1. जीवन की वैज्ञानिक एवं दार्शनिक परिभाषा
अपनी कक्षा या घर के चारों ओर दृष्टि डालिए। एक ओर कुर्सी, मेज, श्यामपट्ट, पत्थर और पुस्तकें हैं, और दूसरी ओर आपके सहपाठी, खिड़की पर बैठा कबूतर, गमले में लगा गुलाब का पौधा और आंगन में घूमती बिल्ली है। आखिर वह कौन-सी अदृश्य सीमा रेखा है जो किसी वस्तु को 'सजीव' और किसी वस्तु को 'निर्जीव' बनाती है? यद्यपि कार और बसें सड़कों पर दौड़ती हैं और आकाश में बादल आकार में बड़े होते दिखाई देते हैं, परंतु वे सजीव नहीं हैं। विज्ञान में जीवन की पहचान किसी एक बाहरी क्रिया से नहीं, बल्कि सात अनिवार्य जैविक लक्षणों के एक साथ उपस्थित होने से होती है।
2. सजीवों के सात सार्वभौमिक लक्षण
(1) पोषण (भोजन की आवश्यकता - Nutrition)
सभी सजीवों को जीवित रहने, शारीरिक वृद्धि करने, कोशिकाओं की मरम्मत और जीवन की विभिन्न जैविक क्रियाओं को संचालित करने के लिए ऊर्जा की निरंतर आवश्यकता होती है, जो उन्हें भोजन से प्राप्त होती है।
- स्वपोषी (Autotrophs - हरे पौधे): पौधे सूर्य के प्रकाश, क्लोरोफिल, जल और कार्बन डाइऑक्साइड की सहायता से प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) द्वारा अपना भोजन स्वयं संश्लेषित करते हैं।
- विषमपोषी (Heterotrophs - जंतु): जंतु अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते; वे अपने भोजन के लिए प्रत्यक्ष रूप से पौधों पर (शाकाहारी) अथवा अन्य जंतुओं पर (मांसाहारी) निर्भर रहते हैं।
(2) वृद्धि एवं विकास (Growth and Development)
सजीवों में वृद्धि एक अपरिवर्तनीय (स्थायी) आंतरिक प्रक्रिया है, जिसमें नई कोशिकाओं के विभाजन द्वारा शरीर के आकार, भार और आयतन में भीतर से वृद्धि होती है। एक नन्हा बीज अंकुरित होकर पौधा और अंततः विशाल वृक्ष बन जाता है। एक छोटा नवजात शिशु धीरे-धीरे बढ़कर वयस्क बन जाता है। इसके विपरीत, निर्जीव वस्तुओं (जैसे रेत के टीले या बर्फ के ढेर) में होने वाली तथाकथित वृद्धि केवल बाहर से अतिरिक्त पदार्थों के जमा होने से होती है, जो प्रतिवर्ती (अस्थायी) होती है।
(3) श्वसन (Respiration): कोशिकीय ऊर्जा विमुक्ति
प्रायः छात्र सांस लेने (Breathing) और श्वसन (Respiration) को एक ही समझ लेते हैं। सांस लेना केवल ऑक्सीजन युक्त वायु को फेफड़ों में खींचना और कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर छोड़ना है। जबकि श्वसन वह मूलभूत कोशिकीय रासायनिक प्रक्रम है जिसमें कोशिकाओं के भीतर ऑक्सीजन की उपस्थिति में पचे हुए ग्लूकोज का विखंडन होता है और शरीर को कार्य करने हेतु जैविक ऊर्जा (ATP) प्राप्त होती है:
$$\text{ग्लूकोज} + \text{ऑक्सीजन} \longrightarrow \text{कार्बन डाइऑक्साइड} + \text{जल} + \text{जैविक ऊर्जा (ATP)}$$
विभिन्न जीवों में श्वसन अंग अलग-अलग होते हैं: मनुष्य फेफड़ों से, मछलियां गलफड़ों (Gills) से, केंचुआ अपनी नम त्वचा से, कीट श्वास रंध्रों से, तथा पौधे पत्तियों के सूक्ष्म रंध्रों (Stomata) द्वारा गैसों का विनिमय करते हैं।
(4) उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया (Response to Stimuli / Irritability)
परिवेश में होने वाले वे सभी भौतिक या रासायनिक परिवर्तन जो किसी सजीव को किसी प्रकार की प्रतिक्रिया करने के लिए प्रेरित करते हैं, उद्दीपन (Stimulus) कहलाते हैं। उस उद्दीपन के उत्तर में जीव द्वारा किया गया तात्कालिक व्यवहार अनुक्रिया (Response) कहलाता है।
- जंतुओं में: यदि चलते समय अचानक आपके पैर में कोई नुकीला कांटा चुभ जाए, तो बिना सोचे आपका पैर तुरंत ऊपर उठ जाता है; रात्रि में रसोई की बत्ती जलाते ही तिलचट्टे प्रकाश से बचने के लिए तेजी से अंधेरे कोनों की ओर भागते हैं।
- पौधों में: छुई-मुई (लाजवंती / Mimosa pudica) के पौधे की पत्तियों को उंगली से छूते ही उसकी पत्तियां तुरंत सिकुड़कर नीचे लटक जाती हैं; सूर्यमुखी का फूल दिनभर सूर्य के प्रकाश की दिशा में घूमता रहता है।
(5) उत्सर्जन (Excretion): हानिकारक अपशिष्टों का निष्कासन
सजीवों के शरीर में दिन-रात चलने वाली जैव-रासायनिक क्रियाओं (उपापचय) के फलस्वरूप कई विषैले और हानिकारक अपशिष्ट पदार्थ (जैसे यूरिया, अतिरिक्त लवण, कार्बन डाइऑक्साइड) बनते हैं। इन दूषित अपशिष्टों को शरीर से छानकर बाहर निकालने की जैविक प्रक्रिया को उत्सर्जन कहते हैं। जंतु मूत्र, पसीने और उच्छ्वास द्वारा अपशिष्ट निकालते हैं। पौधे भी गोंद, राल (Resin), लैटेक्स और सूखी पत्तियों को गिराकर उत्सर्जन करते हैं।
(6) प्रजनन (Reproduction): वंश वृद्धि की निरंतरता
चूंकि प्रत्येक सजीव का एक निश्चित जीवनकाल होता है और अंततः उसकी मृत्यु हो जाती है, इसलिए पृथ्वी पर अपनी जाति या प्रजाति के अस्तित्व को सदा बनाए रखने के लिए सभी सजीव अपने जैसे नए जीव (संतान) उत्पन्न करते हैं। इस प्रक्रम को प्रजनन कहते हैं। पक्षी और सरीसृप अंडे देते हैं (अंडज), जबकि स्तनधारी जैसे गाय और मनुष्य सीधे बच्चे को जन्म देते हैं (जरायुज)। पौधे बीजों, तनों या कलिकाओं द्वारा नए पौधे बनाते हैं।
(7) गति एवं संचलन (Movement and Locomotion)
सभी सजीवों में गति पाई जाती है। जंतु भोजन, सुरक्षा और अनुकूल आवास की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान पर चलकर, उड़कर, तैरकर या रेंगकर जा सकते हैं (गमन / Locomotion)। यद्यपि पौधे जमीन में जड़ों द्वारा स्थिर रहते हैं और चलकर कहीं नहीं जा सकते, परंतु उनके भीतर जल और पोषक तत्वों का निरंतर संवहन होता है, तना प्रकाश की ओर मुड़ता है और फूल खिलते व बंद होते हैं।
3. बीजों की सुप्तावस्था: जीवन का अद्भुत रहस्य
दुकान या घर में बंद बोरी में रखे गेहूं, चना या मूंग के सूखे दाने महीनों तक बिना किसी गति या वृद्धि के पड़े रहते हैं। क्या वे निर्जीव हैं? वैज्ञानिक रूप से बीज सजीव हैं, परंतु वे सुप्तावस्था (Dormancy) में होते हैं। बीज के कठोर आवरण के भीतर एक नन्हा जीवित भ्रूण छुपा होता है जो अत्यंत धीमी गति से कोशिकीय श्वसन करता रहता है। जैसे ही उस सूखे बीज को जल, वायु और अनुकूल तापमान प्राप्त होता है, वह सुप्तावस्था तोड़कर अंकुरित हो जाता है और एक नए पौधे को जन्म देता है।