पर्यावरणीय क्षरण एवं आपदा प्रबंधन (Environmental Degradation)
एनआईओएस माध्यमिक (कक्षा 10) सामाजिक विज्ञान (213) के लिए व्यवस्थित रूप से तैयार की गई पर्यावरणीय गिरावट और आपदा प्रबंधन के लिए व्यापक अध्ययन सामग्री और अध्याय नोट्स। नवीनतम नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग पाठ्यक्रम के अनुरूप, यह गाइड मुख्य सैद्धांतिक अवधारणाओं, ऐतिहासिक कालक्रम, भौगोलिक विश्लेषण, संवैधानिक सिद्धांतों, ट्यूटर मार्क्ड असाइनमेंट (टीएमए) दिशानिर्देशों और सार्वजनिक परीक्षा में महारत पर जोर देती है।
जब पेड़ों और हिरणों को बचाने के लिए लोगों ने अपनी जान की बाजी लगा दी!
राजस्थान के मारवाड़ में बिश्नोई समाज के गांवों में यदि आप जाएं, तो आप पाएंगे कि काले हिरण (चिंकारा), नीलगाय और मोर इंसानों के बीच ऐसे बेखौफ घूमते हैं जैसे वे परिवार के ही सदस्य हों! सदियों पहले अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 लोगों ने खेजड़ी के पेड़ों को कुल्हाड़ियों से बचाने के लिए अपने सिर कटवा दिए थे। उत्तराखंड की पहाड़ियों में महिलाओं ने पेड़ों को अपनी बांहों में भरकर 'चिपको आंदोलन' रचा। वन और वन्यजीव केवल सरकारी नियम-कायदों से नहीं, बल्कि भारत की उस महान सांस्कृतिक परंपरा से जीवित हैं जो प्रकृति की हर रचना को पवित्र मानती है।
यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है
एनआईओएस और एनआईओएस कक्षा 10वीं बोर्ड परीक्षा में 'वन एवं पेंटिंग्स संसाधन' से आईयूसीएन की सब्जियां और सुभेद्य, वनों के विनाश के कारण प्रमुख (खनन, नदी घाटी), वनों के अवशेष (आरक्षित, रक्षित, वर्गीकृत वन), प्रोजेक्ट टाइगर्स (1973) की सामग्री और प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान, और खाद्य संरक्षण उदाहरण (चिपको आंदोलन, बिश्नोई समाज, पवित्र उपवन, जेएफएम) पर 3 से 5 के विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं।
अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)
पारिस्थितिक तंत्र (पारिस्थितिकी तंत्र) और खाद्य श्रृंखला (खाद्य श्रृंखला) की सामान्य समझ।
पादप और जंतु जानवर (वनस्पति और जीव) की सामान्य जानकारी।
पर्यावरण और वनों की कटाई (वनों की कटाई) के प्रभावों का परिचय।
इस अध्याय के लक्ष्य
भारत की समृद्ध जैव विविधता और IUCN द्वारा निर्धारित वृक्षों के छह टुकड़ों में पुष्प का आसंजन करना।
स्वतंत्रता पूर्व और पश्चात वनों के विनाश के ऐतिहासिक व विकासात्मक कारकों (कृषि, बड़े बांध, खनन) की पहचान करना।
भारत में वनों के त्रि-स्तरीय प्रशासनिक वर्गीकरण (आरक्षित, रक्षित, अवर्गीकृत वन) के अंतर और वितरण को समझना।
भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 और प्रोजेक्ट टाइगर (1973) के उद्देश्यों व प्रमुख टाइगर रिजर्वों की सूची बनाना।
समुदायिक संरक्षण मंडल (चिपको, बिश्नोई परंपरा, पवित्र उपवन, संयुक्त वन प्रबंधन-JFM) की आख्यान करना।
अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति
11. भारत में जैव विविधता एवं IUCN स्...
22. वन और वन्यजीव संसाधनों के ह्रास...
33. वनों का प्रशासनिक वर्गीकरण (आरक्...
44. सरकारी संरक्षण प्रयास: वन्यजीव स...
55. समुदाय और संरक्षण: चिपटो, बिश्नो...
सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन
1. भारत में जैव विविधता एवं IUCN स्मारकों का पुष्पक्रम
1.1 जैव विविधता और भारत की स्थिति
जैव विविधता (Biodiversity): पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीवों (वनस्पतियों, प्राणियों और सूक्ष्मजीवों) की विविधता, उनके आवासों और उनके मध्य जटिल पारिस्थितिक अंतर्संबंधों को जैव विविधता कहा जाता है।
भारत विश्व के 12 महा-विविधता (Mega-biodiversity) वाले देशों में से एक है।
भारत में लगभग 81,000 वन्यजीव प्रजातियाँ और 47,000 वनस्पति प्रजातियाँ पाई जाती हैं। वनस्पति प्रजातियों में लगभग 15,000 प्रजातियाँ देशज (स्थानिक) हैं जो केवल भारत में पाई जाती हैं।
वर्तमान में भारत में कम से कम 10% वन्य वनस्पतिजात और 20% स्तनधारियों के लुप्त होने का गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
1.2 IUCN के अनुसार प्रजातियों का वर्गीकरण
अंतरराष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण संघ (IUCN - International Union for Conservation of Nature and Natural Resources) के अनुसार पौधों और प्राणियों की जातियों को निम्नलिखित श्रेणियों में बांटा गया है:
श्रेणी का नाम
लक्षण एवं परिभाषा
प्रमुख उदाहरण
1. सामान्य जातियाँ (Normal Species)
वे जातियाँ जिनकी संख्या जीवित रहने के लिए सामान्य मानी जाती है।
साल, चीड़, मवेशी, कृंतक (Rodents)।
2. संकटग्रस्त जातियाँ (Endangered Species)
वे जातियाँ जिनके लुप्त होने का खतरा है। यदि विपरीत परिस्थितियाँ जारी रहीं तो इनका जीवित रहना कठिन हो जाएगा।
काला हिरण (Black buck), मगरमच्छ, भारतीय जंगली गधा, गेंडा (Indian Rhino), शेर की पूंछ वाला मकाक बंदर, संगाई (मणिपुर का हिरण)।
3. सुभेद्य जातियाँ (Vulnerable Species)
वे जातियाँ जिनकी संख्या लगातार घट रही है। यदि इनकी आबादी घटाने वाले कारकों को नहीं रोका गया तो ये संकटग्रस्त श्रेणी में आ जाएंगी।
नीली भेड़, एशियाई हाथी, गंगा नदी की डॉल्फिन।
4. दुर्लभ जातियाँ (Rare Species)
इन जातियों की संख्या बहुत कम या विषम है। यदि विपरीत परिस्थितियों में सुधार नहीं हुआ तो ये संकटग्रस्त या सुभेद्य बन सकती हैं।
वे जातियाँ जो अपने आवास स्थलों में खोज करने पर पूरी तरह अनुपस्थित पाई गई हैं; जो पृथ्वी से हमेशा के लिए विलुप्त हो चुकी हैं।
एशियाई चीता (1952 में भारत में लुप्त घोषित), गुलाबी सिर वाली बत्तख (Pink-headed duck)।
2. वन और वन्यजीव संसाधनों के ह्रास के कारण
2.1 ऐतिहासिक एवं औपनिवेशिक कारक
भारत में वनों के सबसे बड़े विनाश का आरंभ औपनिवेशिक काल (ब्रिटिश शासन) में हुआ:
रेलवे का विस्तार: रेल कंपनियों के स्लीपर निर्माण और इंजनों के लिए लाखों जंगलों का विस्फोट दिया गया।
2.2 स्वतंत्रता के बाद वन विनाश के प्रमुख कारण
कृषि भूमि का विस्तार: भारतीय वन विभाग (एफएसआई) के अनुसार 1951 से 1980 के बीच 26,200 वर्ग किमी अधिक वन क्षेत्र को कृषि भूमि में बदल दिया गया। स्थानांतरी (झूम)खेती के कारण भी वनों का व्यापक विनाश हुआ।
विशाल नदी घाटी के अवशेष: 1951 से अब तक नदी घाटी चट्टानों के कारण 5,000 वर्ग किमी से अधिक वन जलमग्न हो गए हैं। उदाहरणार्थ, मध्य प्रदेश में नर्मदा सागर परियोजना के कारण 40,000 हेक्टेयर वन क्षेत्र जलमग्न हो गया।
खनन (खनन): उत्खनन उत्खनन ने वनों को मजबूत किया है। उदाहरणार्थ, पश्चिम बंगाल में बक्सा टाइगर रिजर्व (बक्सा टाइगर रिजर्व) डोलोमाइट के खतरे का कारण गंभीर संकट है। 43§
संसाधनों का सामुदायिक उपभोक्ता: समृद्ध वर्ग और विकसित देश पर्यावरण पर्यावरण का गरीब लोगों की तुलना में कई गुना अधिक उपभोक्ता करते हैं। भारत में सबसे अमीर 5% लोग सबसे गरीब 25% लोग तुलना में पर्यावरण को कहीं अधिक नुकसान पहुंचाते हैं।
3. वनों का प्रशासनिक वर्गीकरण (आरक्षित, रक्षित एवं अवर्गीकृत वन)
3.1 भारत में वनों का त्रि-स्तरीय उद्यम
प्रशासन और संरक्षण की दृष्टि से वन विभाग ने भारत के वनों को तीन प्रमुख उद्यमों में विभाजित किया है:
श्रेणी का नाम
अनुपात एवं संरक्षण की स्थिति
भौगोलिक वितरण (राज्य)
1. राष्ट्रीय वन (आरक्षित वन)
देश के कुल वन क्षेत्र का 50% से अधिक भाग। यह वन एवं संरचनात्मक संरक्षण की दृष्टि से सार्वभौमिक मूल्य माने जाते हैं। यहां बिना सरकारी स्वामित्व वाले लकड़ी के चमड़े, शिकार करना और पशुचारा पूरी तरह से नापसंद है। संरक्षित वन (संरक्षित वन)
देश के कुल वन क्षेत्र का लगभग एक-तिहाई (33%) भाग। इन वनों को और अधिक नष्ट होने से सुरक्षित घोषित किया गया है। यहां पर स्थानीय शास्त्रीयों को कुछ प्राकृतिक गैसों के अंतर्गत सूखी लकड़ी के बीज और पशु चराने की सीमित छूट दी गई है। अवर्गीकृत वन (अवर्गीकृत वन)
अन्य सभी वन और बंजर भूमि जो सरकार, निजी स्वामित्व और समुदाय के स्वामित्व में हैं। यहां लकड़ी काटने वाले और चराई पर कोई सरकारी प्रतिबंध नहीं है। कुल 'स्थायी वन क्षेत्र' कहा जाता है, जिसका वास्तुशिल्प भवन लकड़ी और अन्य वन खण्डों की तैयारी और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से किया जाता है। मध्य प्रदेश में देश का सर्वाधिक पर्वतीय वन क्षेत्र (लगभग 75%) है।
4. सरकारी संरक्षण प्रयास: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 एवं प्रोजेक्ट टाइगर
4.1 भारतीय उद्यान (संरक्षण) अधिनियम 1972
वन्यजीवों के भव्य से भव्य स्तर को 1972 में भारत सरकार ने देखा (पर्यावास) का कानूनी संरक्षण और संकटग्रस्तों की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
शिकार (अवैध शिकार) पूरे देश में कानूनी रूप से पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया। (अभयारण्य) की स्थापना की गई। 1973 में अधिकारियों ने पाया कि 20वीं सदी की शुरुआत में जहां भारत में बाघों की आबादी 55,000 थी, वहीं पेंसिल्वेनिया 1973 में यह दस्तावेज 1,827 रह गए थे। प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत: 1973 में भारत सरकार ने 'प्रोजेक्ट टाइगर अभियान' की शुरुआत की, जो केवल एक उत्पाद को बढ़ावा देने का प्रयास नहीं था बल्कि संपूर्ण औद्योगिक तंत्र को सुरक्षित करने का एक विशाल जैव-संरक्षण निगम था।
भारत के प्रमुख टाइगर रिजर्व (टाइगर) रिजर्व):
टाइगर रिजर्व का नाम
राज्य
भौगोलिक महत्वपूर्ण
जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क (जिम कॉर्बेट)
उत्तराखंड
भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान और प्रमुख बाघ आश्रय
सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान (सुंदरबन)
पश्चिम बंगाल
मैंग्रोव बोमी वनों में रॉयल बंगाल टाइगर का प्राकृतिक आवास।
बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान (बांधवगढ़)
मध्य प्रदेश
व्हाइट बाघ और उच्च बाघ आबादी ।
सरिस्का अभयारण्य (सरिस्का)
राजस्थान
अरावली पर्वत श्रृंखला में स्थित बाघ अभयारण्य।
मानस राष्ट्रीय उद्यान (मानस)
असम
बाघ, गेंदा और एशियाई हाथियों के प्रमुख जैवमंडल।
§
पेरियार टाइगर रिजर्व (पेरियार)
केरल
पश्चिमी घाट का प्रसिद्ध हाथी एवं बाघ संरक्षण क्षेत्र।
5. समुदाय और संरक्षण: चिपटो, बिश्नोई और संयुक्त वन प्रबंधन (जेएफएम)
5.1 सामुदायिक संरक्षण की समृद्ध भारतीय परंपरा
भारत में संरक्षण केवल सरकारी संस्थाओं का काम नहीं है; स्थानीय समुदायों ने सदियों से जंगलों को अपना घर माना है और उनकी रक्षा की है:
1. सरिस्का एवं भैरोंदेव डाकव 'सोंचुरी'
राजस्थान के सरिस्का टाइगर रिजर्व में ग्रामीणों ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का हवाला देकर खनन के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी और खनन बंद करवाया। अलवर जिले के 5 गांवों के लोगों ने 1,200 हेक्टेयर वन भूमि को 'भैरोंदेव डाकव सोंचुरी' घोषित किया और अपने स्वयं के नियम बनाए—जहाँ शिकार पूरी तरह वर्जित है।
2. चिपको आंदोलन और बीज बचाओ
उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में प्रसिद्ध चिपको आंदोलन (Chipko Movement) ने न केवल वनों की कटाई को सफलतापूर्वक रोका बल्कि यह दिखाया कि स्थानीय प्रजातियों के वृक्षारोपण से सामुदायिक वनीकरण सफल हो सकता है। टिहरी में 'बीज बचाओ आंदोलन' और 'नवदान्य' ने बिना रासायनिक खादों के पारंपरिक बीजों से सफल जैविक खेती कर दिखाई।
3. पवित्र उपवन (Sacred Groves / देवराहा)
प्रकृति की पूजा सदियों पुरानी जनजातीय परंपरा है। छोटानागपुर क्षेत्र में मुंडा और संथाल जनजातियाँ महुआ और कदंब के पेड़ों की पूजा करती हैं। ओडिशा और बिहार की जनजातियाँ विवाह के समय इमली और आम के पेड़ों की पूजा करती हैं। इन जंगलों को 'देवी-देवताओं का वन' माना जाता है जहाँ कुल्हाड़ी चलाना वर्जित होता है।
4. बिश्नोई समाज की वन्यजीव रक्षा
राजस्थान में बिश्नोई गांवों के आसपास चिंकारा (काला हिरण), नीलगाय और मोरों के झुंड देखे जा सकते हैं जो वहाँ के अभिन्न अंग हैं और कोई भी उन्हें नुकसान नहीं पहुंचा सकता। जीव रक्षा उनके धार्मिक 29 नियमों का हिस्सा है।
5.2 संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management - JFM)
भारत में क्षरित वनों के पुनर्निर्माण और संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी का सबसे सफल उदाहरण संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) है:
शुरुआत: औपचारिक रूप से JFM की शुरुआत 1988 में ओडिशा राज्य द्वारा पहला प्रस्ताव पारित करने के साथ हुई।
कार्यपद्धति: इसके अंतर्गत ग्राम स्तर पर संस्थाएं बनाई जाती हैं जिनमें ग्रामीण और वन विभाग मिलकर क्षरित वन भूमि की सुरक्षा और प्रबंधन करते हैं।
पारस्परिक लाभ: बदले में ग्रामीणों को गैर-इमारती वन उत्पादों (जैसे महुआ, पत्तियां, गोंद, फल) के संग्रहण का अधिकार मिलता है और जब वन तैयार होते हैं, तो इमारती लकड़ी की बिक्री से प्राप्त आय में भी हिस्सा मिलता है।
महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था
8% जैव विविधता
विश्व की कुल 16 लाख ज्ञात प्रजातियों का 8% हिस्सा भारत में विद्यमान।
1952 (एशियाई चीता)
भारत में एशियाई चीते को आधिकारिक रूप से लुप्त (Extinct) घोषित किया गया।
IUCN 6 श्रेणियाँ
सामान्य, संकटग्रस्त, सुभेद्य, दुर्लभ, स्थानिक और लुप्त जातियाँ।
1972 अधिनियम
भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम; शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध व आवासों को कानूनी सुरक्षा।
1973 प्रोजेक्ट टाइगर
बाघों की घटती संख्या (1,827) को रोकने हेतु शुरू किया गया ऐतिहासिक संरक्षण प्रोजेक्ट।
50% से अधिक वन
आरक्षित वन (Reserved Forests); सर्वाधिक मूल्यवान व सख्त कानूनी प्रतिबंध।
33% वन क्षेत्र
रक्षित वन (Protected Forests); सीमित चराई व वनोपज की अनुमति।
75% स्थाई वन (म.प्र.)
मध्य प्रदेश में देश का सर्वाधिक स्थाई वन क्षेत्र (आरक्षित + रक्षित वन)।
बक्सा टाइगर रिजर्व (प. बंगाल)
डोलोमाइट खनन के कारण हाथियों व वन्यजीवों का आवास गंभीर संकट में।
1988 (ओडिशा)
संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) का पहला आधिकारिक सरकारी संकल्प पारित।
पवित्र उपवन (देवराहा)
जनजातियों द्वारा देवी-देवताओं को समर्पित वन क्षेत्र जहाँ पेड़ों को काटना वर्जित है।
भैरोंदेव डाकव सोंचुरी
अलवर (राजस्थान) के 5 गांवों द्वारा 1,200 हेक्टेयर वन को खुद के नियमों से संरक्षित किया गया।
अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)
उदाहरण 1
अंतर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण संघ (IUCN) के अनुसार किस संस्था का प्लास्टिक संस्थान बनाया गया है? किन्हीं चार स्थानों के लक्षण और उदाहरण।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
आईयूसीएन ने अपने शस्त्रागार में छह मुख्य स्थानों पर अपने शस्त्रागारों को स्थापित करने का कार्य किया है:
1। संकटग्रस्त जातियाँ (लुप्तप्राय प्रजातियाँ): ये जातियाँ लुप्तप्राय होने का तात्कालिक खतरा हैं। यदि असंख्य संख्या वाली विषम परिस्थितियाँ जारी हैं, तो उनका जीवित अस्तित्व प्रभाव होगा। उदाहरण: काला हिरण, हिरण, भारतीय जंगली गधा, गैंडा, शेर की पूंछ वाला मकाक बंदर और बंदर का संगाई हिरण। 2। सुभेद्य जातियाँ (कमजोर प्रजातियाँ): ये वे जातियाँ हैं जिनकी संख्या में निरंतर गिरावट आ रही है। यदि प्रतिपक्षी तत्वों में सुधार नहीं किया गया, तो वे निकट भविष्य में संकटग्रस्त श्रेणी में पहुंच जाएंगे। उदाहरण: नीली भेड़िये, एशियाई हाथी, और गंगा नदी की डॉल्फिन 3. स्थानिक जातियाँ (स्थानिक प्रजातियाँ): प्राकृतिक या भौगोलिक सीमाएँ अलग-अलग स्तर पर विशिष्ट क्षेत्रों में ही पाई जाने वाली जातियाँ। उदाहरण: अंडमानी तिल (जंगली बत्तख), निकोबारी कबूतर, और डोमिनिक का मिथुन. 4. लुप्त जातियाँ (विलुप्त प्रजातियाँ): वे जातियाँ जो अपने सामान्य या विशिष्ट आवासीय क्षेत्रों में पूरी तरह से निवास पर भी नहीं मिलीं और पृथ्वी से हमेशा के लिए समाप्त हो गईं। एशियाई चीता (1952 में भारत में घोषित उदाहरण) और गुलाबी सिर वाली बत्तख।
उदाहरण 2
वनों और वन्यजीवों के विनाश के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारणों का विस्तार से विश्लेषण कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भारत में वनों और संपदा के विनाश के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
1. औपनिवेशिक स्मारक: ब्रिटिश शासनकाल में रेलवे का विस्तार (स्लीपर निर्माण भवन), शिपरानी, व्यावसायिक व्यवसाय (चाय, फूल, रबर) के बागों और एकल विशिष्टता (टीक और चिड़) के कारण लाखों विशाल प्राकृतिक मिश्रित वनों का सफाया किया गया। 2. कृषि भूमि का फैलाव:स्वतंत्रता के बाद जनसंख्या का पेट भरने के लिए वनों को अलग कर दिया गया। भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार 1951 से 1980 के मध्य में 26,200 वर्ग वर्ग मीटर वन भूमि को आवंटित किया गया। इसके अलावा 'झूम खेती' से भी वनों का ह्रास हुआ। 3. बड़ी नदी घाटी के देवता: बहुउद्देश्यीय नदी घाटी के देवता 1951 से अब तक 5,000 वर्ग किमी से अधिक वन जलमग्न हो गए हैं। अर्थ, मध्य प्रदेश में 'नर्मदा सागर परियोजना' से 40,000 हेक्टेयर वन जलमग्न हो गए। 4. खनन खनन (खनन): खदानों के लिए जंगलों की कटाई ने उथले तंत्र को भारी नुकसान पहुंचाया है। अर्थ, पश्चिम बंगाल में 'बक्सा टाइगर रिजर्व' डोलोमाइट चट्टान के कारण गंभीर रूप से क्षति हो चुकी है और हाथियों के प्राकृतिक गलियारों को अवरुद्ध कर दिया गया है। 5. शिकार और अवैध भंडार: बाघ के घोड़े, खल, हाथी दांत, गांडे के सींग और कस्तूरी मृग के शिकार ने कई मशहूर हस्तियों को स्थापत्य पर लाद दिया है।
उदाहरण 3
प्रशासनिक दृष्टि से भारत के वनों का वर्गीकरण किस प्रकार किया गया है? आरक्षित, रक्षित और अवर्गीकृत वनों की तुलना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भारत के वन विभाग ने वनों को तीन प्रमुख स्थलों के आधार पर वर्गीकृत किया है:
वर्गीकरण का आधार
आरक्षित वन (आरक्षित वन)
रक्षित वन (संरक्षित वन)
वर्गीकृत वन (अवर्गीकृत वन)
कुल वन क्षेत्र का अनुपात
50% से अधिक (सार्वभौमिक विस्तार).
अनुमान 33% (एक-तिहाई).
शेष वन व बंजार भूमि (उत्तर व गुजरात).
कानूनी स्तर सुरक्षा
सार्वभौमिक कठोरता व मूल्य; यहां किसी भी अनाधिकृत व्यक्ति का प्रवेश, शिकार, लकड़ी का सामान या चराई कानूनी रूप से पूर्ण प्रतिबंधित है।
मध्यम सुरक्षा; इन वनों को और अधिक नष्ट कर दिया गया है।
कोई विशेष सरकारी प्रतिबंध नहीं; यह सरकार, समुदाय और निजी लोगों के संयुक्त नियंत्रण में हैं। है।
समुदायों और कानूनों को पारंपरिक उपयोग की स्वतंत्रता है।
प्रमुख।
मध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, आंध्र प्रदेश, उत्तराखंड, केरल, प. बंगाल, महाराष्ट्र।
बिहार, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान।
असम, नागालैंड, मेघालय, बौद्ध और गुजरात का अधिकांश भाग।
उदाहरण 4
'प्रोजेक्ट टाइगर' (1973) क्या है? इसके उद्देश्यों और भारत के किन्हीं चार प्रमुख टाइगर रिजर्वों का उल्लेख कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
प्रोजेक्ट टाइगर का परिचय पृष्ठभूमि: बाघ (टाइगर) की सुरक्षा और खाद्य श्रृंखला की स्थिरता का सर्वोच्च प्रतीक है। 1973 में जब भारत सरकार ने पाया कि 20वीं सदी के आरंभ में जिस देश में 55,000 बाघ थे, उनके संस्कार 1,827 रह गए थे, तब इस गंभीर संकट से अप्रैल 1973 में विश्व प्रसिद्ध 'प्रोजेक्ट टाइगर' की शुरुआत हुई थी। बाघों की तेजी से जंगल आबादी को लाभ और उनके होने से लाभ। 2। बाघों के प्राकृतिक आवासों (Natural Habitats) को खंडहरों और चट्टानों से पूरी तरह मुक्त रखना। 3. केवल एक आर्किटेक्चर को नहीं, बल्कि उसके पूरे पारिस्थितिक तंत्र (शाकाहारी सागर, वनों और जल संसाधनों) को संरक्षित करना है।
चार प्रमुख टाइगर रिजर्व: 1। जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान (उत्तराखंड): भारत का सबसे पहला और प्रतिष्ठित राष्ट्रीय उद्यान। 2. सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान (पश्चिम बंगाल): मैंग्रोव डेल्टा में रॉयल टाइगर का अनोखा आवास। 3. बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान (मध्य प्रदेश): उच्च बाघ घनत्व और समृद्ध समृद्ध संपदा वाला पार्क। 4. सरिस्का अभयारण्य (राजस्थान): अरावली के मंदिर स्थित ऐतिहासिक बाघ अभयारण्य।
उदाहरण 5
भारत में वन और प्राकृतिक संरक्षण में स्थानीय स्थानों की भूमिका का सोडाहरण विवरण। 'संयुक्त वन प्रबंधन' (JFM) क्या है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भारत में प्रकृति संरक्षण के लिए सरकारी एजेंसियों को मंजूरी नहीं दी गई है, बल्कि ग्रामीण और जनजातीय समूहों ने सदियों से जंगलों को पूज्य बना कर अपनी रक्षा की है:
1. चिपको आंदोलन (उत्तराखंड):हिमाचल के पर्वतीय आंचल में महिलाओं ने वनों के व्यवसायिक कटान के विरोध में पेड़ों से अपनी रक्षा की और यह सिद्ध किया कि वैज्ञानिक भागीदारी से वनीकरण संभव है। 2. भैरोंदेव डाकव 'सोनचुरी' (राजस्थान): अलवर जिले के पांच जिलों के लोगों ने 1,200 हेक्टेयर वन क्षेत्र को 'भैरोंदेव डाकव सोंचुरी' घोषित किया। उन्होंने अपने असंगठित नियम बनाए और बाहरी हस्तक्षेप को पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया। 3. बिश्नोई समाज की परंपरा: राजस्थान के बिश्नोई कश्मीर में काले हिरण (चिंकारा), नीलगाय और मोर समाज के बच्चे सुरक्षित रूप से मौजूद हैं। जीव अपने धार्मिक अधर्म में हिंसा करते हैं। 4। पवित्र उपवन (सेक्रेड ग्रोव्स/देवराहा): छोटा नागपुर के मुंडा और संथाल जापानी और कदंब के पेड़ों की तथा ओडिशा के जनाब इमली और आम के पेड़ों की पूजा करते हैं। इन पवित्र जंगलों में पेड़-पौधों का पाप माना जाता है। शुरुआत 1988 में ओडिशा राज्य सेहुई में हुई। इसके तहत ग्राम स्तर पर वन सुरक्षा समितियां बनाई गईं जो वन विभाग के साथ मिलकर वनों की रक्षा करती हैं। इसके बदले में गैर-इमरती वनोपज (महुआ, गोण्डा, पत्ते) और अंत में विदेशी इमारती लकड़ी से होने वाली आय में निश्चित दृष्टि है।
सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)
सामान्य भ्रम / गलत उत्तर
एशियाई चीते (चीता) और तेंदुआ (तेंदुए) को एक ही समझ लें।
सही वैज्ञानिक तथ्य
चीता बिल्ली परिवार का दुनिया का सबसे तेज दौड़ने वाला स्तनधारी (112 किमी/घंटा) है जिसकी आंखों के कोने से मुंह तक आंसुओं जैसी लकीरें होती हैं। भारत में एशियाई चीते को 1952 में ही आधिकारिक रूप से लुप्त घोषित कर दिया गया था।
सामान्य भ्रम / गलत उत्तर
प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत का वर्ष 1972 या 1980 लिख देना।
सही वैज्ञानिक तथ्य
भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 में पारित हुआ था, जबकि 'प्रोजेक्ट टाइगर' 1973 में शुरू किया गया था।
सामान्य भ्रम / गलत उत्तर
आरक्षित और रक्षित वनों में भ्रम होना (रक्षित वन को अधिक सुरक्षित मानना)।
सही वैज्ञानिक तथ्य
अयस्क वन (आरक्षित वन) सबसे अधिक सख्त और मूल्यांकित होते हैं जहां कोई भी मानव छूट नहीं होती है। संरक्षित वनों में स्थानीय लोगों के साथ सूखी लकड़ी और चराई की सीमित मात्रा होती है।
सामान्य भ्रम / गलत उत्तर
स्थानिक प्रजातियाँ (स्थानिक प्रजातियाँ) पूरे भारत में पाई जाने वाली जातियाँ हैं।
सही वैज्ञानिक तथ्य
स्थानिक जातियाँ केवल किसी विशिष्ट और अलग-थलग भौगोलिक क्षेत्र (जैसे अंडमान या निकोबार द्वीप समूह) में ही पाई जाती हैं, जैसे अंडमानी टील या निकोबारी कबूतर।
सामान्य भ्रम / गलत उत्तर
संयुक्त वन प्रबंधन (जेएफएम) को केवल वन विभाग का अग्रिम कार्यक्रम प्रदान किया गया।
सही वैज्ञानिक तथ्य
जेएफएम वन विभाग और स्थानीय ग्रामीण समूह की भागीदारी है, जिसमें प्रबंधन की जिम्मेदारी है और वनोपज का लाभ दोनों में साझा होता है।
भारत में वन एवं संरचनात्मक संरचना संरचना: IUCN, श्रेणियां एवं स्केल मॉडल
अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष
मुख्य बिंदु 1
भारत विश्व के 12 महा-जैव-विविधता वाले देशों में शामिल है जहाँ विश्व की 8% प्रजातियाँ (लगभग 16 लाख) पाई जाती हैं।
मुख्य बिंदु 2
IUCN ने जानवरों को 6 श्रेणियों में रखा है - सामान्य, संकटग्रस्त, सुभेद्य, दुर्लभ, स्थानिक और लुप्तप्राय।
मुख्य बिंदु 3
एशियाई चीता (112 किमी/घंटा की गति वाला स्तनधारी) 1952 में भारत में आधिकारिक रूप से विलुप्त घोषित कर दिया गया।
मुख्य बिंदु 4
औपनिवेशिक काल में रेलवे विस्तार, व्यावसायिक वानिकी तथा स्वतंत्रता के बाद नदी घाटी परियोजनाओं और खनन (बक्सा टाइगर रिजर्व) ने वनों को भारी क्षति पहुंचाई।
मुख्य बिंदु 5
प्रशासनिक दृष्टि से भारत के वनों को आरक्षित वन (50% से अधिक, सर्वाधिक मूल्यवान), रक्षित वन (33%, सीमित छूट) और अवर्गीकृत वन (पूर्वोत्तर व गुजरात) में बांटा गया है।
मुख्य बिंदु 6
मध्य प्रदेश में देश का सबसे बड़ा स्थाई वन क्षेत्र (लगभग 75%) है।
मुख्य बिंदु 7
1972 में 'भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम' लागू किया गया जिसके तहत शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध और संकटग्रस्त जातियों को संरक्षण दिया गया।
मुख्य बिंदु 8
1973 में बाघों की घटती संख्या (1,827) को बचाने हेतु विश्व प्रसिद्ध 'प्रोजेक्ट टाइगर' शुरू किया गया (कॉर्बेट, सुंदरबन, बांधवगढ़, पेरियार आदि)।
मुख्य बिंदु 9
उत्तराखंड में चिपको आंदोलन, टिहरी का बीज बचाओ आंदोलन और राजस्थान में बिश्नोई समाज ने सामुदायिक स्तर पर वनों व वन्यजीवों की रक्षा की मिसाल कायम की।
मुख्य बिंदु 10
1988 में ओडिशा में 'संयुक्त वन प्रबंधन' (जेएफएम) की शुरुआत हुई, जो कि औद्योगिक और वन विभाग की सफल भागीदारी का एक आदर्श मॉडल है।
स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)
मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।
1
संकटग्रस्त प्रजाति (लुप्तप्राय प्रजाति) और संकटग्रस्त प्रजाति (संकटग्रस्त प्रजाति) का क्या अर्थ है? प्रत्येक का एक उदाहरण दाता।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: संकटग्रस्त जातियाँ वे हैं जिनके लुप्त होने का तात्कालिक खतरा है और यदि विपरीत परिस्थितियाँ जारी रहीं तो वे विलुप्त हो जाएंगी (उदा: काला हिरण, गेंडा)। सुभेद्य जातियाँ वे हैं जिनकी आबादी निरंतर घट रही है और यदि ध्यान न दिया गया तो वे जल्द ही संकटग्रस्त श्रेणी में पहुंच जाएंगी (उदा: नीली भेड़, गंगा नदी की डॉल्फिन)।
2
आर्किड वन (आरक्षित वन) और संरक्षित वन (संरक्षित वन) में क्या अंतर है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: आरक्षित वन देश के कुल वनों के 50% से अधिक हैं और सबसे मूल्यवान हैं जहाँ किसी भी प्रकार की कटाई या पशु चराई पर पूर्ण कानूनी प्रतिबंध होता है। रक्षित वन कुल वन क्षेत्र का एक-तिहाई हैं जहाँ स्थानीय ग्रामीणों को कुछ शर्तों पर सूखी लकड़ी बीनने व सीमित चराई की अनुमति दी जाती है।
3
प्रोजेक्ट टाइगर कब और क्यों शुरू किया गया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: प्रोजेक्ट टाइगर 1973 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य बाघों की तेजी से घटती संख्या (जो 1973 में घटकर मात्र 1,827 रह गई थी) को बचाना और संपूर्ण वन पारिस्थितिक तंत्र को संरक्षित करना था।
4
पवित्र उपवन (सेक्रेड ग्रूव्स) क्या हैं और वे जैव विविधता के संरक्षण में किस प्रकार के सहायक हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पवित्र उपवन (देवराहा) वनों के वे भाग हैं जिन्हें स्थानीय जनजातियाँ अपने देवी-देवताओं का निवास मानकर सदियों से अछूता रखती आई हैं। इन वनों में किसी भी पेड़ को काटना या शिकार करना पूरी तरह वर्जित होता है, जिससे दुर्लभ वनस्पतियाँ और जीव सुरक्षित रहते हैं।
5
संयुक्त वन प्रबंधन (जेएफएम) कार्यक्रम की शुरुआत क्या है और इसका प्रदर्शन कब और कहां हुआ?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: JFM की शुरुआत 1988 में ओडिशा राज्य में हुई। इसके अंतर्गत ग्राम स्तर पर वन सुरक्षा समितियां बनाई जाती हैं जो वन विभाग के साथ मिलकर क्षरित वनों की रक्षा करती हैं। गैर-इमरती वनोपज और लकड़ी की बिक्री से प्राप्त आय में बदले में भाग मिलता है।
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