1.1 प्रागैतिहासिक काल एवं मानव गतिशीलता के प्रारंभिक चरण
मानव सभ्यता के सुदूर प्रारंभिक काल में मनुष्यों के पास आवागमन अथवा भार वहन का कोई यांत्रिक साधन उपलब्ध नहीं था। आदिमानव भोजन एवं आश्रय की खोज में पूरी तरह पैदल ही एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकते थे। जब भी उन्हें शिकार किए गए वन्यजीवों, कंदमूलों, जलावन की लकड़ियों अथवा पत्थरों को ले जाना होता था, तो वे संपूर्ण भार अपनी पीठ, सिर अथवा कंधों पर लादकर ले जाते थे।
जैसे-जैसे नदी घाटियों (विशेषकर बिहार की उर्वर गंगा, सोन एवं गंडक के मैदानी भागों) में कृषि बस्तियों का विकास हुआ, अधिशेष अनाज और निर्माण सामग्री के परिवहन की आवश्यकता ने दो युगांतरकारी आविष्कारों को जन्म दिया:
- भारवाही एवं सवारी पशुओं का पालतूकरण: मनुष्यों ने भारी वजन खींचने हेतु पशुओं को पालतू बनाना प्रारंभ किया। उत्तर एवं पूर्वी भारत में बैल, सांड, घोड़े और गधों को हल चलाने तथा गाड़ियां खींचने हेतु प्रशिक्षित किया गया। मरुस्थलीय क्षेत्रों में ऊंट और दुर्गम पर्वतीय ढलानों पर खच्चर व याक अपरिहार्य साधन बने।
- जल परिवहन का उद्भव: नदियों एवं सरोवरों को पार करने हेतु आदिमानव ने सर्वप्रथम जल पर तैरते सूखे लट्ठों को आपस में बांधकर बेड़ा (Raft) बनाया। इसके पश्चात उन्होंने तने को भीतर से खोखला कर 'डोंगी' (Canoe) का निर्माण किया। जलीय जीवों के निरंतर अवलोकन से उन्होंने सीखा कि मछलियों के समान धारा-रेखीय (Streamlined) आकृति जल के घर्षण प्रतिरोध को न्यूनतम कर देती है। कालांतर में पतवारों एवं बादबानों (Sails) से युक्त नौकाओं का विकास हुआ।
1.2 क्रांतिकारी मोड़: पहिए का युगांतरकारी आविष्कार
लगभग 3500 ईसा पूर्व में पहिए (Wheel) का आविष्कार मानव तकनीकी इतिहास की सर्वाधिक महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी घटना सिद्ध हुआ। भौतिकी के नियम के अनुसार, लोटनिक घर्षण (Rolling Friction) का मान सर्पी घर्षण (Sliding Friction) की तुलना में अत्यंत अल्प होता है। जिस भारी पत्थर या भारी लकड़ी के कुंदे को जमीन पर घसीटने हेतु बीस व्यक्तियों के बल की आवश्यकता होती थी, उसे धुरी (Axle) पर लगे दो पहियों की गाड़ी पर रखकर केवल दो बैल सरलतापूर्वक खींच सकते थे।
पहिए के उपयोग ने मानव जीवन के प्रत्येक आयाम को रूपांतरित कर दिया:
- पशु-चालित गाड़ियां: दो-पहिया एवं चार-पहिया बैलगाड़ियों, घोड़ा-गाड़ियों तथा रथों ने व्यापार को सुदूर जनपदों तक विस्तृत किया।
- चाक और हस्तशिल्प: पहिए की घूर्णन गति का उपयोग कुम्हार के चाक, सूत कातने के चरखे, और खेतों की सिंचाई हेतु जल उठाने वाले रहट (Persian Wheel) में हुआ।
- सड़क तंत्र का निर्माण: पहियों के नियमित परिचालन हेतु मानव समाज को कच्चे रास्तों को समतल करने, पत्थरों के मार्ग बनाने तथा पुलियाओं के निर्माण हेतु प्रेरित होना पड़ा।
हजारों वर्षों तक, भूमि पर पहिएदार पशु-गाड़ियां और जल पर पवन चालित पालदार नावें ही मानव जाति के द्रुतगामी साधन बनी रहीं।
1.3 औद्योगिक क्रांति: भाप का इंजन एवं रेलमार्गों का जाल
18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जेम्स वाट (James Watt) द्वारा भाप के इंजन (Steam Engine) के परिष्करण ने परिवहन जगत में एक नई वैज्ञानिक क्रांति ला दी। उबलते जल की ऊष्मीय ऊर्जा को निरंतर यांत्रिक कार्य में परिवर्तित करके भाप के इंजन ने परिवहन को मानवीय पेशीय शक्ति तथा पशुओं की शारीरिक सीमाओं से पूरी तरह मुक्त कर दिया।
भाप शक्ति के प्रमुख प्रभाव:
- रेलगाड़ियां और लोहे की पटरियां: लोहे की चिकनी पटरियों पर दौड़ने वाले वाष्प चालित इंजनों ने सैकड़ों टन भारी खाद्यान्न, कोयला और यात्रियों को अभूतपूर्व गति से सुदूर दूरियों तक पहुंचाना संभव किया।
- वाष्पपोत (Steamships): भाप से चलने वाले जहाजों ने समुद्री यात्राओं को मौसमी हवाओं की अनिश्चितता से स्वतंत्र कर दिया, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नए द्वार खुले।
1.4 बीसवीं एवं इक्कीसवीं सदी: अंतर्दहन इंजन, विमानन एवं अंतरिक्ष अन्वेषण
20वीं सदी में पेट्रोलियम आधारित अंतर्दहन इंजनों (Internal Combustion Engines), विद्युत ऊर्जा और वैमानिकी ने दूरियों को समेट कर रख दिया:
| परिवहन युग | प्रमुख ऊर्जा स्रोत | प्रमुख वाहन एवं प्रणालियां | ऐतिहासिक एवं तकनीकी महत्व |
|---|---|---|---|
| प्राचीन युग | पेशीय शक्ति (मानव एवं पशु) | पैदल यात्रा, बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी, डोंगी | अत्यंत मंद गति; शारीरिक सहनशक्ति एवं मौसमी हवाओं पर पूर्ण निर्भरता। |
| वाष्प युग (19वीं सदी) | कोयला दहन एवं भाप का प्रसार | भाप का रेल इंजन, वाष्प चालित समुद्री जहाज | भारी औद्योगिक माल ढुलाई और राष्ट्रीय स्तर पर तीव्र संपर्क का सूत्रपात। |
| मोटर युग (20वीं सदी का पूर्वार्ध) | पेट्रोल एवं डीजल (अंतर्दहन इंजन) | मोटरकार, बस, ट्रक, मोटरसाइकिल | घर-घर तक लचीला सड़क संपर्क; ग्रामीण क्षेत्रों को जिला मुख्यालयों से जोड़ना। |
| विमानन युग (1903 के बाद) | पिस्टन इंजन $ ightarrow$ जेट टरबाइन | राइट बंधुओं का द्विपंखी विमान, आधुनिक वाणिज्यिक जेट | महाद्वीपों के बीच महीनों की यात्रा को मात्र कुछ घंटों में रूपांतरित किया। |
| आधुनिक विद्युत युग | उच्च वोल्टता विद्युत ग्रिड व चुंबकत्व | इलेक्ट्रिक रेलगाड़ियां, मेट्रो ट्रेन, बुलेट ट्रेन (मैग्लेव) | शून्य स्थानीय प्रदूषण, विशाल यात्री वहन क्षमता, $300 ext{ km/h}$ से अधिक गति। |
| अंतरिक्ष युग (उत्तर 20वीं सदी से वर्तमान) | तरल एवं ठोस रासायनिक रॉकेट प्रणोदक | प्रक्षेपण यान (जैसे ISRO का PSLV, LVM3), कृत्रिम उपग्रह | पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलकर संचार उपग्रह स्थापित करना तथा चंद्र-मंगल अभियान। |
वर्तमान बिहार में इस ऐतिहासिक विकास के सभी स्तर एक साथ दृष्टिगोचर होते हैं: भोजपुर या समस्तीपुर का एक कृषक ट्रैक्टर-ट्रॉली या पारंपरिक बैलगाड़ी से अपनी उपज मंडी ले जाता है, वहीं आकाश में पटना के जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की ओर बढ़ता हुआ विशाल जेट विमान उड़ता है, और अंतरिक्ष में भ्रमण करते मौसम उपग्रह किसानों को मानसूनी वर्षा का सटीक पूर्वानुमान देते हैं।