मीराबाई (१४९८–१५४६) हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की सगुण कृष्णभक्ति धारा की सर्वाधिक लोकप्रिय एवं अनन्य कवयित्री हैं। उनका जन्म राजस्थान के मेड़ता के निकट कुड़की गाँव में राव रत्नसिंह के राठौड़ राजवंश में हुआ था। बाल्यकाल में ही एक साधु द्वारा दी गई श्रीकृष्ण की नन्हीं मूर्ति ने उनके हृदय में ऐसा स्थान बनाया कि उन्होंने मन-ही-मन गिरधर गोपाल को ही अपना आराध्य और प्रियतम स्वीकार कर लिया। उनका संपूर्ण जीवन कृष्ण-प्रेम की अविरल धारा था।
मीराबाई का विवाह मेवाड़ के सुप्रसिद्ध महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र कुँवर भोजराज के साथ हुआ। राजमहल का अपार ऐश्वर्य, हीरे-जवाहरात और दास-दासियों का वैभव भी मीरा को कृष्ण-भक्ति से विमुख न कर सका। विवाह के कुछ ही वर्षों बाद पति का असामयिक देहांत हो गया। तत्कालीन मध्यकालीन समाज में विधवा स्त्री के लिए सती होने या कठोर पर्दा-प्रथा में रहने की विवशता थी। परंतु मीराबाई ने संकीर्ण कुल-मर्यादा के पाखंडी बंधनों को ठुकराकर साधु-संतों की संगति में कीर्तन करना चुना।
मीरा की स्वतंत्र भक्ति और संतों के साथ उठना-बैठना राजपरिवार (विशेषकर राणा विक्रमादित्य) को नागवार गुजरा। उन्हें भक्ति-मार्ग से डिगाने और लोक-लाज के नाम पर समाप्त करने के लिए राणा ने विष से भरा प्याला भेजा। मीराबाई ने इसे अपने गिरधर गोपाल का चरणामृत समझकर सहर्ष पी लिया। प्रभु कृपा से वह विष भी अमृत बन गया और मीरा का बाल भी बांका न हुआ। इस चमत्कार ने मीरा की अडिग निष्ठा को अमर बना दिया।
मीराबाई की भक्ति मुख्य रूप से माधुर्य भाव (दाम्पत्य या कांता-भाव) की है, जिसमें भक्त अपने इष्टदेव को पति, प्रियतम और सर्वस्व मानकर स्वयं को उनकी दासी स्वीकार करता है। मीरा के पदों में विरह की अगाध वेदना, मिलन की उत्कट लालसा, दीनता और परम आत्मसमर्पण की त्रिवेणी प्रवाहित होती है। उन्होंने लिखा: 'मेरो तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई'।
मीराबाई के पदों की मूल भाषा ब्रजभाषा है, जिसमें उनकी मातृभूमि राजस्थानी, खड़ीबोली तथा गुजराती शब्दों का अत्यंत सहज, स्वाभाविक और मिठास भरा सम्मिश्रण मिलता है। उनके पद शास्त्रीय राग-रागिनियों में आबद्ध गेय पद हैं, जिन्हें सदियों से मंदिरों, घर-आँगन और संगीत सभाओं में भावविभोर होकर गाया जाता रहा है।