Follow Us
WBB • कक्षा 9 • Hindi • अध्याय 23
अनुमानित समय: 50 मिनट
प्रगति: अध्ययनरत

गोपाल कृष्ण गोखले

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 9 हिन्दी (साहित्य संचयन) के पद्य खंड के प्रथम अध्याय 'विनय के पद' के संपूर्ण अध्ययन गाइड में आपका स्वागत है। यह पाठ भक्तिकाल की सगुण रामकाव्य धारा के अमर गायक गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रसिद्ध रचना 'विनय पत्रिका' से संकलित दो अत्यंत लोकप्रिय पदों पर आधारित है। प्रथम पद 'ऐसो को उदार जग माहीं' में तुलसीदास जी ने प्रभु श्री राम की असीम, निस्वार्थ और अहैतुकी उदारता का भावपूर्ण गान किया है। वे स्पष्ट करते हैं कि जो परमपद बड़े-बड़े मुनि-ज्ञानी वर्षों की कठोर साधना और वैराग्य से भी नहीं पा पाते, वही मोक्ष प्रभु राम ने गीधराज जटायु और भीलनी शबरी को अत्यंत सहजता से प्रदान कर दिया। इसी प्रकार, जिस लंका के अपार राजवैभव को रावण ने अपने दस शीश काटकर भगवान शिव से कठिन तपस्या द्वारा पाया था, वही समस्त संपत्ति श्री राम ने शरणागत विभीषण को अत्यंत संकोच के साथ एक पल में सौंप दी। तुलसीदास जी अपने चंचल मन को उपदेश देते हैं कि सब प्रकार का शाश्वत सुख पाने के लिए केवल कृपानिधान श्री राम की शरण में जाना चाहिए। द्वितीय पद 'जाके प्रिय न राम-बैदेही' में अनन्य भक्ति की दृढ़ कसौटी निर्धारित की गई है। कवि कहते हैं कि जिसके मन में श्री राम और माता सीता के प्रति प्रेम नहीं है, वह चाहे कितना भी घनिष्ठ सगा-संबंधी क्यों न हो, उसे करोड़ों शत्रुओं के समान तुरंत त्याग देना चाहिए। इसके समर्थन में वे भक्त प्रह्लाद द्वारा पिता हिरण्यकशिपु, विभीषण द्वारा भ्राता रावण, भरत द्वारा माता कैकेयी, राजा बलि द्वारा कुलगुरु शुक्राचार्य तथा ब्रज-गोपियों द्वारा अपने पतियों के परित्याग का अकाट्य पौराणिक प्रमाण देते हैं। वे 'अंजन कहा आँखि जेहि फूटै' का दृष्टांत देकर समझाते हैं कि ऐसे संबंध का कोई मूल्य नहीं जो आत्मा को ईश्वर से विमुख कर दे। यह अध्ययन सामग्री विद्यार्थियों को सप्रसंग व्याख्या, विस्तृत शब्दार्थ, भाषा-शिल्प, व्याकरण और बोर्ड परीक्षा उपयोगी प्रश्नोत्तरी में पूर्ण निपुणता प्रदान करती है।

क्या आपने कभी सोचा है?

क्या कोई ऐसा स्वामी हो सकता है जो बिना किसी सेवा, पूजा या कर्मकांड के केवल भक्त के आर्तनाद पर द्रवित हो उठे? और क्या कोई ऐसा प्रेम हो सकता है जिसके सामने संसार के सभी सांसारिक संबंध तुच्छ प्रतीत होने लगें? भक्तिकाल के शिरोमणि कवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी अमर कृति 'विनय पत्रिका' के इन पदों में प्रभु श्री राम के अहैतुकी कृपा-सिंधु स्वरूप और अनन्य भक्ति की ऐसी अद्भुत कसौटी प्रस्तुत की है, जो सदियों से मानव हृदय को भक्ति, त्याग और नैतिक साहस की सर्वोच्च प्रेरणा देती आ रही है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

गोस्वामी तुलसीदास जी के 'विनय के पद' केवल धार्मिक पद्य नहीं हैं, बल्कि वे जीवन-मूल्यों, कर्तव्य-निष्ठा और नैतिक विवेक की कालजयी पाठशाला हैं। आधुनिक युग में जहाँ मनुष्य स्वार्थ, भौतिक लोभ और भावनात्मक असमंजस में घिरा हुआ है, यह पाठ सिखाता है कि निस्वार्थ सेवा, विनम्रता और उच्च आदर्शों के लिए व्यक्तिगत मोह का त्याग कैसे किया जाता है। प्रथम पद विद्यार्थियों में कृतज्ञता, दया और दीन-दुखियों के प्रति संवेदनशीलता का भाव जगाता है, जबकि द्वितीय पद असत्य और अधर्म से समझौता न करने का अदम्य चारित्रिक साहस प्रदान करता है। माध्यमिक परीक्षा के दृष्टिकोण से यह पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें से सप्रसंग व्याख्या, पद्यांश पर आधारित बोध प्रश्न और काव्य-सौंदर्य के प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं। साथ ही, साहित्यिक ब्रजभाषा के अध्ययन से विद्यार्थियों की भाषिक समझ, शब्दावली और मध्यकालीन हिन्दी काव्य-परंपरा की समझ समृद्ध होती है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल (सगुण रामभक्ति धारा) की आधारभूत जानकारी।
  • गोस्वामी तुलसीदास जी के जीवन, उनके महान कृतित्व तथा 'विनय पत्रिका' के स्वरूप का सामान्य परिचय।
  • मध्यकालीन साहित्यिक ब्रजभाषा की गेय पदावली और तद्भव शब्दावली को समझने की प्राथमिक क्षमता।
  • शांत रस, भक्ति रस, दास्य भाव तथा प्रमुख काव्यालंकारों (अनुप्रास, दृष्टांत, रूपक) की मूलभूत समझ।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • गोस्वामी तुलसीदास जी के जीवन-दर्शन, उनकी समन्वयवादी प्रवृत्ति तथा 'विनय पत्रिका' की रचना-पृष्ठभूमि का प्रामाणिक विवेचन करना।
  • प्रथम पद ('ऐसो को उदार जग माहीं') का सप्रसंग भावार्थ, अंतर्कथाएं (गीध जटायु, शबरी, विभीषण) और राम की अहैतुकी उदारता की विशद व्याख्या करना।
  • द्वितीय पद ('जाके प्रिय न राम-बैदेही') का मर्म, अनन्य राम-प्रेम की अनिवार्यता और पाँच अमर पौराणिक त्यागों (प्रह्लाद, विभीषण, भरत, बलि, ब्रज-गोपियाँ) का दार्शनिक विश्लेषण करना।
  • 'अंजन कहा आँखि जेहि फूटै' जैसे कालजयी दृष्टांतों की सहायता से सांसारिक मोह और आध्यात्मिक निष्ठा के द्वंद्व को स्पष्ट करना।
  • पदों की साहित्यिक ब्रजभाषा, गेयता, माधुर्य गुण, शांत रस तथा अनुप्रास एवं दृष्टांत अलंकारों के कलात्मक वैशिष्ट्य का मूल्यांकन करना।
  • माध्यमिक परीक्षा (WBBSE Class 9) के अनुरूप सभी शब्दार्थ, सप्रसंग व्याख्या, लघु-उत्तरीय एवं निबंधात्मक प्रश्नों के आदर्श उत्तर लिखना।
  • पाठ पर आधारित व्याकरणिक घटकों (संधि, समास, विलोम, पर्यायवाची, तद्भव से तत्सम रूपांतरण) में पूर्ण दक्षता प्राप्त करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 मॉड्यूल 1: कवि-परिचय एवं 'विनय पत्र...
2 मॉड्यूल 2: प्रथम पद की सप्रसंग व्या...
3 मॉड्यूल 3: द्वितीय पद की सप्रसंग व्...
4 मॉड्यूल 4: दार्शनिक भावपक्ष एवं काव...
5 मॉड्यूल 5: व्याकरण, शब्द-भंडार एवं...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

मॉड्यूल 1: कवि-परिचय एवं 'विनय पत्रिका' की रचना-पृष्ठभूमि

1.1 गोस्वामी तुलसीदास (1532 – 1623 ई.): जीवन एवं कृतित्व

गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल की सगुण रामभक्ति शाखा के सर्वोपरि महाकवि हैं। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राजापुर गाँव में संवत् 1589 (1532 ई.) में हुआ था (कुछ विद्वान एटा जिले के सोरों को जन्मस्थान मानते हैं)। उनके पिता का नाम आत्माराम शुक्ल और माता का नाम हुलसी था। मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण माता-पिता ने बाल्यावस्था में ही त्याग दिया था, जिसके बाद स्वामी नरहरिदास ने उन्हें अपना शिष्य बनाया और रामकथा की दीक्षा दी।

  • समन्वयवादी दृष्टि: तुलसीदास जी भारतीय संस्कृति के महान समन्वयकर्ता थे। उन्होंने ज्ञान और भक्ति, शैव और वैष्णव, सगुण और निर्गुण, राजा और रंक तथा लोक और शास्त्र का अप्रतिम समन्वय किया।
  • दास्य भाव की भक्ति: तुलसीदास जी की भक्ति 'सेवक-सेव्य भाव' (दास्य भाव) की है, जहाँ भक्त अपने प्रभु के सम्मुख दीन, असहाय और पूर्णतः शरणागत बनकर प्रार्थना करता है।
  • प्रमुख कृतियाँ: उनका अमर महाकाव्य 'रामचरितमानस' अवधी भाषा का मुकुटमणि है। इसके अतिरिक्त ब्रजभाषा में रचित विनय पत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, कृष्ण गीतावली तथा अवधी में जानकी मंगल, पार्वती मंगल, बरवै रामायण आदि उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं।
1.2 'विनय पत्रिका' की रचना-पृष्ठभूमि एवं स्वरूप

प्रस्तुत दोनों पद तुलसीदास जी की प्रसिद्ध गीति-काव्य कृति 'विनय पत्रिका' से लिए गए हैं। 'विनय पत्रिका' का शाब्दिक अर्थ है—'प्रार्थना-पत्र' या 'याचिका'।

विनय पत्रिका का ऐतिहासिक संदर्भ:

मान्यता है कि कलियुग के साक्षात् त्रास, सामाजिक विसंगतियों और आंतरिक विकारों से व्यथित होकर तुलसीदास जी ने भगवान श्री राम के दिव्य दरबार में प्रस्तुत करने के लिए एक अर्जी (याचिका) लिखी, जिसका नाम 'विनय पत्रिका' रखा गया। इसमें कवि ने अपनी संपूर्ण दीनता, मानसिक व्याकुलता और निष्कपट हृदय की पुकार को राग-रागनियों में निबद्ध गेय पदों में अभिव्यक्त किया है।

मॉड्यूल 2: प्रथम पद की सप्रसंग व्याख्या — 'ऐसो को उदार जग माहीं'

2.1 मूल पद एवं शब्दार्थ
ऐसो को उदार जग माहीं।
बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर, राम सरिस कोउ नाहीं॥
जो गति जोग बिराग जतन करि, जेहिं पावत मुनि ग्यानी।
सो गति देत गीध सबरी कहँ, प्रभु न बहुत जिय जानी॥
जो संपति दससीस अरपि करि, रावन सिव पहिं लीन्ही।
सो संपदा बिभीषन कहँ अति, सकुच सहित हरि दीन्ही॥
तुलसीदास सब भाँति सकल सुख, जो चाहसि मन मेरो।
तौ भजु राम, काम सब पूरन, करहिं कृपानिधि तेरो॥
2.2 कठिन शब्दों के अर्थ
कठिन शब्द हिन्दी अर्थ कठिन शब्द हिन्दी अर्थ
उदार दयालु, दानशील, बड़े दिल वाला द्रवै पिघलता है, दया करता है
दीन असहाय, गरीब, दुखी सरिस समान, सदृश
गति मोक्ष, सद्गति, परमपद जोग बिराग योग और वैराग्य
गीध जटायु (गिद्ध पक्षी) दससीस दशानन रावण (दस सिर वाला)
सकुच सहित संकोच के साथ, लज्जापूर्वक कृपानिधि दया के सागर, कृपानिधान श्री राम
2.3 विस्तृत सप्रसंग व्याख्या
  • संदर्भ: प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक 'साहित्य संचयन' के पद्य खंड के 'विनय के पद' नामक पाठ से अवतरित है। इसके रचयिता भक्तिकाल के अमर महाकवि गोस्वामी तुलसीदास हैं। यह पद उनकी प्रसिद्ध रचना 'विनय पत्रिका' से संकलित है।
  • प्रसंग: इस पद में कवि ने भगवान श्री राम के अहैतुकी दयालु स्वभाव, उनकी अनुपम उदारता और शरणागत-वत्सल रूप का गुणगान करते हुए अपने मन को एकमात्र राम-भक्ति में लीन होने का उपदेश दिया है।
  • व्याख्या:

    पंक्ति १-२: तुलसीदास जी कहते हैं कि इस संसार में भगवान श्री राम के समान उदार और दयालु कोई दूसरा नहीं है। संसार के अन्य सभी स्वामी या देवता तो पूजा, सेवा या स्वार्थ के बदले कुछ देते हैं, किंतु प्रभु राम ऐसे कृपालु हैं जो बिना किसी सेवा-पूजा के ही केवल दीन-दुखियों की पुकार सुनकर उन पर दया से द्रवित हो उठते हैं।

    पंक्ति ३-४: जिस परमगति (मोक्ष) को बड़े-बड़े ज्ञानी ऋषि-मुनि कठोर योग साधना, तपस्या और वैराग्य के अथक यत्नों के बाद भी बड़ी कठिनाई से प्राप्त कर पाते हैं, वही दुर्लभ मोक्ष प्रभु श्री राम ने गीधराज जटायु और भीलनी शबरी को अत्यंत सहजता से दे दिया और मन में यह कभी नहीं सोचा कि उन्होंने कोई बहुत बड़ा उपकार किया है (प्रभु न बहुत जिय जानी)।

    पंक्ति ५-६: जिस त्रिलोक-विजयी लंका के राजवैभव और अतुल संपत्ति को रावण ने अपने दस-दस सिर काटकर भगवान शिव के चरणों में अर्पित करके बड़ी कठिन तपस्या से पाया था, वही अकूत राज्य-संपदा प्रभु राम ने शरणागत विभीषण को संकोच के साथ दे दी। श्री राम को संकोच इस बात का था कि विभीषण ने तो मुझे अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया और मैं उसे बदले में केवल तुच्छ लंका का राज्य ही दे पा रहा हूँ!

    पंक्ति ७-८: अंत में तुलसीदास जी अपने मन को संबोधित करते हुए कहते हैं—हे मेरे मन! यदि तू सब प्रकार से सच्चा, अक्षय और शाश्वत सुख चाहता है, तो व्यर्थ इधर-उधर भटकना छोड़ और केवल कृपानिधान श्री राम का भजन कर। वे दयानिधि राम तेरी समस्त कामनाओं को पूर्ण करेंगे।

प्रथम पद का विशेष काव्य-सौंदर्य:
  • रस: शांत एवं भक्ति रस।
  • भाषा: मधुर एवं साहित्यिक ब्रजभाषा।
  • अलंकार: 'जोग बिराग जतन', 'दीन पर द्रवै' में अनुप्रास अलंकार; राम की उपमा में उपमा अलंकार।
  • भावपक्ष: राम की अहैतुकी कृपा (बिना कारण दया) और भक्तवत्सलता का उत्कृष्ट दिग्दर्शन।

मॉड्यूल 3: द्वितीय पद की सप्रसंग व्याख्या — 'जाके प्रिय न राम-बैदेही'

3.1 मूल पद एवं शब्दार्थ
जाके प्रिय न राम-बैदेही।
तजिए ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही॥
तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरत महतारी।
बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज-बनितन्हि, भए मुद-मंगलकारी॥
नाते नेह राम के मनियत, सुहृद सुसंख्य जहाँ लौं।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं॥
तुलसी सो सब भाँति परम हित, पूज्य प्रान ते प्यारो।
जासों होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो॥
3.2 कठिन शब्दों के अर्थ
कठिन शब्द हिन्दी अर्थ कठिन शब्द हिन्दी अर्थ
बैदेही विदेहराज जनक की पुत्री, माता सीता तजिए त्याग देना चाहिए, छोड़ देना चाहिए
कोटि बैरी सम करोड़ों शत्रुओं के समान सनेही स्नेही, प्रिय, आत्मीय जन
कंत पति, स्वामी ब्रज-बनितन्हि ब्रज की गोपियाँ (महिलाएं)
मुद-मंगलकारी आनंद और कल्याण प्रदान करने वाले अंजन काजल, सुरमा
सुहृद मित्र, सच्चा हितैषी एतो मतो हमारो यही हमारा अंतिम विचार/दृढ़ मत है
3.3 विस्तृत सप्रसंग व्याख्या
  • संदर्भ: प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक 'साहित्य संचयन' के 'विनय के पद' शीर्षक पाठ से संकलित है। इसके रचयिता महाकवि गोस्वामी तुलसीदास हैं।
  • प्रसंग: तुलसीदास जी इस पद में अनन्य भक्ति का प्रतिपादन करते हुए स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति भगवान राम और सीता से विमुख है, वह चाहे कितना भी प्रिय क्यों न हो, उसका तुरंत परित्याग कर देना चाहिए।
  • व्याख्या:

    पंक्ति १-२: तुलसीदास जी अत्यंत दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि जिस व्यक्ति को भगवान श्री राम और माता वैदेही (सीता) प्रिय नहीं हैं, वह चाहे हमारा कितना भी आत्मीय, पूज्य या परम स्नेही संबंधी क्यों न हो, उसे करोड़ों शत्रुओं के समान मानकर तुरंत त्याग देना चाहिए।

    पंक्ति ३-४: पाँच महान ऐतिहासिक त्याग: अपने कथन की सत्यता सिद्ध करने के लिए तुलसीदास जी पाँच अकाट्य पौराणिक उदाहरण देते हैं:
    १. प्रह्लाद ने अपने सगे पिता हिरण्यकशिपु का त्याग कर दिया क्योंकि वह ईश्वर का द्रोही था।
    २. विभीषण ने अपने बड़े भाई रावण का त्याग कर दिया क्योंकि वह अधर्म के मार्ग पर था।
    ३. भरत ने अपनी सगी माता कैकेयी के कुटिल वचनों का त्याग कर दिया।
    ४. राजा बलि ने अपने कुलगुरु शुक्राचार्य का त्याग कर दिया जब गुरु ने वामन भगवान को दान देने से रोका।
    ५. ब्रज की गोपियों ने अपने पतियों को छोड़ दिया और श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति में लीन हो गईं।
    इन सभी ने ईश्वर के लिए अपने प्रियजनों का त्याग किया और अंततः सभी आनंद और परम कल्याण (मुद-मंगलकारी) के भागी बने।

    पंक्ति ५-६: संसार में जितने भी नाते-रिश्ते, मित्रता और स्नेह के संबंध हैं, वे सब केवल तभी तक सच्चे और आदरणीय हैं जब तक वे राम से जुड़े हुए हैं (नाते नेह राम के मनियत)। कवि सुप्रसिद्ध दृष्टांत देते हुए पूछते हैं—ऐसे काजल का क्या लाभ जिससे आँख ही फूट जाए? अर्थात ऐसे सांसारिक प्रेम और संबंध का क्या औचित्य जो मनुष्य को प्रभु के चरणों से दूर कर दे और उसके पतन का कारण बन जाए?

    पंक्ति ७-८: तुलसीदास जी अंत में अपना अंतिम निर्णय सुनाते हैं कि हमारी दृष्टि में वही व्यक्ति सब प्रकार से परम हितैषी, पूजनीय और प्राणों से भी अधिक प्यारा है, जिसके संपर्क में आने से श्री राम के चरणों में सच्चा अनुराग और प्रेम उत्पन्न हो—यही हमारा निश्चित मत है।

द्वितीय पद का विशेष काव्य-सौंदर्य:
  • अलंकार विधान: 'अंजन कहा आँखि जेहि फूटै' में अत्यंत सजीव दृष्टांत अलंकार है। 'मुद-मंगलकारी', 'नाते नेह' में अनुप्रास अलंकार है।
  • तुलसी की लोक-दृष्टि: कवि ने धर्म और भक्ति को कुल या रक्त-संबंध से भी ऊपर स्थान दिया है।
  • संगीतात्मकता: राग-बद्ध होने के कारण पद में उत्कृष्ट गेयता और प्रवाह है।

मॉड्यूल 4: दार्शनिक भावपक्ष एवं काव्य-शिल्प का गहन विश्लेषण

4.1 तुलसीदास की भक्ति का स्वरूप: दास्य भाव एवं अनन्यता

तुलसीदास जी की भक्ति का मूल आधार दास्य भाव है। दास्य भाव में भक्त स्वयं को 'सेवक' और भगवान को 'सेव्य' (स्वामी) मानता है:

  • अहंकार का विसर्जन: भक्त अपने ज्ञान, तप, कुल या जाति का कोई अभिमान नहीं करता। तुलसीदास जी स्वयं को 'अधम', 'पापी' और 'दीन' कहकर भगवान से केवल उनकी दया की याचना करते हैं।
  • अहैतुकी दया का भरोसा: तुलसीदास जी जानते हैं कि मनुष्य अपने सीमित कर्मों से मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता। मोक्ष केवल और केवल प्रभु की निस्वार्थ कृपा (Grace) से ही संभव है, जैसा जटायु और शबरी के प्रसंग में देखा गया।
  • एकनिष्ठ अनन्यता: तुलसीदास के लिए राम के अतिरिक्त संसार में कोई अन्य शरणदाता नहीं है—"एक भरोसो, एक बल, एक आस विस्वास। एक राम घनस्याम हित, चातक तुलसीदास॥"
4.2 काव्य-शिल्प (कलापक्ष) का विश्लेषण
शिल्पगत तत्व पाठ में प्रयुक्त स्वरूप साहित्यिक प्रभाव
भाषा साहित्यिक, परिष्कृत एवं मधुर ब्रजभाषा। तुलसीदास जी ने 'रामचरितमानस' अवधी में लिखा, किंतु गीति-काव्यों (विनय पत्रिका) के लिए मधुर ब्रजभाषा को चुना।
रस एवं गुण शांत रस एवं भक्ति रस; प्रसाद तथा माधुर्य गुण। चित्त को शांत करने वाला, भक्ति-भाव में लीन करने वाला निर्वेद भाव।
छंद एवं शैली गेय पद शैली (गीति-काव्य)। लय, ताल और संगीत से युक्त पद, जिन्हें शास्त्रीय रागों में गाया जा सकता है।
प्रमुख अलंकार अनुप्रास, दृष्टांत, उदाहरण एवं रूपक। 'अंजन कहा आँखि जेहि फूटै' में लोक-प्रसिद्ध दृष्टांत द्वारा गंभीर आध्यात्मिक सत्य का सहज प्रकटीकरण।

मॉड्यूल 5: व्याकरण, शब्द-भंडार एवं माध्यमिक परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

5.1 पाठ्यपुस्तक आधारित महत्वपूर्ण व्याकरण
  • १. तद्भव से तत्सम रूपांतरण (ब्रजभाषा शब्द):
    • गीध → गृध्र (जटायु)
    • दससीस → दशशीर्ष / दशानन
    • सिव → शिव
    • बैदेही → वैदेही (सीता)
    • जोग → योग
    • बिराग → वैराग्य
    • जतन → यत्न / प्रयत्न
    • सनेह → स्नेह / प्रेम
    • महतारी → मातृ / माता
    • कंत → कांत / पति
  • २. संधि-विच्छेद:
    • कृपानिधि = कृपा + निधि (तत्पुरुष समास युक्त पद)
    • सर्वस्व = सर्व + स्व
    • मुनीश्वर = मुनि + ईश्वर (दीर्घ स्वर संधि)
    • सूर्योदय = सूर्य + उदय (गुण स्वर संधि)
  • ३. समास-विग्रह एवं भेद:
    • राम-बैदेही: राम और वैदेही → द्वंद्व समास
    • दससीस: दस हैं शीश जिसके अर्थात रावण → बहुव्रीहि समास
    • कृपानिधि: कृपा की निधि (भंडार) → संबंध तत्पुरुष समास
    • मुद-मंगलकारी: मुद (आनंद) और मंगल करने वाला → उपपद तत्पुरुष समास
    • राम-पद: राम के पद (चरण) → संबंध तत्पुरुष समास
  • ४. पर्यायवाची शब्द:
    • राम: रघुपति, राघव, कृपानिधान, कौशल्यानंदन, दशरथनंदन।
    • बैदेही: सीता, जानकी, मैथिली, जनकसुता, अवनिजा।
    • दीन: दरिद्र, निर्धन, असहाय, अकिंचन, रंक।
    • बैरी: शत्रु, रिपु, अरि, विरोधी, अमित्र।
    • नेह: प्रेम, स्नेह, अनुराग, प्रीति, प्यार।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

राम की अहैतुकी कृपा का सिद्धांत (Unconditional Grace Formula)
परमगति (मोक्ष) = प्रभु की अहैतुकी कृपा + शरणागति (ना कि केवल कठोर योग/वैराग्य का अहंकार)
अनन्य भक्ति की त्याग कसौटी (The Renunciation Criterion)
त्याज्य संबंधी = जो राम-जानकी से विमुख हो (भले ही पिता, भाई, माता, गुरु या पति हो) --> परिणाम: मुद-मंगलकारी
दृष्टांत अलंकार संरचना (Exemplum Figure of Speech)
कथन (राम विमुख का त्याग) + बिम्ब-प्रतिबिम्ब दृष्टांत ('अंजन कहा आँखि जेहि फूटै')
तद्भव से तत्सम ध्वनि-परिवर्तन नियम
ब्रजभाषा 'ब'/'ज'/'स' --> मानक संस्कृत तत्सम 'व'/'य'/'श' (उदा. बिराग->वैराग्य, जोग->योग, सिव->शिव)

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
सप्रसंग व्याख्या कीजिए: 'जो संपति दससीस अरपि करि, रावन सिव पहिं लीन्ही। सो संपदा बिभीषन कहँ अति, सकुच सहित हरि दीन्ही॥'
विस्तृत समाधान / उत्तर:
संदर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ भक्तिकाल के महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित 'विनय के पद' (विनय पत्रिका) से उद्धृत हैं। प्रसंग: इसमें कवि ने भगवान श्री राम की अनुपम उदारता और त्यागशीलता का वर्णन किया है। व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि लंका के जिस विशाल राजवैभव और अतुलनीय संपत्ति को प्राप्त करने के लिए दशानन रावण ने भगवान शिव के चरणों में अपने दस-दस सिरों की आहुति देकर अत्यंत कठोर तपस्या की थी, वही सम्पूर्ण त्रिलोक-दुर्लभ संपत्ति प्रभु श्री राम ने अपने शरणागत विभीषण को अत्यंत संकोच के साथ भेंट कर दी। श्री राम को मन में संकोच यह था कि विभीषण ने तो अपने भाई और राज्य को छोड़कर मुझे अपना सर्वस्व सौंप दिया, और मैं बदले में उसे केवल लंका का तुच्छ राज्य ही दे पा रहा हूँ! काव्य-सौंदर्य: १. भाषा: मधुर ब्रजभाषा। २. रस: शांत रस एवं भक्ति रस। ३. राम के त्यागी, उदार एवं शरणागत-वत्सल स्वभाव का मनोहारी चित्रण।
उदाहरण 2
सप्रसंग व्याख्या कीजिए: 'अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं। तुलसी सो सब भाँति परम हित, पूज्य प्रान ते प्यारो॥'
विस्तृत समाधान / उत्तर:
संदर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक 'साहित्य संचयन' के 'विनय के पद' से उद्धृत हैं, जिसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास हैं। प्रसंग: यहाँ कवि ने स्पष्ट किया है कि जो संबंध ईश्वर-प्रेम से दूर करे, वह सर्वथा त्याज्य है। व्याख्या: तुलसीदास जी एक प्रसिद्ध लोक-दृष्टांत देते हुए कहते हैं कि ऐसे काजल (अंजन) को लगाने से क्या लाभ जिससे आँख की ज्योति ही नष्ट हो जाए अर्थात आँख ही फूट जाए? भाव यह है कि ऐसा प्रेम या संबंध जो हमें परमात्मा से विमुख कर दे और पतन की ओर ले जाए, वह किसी काम का नहीं है। अतः तुलसीदास जी का दृढ़ मत है कि हमारे लिए संसार में वही व्यक्ति सब प्रकार से परम हितैषी, पूजनीय और प्राणों से भी अधिक प्रिय है, जिसके संग से भगवान श्री राम के चरणों में सच्चा अनुराग उत्पन्न हो। काव्य-सौंदर्य: १. 'अंजन कहा आँखि जेहि फूटै' में लोकप्रसिद्ध दृष्टांत अलंकार है। २. भाषा में प्रबोधात्मकता और दार्शनिक गंभीरता है।
उदाहरण 3
तुलसीदास जी ने भगवान श्री राम को 'उदार' क्यों कहा है? प्रथम पद के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
तुलसीदास जी ने भगवान राम को 'उदार' इसलिए कहा है क्योंकि वे बिना किसी स्वार्थ, सेवा या अनुष्ठान के केवल दीन-दुखियों की आर्त पुकार पर द्रवित हो उठते हैं। जिस मोक्ष को बड़े-बड़े मुनि योग और वैराग्य से भी नहीं पा पाते, वह मोक्ष राम ने गीध (जटायु) और शबरी को सहज ही प्रदान कर दिया। इसके अतिरिक्त, रावण द्वारा दस सिर अर्पित कर पाया गया लंका का राज्य उन्होंने विभीषण को संकोच के साथ दे दिया। संसार में ऐसा कोई दूसरा कृपालु स्वामी नहीं है।
उदाहरण 4
द्वितीय पद में तुलसीदास जी ने किन-किन महापुरुषों के त्याग का उल्लेख किया है और क्यों?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
तुलसीदास जी ने पाँच प्रमुख पौराणिक त्यागों का उल्लेख किया है: १. भक्त प्रह्लाद ने अपने पिता हिरण्यकशिपु का त्याग किया। २. विभीषण ने अपने सगे भाई रावण का त्याग किया। ३. भरत ने अपनी माता कैकेयी का परित्याग किया। ४. राजा बलि ने अपने कुलगुरु शुक्राचार्य का त्याग किया। ५. ब्रज की गोपियों ने अपने पतियों का त्याग किया। कारण: ये सभी संबंधी भगवान राम और धर्म के विरोधी थे। तुलसीदास जी यह सिद्ध करना चाहते हैं कि ईश्वर-भक्ति के मार्ग में बाधक बनने वाले किसी भी संबंधी को तुरंत त्याग देना चाहिए, क्योंकि ऐसा त्याग अंततः परम कल्याणकारी (मुद-मंगलकारी) सिद्ध होता है।
उदाहरण 5
व्याकरण: 'मुद-मंगलकारी' और 'राम-बैदेही' शब्दों में समास बताइए और विग्रह कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
१. मुद-मंगलकारी: मुद (आनंद) और मंगल करने वाला → उपपद तत्पुरुष समास। २. राम-बैदेही: राम और वैदेही (सीता) → द्वंद्व समास।
उदाहरण 6
तुलसीदास जी के अनुसार सच्चा मित्र और परम हितैषी कौन है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
तुलसीदास जी के अनुसार सच्चा मित्र, पूजनीय और प्राणों से भी प्यारा वही व्यक्ति है, जिसके साथ रहने और उपदेश सुनने से भगवान श्री राम के पावन चरणों में सच्चा प्रेम और अनुराग उत्पन्न हो।
उदाहरण 7
'प्रभु न बहुत जिय जानी' पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
इस पंक्ति का आशय यह है कि प्रभु श्री राम ने जटायु और शबरी को वैकुंठ (परम मोक्ष) जैसा दुर्लभ पद प्रदान करते समय अपने मन में तनिक भी यह अहंकार या विचार नहीं आने दिया कि उन्होंने कोई बहुत बड़ा एहसान किया है। वे अपने उपकार को अत्यंत सामान्य और स्वाभाविक मानते हैं।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि तुलसीदास जी पारिवारिक संबंधों को तोड़ने का उपदेश दे रहे हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

तुलसीदास जी सामान्य पारिवारिक संबंधों के विरोधी नहीं हैं; वे केवल तभी संबंध त्यागने को कहते हैं जब कोई संबंधी व्यक्ति को धर्म, सत्य और ईश्वर के मार्ग से भटकाने का प्रयास करे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

'गीध' शब्द का अर्थ केवल पक्षी समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यहाँ 'गीध' का अर्थ विशेष रूप से रामायण के अमर पात्र 'जटायु' से है, जिन्होंने सीता हरण के समय रावण से युद्ध करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

'सकुच सहित' का अर्थ राम का भयभीत होना समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

'सकुच सहित' का अर्थ है कि श्री राम को विभीषण की अनन्य निष्ठा के आगे लंका का राज्य अत्यंत तुच्छ जान पड़ रहा था, इसलिए वे लज्जा और संकोच का अनुभव कर रहे थे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

पदों की भाषा को 'अवधी' लिख देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

'विनय पत्रिका' और प्रस्तुत 'विनय के पद' साहित्यिक 'ब्रजभाषा' में रचित हैं, अवधी में नहीं।

विनय के पद: काव्य-संरचना, भाव-सौंदर्य एवं दार्शनिक संकल्पना (WBBSE कक्षा 9 हिन्दी साहित्य संचयन)

WBBSE कक्षा 9 हिन्दी (साहित्य संचयन) • पद्य खंड पाठ 1 विनय के पद — गोस्वामी तुलसीदास (विनय पत्रिका) भक्ति काल एवं दास्य भाव 1. पद १: राम की परम उदारता ऐसो को उदार जग माहीं • बिनु सेवा द्रवै दीन पर • अहैतुकी दया का सागर • राम सरिस कोउ नाहीं “दीनबंधु का पावन स्वभाव” गीध और शबरी को मोक्ष • मुनि-ज्ञानी योग से न पावे • जटायु (गीध) को परमगति • शबरी के जूठे बेर स्वीकार • प्रभु न बहुत जिय जानी • सहज भाव से मुक्ति प्रदान विभीषण को लंका का राज • रावण ने दस शीश देकर पाया • वही राज विभीषण को दिया • सकुच सहित हरि दीन्ही • मन को राम भजन का संदेश “कृपानिधि पूर्ण करहिं काम” 2. पद २: अनन्य राम-प्रेम जाके प्रिय न राम-बैदेही • तजिए ताहि कोटि बैरी सम • यद्यपि परम सनेही होय • भक्ति ही सर्वोच्च संबंध “संसार से ऊपर ईश्वर-प्रेम” 5 महान ऐतिहासिक त्याग • प्रह्लाद ने पिता को त्यागा • विभीषण ने भ्राता रावण को • भरत ने माता कैकेयी को • बलि ने गुरु को, गोपियों ने पति “भए मुद-मंगलकारी सब” अंजन कहा आँखि जेहि फूटै • दृष्टांत अलंकार का सौंदर्य • ऐसे काजल का क्या काम • जिससे आँख ही फूट जाए • नाते नेह राम के मनियत “राम-पद सनेह ही सार है” 3. कवि परिचय एवं भावपक्ष गोस्वामी तुलसीदास • जन्म: 1532, राजापुर (बांदा) • रामभक्ति शाखा के शिरोमणि • गुरु: नरहरिदास “समन्वयवादी महाकवि” विनय पत्रिका का संदर्भ • कलियुग के त्रास से मुक्ति • राम के दरबार में याचिका • दास्य भाव की पराकाष्ठा • सेवक-सेव्य भाव का समर्पण “आत्मनिवेदन एवं शरणागति” प्रमुख कृतियाँ • रामचरितमानस (अवधी महाकाव्य) • विनय पत्रिका (ब्रजभाषा) • कवितावली, गीतावली • दोहावली, जानकी मंगल “लोकनायक तुलसीदास” 4. शिल्प, भाषा एवं व्याकरण काव्यगत विशेषताएं • भाषा: साहित्यिक ब्रजभाषा • रस: शांत रस एवं भक्ति रस • गुण: प्रसाद एवं माधुर्य “गेय पद शैली एवं संगीतात्मकता” प्रमुख अलंकार • अनुप्रास: जोग बिराग जतन • मुद-मंगल, नाते नेह • दृष्टांत: अंजन कहा आँखि... • उदाहरण: प्रह्लाद, विभीषण आदि “उपमा एवं अर्थालंकार विधान” माध्यमिक व्याकरण संदर्भ • संधि, समास (तत्पुरुष, द्वंद्व) • पर्यायवाची एवं विलोम शब्द • ब्रजभाषा तद्भव रूप स्पष्टीकरण • भाव-स्पष्टीकरण एवं सप्रसंग व्याख्या “WBBSE कक्षा 9 संपूर्ण तैयारी”

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
गोस्वामी तुलसीदास जी भक्तिकाल की सगुण रामभक्ति शाखा के प्रतिनिधि एवं समन्वयवादी महाकवि हैं।
मुख्य बिंदु 2
प्रस्तुत दोनों पद तुलसीदास जी के प्रसिद्ध भक्ति गीति-काव्य 'विनय पत्रिका' से संकलित हैं, जो साहित्यिक ब्रजभाषा में रचित हैं।
मुख्य बिंदु 3
प्रथम पद 'ऐसो को उदार जग माहीं' में प्रभु श्री राम की अहैतुकी कृपा, परोपकारिता और दीनबंधु स्वरूप का गुणगान है।
मुख्य बिंदु 4
श्री राम बिना किसी स्वार्थ या कर्मकांड के केवल दीनता पर द्रवित होने वाले एकमात्र दयालु स्वामी हैं।
मुख्य बिंदु 5
जो मोक्ष ज्ञानी मुनि कठोर योग और वैराग्य से नहीं पा पाते, वह परमगति प्रभु ने गीधराज जटायु और शबरी को सहज भाव से प्रदान कर दी।
मुख्य बिंदु 6
रावण द्वारा दस शीश काटकर पाई गई लंका की संपत्ति को प्रभु ने शरणागत विभीषण को संकोचपूर्वक भेंट कर दिया।
मुख्य बिंदु 7
कवि अपने मन को सब सुखों की प्राप्ति हेतु कृपानिधान श्री राम के भजन में लीन होने की प्रेरणा देते हैं।
मुख्य बिंदु 8
द्वितीय पद 'जाके प्रिय न राम-बैदेही' में अनन्य ईश्वर-प्रेम को समस्त सांसारिक संबंधों से श्रेष्ठ बताया गया है।
मुख्य बिंदु 9
श्री राम-सीता से विमुख व्यक्ति चाहे कितना भी स्नेही क्यों न हो, उसे करोड़ों शत्रुओं के समान तुरंत त्याग देना चाहिए।
मुख्य बिंदु 10
प्रह्लाद (पिता), विभीषण (भाई), भरत (माता), राजा बलि (गुरु) और ब्रज-गोपियों (पति) का त्याग इस सत्य का अमर प्रमाण है।
मुख्य बिंदु 11
'अंजन कहा आँखि जेहि फूटै' दृष्टांत द्वारा कवि स्पष्ट करते हैं कि सच्चा हितैषी वही है जो श्री राम के चरणों में अनुराग उत्पन्न करे।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
'विनय के पद' किस प्रसिद्ध ग्रंथ से संकलित हैं और इसके रचयिता कौन हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 'विनय के पद' गोस्वामी तुलसीदास जी के प्रसिद्ध गीति-काव्य ग्रंथ 'विनय पत्रिका' से संकलित हैं।
2
प्रस्तुत पदों की भाषा क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: प्रस्तुत पदों की भाषा परिष्कृत एवं साहित्यिक 'ब्रजभाषा' है।
3
भगवान श्री राम को 'दीनबंधु' क्यों माना गया है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि वे बिना किसी सेवा या स्वार्थ के केवल दीनों और दुखियों की आर्त पुकार सुनकर उन पर अहैतुकी दया करते हैं।
4
प्रथम पद में किन दो पात्रों को मुनियों से भी दुर्लभ परमगति मिलने की बात कही गई है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: गीधराज जटायु और भीलनी शबरी को।
5
रावण ने लंका का राज्य किसे प्रसन्न करके और कैसे प्राप्त किया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: रावण ने भगवान शिव को अपने दस शीश अर्पित करके अत्यंत कठोर तपस्या द्वारा लंका का राज्य प्राप्त किया था।
6
श्री राम ने लंका का राज्य विभीषण को किस प्रकार दिया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: श्री राम ने लंका का अकूत राज्य शरणागत विभीषण को अत्यंत संकोच के साथ (कि यह विभीषण के समर्पण के आगे बहुत छोटा है) दिया।
7
तुलसीदास जी के अनुसार किसे करोड़ों शत्रुओं के समान त्याग देना चाहिए?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: जिस व्यक्ति को भगवान श्री राम और माता वैदेही (सीता) प्रिय नहीं हैं, उसे करोड़ों शत्रुओं के समान त्याग देना चाहिए।
8
भक्त प्रह्लाद और विभीषण ने भक्ति के लिए क्रमशः किनका परित्याग किया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: प्रह्लाद ने अपने पिता हिरण्यकशिपु का और विभीषण ने अपने सगे भ्राता रावण का परित्याग किया था।
9
'अंजन कहा आँखि जेहि फूटै' पंक्ति में कौन सा अलंकार है और इसका क्या अर्थ है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: इसमें 'दृष्टांत अलंकार' है। इसका अर्थ है—ऐसे काजल का क्या लाभ जिससे आँख ही फूट जाए, अर्थात ऐसे संबंध का क्या औचित्य जो ईश्वर से विमुख कर दे।
10
तुलसीदास जी की भक्ति किस भाव की मानी जाती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: तुलसीदास जी की भक्ति 'दास्य भाव' (सेवक-सेव्य भाव) की मानी जाती है।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

ऑनलाइन CBT टेस्ट देकर तैयारी का मूल्यांकन करें

झारखण्ड बोर्ड परीक्षा पैटर्न पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्नों का ऑनलाइन टेस्ट दें। तुरंत परिणाम, समय विश्लेषण और प्रत्येक प्रश्न का विस्तृत हल प्राप्त करें।

कक्षा 9 Hindi के सभी अध्याय

अध्याय 1: विनय के पद (गोस्वामी तुलसीदास) अध्याय 2: धीरे-धीरे उतर क्षितिज से अध्याय 3: पेड़ का दर्द अध्याय 4: जरुरतों के नाम पर अध्याय 5: कलकत्ता अध्याय 6: सबसे खतरनाक अध्याय 7: यमराज की दिशा अध्याय 8: कर चले हम फ़िदा अध्याय 9: स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खण्डन अध्याय 10: हिंसा परम धर्मः अध्याय 11: संस्कृति है क्या? अध्याय 12: ठेले पर हिमालय अध्याय 13: भोलाराम का जीव अध्याय 14: वापसी अध्याय 15: पर्यावरण संरक्षण अध्याय 16: गिरगिट अध्याय 17: बहू की विदा अध्याय 18: कालिदास अध्याय 19: गुरु नानक अध्याय 20: स्वामी दयानंद सरस्वती अध्याय 21: राजा राममोहन राय अध्याय 22: आचार्य जगदीश चंद्र बोस अध्याय 23: गोपाल कृष्ण गोखले अध्याय 24: बाल गंगाधर तिलक अध्याय 25: मोतीलाल नेहरू अध्याय 26: लाला लाजपत राय अध्याय 27: रवीन्द्रनाथ ठाकुर अध्याय 28: सरदार वल्लभ भाई पटेल अध्याय 29: डॉ. राजेन्द्र प्रसाद अध्याय 30: मौलाना अबुल कलाम आज़ाद

AI अध्ययन मित्र

त्वरित शंका समाधान

गोपाल कृष्ण गोखले में कोई संदेह या प्रश्न है? हमारे AI अध्ययन मित्र से तुरंत समझें।