1. मानव कंकाल तंत्र: शरीर का आंतरिक संरचनात्मक ढांचा
जिस प्रकार किसी बहुमंजिला भवन के निर्माण से पूर्व लोहे और सीमेंट का एक सुदृढ़ ढांचा तैयार किया जाता है, ठीक उसी प्रकार हमारे शरीर को एक निश्चित आकृति, ऊंचाई, अवलंब और दृढ़ता प्रदान करने के लिए अंदर एक सुव्यवस्थित हड्डियों का ढांचा होता है। इस आंतरिक अस्थिमय ढांचे को कंकाल तंत्र (Skeletal System) कहा जाता है। यदि हमारे शरीर में कंकाल न होता, तो हमारा शरीर मांस और त्वचा की एक निराकार थैली की भांति जमीन पर ढह जाता और हम न तो सीधे खड़े हो पाते, न चल पाते और न ही कोई कार्य कर पाते।
जन्म के समय एक नवजात शिशु के शरीर में लगभग 300 से 305 छोटी-बड़ी अस्थियां और उपास्थि संरचनाएं होती हैं। जैसे-जैसे बच्चे का विकास होता है, कई छोटी हड्डियां आपस में जुड़ती (फ्यूज होती) जाती हैं। परिणामस्वरूप, एक पूर्ण विकसित वयस्क मानव के कंकाल में कुल 206 अस्थियां पाई जाती हैं। ये हड्डियां कैल्शियम और फास्फोरस के लवणों से मिलकर बनी होती हैं, जिसके कारण ये अत्यंत कठोर, मजबूत और वजन उठाने में सक्षम होती हैं।
2. मानव कंकाल के चार प्रमुख कार्य
कंकाल तंत्र मानव जीवन के संचालन में निम्नलिखित चार अनिवार्य भूमिकाएं निभाता है:
- आकार एवं अवलंब (Shape and Support): यह शरीर को सीधा खड़ा रखता है और त्वचा तथा मांसपेशियों को एक सुदृढ़ आधार प्रदान करता है।
- कोमल आंतरिक अंगों की सुरक्षा: हमारे शरीर के अत्यंत नाजुक और जीवन-रक्षक अंग कठोर अस्थि मंजूषाओं (अस्थि गुहाओं) के भीतर सुरक्षित रहते हैं। उदाहरण के लिए, खोपड़ी मस्तिष्क की रक्षा करती है; पसली पिंजर हृदय और फेफड़ों को ढकता है; तथा मेरुदंड रीढ़ की हड्डी के भीतर मेरुरज्जु (स्पाइनल कॉर्ड) की रक्षा करता है।
- गति और चलन में सहायता: कंकाल की अस्थियां कठोर उत्तोलक (Levers) की भांति कार्य करती हैं। जब इनके साथ जुड़ी पेशियां संकुचित होती हैं, तो संधियों (जोड़ों) पर गति उत्पन्न होती है।
- रक्त कणिकाओं का निर्माण एवं खनिज संचय: बड़ी और लंबी हड्डियों के खोखले आंतरिक भाग में उपस्थित लाल अस्थि मज्जा (Bone Marrow) में लाल रक्त कणिकाओं (RBC) और श्वेत रक्त कणिकाओं (WBC) का निरंतर निर्माण होता है। इसके अलावा हड्डियां शरीर में कैल्शियम का मुख्य भंडार हैं।
3. उपास्थि (Cartilage): लचीला एवं कोमल संयोजी ऊतक
कंकाल के सभी भाग हड्डियों जितने कठोर और अमुड़नशील नहीं होते। हमारे कंकाल में कुछ ऐसे विशेष भाग भी होते हैं जो हड्डी की तुलना में काफी कोमल, लचीले और मोड़े जा सकने वाले होते हैं। इन्हें उपास्थि (Cartilage) कहा जाता है।
- बाह्य उपस्थिति (External Presence): आप अपने कान के ऊपरी भाग (कर्णपल्लव / Ear Pinna) को अपनी उंगलियों से छूकर देखिए। यह भाग कान के नीचे वाले कोमल लोब (Earlobe) की तरह केवल मांस का लोथड़ा नहीं है, बल्कि इसमें एक लचीली संरचना है जिसे मोड़ने पर वह बिना टूटे मुड़ जाती है और छोड़ने पर पुनः अपनी मूल स्थिति में आ जाती है। यह उपास्थि है। इसी प्रकार हमारी नाक की नोक और नासा पट (Nasal Septum) में भी उपास्थि पाई जाती है।
- संधियों पर उपास्थि का कार्य: जोड़ों (संधियों) पर जहां दो अस्थियां आपस में मिलती हैं, उनकी सतहों पर चिकनी, चमकदार उपास्थि की एक परत चढ़ी होती है। यह परत जोड़ों के बीच घर्षण को शून्य करती है और चलते-कूदते समय लगने वाले झटकों (Shock absorber) को सोख लेती है।
- रीढ़ की हड्डियों के बीच: मेरुदंड की कशेरुकाओं के बीच उपास्थि की गद्दियां (Intervertebral discs) पाई जाती हैं जो रीढ़ को लचीलापन प्रदान करती हैं।
4. मानव कंकाल के प्रमुख संरचनात्मक भाग
(क) खोपड़ी / कपाल (Skull)
खोपड़ी 22 अस्थियों के आपस में जुड़ने से बनी एक अत्यंत सुदृढ़ सुरक्षात्मक पेटी है। यह दो भागों में बंटी होती है—मस्तिष्क को चारों ओर से ढकने वाला कपाल (Cranium - 8 अस्थियां) और चेहरे का ढांचा (Facial bones - 14 अस्थियां)। खोपड़ी की सभी अस्थियां अचल संधियों द्वारा परस्पर कसकर बंधी रहती हैं। संपूर्ण खोपड़ी में केवल एक ही अस्थि गतिशील होती है, और वह है निचला जबड़ा (Mandible)। निचले जबड़े की गति के कारण ही हम भोजन चबा सकते हैं, बोल सकते हैं और हंस सकते हैं।
(ख) मेरुदंड / रीढ़ की हड्डी (Vertebral Column / Backbone)
गर्दन से लेकर कमर के निचले हिस्से तक पीठ के ठीक बीचों-बीच स्थित लंबी अस्थि श्रृंखला को मेरुदंड कहते हैं। यदि मेरुदंड केवल एक ही लंबी सीधी छड़ जैसी हड्डी का बना होता, तो हम कभी भी आगे, पीछे या अगल-बगल नहीं झुक पाते। मेरुदंड वास्तव में 33 छोटी-छोटी छल्लेदार हड्डियों से मिलकर बना होता है, जिन्हें कशेरुकाएं (Vertebrae) कहते हैं। प्रत्येक कशेरुका के बीच में एक छिद्र होता है। जब ये 33 कशेरुकाएं एक के ऊपर एक रखी होती हैं, तो इनके बीच एक खोखली नली बन जाती है जिसे तंत्रिका नाल कहते हैं। इसी नाल के भीतर से मस्तिष्क से आने वाली अत्यंत नाजुक मेरुरज्जु (Spinal Cord) गुजरती है, जिसकी मेरुदंड पूर्ण सुरक्षा करता है।
(ग) पसली पिंजर / वक्ष पिंजर (Rib Cage)
छाती के क्षेत्र में पसलियों द्वारा बना एक शंक्वाकार पिंजरा होता है जिसे पसली पिंजर कहते हैं। यह 12 जोड़ी (कुल 24) मुड़ी हुई पतली पसलियों से बना होता है। पीछे की ओर ये पसलियां मेरुदंड की कशेरुकाओं से जुड़ी होती हैं और आगे की ओर छाती के बीचों-बीच स्थित चपटी अस्थि जिसे उरोस्थि (Sternum) कहते हैं, से जुड़ती हैं। अंतिम दो जोड़े (11वीं और 12वीं जोड़ी पसलियां) आगे उरोस्थि से नहीं जुड़तीं, इसलिए उन्हें 'प्लावी पसलियां' (Floating Ribs) कहा जाता है। पसली पिंजर हमारे अतिसंवेदनशील अंगों—हृदय और फेफड़ों—की रक्षा करता है तथा श्वास लेते समय फूलता और सिकुड़ता है।
(घ) कंधे की अस्थियां / अंस मेखला (Shoulder Bones / Pectoral Girdle)
प्रत्येक कंधे पर दो प्रमुख अस्थियां पाई जाती हैं: आगे की ओर कॉलर के पास स्थित पतली, लंबी हड्डी जिसे हंसुली (Clavicle / Collarbone) कहते हैं, और पीछे पीठ के ऊपरी हिस्से पर स्थित एक चौड़ी, त्रिकोणीय चपटी हड्डी जिसे अंसफलक (Scapula) कहते हैं। अंसफलक में एक गोल गड्ढा (गुहा) होता है, जिसमें बांह की हड्डी का सिरा फिट होता है।
(ङ) श्रोणि अस्थियां / श्रोणि मेखला (Pelvic Bones / Pelvic Girdle)
कमर के ठीक नीचे स्थित कटोरीनुमा सुदृढ़ अस्थि ढांचे को श्रोणि मेखला कहते हैं। यह कई अस्थियों के संलयन से बनता है और आंतों, मूत्राशय तथा गर्भाशय जैसे निचले उदर अंगों को सुरक्षा प्रदान करता है। इसी श्रोणि अस्थि के गहरे गड्ढों में जांघ की सबसे बड़ी हड्डी (फीमर) आकर जुड़ती है, जिससे मनुष्य सुगमता से कुर्सी या जमीन पर बैठ सकता है और चल सकता है।