हमारे देश में हर चौथा व्यक्ति निर्धन है। इसका अर्थ यह है कि भारत में लाखों लोग गरीबी में जीवन यापन कर रहे हैं। इसे दो विशिष्ट मामलों से समझा जा सकता है:
1. शहरी मामला: राम सरन की कहानी (रांची, झारखंड):
- राम शरण रांची के निकट एक आटा मिल में दिहाड़ी मजदूर है। जब वह काम करता है तो वह महीने में लगभग ₹1,500 कमाता है।
- परिवार में 6 सदस्य हैं: वह, उनकी पत्नी सांता देवी और 6 महीने से 12 साल के 4 बच्चे। इसके अलावा गांव में रह रहे उनके वृद्ध और भूमिहीन माता-पिता भी एक ही पर हैं।
- पत्नी घर में नौकरानी का काम कर ₹800 और 10 साल बड़ा बेटे की चाय की दुकान पर काम कर ₹300 कमाता है।
- परिवार समूह-मिट्टी के एक कमरे में किराये के मकान में रहता है। परिवार को दिन में दो वक्त का खाना (दाल और चावल) भी बमुश्किल मिलता है। बच्चों के पास खिलौने नहीं हैं, साबुन और तेल विलासिता की पसंद हैं।
2. ग्रामीण क्षेत्र: लक्खा सिंह की कहानी (मेरठ, उत्तर प्रदेश):
- लक्खा सिंह का परिवार भूमिहीन है। वह बड़े किसानों के सुपरमार्केट में काम करता है। कई बार पूरे दिन के कठिन परिश्रम के बाद उसे ₹50 नकद या कुछ अनाज और दाल मिलती है।
- 8 सदस्यों का परिवार गांव के बाहर घास-फूस की कोठरी में रहता है। परिवार की महिलाएं नासा में के लिए चारा काटने वाले में दिन बिताती हैं।
- उसके पिता टेपेडिक (टीबीई) के मरीज थे और दवा के अभाव में दो साल पहले चले थे; अब उनकी बुजुर्ग मां भी इसी बीमारी से पीड़ित हैं। गांव में प्राथमिक विद्यालय के बावजूद भी लक्खा सिंह कभी स्कूल नहीं गया।
निर्धनता के क्वेश्चन आयाम:
ये दोनों मामले नारे हैं कि निर्धनता का अर्थ केवल पैसे की कमी नहीं है, बल्कि इसका अर्थ है: भूख और आश्रय न रहना, बच्चों को स्कूल न छोड़ना, बीमारी में इलाज न कराना, साफ पानी और स्वतंत्रता का अभाव, नियमित रोजगार की कमी तथा मुक्ति (लाचारी) की भावना के साथ जीना।