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NIOS • कक्षा X • Social Science (213) • अध्याय 24
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

राष्ट्रीय एकीकरण एवं धर्मनिरपेक्षता (National Integration & Secularism)

राष्ट्रीय एकता और धर्मनिरपेक्षता के लिए व्यापक अध्ययन सामग्री और अध्याय नोट्स, एनआईओएस माध्यमिक (कक्षा 10) सामाजिक विज्ञान (213) के लिए व्यवस्थित रूप से तैयार किए गए। नवीनतम नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग पाठ्यक्रम के अनुरूप, यह गाइड मुख्य सैद्धांतिक अवधारणाओं, ऐतिहासिक कालक्रम, भौगोलिक विश्लेषण, संवैधानिक सिद्धांतों, ट्यूटर मार्क्ड असाइनमेंट (टीएमए) दिशानिर्देशों और सार्वजनिक परीक्षा में महारत पर जोर देती है।

घर में चाय बनाने वाली मां को कोई वेतन नहीं, पर उसी काम के लिए होटल के पुरुष रसोइए को हजारों रुपये क्यों?

हमारे घरों में माताएं और बहनें सुबह 5 बजे से रात 11 बजे तक बिना रुके काम करती हैं—खाना बनाना, झाड़ू-पोछा, बर्तन, बच्चों की देखभाल। लेकिन जब कोई पूछता है कि 'वे क्या करती हैं?' तो अक्सर जवाब मिलता है—'वे कुछ नहीं करतीं, बस घर संभालती हैं!' परंतु जब इसी खाना पकाने का काम किसी बड़े होटल में किया जाता है, तो वहाँ पुरुष शेफ को लाखों रुपये का पैकेज मिलता है! यह जैविक अंतर नहीं, बल्कि समाज द्वारा थोपा गया 'श्रम का लैंगिक विभाजन' है। यही स्थिति हमारे समाज में धर्म और जाति के साथ भी है। आइए जानें कि कैसे राजनीति इन तीन दीवारों को तोड़कर समाज में समानता ला सकती है!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

एनआईओएस और एनआईओएस कक्षा 10वीं बोर्ड परीक्षा में 'जाति, धर्म और भाषाई मुद्दे' नागरिक शास्त्र का सबसे महत्वपूर्ण विचार और महत्वपूर्ण अध्याय है। श्रम का लैंगिक विभाजन और महिलाओं के साथ भेदभाव के चार प्रमुख आयाम, राजनीति में महिलाओं की प्रतिनिधित्व स्थिति (संसद बनाम स्थानीय निकाय), सांप्रदायिकता (सांप्रदायिकता) की परिभाषा और इसकी राजनीति में अलग-अलग रूप, भारतीय संविधान के मूल स्वरूप को सिद्ध करने वाले चार संवैधानिक सिद्धांत, तथा 'राजनीति में जाति' और 'जाति के अंदर की राजनीति' (केवल जाति चुनाव ही क्या हो सकता है?) पर 3 से 5 व्याख्यात्मक प्रश्न अनिवार्य रूप से बताए गए हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • लिंग (स्त्री-पुरुष), धर्म और जाति के सामाजिक भेदों की सामान्य समझ।
  • समानता के अधिकार और मौलिक अधिकारों की बुनियादी जानकारी।
  • चुनावों में वोट बैंक और राजनीतिक दलों के प्रचार से सामान्य परिचय।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • श्रम के लैंगिक विभाजन और पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के साथ होने वाले विभिन्न भेदभावों का परीक्षण करना।
  • महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण (पंचायती राज में 1/3 आरक्षण एवं 33% महिला आरक्षण विधेयक) के महत्व का मूल्यांकन करना।
  • सांप्रदायिकता की अवधारणा, इसके खतरों और भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष प्रावधानों की व्याख्या करना।
  • राजनीति में जाति की भूमिका (उम्मीदवार चयन, वोट बैंक) और उसकी सीमाओं (केवल जाति से चुनाव न जीतना) का विश्लेषण करना।
  • राजनीति द्वारा जाति व्यवस्था के रूपांतरण और गरीबों के समुदाय (दलित और ओबीसी) को मिले समर्थन।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. लैंगिक मसले और राजनीति: श्रम का...
2 2. महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व...
3 3. धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति:...
4 4. राजनीति में जाति (Caste in Capit...
5 5. जाति के भीतर की राजनीति (जाति सं...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. लैंगिक मसले और राजनीति: श्रम का विभाजन एवं पितृसत्ता

1.1 श्रम कांगिक प्रभाग (श्रम का यौन विभाजन)

परिभाषा: काम के गरीबी का वह स्थान जिसमें घर के अंदर सारा काम (खाना बनाना, सफाई करना, कपड़े धोने का सामान, बच्चों की देखभाल) की महिलाएं काम करती हैं या अपनी फर्म में घरेलू नौकरानियां करती हैं, जबकि पुरुष घर के बाहर पैसे कमाने वाले होते हैं हैं।

जैविक बनाम सामाजिक आधार: यह श्रमविभाजन किसी प्राकृतिक या जैविक अंतर पर आधारित नहीं है, बल्कि यह केवल सामाजिक आवश्यकताओं और रुधिवादिता की मांद है। जब घरेलू उद्यम पैसे के साथ मिलते हैं तो पुरुष भी खुशी-खुशी करते हैं। सोसायटी) है, जिसमें पुरुषों का गौण स्थान और स्त्रियों का गौण स्थान होता है। महिलाओं के साथ भेदभाव सैद्धांतिक सैद्धांतिक में दिखता है:

  • 1. महिलाओं में यह 54% है जबकि पुरुषों में यह 76% है। माता-पिता बच्चों की उच्च शिक्षा पर खर्च करते हैं लेकिन स्कूल की पढ़ाई के बाद घर ले जाते हैं।
  • 2। उच्च वेतन वाले वेतनमान पर ध्यान दें: भारत में औसत एक महिला एक पुरुष की तुलना में प्रतिदिन एक घंटा अधिक काम करती है, फिर भी उच्च वेतन और वेतनमान वाले वेतनमान पर महिलाओं का प्रतिशत प्रतिशत है।
  • 3. समान पारिश्रमिक अधिनियम (समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976) की स्थापना: कानून में समान काम के लिए समान वेतन अनिवार्य है, फिर भी खेल, सिनेमा, कृषि और निर्माण क्षेत्रों में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम वेतन दिया जाता है।
  • 4. बाल लिंगानुपात एवं कन्या भ्रूण हत्या: पुत्र की चाहत में लिंग परीक्षण गर्भ में ही हत्या कर दी जाती है। इसके कारण देश का बाल लिंगानुपात (लिंग अनुपात) जनसंख्या प्रति 1,000 बच्चों पर मात्र 919 लड़कियां रह गया है (पंजाब वरिया के कई लिंगानुपात में यह 850 से भी कम है)।
  • 5. घरेलू हिंसा और असुरक्षा: महिलाओं का घर के अंदर और बाहर परामर्श, शारीरिक, मानसिक निरीक्षण और यौन शोषण आम बात है।

2. महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व एवं महिला आरक्षण कानून

2.1 राजनीति में महिलाओं की नई भागीदारी

महिलाओं की समस्याएं के स्थायी समाधान उन्हें कानून बनाने वाली ताकत (संसद व विधानसभाओं) में स्वायत्तता समर्थन की आवश्यकता है:

संस्था का स्तरमहिलाओं का वर्तमान प्रतिनिधित्वसंवैधानिक स्थिति / नवीन
लोकसभा एवं सर्वेक्षणलोकसभा में महिला सदन की सीट 14.4% (2019 चुनाव) है।संसद ने ऐतिहासिक 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (128वाँ संविधान संशोधन) पारितोषिक और राज्य विधानसभाओं में 33% महिलाओं के लिए दर्शन करने का कानून बनाया है।
विधान सभाओं में भी 33% नीतिगत लागू होने से स्थिति में क्रांतिकारी सुधार होगा। (पंचायती राज)देश भर में 14 लाख से अधिक जापानी महिलाएं मुखिया, सरपंच, ब्लॉक प्रमुख और मेयर के नाम पर। ऑस्ट्रेलिया की यात्रा (झारखंड और बिहार में यह 50% है)।

3. धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति: सेक्युलर राज्य की अनिवार्यता

3.1 धर्म और राजनीति: गांधीजी का दृष्टिकोण

महात्मा गांधी कहा करते थे कि 'धर्म को कभी राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता।' गांधीजी का धर्म से तात्पर्य किसी विशेष कर्मकांड या संप्रदाय (हिंदू या इस्लाम) से नहीं था, बल्कि उनका आशय नैतिक मूल्यों और सार्वभौमिक मानवीय आचार संहिता से था जो सभी धर्मों में समान हैं। उनका मानना था कि राजनीति को धर्म द्वारा प्रस्तुत इन्हीं नैतिक मूल्यों से निर्देशित होना चाहिए।

3.2 सांप्रदायिकता (Communalism) की समस्या एवं राजनीति में इसके रूप

सांप्रदायिकता क्या है?
जब धर्म को राष्ट्र की पहचान और राजनीति का मुख्य आधार मान लिया जाता है, और जब एक धर्म के अनुयायियों के हितों को दूसरे धर्म के अनुयायियों के विरुद्ध खड़ा किया जाता है, तो इसे 'सांप्रदायिकता' कहते हैं। इसमें यह कट्टर सोच शामिल होती है कि एक धर्म को मानने वाले सभी लोगों के सामाजिक व राजनीतिक हित बिल्कुल एक जैसे होते हैं और अलग धर्म के लोग एक समुदाय के रूप में शांति से नहीं रह सकते。

राजनीति में सांप्रदायिकता निम्नलिखित रूप धारण करती है:

  1. दैनिक पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता: अपने धर्म को स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठ मानना और दूसरे धर्मों के अनुयायियों के प्रति मन में संदेह, पूर्वाग्रह और घृणा पालना।
  2. राजनीतिक गोलबंदी (Mobilisation): चुनावों में वोट बटोरने के लिए धर्म के पवित्र प्रतीकों, धार्मिक नारों, भावनात्मक अपीलों और धर्मगुरुओं का खुला दुरुपयोग करना।
  3. सांप्रदायिक हिंसा, दंगे और नरसंहार: सांप्रदायिकता का सबसे भयानक और वीभत्स रूप सांप्रदायिक दंगे हैं। भारत ने 1947 के विभाजन के समय लाखों बेकसूर लोगों का खूनी नरसंहार झेला है और स्वतंत्रता के बाद भी कई बड़े सांप्रदायिक दंगे देखे हैं।

3.3 भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य (Secular State): संवैधानिक प्रावधान

सांप्रदायिकता की चुनौती से निपटने के लिए हमारे संविधान निर्माताओं ने 'धर्मनिरपेक्ष राज्य' का मॉडल चुना:

भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के चार मुख्य संवैधानिक आधार:
1. कोई आधिकारिक राज्य धर्म नहीं: भारत का अपना कोई आधिकारिक राजकीय धर्म नहीं है (श्रीलंका के बौद्ध, पाकिस्तान के इस्लाम, और इंग्लैंड के ईसाई धर्म के विपरीत)। भारत सरकार सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखती है。
2. धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 25-28): संविधान प्रत्येक नागरिक को किसी भी धर्म को मानने, उसका आचरण करने और उसका शांतिपूर्ण प्रचार करने की पूरी स्वतंत्रता देता है。
3. धर्म के आधार पर भेदभाव का निषेध (अनुच्छेद 15): राज्य किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म के आधार पर सार्वजनिक नौकरियों, शिक्षण संस्थानों या सुविधाओं में कोई भेदभाव नहीं कर सकता raw。
4. सामाजिक सुधार हेतु हस्तक्षेप की अनुमति: संविधान धार्मिक समानता और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए राज्य को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार देता है (जैसे संविधान ने हिंदुओं में छुआछूत / अस्पृश्यता को पूरी तरह समाप्त कर दिया)।

4. राजनीति में जाति (Caste in Capital): गुणांक एवं भिन्नता

4.1 जातिगत असाध्य और आधुनिक परिवर्तन

जाति व्यवस्था केवल भारत में पाई जाने वाली श्रमिक व्यवस्था की एक अत्यंत कठोर, वंशानुगत और शोषणकारी व्यवस्था बनी हुई है। न केवल काम का विभाजन था, बल्कि काम करने वालों का भी ऊंच-नीच के विस्तार पर विभाजन था (वर्ण व्यवस्था और बंदछूट)। भीमराव अम्बेडकर, पेरियार ई.वी. रामास्वामी का संघर्ष; गति शहरीकरण, औद्योगिक का प्रकाशन और व्यावसायिक प्रतिभा (व्यावसायिक गतिशीलता)।

4.2 राजनीति में जाति के रूप में और ही योगदान

पार्टियाँ स्थायी तय करती हैं, जाति के नाम पर वोट मिलते हैं और कलाकारों में कलाकारों को दिखाया जाता है। इसका अकाट्य प्रमाण:
1. किसी भी क्षेत्र में एक जाति का स्पष्ट बहुमत नहीं: दावेदारों के लिए अन्य सभी कलाकारों और ताकतों का समर्थन पाना ही मौजूद है。
2. एक ही जाति के कई मुद्दे:चुनाव में अक्सर एक ही जाति के कई वोट बन जाते हैं जिससे उस जाति के वोट बंट जाते हैं。
3. सत्तारूढ़ आश्रम और आश्रमों की पराजय: यदि केवल जाति ही चलती है तो 50% समाजवादी-विधायक चुनाव न हारते; सार्वजनिक कार्य और विकास दर्शक वोट वोट है।

5. जाति के भीतर की राजनीति (जाति संवर्धन में राजनीति): एवं रूपांतरण

5.1 राजनीति द्वारा जाति का रूपांतरण

राजनीति ने केवल जाति का उपयोग नहीं किया, बल्कि राजनीति ने स्वयं जाति व्यवस्था को बदल कर रख दिया है:

  • प्रत्येक जाति समुदाय को बड़ा बनाने के लिए पहले अपनी से अलग समझी जाने वाली उप-जातियों को अपने साथ जोड़ा लगी है।
  • विभिन्न जातियों के साथ गठबंधन और संवाद करने लगी। हासिल करने और छीने गए आत्मसम्मान को वापस पाने का ऐतिहासिक मंच दिया गया है।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

श्रम का लैंगिक विभाजन
घर के सारे काम महिलाओं द्वारा और बाहर के आय वाले काम पुरुषों द्वारा करना।
पितृसत्तात्मक समाज
पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था जिसमें महिलाओं को गौण व अधीनस्थ स्थान मिलता है।
साक्षरता लिंग भेद
भारत में पुरुष साक्षरता 76% बनाम महिला साक्षरता मात्र 54%।
समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976
समान कार्य के लिए स्त्री व पुरुष दोनों को समान पारिश्रमिक देने का कानून।
बाल लिंगानुपात (919)
प्रति 1,000 बालकों पर 919 बालिकाएं; कन्या भ्रूण हत्या का चिंताजनक संकेत।
संसद में महिला आरक्षण (33%)
नारी शक्ति वंदन अधिनियम द्वारा लोकसभा व विधानसभाओं में 33% सीटें आरक्षित।
गांधीजी का धर्म विचार
धर्म को राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता; धर्म का अर्थ 'नैतिक मूल्य' है।
साम्प्रदायिकता (साम्प्रदायिकता)
धर्म को राष्ट्र व राजनीति का आधार मानकर दूसरे धर्मों के विरुद्ध खड़ा करना।
अंतिम राज्य (धर्मनिरपेक्ष)
कोई राजकीय धर्म नहीं; सभी को अंतःकरण व धार्मिक आचरण की पूर्ण समानता।
जाति सुधारक नायक
ज्योतिबा फुले, महात्मा गांधी, डॉ. बी.आर. आंबेडकर, पेरियार रामास्वामी।
व्यावसायिक गतिशीलता
पुरानी पैतृक जातिगत पेशा व्यवस्था को छोड़कर नई नौकरियों और व्यवसायों को अपनाना।
जाति सीमाओं का सच
किसी भी सीट पर एक जाति का बहुमत नहीं; केवल जाति से चुनाव जीतना असंभव।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
'श्रम के लैंगिक डिविजन' (श्रम का लैंगिक विभाजन) से क्या ट्रांसफार्मर है? भारतीय समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव दर्शन वाले किन्हीं चार सिद्धांत की व्याख्या।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
श्रम का आंगिकविभाजन:
यह समाज में काम के कमरे की व्यवस्था है जिसमें घर के अंदर के सभी काम-जैसे भोजन पकाना, कपड़े पहनना, साफ-सफाई और बच्चों का पालन-पोषण-महिलाओं के जिम्मे मन जाते हैं, जबकि घर के बाहर रहने वाले पुरुषों का काम माना जाता है। यह कोई जैविक विभाजन नहीं बल्कि पुरुष-प्रधान विचारधारा का परिणाम है。

महिलाओं के साथ भेदभाव के चार मुख्य सिद्धांत:
1. साक्षरता दर में भारी अंतर: भारत में महिलाओं की प्राकृतिक दर 54% है जबकि पुरुषों की 76% है। लेवल स्कूल पर ही पढ़ाई छोड़ने वाली लड़कियों की संख्या बहुत अधिक है क्योंकि परिवार को छात्रों की पढ़ाई पर सीखना पसंद है।
2. वेतन और मंडी में ताला: समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 लागू होने के बावजूद निर्माण कार्य, कृषि और फिल्मों तक में महिलाओं को एक ही काम के लिए पुरुषों से कम मजदूरी दी जाती है।
3. कन्या भ्रूणहत्या एवं घटता लिंगानुपात: पुत्र-मोह के कारण आधुनिक तकनीक का दुरुपयोग कर अजन्मी बच्चों को गर्भ में ही मार दिया जाता है, क्योंकि देश का बाल लिंगानुपात प्रतिभा 919 (प्रति 1,000 बालक) रह गया है।
4. राजनीतिक प्रतिनिधित्व का घोर अभाव: स्वतंत्रता के सात दशकों बाद भी संसद (लोकसभा) में महिला कलाकारों की संख्या 14% तक पहुँच गयी है, और राज्य विधानसभाओं में यह 5% से भी कम है।
उदाहरण 2
साम्प्रदायिकता (सांप्रदायिकता) से क्या अभिप्राय है? राजनीति में सांप्रदायिकता किन-किन सिद्धांतों में अभिव्यक्त होती है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
संप्रदायिकता का अर्थ:
संप्रदायिकता एक ऐसा सिद्धांत और आक्रामक राजनीतिक सिद्धांत है जो धर्म को ही समुदाय और राष्ट्र की पहचान का एकमात्र आधार मानता है। ऐसा माना जाता है कि इसमें एक धर्म के सभी राक्षसों के हित समान हैं और दूसरे धर्म के संतों के हित उनके विरोधी और शत्रुतापूर्ण हैं। दैनिक जीवन के दृष्टिकोण: दूसरे धर्म के बारे में लोग अपने मन में रूढ़िवादी धारणाएं और पूर्वाग्रह बनाते हैं और अपने धर्म को श्रेष्ठ और दूसरे को हीन मान्यता देते हैं।
2. राजनीतिक लामबंदी (राजनीतिक लामबंदी): धार्मिक प्रतीकों, झंडों, वैज्ञानिक नारों और पूजनीय धर्मगुरुओं का उपयोग करके राजनीतिक अधर्म में जीत हासिल करना, धर्म के आधार पर ध्रुवीकृत करना।
3. बहुसंख्यकवाद की स्थापना: जब बहुसंख्यक धर्म के लोग अपनी जनसंख्या के बल पर देश की सत्ता पर एकाधिकार स्थापित करने और अल्पसंख्यकों के अधिकार को हासिल करने का प्रयास करते हैं (जैसे श्रीलंका में हुआ)।
4. सांप्रदायिक हिंसा और दंगे: सांप्रदायिकता जब उग्र रूप धारण करती है तो यह दंगा, नरसंहार और उग्रता में बदल जाती है (जैसे 1947 के विभाजन के भयंकर दंगे)।
उदाहरण 3
भारतीय संविधान एक 'धर्मनिरपेक्ष राज्य' (धर्मनिरपेक्ष राज्य) की स्थापना करता है। इस कथन के समर्थन में चार संवैधानिक संवैधानिक उल्लेख शामिल हैं।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भारत के संविधान ने देश की धार्मिक विविधता और अखंडता की रक्षा के लिए संविधान का मूल ढांचा बनाया। इसके चार प्रमुख संवैधानिक प्रोविज़ निम्न हैं:

1. कोई आधिकारिक राज्य धर्म नहीं: भारतीय संविधान में किसी भी एक धर्म को 'राजकीय धर्म' घोषित नहीं किया गया है। सरकार सभी धर्मों से समान दूरी बनाती है और सभी के प्रति समभाव बनाती है।
2। धार्मिक स्वतंत्रता का मूल अधिकार (अनुच्छेद 25): संविधान देश के प्रत्येक नागरिक को किसी भी धर्म को अपनी अंतरात्मा से संतुष्ट करने, उसकी शांति को अनैतिक आचरण करने और उसका प्रचार-प्रसार करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करता है।
3. धर्म के आधार पर भेदभाव पर पूर्ण प्रतिबंध (अनुच्छेद 15): राज्य द्वारा सार्वजनिक रोजगार, शैक्षणिक ग्रंथों और सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता है।
4. धार्मिक कुरितियों के विरोध में हस्तक्षेप की मात्रा: संविधान धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर मानवाधिकार के हनान की मात्रा नहीं देता है। राज्य को समाज सुधार और सद्भाव सुनिश्चित करने के लिए धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार है; उदाहरणार्थ, संविधान के सूत्र 17 द्वारा हिन्दुस्तान में स्थापित अपराध (अस्पृश्यता) को कानूनी अपराध घोषित किया गया।
उदाहरण 4
भारतीय राजनीति में 'जाति' की भूमिका का परीक्षण। केवल जातिगत गुणांक के आधार पर भारत में कोई चुनाव कैसे जीता जा सकता है? तर्क उत्तर सहित दें।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
राजनीति में जाति की भूमिका:
1. प्रतिस्पर्धी उम्मीदवार समय उस जाति का वोट बैंक हासिल हो सके। चुनावी प्रचार में सुपरस्टार की अस्मिता और सम्मान के नाम पर वोट मांगा जाता है।
3. सरकार के गठन में सभी प्रमुख राष्ट्रीयताओं के नेताओं को मंत्री जातीय संतुलन के आधार पर जाना जाता है। किसी एक जाति पर किसी सीट पर बहुमत नहीं: किसी देश की किसी भी जाति या सीट पर किसी एक जाति का बहुमत नहीं होता कि वह अपने दम पर दावेदारी को जिता सके। जीतने के लिए अन्य दिग्गजों का समर्थन लेना ही है।
2. एक ही जाति के कई दावेदार: सभी बेरोजगारी में एक ही जाति के दावेदार उभरते हैं जिससे अलग-अलग जातियां अधिक होती हैं। इस प्रकार उस जाति का वोट बंट जाता है और निर्णय गैर-जाति पुस्तकालय के हाथ में आ जाता है।
3. सत्तारूढ़ दल और नामांकन की पराजय: यदि केवल जाति ही चलती तो स्थानी कभी दल चुनाव न हारते। भारत में हर चुनाव में जनता सरकार के कार्य, विविधता, रोजगार और विकास (प्रदर्शन) को देखने वाले वोट वोट मिलते हैं, इसलिए 50% समाजवादी-विधायक चुनाव हार जाते हैं।
उदाहरण 5
लोकतांत्रिक राजनीति ने भारत में 'जाति व्यवस्था' (जाति व्यवस्था) को किस प्रकार प्रभावित और रूपांतरित किया है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
राजनीति केवल जाति से प्रभावित नहीं होती, बल्कि राजनीति ने स्वयं जाति व्यवस्था के स्वरूप को अंदर से बदल दिया है:

1. जातियों का व्यापक संगठन: चुनाव में संख्या बल का महत्व देखकर हर जाति अपने को बड़ा बनाने का प्रयास करती है। इसके लिए वह अपने से जुड़ी छोटी-छोटी उप-जातियों को अपने ग्रुप में शामिल कर सकती है।
2. जातियों के बीच राजनीतिक गठबंधन: सत्ता हासिल करने के लिए अलग-अलग जातियां एकजुट होकर सामने आती हैं; जैसे 'अगली पार्टियों का गठबंधन', 'दलित-पिछड़ा गठबंधन' या 'जाति और अल्पसंख्यक मोर्चा'।
3. आदिवासी (दलित), समुदाय (आदिवासी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को लोकतांत्रिक राजनीति में 'एक व्यक्ति, एक वोट' के सिद्धांत ने दबे-कुचले से जोड़ा। राजनीति के बल पर ही वे अपने आत्मसम्मान, जमीन, समानता और सत्ता की मांग में सफल हुए हैं।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

श्रम के लैंगिक विभाजन को स्त्रियों की प्राकृतिक कमजोरी मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

श्रम का लैंगिक विभाजन कोई प्राकृतिक या जैविक नियम नहीं है; यह पुरुष-प्रधान समाज द्वारा थोपी गई एक सामाजिक रूढ़िवादिता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गांधीजी के 'धर्म और राजनीति' के विचार को सांप्रदायिक समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

गांधीजी का धर्म से तात्पर्य हिंदू या इस्लाम से नहीं था, बल्कि सभी धर्मों के साझा 'नैतिक और मानवीय मूल्यों' से था जो राजनीति को शुद्ध करते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भारत में किसी धर्म को अल्पसंख्यकों पर भारी मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है जहाँ किसी भी धर्म को आधिकारिक मान्यता नहीं है और संविधान सभी धर्मों को पूर्णतः समान दर्जा देता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह निष्कर्ष निकालना कि भारतीय राजनीति में केवल जाति ही सब कुछ तय करती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

जाति एक कारक है, परंतु अकेले जाति से चुनाव नहीं जीता जा सकता; जनता आर्थिक विकास, महंगाई, उम्मीदवार की छवि और सुशासन को देखकर वोट देती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

संसद में महिला आरक्षण को 50% लिख देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

संसद और विधानसभाओं के लिए 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' में 33% आरक्षण का प्रावधान है (यद्यपि कुछ राज्यों के पंचायती राज में 50% है)।

जाति, धर्म और लैंगिक मसले: पितृसत्ता, सांप्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता व जाति सीमाएं

जाति, धर्म और लैंगिक मसले: पितृसत्ता, धर्मनिरपेक्ष राज्य एवं जाति-राजनीति1. लैंगिक मसले व पितृसत्ताश्रम का लैंगिक विभाजन• घरेलू काम महिलाओं के जिम्मे• भेदभाव के 4 रूप:1. साक्षरता: पुरुष 76% vs महिला 54%2. समान कार्य पर कम पारिश्रमिक3. बाल लिंगानुपात 919 (कन्या भ्रूण हत्या)4. घरेलू हिंसा व असुरक्षा• नारी शक्ति वंदन अधिनियम:संसद व विधानसभाओं में 33% आरक्षण• पंचायत: 14 लाख+ निर्वाचित महिलाएं2. धर्म व धर्मनिरपेक्ष राज्यसांप्रदायिकता से मुक्ति• गांधीजी: धर्म = साझा नैतिक मूल्य• सांप्रदायिकता के 3 रूप:पूर्वाग्रह, वोट गोलबंदी, वीभत्स दंगे• धर्मनिरपेक्ष राज्य (Secular):1. कोई राजकीय धर्म नहीं2. अंतःकरण की पूर्ण स्वतंत्रता (अनु. 25)3. धर्म के आधार पर भेदभाव निषेध4. सुधार हेतु हस्तक्षेप (छुआछूत रोक)• सभी धर्मों का समान आदर3. जाति और राजनीतिसमीकरण, सीमाएं व मुक्ति• ज्योतिबा फुले, गांधी, आंबेडकर संघर्ष• केवल जाति से जीत असंभव:1. किसी सीट पर एक जाति का बहुमत नहीं2. एक ही जाति के कई प्रत्याशी3. 50% मौजूदा सांसद-विधायक हारते हैं• जाति के अंदर राजनीति:उप-जातियों का विलय व बड़े मोर्चे• दलित, आदिवासी व OBC सशक्तीकरणबोर्ड परीक्षा के प्रमुख संप्रत्यय (Golden Social Issues Capsule)महिला आरक्षण (33%):नारी शक्ति वंदन अधिनियम द्वारा संसद व विधानसभाओं में 33% सीटों का आरक्षण।धर्मनिरपेक्ष राज्य:कोई राजकीय धर्म नहीं; सभी को धार्मिक स्वतंत्रता व समानता; छुआछूत पर संवैधानिक रोक।जाति सीमाएं व लोकतंत्र:केवल जाति से चुनाव नहीं जीत सकते; सुशासन, विकास व कार्य-प्रदर्शन निर्णायक।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
श्रम का लैंगिक विभाजन जैविक नहीं, बल्कि पुरुष-प्रधान समाज द्वारा थोपा गया सामाजिक बंटवारा है।
मुख्य बिंदु 2
महिलाओं के साथ मारपीट (54% बनाम 76%), वेतन, कन्या भ्रूण हत्या (बाल लिंगानुपात 919) और राजनीति में गहरा भेदभाव होता है।
मुख्य बिंदु 3
पंचायती राज में 1/3 आरक्षण से 14 लाख से अधिक महिलाएं चुनी गईं; नारी शक्ति वंदन अधिनियम संसद में 33% महिला आरक्षण देता है।
मुख्य बिंदु 4
गांधीजी के अनुसार धर्म का अर्थ साझा 'नैतिक मूल्य' है जो राजनीति को दिशा देते हैं।
मुख्य बिंदु 5
सांप्रदायिकता धर्म को राष्ट्र और राजनीति का आधार मानकर दूसरे धर्मों के विरुद्ध घृणा, ध्रुवीकरण और दंगे भड़काती है।
मुख्य बिंदु 6
भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है: कोई राजकीय धर्म नहीं, अंतःकरण की पूर्ण स्वतंत्रता और धर्म आधारित भेदभाव पर प्रतिबंध।
मुख्य बिंदु 7
शहरीकरण, शिक्षा और डॉ. आंबेडकर व गांधीजी के संघर्षों ने जाति व्यवस्था की पुरानी कठोरता को तोड़ा है।
मुख्य बिंदु 8
राजनीतिक दल जातिगत समीकरणों को देखकर टिकट देते हैं और जातीय भावनाओं का चुनावी लाभ उठाने का प्रयास करते हैं।
मुख्य बिंदु 9
किसी भी क्षेत्र में एक जाति का बहुमत नहीं होता और 50% मौजूदा सांसद हारते हैं, जो सिद्ध करता है कि केवल जाति से चुनाव नहीं जीता जा सकता।
मुख्य बिंदु 10
लोकतांत्रिक राजनीति ने दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों को सत्ता में हिस्सेदारी, आवाज और सामाजिक आत्मसम्मान दिया है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
'श्रम के लैंगिक विभाजन' (श्रम का यौन विभाजन) का क्या अर्थ है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: काम के बंटवारे की वह सामाजिक व्यवस्था जिसमें घर के अंदर के सभी अनुत्पादक काम (खाना बनाना, सफाई, बाल-देखभाल) महिलाओं द्वारा किए जाते हैं और घर के बाहर जाकर धन कमाने वाले काम पुरुषों के जिम्मे होते हैं।
2
भारतीय समाज में 'बाल लिंगानुपात' (बाल लिंग अनुपात) में गिरावट का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: बेटे की तीव्र सामाजिक चाह और आधुनिक चिकित्सा तकनीकों का दुरुपयोग करके गर्भ में ही कन्या भ्रूण की पहचान कर उसे नष्ट कर देना (कन्या भ्रूण हत्या)।
3
साम्प्रदायिकता (साम्प्रदायिकता) लोकतंत्र के लिए किस प्रकार का एक बड़ा खतरा है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि यह नागरिकों को धर्म के आधार पर विभाजित करती है, दूसरे धर्मों के प्रति घृणा व अविश्वास पैदा करती है, और उग्र रूप लेकर दंगे, नरसंहार और देश की एकता को छिन्न-भिन्न कर देती है।
4
भारतीय संविधान के अनुसार भारत को एक 'धर्मनिरपेक्ष राज्य' (धर्मनिरपेक्ष राज्य) क्यों कहा जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि भारत का अपना कोई आधिकारिक राज्य धर्म नहीं है, संविधान सभी नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने व आचरण की स्वतंत्रता देता है, और धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकता है।
5
यह कथन क्यों गलत है कि 'भारत में चुनाव केवल जाति के आधार पर ही जीते जाते हैं'?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि किसी भी चुनावी क्षेत्र में केवल एक जाति के बहुमत का बहुमत नहीं होता है, एक ही जाति के कई वोट चुनावी नतीजों में आते हैं, और नेताओं के काम और विकास (प्रदर्शन) को देखने वाले वोट वोट मिलते हैं, जिससे 50% अल्पसंख्यकों को नुकसान होता है।
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कक्षा 10 Social Science (213) के सभी अध्याय

अध्याय 1: प्राचीन विश्व (Ancient World) अध्याय 2: मध्यकालीन विश्व (Medieval World) अध्याय 3: आधुनिक विश्व - I (Modern World - I) अध्याय 4: आधुनिक विश्व - II (Modern World - II) अध्याय 5: भारत पर ब्रिटिश शासन का प्रभाव (Impact of British Rule) अध्याय 6: औपनिवेशिक भारत में सामाजिक सुधार (Religious & Social Awakening) अध्याय 7: ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जन प्रतिरोध (Popular Resistance) अध्याय 8: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement) अध्याय 9: भारत का भौतिक स्वरूप (Physiography of India) अध्याय 10: जलवायु (Climate) अध्याय 11: जैव विविधता (Bio-diversity) अध्याय 12: भारत में कृषि (Agriculture in India) अध्याय 13: परिवहन एवं संचार (Transport and Communication) अध्याय 14: जनसंख्या: हमारा संसाधन (Population: Our Greatest Resource) अध्याय 15: संवैधानिक मूल्य एवं राजनीतिक व्यवस्था (Constitutional Values) अध्याय 16: मौलिक अधिकार एवं मौलिक कर्तव्य (Fundamental Rights and Duties) अध्याय 17: भारत - एक कल्याणकारी राज्य (India - A Welfare State) अध्याय 18: स्थानीय शासन एवं प्रशासन (Local Governments) अध्याय 19: राज्य स्तर पर शासन (Governance at State Level) अध्याय 20: केंद्रीय स्तर पर शासन (Governance at Union Level) अध्याय 21: राजनीतिक दल एवं दबाव समूह (Political Parties and Pressure Groups) अध्याय 22: लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जन-सहभागिता (Democratic Participation) अध्याय 23: भारतीय लोकतंत्र की चुनौतियाँ (Challenges to Indian Democracy) अध्याय 24: राष्ट्रीय एकीकरण एवं धर्मनिरपेक्षता (National Integration & Secularism) अध्याय 25: सामाजिक-आर्थिक विकास एवं वंचित वर्ग (Socio-Economic Development) अध्याय 26: पर्यावरणीय क्षरण एवं आपदा प्रबंधन (Environmental Degradation) अध्याय 27: शांति एवं सुरक्षा (Peace and Security)

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