मध्यकाल में स्मारकों के निर्माण में दो प्रमुख निर्माण शैलियों और तकनीकों का विकास देखा गया:
(A) अनुप्रस्थ टोडा निर्माण शैली (Trabeate Style)
7वीं से 10वीं सदी के बीच भवनों में अधिक कमरे, दरवाजे और खिड़कियां बनने लगीं। छत, दरवाजे और खिड़कियां दो ऊर्ध्वाधर खंभों के आर-पार एक क्षैतिज शहतीर (Horizontal Beam) रखकर बनाए जाते थे। वास्तुकला की यह तकनीक "अनुप्रस्थ टोडा निर्माण" (Trabeate) कहलाती है। 8वीं से 13वीं सदी के मध्य के मंदिर, मस्जिद, मकबरे तथा बावड़ियों (सीढ़ीदार कुएं) के निर्माण में यही तकनीक प्रयुक्त हुई।
(B) चापाकार शैली (Arcuate Style)
12वीं सदी के बाद दो महत्वपूर्ण तकनीकी परिवर्तन आए: दरवाजों और खिड़कियों के ऊपर की अधिरचना (Superstructure) का भार अब मेहराबों (Arches) पर डाला जाने लगा। मेहराब के केंद्र में एक त्रिकोणीय पत्थर होता था जिसे "डाट" (Keystone) कहा जाता था, जो सारा भार आधार स्तंभों पर स्थानांतरित कर देता था। इस वास्तुकला रूप को "चापाकार" (Arcuate) कहा गया।
चूना-पत्थर गारा (Limestone Mortar) का क्रांतिकारी प्रयोग:
12वीं सदी में इमारतों के निर्माण में चूना-पत्थर गारे का प्रयोग बहुत बढ़ गया। यह बहुत ही उच्च श्रेणी का सीमेंट होता था जिसमें पत्थर के टुकड़े मिलाने पर वह मजबूत कंक्रीट बन जाता था। इसने विशाल पत्थरों की चिनाई को अत्यंत आसान, टिकाऊ और तीव्र बना दिया।