लैटिन शब्द Crux (क्रॉस) से व्युत्पन्न 'क्रूसेड' उन सैन्य अभियानों की श्रृंखला थी, जिन्हें 1096 से 1291 के बीच पश्चिमी यूरोपीय ईसाइयों ने पवित्र भूमि (येरुशलम) पर पुनर्अधिकार हेतु मुस्लिम शासकों के विरुद्ध संचालित किया। इसके प्रमुख कारण थे:
- सेल्जुक तुर्कों का उत्कर्ष एवं मांजीकर्ट का युद्ध (1071): 11वीं सदी में मध्य एशियाई सेल्जुक तुर्कों ने इस्लाम स्वीकार कर विशाल साम्राज्य बनाया। 1071 में मांजीकर्ट के युद्ध में उन्होंने बीजान्टिन साम्राज्य की सेना को पराजित किया और 1073 में फातिमी खलीफा से येरुशलम छीन लिया। यूरोप लौटने वाले ईसाई तीर्थयात्रियों पर उत्पीड़न और पवित्र स्थलों के अपमान के आरोप लगे।
- बीजान्टिन सम्राट की सैन्य सहायता की अपील: तुर्कों के कॉन्स्टेंटिनोपल की ओर बढ़ने पर बीजान्टिन सम्राट एलेक्सियोस प्रथम कोमनेनोस ने रोम के पोप से पश्चिमी भाड़े के सैनिकों की गुहार लगाई।
- पोपतंत्र का सार्वभौमिक प्रभुत्व विस्तार (Gregorian Reform): पोप ग्रेगरी सप्तम के सुधारों के बाद पोपतंत्र यूरोपीय राजाओं पर अपना राजनीतिक-धार्मिक आधिपत्य (Plenitudo Potestatis) स्थापित करना चाहता था। साथ ही 1054 के 'ग्रेट सिज़्म' (विभाजन) के बाद पूर्वी रूढ़िवादी चर्च को रोम के अधीन लाने की महत्वाकांक्षा थी।
- सामंती संकट एवं योद्धा शूरवीरों (Knights) का उपद्रव: यूरोप में ज्येष्ठाधिकार प्रथा (Primogeniture) के कारण सामंतों की समस्त संपत्ति बड़े बेटे को मिलती थी। छोटे बेटे व शूरवीर भूमिहीन होकर यूरोप में आपसी हिंसा फैलाते थे। चर्च ने 'ईश्वर की शांति' (Pax Dei) के तहत इन हिंसक शूरवीरों की ऊर्जा को बाहरी मुस्लिम शत्रु की ओर मोड़ने का निर्णय लिया।
नवंबर 1095 में दक्षिणी फ्रांस के क्लेरमोंट में पोप अर्बन द्वितीय ने ऐतिहासिक भाषण दिया:
| पहलू | पोप का तर्क व आश्वासन | ऐतिहासिक परिणाम व प्रभाव |
|---|---|---|
| धार्मिक व आध्यात्मिक प्रेरणा | युद्ध में भाग लेने या बलिदान होने वाले सैनिकों के समस्त पापों के पूर्ण मोचन (Plenary Indulgence) की घोषणा की। | हजारों कुलीन सामंतों, शूरवीरों व किसानों ने अपने कपड़ों पर लाल क्रॉस सिल लिए और "Deus Vult!" (ईश्वर की यही इच्छा है!) का उद्घोष किया। |
| भौतिक व आर्थिक प्रलोभन | लेवांत क्षेत्र को 'दूध और शहद की भूमि' बताते हुए यूरोप के अकाल-पीड़ित व भूमिहीन लोगों को पूर्व की अपार संपदा का सपना दिखाया। | यूरोप के भूमिहीन छोटे बेटों और साहसी शूरवीरों ने पूर्व में नई जागीरों और लूट की आशा में भाग लिया। |
| धर्मशास्त्रीय औचित्य | इसे आक्रामक युद्ध नहीं, बल्कि पवित्र कब्र (Holy Sepulchre) की रक्षा का 'उचित युद्ध' (Just War - Bellum Justum) घोषित किया। | पारंपरिक ईसाई अहिंसा की अवधारणा बदल गई और युद्ध को मोक्षदायिनी पुण्य सेवा का दर्जा मिल गया। |