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NIOS • कक्षा X • Social Science (213) • अध्याय 5
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

भारत पर ब्रिटिश शासन का प्रभाव (Impact of British Rule)

भारत पर ब्रिटिश शासन का प्रभाव: आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक (1757-1857) के लिए व्यापक अध्ययन सामग्री और अध्याय नोट्स, एनआईओएस माध्यमिक (कक्षा 10) सामाजिक विज्ञान (213) के लिए व्यवस्थित रूप से तैयार किया गया। नवीनतम नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग पाठ्यक्रम के अनुरूप, यह गाइड मुख्य सैद्धांतिक अवधारणाओं, ऐतिहासिक कालक्रम, भौगोलिक विश्लेषण, संवैधानिक सिद्धांतों, ट्यूटर मार्क्ड असाइनमेंट (टीएमए) दिशानिर्देशों और सार्वजनिक परीक्षा में महारत पर जोर देती है।

जब लंदन को दुनिया का 'फिनिशिंग सेंटर' कहा जाता था, तब कपड़े वास्तव में कहाँ बनते थे?

क्या आप जानते हैं कि जब तक स्टीम के इंजन और भव्य विस्फोटक नहीं बने थे, तब तक पूरे यूरोप के लोग उन उत्पादों को बनाते थे जो हजारों अलग-अलग दूर के गांवों की झोपड़ियों में बुने जाते थे? शहरों के धनी सौदागर गाँवों में जाते थे, किसानों को पेशगी (एडवांस) देते थे, ऊन को गाँव-दर-गांव काटा, डूब और रंगा जाते थे। अंत में कपड़े लंदन भेजे गए जहां केवल उनकी अंतिम छंटाई और फिनिशिंग (परिष्करण) हुई थी। इसलिए लंदन को 'फ़िनिशिंग सेंटर' कहा गया! आइये जानें कि कैसे आदि-औद्योगिकीकरण की झोपड़ियों से लेकर आधुनिक युग के विशाल भंडार तक।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

एनआईओएस एवं एनआईओएस 10वीं बोर्ड परीक्षा में 'औद्योगिकीकरण का युग' इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। 'आदि-औद्योगिकीकरण' (प्रोटो-औद्योगिकीकरण) की अवधारणा, विक्टोरियाई ब्रिटेन में हाथ के श्रम की समानता, 'गुमास्ता' की भूमिका और बुनकरों का शोषण, भारत में मैनचेस्टर के आगमन का प्रभाव, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय औद्योगिकीकरण का तीव्र विकास, तथा नए बाजार के निर्माण पर 3 से 5 अभिलेखों के विस्तृत प्रश्न पूछे जाते हैं। यह अध्याय भारत के आधुनिक औद्योगिक विकास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • 18वीं और 19वीं सदी की औद्योगिक क्रांति और वैज्ञानिक आविष्कारों (भाप इंजन, कताई मशीन) की सामान्य समझ।
  • ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार और भारत में औपनिवेशिक शोषण की पृष्ठभूमि।
  • हस्तशिल्प, कुटीर उद्योग और बड़े पैमाने के कारखानों के बीच का बुनियादी अंतर।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • आदि-औद्योगिकीकरण (प्रोटो-औद्योगिकीकरण) का संकल्पना और गिल्ड्स के प्रभाव का विश्लेषण करना।
  • विक्टोरियाई ब्रिटेन में उद्योगपतियों द्वारा मशीनों की तुलना में हाथ के श्रम को प्राथमिकता देने के सामाजिक-आर्थिक कारणों को समझना।
  • ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा 'गुमाश्ता' की नियुक्ति और इसके कारण भारतीय पारंपरिक बुनकरों पर पड़े विनाशकारी प्रभावों की व्याख्या करना।
  • 19वीं सदी में 'मैनचेस्टर के आगमन' से भारतीय कपड़ा उद्योग के समक्ष उत्पन्न संकट और बुनकरों की दुर्दशा का परीक्षण करना।
  • प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय उद्योगों के अप्रत्याशित विस्तार और उपभोक्ता बाजार के निर्माण में विज्ञापनों व कैलेंडरों की भूमिका का मूल्यांकन करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. औद्योगिक क्रांति से पहले: आदि-औद...
2 2. कारखानों का उदय एवं हाथ का श्रम...
3 3. उपनिवेशों में औद्योगिकीकरण: भारत...
4 4. भारत में शुरुआती कारखाने, उद्योग...
5 5. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान औद्यो...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. औद्योगिक क्रांति से पहले: आदि-औद्योगिकीकरण (आद्य-औद्योगिकीकरण)

1.1 आदि-औद्योगिकीकरण क्या है?

इंग्लैंड और यूरोप में सबसे पहले अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन की स्थापना हुई थी। यह प्रोडक्शन बिल्डरों द्वारा किसी पारिवारिक परिवार में नहीं हुआ था। इतिहासकार उद्योग के इस चरण को 'आदि-औद्योगिकीकरण' (प्रोटो-औद्योगिकीकरण) कहते हैं। लेकिन डीलनगर शहरों में अपना व्यवसाय नहीं बढ़ सका, क्योंकि शहरों में शहरी दस्तकारी संघ या गिल्ड्स (अर्बन क्राफ्ट्स गिल्ड्स) शक्तिशाली थे। शासकों ने विभिन्न गिल्डों को विशिष्ट पुरावशेषों के उत्पादन और व्यापार का अधिकार दिया था। असल में सियालगर की ओर मुचे। छोटे किसान और कृषकों के पास गुजराते भूमि नहीं थी। जब डीलरों ने उन्हें पूर्व पेशेवर विशेषज्ञों के रूप में पेश किया, तो वे सहर्ष तैयार हो गए क्योंकि उनके परिवार के सभी सदस्यों ने श्रम का उपयोग कर अतिरिक्त आय का प्रबंध किया। था:

निर्माण का चरणकार्यप्रणाली एवं श्रमिक
स्टॉपलर (स्टेपलर)वह व्यक्ति जो रेशों के खाते से ऊन को छांटता (क्रमबद्ध) था। डीलगर औन खरीदकर स्टेपलरों को दिए गए थे। वह।
फुलर (फुलर) / बुनेकरफुलर्स वह व्यक्तित्व थी जो मुंडों (प्लीट्स) के साकीन मूर्तियों को इकट्ठा करती थी; बुनेकर कपड़े बुनते थे। फिनिशिंग सेंटरतैयार कपड़ों की अंतिम चंताई और फिनिशिंग (फिनिशिंग) केवल लंदन में हुई थी, जिसके बाद सौदागर उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच दिया गया था। लंदन को 'फिनिशिंग सेंटर' (फिनिशिंग सेंटर) कहा गया।

2. कारखानों का उदय एवं हाथ का श्रम बनाम वाष्प शक्ति

2.1 कारखानों का उदय और कपड़ा मिल

इंग्लैंड में सबसे पहले 1730 के दशक में कारखाने खुले, लेकिन 18वीं सदी के अंत में उनकी संख्या में भारी वृद्धि हुई:

  • कपास का पहला प्रतीक: नए युग का पहला प्रतीक कपास (सूती वस्त्र) था। 1760 में ब्रिटेन अपने सूती उद्योग के लिए 25 लाख पाउंड कच्चे कपास का आयात करता था, जो 1787 तक बढ़कर 220 लाख पाउंड तक पहुंच गया।
  • रिचर्ड आर्कराइट (Richard Arkwright): उन्होंने सूती कपड़ा मिल (Cotton Mill) की रूपरेखा तैयार की। अब तक कपड़ा पूरे देहात में फैला हुआ था, लेकिन अब महंगी मशीनें खरीदकर एक ही छत के नीचे लगाई जा सकती थीं।
  • उत्पादन प्रक्रिया के सभी चरण—कताई, बुनाई, रंगाई—एक छत के नीचे आने से गुणवत्ता पर बेहतर नियंत्रण, श्रम की निगरानी और समय की बचत संभव हुई।

2.2 विक्टोरियाई ब्रिटेन में हाथ का श्रम और मशीनें

अक्सर माना जाता है कि मशीनें आने के बाद उद्योगपति केवल मशीनों पर निर्भर हो गए, परंतु विक्टोरियाई ब्रिटेन (19वीं सदी) में स्थिति भिन्न थी:

उद्योगपतियों द्वारा हाथ के श्रम को प्राथमिकता देने के कारण:
1. मानव श्रम की प्रचुरता: गांवों से भारी संख्या में गरीब किसान और मजदूर काम की तलाश में शहरों में आ रहे थे। अतः मजदूरी बहुत कम थी; उद्योगपतियों को श्रमिकों की कोई कमी नहीं थी।
2. मौसमी उद्योग (Seasonal Industries): कई उद्योगों में काम केवल कुछ खास महीनों में होता था—जैसे गैस घरों और शराबखानों (Breweries) में सर्दियों में काम ज्यादा होता था, जहाजों की मरम्मत जाड़ों में होती थी, और क्रिसमस के समय प्रिंटरों और बुकबाइंडरों को ज्यादा काम मिलता था। ऐसे मौसमी उद्योगों के लिए उद्योगपति महंगी मशीनें खरीदने के बजाय केवल मौसम के लिए मजदूरों को काम पर रखना बेहतर समझते थे।
3. परिष्कृत एवं विविधतापूर्ण उत्पाद: मशीनों से केवल एक जैसे, मानकीकृत (Standardized) उत्पाद ही बन सकते थे। परंतु बाजार में ऐसे बारीक डिजाइनों और खास आकारों वाली चीजों की मांग थी जो केवल हाथ से बन सकती थीं। ब्रिटेन का उच्च और कुलीन वर्ग (Aristocrats) हाथ से बनी चीजों को अपनी प्रतिष्ठा का प्रतीक मानता था। मशीनी उत्पाद औपनिवेशिक देशों को निर्यात के लिए होते थे।
4. मशीनों की अत्यधिक लागत व खराबी: तत्कालीन मशीनें बहुत महंगी थीं और बार-बार खराब हो जाती थीं। उनकी मरम्मत में भारी खर्च आता था और वे निर्माताओं के दावों जितनी प्रभावी नहीं थीं।

2.3 मजदूरों का जीवन और स्पिनिंग जेनी का विरोध

  • काम की तलाश में शहरों में आए हजारों मजदूरों को कई हफ्तों तक सड़कों पर, पुलों के नीचे या रैनबसेरों (Night Refuges) में सोना पड़ता था। नौकरी मिलना इस बात पर निर्भर करता था कि कारखाने में उनका कोई रिश्तेदार या दोस्त है या नहीं।
  • स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny): 1764 में जेम्स हारग्रीव्स (James Hargreaves) ने स्पिनिंग जेनी का आविष्कार किया, जिसने एक ही पहिया घुमाकर एक साथ कई तकलियों को घुमा दिया और एक मजदूर कई धागे कात सकता था।
  • जब कताई में इस मशीन का उपयोग शुरू हुआ, तो हाथ से ऊन कातने वाली महिलाओं ने बेरोजगारी के डर से स्पिनिंग जेनी मशीनों पर हमले कर दिए और उन्हें तोड़ना शुरू कर दिया। यह मशीनों के प्रति मजदूरों के आक्रोश का जीवंत उदाहरण था।

3. उपनिवेशों में औद्योगिकीकरण: भारत में बुनकरों का संकट और मैनचेस्टर का आगमन

3.1 भारतीय वस्त्रों का स्वर्णिम युग और पुराने बंदरगाहों का पतन

मशीनी उद्योगों के युग से पहले अंतरराष्ट्रीय कपड़ा बाजार में भारत के रेशमी और बारीक सूती वस्त्रों (Fine Cotton) का एकछत्र वर्चस्व था। आर्मेनियाई और फारसी सौदागर पंजाब से अफगानिस्तान, पूर्वी फारस और मध्य एशिया के रास्ते माल ले जाते थे।

  • गुजरात तट पर सूरत बंदरगाह भारत को खाड़ी और लाल सागर के बंदरगाहों से जोड़ता था। कोरोमंडल तट पर मसूलीपट्टनम और बंगाल में हुगली के दक्षिण-पूर्व एशियाई बंदरगाहों के साथ व्यापारिक संबंध थे।
  • 1750 के दशक तक भारतीय सौदागरों और बैंकरों का यह नेटवर्क टूटने लगा क्योंकि यूरोपीय कंपनियों ने पहले स्थानीय दरबारों से व्यापारिक रियायतें हासिल कीं और फिर व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त कर लिया।
  • सूरत और हुगली जैसे पुराने ऐतिहासिक बंदरगाह वीरान हो गए और उनकी जगह औपनिवेशिक सत्ता के नए केंद्र—बंबई (मुंबई) और कलकत्ता (कोलकाता) उभरे।

3.2 ईस्ट इंडिया कंपनी, गुमाश्ता और बुनकरों का शोषण

1760 के दशक में बंगाल और कर्नाटक में राजनीतिक सत्ता स्थापित करने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार पर अपना एकाधिकार सुनिश्चित करने के लिए एक नई व्यवस्था लागू की:

गुमाश्ता (Gomastha) की व्यवस्था:
1. कंपनी ने कपड़े के व्यापार में सक्रिय पुराने दलालों और व्यापारियों को खत्म करने का प्रयास किया और बुनकरों पर सीधा नियंत्रण स्थापित करने के लिए एक वेतनभोगी कर्मचारी नियुक्त किया जिसे 'गुमाश्ता' कहा जाता था। उसका काम बुनकरों की निगरानी करना, माल इकट्ठा करना और कपड़े की गुणवत्ता जांचना था।
2. पेशगी की प्रणाली (System of Advances): कंपनी ने बुनकरों को कच्चा माल खरीदने के लिए अग्रिम कर्ज (Loan) देना शुरू किया। जो बुनकर कर्ज लेते थे, उन्हें अपना तैयार कपड़ा केवल कंपनी के गुमाश्ता को ही बेचना पड़ता था; वे किसी अन्य व्यापारी को कपड़ा नहीं बेच सकते थे।
3. गुमाश्ता का क्रूर व्यवहार: गुमाश्ता का गांव से कोई सामाजिक संबंध नहीं होता था। वे सिपाहियों और चपरासियों के साथ अकड़कर आते थे और माल की आपूर्ति में देरी होने पर बुनकरों को पीटते और कोड़े लगवाते थे। बुनकरों को कपड़े की जो कीमत मिलती थी, वह बहुत कम होती थी और वे कर्ज के अंतहीन जाल में फंस गए।

इसके परिणामस्वरूप कई गांवों में बुनकरों और गुमाश्ताओं के बीच हिंसक टकराव हुए। कई बुनकर अपनी करघों को छोड़कर दूसरे गांवों में चले गए और कई ने हमेशा के लिए बुनाई का पुश्तैनी पेशा छोड़ दिया।

3.3 भारत में मैनचेस्टर का आगमन

19वीं सदी की शुरुआत में भारत के कपड़ा निर्यात में भारी गिरावट आई। 1811-12 में भारत के कुल निर्यात में सूती कपड़े का हिस्सा 33% था, जो 1850-51 तक घटकर मात्र 3% रह गया।

  • कारण: इंग्लैंड के कपास उद्योगपतियों ने सरकार पर दबाव डाला कि वह आयातित कपड़ों पर भारी आयात शुल्क (Import Duty) लगाए ताकि मैनचेस्टर में बने कपड़े बिना किसी प्रतिस्पर्धा के बिक सकें। साथ ही उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी पर भारतीय बाजारों में ब्रिटिश कपड़ा बेचने का दबाव बनाया।
  • भारतीय बुनकरों के समक्ष दोहरा संकट:
    • उनका विदेशी निर्यात बाजार पूरी तरह समाप्त हो गया।
    • स्थानीय बाजार मैनचेस्टर के सस्ते, मशीनी कपड़ों से पट गया। मशीनों पर बने कपड़े इतने सस्ते और आकर्षक होते थे कि भारतीय बुनकर उनका मुकाबला नहीं कर सके।
  • कच्चे कपास का संकट (1860 का दशक): 1861 में जब अमेरिकी गृहयुद्ध (American Civil War) शुरू हुआ, तो अमेरिका से ब्रिटेन को कच्चे कपास का आयात बंद हो गया। ब्रिटेन ने भारत से कच्चा कपास मंगाना शुरू किया। परिणामस्वरूप भारत में कच्चे कपास की कीमतें आसमान छूने लगीं। भारतीय बुनकरों को कच्चा माल मिलना बंद हो गया और वे भुखमरी के कगार पर पहुंच गए।

4. भारत में शुरुआती कारखाने, उद्योगपति और श्रमिकों का जीवन

4.1 भारत में पहली मिलें और प्रारंभिक उद्योगपति

19वीं सदी के उत्तरार्ध में भारत में आधुनिक वैभव का युग शुरू हुआ:

वर्ष / स्थानउद्योग / मिलसंस्थापक और ऐतिहासिक महत्वपूर्ण
1854 (बंबई)पहली सुती कपड़ा मिलकावासजी नानाभाई डाबर द्वारा स्थापित; 1856 में उत्पादन शुरू हुआ।
1855 (बंगाल)पहली जूट मिल (रिसारा में)जॉर्ज ऑकलैंड द्वारा स्थापित; भारत में जूट उद्योग के प्रमुख केंद्र बनी।
1874 (मद्रास)पहली कटाई व क्रीड़ा मिलदक्षिण भारत में आधुनिक उद्योग कारखाने की शुरुआत।

प्रारंभिक भारतीय अभिव्यक्ति:

  • द्वारकानाथ टैगोर (बंगाल): उन्होंने चीन के साथ मिलकर लॉयन और चाय व्यापार से धन कमाया और 1830 वी 1840 के दशक में छह यूनाइटेड एंटरप्राइज (ज्वाइंट स्टॉक) की स्थापना की।
  • जमशेदजी नसरवानजी टाटा (बंबई): चीन और इंग्लैंड के साथ व्यापार कर विशाल संपत्ति निवेशकों की और 1912 में भारत का पहला आधुनिक लोम-इस्पात प्लांट (टिस्को - टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी) की स्थापना की गई। किया।
  • सेठ हुकुमचंद: मारवाड़ी गवाह 1917 में कोलकाता में पहली भारतीय जूट मिल की स्थापना की।
  • जी.डी. बिड़ला: प्रमुख उद्योगपति स्वतंत्र भारत के विशाल औद्योगिक साम्राज्य की स्थापना राखियां।

4.2 आतिथ्य की भर्ती और 'जॉबर' (जॉबर)

कारखान में काम करने के लिए उद्योग से लेकर उद्योग जगत तक शामिल थे (जैसे बंबई की मिलों में 50% से अधिक कंपनियों के पास रत्नागिरी जिले से आये थे। नौकरीपेशा कोई पुराना और भरोसेमंद मजदूर बन गया।

5. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान औद्योगिक उछाल एवं वस्तुओं के लिए बाजार

5.1 प्रथम विश्व युद्ध और भारतीय उद्योगों का अप्रत्याशित विकास

प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) ने भारतीय उद्योगों के लिए एक नाटकीय बदलाव पैदा कर दिया:

  1. ब्रिटिश आयात में भारी गिरावट: ब्रिटिश कारखाने सेना की आवश्यकताओं और युद्ध सामग्री के उत्पादन में व्यस्त हो गए। इंग्लैंड से भारत में आयात अचानक घट गया।
  2. घरेलू बाजार पर भारतीय मिलों का नियंत्रण: आयात गिरने से भारतीय कपड़ा मिलों को घरेलू बाजार की विशाल मांग पूरी करने का अप्रत्याशित अवसर मिला।
  3. सैन्य आपूर्ति के ऑर्डर: जैसे-जैसे युद्ध लंबा खिंचता गया, भारतीय कारखानों को सेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े ऑर्डर दिए गए—जूट की बोरियां, सैनिकों की वर्दियां, टेंट, चमड़े के जूते और काठी आदि।
  4. नये कारखाने व अतिरिक्त पारियाँ: पुराने कारखानों में कई पारियों (Shifts) में काम चलने लगा और हजारों नए श्रमिकों को रोजगार मिला। युद्ध के वर्षों में भारतीय औद्योगिक उत्पादन कई गुना बढ़ गया।
युद्धोपरांत स्थिति: युद्ध के बाद ब्रिटेन भारत के बाजार में अपनी पुरानी श्रेष्ठता कभी दोबारा हासिल नहीं कर सका। आधुनिक तकनीक में पिछड़ने और अमेरिका-जापान से पिछड़ जाने के कारण ब्रिटिश अर्थव्यवस्था चरमरा गई, जबकि भारतीय उद्योगपतियों ने स्थानीय बाजार पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली।

5.2 वस्तुओं के लिए बाजार का निर्माण (Market for Goods)

उत्पादक नए ग्राहकों को आकर्षित करने और अपनी वस्तुओं के प्रति निष्ठा पैदा करने के लिए विभिन्न मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक माध्यमों का प्रयोग करते थे:

1. विज्ञापनों और लेबलों की भूमिका

कपड़े के बंडलों पर लेबल लगाए जाते थे ताकि खरीदार को कंपनी का नाम और उत्पादन का स्थान पता चल सके। जब लेबल पर मोटे अक्षरों में 'मेड इन मैनचेस्टर' (Made in Manchester) लिखा होता था, तो यह गुणवत्ता का प्रतीक माना जाता था।

2. देवी-देवताओं और राष्ट्रीय नायकों के चित्र

लेबलों पर भारतीय देवी-देवताओं—सरस्वती, लक्ष्मी, कृष्ण—के चित्र छापे जाते थे। इससे यह संदेश दिया जाता था कि यह वस्तु ईश्वर द्वारा अनुशंसित है और इसे खरीदना शुभ है। बाद में राष्ट्रीय नेताओं (जैसे गांधीजी, नेहरू) और नवाबों के चित्र छापे जाने लगे।

3. कैलेंडरों का वितरण

19वीं सदी के अंत से उत्पादक कैलेंडर छापने लगे। कैलेंडर उन लोगों के घरों में भी पूरे साल टंगे रहते थे जो पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे। चाय की दुकानों, गरीब बस्तियों और दफ्तरों में विज्ञापन दिन-रात लोगों की आंखों के सामने रहते थे।

4. राष्ट्रवादी संदेश

स्वदेशी आंदोलन के दौरान भारतीय उत्पादकों ने राष्ट्रवादी संदेश दिए: 'यदि आप राष्ट्र की परवाह करते हैं, तो उन चीजों को खरीदिए जो भारतीयों द्वारा बनाई गई हैं।' विज्ञापन स्वदेशी के प्रसार का प्रमुख माध्यम बन गए।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

आदि-औद्योगिकीकरण
कारखानों की स्थापना से पूर्व अंतरराष्ट्रीय बाजार हेतु देहातों में होने वाला उत्पादन।
1764 स्पिनिंग जेनी
जेम्स हारग्रीव्स द्वारा आविष्कृत कताई मशीन; महिलाओं द्वारा बेरोजगार होने के डर से विरोध।
1781 भाप इंजन पेटेंट
जेम्स वाट द्वारा न्यूकॉमन के भाप इंजन में सुधार व मैथ्यू बोल्टन द्वारा निर्माण।
लंदन: फिनिशिंग सेंटर
आदि-औद्योगिक व्यवस्था में कपड़ों की अंतिम फिनिशिंग का वैश्विक केंद्र।
गुमास्ता (गोमास्थ)
ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा बुनकरों पर निगरानी व कपड़ा एकत्र करने हेतु नियुक्त वेतनभोगी एजेंट।
1854 (बंबई)
भारत की पहली सफल सूती कपड़ा मिल की स्थापना (कावासजी नानाभाई डाबर)।
1855 (रिशरा, बंगाल)
भारत की पहली जूट मिल की स्थापना।
1861 - 1865
अमेरिकी गृहयुद्ध; भारत से ब्रिटेन को कच्चे कपास का भारी निर्यात, भारतीय बुनकरों पर संकट।
1912 टिस्को कोटा
जमशेदजी टाटा द्वारा भारत का पहला आधुनिक लौह एवं इस्पात संयंत्र।
जॉबर्स (नौकरी / मिस्त्री)
कारखानों में नए मजदूरों की भर्ती करने वाला पुराना व भरोसेमंद मध्यस्थ।
मेड इन मैनचेस्टर
ब्रिटिश कपड़ा मिलों द्वारा भारतीय बाजारों में गुणवत्ता विश्वास जमाने हेतु लगाया गया लेबल।
1914 - 1918 प्रथम विश्व युद्ध
ब्रिटिश आयात ठप होने से भारतीय उद्योगों का तीव्र गति से अभूतपूर्व विस्तार।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
आदि-औद्योगिकीकरण (प्रोटो-औद्योगिकीकरण) से आप क्या हैं? इस व्यवस्था में किस प्रकार का संबंध उत्पन्न हुआ?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
आदि-औद्योगिकीकरण का अर्थ:
इंग्लैंड और यूरोप में व्यापारियों (कारखाना-आधारित उत्पाद) के उदय से बहुत पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़े पैमाने पर होने वाले औद्योगिक उत्पादन को ऐतिहासिक रूप से 'आदि-औद्योगिकीकरण' कहा जाता है। यह प्रोडक्शन बिल्डर्स के बजाय देहातों में किसानों और दस्तकारों के घरों में हुआ था।

निर्माण का संगठन:
1. सौदागरों की पंक्ति में: शहरों में गिल्ड्स के शक्तिशाली एकाधिकार और पाबंदियों के कारण नए व्यवसाय शहरों में व्यवसाय को बढ़ावा नहीं दिया जा सका। मूल रूप से वे राजस्थान में गए और गरीब किसानों को पेशगी (एडवांस) नैट मार्केट का उत्पादन शुरू हुआ।
2। पारिवारिक श्रम का उपयोग: खुले में खुले में रहने से संकटग्रस्त किसान परिवार ने अपने खाली घर में श्रम शक्ति का उपयोग किया। पूरा परिवार कटाई, इडियन और ढोलाई के काम में लग गया।
3. चरणबद्ध नेटवर्क: एक डीलगर एक स्टेपलर से एक खरीदता था, उसे कट्टिनों के पास कटवाता था, फिर बुनकरों के पास कपड़ा बुनवाया जाता था और रंगसाजों से रंगवाया जाता था।
4. लंदन में फिनिशिंग: अंत में कपड़ों को लंदन भेजा गया जहां उनकी अंतिम फिनिशिंग हुई थी। इसके बाद डीलर इंटरनेशनल ऑटोमोबाइल में फैक्ट्री स्टीकर्स थे। इस प्रकार लंदन यह संपूर्ण व्यवस्था का 'फिनिशिंग सेंटर' था।
उदाहरण 2
उन्नीसवीं सदी के विक्टोरियाई ब्रिटेन में उद्योगपति मशीनों के बजाय हाथ के श्रम को प्राथमिकता क्यों देते थे? स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
औद्योगिक क्रांति के बावजूद 19वीं सदी के ब्रिटेन में उद्योगपति उद्योग के प्रयोग से उत्साहित थे और हाथ के श्रम को प्राथमिकता देते थे। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

1. श्रमिकों की समृद्धि और कमाई: कृषि संकट और बेरोजगारी के कारण शहरों में लाखों गरीब ग्रामीण काम की तलाश में थे। असली की भारी ज्वालामुखी के कारण मॅट की किताब बहुत कम थी। मूलतः उद्यमों को चिप्स के सामान की कोई आर्थिक आवश्यकता महसूस नहीं हुई।
2. मौसमी उद्योग (मौसमी कार्य): कई कलाकार-जैसे गैस कारखाने, बीयर भट्टियां, शिपरानी और बुकबाइंडिंग-में काम साल के कुछ निश्चित महीनों (सरदियों या त्योहारों) में होता था। पूरे साल की आवश्यकता के समय नोटबुक को अधिक जमा रखने के बजाय।
3. पारदर्शी और विशिष्ट डिजाइनों की मांग: मानदंड केवल मानकीकृत और एकरूप नमूना ही बनाया जा सकता है। विक्टोरियन ब्रिटेन के अमीर और कुलीन वर्ग (अभिजात वर्ग) के हाथ से बनी वस्तुएँ, निर्मित वस्तुएँ और विशिष्ट वस्तुएँ अपनी उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक थीं।
4। मशीनों की भारी लागत कम नहीं हुई: मूर्तिकला अवशेष अवशेष थे, जल्दी खराब हो गए थे और उनकी कुल लागत बहुत अधिक थी। वे बेकार के टैटू असमर्थ थे।
उदाहरण 3
ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा नियुक्त 'गुमाश्ता' कौन था? उसके द्वारा अपनाई गई कार्यप्रणाली का भारतीय बुनकरों पर क्या विनाशकारी प्रभाव पड़ा?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
गुमाष्ठा का परिचय:
ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के समृद्ध कपड़ा व्यापार से भारतीय प्रशिक्षुओं और छात्रों को बाहर करने और एकजुट नियंत्रण स्थापित करने के लिए एक वेतनभोगी कर्मचारी की नियुक्ति की, जिसे 'गुमाष्ठा' (गोमाष्ठा) कहा जाता था। उनके मुख्य कार्य बुनकरों को कर्ज बांटना, करघों की निगरानी करना, तैयार सामान एकत्र करना और कपड़ों की गुणवत्ता की जांच करना था।

बुनकरों पर विनाशकारी प्रभाव:
1। अन्य फिल्मांकन से संपर्क समाप्त: ने कंपनी बुनकरों को रॉ माललाइक में 'पेशेगी' (एग्रीम लोन) दी। जो ऋण स्वीकृत करते थे, वे कानूनी रूप से बंधक हो जाते थे कि वे अपनी सारा तैयार माल केवल कंपनी के गुमाश्ता को ही दे देते थे। वे स्वतंत्र बाज़ार में किसी अन्य व्यापारी को अधिक दाम पर माल नहीं बेच सकते थे।
2. अमानवीय शोषण और शारीरिक संबंध: गुमास्ता बाहरी लोग होते थे संबंध से कोई सामाजिक संबंध नहीं था. वे पुलिस और चपरासी के साथ आये थे। माल की आपूर्ति में जरा सी भी देरी हो रही है पर वे बुनेकरों को बुरी तरह पीटते हैं और सार्वजनिक रूप से कोड लगाए जाते हैं।
3. अटाइलप पारिश्रमिक और कर्ज़ का दुष्चक्र: कंपनी के कपड़ों की जो कीमत थी, वह इतने कम थे कि बुनेकर ने अपना मूल कर्ज़ भी नहीं चुकाया था।
4. विद्रोह और पलायन: इन आंकड़ों से तंग ग्यान बुनकरों ने करघों को तोड़ दिया, पुश्तैनी काम छोड़ दिया और भागकर अन्य प्रांतों में किसान मजदूर बन गए।
उदाहरण 4
19वीं सदी में 'मैनचेस्टर के भारत आगमन' से भारतीय पारंपरिक बुनकरों के सामने कौन सी गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न हुईं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
19वीं सदी के मध्य में जब इंग्लैंड के औद्योगिक शहर मैनचेस्टर से निर्मित सूती वस्त्रों का भारत में बड़े पैमाने पर आयात शुरू हुआ, तो भारतीय पारंपरिक हथकरघाकरों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया:

1. विदेशी कम्युनिस्ट पार्टियों का पतन: ब्रिटिश उत्पाद उद्योग के दबाव में ब्रिटिश संसद ने भारतीय उत्पाद के अधिग्रहण पर भारी सीमा शुल्क (आयात शुल्क) लगाया। इंग्लैण्ड, इंग्लैंड और यूरोप के उद्यमियों से भारतीय वामपंथी व्यापार 33% से 3% रह गया। घरेलु बाजार में मैनचेस्टर का बाढ़: ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में ब्रिटिश व्यापारियों से शुल्क हटा दिया या न्यूनतम रखा। मैनचेस्टर के कारखाने में बड़ी फैक्ट्री बनने वाला कपड़ा भारी सस्ता और चमकीला होता था। भारतीय बुनेकर ने अपने हाथ से बनाए शानदार कपड़े, जिनकी कीमत का मुकाबला नहीं कर पाएंगे। उनका घरेलू बाज़ार भी छिन गया।
3. कच्चे सिक्के का अधिग्रहण (1860 का दशक): 1861 में ब्रिटेन से अमेरिका तक अमेरिकी गृहयुद्ध समाप्त हो गया। ब्रिटिश ने भारत से भारी मात्रा में कच्चे सिक्के ब्रिटेन में खरीदने की शुरुआत की। भारत में कच्चे माल के उत्पादन में इतनी वृद्धि हुई कि बुनकरों की कच्चे माल पर प्रभाव पड़ा।
4. व्यापक भुखमरी और बेकारी: इन दो-तिहरी मार्च से भारत का तीसरा पुराना हथकरघा उद्योग नष्ट हो गया और लाखों कुशल बुंडकर शाहबाज़ार दर-डर भटकने लगे।
उदाहरण 5
प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) ने भारतीय औद्योगिक विकास को किस प्रकार एक अप्रत्याशित बढ़ावा दिया? विस्तार से समझाइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
प्रथम विश्व युद्ध के भारतीय सहयोगियों के लिए एक ऐतिहासिक गौरवशाली उपलब्धि। भारतीय वैज्ञानिकों को निम्नलिखित प्रकार से अपक्षयी गति प्रदान की जाती है:

1। ब्रिटिश आतंकवादियों का अचानक बंद होना:युद्ध में ब्रिटिश सेनाओं ने अपनी पूरी क्षमता के साथ सैन्य साजो-सामान और सामग्री युद्ध के उत्पादन में दिखाया। इंग्लैंड से भारत आने वाले माल का समुद्र तट के करीब हो गया।
2. भारतीय मिलों का घरेलू बाजार पर अधिकार: भारतीय कपड़ा और उपभोक्ता मिलों से आयात बंद होने से उनके ही देश में एक विशाल, खाली बाजार उपलब्ध हो गया, जिसे उन्होंने तुरंत अपने नियंत्रण में ले लिया।
3. विशाल सप्लाई के क्रम: युद्ध के महान खानदान पर ब्रिटिश सरकार ने अपनी सेना की किशाल को पूरा करने के लिए भारतीय भंडारों को बड़े-बैरल युद्ध क्रम दिया-जैसे जूट की बोरियां, सैनिकों की वार्डियां, रेस्तरां, आराम की बूटियां और गरीबों की कटियां।
4. उत्पादन क्षमता का विस्तार: मांग पूरी करने के लिए नए कारखाने गए, पुराने शेयरों में चौबीस घंटे में कई पारियां (शिफ्ट) में काम में तेजी आई और लाखों नए उद्यमियों को रोजगार मिला।
5. स्थानीय उद्योगपतियों की स्थायी पकड़: युद्ध के बाद ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था इतनी ढीली हो गई कि वह अमेरिका और जापान से पिछड़ गई और भारत में अपनी पुरानी श्रेष्ठता फिर से स्थापित नहीं हो पाई। भारतीय उद्योग जगत ने औपनिवेशिक बाजार पर स्थायी रूप से अपना अधिपति जमा लिया।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि औद्योगिकीकरण की शुरुआत केवल कारखानों और विशाल भाप इंजनों के निर्माण से हुई थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

फ़्रांसीसी से पहले भी 'आदि-औद्योगिकीकरण' (प्रोटो-औद्योगिकीकरण) का एक व्यापक दौर था, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए ज़िला में लाखों किसान वॅक्टर्स दस्तों से बड़े पैमाने पर उत्पादन करवाते थे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि 19वीं सदी के ब्रिटेन में उद्योगपति हाथ के मजदूरों को हटाकर केवल मशीनों से ही काम कराते थे।

सही वैज्ञानिक तथ्य

विक्टोरियाई ब्रिटेन में मजदूर बहुत सस्ते थे, कई उद्योग मौसमी थे, और कुलीन वर्ग हाथ से बनी बारीक चीजों को पसंद करता था। इसलिए उद्योगपति मशीनों से ज्यादा हाथ के श्रम को तरजीह देते थे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गुमाश्ता को भारतीय बुनकरों का हितैषी या स्थानीय नेता समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

गुमाश्ता ईस्ट इंडिया कंपनी का एक वेतनभोगी दमनकारी एजेंट था, जो बुनकरों पर नजर रखता था, उनका शोषण करता था और देर होने पर उन्हें शारीरिक दंड देता था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भारत की पहली सूती कपड़ा मिल को 1854 में कलकत्ता में स्थापित मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

भारत की पहली सफल सूती कपड़ा मिल 1854 में बंबई (मुंबई) में कावासजी नानाभाई डाबर द्वारा लगाई गई थी। 1855 में रिशरा (बंगाल) में पहली जूट मिल लगी थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

स्पिनिंग जेनी मशीन को भाप से चलने वाला इंजन समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

स्पिनिंग जेनी (1764) जेम्स हारग्रीव्स द्वारा बनाई गई हाथ से चलने वाली सूत कातने की मशीन थी, जिसमें एक पहिया घुमाने से एक साथ कई तकलियाँ घूमती थीं।

औद्योगिकीकरण का विकास क्रम: आदि-उद्योग से आधुनिक कारखानों तक

औद्योगिकीकरण का युग: आदि-औद्योगीकरण, भारतीय बुनकर व युद्धकालीन उछाल1. आदि-औद्योगिकीकरणकारखानों से पूर्व देहाती उत्पादन• सौदागरों का गांवों में प्रवेश• शहरी गिल्ड्स का एकाधिकार• स्टैपलर, कताई, बुनाई व रंगाई• लंदन: फिनिशिंग सेंटर• रिचर्ड आर्कराइट: सूती मिल• विक्टोरियाई ब्रिटेन: हाथ का श्रमसस्ता; मौसमी काम; बारीक डिजाइन• 1764 स्पिनिंग जेनी विरोध2. भारतीय बुनकर व संकटगुमाश्ता व मैनचेस्टर आगमन• सूरत व हुगली पुराने बंदरगाह ढहे• बंबई व कलकत्ता नए केंद्र बने• गुमाश्ता का क्रूर नियंत्रण:अग्रिम पेशगी, कोड़े, बुनकर पलायन• मैनचेस्टर का भारत आगमन:निर्यात ढहा (33% से 3%), सस्ता कपड़ा• 1861 अमेरिकी गृहयुद्ध:कपास निर्यात से स्थानीय अकाल3. भारतीय उद्योग व युद्धमिलों का उदय व नया बाजार• 1854 बंबई: पहली सूती मिल• 1855 रिशरा: पहली जूट मिल• उद्यमी: टैगोर, टाटा, बिड़ला• जॉबर द्वारा मजदूरों की भर्ती• 1914-18 प्रथम विश्व युद्ध:ब्रिटिश आयात बंद; सैन्य ऑर्डर;भारतीय मिलों का अभूतपूर्व उछाल• विज्ञापन, कैलेंडर व देवी-देवताबोर्ड परीक्षा के प्रमुख संप्रत्यय (Key Examination Takeaways)गुमाश्ता (Gomastha):ईस्ट इंडिया कंपनी का वेतनभोगी एजेंट; बुनकरों पर कठोर नियंत्रण, पेशगी ऋण और उत्पीड़न।मैनचेस्टर का संकट:सस्ते मशीनी कपड़ों से भारतीय घरेलू बाजार पटा और हथकरघा बुनकरों की आजीविका नष्ट हुई।प्रथम विश्व युद्ध प्रभाव:ब्रिटिश आयातों में गिरावट से भारतीय मिलों को घरेलू व सैन्य मांग पूरी कर भारी लाभ मिला।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
आदि-औद्योगिकीकरण (प्रोटो-औद्योगिकीकरण) से पहले के दौर में अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार ग्रामीण परिवारों द्वारा उत्पादित किया गया था।
मुख्य बिंदु 2
शहरी गिल्ड्स के व्यापारिक एकाधिकार के कारण सौदागरों ने देहातों का रुख किया और किसानों को अग्रिम पेशगी देकर ऊन व कपड़े का उत्पादन कराया।
मुख्य बिंदु 3
लंदन को 'फिनिशिंग सेंटर' कहा जाता था क्योंकि देहातों में बुने गए कपड़ों की अंतिम छंटाई और फिनिशिंग केवल लंदन में होती थी।
मुख्य बिंदु 4
विक्टोरियाई ब्रिटेन में श्रमिकों की प्रचुरता, सस्ते श्रम, मौसमी उद्योगों और कुलीन वर्ग द्वारा हाथ से बनी अनूठी चीजों की पसंद के कारण उद्योगपति मशीनों पर हाथ के श्रम को तरजीह देते थे।
मुख्य बिंदु 5
1764 में जेम्स हारग्रीव्स द्वारा आविष्कृत स्पिनिंग जेनी मशीन पर कताई करने वाली महिलाओं ने बेरोजगारी के डर से हिंसक हमले किए।
मुख्य बिंदु 6
ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय कपड़ा व्यापार पर एकाधिकार जमाने के लिए 'गुमाश्ता' (वेतनभोगी एजेंट) नियुक्त किए, जिन्होंने पेशगी व्यवस्था के जरिए बुनकरों को कंगाल बना दिया।
मुख्य बिंदु 7
19वीं सदी में मैनचेस्टर के सस्ते मशीनी वस्त्रों के भारत आगमन ने भारतीय निर्यात को नष्ट कर दिया और स्थानीय बुनकरों को भुखमरी के कगार पर ला दिया।
मुख्य बिंदु 8
भारत में पहली सफल सूती कपड़ा मिल 1854 में बंबई में और पहली जूट मिल 1855 में रिशरा (बंगाल) में स्थापित की गई।
मुख्य बिंदु 9
द्वारकानाथ टैगोर, जमशेदजी टाटा, सेठ हुकुमचंद और जी.डी. बिड़ला ने औपनिवेशिक भेदभाव के बावजूद भारतीय उद्योगों की मजबूत नींव रखी।
मुख्य बिंदु 10
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश आयात ठप होने और भारी सैन्य ऑर्डर मिलने से भारतीय उद्योगों का अप्रत्याशित विस्तार हुआ; विज्ञापनों व कैलेंडरों ने नया बाजार रचा।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
आदि-औद्योगिकीकरण (प्रोटो-औद्योगिकीकरण) क्या है और शहरों के बजाय व्यापारियों ने इसका रुख क्यों किया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: कारखानों की स्थापना से पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार हेतु देहातों में होने वाले बड़े पैमाने के उत्पादन को आदि-औद्योगिकीकरण कहते हैं। शहरों में शक्तिशाली गिल्ड्स के एकाधिकार और नियमों के कारण नए व्यापारियों को काम करने की अनुमति नहीं थी, इसलिए सौदागरों ने गांवों का रुख किया।
2
विक्टोरियाई ब्रिटेन में उद्योगपति मशीनों की तुलना में हाथ के श्रम को क्यों प्राथमिकता देते थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि ब्रिटेन में सस्ते मानवीय श्रम की प्रचुरता थी, कई उद्योग केवल कुछ महीनों (मौसमी) के लिए चलते थे, मशीनें बहुत महंगी व जल्दी खराब होने वाली थीं, और अमीर वर्ग हाथ से बनी परिष्कृत व अद्वितीय चीजों को पसंद करता था।
3
ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा नियुक्त 'गुमाश्ता' कौन था और उसका बुनकरों के साथ क्या संबंध था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: गुमाश्ता कंपनी का एक वेतनभोगी कर्मचारी था जो बुनकरों पर नजर रखता था, कच्चा माल खरीदने हेतु कर्ज देता था और कपड़ा इकट्ठा करता था। उसका व्यवहार अत्यंत क्रूर और दमनकारी था; वह देरी होने पर बुनकरों को कोड़ों से पिटवाता था।
4
1860 के दशक में भारतीय बुनकरों के सामने कच्चे कपास का गंभीर संकट क्यों पैदा हुआ?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 1861 में अमेरिकी गृहयुद्ध शुरू होने से ब्रिटेन को अमेरिका से कपास मिलना बंद हो गया। अंग्रेजों ने अपनी मिलों के लिए भारत से भारी मात्रा में कच्चा कपास मंगाना शुरू किया, जिससे भारत में कपास की कीमतें अत्यधिक बढ़ गईं और भारतीय बुनकरों को कच्चा माल मिलना असंभव हो गया।
5
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय उद्योगों का तेजी से विकास क्यों हुआ?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि ब्रिटिश कारखाने युद्ध सामग्री बनाने में व्यस्त हो गए और इंग्लैंड से भारत आने वाला आयात बंद हो गया। भारतीय मिलों को घरेलू बाजार पर एकाधिकार मिला और सेना के लिए वर्दी, टेंट व बोरियां बनाने के भारी सरकारी ऑर्डर मिले।
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