3.1 भारतीय वस्त्रों का स्वर्णिम युग और पुराने बंदरगाहों का पतन
मशीनी उद्योगों के युग से पहले अंतरराष्ट्रीय कपड़ा बाजार में भारत के रेशमी और बारीक सूती वस्त्रों (Fine Cotton) का एकछत्र वर्चस्व था। आर्मेनियाई और फारसी सौदागर पंजाब से अफगानिस्तान, पूर्वी फारस और मध्य एशिया के रास्ते माल ले जाते थे।
- गुजरात तट पर सूरत बंदरगाह भारत को खाड़ी और लाल सागर के बंदरगाहों से जोड़ता था। कोरोमंडल तट पर मसूलीपट्टनम और बंगाल में हुगली के दक्षिण-पूर्व एशियाई बंदरगाहों के साथ व्यापारिक संबंध थे।
- 1750 के दशक तक भारतीय सौदागरों और बैंकरों का यह नेटवर्क टूटने लगा क्योंकि यूरोपीय कंपनियों ने पहले स्थानीय दरबारों से व्यापारिक रियायतें हासिल कीं और फिर व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त कर लिया।
- सूरत और हुगली जैसे पुराने ऐतिहासिक बंदरगाह वीरान हो गए और उनकी जगह औपनिवेशिक सत्ता के नए केंद्र—बंबई (मुंबई) और कलकत्ता (कोलकाता) उभरे।
3.2 ईस्ट इंडिया कंपनी, गुमाश्ता और बुनकरों का शोषण
1760 के दशक में बंगाल और कर्नाटक में राजनीतिक सत्ता स्थापित करने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार पर अपना एकाधिकार सुनिश्चित करने के लिए एक नई व्यवस्था लागू की:
गुमाश्ता (Gomastha) की व्यवस्था:
1. कंपनी ने कपड़े के व्यापार में सक्रिय पुराने दलालों और व्यापारियों को खत्म करने का प्रयास किया और बुनकरों पर सीधा नियंत्रण स्थापित करने के लिए एक वेतनभोगी कर्मचारी नियुक्त किया जिसे 'गुमाश्ता' कहा जाता था। उसका काम बुनकरों की निगरानी करना, माल इकट्ठा करना और कपड़े की गुणवत्ता जांचना था।
2. पेशगी की प्रणाली (System of Advances): कंपनी ने बुनकरों को कच्चा माल खरीदने के लिए अग्रिम कर्ज (Loan) देना शुरू किया। जो बुनकर कर्ज लेते थे, उन्हें अपना तैयार कपड़ा केवल कंपनी के गुमाश्ता को ही बेचना पड़ता था; वे किसी अन्य व्यापारी को कपड़ा नहीं बेच सकते थे।
3. गुमाश्ता का क्रूर व्यवहार: गुमाश्ता का गांव से कोई सामाजिक संबंध नहीं होता था। वे सिपाहियों और चपरासियों के साथ अकड़कर आते थे और माल की आपूर्ति में देरी होने पर बुनकरों को पीटते और कोड़े लगवाते थे। बुनकरों को कपड़े की जो कीमत मिलती थी, वह बहुत कम होती थी और वे कर्ज के अंतहीन जाल में फंस गए।
इसके परिणामस्वरूप कई गांवों में बुनकरों और गुमाश्ताओं के बीच हिंसक टकराव हुए। कई बुनकर अपनी करघों को छोड़कर दूसरे गांवों में चले गए और कई ने हमेशा के लिए बुनाई का पुश्तैनी पेशा छोड़ दिया।
3.3 भारत में मैनचेस्टर का आगमन
19वीं सदी की शुरुआत में भारत के कपड़ा निर्यात में भारी गिरावट आई। 1811-12 में भारत के कुल निर्यात में सूती कपड़े का हिस्सा 33% था, जो 1850-51 तक घटकर मात्र 3% रह गया।
- कारण: इंग्लैंड के कपास उद्योगपतियों ने सरकार पर दबाव डाला कि वह आयातित कपड़ों पर भारी आयात शुल्क (Import Duty) लगाए ताकि मैनचेस्टर में बने कपड़े बिना किसी प्रतिस्पर्धा के बिक सकें। साथ ही उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी पर भारतीय बाजारों में ब्रिटिश कपड़ा बेचने का दबाव बनाया।
- भारतीय बुनकरों के समक्ष दोहरा संकट:
- उनका विदेशी निर्यात बाजार पूरी तरह समाप्त हो गया।
- स्थानीय बाजार मैनचेस्टर के सस्ते, मशीनी कपड़ों से पट गया। मशीनों पर बने कपड़े इतने सस्ते और आकर्षक होते थे कि भारतीय बुनकर उनका मुकाबला नहीं कर सके।
- कच्चे कपास का संकट (1860 का दशक): 1861 में जब अमेरिकी गृहयुद्ध (American Civil War) शुरू हुआ, तो अमेरिका से ब्रिटेन को कच्चे कपास का आयात बंद हो गया। ब्रिटेन ने भारत से कच्चा कपास मंगाना शुरू किया। परिणामस्वरूप भारत में कच्चे कपास की कीमतें आसमान छूने लगीं। भारतीय बुनकरों को कच्चा माल मिलना बंद हो गया और वे भुखमरी के कगार पर पहुंच गए।