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BSEB • कक्षा 6 • Science • अध्याय 3
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

पदार्थों का पृथक्करण (Separation of Substances)

बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB / NCERT) कक्षा 6 विज्ञान का अध्याय 3, 'पदार्थों का पृथक्करण' (Separation of Substances), मिश्रणों के घटकों को अलग करने की विभिन्न वैज्ञानिक विधियों का क्रमबद्ध और व्यावहारिक विवेचन प्रस्तुत करता है। अध्याय का प्रारंभ पृथक्करण के तीन मूलभूत वैज्ञानिक उद्देश्यों से होता है: (1) हानिकारक या अवांछित घटकों को दूर करना (जैसे चावल से कंकड़ निकालना), (2) अनुपयोगी अवयवों को हटाना (जैसे चाय की पत्तियां छानना), तथा (3) किसी एक ही मिश्रण से दो अलग-अलग उपयोगी पदार्थों को प्राप्त करना (जैसे दही से मक्खन और छाछ प्राप्त करना)। पाठ्यक्रम में घटकों के भौतिक गुणों के आधार पर पृथक्करण की विधियों का वर्गीकरण किया गया है: ठोस-ठोस मिश्रणों का पृथक्करण: हस्त चयन (कम मात्रा में कंकड़ चुनना), थ्रेशिंग/दौनी (डंठलों से अन्नकणों को पीटना या बैलों से अलग करना), निष्पावन/ओसाना (हवा के झोंके द्वारा भारी अन्नकणों से हल्के भूसे को अलग करना), तथा चालन (छलनी द्वारा विभिन्न आकारों के कणों को अलग करना)। अविलेय ठोस-द्रव मिश्रणों का पृथक्करण: अवसादन (गुरुत्वाकर्षण द्वारा भारी कणों का तली में बैठना), निस्तारण (तली की गाद को बिना हिलाए ऊपरी स्वच्छ द्रव को उंडेलना तथा तेल-पानी की परतों को अलग करना), एवं निस्यंदन/छानना (फिल्टर पेपर या बारीक कपड़े द्वारा ठोस अवशेष को अलग करना)। विलेय ठोस-द्रव मिश्रणों का पृथक्करण: वाष्पन (द्रव को गर्म करके वाष्प बनाना और समुद्री जल से नमक प्राप्त करना), संघनन (वाष्प को ठंडा करके पुनः द्रव में बदलना), तथा दोनों के संयोजन द्वारा नमक और शुद्ध जल को अलग-अलग प्राप्त करना। इसके अलावा, अध्याय में विलेयता की सीमाओं का अध्ययन किया गया है—असंतृप्त और संतृप्त विलयन के बीच अंतर तथा ताप बढ़ाने पर घुलनशीलता में वृद्धि और ठंडा करने पर क्रिस्टलीकरण। अंत में, बिहार की पारंपरिक पृथक्करण तकनीकों—जैसे बांस का सूप, खलिहान में दौनी, लकड़ी की मथानी, छेना छानने के लिए मलमल का कपड़ा, और बाढ़ के गंदले जल को फिटकरी (भारण) द्वारा शुद्ध करने की वैज्ञानिक पद्धति—को बड़े विस्तार से समझाया गया है।

क्या आपने कभी सोचा है?

बिहार के किसी गांव की रसोई में दाल या चावल पकाने से पहले हमारी माताएं और दीदी थाली में अनाज फैलाकर उसमें से छोटे-छोटे कंकड़-पत्थर और खरपतवार के बीज चुन-चुनकर अलग करती हैं। जब सुबह की चाय बनती है, तो छन्नी लगाकर उबलती चाय में से पत्तियां छान ली जाती हैं। मिथिला और भोजपुरी अंचलों के आंगनों में मिट्टी की मटकी में जमे दही को लकड़ी की मथानी से मथकर स्वादिष्ट मक्खन और छाछ अलग की जाती है। क्या आपने कभी सोचा है कि हम पदार्थों को अलग-अलग क्यों करते हैं? प्रकृति में मिलने वाली अधिकांश चीजें पूर्णतः शुद्ध नहीं होतीं; वे कई उपयोगी, अनुपयोगी अथवा हानिकारक घटकों का मिश्रण होती हैं। कक्षा 6 विज्ञान का अध्याय 3, 'पदार्थों का पृथक्करण', हमें यह सिखाता है कि किस प्रकार वैज्ञानिक सिद्धांतों और भौतिक गुणों (आकार, भार, घनत्व, विलेयता) का उपयोग करके हम मिश्रणों से शुद्ध, उपयोगी और स्वास्थ्यवर्धक पदार्थों को सुगमता से अलग कर सकते हैं।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पदार्थों का पृथक्करण मानव स्वास्थ्य, कृषि और आधुनिक उद्योगों की आधारशिला है। पटना और मुजफ्फरपुर के नगर निगम जल शोधन संयंत्रों में गंगा के जल को शुद्ध करके लाखों लोगों तक पहुंचाना हो या जीवन रक्षक दवाइयों का निर्माण, मिश्रणों से शुद्ध अवयव अलग किए बिना आधुनिक जीवन असंभव है। कक्षा 6 के विद्यार्थियों के लिए यह अध्याय रसोईघर के सामान्य कार्यों से लेकर बड़े कारखानों की जटिल वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के पीछे छिपे विज्ञान को उजागर करता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • दैनिक जीवन के सामान्य मिश्रणों (जैसे कंकड़ मिला अनाज, चाय पत्ती वाली चाय, गंदला पानी, नमक का घोल) की व्यावहारिक पहचान।
  • पदार्थ की तीन भौतिक अवस्थाओं (ठोस, द्रव, गैस) तथा वाष्पीकरण व जमने की बुनियादी समझ।
  • पिछले अध्यायों में सीखे गए विलेय/अविलेय तथा घनत्व के आधार पर तैरने/डूबने के प्रारंभिक नियम।
  • इंद्रिय अवलोकन कौशल: कणों के आकार, भार, रंग तथा पानी के स्वच्छपन में अंतर पहचानने की क्षमता।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • दैनिक जीवन, कृषि और उद्योग में पदार्थों के पृथक्करण के तीन मुख्य वैज्ञानिक उद्देश्यों की व्याख्या करना।
  • ठोस-ठोस मिश्रणों के लिए उपयुक्त विधि (हस्त चयन, थ्रेशिंग, निष्पावन, चालन) का चयन करना और उसका प्रयोगात्मक निष्पादन करना।
  • अविलेय ठोस-द्रव मिश्रणों को अलग करने के लिए अवसादन, निस्तारण और निस्यंदन (छानना) की विधियों में वैज्ञानिक विभेद करना।
  • वाष्पन और संघनन के भौतिक सिद्धांतों को समझाते हुए समुद्री जल से साधारण नमक बनाने की पूरी प्रक्रिया का वर्णन करना।
  • असंतृप्त और संतृप्त विलयन में अंतर स्पष्ट करना तथा विलेयता पर तापमान के प्रभाव का प्रयोगात्मक विश्लेषण करना।
  • जटिल मिश्रणों (जैसे बालू, नमक और लोहे के चूर्ण) को अलग करने के लिए क्रमबद्ध बहु-चरणीय वैज्ञानिक योजना तैयार करना।
  • बिहार की पारंपरिक धरोहर (बांस का सूप, लकड़ी की मथानी, फिटकरी द्वारा जल शुद्धिकरण) में छिपे वैज्ञानिक सिद्धांतों को समझना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 पृथक्करण की आवश्यकता: शुद्ध पदार्थ,...
2 ठोस-ठोस मिश्रणों के पृथक्करण की विध...
3 अविलेय ठोस-द्रव मिश्रणों का पृथक्कर...
4 विलेय ठोस-द्रव मिश्रणों का पृथक्करण...
5 घुलनशीलता की सीमाएं: असंतृप्त व संत...
6 जटिल मिश्रणों के लिए क्रमबद्ध बहु-च...
7 बिहार की पारंपरिक पृथक्करण पद्धतिया...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

पृथक्करण की आवश्यकता: शुद्ध पदार्थ, मिश्रण एवं व्यावहारिक उद्देश्य

1. शुद्ध पदार्थ बनाम मिश्रण: दैनिक जीवन की वास्तविकता

प्रकृति और हमारे दैनिक परिवेश में मिलने वाली अधिकांश वस्तुएं रासायनिक रूप से पूर्णतः शुद्ध नहीं होतीं। हम जो कुछ भी छूते हैं, खाते हैं या उपयोग करते हैं, वह सामान्यतः एक मिश्रण (Mixture) होता है—अर्थात दो या दो से अधिक ऐसे पदार्थों का भौतिक संयोजन जो बिना किसी रासायनिक बंध के एक साथ मौजूद रहते हैं और अपने मूल गुणों को बनाए रखते हैं।

  • शुद्ध पदार्थ (Pure Substance): वह पदार्थ जिसका रासायनिक संघटन संपूर्ण भाग में एकसमान और निश्चित होता है तथा जिसके भौतिक गुण (जैसे गलनांक, क्वथनांक) अद्वितीय होते हैं। उदाहरण के लिए: आसुत जल (Distilled Water, $H_2O$), शुद्ध शर्करा ($C_{12}H_{22}O_{11}$), सोडियम क्लोराइड के शुद्ध क्रिस्टल ($NaCl$) और 24 कैरेट का शुद्ध सोना ($Au$)।
  • मिश्रण (Mixture): दो या अधिक पदार्थों का किसी भी अनिश्चित अनुपात में भौतिक रूप से मिला हुआ रूप, जिसमें प्रत्येक घटक अपना मूल अस्तित्व बनाए रखता है और जिसे भौतिक विधियों द्वारा अलग किया जा सकता है। उदाहरण के लिए: कंकड़ मिला हुआ कच्चा चावल, नदी का मटमैला जल, लवण घुला समुद्री जल और हमारे चारों ओर की वायु (जो नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प का गैसीय मिश्रण है)।
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|                          शुद्ध पदार्थ बनाम मिश्रण का तुलनात्मक वैज्ञानिक ढांचा                     |
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|  तुलना का आधार       शुद्ध पदार्थ (PURE SUBSTANCE)                  मिश्रण (MIXTURE)              |
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|  रासायनिक संघटन      निश्चित, स्थिर और संपूर्ण भाग में एकसमान।      परिवर्तनशील, कोई निश्चित अनुपात नहीं।|
|  भौतिक गुणधर्म       निश्चित गलनांक, क्वथनांक व घनत्व।              घटकों के व्यक्तिगत गुणों का मिश्रण।   |
|  पृथक्करण की विधि    सरल भौतिक विधियों द्वारा अलग नहीं किया जा सकता।सरल भौतिक विधियों (छानना, उबालना) से अलग।|
|  दैनिक उदाहरण        आसुत जल, शुद्ध नमक, शुद्ध सोना।                नल का पानी, दूध, कंकड़-दाल, वायु।    |
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2. पृथक्करण के तीन प्रमुख वैज्ञानिक उद्देश्य

हम पदार्थों के मिश्रण से उसके विभिन्न घटकों को अलग करने के लिए इतना शारीरिक श्रम और उपकरण क्यों लगाते हैं? कक्षा 6 भौतिक विज्ञान के अनुसार सभी पृथक्करण प्रक्रियाएं तीन मुख्य व्यावहारिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की जाती हैं:

क. हानिकारक या नुकसानदेह अशुद्धियों को दूर करना

कच्चे प्राकृतिक पदार्थों में प्रायः ऐसे अवांछित तत्व मिले होते हैं जो हमारे स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं:

  1. अनाज की सफाई: खेतों से काटे गए गेहूं, चावल और दालों में मिट्टी के ढेले, नुकीले कंकड़, खरपतवार के जहरीले बीज और कीड़ों के अंश मिले होते हैं। यदि इन्हें बिना हटाए सीधे पका लिया जाए, तो ये दांतों को तोड़ सकते हैं और पेट की आंतों को जख्मी कर सकते हैं। अतः पकाने से पहले इन्हें चुनकर अलग करना अनिवार्य है।
  2. पेयजल का शुद्धिकरण: बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में गंगा, कोसी और गंडक का पानी अत्यधिक गंदला होता है जिसमें मिट्टी के बारीक कण और हैजा, पेचिश फैलाने वाले जीवाणु होते हैं। अवसादन, निस्यंदन और क्लोरीनीकरण द्वारा इन हानिकारक अशुद्धियों को अलग करके पानी को पीने योग्य बनाया जाता है।

ख. अनुपयोगी या अखाद्य अवयवों को हटाना

मिश्रण में कई ऐसे घटक होते हैं जो विषैले तो नहीं होते, परंतु तैयार उत्पाद में उनका कोई उपयोग नहीं होता और वे स्वाद या उपयोगिता में बाधा बनते हैं:

  1. उबली हुई चाय छानना: चाय बनाते समय पत्तियों के पोषक तत्व और सुगंध गर्म पानी में आ जाते हैं। इसके बाद पत्तियों का कोई उपयोग नहीं रह जाता; यदि वे कप में आ जाएं तो मुंह का स्वाद खराब करती हैं। अतः छलनी (Strainer) लगाकर अनुपयोगी चाय पत्ती को अलग फेंक दिया जाता है।
  2. धान से भूसा अलग करना: चावल के दाने के ऊपर रेशेदार, कठोर और अखाद्य छिलका होता है जिसे भूसा (हस्क) कहते हैं। मनुष्य का पेट सेल्यूलोज युक्त भूसे को नहीं पचा सकता; इसलिए थ्रेशिंग और ओसाना द्वारा भूसे को अलग किया जाता है ताकि केवल शुद्ध चावल खाया जा सके।

ग. एक ही मिश्रण से दो अलग-अलग उपयोगी पदार्थों को प्राप्त करना

कई प्रक्रियाओं में मिश्रण के दोनों ही घटक अत्यंत मूल्यवान और उपयोगी होते हैं और दोनों का अलग-अलग महत्व होता है:

  1. दही का मंथन (मथानी से मथना): बिहार के ग्रामीण घरों में जमे हुए दही को लकड़ी की मथानी से मथा जाता है। मथने से हल्का मक्खन ऊपर आ जाता है और तरल छाछ (मट्ठा) नीचे रह जाती है। यहाँ मक्खन से शुद्ध घी बनाया जाता है और छाछ को पाचक पेय के रूप में पिया जाता है—दोनों घटक अत्यंत उपयोगी हैं।
  2. कच्चे पेट्रोलियम का प्रभाजी आसवन: जमीन से निकलने वाला कच्चा खनिज तेल एक गाढ़ा काला मिश्रण होता है। इसे अलग-अलग तापमान पर उबालकर पेट्रोल, डीजल, केरोसिन, मोम और डामर (अलकतरा) प्राप्त किया जाता है, और प्रत्येक अलग हुआ घटक देश की अर्थव्यवस्था चलाता है।

मुख्य वैज्ञानिक नियम: पृथक्करण की विधि का चुनाव कभी भी मनमाने ढंग से नहीं होता; यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि अलग किए जाने वाले घटकों के भौतिक गुणों में क्या अंतर है (जैसे कणों का आकार, भार, घनत्व, विलेयता, वाष्पशीलता या चुंबकीय गुण)।

ठोस-ठोस मिश्रणों के पृथक्करण की विधियां: हस्त चयन, थ्रेशिंग (दौनी), निष्पावन (ओसाना) और चालन

1. ठोस-ठोस मिश्रणों के पृथक्करण का अवलोकन

जब दो या अधिक ठोस पदार्थ आपस में सूखे रूप में मिले होते हैं, तो उन्हें अलग करने के लिए उनके बाह्य रूप (रंग और आकार), कणों के आकार, कणों के द्रव्यमान (घनत्व) या पौधों के डंठलों से उनके जुड़ाव के अंतर का सहारा लिया जाता है। कक्षा 6 में पढ़ाई जाने वाली ये चार विधियां कृषि और घरेलू प्रबंधन की सदियों पुरानी तकनीकें हैं।

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|                          ठोस-ठोस मिश्रणों के पृथक्करण की मानक वैज्ञानिक विधियां                   |
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|  विधि                उपयोग में आने वाला भौतिक गुण  अशुद्धि की मात्रा / पैमाना      दैनिक जीवन का उदाहरण   |
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|  हस्त चयन            आकार, रंग या रूप में स्पष्ट   कम मात्रा; सीमित घरेलू उपयोग     थाली में फैले चावल से |
|  (Handpicking)       दृश्य अंतर।                   (1-2 किलो का बैच)।              कंकड़ चुनना।           |
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|  थ्रेशिंग / दौनी     डंठल और दाने के बीच यांत्रिक  विशाल कृषि पैमाना (खेतों में     खलिहान में डंठलों को  |
|  (Threshing)         बंधन की दुर्बलता।             क्विंटल अनाज का उत्पादन)।       पत्थर पर पीटना।        |
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|  निष्पावन / ओसाना    कणों के द्रव्यमान और घनत्व    हल्के भूसे से मिले भारी अन्न     सूप को हवा के सामने   |
|  (Winnowing)         का अंतर (हवा हल्के को उड़ाए)। का विशाल ढेर।                   ऊंचाई से हिलाना।       |
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|  चालन                कणों के आकारों में निश्चित    निरंतर चलने वाली छलनी प्रक्रिया आटा से चोकर अलग करना,  |
|  (Sieving)           अंतर (छलनी के छिद्र)।         (आटा मिल, भवन निर्माण)।          बालू से कंकड़ छानना।  |
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2. हस्त चयन (Handpicking)

हस्त चयन अपने हाथों की उंगलियों से अवांछित अशुद्धियों को चुनकर अलग करने की सबसे सरल और सीधी विधि है। यह विधि केवल तभी व्यावहारिक होती है जब निम्नलिखित तीन शर्तें पूरी होती हों:

  1. अशुद्धियों का रंग, रूप या आकार उपयोगी पदार्थ से स्पष्ट रूप से भिन्न हो (जैसे हल्के पीले चावल में काले या भूरे नुकीले कंकड़ साफ दिखते हैं)।
  2. मिश्रण की कुल मात्रा सीमित और कम हो (जैसे परिवार के भोजन के लिए थाली में ली गई 1 किलो दाल)।
  3. अशुद्धि की संख्या बहुत कम हो (थाली में 10-15 कंकड़ चुनना आसान है, किंतु यदि आटे की बोरी में लाखों बारीक बालू के कण मिले हों तो उन्हें हाथ से नहीं चुना जा सकता)।

3. थ्रेशिंग या दौनी (Threshing)

बिहार के उपजाऊ खेतों में जब गेहूं, धान (चावल) या सरसों की फसल पककर तैयार हो जाती है, तो किसान पौधों को जमीन के पास से काट लेते हैं। काटी गई फसल में सूखे डंठलों के सिरों पर बालियां लगी होती हैं, जिनमें सैकड़ों अन्नकण मजबूती से जकड़े रहते हैं। चूंकि अन्नकणों की संख्या लाखों में होती है, अतः इन्हें हाथ से तोड़कर अलग करना असंभव है। पौधों के सूखे डंठलों से अन्नकणों को अलग करने की प्रक्रिया को थ्रेशिंग (दौनी) कहते हैं।

  • पारंपरिक हस्त दौनी: सूखे डंठलों के पूलों (बंडलों) को उठाकर लकड़ी के भारी लट्ठे, पत्थर की पटिया या खलिहान की पक्की जमीन पर जोर-जोर से पटका जाता है। अचानक लगने वाले झटके से सूखे डंठल टूट जाते हैं और दाने छिटककर अलग गिर जाते हैं।
  • बैलों द्वारा दौनी: बिहार के गांवों में खलिहान (खलिहान) के बीच में एक खूंटा गाड़कर उसके चारों ओर सूखे डंठलों को गोल बिछा दिया जाता है। बैलों की एक जोड़ी को खूंटे से बांधकर फसल के ऊपर लगातार चलाया जाता है। बैलों के खुरों के दबाव से डंठल कुचल जाते हैं और दाने सुरक्षित बाहर निकल आते हैं।
  • आधुनिक थ्रेशर मशीनें: आजकल ट्रैक्टर या डीजल इंजन से चलने वाले थ्रेशर उपयोग में आते हैं, जो मिनटों में क्विंटल अनाज के डंठलों को चीरकर दाना अलग कर देते हैं।

4. निष्पावन या ओसाना (Winnowing)

दौनी के बाद किसान के पास जो ढेर मिलता है, उसमें शुद्ध अनाज के दानों के साथ-साथ सूखे डंठलों के बारीक टुकड़े और हल्का छिलका (भूसा) मिला होता है। दाना और भूसा आकार में लगभग बराबर होते हैं, इसलिए छलनी से इन्हें अलग करना कठिन होता है। किंतु इनके द्रव्यमान और घनत्व में भारी अंतर होता है: दाना भारी और सघन होता है, जबकि सूखा भूसा अत्यंत हल्का और हवा में उड़ने वाला होता है।

निष्पावन (ओसाना) हवा के झोंकों द्वारा भारी अनाज के कणों से हल्के भूसे को अलग करने की विधि है:

  1. किसान खुले मैदान में हवा की दिशा के सामने एक ऊंचे तख्ते या मेज पर खड़ा होता है।
  2. मिश्रण को बांस के बने चपटे और सूपड़ेनुमा बर्तन में लिया जाता है, जिसे बिहार में सूप (Soop) कहा जाता है।
  3. सूप को कंधे की ऊंचाई तक उठाकर आगे की ओर हल्का झुकाया जाता है और धीरे-धीरे हिलाया जाता है ताकि मिश्रण नीचे गिरे।
  4. गिरते समय प्राकृतिक हवा के झोंके हल्के भूसे के कणों को उड़ाकर कुछ दूरी पर ले जाते हैं, जहाँ भूसे का एक अलग ढेर लग जाता है (जो पशुओं के चारे के काम आता है)।
  5. भारी अन्नकण हवा से प्रभावित नहीं होते और गुरुत्वाकर्षण के कारण सीधे नीचे गिरकर किसान के पैरों के पास साफ अनाज का एक अलग ढेर बना लेते हैं।

5. चालन (Sieving)

जब किसी सूखे ठोस मिश्रण के घटकों के कणों के आकारों में स्पष्ट अंतर होता है, तो उन्हें अलग करने के लिए उपयुक्त जालीदार छलनी का उपयोग किया जाता है। इस विधि को चालन (Sieving) कहते हैं।

  • रसोई में आटा छानना: चक्की से पिसकर आए गेहूं के आटे में बारीक मैदा कणों के साथ-साथ गेहूं का मोटा छिलका यानी चोकर (ब्रान) होता है। जब आटे को महीन छलनी में डालकर हिलाया जाता है, तो बारीक आटा छलनी के छिद्रों से निकलकर थाली में गिर जाता है, जबकि मोटा चोकर छलनी पर ही रुका रह जाता है।
  • मकान निर्माण में बालू छानना: नदी से लाई गई बालू में बड़े-बड़े पत्थर और कंकड़ होते हैं जो सीमेंट का जोड़ कमजोर कर सकते हैं। मजदूर लोहे की तारों वाली बड़ी तिरछी छलनी पर फावड़े से बालू फेंकते हैं। महीन बालू जाली के आर-पार निकल जाती है और बड़े कंकड़-पत्थर लुढ़ककर नीचे गिर जाते हैं।

अविलेय ठोस-द्रव मिश्रणों का पृथक्करण: अवसादन, निस्तारण और निस्यंदन (छानना)

1. अविलेय निलंबन का विज्ञान

जब कोई अघुलनशील ठोस किसी द्रव में मिलाया जाता है—जैसे नदी की गंदली मिट्टी या चाक का पाउडर पानी में घोलने पर—तो वह घुलता नहीं है, बल्कि एक विषमांगी निलंबन (Suspension) बनाता है। ऐसे मिश्रण से शुद्ध जल प्राप्त करने के लिए भौतिक विज्ञान तीन क्रमिक चरणों की एक मानक वैज्ञानिक पद्धति प्रदान करता है: अवसादन, निस्तारण और निस्यंदन (छानना)।

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|                          अविलेय ठोस-द्रव पृथक्करण के तीन क्रमिक वैज्ञानिक चरण                     |
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|  चरण                 भौतिक सिद्धांत                परिणाम / शुद्धता का स्तर        उपकरण / साधन   |
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|  1. अवसादन           गुरुत्वाकर्षण द्वारा भारी     केवल भारी कण तली में बैठते हैं; बीकर, शांत जल, |
|  (Sedimentation)     कणों का तली में बैठना।        पानी अब भी थोड़ा गंदला रहता है। फिटकरी (भारण)। |
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|  2. निस्तारण         तली की गाद को छेड़े बिना      मोटा जल अलग हो जाता है; महीन    कांच की छड़,   |
|  (Decantation)       ऊपरी स्वच्छ जल को उंडेलना।    कण फिर भी तैरते रहते हैं।       चोंचदार बीकर।  |
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|  3. निस्यंदन         सूक्ष्म छिद्रों वाले माध्यम   100% शुद्ध पारदर्शी द्रव        फिल्टर पेपर,   |
|  (Filtration/छानना)  से छानना (अवशेष ऊपर, निस्यंद) मिलता है; सारे ठोस अलग।         कीप, मलमल कपड़ा।|
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2. अवसादन (Sedimentation)

जब किसी गंदले जल के मिश्रण को किसी बर्तन में भरकर कुछ समय के लिए बिल्कुल शांत और बिना हिलाए छोड़ दिया जाता है, तो पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल उस मिश्रण में मौजूद भारी अघुलनशील कणों (जैसे बालू और मोटी मिट्टी) को नीचे की ओर खींचता है। धीरे-धीरे ये भारी कण बर्तन की तली में एक ठोस परत के रूप में बैठ जाते हैं, जिसे गाद या तलछट (Sediment) कहते हैं।

  • वैज्ञानिक परिभाषा: किसी द्रव मिश्रण में भारी अविलेय अवयवों के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से तली में नीचे बैठने की प्रक्रिया को अवसादन (Sedimentation) कहते हैं।
  • अधितरल (Supernatant Liquid): तली में बैठी गाद के ऊपर जो अपेक्षाकृत साफ पानी इकट्ठा हो जाता है, उसे अधितरल कहते हैं।
  • फिटकरी द्वारा भारण (Loading with Alum): बिहार में गंगा या कोसी की बाढ़ के पानी में मिट्टी के कण इतने बारीक (कोलाइडल) होते हैं कि वे कई दिनों तक नीचे नहीं बैठते। ग्रामीण लोग गंदले पानी में फिटकरी (Alum) का टुकड़ा धागे से बांधकर 4-5 बार घुमा देते हैं। फिटकरी के घुले हुए एल्युमिनियम आयन मिट्टी के कणों के विद्युत आवेश को समाप्त कर देते हैं, जिससे मिट्टी के नन्हें कण आपस में चिपककर भारी थक्के (Flocs) बना लेते हैं और कुछ ही मिनटों में तेजी से पेंदे में बैठ जाते हैं! इस क्रिया को भारण (Loading) कहते हैं।

3. निस्तारण (Decantation)

अवसादन के पश्चात जब तली में गाद बैठ जाती है और ऊपर का पानी साफ दिखने लगता है, तो उस साफ पानी को गाद से अलग करने की आवश्यकता होती है:

  • वैज्ञानिक परिभाषा: अवसादन के बाद तली में बैठी गाद को बिना हिलाए या छेड़े, ऊपर के स्वच्छ द्रव को सावधानीपूर्वक किसी दूसरे बर्तन में उंडेलने (डालने) की क्रिया को निस्तारण (Decantation) कहते हैं।
  • प्रयोगशाला युक्ति: प्रयोगशाला में निस्तारण करते समय बीकर के मुंह पर कांच की छड़ लगा दी जाती है ताकि पानी छड़ के सहारे धीरे-धीरे बहे और छलकने से तली की गाद दोबारा न हिले।
  • अमिश्रणीय द्रवों का पृथक्करण: निस्तारण का उपयोग दो अमिश्रणीय द्रवों (जैसे सरसों का तेल और पानी) को अलग करने के लिए भी किया जाता है। जब तेल-पानी के मिश्रण को शांत छोड़ते हैं, तो हल्का तेल ऊपर तैरने लगता है। बर्तन को हल्का तिरछा करके ऊपरी तेल की परत को दूसरे बर्तन में उंडेल लिया जाता है।

4. निस्यंदन या छानना (Filtration)

निस्तारण द्वारा अलग किए गए पानी में अभी भी बहुत बारीक मिट्टी के कण तैरते रहते हैं, जिससे वह पूरी तरह स्वच्छ नहीं दिखता। इस जल को शत-प्रतिशत निर्मल बनाने के लिए निस्यंदन (Filtration) किया जाता है।

  • वैज्ञानिक परिभाषा: किसी द्रव में उपस्थित अविलेय ठोस कणों को किसी सूक्ष्म छिद्रयुक्त माध्यम (जैसे फिल्टर पेपर, बारीक कपड़ा या छलनी) से गुजारकर अलग करने की प्रक्रिया को निस्यंदन या छानना कहते हैं।
  • अवशेष बनाम निस्यंद:
    • अवशेष (Residue): वह अघुलनशील ठोस पदार्थ जो फिल्टर पेपर के बारीक छिद्रों के ऊपर ही फंसा रह जाता है।
    • निस्यंद (Filtrate): वह स्वच्छ, शुद्ध द्रव जो फिल्टर पेपर के छिद्रों से छनकर नीचे रखे बीकर में बूंद-बूंद टपकता है।

व्यावहारिक एवं दैनिक अनुप्रयोग:

  1. प्रयोगशाला में फिल्टर पेपर का शंकु बनाना: छात्र गोल फिल्टर पेपर को पहले आधा मोड़ते हैं, फिर चौथाई मोड़कर एक शंकु (Cone) बनाते हैं। इसे कांच की कीप (Funnel) में गीला करके चिपका दिया जाता है। गंदला पानी डालने पर कीप से बिल्कुल पारदर्शी निस्यंद नीचे गिरता है और सारी मिट्टी कागज पर अवशेष बनकर रह जाती है।
  2. फलों के रस की छनाई: संतरे या मौसमी के ताजे निकाले गए रस को जालीदार छन्नी से छाना जाता है ताकि कड़वे बीज और मोटा गूदा अलग हो जाए।
  3. पारंपरिक छेना और पनीर का निर्माण: बिहार और बंगाल में उबलते दूध में नींबू का रस या खट्टा मट्ठा डालकर दूध फाड़ा जाता है। फटे हुए दूध को साफ मलमल के कपड़े (Muslin cloth) पर उड़ेला जाता है। मलमल का कपड़ा एक उत्कृष्ट फिल्टर का कार्य करता है: सारा पीला पानी (व्हे) छनकर नीचे गिर जाता है और कपड़े के भीतर शुद्ध सफेद छेना (Residue) बच जाता है, जिससे स्वादिष्ट रसगुल्ले बनते हैं!

विलेय ठोस-द्रव मिश्रणों का पृथक्करण: वाष्पन, समुद्री जल से नमक निर्माण और संघनन

1. विलेय मिश्रणों की चुनौती: जब छानना विफल हो जाता है

यदि आप एक बीकर पानी में दो चम्मच साधारण नमक ($NaCl$) डालकर चम्मच से पूरी तरह घोल दें, तो नमक के सारे कण गायब हो जाते हैं और पानी बिल्कुल पारदर्शी दिखता है। अब यदि आप इस नमक के पानी को सबसे बारीक फिल्टर पेपर से भी छानें, तो क्या होगा?

छात्र यह देखकर दंग रह जाते हैं कि सारा नमक पानी के साथ फिल्टर पेपर के आर-पार निकल जाता है! ऐसा इसलिए होता है क्योंकि घुले हुए नमक के आयन 1 नैनोमीटर से भी छोटे होते हैं, जो फिल्टर पेपर के छिद्रों से हजारों गुना सूक्ष्म हैं। अतः घुले हुए पदार्थों को अवसादन, निस्तारण या छानने से कभी अलग नहीं किया जा सकता। इन्हें अलग करने के लिए हमें अवस्था परिवर्तन (वाष्पीकरण और द्रवीकरण) के सिद्धांतों का सहारा लेना पड़ता है।

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|                          वाष्पन (EVAPORATION) बनाम संघनन (CONDENSATION)                           |
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|  प्रक्रिया           अवस्था परिवर्तन               ऊष्मा की आवश्यकता              प्राप्त होने वाला भाग  |
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|  वाष्पन              द्रव अवस्था से वाष्प (गैस)    ऊष्मा अवशोषित करता है (ऊष्माशोषी)तली में ठोस विलेय     |
|  (Evaporation)       में बदलना।                    (पर्यावरण या बर्नर से)।         (नमक) बचता है।         |
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|  संघनन               वाष्प (गैस) से द्रव अवस्था    ऊष्मा मुक्त करता है (ऊष्माक्षेपी)शुद्ध आसुत जल की बूंदें|
|  (Condensation)      में लौटना (ठंडा होने पर)।     (ठंडी सतह के संपर्क में)।       प्राप्त होती हैं।      |
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2. वाष्पन (Evaporation)

वाष्पन वह भौतिक प्रक्रिया है जिसमें कोई द्रव अपने क्वथनांक से नीचे के किसी भी तापमान पर धीरे-धीरे वाष्प (गैस) में परिवर्तित होता रहता है:

  • वैज्ञानिक सिद्धांत: द्रव की खुली सतह के अणु आसपास से ऊष्मीय ऊर्जा ग्रहण करते हैं, अंतराण्विक आकर्षण बल को तोड़ते हैं और गैस बनकर हवा में उड़ जाते हैं।
  • प्रयोगशाला में नमक प्राप्त करना: एक चीनी मिट्टी की प्याली (Evaporating Dish) में नमक का घोल लीजिए और उसे तिपाई स्टैंड पर रखकर स्पिरिट लैंप से गर्म कीजिए। पानी तेजी से भाप बनकर हवा में उड़ने लगता है। जब सारा पानी उड़ जाता है, तो प्याली की तली में सफेद, चमकीले शुद्ध नमक के क्रिस्टल शेष रह जाते हैं।

3. समुद्री जल से साधारण नमक का निर्माण (कयारियों में नमक की खेती)

भारत और बिहार के करोड़ों परिवारों में प्रतिदिन खाया जाने वाला साधारण नमक मुख्य रूप से समुद्र के खारे पानी के वाष्पीकरण से ही प्राप्त होता है:

  1. समुद्री जल में लगभग $3.5\%$ घुले हुए खनिज लवण होते हैं, जिनमें मुख्य रूप से सोडियम क्लोराइड (साधारण नमक) होता है।
  2. समुद्र तटीय क्षेत्रों (गुजरात, तमिलनाडु आदि) में उथले गड्ढे या बांध बनाकर छिछले खेत बनाए जाते हैं, जिन्हें कयारियां (Salt Pans) कहते हैं।
  3. इन कयारियों में समुद्र का पानी भर दिया जाता है।
  4. सूर्य की तेज धूप और बहने वाली हवा की ऊष्मा से कयारियों का पानी धीरे-धीरे वाष्प बनकर हवा में उड़ता रहता है।
  5. कुछ हफ्तों में जब सारा पानी उड़ जाता है, तो कयारियों की जमीन पर ठोस लवणों की मोटी सफेद परत बच जाती है।
  6. इस कच्चे नमक को इकट्ठा करके कारखानों में ले जाया जाता है, जहाँ इसका शोधन किया जाता है और घेंघा रोग से बचाव के लिए इसमें पोटैशियम आयोडेट मिलाकर आयोडीन युक्त नमक तैयार किया जाता है।

4. संघनन (Condensation)

साधारण वाष्पन में सारा पानी भाप बनकर वायुमंडल में उड़ जाता है और नष्ट हो जाता है। किंतु यदि हमारा उद्देश्य घुले हुए ठोस (नमक) के साथ-साथ उस शुद्ध पानी को भी वापस प्राप्त करना हो, तो हमें भाप को ठंडा करना पड़ता है:

  • वैज्ञानिक परिभाषा: वाष्प (गैस) के ठंडा होकर पुनः द्रव अवस्था में बदलने की प्रक्रिया को संघनन (Condensation) कहते हैं।
  • दैनिक जीवन में संघनन के उदाहरण:
    1. बर्फ के पानी का गिलास: बिहार की गर्मी में स्टील के गिलास में बर्फ का ठंडा पानी डालिए। दो मिनट में गिलास की बाहरी सतह पर पानी की नन्हीं बूंदें चमकने लगती हैं। यह पानी गिलास के अंदर से रिसकर नहीं आया है! कमरे की हवा में मौजूद अदृश्य जलवाष्प जब गिलास की ठंडी धातु से टकराती है, तो ठंडी होकर संघनित हो जाती है और पानी की बूंदों में बदल जाती है।
    2. गर्म खाने का ढक्कन: जब गर्म पके हुए चावल या दाल के पतीले का ढक्कन हटाया जाता है, तो ढक्कन के भीतरी भाग पर पानी की बड़ी-बड़ी बूंदें चिपकी दिखाई देती हैं। गर्म भाप ढक्कन से टकराकर ठंडी हुई और संघनित हो गई।

5. वाष्पन और संघनन का संयुक्त प्रयोग: केतली वाला प्रयोग

नमक और पानी के घोल से नमक और शुद्ध पानी दोनों को एक साथ अलग करने के लिए विज्ञान शिक्षक केतली का प्रसिद्ध प्रयोग दिखाते हैं:

  1. धातु की चाय की केतली में नमक और पानी का घोल भरकर ढक्कन बंद कर दिया जाता है और उसे स्टोव पर खौलाया जाता है।
  2. पानी उबलने लगता है और केतली की टोंटी से तेज भाप (वाष्प) बाहर निकलने लगती है। अवाष्पशील नमक केतली के भीतर ही छूट जाता है।
  3. अब बर्फ के टुकड़ों से भरी एक धातु की तस्तरी (प्लेट) को टोंटी से निकलती भाप के ठीक ऊपर तिरछा करके पकड़ा जाता है।
  4. जैसे ही गर्म भाप बर्फ वाली ठंडी तस्तरी से टकराती है, वह तुरंत संघनित होकर द्रव जल की बूंदों में बदल जाती है।
  5. ये शुद्ध पानी की बूंदें तस्तरी के किनारे से फिसलकर नीचे रखे साफ बीकर में टपकने लगती हैं।
  6. अंत में केतली के भीतर शुद्ध ठोस नमक बच जाता है, और बीकर में 100% शुद्ध आसुत जल इकट्ठा हो जाता है!

घुलनशीलता की सीमाएं: असंतृप्त व संतृप्त विलयन एवं तापमान की गतिकी

1. क्या जल किसी पदार्थ की कितनी भी मात्रा को घोल सकता है?

यदि आप एक गिलास पानी में आधा चम्मच चीनी घोलें, तो वह तुरंत घुल जाती है। एक चम्मच और डालें, वह भी गायब हो जाती है। क्या इसका अर्थ यह है कि एक ही गिलास पानी में आप चीनी की पूरी बोरी घोल सकते हैं, बशर्ते आप चम्मच से हिलाते रहें?

भौतिक विज्ञान में इसका उत्तर है: बिल्कुल नहीं। जल के अणुओं ($H_2O$) के बीच एक सीमित रिक्त स्थान (अंतराण्विक अवकाश) होता है। जब जल के अणुओं के बीच के सारे खाली स्थान घुले हुए पदार्थ के कणों से भर जाते हैं, तो विलायक अपनी संतृप्ति सीमा तक पहुँच जाता है और उस निश्चित तापमान पर अतिरिक्त पदार्थ को घोलने से इनकार कर देता है। यहीं से जन्म होता है असंतृप्त और संतृप्त विलयन की वैज्ञानिक अवधारणा का।

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|                          विलयन की संतृप्ति अवस्थाएं एवं विलेयता का व्यवहार                       |
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|  विलयन की अवस्था     अतिरिक्त विलेय डालने पर व्यवहारआणविक स्थिति                   साम्यावस्था     |
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|  असंतृप्त विलयन      डाला गया विलेय तुरंत और         विलायक के अंतराण्विक स्थान     घुलने की गति >  |
|  (Unsaturated)       पूरी तरह घुल जाता है।          अभी आंशिक रूप से खाली हैं।     क्रिस्टलीकरण।   |
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|  संतृप्त विलयन       अतिरिक्त विलेय नहीं घुलता;     सभी अंतराण्विक स्थान विलेय के  गतिक संतुलन;    |
|  (Saturated)         तली में ठोस जमा होने लगता है।  कणों से पूरी तरह भर चुके हैं।  घुलना = जमना।   |
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|  अतिसंतृप्त विलयन    गर्म करके अधिक घोला गया;       अस्थिर; ठंडा होने पर अतिरिक्त  असंतुलित; हिलाने|
|  (Super-saturated)   सामान्य से अधिक विलेय धारण।    विलेय तुरंत बाहर निकलता है।    पर क्रिस्टल बने|
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2. असंतृप्त विलयन (Unsaturated Solution)

असंतृप्त विलयन वह विलयन है जिसमें किसी दिए गए निश्चित तापमान पर विलेय पदार्थ की और अधिक मात्रा को आसानी से घोला जा सकता है:

  • यदि $25^\circ\text{C}$ पर $100\text{ मिली}$ पानी में केवल एक चम्मच नमक घोला जाए, तो यह असंतृप्त विलयन है क्योंकि इसमें दूसरा या तीसरा चम्मच नमक डालने पर भी वह पूरी तरह घुल जाएगा।
  • इसमें विलेय की सांद्रता उसकी अधिकतम विलेयता सीमा से काफी कम होती है।

3. संतृप्त विलयन (Saturated Solution)

संतृप्त विलयन वह विलयन है जिसमें किसी दिए गए निश्चित तापमान पर विलेय पदार्थ की और अधिक मात्रा नहीं घोली जा सकती, चाहे उसे कितनी भी देर तक क्यों न हिलाया जाए:

  • प्रयोगशाला में संतृप्त घोल बनाने की विधि:
    1. एक बीकर में कमरे के तापमान ($25^\circ\text{C}$) पर $100\text{ मिली}$ पानी लीजिए।
    2. इसमें एक चम्मच साधारण नमक डालिए और कांच की छड़ से हिलाकर पूरी तरह घोल लीजिए।
    3. दूसरा चम्मच, तीसरा चम्मच, चौथा चम्मच नमक लगातार डालते रहिए और प्रत्येक बार अच्छी तरह हिलाते रहिए।
    4. लगभग 36 ग्राम नमक घुलने के बाद आप देखेंगे कि अगला चम्मच नमक अब बिल्कुल नहीं घुल रहा है! बहुत देर तक हिलाने पर भी नमक के क्रिस्टल बीकर की तली में ज्यों के त्यों पड़े रहते हैं।
    5. तली में बैठे नमक के ऊपर जो स्वच्छ द्रव है, वही $25^\circ\text{C}$ पर नमक का संतृप्त विलयन कहलाता है।

4. विलेयता पर तापमान (ऊष्मा) का चमत्कारी प्रभाव

यदि उस बीकर को—जिसकी तली में अघुला नमक बैठा है—बर्नर की आग पर रखकर धीरे-धीरे गर्म किया जाए, तो क्या होगा?

  • गर्म करने पर अवलोकन: जैसे-जैसे पानी का तापमान $25^\circ\text{C}$ से बढ़कर $70^\circ\text{C}$ या $80^\circ\text{C}$ पहुंचता है, तली में बैठा सारा अघुला नमक पूरी तरह पानी में विलीन हो जाता है! घोल फिर से एकदम स्वच्छ पारदर्शी बन जाता है।
  • वैज्ञानिक कारण: ऊष्मा पाकर जल के अणुओं की गतिज ऊर्जा बढ़ जाती है और वे एक-दूसरे से दूर-दूर हो जाते हैं। इस फैलाव से जल के अणुओं के बीच के अंतराण्विक स्थान बड़े हो जाते हैं, जिससे गर्म जल में अधिक मात्रा में विलेय कण समा जाते हैं। अधिकांश ठोस पदार्थों की जल में विलेयता तापमान बढ़ने पर बढ़ जाती है।

ठंडा करने की घटना और क्रिस्टलीकरण (Crystallization)

अब उस गर्म बीकर को बर्नर से उतारकर बिना हिलाए कमरे में ठंडा होने दीजिए:

  • जैसे-जैसे पानी ठंडा होकर पुनः $25^\circ\text{C}$ पर लौटता है, जल के अणुओं के बीच के रिक्त स्थान संकुचित होने लगते हैं।
  • ठंडा हुआ पानी उस अतिरिक्त नमक को थामे नहीं रख पाता; अतः सफेद, चमकीले शुद्ध नमक के क्रिस्टल पुनः प्रकट होकर तली में जमने लगते हैं! ठंडा करके शुद्ध ठोस क्रिस्टल प्राप्त करने की इस वैज्ञानिक प्रक्रिया को क्रिस्टलीकरण (Crystallization) कहते हैं।

5. विभिन्न पदार्थों की विलेयता भिन्न-भिन्न होती है

जल में सभी घुलनशील पदार्थ एक समान मात्रा में नहीं घुलते। प्रत्येक रासायनिक पदार्थ की एक निश्चित तापमान पर अपनी विशिष्ट विलेयता सीमा होती है:

  • $20^\circ\text{C}$ पर $100\text{ मिली}$ जल में साधारण नमक ($NaCl$) की अधिकतम लगभग $36\text{ ग्राम}$ मात्रा ही घुल सकती है।
  • इसके विपरीत, उसी $100\text{ मिली}$ जल में उसी तापमान पर चीनी ($C_{12}H_{22}O_{11}$) की लगभग $204\text{ ग्राम}$ मात्रा घुल जाती है! अर्थात चीनी नमक की तुलना में जल में लगभग 6 गुना अधिक घुलनशील है।
  • खाने का सोडा (मीठा सोडा, $NaHCO_3$) जल में बहुत कम घुलनशील है; $100\text{ मिली}$ जल में केवल लगभग $9.6\text{ ग्राम}$ ही घुल पाता है।

जटिल मिश्रणों के लिए क्रमबद्ध बहु-चरणीय पृथक्करण योजना

1. प्रकृति में जटिल मिश्रण: जब एक विधि पर्याप्त नहीं होती

वास्तविक जीवन, उद्योग और वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में मिलने वाले मिश्रण प्रायः दो से अधिक पदार्थों के जटिल संयोजन होते हैं। ऐसे मिश्रणों के सभी घटकों को किसी एक अकेले तरीके से अलग करना असंभव होता है। वैज्ञानिकों को एक क्रमबद्ध बहु-चरणीय पृथक्करण योजना (Sequential Multi-Step Separation Protocol) बनानी पड़ती है—अर्थात विभिन्न विधियों को ऐसे तार्किक क्रम में लगाना होता है कि प्रत्येक चरण में एक विशिष्ट घटक अलग हो जाए और बाकी बचा मिश्रण अगले चरण के लिए तैयार हो जाए।

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|                          तीन घटकों (बालू, नमक और लोहे की छीलन) की पृथक्करण योजना                 |
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|  चरण                 लागू की गई विधि               उपयोग किया गया भौतिक गुण        अलग हुआ घटक    |
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|  चरण 1: चुंबकत्व     कागज में लिपटा चुंबक सूखे     लोहे का चुंबकीय गुण; बालू व     100% शुद्ध लोहे|
|                      मिश्रण पर घुमाना।             नमक अचुंबकीय हैं।               की छीलन।       |
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|  चरण 2: विलेयता      बचे बालू व नमक में पानी       विलेयता का अंतर: नमक घुलता है,  नमक का नमकीन   |
|                      मिलाकर हिलाना।                बालू अविलेय रहती है।            घोल + बालू।    |
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|  चरण 3: निस्यंदन     मिश्रण को फिल्टर पेपर शंकु    कणों का आकार: बालू छिद्रों से   100% शुद्ध सूखी|
|                      लगी कीप से छानना।             बड़ी है, नमक का पानी छन जाता है।बालू (अवशेष)।  |
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|  चरण 4: वाष्पन एवं   नमक के छने पानी को केतली में  क्वथनांक व वाष्पशीलता: पानी     100% शुद्ध नमक |
|  संघनन               उबालना; बर्फ प्लेट से भाप ठंड।भाप बनता है, नमक बचता है।       व आसुत जल।     |
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2. क्लासिक तीन-घटकीय प्रयोगात्मक चुनौती: बालू, नमक और जल का पृथक्करण

कक्षा 6 की प्रायोगिक परीक्षा का एक प्रसिद्ध प्रश्न है: आपको नदी की बालू (रेत) और साधारण नमक का सूखा मिश्रण दिया गया है। आप इन दोनों पदार्थों को किस प्रकार अलग करेंगे कि आपको पूरी तरह सूखी शुद्ध बालू और शुद्ध सूखा नमक दोनों प्राप्त हो जाएं?

प्रथम चरण: चयनात्मक विलेयता (पानी मिलाना)

  1. आप बालू और नमक को हाथ से नहीं चुन सकते क्योंकि दोनों के लाखों बारीक कण हैं।
  2. आप छलनी से नहीं छान सकते क्योंकि बालू के दाने और नमक के क्रिस्टल लगभग एक ही आकार के हैं।
  3. समाधान: जल में उनकी विलेयता के अंतर का उपयोग कीजिए! नमक पानी में पूरी तरह घुलनशील है, जबकि बालू पूरी तरह अघुलनशील है।
  4. सूखे मिश्रण को एक बीकर में डालिए, लगभग $100\text{ मिली}$ पानी मिलाइए और कांच की छड़ से दो मिनट तक अच्छी तरह हिलाइए। सारा नमक पानी में घुलकर अदृश्य हो जाता है, जबकि बालू के कण अघुलित अवस्था में नीचे बैठे रहते हैं।

द्वितीय चरण: अवसादन एवं निस्यंदन (बालू को अलग करना)

  1. बीकर को 5 मिनट शांत छोड़ दीजिए ताकि भारी बालू पूरी तरह पेंदे में बैठ जाए (अवसादन)।
  2. कीप में गोल फिल्टर पेपर का शंकु लगाइए और बीकर के ऊपर के नमकीन पानी को कीप में उंडेलिए (निस्तारण एवं निस्यंदन)।
  3. तली में बची गीली बालू को भी फिल्टर पेपर पर डाल दीजिए और थोड़ा साफ पानी डालकर धो लीजिए ताकि बालू पर लगा नमक का पानी भी छनकर नीचे चला जाए।
  4. बालू फिल्टर पेपर पर अवशेष (Residue) के रूप में रुक जाती है। इस गीली बालू को धूप में सुखा लीजिए: प्रथम घटक (शुद्ध सूखी बालू) प्राप्त हो गया!

तृतीय चरण: वाष्पन द्वारा नमक की प्राप्ति

  1. कीप से छनकर नीचे बीकर में जो साफ द्रव इकट्ठा हुआ है, वह निस्यंद (Filtrate) है—अर्थात नमक का नमकीन पानी।
  2. इस निस्यंद को चीनी मिट्टी की प्याली में डालकर स्पिरिट लैंप या बर्नर से गर्म कीजिए (वाष्पन)।
  3. पानी खौलकर भाप बनकर उड़ता रहता है। जैसे-जैसे पानी समाप्त होता है, सफेद नमक के रवे बनने लगते हैं।
  4. जब सारा पानी भाप बनकर उड़ जाए, तो बर्नर बंद कर दीजिए: द्वितीय घटक (100% शुद्ध सूखा नमक) प्राप्त हो गया!
  5. यदि पानी भी बचाना हो: तो घोल को केतली में उबालकर भाप को बर्फ की प्लेट पर संघनित कर लिया जाता है, जिससे शुद्ध आसुत जल भी मिल जाता है।

पृथक्करण का सुनहरा नियम: किसी भी बहु-घटकीय मिश्रण को अलग करने के लिए घटकों के ऐसे भौतिक गुणों का चयन कीजिए जो एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्न हों: चुंबकत्व $\rightarrow$ विलेयता $\rightarrow$ कणों का आकार $\rightarrow$ वाष्पशीलता।

बिहार की पारंपरिक पृथक्करण पद्धतियां एवं सार्वजनिक जल शोधन

1. बिहार की पारंपरिक ग्रामीण संस्कृति में पृथक्करण विज्ञान

आधुनिक मशीनों और बिजली से चलने वाले उपकरणों के आने से बहुत पहले बिहार के ग्रामीण समाज, किसानों और महिलाओं ने अपने दैनिक जीवन में पदार्थों के भौतिक गुणों को गहराई से पहचाना और स्थानीय प्राकृतिक साधनों से अत्यंत प्रभावी पृथक्करण तकनीकें विकसित कीं:

क. बांस का सूप और ओसाना परंपरा (बांस का सूप और छठ पर्व)

बिहार के हर ग्रामीण घर में सूप (Soop) अवश्य पाया जाता है। इसे स्थानीय कारीगर मजबूत बांस की तीलियों से बुनकर बनाते हैं:

  • वायुगतिकीय बनावट: सूप का आगे का भाग चपटा और चौड़ा होता है तथा पीछे का भाग गहरा और गोल होता है। किसान सूप में अनाज लेकर हवा के सामने खड़ा होता है और कलाइयों के झटके से अनाज को हवा में गिराता है।
  • छठ पूजा का पावन प्रतीक: सूप बिहार की कृषि संस्कृति और अन्न की शुद्धता का इतना पवित्र प्रतीक है कि लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा में भगवान सूर्य को अर्घ्य देने के लिए नए सूप में ही खेतों का ताजा, शुद्ध अनाज और फल अर्पित किए जाते हैं।

ख. मथानी से दही का मंथन (मथानी और अपकेन्द्री बल)

मिथिला और भोजपुर के दुग्ध-समृद्ध अंचलों में मिट्टी के बड़े बर्तनों में दही जमाया जाता है। मक्खन निकालने के लिए:

  • पारंपरिक औजार: शीशम या बबूल की लकड़ी से बनी खांचेदार मथानी (Mathani) या रई का उपयोग किया जाता है। मथानी के ऊपरी डंडे पर रस्सी लपेटकर दोनों हाथों से आगे-पीछे तेजी से खींचा जाता है।
  • वैज्ञानिक सिद्धांत: तीव्र घूर्णन से अपकेन्द्री बल उत्पन्न होता है। दूध की कम घनत्व वाली वसा (चिकनाई) की बूंदें आपस में जुड़कर ठोस मक्खन बनकर ऊपर तैरने लगती हैं, और भारी पोषक छाछ (मट्ठा) नीचे रह जाती है।
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|                          बिहार की पारंपरिक तकनीकें बनाम आधुनिक औद्योगिक प्रणाली                   |
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|  पारंपरिक तकनीक      उपयोग में आने वाला साधन       वैज्ञानिक भौतिक सिद्धांत        आधुनिक विकल्प  |
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|  ओसाना (Winnowing)   बांस का सूप (Soop)            वायु प्रवाह में द्रव्यमान व     औद्योगिक एयर   |
|                                                    घनत्व का अंतर।                  एस्पिरेटर।     |
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|  दही मंथन            खांचेदार लकड़ी की मथानी       अपकेन्द्री बल द्वारा कम घनत्व   विद्युत क्रीम  |
|                      (रस्सी से घूर्णन)।            वाली वसा का सतह पर आना।         सेपरेटर।       |
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|  जल शुद्धिकरण        फिटकरी का टुकड़ा              विद्युत आवेश का उदासीनीकरण      जल शोधन में    |
|  (Alum Loading)      (गंदले पानी में घुमाना)।      (भारण द्वारा तीव्र अवसादन)।     फिटकरी का घोल। |
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|  छेना छानना          मलमल का बारीक सूती कपड़ा      सूक्ष्म छिद्रों द्वारा ठोस प्रोटीन डेयरी संयंत्रों|
|  (Cloth Filtration)  (Muslin cloth)।               अवशेष को जल से अलग करना।       में मेम्ब्रेन। |
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2. बाढ़ के गंदले जल का शुद्धिकरण: फिटकरी (भारण) की देशीय पद्धति

उत्तर बिहार में हर वर्ष कोसी, गंडक, बागमती और गंगा की बाढ़ आती है। बाढ़ का पानी गाद और महीन मिट्टी से लथपथ होकर गहरा मटमैला हो जाता है। बाढ़ के समय स्वच्छ पेयजल का गंभीर संकट उत्पन्न होता है। ऐसे में बिहार के ग्रामीण निम्नलिखित वैज्ञानिक पद्धति अपनाते हैं:

  1. फिटकरी द्वारा त्वरित अवसादन (भारण / Loading): पीतल के कलसे या मिट्टी के घड़े में गंदला पानी भरकर उसमें धागे से बंधी फिटकरी (Alum) को 4-5 बार घुमा दिया जाता है। फिटकरी के एल्युमिनियम आयन मिट्टी के कणों के ऋणात्मक आवेश को समाप्त कर देते हैं। आवेशहीन होकर मिट्टी के कण आपस में जुड़कर भारी गुच्छे (थक्के) बना लेते हैं और मात्र 15 मिनट में घड़े के पेंदे में ठोस गाद बनकर बैठ जाते हैं।
  2. निस्तारण और कपड़े से छानना: ऊपर के साफ पानी को सावधानी से दूसरे बर्तन में निथार लिया जाता है और सूती धोती या गमछे की चार तहों से छान लिया जाता है।
  3. उबालना (Disinfection): छाने गए पानी को 10 मिनट तक खौलाया जाता है ताकि उसमें मौजूद अदृश्य कीटाणु और जीवाणु मर जाएं, जिससे पानी पीने के लिए पूरी तरह सुरक्षित हो जाता है।

3. शहरों में नगरपालिका जल शोधन संयंत्र (Water Treatment Plant)

पटना, गया, भागलपुर और मुजफ्फरपुर जैसे नगरों में नगर निगम नदियों और नलकूपों के पानी को इसी पृथक्करण विज्ञान की बहु-स्तरीय शृंखला द्वारा शुद्ध करके घरों की टोंटियों तक पहुंचाता है:

  1. मोटा निस्यंदन (Screening): लोहे की मजबूत जाली लगाकर तैरने वाले पॉलीथिन, पत्तों और लकड़ियों को रोक दिया जाता है।
  2. अवसादन हौज (Sedimentation Tank): विशाल कंक्रीट के हौजों में पानी को कई घंटे शांत रखा जाता है ताकि भारी बालू नीचे बैठ जाए।
  3. फिटकरी मिश्रण (Coagulation): फिटकरी या पॉली-एल्युमिनियम क्लोराइड मिलाकर सूक्ष्म मिट्टी को थक्कों में बदला जाता है।
  4. रेत के निस्यंदक (Sand Filtration Beds): पानी को महीन बालू, बजरी और चारकोल की परतों से गुजारा जाता है, जिससे $99.9\%$ अशुद्धियां छन जाती हैं।
  5. क्लोरीनीकरण (Chlorination): पानी में नियंत्रित मात्रा में क्लोरीन गैस या ब्लीचिंग पाउडर मिलाकर रोगाणुओं को नष्ट किया जाता है, जिसके बाद स्वच्छ जल पाइपों में भेजा जाता है।

महत्वपूर्ण रासायनिक सूत्र, अभिक्रियाएँ एवं समीकरण

पृथक्करण विधि चयन मैट्रिक्स: गुणधर्म अंतर समीकरण

$$पृथक्करण सुगमता सूचकांक (S_f) = {|P_A - P_B|}{_P} जहाँ P {आकार, घनत्व, वाष्पशीलता, विलेयता}$$

कोई भी पृथक्करण विधि तभी प्रभावी होती है जब दो घटकों के किसी भौतिक गुण में पर्याप्त अंतर हो:

  1. कणों के आकार में अंतर ($|d_A - d_B| 0$): चालन (छलनी की जाली) और निस्यंदन (फिल्टर पेपर के छिद्र) द्वारा पृथक्करण।
  2. कणों के घनत्व/भार में अंतर ($|_A - _B| 0$): निष्पावन (ओसाना) (हवा में उड़ना) और अवसादन (पानी में बैठना)।
  3. वाष्पशीलता व क्वथनांक में अंतर ($|T_{boil, A} - T_{boil, B}| 0$): वाष्पन और संघनन द्वारा पृथक्करण।
निष्पावन (ओसाना) वायुगतिकीय प्रक्षेप पथ एवं अपवाह समीकरण

$$क्षैतिज विस्थापन दूरी (x) = {F_{कर्षण}}{m} · {h}{v_{अंतिम}} जहाँ F_{कर्षण} = {1}{2} C_d _{हवा} A v_{वायु}^2$$

  • हल्के भूसे (छिलके) के लिए: द्रव्यमान ($m$) नगण्य ($m ≈ 0.005 g$) और सतही क्षेत्रफल ($A$) बड़ा होता है। हवा का क्षैतिज त्वरण बहुत अधिक होने से भूसा $3 से 5 मीटर$ दूर उड़कर अलग ढेर बना लेता है।
  • भारी अन्नकण (दाने) के लिए: द्रव्यमान ($m$) अधिक ($m ≈ 0.04 g$) और आकार ठोस होता है। नीचे की ओर गुरुत्वीय बल ($m · g$) हवा के बल पर हावी रहता है, जिससे दाने सीधे नीचे किसान के पैरों के पास गिरते हैं।
स्टोक्स का अवसादन वेग एवं फिटकरी द्वारा भारण गतिकी

$$v_{अवसादन} = {2}{9} {(_{कण} - _{जल}) · g}{} · r^2$$

  • महीन कोलाइडल मिट्टी ($r ≈ 1 $): अवसादन वेग $v_{अवसादन}$ अत्यंत कम होता है; कणों पर ऋणात्मक आवेश होने के कारण वे एक-दूसरे को दूर धकेलते हैं और कई दिनों तक पानी में तैरते रहते हैं।
  • फिटकरी द्वारा भारण (Loading with $Al^{3+}$): फिटकरी के आयन आवेश को उदासीन कर देते हैं, जिससे मिट्टी के कण जुड़कर बड़े थक्के ($r → 100 $) बना लेते हैं। वेग त्रिज्या के वर्ग ($r^2$) के समानुपाती होने से गति $10,000$ गुना बढ़ जाती है!
निस्यंदन (छानना) छिद्र-आकार अवरोधन सिद्धांत

$$अवरोधन शर्त: {cases} d_{कण} > d_{छिद्र} ⇒ फिल्टर पर फंसा रहता है = अवशेष (RESIDUE) [6pt] d_{कण} < d_{छिद्र} ⇒ फिल्टर के आर-पार निकल जाता है = निस्यंद (FILTRATE) {cases}$$

  • प्रयोगशाला फिल्टर पेपर: छिद्र का आकार $d_{छिद्र} ≈ 2 से 10 $ होता है। यह बालू, मिट्टी और चाक के कणों को पूरी तरह ऊपर ही रोक लेता है।
  • घुले हुए लवण के आयन ($Na^+, Cl^-$): आकार $d_{आयन} ≈ 0.4 nm = 0.0004 $ होता है। ये छिद्रों से हजारों गुना छोटे होते हैं और पानी के साथ सीधे आर-पार निकल जाते हैं (छानने से घुला नमक अलग नहीं हो सकता)।
वाष्पन-संघनन दोहरा प्रावस्था ऊष्मागतिकी चक्र

$$नमक का घोल [द्रव] →{+ H_{वाष्पन} (वाष्पन)} ठोस नमक [अवशेष] + भाप [गैस] →{- H_{संघनन} (संघनन)} शुद्ध जल [आसुत]$$

  1. वाष्पन चरण ($+ H_{वाष्पन}$): जल के अणु वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा सोखकर भाप में बदल जाते हैं, जबकि अवाष्पशील नमक के क्रिस्टल केतली के भीतर ही रह जाते हैं।
  2. संघनन चरण ($- H_{संघनन}$): गर्म भाप जब बर्फ से ठंडी की गई धातु की प्लेट से टकराती है, तो गुप्त ऊष्मा त्यागकर तुरंत 100% शुद्ध आसुत जल की बूंदों में बदल जाती है।
जलीय विलेयता संतृप्ति एवं तापमान वक्र

$$S(T) = {m_{विलेय}^{अधिकतम}(T)}{100 g H_2O} तथा {dS}{dT} > 0 \; (ऊष्माशोषी घुलनशीलता)$$

  • असंतृप्त अवस्था: घुली मात्रा $< S(T)$; और अधिक विलेय आसानी से घुल जाता है।
  • संतृप्त अवस्था: घुली मात्रा $= S(T)$; गतिक संतुलन बन जाता है और अतिरिक्त विलेय तली में बैठ जाता है।
  • तापमान का प्रभाव: गर्म करने पर जल के अंतराण्विक स्थान फैल जाते हैं, जिससे संतृप्त घोल में और अधिक विलेय घुल जाता है। ठंडा करने पर अतिरिक्त विलेय शुद्ध क्रिस्टल बनकर बाहर निकल आता है (पुनःक्रिस्टलीकरण)।
क्रमबद्ध बहु-चरणीय पृथक्करण कलन विधि (Protocol Engine)

$$मिश्रण M = {C_1, C_2, C_3} →{विधि 1 (P_1)} C_1 + {C_2, C_3} →{विधि 2 (P_2)} C_2 + C_3$$

बालू ($C_1$), नमक ($C_2$) और लोहे की छीलन ($C_3$) के लिए योजना:

  1. चरण 1 (चुंबकत्व): चुंबक घुमाने पर $⇒$ चुंबकीय लोहे की छीलन ($C_3$) अलग।
  2. चरण 2 (विलेयता व निस्यंदन): पानी मिलाकर छानने पर $⇒$ अघुलनशील बालू ($C_1$) फिल्टर पेपर पर अलग।
  3. चरण 3 (तापीय वाष्पन): छने पानी को उबालने पर $⇒$ पानी उड़कर शुद्ध ठोस नमक ($C_2$) प्राप्त।
नगरपालिका जल शोधन बहु-अवरोधक सोपान (Cascade)

$$कच्चा नदी जल →{जाली छनाई} →{अवसादन हौज} →{फिटकरी मिश्रण} →{रेत निस्यंदन} →{क्लोरीनीकरण} शुद्ध नल का जल$$

  1. जाली छनाई (Screening): तैरते कचरे और पॉलीथिन को रोकना।
  2. अवसादन (Sedimentation): भारी बालू और कंकड़ों का तली में बैठना।
  3. फिटकरी स्कंदन (Coagulation): सूक्ष्म मिट्टी के आवेश को खत्म कर थक्के बनाना।
  4. रेत निस्यंदन (Sand Filtration): बजरी और बालू की परतों से $99.9\%$ अशुद्धियां छानना।
  5. जीवाणुनाशन (Disinfection): क्लोरीन द्वारा रोगाणुओं का समूल नाश।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
मिश्रण से पदार्थों को अलग करने के तीन मुख्य वैज्ञानिक उद्देश्य कौन-से हैं? प्रत्येक का दैनिक जीवन से एक-एक उपयुक्त उदाहरण दीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

पदार्थों के पृथक्करण के तीन मुख्य वैज्ञानिक उद्देश्य:

  1. हानिकारक या नुकसानदेह अशुद्धियों को दूर करना:
    • उदाहरण: भोजन पकाने से पहले कच्चे चावल या दाल से कंकड़-पत्थर और मिट्टी के ढेलों को हाथ से चुनकर अलग करना ताकि दांत न टूटें और पेट खराब न हो।
  2. अनुपयोगी या अखाद्य घटकों को हटाना:
    • उदाहरण: तैयार चाय को छलनी से छानकर अनुपयोगी चाय की पत्तियों को अलग फेंक देना और केवल स्वच्छ चाय का आनंद लेना।
  3. एक ही मिश्रण से दो अलग-अलग उपयोगी पदार्थों को प्राप्त करना:
    • उदाहरण: जमे हुए दही को मथानी से मथकर ठोस मक्खन (घी बनाने हेतु) और तरल छाछ/मट्ठा (पीने हेतु) दोनों उपयोगी पदार्थों को अलग करना।
उदाहरण 2
बिहार के एक किसान ने गेहूं की फसल काटी है। क्रमबद्ध समझाइए: (क) किसान हाथ से चुनकर डंठलों से दाने अलग क्यों नहीं कर सकता? (ख) डंठलों से दानों को अलग करने के लिए किस विधि का उपयोग किया जाता है? (ग) इसके बाद दानों से हल्के भूसे को अलग करने के लिए किस विधि का उपयोग होता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

फसल कटाई के बाद अनाज पृथक्करण के चरण:

  1. हाथ से चुनना क्यों असंभव है:

    • एक एकड़ खेत में लाखों डंठल और करोड़ों दाने होते हैं जो डंठलों से मजबूती से जुड़े होते हैं। एक-एक दाना हाथ से तोड़ना व्यावहारिक रूप से असंभव है और इसमें कई महीने लग जाएंगे।
  2. डंठलों से दाने अलग करना — थ्रेशिंग या दौनी (Threshing):

    • विधि: किसान सूखे डंठलों के बंडलों को पत्थर की पटिया या खलिहान की पक्की जमीन पर पटकते हैं, अथवा खलिहान में बैलों को फसल पर चलाते हैं (या थ्रेशर मशीन का उपयोग करते हैं)।
    • सिद्धांत: अचानक यांत्रिक झटके और दबाव से सूखे डंठल टूट जाते हैं और अन्नकण डंठलों से अलग होकर बिखर जाते हैं।
  3. दानों से हल्का भूसा अलग करना — निष्पावन या ओसाना (Winnowing):

    • विधि: किसान मिश्रण को बांस के सूप (Soop) में लेकर हवा के सामने ऊंचाई पर खड़े होकर धीरे-धीरे हिलाते हुए नीचे गिराते हैं।
    • सिद्धांत: यह द्रव्यमान और घनत्व के अंतर पर कार्य करता है: बहती हवा हल्के भूसे को उड़ाकर दूर ढेर बना देती है, जबकि भारी और सघन अन्नकण सीधे नीचे गिरकर साफ अनाज का ढेर बना लेते हैं।
उदाहरण 3
बिहार की किसी नदी से लाए गए गंदले पानी के नमूने का उपयोग करते हुए अवसादन, निस्तारण और निस्यंदन (छानना) में अंतर समझाइए। निस्तारण से प्राप्त जल पूरी तरह स्वच्छ क्यों नहीं होता?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

अविलेय ठोस-द्रव पृथक्करण की प्रक्रियाएं:

  1. अवसादन (Sedimentation):

    • गंदले पानी को बीकर में बिल्कुल शांत छोड़ दिया जाता है। गुरुत्वाकर्षण बल के कारण भारी बालू और मिट्टी के कण बीकर की तली में गाद (Sediment) के रूप में बैठ जाते हैं और ऊपर अपेक्षाकृत साफ जल आ जाता है।
  2. निस्तारण (Decantation):

    • तली में बैठी गाद को बिना हिलाए, ऊपर के स्वच्छ जल को बीकर को धीरे से तिरछा करके दूसरे बर्तन में उंडेल लिया जाता है।
  3. निस्यंदन / छानना (Filtration):

    • निस्तारित जल को कीप में लगे फिल्टर पेपर के शंकु से गुजारा जाता है। अशुद्धियां कागज पर अवशेष (Residue) बनकर रुक जाती हैं और नीचे बीकर में बूंद-बूंद बिल्कुल पारदर्शी निस्यंद (Filtrate) इकट्ठा हो जाता है।
  4. निस्तारित जल पूरी तरह स्वच्छ क्यों नहीं होता:

    • अवसादन केवल भारी कणों को नीचे बैठाता है। मिट्टी के अत्यंत बारीक कोलाइडल कण अपने सूक्ष्म भार और विद्युत आवेश के कारण पानी में तैरते रहते हैं और निस्तारण के समय पानी के साथ ही बह आते हैं। इन्हें केवल फिल्टर पेपर या बारीक कपड़े के सूक्ष्म छिद्रों द्वारा ही रोका जा सकता है।
उदाहरण 4
व्यापारिक पैमाने पर समुद्री जल से साधारण नमक कैसे प्राप्त किया जाता है? इसमें प्रयुक्त वैज्ञानिक विधि को समझाइए तथा यह भी बताइए कि नमक के पानी से नमक को छानकर अलग क्यों नहीं किया जा सकता।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

समुद्री जल से नमक निर्माण की वैज्ञानिक प्रक्रिया:

  1. छानने की विधि क्यों विफल हो जाती है:

    • जब नमक पानी में घुलता है, तो वह सोडियम ($Na^+$) और क्लोराइड ($Cl^-$) आयनों में टूटकर जल के अणुओं के बीच के अंतराण्विक स्थानों में पूरी तरह समा जाता है। इन घुले हुए कणों का आकार 1 नैनोमीटर से भी छोटा होता है, जो फिल्टर पेपर के छिद्रों से हजारों गुना सूक्ष्म है। अतः छानने पर सारा नमक पानी के साथ ही छनकर बाहर निकल जाता है।
  2. कयारियों में वाष्पन की प्रक्रिया:

    • समुद्र तटों पर उथले गड्ढे बनाकर चौकोर खेत तैयार किए जाते हैं, जिन्हें कयारियां (Salt Pans) कहते हैं।
    • इन कयारियों में समुद्र का खारा पानी भर दिया जाता है। सूर्य की तेज धूप और समुद्री हवा की प्राकृतिक ऊष्मा से पानी धीरे-धीरे वाष्पीकृत होकर भाप बनकर आसमान में उड़ता रहता है।
  3. नमक के क्रिस्टलों का जमना और कटाई:

    • कुछ हफ्तों में जब अधिकांश पानी उड़ जाता है, तो घोल संतृप्त हो जाता है और कयारियों की तली पर ठोस नमक के सफेद क्रिस्टल जम जाते हैं।
    • इस कच्चे नमक को खुरचकर बड़े ढेरों में इकट्ठा किया जाता है।
  4. शोधन एवं आयोडीकरण:

    • कारखानों में इस कच्चे नमक को धोकर शुद्ध किया जाता है और भारत सरकार के जनस्वास्थ्य नियमों के तहत इसमें पोटैशियम आयोडेट मिलाकर आयोडीन युक्त नमक तैयार किया जाता है।
उदाहरण 5
असंतृप्त और संतृप्त विलयन में क्या अंतर है? कमरे के तापमान पर पानी में चीनी का संतृप्त विलयन तैयार करने का प्रयोग लिखिए। यदि इस संतृप्त घोल को गर्म किया जाए और फिर ठंडा होने दिया जाए, तो क्या होगा?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

असंतृप्त बनाम संतृप्त विलयन एवं तापीय गतिकी:

  1. वैज्ञानिक परिभाषाएं:

    • असंतृप्त विलयन (Unsaturated Solution): वह विलयन जिसमें किसी निश्चित तापमान पर विलेय की और अधिक मात्रा को घोला जा सकता है।
    • संतृप्त विलयन (Saturated Solution): वह विलयन जिसमें किसी निश्चित तापमान पर विलेय की और अधिक मात्रा नहीं घोली जा सकती।
  2. संतृप्त चीनी घोल तैयार करने का प्रयोग:

    • एक बीकर में कमरे के तापमान ($25^\circ\text{C}$) पर $100\text{ मिली}$ पानी लीजिए।
    • इसमें एक चम्मच चीनी डालकर हिलाइए। जब वह घुल जाए, तो दूसरा, तीसरा और चौथा चम्मच लगातार डालते रहिए और हिलाते रहिए।
    • अंत में एक ऐसी स्थिति आएगी जब डाली गई चीनी घुलना बंद कर देगी और बीकर के पेंदे में ठोस चीनी जमा होने लगेगी। तली में बैठी चीनी के ऊपर का स्वच्छ घोल $25^\circ\text{C}$ पर चीनी का संतृप्त विलयन है।
  3. गर्म करने का प्रभाव:

    • जब इस बीकर को बर्नर पर रखकर गर्म किया जाता है, तो तली में बैठी अघुली चीनी पूरी तरह घुल जाती है। ताप बढ़ने से जल के अणुओं के बीच की दूरी बढ़ती है और विलेयता बढ़ जाती है।
  4. ठंडा करने का प्रभाव (क्रिस्टलीकरण):

    • जब इस गर्म घोल को बिना हिलाए ठंडा होने दिया जाता है, तो पानी का तापमान गिरते ही अतिरिक्त घुली चीनी पुनः शुद्ध, चमकीले ठोस क्रिस्टल बनकर तली में जमने लगती है। इस प्रक्रिया को क्रिस्टलीकरण कहते हैं।
उदाहरण 6
आपको (क) नदी की सूखी बालू, (ख) साधारण खाने का नमक, और (ग) लोहे की महीन छीलन का एक सूखा मिश्रण दिया गया है। इन तीनों घटकों को पूरी तरह शुद्ध और सूखे रूप में अलग करने के लिए एक क्रमबद्ध बहु-चरणीय वैज्ञानिक योजना बनाइए। प्रत्येक चरण में उपयोग किए गए भौतिक गुण का उल्लेख कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

बालू, नमक और लोहे की छीलन के पृथक्करण की क्रमबद्ध वैज्ञानिक योजना:

चूंकि कोई एक अकेली विधि तीनों घटकों को एक साथ अलग नहीं कर सकती, अतः हम तीन क्रमिक चरणों की वैज्ञानिक योजना निष्पादित करते हैं:

  1. चरण 1: चुंबकीय पृथक्करण द्वारा लोहे की छीलन को अलग करना:

    • प्रक्रिया: सूखे मिश्रण को एक कागज पर फैलाइए। एक शक्तिशाली छड़ चुंबक को पतले प्लास्टिक या कागज में लपेटकर मिश्रण के ऊपर धीरे-धीरे घुमाइए।
    • प्रयुक्त भौतिक गुण: चुंबकत्व (Ferromagnetism)। लोहा चुंबक की ओर अत्यधिक आकर्षित होता है, जबकि बालू और नमक अचुंबकीय हैं।
    • परिणाम: लोहे की सारी छीलन चुंबक से चिपक जाती है। चुंबक को अलग प्याली पर ले जाकर प्लास्टिक हटाते ही 100% शुद्ध लोहे की छीलन (घटक 1) प्राप्त हो जाती है।
  2. चरण 2: विलेयता एवं निस्यंदन द्वारा बालू को अलग करना:

    • प्रक्रिया: बचे हुए बालू और नमक के मिश्रण को बीकर में डालिए, $100\text{ मिली}$ पानी मिलाइए और 2 मिनट तक कांच की छड़ से हिलाइए। इसके बाद मिश्रण को कीप में लगे फिल्टर पेपर के शंकु से छान लीजिए।
    • प्रयुक्त भौतिक गुण: जल में विलेयता एवं कणों का आकार। नमक जल में पूरी तरह विलेय है, जबकि बालू पूरी तरह अविलेय है और उसके कण फिल्टर पेपर के छिद्रों से बड़े हैं।
    • परिणाम: बालू फिल्टर पेपर पर अवशेष के रूप में रुक जाती है। इसे थोड़े साफ पानी से धोकर धूप में सुखा लेते हैं: 100% शुद्ध सूखी बालू (घटक 2) प्राप्त हो जाती है।
  3. चरण 3: तापीय वाष्पन द्वारा साधारण नमक को अलग करना:

    • प्रक्रिया: फिल्टर पेपर से छनकर नीचे बीकर में आया पारदर्शी पानी निस्यंद (नमक का जलीय घोल) है। इस घोल को चीनी मिट्टी की प्याली में डालकर बर्नर पर गर्म कीजिए।
    • प्रयुक्त भौतिक गुण: वाष्पशीलता एवं क्वथनांक का अंतर। जल $100^\circ\text{C}$ पर वाष्पशील होकर उड़ जाता है, जबकि सोडियम क्लोराइड का गलनांक $801^\circ\text{C}$ है और वह अवाष्पशील है।
    • परिणाम: सारा पानी भाप बनकर उड़ जाता है और प्याली में सफेद क्रिस्टल के रूप में 100% शुद्ध सूखा नमक (घटक 3) प्राप्त हो जाता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

निष्पावन (ओसाना) किसी भी दो सूखे ठोस पदार्थों को अलग कर सकता है, चाहे उनका भार या घनत्व कुछ भी हो।

सही वैज्ञानिक तथ्य

निष्पावन केवल तभी कार्य करता है जब दोनों घटकों के द्रव्यमान और घनत्व में भारी अंतर हो। यदि दोनों घटक समान भार के हों (जैसे गेहूं और छोटे कंकड़), तो हवा किसी को भी दूर नहीं उड़ा सकेगी। निष्पावन केवल तभी सफल होता है जब एक घटक बहुत हल्का (भूसा) और दूसरा बहुत भारी (अन्नकण) हो।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

नमक के पानी को प्रयोगशाला के बारीक फिल्टर पेपर से छानकर नमक को फिल्टर पेपर पर अवशेष के रूप में प्राप्त किया जा सकता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

जब नमक पानी में घुलता है, तो वह 1 नैनोमीटर से भी छोटे आयनों (Na⁺ और Cl⁻) में टूट जाता है। चूंकि फिल्टर पेपर के छिद्र 2 से 10 माइक्रोमीटर बड़े होते हैं, घुला हुआ नमक पानी के साथ सीधे आर-पार निकल जाता है। घुले नमक को अलग करने के लिए छानना नहीं, बल्कि वाष्पन विधि अनिवार्य है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गंदले पानी के अवसादन के बाद निथारा गया जल (निस्तारित जल) शत-प्रतिशत शुद्ध, रोगाणु-मुक्त और सीधे पीने योग्य होता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

निस्तारण केवल भारी बालू और मोटी मिट्टी को अलग करता है। निस्तारित पानी में अभी भी बहुत बारीक मिट्टी के कोलाइडल कण, घुले हुए लवण और खतरनाक अदृश्य रोगाणु (बैक्टीरिया) मौजूद रहते हैं। इसे पीने योग्य बनाने के लिए निस्यंदन, उबालना या क्लोरीनीकरण आवश्यक है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

संतृप्त विलयन में किसी भी परिस्थिति में विलेय की और अधिक मात्रा को कभी भी नहीं घोला जा सकता।

सही वैज्ञानिक तथ्य

कोई विलयन केवल एक निश्चित तापमान पर ही संतृप्त होता है। जब उस संतृप्त घोल को गर्म किया जाता है, तो जल के अणुओं के बीच का स्थान फैल जाता है और उसमें और अधिक विलेय आसानी से घुल जाता है। ठंडा करने पर यह अतिरिक्त विलेय पुनः क्रिस्टल बनकर जम जाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

थ्रेशिंग (दौनी) और निष्पावन (ओसाना) दोनों एक ही कृषि प्रक्रिया के दो नाम हैं और दोनों में कोई अंतर नहीं है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

थ्रेशिंग और निष्पावन दो अलग-अलग क्रमिक चरण हैं: थ्रेशिंग का अर्थ है सूखे डंठलों को पीटकर या कुचलकर दानों को डंठल से अलग करना। निष्पावन का अर्थ है अलग हुए दानों और हल्के भूसे के मिश्रण को हवा के झोंकों द्वारा अलग-अलग ढेरों में विभाजित करना।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

जल एक ही तापमान पर सभी घुलनशील पदार्थों को बिल्कुल बराबर ग्राम मात्रा में घोलता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

विभिन्न रासायनिक पदार्थों की जल में विलेयता अत्यधिक भिन्न होती है। उदाहरण के लिए, 20°C पर 100 मिली जल में साधारण नमक केवल 36 ग्राम घुलता है, जबकि उसी जल में चीनी 204 ग्राम घुल जाती है और मीठा सोडा केवल 9.6 ग्राम घुल पाता है। प्रत्येक पदार्थ की अपनी विशिष्ट विलेयता होती है।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
पृथक्करण का संपूर्ण विज्ञान घटकों के भौतिक गुणों के अंतर (कणों का आकार, भार, घनत्व, विलेयता, वाष्पशीलता) के सुनियोजित उपयोग पर आधारित है।
मुख्य बिंदु 2
हवा के घर्षण और गुरुत्वाकर्षण का संतुलन निष्पावन में शून्य ऊर्जा से भारी अनाज को हल्के भूसे से अलग कर देता है।
मुख्य बिंदु 3
जल में घुले हुए लवणों के आयन 1 नैनोमीटर से छोटे होने के कारण फिल्टर पेपर के छिद्रों से नहीं रुक सकते, अतः वाष्पन ही एकमात्र उपाय है।
मुख्य बिंदु 4
फिटकरी (Alum) गंदले जल में कोलाइडल मिट्टी के ऋणात्मक विद्युत आवेश को उदासीन करके भारी थक्के बनाती है, जिसे भारण (Loading) कहते हैं।
मुख्य बिंदु 5
निस्यंदन में जाली पर रुका ठोस भाग 'अवशेष' (Residue) तथा नीचे एकत्र हुआ स्वच्छ द्रव 'निस्यंद' (Filtrate) कहलाता है।
मुख्य बिंदु 6
समुद्र तटों पर उथली कयारियों में सूर्य की धूप से प्राकृतिक वाष्पीकरण द्वारा नमक का व्यापारिक उत्पादन किया जाता है।
मुख्य बिंदु 7
जल में किसी विलेय के घुलने की क्षमता सीमित होती है; संतृप्ति वह अवस्था है जहाँ विलेय के घुलने और जमने की गति बराबर हो जाती है।
मुख्य बिंदु 8
जटिल मिश्रणों के लिए क्रमबद्ध योजना बनानी पड़ती है जहाँ प्रत्येक चरण अगले चरण के लिए आधार तैयार करता है।
मुख्य बिंदु 9
बिहार की पारंपरिक धरोहर—बांस का सूप, लकड़ी की मथानी और मलमल का कपड़ा—उच्च वैज्ञानिक सिद्धांतों के अत्यंत सुंदर देशीय रूप हैं।
मुख्य बिंदु 10
शहरी जल शोधन संयंत्र अवसादन, स्कंदन, बालू निस्यंदन और क्लोरीनीकरण की शृंखला द्वारा लाखों नागरिकों को शुद्ध पेयजल प्रदान करते हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
बांस के सूप से ओसाते (निष्पावन करते) समय वह कौन-सा विशिष्ट भौतिक गुण है जिसके कारण भूसा हवा में उड़ जाता है और अन्नकण सीधे नीचे गिरते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
कणों के द्रव्यमान और घनत्व के भारी अंतर पर विचार कीजिए।
2
फिल्टर पेपर से छानने के बाद नीचे बीकर में इकट्ठा होने वाले पूरी तरह स्वच्छ और पारदर्शी द्रव को वैज्ञानिक भाषा में क्या कहते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
कागज पर रुके 'अवशेष' से भ्रमित न हों; नीचे गिरे द्रव का नाम बताइए।
3
बाढ़ के गहरे मटमैले पानी में फिटकरी का टुकड़ा घुमाने पर मिट्टी के कण तेजी से पेंदे में क्यों बैठ जाते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
फिटकरी के आयन मिट्टी के कणों के विद्युत आवेश को उदासीन कर भारी थक्के बनाते हैं।
4
जब नमक के गर्म संतृप्त घोल को बिना हिलाए कमरे के सामान्य तापमान पर ठंडा होने दिया जाता है, तो क्या देखने को मिलता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
तापमान गिरने से जल के अणुओं के बीच का स्थान सिकुड़ जाता है।
5
सरसों के तेल और पानी के मिश्रण को अलग करने के लिए किस सरल भौतिक विधि का उपयोग किया जाता है और यह किस गुण पर निर्भर करती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
हल्का तेल ऊपर तैरता है जिसे बर्तन झुकाकर धीरे से उंडेला जा सकता है।
6
बिहार में पारंपरिक रूप से फटे हुए दूध से रसगुल्ले बनाने के लिए छेना अलग करने हेतु किस कपड़े का उपयोग फिल्टर की तरह किया जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
महीन बुनावट वाला सफेद सूती कपड़ा।
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