के दार्शनिक और आरंभिक वैज्ञानिक यह दृढ़ विश्वास रखते थे कि वायु एक अविभाज्य, सरल और एकल 'मूल तत्व' है। प्राचीन यूनानी और भारतीय दर्शन में भी वायु को पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) में एक स्वतंत्र प्राथमिक तत्व माना गया था।

किंतु 18वीं शताब्दी के आधुनिक रसायन विज्ञान के जन्म ने इस प्राचीन धारणा को हमेशा के लिए बदल दिया:

  • वर्ष 1774 में अंग्रेज वैज्ञानिक जोसेफ प्रीस्टले (Joseph Priestley) ने एक विशेष लाल यौगिक (मर्क्यूरिक ऑक्साइड) को गर्म करके एक ऐसी जादुई गैस अलग की, जिसमें मोमबत्ती साधारण हवा की तुलना में चौगुनी चमक के साथ जली और एक चूहा साधारण हवा से दुगने समय तक जीवित रहा। यह ऑक्सीजन की ऐतिहासिक खोज थी।
  • इसके पश्चात वर्ष 1777 में फ्रांसीसी रसायनशास्त्री एंटोनी लेवोइज़िए (Antoine Lavoisier) ने सुव्यवस्थित रासायनिक प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध कर दिया कि वायु कोई एकल तत्व नहीं है, बल्कि यह विभिन्न गैसों का एक समांगी भौतिक मिश्रण (Homogeneous Physical Mixture) है। उन्होंने बताया कि वायु मुख्य रूप से दो गैसों से बनी है—एक जीवन रक्षक और दहन पोषक गैस (जिसे उन्होंने ऑक्सीजन नाम दिया) तथा दूसरी निष्क्रिय और बुझाने वाली गैस (जिसे उन्होंने नाइट्रोजन नाम दिया)।

2.2 स्वच्छ एवं शुष्क वायु का आयतनात्मक रासायनिक संघटन

रासायनिक दृष्टि से हमारे वायुमंडल की स्वच्छ, शुष्क वायु में विभिन्न गैसों का एक अत्यंत सुंतलित एवं निश्चित अनुपात पाया जाता है:

+-------------------------------------------------------------------------+
|                  स्वच्छ एवं शुष्क वायुमंडलीय वायु का रासायनिक संघटन    |
+---------------------+-------------------+-------------------------------+
| गैसीय घटक का नाम     | आयतन के अनुसार %  | मुख्य रासायनिक एवं जैविक भूमिका|
+---------------------+-------------------+-------------------------------+
| 1. नाइट्रोजन (N2)   | 78.08% (~ 78%)    | रासायनिक रूप से अक्रिय;      |
|                     |                   | पादप प्रोटीनों का मूल आधार।   |
+---------------------+-------------------+-------------------------------+
| 2. ऑक्सीजन (O2)     | 20.95% (~ 21%)    | सजीवों के श्वसन एवं दहन हेतु |
|                     |                   | अनिवार्य जीवनदायिनी गैस।      |
+---------------------+-------------------+-------------------------------+
| 3. आर्गन एवं अक्रिय | 0.93% (~ 0.9%)    | रासायनिक अक्रियता; विद्युत बल्ब|
|    गैसें (Noble Gas)|                   | आदि में उपयोगी।               |
+---------------------+-------------------+-------------------------------+
| 4. कार्बन डाइऑक्साइड| 0.04%             | पौधों के प्रकाश संश्लेषण का   |
|    (CO2)            |                   | कच्चा माल; मुख्य हरितगृह गैस। |
+---------------------+-------------------+-------------------------------+
| 5. जलवाष्प          | परिवर्तनशील       | जलचक्र, बादलों के निर्माण, नमी|
|    (Water Vapour)   | (0.1% से 4.0%)    | और वर्षा का एकमात्र कारण।     |
+---------------------+-------------------+-------------------------------+
| 6. धूल एवं धुआं     | स्थान अनुसार भिन्न| ईंधन दहन, पराली एवं धूल से    |
|    (Dust & Smoke)   | (अल्प से अत्यधिक) | उत्पन्न निलंबित ठोस कण।       |
+---------------------+-------------------+-------------------------------+

2.3 वायु के प्रमुख गैसीय घटकों का वैज्ञानिक विश्लेषण

1. नाइट्रोजन ($\text{N}_2$): वायुमंडल का विशाल निष्क्रिय भंडार

  • मात्रा: यह वायुमंडल का विशालतम भाग है, जो वायु के कुल आयतन के लगभग चार-पंचमांश ($78\%$) भाग पर अधिकार रखता है।
  • भौतिक एवं रासायनिक प्रकृति: यह रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन द्वि-परमाण्विक गैस है। कमरे के सामान्य तापमान पर यह अत्यंत अक्रिय (कम क्रियाशील) होती है। यह न तो स्वयं जलती है और न ही जलने में सहायता करती है।
  • ऑक्सीजन का जीवनरक्षक मंदक: यदि वायुमंडल में केवल शुद्ध ऑक्सीजन होती, तो आकाशीय बिजली की एक चिंगारी से पूरी पृथ्वी पर ऐसा भीषण दावानल भड़क उठता जिसे बुझाना असंभव होता। नाइट्रोजन ऑक्सीजन की उग्र सक्रियता को धीमा करने वाले एक 'प्राकृतिक मंदक' (Diluent) का कार्य करती है।
  • जैविक अनिवार्यता: सभी जीवों के शरीर में मांसपेशियों, ऊतकों, एंजाइमों और आनुवंशिक डीएनए (DNA) के निर्माण हेतु प्रोटीन की आवश्यकता होती है, और प्रोटीन का मूल तत्व नाइट्रोजन है। यद्यपि जंतु और पौधे वायु की नाइट्रोजन को सीधे सांस द्वारा ग्रहण नहीं कर सकते, किंतु दलहनी पौधों की जड़ों में रहने वाले राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को जल में घुलनशील नाइट्रेट में बदलकर मिट्टी को उर्वर बनाते हैं, जिसे पौधे जड़ों से सोखते हैं।

2. ऑक्सीजन ($\text{O}_2$): प्राणवायु एवं दहन की पोषक

  • मात्रा: वायु के कुल आयतन का लगभग पाँचवां भाग ($21\%$) ऑक्सीजन है।
  • सजीवों का कोशिकीय श्वसन: मनुष्य, पशु-पक्षी, जल में तैरती मछलियां तथा मिट्टी के सूक्ष्म जीवाणु—सभी भोजन (ग्लूकोज) से जैविक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए निरंतर ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं।
  • दहन की अनिवार्य शर्त: मोमबत्ती, लकड़ी, कोयला, पेट्रोल, रसोई गैस (LPG) आदि किसी भी ईंधन को जलने के लिए ऑक्सीजन की निरंतर आपूर्ति आवश्यक है।

3. कार्बन डाइऑक्साइड ($\text{CO}_2$): पादप भोजन की आधारशिला

  • मात्रा: वायु में इसकी मात्रा बहुत सूक्ष्म (मात्र $0.04\%$) है, किंतु पारिस्थितिक तंत्र में इसका महत्व अपरिमित है।
  • प्रकाश संश्लेषण: हरे पौधे दिन के समय सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में वायु से इसी कार्बन डाइऑक्साइड को अपनी पत्तियों के रंध्रों (Stomata) द्वारा सोखते हैं और पृथ्वी के समस्त सजीव जगत के लिए भोजन (कार्बोहाइड्रेट) का निर्माण करते हैं।
  • उत्पत्ति के स्रोत: सभी जीवों के श्वसन की उच्छ्वास वायु द्वारा, जीवाश्म ईंधनों के दहन से तथा जैविक पदार्थों के सड़ने-गलने से $CO_2$ वायुमंडल में मुक्त होती है।

2.4 जलवाष्प एवं बर्फ के गिलास का संघनन प्रयोग (क्रियाकलाप 3)

वायु कभी भी पूर्णतः सूखी नहीं होती; उसमें सदैव अदृश्य गैसीय जल उपस्थित रहता है जिसे जलवाष्प (Water Vapour) कहते हैं।

बर्फ-गिलास संघनन प्रयोग:

  1. स्टील अथवा कांच का एक साफ गिलास लें और उसकी बाहरी सतह को कपड़े से पोंछकर पूरी तरह सुखा लें।
  2. गिलास में आधा पानी भरें और उसमें बर्फ के कुछ ठोस टुकड़े डाल दें।
  3. गिलास को मेज पर 3 से 5 मिनट के लिए बिना हिलाए रख दें।
  4. प्रेक्षण: कुछ ही क्षणों में गिलास की बाहरी सूखी दीवार पर पानी की नन्हीं-नन्हीं बूंदें चमकने लगती हैं। थोड़ी देर में ये बूंदें आपस में मिलकर नीचे टपकने लगती हैं।
  5. वैज्ञानिक कारण: यह पानी गिलास के भीतर से रिसकर बाहर नहीं आया है। वास्तव में, गिलास के आसपास की सामान्य वायु में जो अदृश्य जलवाष्प तैर रही थी, वह जैसे ही बर्फ के कारण ठंडी हुई गिलास की बाहरी दीवार के संपर्क में आई, उसका तापमान कम हो गया।
  6. तापमान गिरने से जलवाष्प अपनी गैसीय अवस्था को छोड़कर द्रव अवस्था में बदल गई। इस भौतिक प्रक्रम को संघनन (Condensation) कहते हैं।
  7. महत्व: वायु में उपस्थित यही जलवाष्प ऊपर उठकर बादलों में बदलती है और वर्षा के रूप में नदियों, खेतों और भूजल को पुनः जीवन प्रदान करती है।

2.5 धूल एवं धुआं तथा नासिका की जैविक सुरक्षा प्रणाली

1. धूप की किरण में नाचते धूलकण (क्रियाकलाप 5)

  • दोपहर के समय किसी कमरे की सभी खिड़कियां, दरवाजे और पर्दे बंद करके कमरे में गहरा अंधकार कर दें।
  • अब सूर्य की दिशा वाले पर्दे में एक छोटा सा गोल छेद (झरोखा) बनाएं।
  • उस छोटे छेद से सूर्य के प्रकाश की एक अत्यंत चमकदार, सीधी किरण अंधेरे कमरे में प्रवेश करती है।
  • उस प्रकाश पुंज को ध्यानपूर्वक देखने पर हमें उसमें लाखों नन्हें-नन्हें, चमकदार धूल के कण पागलों की तरह इधर-उधर नाचते और चक्कर काटते हुए दिखाई देते हैं (भौतिकी में इसे ब्राउनी गति कहते हैं)।
  • यह सिद्ध करता है कि हमारे आसपास की सामान्य वायु में निरंतर असंख्य ठोस धूलकण (Dust Particles) तैरते रहते हैं।

2. धुआं एवं औद्योगिक खतरे

  • जब लकड़ी, कोयला, पेट्रोल, डीजल या उपले जैसे ईंधनों का अपूर्ण दहन होता है, तो बिना जले कार्बन के बारीक कण (कालिख) और विषैली गैसें (कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड) मिलकर धुआं (Smoke) बनाते हैं।
  • कारखानों में ऊंची चिमनियां इसलिए लगाई जाती हैं ताकि यह हानिकारक धुआं और विषैली गैसें सीधे जमीन पर रहने वाले इंसानों की सांसों में न जाएं और ऊपर आकाश में दूर निकल जाएं।

3. नासिका की सुरक्षा प्रणाली: मुंह से सांस लेना क्यों वर्जित है?

  • जब हम अपनी नाक से सांस लेते हैं, तो प्रकृति ने हमारी नासिका गुहा के भीतर दो अभेद्य सुरक्षा चौकियां बनाई हैं:
    1. नाक के नथुनों के भीतर उगे हुए बारीक, घने रोम (बाल / Cilia)।
    2. नासिका की आंतरिक दीवारों से स्रावित होने वाला चिपचिपा, नम द्रव जिसे श्लेष्मा (Mucus) कहते हैं।
  • जब धूल और धुएं से भरी हवा नाक में प्रवेश करती है, तो ये बारीक बाल और चिपचिपी श्लेष्मा अधिकांश धूलकणों, कालिख और जीवाणुओं को अपने ऊपर ही चिपकाकर रोक लेते हैं, जिससे केवल छनी हुई, शुद्ध और नम हवा ही फेफड़ों तक पहुंचती है।
  • मुंह से सांस लेने की गंभीर हानि: यदि कोई व्यक्ति मुंह खोलकर सांस लेता है, तो मुंह में कोई बाल या श्लेष्मा फिल्टर नहीं होता। धूल, कालिख और रोगाणु बिना किसी रुकावट के सीधे श्वासनली और फेफड़ों के कोमल कोष्ठों में प्रवेश कर जाते हैं, जिससे खांसी, दमा (अस्थमा), ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों के घातक संक्रमण हो जाते हैं।

मॉड्यूल 3: ऑक्सीजन एवं दहन: जल में जलती मोमबत्ती का प्रयोग

3.1 दहन (Burning) की रासायनिक प्रकृति एवं पोषक गैस

दहन अथवा जलना एक अत्यंत तीव्र, ऊर्जा-उत्पादक रासायनिक अभिक्रिया है जिसमें कोई कार्बनयुक्त ईंधन (जैसे मोम, लकड़ी, कोयला या तेल) ऑक्सीजन गैस के साथ रासायनिक संयोग करता है, जिसके परिणामस्वरूप अत्यधिक ऊष्मीय ऊर्जा (गर्मी) तथा प्रकाश उत्सर्जित होता है।

कक्षा 6 के विज्ञान में सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक अंतर यह समझना है कि:

  • ऑक्सीजन स्वयं जलने वाली गैस (ईंधन) नहीं है, बल्कि यह दहन की पोषक (Supporter of Combustion) गैस है।
  • इसका अर्थ यह है कि शुद्ध ऑक्सीजन में यदि केवल चिंगारी लगाई जाए तो ऑक्सीजन स्वयं नहीं जलती; किंतु यदि कोई जलने वाली वस्तु उपस्थित हो, तो ऑक्सीजन के बिना वह आग कभी नहीं पकड़ सकती। ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में आग तुरंत बुझ जाती है।

3.2 जल में जलती मोमबत्ती का ऐतिहासिक प्रयोग (NCERT / SCERT क्रियाकलाप 4)

यह प्रमाणित करने के लिए कि (1) जलने की क्रिया में वायु की ऑक्सीजन खर्च होती है, (2) ऑक्सीजन वायु का लगभग पाँचवां भाग घेरती है, तथा (3) वायु का शेष विशाल भाग जलने में बिल्कुल सहायक नहीं है, जलती मोमबत्ती का प्रसिद्ध प्रयोग किया जाता है:

        अवस्था 1: मोमबत्ती जल रही है                    अवस्था 2: मोमबत्ती बुझ गई
          उल्टा गिलास नीचे रखा गया                        पानी 1/5 भाग ऊपर चढ़ गया
      +----------------------------+                 +----------------------------+
      |         कांच का गिलास      |                 |         कांच का गिलास      |
      |       (5 बराबर भागों में)  |                 |       (5 बराबर भागों में)  |
      |       +================+   |                 |       +================+   |
      |       |      वायु      |   |                 |       | नाइट्रोजन (4/5)|   |
      |       |   (5/5 कुल भाग)|   |                 |       | (अदहन पोषक गैस)|   |
      |       |                |   |                 |       |                |   |
      |       |       (i)      |   |                 |       |       (x)      |   |
      |       |     [ज्वाला]   |   |                 |       |     [बुझ गई]   |   |
      |       +-------||-------+   |                 |       +~~~~~~~~~~~~~~~~+   |
      |       |    मोमबत्ती    |   |                 |       | पानी 1/5 ऊपर चढ़ा  |
      |   ~~~~+~~~~~~~~~~~~~~~~+~~~~   |             |   ~~~~+~~~~~~~~~~~~~~~~+~~~~   |
      |        थाली में रंगीन पानी     |             |        थाली में रंगीन पानी     |
      +----------------------------+                 +----------------------------+

विस्तृत प्रायोगिक विधि:

  1. कांच अथवा प्लास्टिक की एक उथली थाली या चौड़ा टब लें।
  2. थाली के ठीक केंद्र में पिघले हुए मोम की सहायता से एक छोटी मोमबत्ती को सीधा खड़ा करके चिपका दें।
  3. थाली में लगभग 2 से 3 सेंटीमीटर की ऊंचाई तक पानी भर दें। पानी में थोड़ा सा लाल रंग या रोली घोल दें ताकि पानी का स्तर कांच के आर-पार स्पष्ट दिखाई दे।
  4. कांच का एक लंबा, सीधा बेलनाकार गिलास या जार लें। एक स्थायी मार्कर और स्केल की सहायता से गिलास की कुल ऊर्ध्वाधर ऊंचाई को पांच बराबर भागों (Units) में बांटकर निशान लगा लें।
  5. मोमबत्ती की बत्ती को माचिस से जलाएं और उसे कुछ क्षण स्थिरता से जलने दें।
  6. अब उस चिह्नित कांच के गिलास को जलती हुई मोमबत्ती के ऊपर बिल्कुल उल्टा करें और सावधानीपूर्वक सीधा नीचे लाकर थाली के पेंदे पर टिका दें।
  7. अब गिलास के भीतर की ज्वाला और पानी के स्तर का लगातार 60 सेकंड तक अवलोकन करें।

प्रायोगिक प्रेक्षण:

  1. ज्वाला का बुझना: गिलास ढकने के बाद आरंभ के कुछ सेकंड तक मोमबत्ती जलती रहती है, फिर धीरे-धीरे उसकी लौ छोटी और धुंधली होने लगती है, और अंततः मोमबत्ती पूरी तरह बुझ जाती है।
  2. पानी का ऊपर चढ़ना: जैसे-जैसे मोमबत्ती बुझने के करीब पहुंचती है, थाली का लाल रंगीन पानी गिलास के भीतर तेजी से ऊपर की ओर चढ़ने लगता है।
  3. पानी की ऊंचाई: जब पूरी प्रक्रिया समाप्त हो जाती है, तो हम देखते हैं कि गिलास के भीतर पानी का स्तर ठीक पहले निशान तक—अर्थात गिलास के कुल आयतन के लगभग एक-पंचमांश ($1/5$ भाग या $\sim 20\%$) तक—ऊपर चढ़कर स्थिर हो जाता है।
  4. शेष भाग: गिलास के ऊपर का चार-पंचमांश ($4/5$ भाग या $\sim 80\%$) आयतन अभी भी एक अदृश्य गैस से भरा रहता है, किंतु मोमबत्ती बुझी रहती है।

3.3 वैज्ञानिक निष्कर्ष एवं मात्रात्मक विश्लेषण

इस प्रयोग से तीन अत्यंत महत्वपूर्ण वैज्ञानिक निष्कर्ष प्राप्त होते हैं:

निष्कर्ष 1: दहन हेतु ऑक्सीजन अनिवार्य है और जलने में प्रयुक्त होती है

  • मोमबत्ती इसलिए नहीं बुझी कि उसका मोम खत्म हो गया था (मोमबत्ती अभी भी काफी बची हुई है)।
  • वह इसलिए बुझ गई क्योंकि गिलास के भीतर बंद वायु में उपस्थित सीमित मात्रा की ऑक्सीजन गैस मोमबत्ती के जलने में पूरी तरह खर्च (समाप्त) हो गई।
  • मोम के हाइड्रोकार्बन ने ऑक्सीजन से क्रिया करके कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प बना ली। जैसे ही ऑक्सीजन शून्य हुई, रासायनिक अभिक्रिया रुक गई और आग तत्काल बुझ गई।

निष्कर्ष 2: ऑक्सीजन वायु के कुल आयतन का लगभग पाँचवां भाग ($\sim 21\%$) है

  • जब गिलास के भीतर की ऑक्सीजन जलने में खर्च हो गई, तो गिलास के भीतर गैसीय दाब बाहर के सामान्य वायुमंडलीय दाब से कम हो गया।
  • बाहर की वायु ने थाली के पानी पर दबाव डाला, जिससे पानी उस खाली हुए स्थान को भरने के लिए गिलास में ऊपर चढ़ गया।
  • चूंकि चढ़ा हुआ पानी गिलास के कुल आयतन का लगभग $1/5$ भाग ($20\%$) है, अतः यह मात्रात्मक रूप से सिद्ध करता है कि वायु में ऑक्सीजन का अनुपात लगभग $21\%$ (एक-पंचमांश) होता है।

निष्कर्ष 3: वायु का शेष विशाल भाग ($4/5$ भाग) दहन का पोषक नहीं है (नाइट्रोजन)

  • पानी चढ़ने के बाद भी गिलास का $80\%$ भाग एक अदृश्य गैस से भरा रहता है।
  • यदि उस बचे हुए गैसीय भाग में कोई जलती हुई तीली ले जाई जाए, तो वह तुरंत बुझ जाती है।
  • यह सिद्ध करता है कि वायु का सबसे बड़ा घटक—अर्थात नाइट्रोजन ($\text{N}_2$)—जलने की क्रिया में बिल्कुल सहायता नहीं करता और एक अदहन पोषक गैस है।

मॉड्यूल 4: जल एवं मिट्टी में रहने वाले जीव श्वसन कैसे करते हैं?

4.1 कोशिकीय श्वसन की सार्वभौमिक जैविक मांग

पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व ऊर्जा पर टिका है, और सजीवों में यह जैविक ऊर्जा श्वसन (Respiration) के माध्यम से उत्पन्न होती है।

सभी जीवित प्राणी—चाहे वे आकाश में उड़ते पक्षी हों, जमीन पर चलते मनुष्य, गहरे समुद्र की मछलियां हों या मिट्टी के नीचे रेंगते केंचुए—भोजन के पाचन से प्राप्त ग्लूकोज को कोशिकाओं के भीतर तोड़ने के लिए निरंतर ऑक्सीजन का उपभोग करते हैं:

$$\text{ग्लूकोज (भोजन)} + \text{ऑक्सीजन } (\text{O}_2) \longrightarrow \text{कार्बन डाइऑक्साइड } (\text{CO}_2) + \text{जल } (\text{H}_2\text{O}) + \text{जैविक ऊर्जा (ATP)}$$

यदि किसी सजीव को ऑक्सीजन न मिले, तो उसकी कोशिकाओं में ऊर्जा निर्माण रुक जाता है और कुछ ही पलों में उसकी मृत्यु हो जाती है। थल पर रहने वाले जंतु तो अपने फेफड़ों या श्वास रंध्रों द्वारा खुली वायु से सीधे ऑक्सीजन ले लेते हैं, किंतु जल में डूबे रहने वाले अथवा मिट्टी के नीचे दबे रहने वाले जीव सांस कैसे लेते हैं?


4.2 जल में घुली हुई वायु: पानी गर्म करने का प्रयोग (क्रियाकलाप 6)

क्या नदियों, तालाबों और समुद्र के जल में वायु उपस्थित होती है? एक अत्यंत सरल विद्यालयी प्रयोग यह प्रमाणित करता है कि प्राकृतिक जल में प्रचुर मात्रा में वायु घुली रहती है:

               धीमी आंच पर खौलने से पूर्व गर्म होता पानी (< 100°C)
          +------------------------------------------------+
          |             कांच का बीकर                       |
          |                                                |
          |    ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~     |
          |                                                |
          |       o       o       O       o       o        | <-- जल से बाहर निकलती
          |        \       \     /       /       /         |     घुली वायु के बुलबुले
          |       o o     o o   o o     o o     o o        |
          |      ===================================       |
          |      ooooooooooooooooooooooooooooooooooo       | <-- तली पर चिपके हुए
          +------------------------------------------------+     नन्हें-नन्हें बुलबुले
                 ▲            ▲            ▲
                     [बर्नर की धीमी ज्वाला / ट्राइपॉड]

प्रायोगिक विधि एवं प्रेक्षण:

  1. कांच के एक बीकर में नल या तालाब का ताजा पानी आधा भर लें।
  2. बीकर को तिपाई स्टैंड पर रखकर बर्नर की धीमी आंच पर धीरे-धीरे गर्म करें।
  3. पानी के उबलने से काफी पहले ही (लगभग $40^\circ\text{C}$ से $60^\circ\text{C}$ के तापमान पर) बीकर की तली और अंदरूनी कांच की दीवारों का ध्यानपूर्वक निरीक्षण करें।
  4. प्रेक्षण: पानी के खौलने से बहुत पहले ही बीकर की अंदरूनी तली और दीवारों पर सैकड़ों नन्हें-नन्हें चमकदार बुलबुले चिपक जाते हैं। जैसे-जैसे पानी थोड़ा और गर्म होता है, ये बुलबुले बड़े होकर ऊपर उठते हैं और पानी से बाहर निकल जाते हैं।
  5. वैज्ञानिक निष्कर्ष: ये आरंभिक बुलबुले भाप (Steam) नहीं हैं (क्योंकि पानी $100^\circ\text{C}$ से पहले भाप नहीं बनता)। ये बुलबुले जल में घुली हुई वायु हैं!
  6. भौतिक नियम: द्रवों में गैसों की विलेयता (घुलने की क्षमता) तापमान बढ़ने पर घट जाती है। जब ठंडा पानी गर्म होता है, तो उसमें घुली हुई वायु अपनी विलेयता खो देती है और बुलबुलों के रूप में पानी से बाहर निकल जाती है।

जलीय जीवों के श्वसन अनुकूलन:

  • मछलियों के गलफड़े (Gills): मछलियों के सिर के दोनों ओर पतले, लाल, रक्त नलिकाओं से भरपूर विशेष अंग होते हैं जिन्हें गलफड़े (क्लोम / Gills) कहते हैं। मछली मुंह से पानी खींचती है और उसे गलफड़ों के ऊपर से बाहर निकालती है। जल में घुली हुई ऑक्सीजन गलफड़ों की सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं में विसरित हो जाती है और रक्त की कार्बन डाइऑक्साइड पानी में छोड़ दी जाती है।
  • जलीय पौधे: कमल, जलकुंभी तथा जलमग्न पौधे (हाइड्रिला) अपनी पतली पत्तियों की बाह्य त्वचा द्वारा सीधे जल में घुली ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान करते हैं।
  • व्हेल एवं डॉल्फिन (स्तनधारी अपवाद): यद्यपि व्हेल और डॉल्फिन समुद्र में रहती हैं, किंतु वे मछलियां नहीं बल्कि स्तनधारी प्राणी हैं। उनके गलफड़े नहीं होते, बल्कि फेफड़े होते हैं। वे जल में घुली ऑक्सीजन नहीं ले सकतीं। इसलिए वे समय-समय पर पानी की सतह पर ऊपर आती हैं और अपने सिर के ऊपर स्थित 'ब्लोहोल' (श्वास छिद्र) द्वारा वायुमंडलीय खुली हवा में सांस लेती हैं।

4.3 मिट्टी में फंसी वायु: सूखे ढेले पर पानी डालने का प्रयोग (क्रियाकलाप 7)

मिट्टी बाहर से देखने में ठोस और सघन प्रतीत होती है। क्या मिट्टी के भीतर हवा होती है?

         कांच के गिलास में सूखी मिट्टी के ढेले पर पानी डालना
          +----------------------------------------+
          |           कांच का गिलास                |
          |                                        |
          |         o       O       o      O       | <-- सनसनाहट के साथ ऊपर
          |          \     /         \    /        |     उठते वायु के बुलबुले
          |           o   o           o  o         |
          |      +--------------------------+      |
          |      |    मिट्टी का सूखा ढेला   |      |
          |      | (पानी द्वारा हवा विस्थापित)|    |
          |      +--------------------------+      |
          +~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~+

प्रायोगिक विधि एवं प्रेक्षण:

  1. बगीचे या खेत से सूखी मिट्टी का एक ठोस ढेला लें और उसे कांच के एक खाली बीकर में रख दें।
  2. अब ऊपर से बीकर में धीरे-धीरे साफ पानी उंडेलें।
  3. प्रेक्षण: पानी डालते ही मिट्टी के ढेले से तीव्र सनसनाहट (फुसफुसाहट / Effervescence) के साथ झाग उठता है और ढेले की सतह से हवा के सैकड़ों बुलबुले तेजी से पानी के ऊपर भागते हैं।
  4. वैज्ञानिक कारण: मिट्टी ठोस पत्थर नहीं है; वह खनिज कणों का एक छिद्रयुक्त (Porous) ढांचा है। मिट्टी के कणों के बीच सूक्ष्म खाली जगहें होती हैं जिन्हें मृदा रंध्र (Soil Pores) कहते हैं। सूखी मिट्टी में ये सभी रंध्र वायु से भरे होते हैं। जब भारी पानी डाला जाता है, तो वह रंध्रों में घुसकर फंसी हुई वायु को बाहर धकेल देता है, जो बुलबुलों के रूप में ऊपर उठती है।

भूमिगत जीवों का श्वसन एवं केंचुए का वर्षा रहस्य:

  • केंचुए का त्वचीय श्वसन: केंचुओं में न फेफड़े होते हैं और न गलफड़े। वे अपनी पतली, सदैव नम और श्लेष्मायुक्त त्वचा द्वारा सीधे श्वसन करते हैं। मिट्टी के रंध्रों में जो वायु फंसी होती है, उसकी ऑक्सीजन केंचुए की नम त्वचा से विसरित होकर सीधे उसकी रक्त नलिकाओं में पहुंचती है। पौधों की जड़ें भी इन्हीं मृदा रंध्रों की वायु से श्वसन करती हैं।
  • भारी वर्षा में केंचुओं का जमीन पर बाहर आने का वैज्ञानिक रहस्य:
    • सामान्य दिनों में केंचुए जमीन के भीतर अपनी गहरी सुरंगों में आराम से रहते हैं क्योंकि मिट्टी के रंध्रों में पर्याप्त हवा होती है।
    • किंतु जब मूसलाधार मानसूनी बारिश होती है, तो वर्षा का जल भूमि में रिसकर मिट्टी के सभी सूक्ष्म रंध्रों, दरारों और केंचुओं की सुरंगों को पूरी तरह पानी से लबालब भर देता है।
    • मिट्टी की सारी वायु बाहर निकल जाती है। भूमिगत सुरंगों में ऑक्सीजन समाप्त हो जाने से केंचुओं का दम घुटने लगता है।
    • पानी में डूबकर मरने से बचने तथा खुली हवा में सांस लेने के लिए ही केंचुए भारी बारिश के समय जमीन से बाहर निकलकर सतह पर रेंगने लगते हैं।

मॉड्यूल 5: वायुमंडल में ऑक्सीजन का प्रतिस्थापन एवं ऑक्सीजन-कार्बन डाइऑक्साइड संतुलन चक्र

5.1 वैश्विक श्वसन बनाम ऑक्सीजन की अनवरत आपूर्ति का विरोधाभास

पृथ्वी पर प्रति सेकंड होने वाले ऑक्सीजन उपभोग के विशाल पैमाने पर विचार करें:

  1. अरबों जीवधारियों का अनवरत श्वसन: संपूर्ण पृथ्वी पर 8 अरब से अधिक मानव तथा खरबों स्थलीय वन्यजीव, मवेशी, पक्षी, कीट एवं मृदा सूक्ष्मजीव वर्ष के 365 दिन, 24 घंटे लगातार वायुमंडल से ऑक्सीजन ($O_2$) ग्रहण कर रहे हैं और कोशिकीय श्वसन के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) निष्कासित कर रहे हैं।
  2. जलीय पारितंत्र में उपभोग: महासागरों, झीलों, तालाबों एवं गंगा जैसी विशाल नदियों में रहने वाले खरबों जलीय जीव जल में घुली ऑक्सीजन को लगातार अवशोषित कर रहे हैं।
  3. दहन एवं औद्योगिक खपत: करोड़ों ताप विद्युत संयंत्र (Thermal Power Plants), ऑटोमोबाइल इंजन, कारखाने, ईंट-भट्ठे, घरेलू चूल्हे और कृषि अपशिष्ट का दहन भारी मात्रा में वायुमंडलीय ऑक्सीजन का उपभोग करते हैं।

इस निरंतर और अत्यंत तीव्र उपभोग के बावजूद, हजारों वर्षों के वैज्ञानिक प्रेक्षण यह स्पष्ट करते हैं कि वायुमंडल में ऑक्सीजन का अनुपात लगभग $21\%$ और कार्बन डाइऑक्साइड का अनुपात लगभग $0.04\%$ पर स्थिर बना हुआ है। यह प्राकृतिक तथ्य यह सिद्ध करता है कि वायुमंडल में ऑक्सीजन का कोई शक्तिशाली और सतत पुनर्भरण स्रोत (Replenishment Mechanism) कार्यरत है।


5.2 प्रकाश संश्लेषण: प्रकृति का ऑक्सीजन उत्पादक कारखाना

हरे पौधे वायुमंडल में ऑक्सीजन लौटाने वाले एकमात्र प्राकृतिक जैविक तंत्र हैं। यह प्रक्रिया प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) कहलाती है।

1. रासायनिक प्रक्रिया एवं समीकरण

हरे पौधों की पत्तियों में उपस्थित हरा वर्णक क्लोरोफिल (Chlorophyll) सूर्य के प्रकाश की सौर ऊर्जा को अवशोषित करता है। पौधे जड़ों द्वारा भूमि से जल ($H_2O$) और पत्तियों के रंध्रों (Stomata) द्वारा वायु से कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) प्राप्त करते हैं:

$$6CO_2 + 6H_2O \xrightarrow[\text{क्लोरोफिल}]{\text{सूर्य का प्रकाश}} C_6H_{12}O_6\text{ (ग्लूकोज)} + 6O_2\uparrow\text{ (ऑक्सीजन)}$$

इस प्रकाश-रासायनिक अभिक्रिया के परिणामस्वरूप पौधे कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज) के रूप में खाद्य ऊर्जा का संचय करते हैं तथा सह-उत्पाद (By-product) के रूप में शुद्ध ऑक्सीजन गैस ($O_2$) वायुमंडल में विसर्जित करते हैं।

2. एक प्रमुख वैज्ञानिक भ्रांति का निवारण: क्या पौधे केवल कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं?

अनेक छात्र इस भ्रांति के शिकार होते हैं कि "पौधे केवल कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते हैं और ऑक्सीजन नहीं लेते"। यह पूर्णतः असत्य है:

  • पौधे भी अन्य सभी सजीवों की भांति अपने जीवित ऊतकों के रखरखाव हेतु दिन-रात (24 घंटे) श्वसन (Respiration) करते हैं, जिसमें वे ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं।
  • परंतु दिन के समय, सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में, प्रकाश संश्लेषण की दर श्वसन की दर से 10 से 20 गुना अधिक तीव्र होती है।
  • अतः पौधे दिन में जितनी ऑक्सीजन अपने श्वसन में उपयोग करते हैं, उससे कहीं अधिक मात्रा में अतिरिक्त ऑक्सीजन प्रकाश संश्लेषण द्वारा वायुमंडल में छोड़ देते हैं।
  • इस प्रकार दिन के अंत में पौधों द्वारा ऑक्सीजन का शुद्ध धनात्मक उत्पादन (Net Positive Production) होता है, जो संपूर्ण जीव-जगत के श्वसन के लिए पर्याप्त होता है।

5.3 ऑक्सीजन-कार्बन डाइऑक्साइड चक्र की गतिकी

वायुमंडल में गैसों का संतुलन पौधों और जंतुओं के मध्य एक अटूट सहजीविता (Symbiosis) और चक्रीय अंतःक्रिया पर आधारित है:

चक्र का चरण जैविक प्रक्रिया सम्मिलित जीव प्रयुक्त गैस निष्कासित गैस
गैस उपभोग कोशिकीय श्वसन सभी जंतु, मानव, सूक्ष्मजीव एवं पौधे (रात-दिन) ऑक्सीजन ($O_2$) कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$)
दहन उपभोग ईंधन दहन मानव उद्योग, वाहन, चूल्हा, जंगल की आग ऑक्सीजन ($O_2$) कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) + धुआँ
गैस उत्पादन प्रकाश संश्लेषण केवल हरे पौधे, शैवाल एवं साइनोबैक्टीरिया (दिन में) कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) ऑक्सीजन ($O_2$)

यदि पृथ्वी से समस्त हरे पौधों को समाप्त कर दिया जाए, तो कुछ ही दशकों में वायुमंडल की ऑक्सीजन समाप्त हो जाएगी और कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर प्राणघातक सीमा तक बढ़ जाएगा। ठीक इसी प्रकार, यदि पृथ्वी पर कोई जंतु न रहे, तो पौधों को प्रकाश संश्लेषण हेतु आवश्यक कार्बन डाइऑक्साइड का जैविक स्रोत मिलना बाधित हो जाएगा। यह अंतःक्रिया जैव-मंडल के संतुलन की नींव है।


5.4 रात्रि में सघन वृक्षों के नीचे सोने का वैज्ञानिक निषेध

बिहार और संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में पारंपरिक रूप से यह हिदायत दी जाती है कि रात्रि के समय सघन और विशाल वृक्षों (जैसे पीपल, बरगद, आम) के नीचे नहीं सोना चाहिए। इसके पीछे का शुद्ध वैज्ञानिक कारण निम्नलिखित है:

  1. रात्रि में प्रकाश संश्लेषण का पूर्ण विराम: सूर्य के प्रकाश की अनुपस्थिति के कारण रात में पौधे प्रकाश संश्लेषण नहीं कर सकते; अतः रात में ऑक्सीजन का कोई उत्पादन नहीं होता।
  2. सक्रिय श्वसन एवं कार्बन डाइऑक्साइड निष्कासन: पेड़ के विशाल तने, शाखाएं, पत्तियां और जड़ें रात भर अनवरत श्वसन करती हैं, जिसमें वे आसपास की वायु से ऑक्सीजन अवशोषित करती हैं और सांद्र कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) निष्कासित करती हैं।
  3. स्थानीय गैस संकेंद्रण: शांत और मंद हवा वाली रातों में विशाल पेड़ की घनी पत्तियों के नीचे भारी कार्बन डाइऑक्साइड गैस एकत्रित हो जाती है और ऑक्सीजन की स्थानीय सांद्रता घट जाती है।
  4. यदि कोई व्यक्ति ऐसी स्थिति में पेड़ के ठीक नीचे सोता है, तो उसे हाइपोक्सिया (Hypoxia - ऑक्सीजन की कमी), दम घुटना, सिरदर्द, बेचैनी और छाती में भारीपन का अनुभव हो सकता है। प्राचीन काल में वैज्ञानिक समझ के अभाव में लोग इसे "भूत-प्रेत का साया" मान लेते थे, जबकि वास्तव में यह $CO_2$ की अधिकता और $O_2$ की अल्पता का शारीरिक प्रभाव है।

5.5 वनों की कटाई और वैश्विक गैसीय असंतुलन

मानव की अनियंत्रित विकास गतिविधियों, वनों की कटाई (Deforestation) और जीवाश्म ईंधनों (कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस) के अत्यधिक दोहन ने इस प्राकृतिक गैसीय चक्र को संकट में डाल दिया है:

  • ऑक्सीजन उत्पादक स्रोतों का ह्रास: विश्व भर में प्रतिवर्ष लाखों हेक्टेयर वर्षावन काटे जा रहे हैं, जिससे पृथ्वी की ऑक्सीजन उत्पादन क्षमता घट रही है।
  • कार्बन डाइऑक्साइड संचयन एवं ग्लोबल वार्मिंग: $CO_2$ एक प्रमुख ग्रीनहाउस गैस (Greenhouse Gas) है। वायुमंडल में इसकी सांद्रता बढ़ने से यह पृथ्वी से उत्सर्जित होने वाली अवरक्त ऊष्मा (Infrared Heat) को रोक लेती है, जिससे वैश्विक तापमान में वृद्धि (Global Warming) और जलवायु परिवर्तन हो रहा है।
  • पर्यावरणीय सीख: वायुमंडलीय संतुलन को बनाए रखने के लिए वृक्षारोपण (Afforestation), वन संरक्षण तथा हरित ऊर्जा स्रोतों का उपयोग अपरिहार्य है।

मॉड्यूल 6: गतिशील वायु (पवन), गतिज ऊर्जा एवं वायु के बहुआयामी व्यावहारिक अनुप्रयोग

6.1 गतिशील वायु: पवन और उसकी भौतिक प्रकृति

स्थैतिक अवस्था में वायु शांत प्रतीत होती है, परंतु जब वायुमंडलीय दाब के अंतर (Pressure Difference) के कारण वायु उच्च दाब क्षेत्र से निम्न दाब क्षेत्र की ओर गति करती है, तो इसे पवन (Wind) कहा जाता है।

1. द्रव्यमान और गतिज ऊर्जा का भौतिक संबंध

चूंकि वायु विभिन्न गैसीय अणुओं का मिश्रण है, अतः इसका एक निश्चित द्रव्यमान ($m$) होता है। जब यह द्रव्यमान किसी वेग ($v$) से गतिशील होता है, तो यह प्रचुर गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) वहन करता है:

$$E_k = \frac{1}{2}mv^2$$

पवन का वेग जितना अधिक होगा, उसके द्वारा उत्पन्न बल और गतिज ऊर्जा उतनी ही प्रचंड होगी। उदाहरणार्थ, यदि पवन का वेग दोगुना कर दिया जाए, तो उसकी गतिज ऊर्जा चार गुना ($2^2 = 4$) बढ़ जाती है। यही कारण है कि तीव्र चक्रवात और आंधी विशाल वृक्षों और छप्परों को उखाड़ फेंकने में सक्षम होते हैं।

2. पवन के मापन हेतु वैज्ञानिक उपकरण

  • पवन-दिशा सूचक (Wind Vane / Weathercock): यह उपकरण एक क्षैतिज अक्ष पर घूमने वाले तीर के आकार का होता है, जो वायु के प्रवाह की दिशा को दर्शाता है।
  • पवनमापी (Anemometer): इसमें तीन या चार खोखले कप (Cups) एक ऊर्ध्वाधर धुरी पर लगे होते हैं। हवा चलने पर कप घूमते हैं और उनके घूर्णन की गति से पवन का वेग (किमी/घंटा अथवा मीटर/सेकंड) मापा जाता है।

6.2 पवन चक्की (Windmill) की कार्यप्रणाली और अनुप्रयोग

पवन चक्की एक यांत्रिक युक्ति है जो बहती हुई पवन की रैखिक गतिज ऊर्जा को घूर्णन यांत्रिक ऊर्जा (Rotational Mechanical Energy) में और फिर विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती है।

1. पवन चक्की की आंतरिक संरचना एवं कार्य-सिद्धांत

  • ब्लेड्स (Paddles/Blades): पवन चक्की में एक ऊंचे खंभे पर विशाल पंखे जैसे तीन या चार तिरछे मुड़े हुए ब्लेड लगे होते हैं। जब पवन इन ब्लेडों से टकराती है, तो वायुगतिकीय लिफ्ट (Aerodynamic Lift) और दबाव के अंतर से वे तेजी से घूमने लगते हैं।
  • मुख्य धुरी (Shaft) एवं गियरबॉक्स: घूमते हुए ब्लेड एक केंद्रीय शाफ्ट को घुमाते हैं। गियरबॉक्स इस घूर्णन गति की दर को बढ़ाता है।
  • जनरेटर (Generator): आधुनिक पवन टर्बाइनों में शाफ्ट एक विद्युत जनरेटर से जुड़ा होता है, जो चुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) के सिद्धांत पर स्वच्छ, हरित विद्युत उत्पन्न करता है।

2. पवन चक्की के प्रमुख पारंपरिक एवं आधुनिक उपयोग

  1. भूमिगत जल निष्कर्षण (Pumping Groundwater): पारंपरिक पवन चक्कियां गियर तंत्र के माध्यम से नलकूप या कुएं के पिस्टन पंप को ऊपर-नीचे चलाकर सिंचाई और पेयजल हेतु भूजल खींचने का कार्य करती हैं।
  2. अनाज की पिसाई (Flour Milling): पवन चक्की की यांत्रिक ऊर्जा से भारी पत्थर के पाट (Chakki stones) घुमाकर गेहूं, मक्का और अन्य अनाजों की पिसाई की जाती है।
  3. विद्युत उत्पादन (Electricity Generation): आधुनिक 'विंड फार्म्स' (Wind Farms) में स्थापित विशाल पवन टर्बाइन ग्रिड हेतु मेगावाट स्तर पर स्वच्छ बिजली का उत्पादन करते हैं, जिससे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होती है। भारत के तटीय राज्यों (तमिलनाडु, गुजरात) में विशाल पवन ऊर्जा फार्म स्थापित हैं।

6.3 दैनिक जीवन एवं प्रकृति में वायु के अन्य महत्वपूर्ण कार्य

वायु केवल श्वसन और दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि पृथ्वी के भौतिक, जैविक और तकनीकी तंत्र इसके अनेक गुणों पर निर्भर करते हैं:

1. जल-चक्र में अपरिहार्य भूमिका

  • वाष्पीकरण को गति देना: बहती हुई वायु गीले कपड़ों, नदियों, तालाबों और खेतों की सतह से जल के वाष्पीकरण की दर को कई गुना बढ़ा देती है, क्योंकि यह सतह के निकट की संतृप्त वायु को हटाकर शुष्क वायु लाती है।
  • बादलों का संचलन एवं वर्षा वितरण: जलवाष्प युक्त गर्म और हल्की वायु ऊपर उठकर बादलों का निर्माण करती है। पवन इन बादलों को महासागरों से हजारों किलोमीटर दूर अंतर्देशीय भूभागों (जैसे बिहार के मैदानी इलाकों) तक ले जाती है, जिससे मानसूनी वर्षा संभव होती है। यदि पवन न चले, तो वर्षा केवल महासागरों पर ही सीमित रह जाएगी और संपूर्ण स्थल भाग मरुस्थल बन जाएगा।

2. पादप प्रजनन: परागण और बीजों का प्रकीर्णन (Seed Dispersal)

  • अनेक पौधों के परागकण इतने सूक्ष्म और हल्के होते हैं कि पवन उन्हें नर पुष्प से मादा पुष्प तक उड़ा ले जाती है (वायु-परागण / Anemophily), जैसे मक्का, गेहूं, धान और घास में।
  • बीज प्रकीर्णन: सहजन (Drumstick), मदार (आक / Calotropis), कपास, डंडेलियन और मेपल के बीजों में पंख (Wings) या रोमदार बाल (Hairy tufts) होते हैं। पवन इन बीजों को मातृ-वृक्ष से मीलों दूर उड़ा ले जाती है, जिससे पौधों का भौगोलिक फैलाव होता है और संकुलन (Overcrowding) रुकता है।

3. ध्वनि संचरण का भौतिक माध्यम

  • ध्वनि तरंगें (Sound Waves) अनुदैर्ध्य यांत्रिक तरंगें (Longitudinal Mechanical Waves) हैं, जिन्हें गति करने के लिए एक भौतिक द्रव्यमान वाले माध्यम की आवश्यकता होती है।
  • वायुमंडलीय वायु के कण कंपन करते हुए ध्वनि को संपीडन (Compression) और विरलन (Rarefaction) के रूप में हमारे कानों तक पहुंचाते हैं। निर्वात (पूर्ण शून्य वायु) में हम एक-दूसरे की आवाज नहीं सुन सकते। चंद्रमा पर वायुमंडल न होने के कारण अंतरिक्ष यात्री सीधे ध्वनि द्वारा वार्तालाप नहीं कर सकते; उन्हें रेडियो संचार का उपयोग करना पड़ता है।

4. परिवहन और विमानन में उत्थापक बल (Aerodynamic Lift)

  • पक्षियों, चमगादड़ों, कीटों और मानवरचित हवाई जहाजों, हेलीकॉप्टरों, ग्लाइडरों तथा पैराशूटों को वायु अपने घनत्व और उत्प्लावन बल द्वारा हवा में उड़ने और तैरने में सहायता प्रदान करती है।
  • पाल नौकाएं (Sailboats): ऐतिहासिक काल से भारतीय और विश्व के नाविक विशाल कपड़ों की पालों (Sails) पर पवन के धक्के का उपयोग करके विशाल महासागरों में जलपोत चलाते रहे हैं।
  • गर्म हवा का गुब्बारा (Hot Air Balloon): गर्म करने पर वायु का घनत्व बाहर की ठंडी वायु से कम हो जाता है, जिससे आर्किमिडीज के सिद्धांत के अनुसार गुब्बारा ऊपर की ओर उठने लगता है।

5. खेलकूद और दैनिक प्रौद्योगिकी

  • फुटबॉल, वॉलीबॉल, बास्केटबॉल और साइकिल के टायरों में संपीड़ित वायु (Compressed Air) भरकर उन्हें लचीला, हल्का और गतिशील बनाया जाता है।
  • बच्चों की फिरकी (Pinwheel) और पतंग (Kite) का आकाश में उड़ना पूरी तरह गतिशील पवन के दबाव पर आधारित है। वायवीय उपकरण (Pneumatic Tools) जैसे भारी ड्रिल और बस-ट्रक के वायवीय ब्रेक (Air Brakes) संपीड़ित वायु की शक्ति पर कार्य करते हैं।

मॉड्यूल 7: वायु प्रदूषण, वातावरणीय स्वास्थ्य एवं बिहार में संरक्षण पहलें ('जल-जीवन-हरियाली')

7.1 वायु प्रदूषण की परिभाषा एवं रासायनिक स्वरूप

सामान्य अवस्था में शुद्ध वायु का संयोजन जीवधारियों के स्वास्थ्य और पारिस्थितिक तंत्र के अनुकूल होता है। परंतु मानवीय गतिविधियों द्वारा जब अवांछित गैसें, विषैले रसायन, धूलिकण और धुआँ वायुमंडल में इतनी अधिक मात्रा में मिल जाते हैं कि वे मानव, जंतुओं, वनस्पतियों और भवनों को हानि पहुँचाने लगें, तो इस स्थिति को वायु प्रदूषण (Air Pollution) कहते हैं।

प्रमुख वायु प्रदूषक और उनके हानिकारक प्रभाव:

  1. कार्बन मोनोऑक्साइड ($CO$): ईंधनों (पेट्रोल, डीजल, कोयला, लकड़ी) के अपूर्ण दहन से उत्पन्न अत्यधिक विषैली, रंगहीन और गंधहीन गैस। यह रक्त के हीमोग्लोबिन से ऑक्सीजन की तुलना में 200 गुना अधिक तीव्रता से जुड़कर कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है, जिससे ऊतकों तक ऑक्सीजन की आपूर्ति रुक जाती है और दम घुटने से मृत्यु तक हो सकती है।
  2. सल्फर डाइऑक्साइड ($SO_2$) एवं नाइट्रोजन के ऑक्साइड ($NO_x$): ताप विद्युत गृहों, तेल रिफाइनरियों और वाहनों से उत्सर्जित गैसें। ये वायुमंडलीय जलवाष्प से क्रिया करके सल्फ्यूरिक अम्ल ($H_2SO_4$) और नाइट्रिक अम्ल ($HNO_3$) बनाती हैं, जो अम्लीय वर्षा (Acid Rain) के रूप में गिरकर ऐतिहासिक इमारतों (जैसे संगमरमर के स्मारक), फसलों और जलीय जीवन को नष्ट करती हैं।
  3. पार्टिकुलेट मैटर ($PM_{2.5}$ एवं $PM_{10}$): वायु में तैरने वाले अत्यंत सूक्ष्म ठोस व तरल कण। $2.5$ माइक्रोमीटर से छोटे कण ($PM_{2.5}$) श्वास के साथ सीधे फेफड़ों की कुपिकाओं (Alveoli) और रक्त प्रवाह में प्रवेश कर जाते हैं, जिससे अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, हृदय रोग और फेफड़ों का कैंसर होता है।

7.2 शीतकालीन स्मॉग (धुंध) और तापीय व्युत्क्रमण परिघटना

सर्दियों के महीनों में, विशेष रूप से उत्तर भारत और बिहार के गंगा के मैदानी इलाकों (जैसे पटना, मुजफ्फरपुर, गया) में एक विशिष्ट और गंभीर वायुमंडलीय स्थिति उत्पन्न होती है जिसे स्मॉग (Smog) कहा जाता है।

1. स्मॉग का निर्माण

  • 'स्मॉग' शब्द धुआँ (Smoke) और कोहरा (Fog) के सम्मिश्रण से बना है:

$$\text{धुआँ (Smoke)} + \text{कोहरा (Fog)} = \text{स्मॉग (Smog)}$$

सर्दियों में जब वातावरण की अत्यधिक नमी घनीभूत होकर कोहरा बनाती है, तो ईंधनों, वाहनों और पराली दहन से निकलने वाला धुआँ और कालिख के कण इसमें फंस जाते हैं।

2. तापीय व्युत्क्रमण (Thermal Inversion) का प्रभाव

  • सामान्यतः ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान घटता है, जिससे सतह की गर्म वायु प्रदूषकों को लेकर ऊपर उड़ जाती है।
  • परंतु सर्दियों की ठंडी रातों में पृथ्वी की सतह तेजी से ठंडी हो जाती है, जिससे ठंडी, सघन वायु की परत जमीन के निकट बैठ जाती है और उसके ऊपर गर्म वायु की परत एक 'ढक्कन' की तरह छा जाती है।
  • इस तापीय व्युत्क्रमण के कारण धुआँ, धूल और विषैली गैसें ऊपर नहीं उठ पातीं और जमीन के निकट एक विषैले चैंबर की भांति फंस जाती हैं। इससे दृश्यता (Visibility) शून्य के करीब पहुंच जाती है, श्वास लेना दूषित हो जाता है और वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI - Air Quality Index) 'गंभीर' (Severe) श्रेणी ($> 400$) में पहुंच जाता है।

7.3 बिहार के विशिष्ट संदर्भ में वायु प्रदूषण के कारक

बिहार के मैदानी भाग अपनी भौगोलिक स्थिति, सघन आबादी और विशिष्ट आर्थिक गतिविधियों के कारण वायु प्रदूषण के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं:

  1. ईंट-भट्ठे (Brick Kilns): बिहार के ग्रामीण और उपनगरीय क्षेत्रों में हजारों पारंपरिक ईंट-भट्ठे कार्यरत हैं। इनमें कोयले, लकड़ी और रबर के टायरों के दहन से भारी मात्रा में काला धुआँ, $SO_2$ और कालिख (Soot) उत्सर्जित होती है।
  2. पराली (कृषि अवशेष) दहन (Stubble Burning): धान और गेहूं की कटाई के बाद खेतों में बचे अवशेषों को जलाने से विशाल धुएं के बादल उठते हैं जो पूरे राज्य की वायु को प्रदूषित करते हैं।
  3. सड़क की उड़ती धूल (Road Dust): कच्ची सड़कों, अधूरे निर्माण कार्यों और बिना ढके निर्माण सामग्री के परिवहन से वातावरण में $PM_{10}$ और सिलिका कणों की सघनता बढ़ जाती है।
  4. घरेलू बायोमास ईंधन: ग्रामीण क्षेत्रों में भोजन पकाने हेतु उपले (गोइठा), सूखी लकड़ी और कृषि अवशेषों का उपयोग बंद कमरों में अत्यधिक धुआँ पैदा करता है, जिससे ग्रामीण महिलाओं और बच्चों में श्वसन रोग होते हैं।

7.4 बिहार सरकार की पर्यावरण संरक्षण पहल: 'जल-जीवन-हरियाली' अभियान

वायु प्रदूषण के संकट से निपटने और राज्य के प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र को पुनर्जीवित करने हेतु बिहार सरकार ने एक युगांतरकारी समग्र कार्यक्रम 'जल-जीवन-हरियाली अभियान' प्रारंभ किया है:

  • मिशन का मूल दर्शन: "जल और हरियाली है, तभी जीवन सुरक्षित है।" यह अभियान यह स्वीकार करता है कि स्वच्छ वायु और प्रचुर जल का अस्तित्व सघन हरित आवरण (Forest Cover) पर निर्भर करता है।
  • वृहद पौधारोपण (Afforestation): राज्य भर में सड़कों, नहरों के किनारों, सरकारी परिसरों और निजी भूखंडों पर करोड़ों छायादार और ऑक्सीजन उत्पादक वृक्षों (जैसे पीपल, नीम, बरगद, शीशम) का रोपण किया गया, जिससे बिहार का हरित आवरण लगभग $9\%$ से बढ़कर $15\%$ से अधिक करने का लक्ष्य रखा गया।
  • स्वच्छ प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहन: पारंपरिक ईंट-भट्ठों को प्रदूषण-नियंत्रक 'जिग-जैग' (Zig-Zag) तकनीक में परिवर्तित करना अनिवार्य किया गया, जिससे धुएं के उत्सर्जन में $70\%$ तक की कमी आई।
  • स्वच्छ रसोई ईंधन (उज्ज्वला योजना व सौर ऊर्जा): बायोमास चूल्हों के स्थान पर एलपीजी सिलेंडरों और सौर ऊर्जा चालित उपकरणों को बढ़ावा देकर घरेलू वायु प्रदूषण को न्यूनतम किया जा रहा है।

7.5 व्यक्तिगत स्तर पर स्वच्छ वायु संरक्षण हेतु नागरिक कर्तव्य

प्रत्येक छात्र और नागरिक अपने दैनिक आचरण में निम्नलिखित वैज्ञानिक उपायों को अपनाकर वायु को स्वच्छ रखने में योगदान दे सकता है:

  1. सामूहिक व गैर-मोटर चालित परिवहन: छोटी दूरियों के लिए पैदल चलना या साइकिल चलाना तथा लंबी यात्राओं हेतु सार्वजनिक बसों या ट्रेनों का उपयोग करना।
  2. कूड़ा-कचरा व पत्तियों को जलाने पर पूर्ण रोक: सूखे पत्तों और जैविक कचरे को जलाने के बजाय उन्हें गड्ढे में डालकर कंपोस्ट खाद तैयार करना।
  3. 'एक छात्र, एक पेड़' संकल्प: अपने जन्मदिवस या विशेष अवसरों पर कम से कम एक स्थायी वृक्ष लगाना और उसकी पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करना।
  4. दीपावली व उत्सवों पर आतिशबाजी का त्याग: पटाखों से निकलने वाले विषाक्त भारी धातुओं (बेरियम, लेड) और धुएं से बचना।
  5. ऊर्जा की बचत: अनावश्यक जलते हुए पंखों, बल्बों और उपकरणों को बंद करना, क्योंकि विद्युत बचत से कोयला-आधारित ताप विद्युत गृहों में ईंधन की खपत और धुआँ कम होता है।

महत्वपूर्ण रासायनिक सूत्र, अभिक्रियाएँ एवं समीकरण

वायुमंडलीय संघटन एवं गुरुत्वीय घनत्व ढांचा (Atmospheric Composition & Gravitational Density Framework)

वायुमंडल पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव द्वारा बंधा हुआ गैसों का एक बहुपरतीय आवरण है।

  1. गैसीय संघटन: शुष्क वायु का रासायनिक संगठन अत्यंत स्थिर रहता है: नाइट्रोजन ($78\%$), ऑक्सीजन ($21\%$), आर्गन ($0.9\%$), कार्बन डाइऑक्साइड ($0.04\%$) तथा अन्य दुर्लभ गैसें। जलवाष्प एवं धूलिकण स्थान और मौसम के अनुसार परिवर्तनशील होते हैं।
  2. गुरुत्वीय संपीडन एवं घनत्व प्रवणता: समुद्र तल पर वायुमंडल की समस्त ऊपरी परतों का भार नीचे की वायु को संपीडित करता है, जिससे समुद्र तल पर वायु का घनत्व ($1.225 kg/m^3$) एवं दाब सर्वाधिक होता है।
  3. ऊंचाई के साथ विरलता: जैसे-जैसे हम पर्वतों पर ऊपर चढ़ते हैं, गुरुत्वाकर्षण बल और ऊपरी वायु का भार कम होता जाता है, जिससे वायु के अणु दूर-दूर हो जाते हैं और वायु विरल हो जाती है। माउंट एवरेस्ट ($8,848 m$) पर वायुमंडलीय दाब समुद्र तल का केवल एक-तिहाई रह जाता है, जिससे श्वसन हेतु ऑक्सीजन के पर्याप्त अणु नहीं मिल पाते और कृत्रिम ऑक्सीजन सिलिंडर आवश्यक हो जाता है।
दहन रससमीकरणमिति एवं ऑक्सीजन सहायक ढांचा (Combustion Stoichiometry & Oxygen Support Framework)

दहन एक ऊष्माक्षेपी रासायनिक प्रक्रिया है जिसमें कोई ईंधन ऑक्सीजन के साथ तीव्र अभिक्रिया करके ऊष्मा, प्रकाश और गैसीय उत्पाद उत्पन्न करता है।

  1. त्रि-तत्व दहन त्रिभुज (Fire Triangle): दहन के लिए तीन घटकों का एक साथ होना अनिवार्य है: ईंधन (Fuel), प्रज्वलन ताप (Ignition Temperature) और ऑक्सीजन ($O_2$)।
  2. ऑक्सीजन की विशिष्ट भूमिका: वायु का केवल $21\%$ भाग (ऑक्सीजन) दहन में सक्रिय रूप से भाग लेता है। शेष लगभग $79\%$ भाग (मुख्यतः नाइट्रोजन) रासायनिक रूप से अक्रिय रहकर दहन की गति को नियंत्रित रखता है।
  3. जल स्तर वृद्धि का सिद्धांत: जब जल से भरी उथली थाली में जलती मोमबत्ती पर बीकर उल्टा रखा जाता है, तो मोमबत्ती बीकर के भीतर की सीमित ऑक्सीजन का उपभोग करती है। ऑक्सीजन समाप्त होने पर लौ बुझ जाती है। बीकर के भीतर गैसीय आयतन में कमी और गैसों के ठंडा होने से आंतरिक दाब घट जाता है, जिसके कारण बाहरी वायुमंडलीय दाब जल को बीकर में लगभग $1/5$ ऊंचाई तक ऊपर चढ़ा देता है। यह प्रयोग सिद्ध करता है कि वायु का लगभग $1/5$ भाग ही दहन का पोषक है।
घुलित गैस तापीय विलेयता एवं जलीय श्वसन ढांचा (Dissolved Gas Thermal Solubility Framework)

जल में वायुमंडलीय गैसों (विशेषकर ऑक्सीजन और नाइट्रोजन) की विलेयता हेनरी के नियम और तापमान की गतिकी द्वारा नियंत्रित होती है।

  1. उल्टा तापीय संबंध (Inverse Thermal Relationship): ठोस पदार्थों के विपरीत, जल में गैसों की विलेयता तापमान बढ़ने पर घटती है। जब जल को गर्म किया जाता है, तो उबलने से काफी पहले ($50^-70^$ पर) जल में घुली वायु के बुलबुले पात्र की दीवारों पर प्रकट होकर बाहर निकलने लगते हैं।
  2. जलीय श्वसन तंत्र (Aquatic Respiration): सामान्य जल में घुली ऑक्सीजन की मात्रा ($7-10 mg/L$) वायुमंडलीय सांद्रता ($210 mL/L$) की तुलना में बहुत कम होती है। अतः मछलियों के गलफड़े (Gills) अत्यंत महीन रक्त-केशिकाओं से युक्त होते हैं, जो मुख से प्रवेश करने वाले जल से परासरण व विसरण द्वारा ऑक्सीजन को अवशोषित करते हैं और $CO_2$ बाहर छोड़ते हैं।
  3. गर्म जल प्रदूषण का प्रभाव: ताप विद्युत संयंत्रों से निकला गर्म जल जब नदियों में डाला जाता है, तो घुलित ऑक्सीजन की सांद्रता तेजी से घट जाती है, जिससे जलीय जीवों का दम घुटने लगता है।
मृदा रंध्रता एवं भूमिगत गैसीय विसरण ढांचा (Soil Porosity & Gaseous Diffusion Framework)

मृदा केवल ठोस खनिजों का पुंज नहीं है, बल्कि यह एक त्रि-घटकीय तंत्र (ठोस कण, जल और वायु) है।

  1. रंध्रावकाश (Pore Spaces): मृदा के कणों (बालू, गाद, चिकनी मिट्टी) के बीच सूक्ष्म खाली स्थान पाए जाते हैं जिन्हें मृदा रंध्र कहा जाता है। शुष्क मृदा में ये रंध्र वायु से भरे होते हैं।
  2. बुदबुदाहट का भौतिक कारण: जब सूखे मिट्टी के ढेले पर जल डाला जाता है, तो जल का घनत्व ($1.0 g/cm^3$) वायु ($0.0012 g/cm^3$) से लगभग 800 गुना अधिक होने और गुरुत्वाकर्षण के कारण जल रंध्रों में प्रवेश करता है तथा भीतर फंसी वायु को विस्थापित कर देता है। यही विस्थापित वायु जल की सतह पर बुलबुलों के रूप में बुदबुदाती है।
  3. भूमिगत जीवों का श्वसन: केंचुए, चींटियां और सूक्ष्मजीव इन्हीं रंध्रों में उपस्थित वायु से श्वसन करते हैं। केंचुआ अपनी नम त्वचा (Cutaneous Respiration) द्वारा वायु अवशोषित करता है। भारी वर्षा में जब सभी रंध्र जल से भर जाते हैं, तो वायु के अभाव में केंचुए विवश होकर जमीन की सतह पर निकल आते हैं।
प्रकाश संश्लेषण-श्वसन गतिक संतुलन ढांचा (Photosynthesis-Respiration Dynamic Equilibrium Framework)

पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व पौधों और जंतुओं के मध्य ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के गतिक संतुलन पर निर्भर है।

  1. श्वसन (Respiration): सभी जीवधारी (पौधों सहित) 24 घंटे अनवरत श्वसन करते हैं:

$$ग्लूकोज + O_2 → CO_2 + H_2O + ऊर्जा$$

  1. प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis): केवल हरे पादप सूर्य के प्रकाश में दिन के समय करते हैं:

$$CO_2 + H_2O + सौर ऊर्जा → ग्लूकोज + O_2$$

  1. शुद्ध संतुलन (Net Balance): दिन में पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण की दर श्वसन दर से कई गुना अधिक होती है। अतः पौधे दिन में जितनी $O_2$ लेते हैं, उससे कहीं अधिक $O_2$ वायुमंडल में मुक्त करते हैं। यह शुद्ध अतिरिक्त ऑक्सीजन वायुमंडल में उपभोग होने वाली ऑक्सीजन की भरपाई करती है, जिससे ऑक्सीजन का स्तर स्थिर बना रहता है।
पवन गतिज ऊर्जा एवं वायुगतिकीय रूपांतरण ढांचा (Wind Kinetic Energy Framework)

पवन सूर्य द्वारा पृथ्वी की सतह के असमान तापन (Differential Solar Heating) के कारण उत्पन्न वायुमंडलीय दाब प्रवणता का परिणाम है।

  1. गतिज ऊर्जा प्रवाह: गतिशील वायु का द्रव्यमान $m$ और वेग $v$ होने पर उसकी गतिज ऊर्जा $E_k = {1}{2}mv^2$ होती है। पवन टर्बाइन के ब्लेड वायुगतिकीय लिफ्ट बल (Aerodynamic Lift) के प्रभाव से घूमते हैं।
  2. ऊर्जा रूपांतरण श्रृंखला: पवन की रैखिक गतिज ऊर्जा $→$ ब्लेड्स एवं शाफ्ट की घूर्णन यांत्रिक ऊर्जा $→$ गियरबॉक्स व जनरेटर द्वारा विद्युत ऊर्जा।
  3. पारिस्थितिक एवं तकनीकी अनुप्रयोग: जल निष्कर्षण, पवन चक्की से अनाज पिसाई, बीजों का प्रकीर्णन, वायु-परागण तथा बादलों का मानसूनी संचलन इसी ऊर्जा पर आश्रित हैं।
जैविक वायु निस्यंदन एवं नासिका सुरक्षा ढांचा (Biological Air Filtration Framework)

वायुमंडल में उपस्थित धूलिकणों और परागकणों से श्वसन तंत्र की सुरक्षा हेतु प्रकृति ने मानव शरीर में त्रि-स्तरीय रक्षा प्रणाली स्थापित की है:

  1. नासिका रोम (Nasal Cilia/Hair): नासिका छिद्रों में उपस्थित महीन बाल एक प्राथमिक यांत्रिक छलनी (Mechanical Sieve) की भांति कार्य करते हैं, जो $10$ से बड़े धूल कणों को प्रवेश द्वार पर ही रोक लेते हैं।
  2. श्लेष्मा झिल्ली (Mucous Membrane): नासिका गुहा की दीवारें नम और चिपचिपे श्लेष्म (Mucus) का स्राव करती हैं। जो सूक्ष्म कण रोमों से बच निकलते हैं, वे इस चिपचिपे द्रव में चिपक जाते हैं।
  3. मुख से श्वसन का खतरा: जब कोई व्यक्ति मुंह से सांस लेता है, तो यह सुरक्षात्मक निस्यंदन बाईपास हो जाता है और धूल, रोगाणु तथा ठंडी वायु सीधे फेफड़ों में पहुंचकर श्वसन संक्रमण, खांसी और एलर्जी उत्पन्न करती है। अतः सदा नाक से ही श्वास लेना चाहिए।
वातावरणीय व्युत्क्रमण एवं शीतकालीन स्मॉग उत्पत्ति ढांचा (Atmospheric Inversion & Winter Smog Framework)

शीत ऋतु में गंगा के मैदानी भूभागों (बिहार एवं उत्तर प्रदेश) में स्मॉग की सघनता का मुख्य कारण तापीय व्युत्क्रमण परिघटना है।

  1. सामान्य तापीय स्थिति: सामान्यतः ऊंचाई बढ़ने पर तापमान घटता है (ह्रास दर)। धरातल की गर्म वायु हल्की होकर ऊपर उठती है और अपने साथ धुएं व प्रदूषकों को ऊपर उड़ा ले जाती है।
  2. व्युत्क्रमण का तंत्र: सर्दियों की लंबी और शांत रातों में पृथ्वी का धरातल विकिरण द्वारा तेजी से ठंडा होता है। धरातल के ठीक ऊपर ठंडी और भारी वायु बैठ जाती है, जबकि उसके ऊपर गर्म वायु की परत छा जाती है।
  3. प्रदूषक ट्रैपिंग: यह गर्म वायु की परत एक वायुमंडलीय ढक्कन (Lid) की भांति कार्य करती है। वाहनों, पराली और ईंट-भट्ठों से निकलने वाला धुआँ ऊपर नहीं जा पाता और कोहरे के साथ मिलकर जमीन की सतह पर ही घने स्मॉग ($Smoke + Fog$) के रूप में फंस जाता है, जिससे AQI गंभीर स्तर पर पहुंच जाता है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
वायु के किन्हीं दो मूलभूत भौतिक गुणों का उल्लेख करें जिन्हें सरल प्रयोगों द्वारा कक्षा में प्रदर्शित किया जा सकता है।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

वायु के दो मूलभूत भौतिक गुण निम्नलिखित हैं:

  1. वायु स्थान घेरती है (Air occupies space): जब किसी खाली कांच की बोतल को उल्टा करके सीधे जल से भरी बाल्टी में डुबोया जाता है, तो बोतल के भीतर उपस्थित वायु जल को अंदर प्रवेश नहीं करने देती। बोतल को थोड़ा तिरछा करने पर वायु बुलबुलों के रूप में बाहर निकलती है और जल अंदर भर जाता है, जो सिद्ध करता है कि वायु स्थान घेरती है।
  2. वायु का द्रव्यमान (भार) होता है (Air has mass/weight): जब एक मीटर पैमाने के दोनों सिरों पर वायु से भरे दो समान गुब्बारे बांधकर पैमाने को बीच से संतुलित किया जाता है, और फिर एक गुब्बारे को पिन चुभाकर फोड़ दिया जाता है, तो हवा से भरा दूसरा गुब्बारा नीचे झुक जाता है। यह सिद्ध करता है कि वायु में भार होता है।
उदाहरण 2
एक छात्र ने जलती हुई मोमबत्ती पर एक कांच का गिलास उल्टा रख दिया। कुछ सेकंड बाद मोमबत्ती बुझ गई। (क) मोमबत्ती क्यों बुझी? (ख) वायु का कौन-सा घटक दहन में सहायक था? (ग) गिलास के भीतर बची अधिकांश गैस कौन-सी है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(क) मोमबत्ती बुझने का कारण: उल्टे गिलास के भीतर वायु की एक सीमित मात्रा बंद थी। मोमबत्ती तब तक जलती रही जब तक कि गिलास के भीतर उपस्थित ऑक्सीजन का उपभोग नहीं हो गया। जैसे ही ऑक्सीजन समाप्त हुई, दहन रुक गया और मोमबत्ती बुझ गई। (ख) दहन में सहायक घटक: वायु में उपस्थित ऑक्सीजन गैस ($O_2$), जो वायु के आयतन का लगभग $21\%$ (लगभग $1/5$ भाग) होती है, दहन की पोषक है। (ग) गिलास के भीतर बची अधिकांश गैस: गिलास के भीतर बची अधिकांश अक्रिय गैस नाइट्रोजन ($N_2$) है, जो वायु का लगभग $78\%$ भाग बनाती है और दहन में सहायता नहीं करती। इसके साथ दहन से उत्पन्न अल्प मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प भी उपस्थित रहते हैं।

उदाहरण 3
जब सूखे बगीचे की मिट्टी के ढेले को पानी से भरे बीकर में डाला जाता है, तो तुरंत हवा के बुलबुले निकलते दिखाई देते हैं। इस परिघटना का वैज्ञानिक कारण स्पष्ट करें और बताएं कि यह मिट्टी में रहने वाले जीवों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. बुलबुले निकलने का वैज्ञानिक कारण: सूखी मिट्टी के कणों के बीच सूक्ष्म खाली स्थान पाए जाते हैं जिन्हें मृदा रंध्र (Soil Pores) कहते हैं। सामान्य अवस्था में ये रंध्र वायु से भरे होते हैं। जब मिट्टी के ढेले को जल में डाला जाता है, तो जल का घनत्व वायु से बहुत अधिक होने के कारण जल रंध्रों में तेजी से प्रवेश करता है। जल द्वारा रंध्रों से विस्थापित की गई यह वायु जल की सतह पर बुलबुलों के रूप में बाहर निकलती है।

  2. मिट्टी के जीवों के लिए महत्व: मृदा रंध्रों में फंसी यही वायु केंचुओं, चींटियों, अन्य कीटों तथा पौधों की जड़ों के लिए ऑक्सीजन का जीवनदायी स्रोत है। जीवधारी इसी वायु से श्वसन करते हैं और पौधे स्वस्थ वृद्धि करते हैं। यदि मिट्टी में वायु न हो, तो भूमिगत जीवों का दम घुट जाएगा और पौधे सड़ जाएंगे।

उदाहरण 4
एक छात्र का दावा है: 'जंतु केवल ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं, जबकि पौधे केवल कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं।' क्या यह कथन पूर्णतः सत्य है? वैज्ञानिक तर्कों और समीकरण के साथ इस कथन का विस्तृत विश्लेषण करें।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

यह कथन पूर्णतः सत्य नहीं है; यह एक आंशिक और भ्रामक समझ है।

वैज्ञानिक विश्लेषण:

  1. पौधों में श्वसन (Respiration in Plants): पौधे भी अन्य सभी जीवित प्राणियों की भांति जीवित रहने हेतु दिन और रात (24 घंटे) श्वसन करते हैं। श्वसन में पौधे वायुमंडल से ऑक्सीजन ($O_2$) ही ग्रहण करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) निष्कासित करते हैं।

  2. पौधों में प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis in Plants): केवल दिन के समय, सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में, पौधे प्रकाश संश्लेषण करते हैं जिसमें वे पत्तियों के रंध्रों द्वारा $CO_2$ ग्रहण करते हैं और उप-उत्पाद के रूप में $O_2$ मुक्त करते हैं:

$$6CO_2 + 6H_2O \xrightarrow[\text{क्लोरोफिल}]{\text{सूर्य का प्रकाश}} C_6H_{12}O_6 + 6O_2\uparrow$$

  1. शुद्ध संतुलन (Net Balance): दिन के समय प्रकाश संश्लेषण की दर श्वसन की दर से 10 से 20 गुना अधिक तीव्र होती है। अतः पौधे दिन में जितनी ऑक्सीजन श्वसन में लेते हैं, उससे कहीं अधिक मात्रा में ऑक्सीजन प्रकाश संश्लेषण द्वारा वातावरण में छोड़ देते हैं। इसलिए दिन में पौधों द्वारा ऑक्सीजन का शुद्ध धनात्मक निष्कासन (Net Output) होता है।

अतः यह कहना गलत है कि पौधे ऑक्सीजन नहीं लेते; वे श्वसन में ऑक्सीजन लेते हैं, परंतु दिन में प्रकाश संश्लेषण द्वारा अतिरिक्त ऑक्सीजन उत्पन्न करके वायुमंडल का संतुलन बनाए रखते हैं।

उदाहरण 5
गर्मियों के दिन बर्फ से भरे ठंडे स्टील के गिलास की बाहरी सतह पर कुछ ही मिनटों में पानी की नन्हीं-नन्हीं बूंदें क्यों दिखाई देने लगती हैं? चरणबद्ध तरीके से समझाइए कि यह वायु के किस घटक की उपस्थिति को सिद्ध करता है और इस प्रक्रिया का जल-चक्र में क्या महत्व है।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. परिघटना का चरणबद्ध वैज्ञानिक कारण:
  • चरण 1: वायु में जल अदृश्य गैसीय रूप में उपस्थित रहता है जिसे जलवाष्प (Water Vapour) कहते हैं।
  • चरण 2: जब बर्फ से भरा स्टील का गिलास कमरे में रखा जाता है, तो बर्फ के कारण गिलास की धात्विक दीवारें अत्यधिक ठंडी (लगभग $0^\circ\text{C}-4^\circ\text{C}$) हो जाती हैं।
  • चरण 3: जब कमरे की वायु में तैरते हुए जलवाष्प के गर्म अणु इस ठंडी धात्विक सतह से टकराते हैं, तो उनकी तापीय ऊर्जा कम हो जाती है।
  • चरण 4: जलवाष्प गैस अवस्था से द्रव अवस्था में परिवर्तित हो जाती है। इस भौतिक प्रक्रिया को संघनन (Condensation) कहते हैं। संघनित जल की ये बूंदें गिलास की बाहरी सतह पर चिपक जाती हैं।
  1. वायु के घटक का प्रमाण: यह प्रयोग अकाट्य रूप से सिद्ध करता है कि वायु में जलवाष्प उपस्थित रहता है।

  2. जल-चक्र में महत्व: संघनन की यही प्रक्रिया पृथ्वी के संपूर्ण जल-चक्र (Water Cycle) का आधार है। महासागरों और नदियों से वाष्पीकृत जल जब वायुमंडल में ऊपर उठता है, तो ऊंचाई पर ठंडी परतों के संपर्क में आकर संघनित होता है और बादलों का निर्माण करता है, जिससे वर्षा संभव होती है।

उदाहरण 6
वायु प्रदूषण के संदर्भ में निम्नलिखित प्रश्नों के विस्तृत उत्तर दीजिए: (क) शीतकालीन स्मॉग (Smog) क्या है और यह सर्दियों में बिहार के मैदानी इलाकों में अधिक क्यों बनता है? (ख) ईंट-भट्ठों और पराली जलाने से वायुमंडल पर क्या प्रभाव पड़ता है? (ग) बिहार सरकार के 'जल-जीवन-हरियाली' अभियान के तहत स्वच्छ वायु संरक्षण हेतु क्या कदम उठाए गए हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(क) शीतकालीन स्मॉग और बिहार के मैदानों में इसका कारण:

  • स्मॉग की परिभाषा: स्मॉग धुआँ (Smoke) और कोहरे (Fog) के रासायनिक व भौतिक मिश्रण से बनता है ($Smoke + Fog = Smog$)। इसमें विषैली गैसें ($SO_2, NO_x$) और सूक्ष्म कण ($PM_{2.5}$) कोहरे की बूंदों में फंस जाते हैं।
  • बिहार में अधिक बनने का कारण: सर्दियों में गंगा के मैदानी भूभागों में तापीय व्युत्क्रमण (Thermal Inversion) की स्थिति उत्पन्न होती है। शांत रातों में जमीन तेजी से ठंडी हो जाती है जिससे जमीन के पास ठंडी, भारी वायु की परत बैठ जाती है और उसके ऊपर गर्म वायु की परत छा जाती है। यह गर्म परत धुएं और प्रदूषकों को ऊपर नहीं उठने देती, जिससे जमीन के निकट विषैला स्मॉग जमा हो जाता है।

(ख) ईंट-भट्ठों एवं पराली दहन का प्रभाव:

  • पारंपरिक ईंट-भट्ठों में कोयला, लकड़ी और रबर के अपूर्ण दहन से अत्यधिक कालिख (Soot), सल्फर डाइऑक्साइड ($SO_2$) और कार्बन मोनोऑक्साइड ($CO$) उत्सर्जित होते हैं।
  • धान व गेहूं की कटाई के बाद खेतों में पराली जलाने से विशाल मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और सूक्ष्म पार्टिकुलेट मैटर ($PM_{2.5}$) वायु में फैलते हैं, जिससे दृश्यता शून्य हो जाती है और फेफड़ों के गंभीर रोग होते हैं।

(ग) 'जल-जीवन-हरियाली' अभियान के प्रमुख कदम:

  1. वृहद हरित आवरण निर्माण: सड़कों, नहरों और सार्वजनिक भूमि पर करोड़ों छायादार व ऑक्सीजन-उत्पादक पौधों (पीपल, नीम, बरगद) का रोपण, जिससे राज्य का हरित आवरण $15\%$ से अधिक करने का लक्ष्य रखा गया।
  2. ईंट-भट्ठों का आधुनिकीकरण: पारंपरिक भट्ठों को स्वच्छ 'जिग-जैग' (Zig-Zag) तकनीक में परिवर्तित करना अनिवार्य किया गया, जिससे धुआँ $70\%$ तक घटा।
  3. स्वच्छ ऊर्जा को प्रोत्साहन: बायोमास चूल्हों के स्थान पर एलपीजी सिलेंडरों और सौर ऊर्जा चालित उपकरणों को बढ़ावा देना ताकि घरेलू और बाहरी वायु प्रदूषण न्यूनतम हो सके।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

पौधे केवल कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते हैं और उन्हें कभी ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती, जबकि जंतु केवल ऑक्सीजन लेते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पौधे भी अन्य सभी जीवित प्राणियों की भांति जीवित रहने हेतु 24 घंटे लगातार कोशिकीय श्वसन करते हैं जिसमें वे ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं। केवल दिन के समय वे प्रकाश संश्लेषण द्वारा इतनी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं कि वह उनके श्वसन में प्रयुक्त ऑक्सीजन से कहीं अधिक होती है, जिससे वातावरण में ऑक्सीजन का शुद्ध धनात्मक निष्कासन होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

बर्फ से भरे ठंडे गिलास की बाहरी सतह पर दिखाई देने वाली पानी की बूंदें गिलास के सूक्ष्म छिद्रों से रिसकर बाहर आई हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

कांच या स्टील एक अभेद्य (impermeable) ठोस पदार्थ है जिसके आर-पार जल रिस नहीं सकता। बाहरी बूंदें वास्तव में कमरे की आसपास की वायु में तैरते अदृश्य जलवाष्प के अणुओं के ठंडी सतह से टकराकर संघनित (द्रवीभूत) होने से बनती हैं। यह प्रयोग वायु में जलवाष्प की उपस्थिति को सिद्ध करता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

मेज पर रखी खुली, बिना ढक्कन वाली खाली कांच की बोतल पूरी तरह खाली है और उसके भीतर कुछ भी नहीं है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

तथाकथित 'खाली' बोतल वास्तव में अदृश्य वायु से पूरी तरह भरी होती है। जब इस बोतल को उल्टा करके सीधे पानी में डुबोया जाता है, तो भीतर की वायु पानी को अंदर नहीं आने देती। बोतल को तिरछा करने पर वायु बुलबुलों के रूप में बाहर निकलती है और जल अंदर भरता है, जो सिद्ध करता है कि बोतल कभी खाली नहीं थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

जल को गर्म करते समय उबलने से काफी पहले जो नन्हे बुलबुले दिखाई देते हैं, वे जलवाष्प या भाप के बुलबुले होते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

उबलने के तापमान (100°C) से काफी पहले (50°C-70°C पर) दिखाई देने वाले बुलबुले भाप नहीं, बल्कि जल में पहले से घुली हुई वायुमंडलीय गैसें (विशेषकर ऑक्सीजन और नाइट्रोजन) होती हैं। तापमान बढ़ने पर जल में गैसों की विलेयता घट जाती है, जिससे घुली वायु बुलबुलों के रूप में बाहर निकलती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

ऑक्सीजन स्वयं एक ज्वलनशील गैस है जो आग लगने पर ज्वाला के साथ जलती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ऑक्सीजन स्वयं ज्वलनशील (Combustible) नहीं है, बल्कि यह दहन की पोषक (Supporter of Combustion) है। यह ईंधनों के दहन में सहायता करती है, किंतु स्वयं नहीं जलती। यदि ऑक्सीजन स्वयं ज्वलनशील होती, तो माचिस की तीली जलाते ही संपूर्ण वायुमंडल में आग लग जाती।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भारी बारिश के समय केंचुए मिट्टी से बाहर इसलिए निकलते हैं क्योंकि उन्हें भीगी जमीन पर घूमना पसंद है या वे बारिश का पानी पीना चाहते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

केंचुए अपनी नम त्वचा से मिट्टी के सूक्ष्म रंध्रों में फंसी वायु से ऑक्सीजन अवशोषित करते हैं। भारी वर्षा में मिट्टी के सभी रंध्र और केंचुओं की बिलें पूरी तरह पानी से भर जाती हैं, जिससे भूमिगत वायु विस्थापित हो जाती है। दम घुटने (दम घुटने की स्थिति) से बचने और श्वसन हेतु ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए केंचुए जमीन की सतह पर बाहर आने को विवश होते हैं।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
वायु पदार्थ (Matter) है जो आयतन घेरती है और जिसमें भार होता है; पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण इसे वायुमंडल के रूप में बांधे रखता है।
मुख्य बिंदु 2
नाइट्रोजन (78%) और ऑक्सीजन (21%) मिलकर शुष्क वायु का 99% भाग बनाते हैं, जबकि शेष 1% में कार्बन डाइऑक्साइड, आर्गन और जलवाष्प हैं।
मुख्य बिंदु 3
ऑक्सीजन दहन का पोषक है लेकिन स्वयं नहीं जलती; पानी में जलती मोमबत्ती का प्रयोग सिद्ध करता है कि वायु का लगभग 1/5 भाग ऑक्सीजन है।
मुख्य बिंदु 4
वायु में उपस्थित जलवाष्प ठंडी सतहों पर संघनित होकर ओस, कोहरा और बादलों का निर्माण करता है, जो वैश्विक जल-चक्र की धुरी है।
मुख्य बिंदु 5
जल को गर्म करने पर उबलने से पहले दिखने वाले बुलबुले उसमें घुली हुई वायु होते हैं, जिससे मछलियां श्वसन करती हैं।
मुख्य बिंदु 6
सूखी मिट्टी में जल डालने पर उठने वाले बुलबुले यह सिद्ध करते हैं कि मिट्टी के रंध्रों में वायु उपस्थित होती है।
मुख्य बिंदु 7
भारी वर्षा में मिट्टी के रंध्र जलमग्न हो जाने के कारण केंचुए श्वसन हेतु विवश होकर जमीन की सतह पर आते हैं।
मुख्य बिंदु 8
पौधे दिन-रात श्वसन करते हैं, किंतु दिन में प्रकाश संश्लेषण द्वारा उपभोग से कहीं अधिक ऑक्सीजन मुक्त करके गैसीय संतुलन बनाए रखते हैं।
मुख्य बिंदु 9
सदा नाक से सांस लेनी चाहिए क्योंकि नासिका के रोम और श्लेष्मा झिल्ली वायु के हानिकारक धूलिकणों को फेफड़ों में जाने से रोकते हैं।
मुख्य बिंदु 10
पवन चक्की गतिशील वायु की गतिज ऊर्जा को यांत्रिक और विद्युत ऊर्जा में बदलकर स्वच्छ ऊर्जा और भूजल निष्कर्षण प्रदान करती है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
जब किसी खाली कांच की बोतल को उल्टा करके सीधे पानी से भरी बाल्टी में नीचे दबाया जाता है, तो पानी बोतल के भीतर क्यों नहीं घुस पाता?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
2
पर्वतारोही माउंट एवरेस्ट जैसी ऊंची चोटियों पर चढ़ते समय ऑक्सीजन सिलिंडर अपने साथ क्यों ले जाते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
3
जल से भरी थाली में जलती मोमबत्ती पर उल्टा बीकर रखने पर मोमबत्ती बुझने के बाद बीकर में जल का स्तर लगभग कितना ऊपर चढ़ता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
4
मानव नासिका में उपस्थित महीन रोमों (बालों) और चिपचिपे श्लेष्म (म्यूकस) का प्राथमिक जैविक कार्य क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
5
मछलियां और अन्य जलीय जीव जल के भीतर श्वसन हेतु ऑक्सीजन किस प्रकार प्राप्त करते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
6
अरबों जीवों द्वारा दिन-रात अनवरत श्वसन और ईंधनों के दहन के बावजूद वायुमंडल में ऑक्सीजन का स्तर स्थिर क्यों बना रहता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
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