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WBB • कक्षा 9 • Science • अध्याय 6
अनुमानित समय: 75 मिनट
प्रगति: अध्ययनरत

Measurement

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 9 जीवन विज्ञान एवं पर्यावरण के प्रथम अध्याय जीवन और उसकी विविधता (Topic ID: 2670, Slug: life-and-its-diversity, Subject ID: 183) के संपूर्ण और प्रामाणिक अध्ययन सामग्री में आपका स्वागत है। यह अध्याय पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति, उपापचय के मूल नियमों, जैव विविधता के संरक्षण और सजीव जगत के व्यापक वर्गीकरण का गहन वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्याय का प्रारंभ जीवन के भौतिक आधार जीवद्रव्य (प्रोटोप्लाज्म) की अवधारणा से होता है, जिसे थॉमस हक्सले ने जीवन का भौतिक आधार कहा था। सजीवों में निरंतर चलने वाली जैव रासायनिक क्रियाओं को उपापचय कहा जाता है, जो दो विरोधी किंतु पूरक प्रक्रियाओं—उपचय (रचनात्मक, ऊर्जा संचयी, शुष्क भार में वृद्धि करने वाला, जैसे प्रकाश संश्लेषण) तथा अपचय (विनाशात्मक, ऊर्जा विमोचक, शुष्क भार घटाने वाला, जैसे श्वसन)—का योग है। इसके साथ ही वृद्धि, उद्दीपनशीलता, क्लाउड बर्नार्ड और वाल्टर कैनन द्वारा प्रतिपादित समस्थापन (होमियोस्टैसिस), जनन और वार्धक्य सजीवों के शाश्वत लक्षण हैं। अध्याय के दूसरे भाग में 13.8 अरब वर्ष पूर्व बिग बैंग से लेकर 4.6 अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी की उत्पत्ति और 3.8 अरब वर्ष पूर्व जीवन के प्रादुर्भाव का कालक्रम समझाया गया है। आदिम पृथ्वी का वायुमंडल अपचायक था जिसमें स्वतंत्र ऑक्सीजन का पूर्ण अभाव था और मीथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन तथा जलवाष्प प्रचुर मात्रा में थे। ओपेरिन और हाल्डेन के रासायनिक विकास सिद्धांत ने स्पष्ट किया कि कैसे तप्त तनु सूप में अकार्बनिक तत्वों से सरल व जटिल कार्बनिक अणु, कोएसरवेट्स और माइक्रोस्फीयर्स बने। 1953 में स्टैनली मिलर और हेरोल्ड यूरे ने स्पार्क डिस्चार्ज उपकरण में मीथेन, अमोनिया और हाइड्रोजन के 2:2:1 मिश्रण और 60,000 वोल्ट के विद्युत स्फुलिंग द्वारा प्रयोगशाला में ग्लाइसिन, ऐलेनिन और एस्पार्टिक एसिड जैसे अमीनो अम्ल संश्लेषित कर इस सिद्धांत की पुष्टि की। इसके बाद आरएनए वर्ल्ड और सायनोबैक्टीरिया की ऑक्सीजन क्रांति (Great Oxidation Event) का विवेचन है। तीसरे भाग में जैव विविधता के तीन स्तरों (आनुवंशिक, प्रजातीय, पारिस्थितिक—अल्फा, बीटा, गामा विविधता) और सिनकोना से कुनैन, सर्पगंधा से रिसरपिन, सदाबहार से विनब्लास्टिन-विनक्रिस्टिन जैसी जीवनरक्षक औषधियों का उल्लेख है। जैव विविधता ह्रास के चार मुख्य कारणों (द इविल क्वार्टेट: आवास विनाश, अति-दोहन, विदेशी प्रजातियों जैसे जलकुंभी का आक्रमण, सह-विलुप्ति) और नॉर्मन मायर्स के हॉटस्पॉट मानदंडों (1500 स्थानिक पौधे, 70% आवास हानि) सहित भारत के चार हॉटस्पॉट्स का अध्ययन किया गया है। चौथे भाग में कैरोलस लिनियस द्वारा प्रतिपादित वर्गिकी पदानुक्रम (जगत, संघ, वर्ग, गण, कुल, वंश, जाति) और द्विनाम पद्धति के नियमों को मानव, आम, बाघ, मोर और रोहू मछली के वैज्ञानिक नामों के माध्यम से समझाया गया है। पांचवें भाग में आर.एच. व्हिटेकर का पांच-जगत वर्गीकरण (मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक, प्लांटी, एनिमेलिया) और उनके तुलनात्मक लक्षणों की समीक्षा की गई है। अंत में पादप जगत के प्रमुख प्रभागों (थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा—पादप जगत के उभयचर, टेरिडोफाइटा—संवहनी अपुष्पोद्भिद, जिम्नोस्पर्म, एंजियोस्पर्म तथा एकबीजपत्री बनाम द्विबीजपत्री का अंतर) और जंतु जगत के 9 अकशेरुकी संघों (पोरीफेरा, नाइडेरिया, टीनोफोरा, प्लैटीहेल्मिन्थीज, नेमाटोडा, एनेलिडा, आर्थ्रोपोडा, मोलस्का, एकाइनोडर्मेटा) तथा कॉर्डेटा के 4 मूलभूत लक्षणों और कशेरुकी के 6 वर्गों (कॉन्ड्रिक्थीज, ऑस्टिक्थीज, एम्फीबिया, सरीसृप, एवीज, स्तनधारी) का विस्तृत निदान सूचक परीक्षण प्रस्तुत किया गया है।

क्या आपने कभी सोचा है?

क्या आपने कभी सोचा है कि लगभग 3.8 अरब वर्ष पूर्व खौलते हुए आदिम महासागरों में निर्जीव रसायनों के मिश्रण से पहली जीवित कोशिका का जन्म कैसे हुआ? एक नन्हे एककोशिकीय अमीबा से लेकर 30 मीटर लंबी विशाल नीली व्हेल और 100 मीटर ऊंचे सिकोइया वृक्ष तक—पृथ्वी पर मौजूद लगभग 87 लाख ज्ञात-अज्ञात सजीव प्रजातियों में ऐसा क्या समान है जो उन्हें 'जीवित' बनाता है? कैसे कैरोलस लिनियस की वर्गिकी और आर.एच. व्हिटेकर का पांच-जगत वर्गीकरण इस असीम जैव विविधता को एक सुव्यवस्थित वैज्ञानिक सूत्र में पिरोता है?

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए 'जीवन और उसकी विविधता' का अध्ययन केवल परीक्षा में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह सजीव जगत की अद्भुत कार्यप्रणाली और उसमें हमारी अपनी उपस्थिति को समझने की आधारशिला है। आज जब हमारी पृथ्वी जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्रजातियों के तीव्र विलोपन के वैश्विक संकट से जूझ रही है, तब जैव विविधता के आर्थिक, औषधीय और पारिस्थितिक महत्व को समझना हर जागरूक नागरिक का कर्तव्य बन जाता है। इस अध्याय को पढ़कर विद्यार्थी जान पाते हैं कि कैसे मलेरिया रोधी कुनैन सिनकोना के वृक्ष से मिलती है, कैसे रक्त कैंसर की औषधियां सदाबहार के पौधे से प्राप्त होती हैं, और कैसे वनों के नष्ट होने से संपूर्ण खाद्य श्रृंखला और जल चक्र ध्वस्त हो सकता है। मिलर और यूरे का प्रयोग विज्ञान की उस तार्किक शक्ति को दर्शाता है जिसने यह साबित किया कि सजीवों का निर्माण किसी अलौकिक चमत्कार से नहीं बल्कि प्रकृति के सार्वभौमिक भौतिक-रासायनिक नियमों के विकास से हुआ है। इसके अतिरिक्त, लिनियस की द्विनाम नामकरण पद्धति और व्हिटेकर का पांच-जगत वर्गीकरण विद्यार्थियों में वैज्ञानिक चिंतन, तार्किक वर्गीकरण और विश्लेषणात्मक दृष्टि विकसित करते हैं। यह अध्याय आगे चलकर कक्षा 11-12 में जीव विज्ञान, नीट (NEET) जैसी राष्ट्रीय मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं और पर्यावरण विज्ञान की उच्च शिक्षा के लिए सबसे मजबूत नींव तैयार करता है। अतः यह अध्याय सजीवों के प्रति संवेदनशीलता, संरक्षण की नैतिक प्रतिबद्धता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का निर्माण करने वाला अनिवार्य विषय है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • सजीव एवं निर्जीव के बीच बुनियादी अंतर तथा कोशिका (Cell) के जीवन की मूलभूत संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई होने की प्राथमिक समझ।
  • पादप और जंतु कोशिकाओं की सामान्य संरचना (कोशिका भित्ति, कोशिका झिल्ली, केंद्रक, माइटोकॉन्ड्रिया व क्लोरोप्लास्ट) का मूलभूत ज्ञान।
  • पर्यावरण, पारिस्थितिक तंत्र तथा सजीवों के जीवित रहने के लिए भोजन, जल, वायु और ऊर्जा की परस्पर निर्भरता की सामान्य जानकारी।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • जीवन के भौतिक आधार 'जीवद्रव्य' (प्रोटोप्लाज्म) की अवधारणा तथा उपचयी (Anabolism) और अपचयी (Catabolism) उपापचय के रासायनिक व ऊर्जा संतुलन की वैज्ञानिक व्याख्या करना।
  • आदिम अपचायक वायुमंडल, ओपेरिन-हाल्डेन के रासायनिक विकास सिद्धांत (तप्त तनु सूप, कोएसरवेट्स) तथा मिलर-यूरे के ऐतिहासिक प्रयोग (1953) द्वारा अमीनो अम्लों के संश्लेषण का विश्लेषण करना।
  • जैव विविधता के तीनों स्तरों (आनुवंशिक, प्रजातीय, पारिस्थितिक), इसके औषधीय व आर्थिक महत्व, ह्रास के कारणों ('The Evil Quartet') और भारत के 4 प्रमुख हॉटस्पॉट्स की पहचान करना।
  • वर्गिकी (Taxonomy) के जनक कैरोलस लिनियस के लिनियन पदानुक्रम (7 स्तर), द्विनाम पद्धति के अंतरराष्ट्रीय नियमों (ICBN/ICZN) तथा प्रमुख जीवों के वैज्ञानिक नामों को शुद्ध रूप से लिखना।
  • आर.एच. व्हिटेकर के पांच-जगत वर्गीकरण (मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक, प्लांटी, एनिमेलिया) के पांचों वैज्ञानिक आधारों और उनके विशिष्ट लक्षणों का तुलनात्मक विश्लेषण करना।
  • पादप जगत के 5 प्रमुख प्रभागों (थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, अनावृतबीजी, आवृतबीजी तथा एकबीजपत्री बनाम द्विबीजपत्री) और जंतु जगत के 9 अकशेरुकी संघों व कशेरुकी के 6 वर्गों के निदान सूचक लक्षणों की तुलना करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 मॉड्यूल 1: जीवन की अवधारणा, लक्षण ए...
2 मॉड्यूल 2: जीवन की उत्पत्ति एवं प्र...
3 मॉड्यूल 3: जैव विविधता एवं उसका संर...
4 मॉड्यूल 4: वर्गिकी, सिस्टेमैटिक्स ए...
5 मॉड्यूल 5: व्हिटेकर का पांच-जगत वर्...
6 मॉड्यूल 6: पादप जगत के प्रमुख प्रभा...
7 मॉड्यूल 7: जंतु जगत के प्रमुख संघ (...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

मॉड्यूल 1: जीवन की अवधारणा, लक्षण एवं उपापचय (Concept of Life & Metabolism)

1.1 जीवन की अवधारणा एवं परिभाषा (Concept & Definition of Life)

जीवन (Life) सजीवों की एक अद्वितीय, अत्यंत जटिल और स्व-नियंत्रित अवस्था है जो उन्हें निर्जीव पदार्थों से अलग करती है। जीवन कोई एकल भौतिक पदार्थ नहीं है, बल्कि यह कोशिकाओं के भीतर होने वाली अनगिनत समन्वित रासायनिक अभिक्रियाओं, ऊर्जा परिवर्तनों और जैविक सूचनाओं के प्रवाह का कुल परिणाम है।

आधुनिक जीव विज्ञान के अनुसार: "सजीव वह स्व-प्रतिकृतिकारी (self-replicating), स्व-नियामक (self-regulating) और विकासशील परस्पर क्रियात्मक प्रणाली है जो बाह्य उद्दीपनों के प्रति संवेदनशील होकर अनुक्रिया व्यक्त करने में सक्षम होती है।"

1.2 जीवन का भौतिक आधार: जीवद्रव्य / प्रोटोप्लाज्म (Protoplasm: The Physical Basis of Life)

वर्ष 1839 में चेक वैज्ञानिक जे.ई. पुरकिंजे (J.E. Purkinje) ने कोशिका के भीतर उपस्थित जीवित, चिपचिपे, पारभासी तरल पदार्थ के लिए सर्वप्रथम 'प्रोटोप्लाज्म' (जीवद्रव्य) शब्द का प्रयोग किया। इसके उपरांत 1868 में प्रसिद्ध ब्रिटिश जीवविज्ञानी थॉमस हेनरी हक्सले (Thomas Henry Huxley) ने जीवद्रव्य के असाधारण महत्व को रेखांकित करते हुए अपना ऐतिहासिक कथन दिया:

थॉमस हक्सले का अमर सिद्धांत: "जीवद्रव्य जीवन का भौतिक आधार है" (Protoplasm is the physical basis of life)। जीवन के सभी मूलभूत कार्य—जैसे पोषण, श्वसन, वृद्धि, संवेदनशीलता और जनन—जीवद्रव्य के भीतर ही संपन्न होते हैं। यदि जीवद्रव्य की संरचना स्थायी रूप से नष्ट हो जाए, तो जीवन समाप्त हो जाता है।

जीवद्रव्य की भौतिक-रासायनिक विशेषताएं:

  • भौतिक प्रकृति: यह एक जटिल, रंगहीन, अर्द्ध-पारदर्शी, चिपचिपा और जैली जैसा कोलाइडल घोल (Colloidal Solution) है। इसमें प्रकीर्णन माध्यम जल है और प्रकीर्णित प्रावस्था प्रोटीन, लिपिड व कार्बोहाइड्रेट हैं। यह 'सॉल' (तरल) और 'जेल' (अर्द्ध-ठोस) अवस्थाओं में परस्पर रूपांतरित हो सकता है।
  • रासायनिक संगठन: जीवद्रव्य में लगभग 75% से 85% जल, 10% से 15% प्रोटीन, 2% से 4% लिपिड, 1% कार्बोहाइड्रेट तथा 1% अकार्बनिक लवण (आयन) पाए जाते हैं। इसके मुख्य चार तत्व कार्बन (C), हाइड्रोजन (H), ऑक्सीजन (O) और नाइट्रोजन (N) हैं, जो इसके कुल भार का 96% बनाते हैं।
  • जैविक गुण: जीवद्रव्य में निरंतर चक्रीय गति होती रहती है जिसे साइक्लोसिस (Cyclosis) या जीवद्रव्यी भ्रमण कहते हैं (उदा. अमीबा व हाइड्रिला की कोशिकाओं में)।
1.3 उपापचय: उपचयी बनाम अपचयी उपापचय (Metabolism: Anabolism vs Catabolism)

सजीव शरीर की प्रत्येक जीवित कोशिका में हर क्षण हजारों रासायनिक अभिक्रियाएं चलती रहती हैं। सजीव के शरीर में संपन्न होने वाली इन सभी रासायनिक अभिक्रियाओं के कुल योग को उपापचय (Metabolism) कहा जाता है। उपापचय को दो परस्पर विरोधी किंतु अनिवार्य श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:

  1. उपचयी उपापचय / उपचय (Anabolism - रचनात्मक उपापचय):
    • यह एक संश्लेषणात्मक या रचनात्मक (Constructive) प्रक्रिया है जिसमें सरल अकार्बनिक या कार्बनिक अणुओं के संयोजन से जटिल कार्बनिक अणुओं का निर्माण होता है।
    • यह एक ऊर्जा-शोषी या ऊर्जा-संचयी (Endergonic) प्रक्रिया है, जिसमें बाह्य ऊर्जा (जैसे सौर ऊर्जा या ATP) रासायनिक बंधों के रूप में संचित होती है।
    • इसके फलस्वरूप जीव के शुष्क भार (Dry Weight) में वृद्धि होती है।
    • प्रमुख उदाहरण:
      क. प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis): पौधे सूर्य के प्रकाश और पर्णहरित की उपस्थिति में जल और कार्बन डाइऑक्साइड से ग्लूकोज बनाते हैं:
      6CO₂ + 12H₂O + प्रकाश ऊर्जा → C₆H₁₂O₆ + 6O₂ + 6H₂O
      ख. प्रोटीन संश्लेषण: अमीनो अम्लों के पेप्टाइड बंधों द्वारा जुड़कर शरीर की नई कोशिकाओं व ऊतकों का निर्माण।
      ग. ग्लाइकोजेनेसिस: अतिरिक्त ग्लूकोज का यकृत व पेशियों में ग्लाइकोजन के रूप में संचयन।
  2. अपचयी उपापचय / अपचय (Catabolism - विनाशात्मक उपापचय):
    • यह एक विघटनकारी या विनाशात्मक (Destructive) प्रक्रिया है जिसमें जटिल कार्बनिक अणु टूटकर सरल पदार्थों में परिवर्तित होते हैं।
    • यह एक ऊर्जा-विमोचक (Exergonic) प्रक्रिया है, जिसमें अणुओं के बंध टूटने से संचित ऊर्जा ATP के रूप में मुक्त होती है, जो जैविक कार्यों में उपयोग होती है।
    • इसके कारण जीव के शुष्क भार (Dry Weight) में कमी आती है।
    • प्रमुख उदाहरण:
      क. कोशिकीय श्वसन (Respiration): ग्लूकोज का ऑक्सीजन की उपस्थिति में ऑक्सीकरण होकर ऊर्जा, CO₂ और जल का बनना:
      C₆H₁₂O₆ + 6O₂ → 6CO₂ + 6H₂O + ऊर्जा (38 ATP / 686 kcal)
      ख. उत्सर्जन (Excretion): नाइट्रोजनी अपशिष्टों (यूरिया, यूरिक अम्ल) का विखंडन और शरीर से निष्कासन।
      ग. पाचन एवं लिपिड अपघटन: जटिल वसा और प्रोटीनों का सरल घटकों में टूटना।
तुलना का आधार उपचयी उपापचय (Anabolism) अपचयी उपापचय (Catabolism)
1. प्रक्रिया की प्रकृति रचनात्मक / संश्लेषणात्मक (Constructive) विनाशात्मक / विघटनकारी (Destructive)
2. ऊर्जा विनिमय ऊर्जा-शोषी / संचयी (Endergonic) — ऊर्जा संचित होती है ऊर्जा-विमोचक (Exergonic) — ATP ऊर्जा मुक्त होती है
3. शुष्क भार पर प्रभाव जीव के शुष्क भार में वृद्धि होती है (भार बढ़ता है) जीव के शुष्क भार में ह्रास होता है (भार घटता है)
4. रासायनिक परिवर्तन सरल अणुओं से जटिल कार्बनिक यौगिकों का संश्लेषण जटिल अणुओं का टूटकर सरल पदार्थों में रूपांतरण
5. प्रमुख उदाहरण प्रकाश संश्लेषण, प्रोटीन संश्लेषण, स्टार्च निर्माण श्वसन (Respiration), पाचन, उत्सर्जन
6. जैविक महत्व शरीर की वृद्धि, ऊतकों की मरम्मत और ऊर्जा संचय हेतु दैनिक जैविक गतिविधियों हेतु तत्पर ऊर्जा (ATP) आपूर्ति
1.4 सजीवों के अन्य विशिष्ट जीवन-लक्षण (Other Hallmarks of Life)

उपापचय के अतिरिक्त सजीवों में निम्नलिखित अनिवार्य जैविक लक्षण पाए जाते हैं:

  • वृद्धि (Growth): सजीवों में वृद्धि एक आंतरिक और अपरिवर्तनीय (Internal & Irreversible) प्रक्रिया है, जो नई कोशिकाओं के बनने और जीवद्रव्य के संचय से होती है। इसे 'अन्तःप्रवेश' (Intussusception) कहते हैं। इसके विपरीत, निर्जीवों (जैसे रेत के टीले या क्रिस्टल) में वृद्धि केवल बाहरी सतह पर पदार्थों के जमाव (Accretion) से होती है।
    वृद्धि का गतिक संतुलन: यदि उपचय > अपचय हो, तो शरीर में धनात्मक वृद्धि होती है। यदि उपचय = अपचय हो, तो वयस्क संतुलन रहता है। यदि उपचय < अपचय हो, तो वजन घटता है और वार्धक्य आता है।
  • संवेदनशीलता / उद्दीपनशीलता (Irritability / Sensitivity): बाह्य या आंतरिक वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को उद्दीपक (Stimulus) कहते हैं (जैसे प्रकाश, ताप, स्पर्श, ध्वनि, रसायन)। इन उद्दीपनों को ग्रहण कर उनके प्रति शारीरिक या व्यावहारिक प्रतिक्रिया (Response) व्यक्त करने की क्षमता को उद्दीपनशीलता कहते हैं।
    उदाहरण: छुईमुई (Mimosa pudica) की पत्तियों को छूते ही उनका झुक जाना (कंपानुकुंचन / Thigmonasty); पौधों के प्ररोह का प्रकाश की ओर मुड़ना (प्रकाशानुवर्तन / Phototropism); तेज प्रकाश में मानव आंख की पुतली का सिकुड़ जाना।
  • समस्थापन / होमियोस्टैसिस (Homeostasis): बाह्य पर्यावरण में निरंतर उतार-चढ़ाव होने के बावजूद सजीव शरीर द्वारा अपने आंतरिक वातावरण (Internal Environment / Milieu Intérieur) को एक स्थिर, अनुकूल और संतुलित अवस्था में बनाए रखने की क्षमता को समस्थापन कहते हैं।
    ऐतिहासिक संदर्भ: फ्रांसीसी शरीरक्रियाविज्ञानी क्लाउड बर्नार्ड (Claude Bernard) ने सर्वप्रथम 'आंतरिक वातावरण की स्थिरता' की संकल्पना दी, और अमेरिकी वैज्ञानिक वाल्टर बी. कैनन (Walter B. Cannon, 1932) ने इसके लिए 'होमियोस्टैसिस' शब्द गढ़ा।
    उदाहरण: अत्यधिक गर्मी में पसीना निकलकर मानव शरीर का तापमान 37°C पर स्थिर रहना (थर्मोरेग्युलेशन); रक्त में ग्लूकोज का स्तर 80-120 mg/100ml पर नियंत्रित रहना (इंसुलिन व ग्लूकागन हार्मोन द्वारा); जल-खनिज संतुलन (ऑस्मोरिग्युलेशन)।
  • जनन (Reproduction): अपनी जाति के अस्तित्व और आनुवंशिक निरंतरता को बनाए रखने के लिए अपने जैसी नई संतान उत्पन्न करने की क्षमता। यह अलैंगिक (Asexual - विखंडन, मुकुलन, बीजाणुजनन) या लैंगिक (Sexual - युग्मक संलयन) विधि से होता है।
  • वार्धक्य एवं जैविक मृत्यु (Senescence & Death): समय बीतने के साथ कोशिकाओं और ऊतकों की उपापचयी कार्यक्षमता का धीरे-धीरे ह्रास होना वार्धक्य कहलाता है। अंततः जब शरीर की सभी समन्वित उपापचयी क्रियाएं और जीवद्रव्यी गतिविधियां स्थायी रूप से बंद हो जाती हैं, तो उसे मृत्यु कहते हैं। मृत्यु सजीवों की जीवन-चक्र की अंतिम अपरिहार्य अवस्था है।

मॉड्यूल 2: जीवन की उत्पत्ति एवं प्रारंभिक जैव विकास (Origin of Life & Early Evolution)

2.1 ब्रह्मांड, पृथ्वी एवं जीवन की उत्पत्ति का कालक्रम (Cosmic Timeline)

आधुनिक खगोल भौतिकी और भूगर्भ विज्ञान के अनुसार, जीवन की उत्पत्ति एक आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि ब्रह्मांडीय और रासायनिक विकास का एक सुदीर्घ परिणाम थी:

  • ब्रह्मांड की उत्पत्ति (Big Bang Theory): लगभग 13.8 अरब वर्ष (13.8 Ga) पूर्व एक महाविस्फोट (Big Bang) के साथ ब्रह्मांड, अंतरिक्ष, समय और पदार्थ का विस्तार प्रारंभ हुआ।
  • सौरमंडल एवं पृथ्वी का निर्माण: लगभग 4.6 अरब वर्ष (4.6 Ga) पूर्व धूल और गैसों के घूर्णनशील बादल (सौर निहारिका) के संघनन से सूर्य और पृथ्वी की उत्पत्ति हुई। प्रारंभिक पृथ्वी एक दहकते हुए तप्त गैसीय गोले के रूप में थी।
  • जीवन का प्रथम प्रादुर्भाव: पृथ्वी के ठंडे होने और महासागरों के बनने के बाद, लगभग 3.7 से 3.8 अरब वर्ष पूर्व आदिम महासागरों में पहले एककोशिकीय, अवायवीय, सूक्ष्मजीवों (प्रोकैरियोट्स) का उद्भव हुआ, जिनके जीवाश्मी साक्ष्य स्ट्रोमेटोलाइट्स (Stromatolites) के रूप में मिले हैं।
2.2 आदिम अपचायक वायुमंडल की विशेषताएं (Primitive Reducing Atmosphere)

प्रारंभिक पृथ्वी का वायुमंडल आज के आधुनिक वायुमंडल से सर्वथा भिन्न था। सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तथ्य यह है कि आदिम वायुमंडल में स्वतंत्र आण्विक ऑक्सीजन (Free Molecular O₂ = 0%) का पूर्ण अभाव था!

  • अपचायक प्रकृति (Reducing Nature): क्योंकि अत्यधिक मात्रा में हाइड्रोजन (H₂) उपस्थित थी, जिसने ऑक्सीजन को बांधकर जलवाष्प (H₂O) बना दिया, कार्बन को बांधकर मीथेन (CH₄) बना दिया और नाइट्रोजन को बांधकर अमोनिया (NH₃) बना दिया।
  • उपस्थित प्रमुख गैसें: मीथेन (CH₄), अमोनिया (NH₃), आण्विक हाइड्रोजन (H₂), जलवाष्प (H₂O), कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) और हाइड्रोजन सल्फाइड (H₂S)।
  • ऊर्जा के आदिम स्रोत: उस समय ओजोन परत (O₃) नहीं थी, अतः सूर्य की तीव्र पराबैंगनी किरणें (UV Rays), लगातार कड़कने वाली आकाशीय बिजली (Lightning), ज्वालामुखियों से निकलने वाला अत्यधिक ताप और ब्रह्मांडीय विकिरण (Cosmic Radiation) रासायनिक अभिक्रियाओं को ऊर्जा प्रदान करते थे।
2.3 ओपेरिन-हाल्डेन का रासायनिक विकास सिद्धांत (Oparin-Haldane Biochemical Evolution, 1924-1929)

रूसी जैव रसायनज्ञ अलेक्जेंडर आई. ओपेरिन (1924) और ब्रिटिश वैज्ञानिक जे.बी.एस. हाल्डेन (1929) ने स्वतंत्र रूप से जीवन की उत्पत्ति का रासायनिक विकास सिद्धांत (Theory of Chemical Evolution / Chemosynthesis) प्रतिपादित किया। उनके अनुसार: "जीवन की उत्पत्ति निर्जीव अकार्बनिक पदार्थों से धीरे-धीरे रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा सरल कार्बनिक अणुओं और फिर जटिल जैविक मैक्रोमोलेक्यूल्स के संश्लेषण से हुई है।"

  1. सरल अणुओं का निर्माण: आदिम वायुमंडल की गैसों (CH₄, NH₃, H₂, H₂O वाष्प) ने ऊर्जा स्रोतों (UV किरणें, बिजली) के प्रभाव में परस्पर क्रिया कर सरल कार्बनिक अणु बनाए—जैसे सरल शर्करा (ग्लूकोज, राइबोज), ग्लिसरॉल, वसीय अम्ल, अमीनो अम्ल, और प्यूरीन व पिरिमिडीन नाइट्रोजनी क्षार।
  2. हाल्डेन का "तप्त तनु सूप" (Haldane's Hot Dilute Soup / Prebiotic Soup): आदिम पृथ्वी पर लगातार होने वाली मूसलाधार वर्षा ने इन सभी नव-संश्लेषित कार्बनिक अणुओं को धोकर खौलते हुए आदिम महासागरों में जमा कर दिया। हाल्डेन ने इस विशाल कार्बनिक घोल को 'तप्त तनु सूप' (Hot Dilute Soup) नाम दिया। क्योंकि उस समय वायुमंडल में ऑक्सीजन नहीं थी (ऑक्सीकरण का अभाव) और कोई सूक्ष्मजीव नहीं थे (अपघटन का अभाव), इसलिए ये कार्बनिक अणु लाखों वर्षों तक बिना नष्ट हुए महासागरों में अत्यधिक सांद्रित होते रहे।
  3. मैक्रोमोलेक्यूल्स का बहुलकीकरण: सरल अमीनो अम्लों के जुड़ने से प्रोटीन बने; शर्कराओं से जटिल पॉलीसैकेराइड बने; और न्यूक्लियोटाइड्स के जुड़ने से न्यूक्लिक अम्ल (RNA और DNA) का निर्माण हुआ।
  4. आदिम कोशिकाओं (Protobionts) का निर्माण:
    • ओपेरिन के कोएसरवेट्स (Coacervates): ओपेरिन ने प्रदर्शित किया कि जब प्रोटीन, पॉलीसैकेराइड और जल के कोलाइडल घोल को मिलाया जाता है, तो वे परस्पर आकर्षित होकर सूक्ष्म कोलाइडल बूंदों के रूप में अलग हो जाते हैं, जिन्हें 'कोएसरवेट्स' कहा गया। ये बूंदें अपने चारों ओर जल और लिपिड-प्रोटीन की एक सुरक्षात्मक झिल्ली बना लेती थीं। इनमें बाह्य वातावरण से पोषक तत्वों को अवशोषित करने, बढ़ने और विभाजित होने की क्षमता थी। किंतु इनमें लिपिड द्विपरत और निश्चित आनुवंशिक तंत्र नहीं था।
    • सिडनी फॉक्स के माइक्रोस्फीयर्स (Sidney Fox's Microspheres): अमेरिकी वैज्ञानिक सिडनी फॉक्स ने सूखे अमीनो अम्लों के मिश्रण को 160°-180°C पर गर्म कर कृत्रिम प्रोटीन सदृश अणु बनाए, जिन्हें उन्होंने 'प्रोटीनॉइड' (Proteinoids) कहा। जब इन प्रोटीनॉइड्स को गर्म जल में घोला गया और ठंडा किया गया, तो 1-2 माइक्रोमीटर व्यास वाले अरबों द्विस्तरीय सूक्ष्म गोलक बने, जिन्हें माइक्रोस्फीयर्स कहा गया। इनमें ऑस्मोटिक गुण, आंशिक एंजाइमी उत्प्रेरण और मुकुलन (Budding) द्वारा प्रजनन जैसी क्षमताएं थीं।
2.4 मिलर और यूरे का ऐतिहासिक प्रयोग (The Miller-Urey Experiment, 1953)

वर्ष 1953 में शिकागो विश्वविद्यालय के युवा शोधकर्ता स्टैनली एल. मिलर (Stanley L. Miller) और उनके प्राध्यापक हेरोल्ड सी. यूरे (Harold C. Urey) ने प्रयोगशाला में आदिम पृथ्वी की परिस्थितियों का कृत्रिम अनुकरण करके ओपेरिन-हाल्डेन सिद्धांत का प्रत्यक्ष प्रायोगिक प्रमाण प्रस्तुत किया।

मिलर-यूरे उपकरण की संरचना एवं कार्यप्रणाली:
  • स्पार्क डिस्चार्ज ग्लास उपकरण (Spark-Discharge Apparatus): मिलर ने एक पूरी तरह से वायुरोधी (Airtight) कांच का चक्राकार उपकरण तैयार किया, जिससे वायु (O₂) को निर्वात पंप द्वारा पूरी तरह बाहर निकाल दिया गया था।
  • गैसों का मिश्रण एवं अनुपात: 5-लीटर के मुख्य गोल फ्लास्क में उन्होंने आदिम वायुमंडल की गैसों का मिश्रण भरा:
    मीथेन (CH₄) : अमोनिया (NH₃) : हाइड्रोजन (H₂) = 2 : 2 : 1 का निश्चित आयतन अनुपात।
  • उबलता जल फ्लास्क (Boiling Water Flask): एक छोटे फ्लास्क में जल को निरंतर उबाला गया, जिससे उत्पन्न जलवाष्प उपकरण में लगातार घूमती रही, जो आदिम वर्षा और जल चक्र का प्रतीक थी।
  • टंगस्टन इलेक्ट्रोड एवं विद्युत स्फुलिंग: मुख्य गैस फ्लास्क में दो टंगस्टन इलेक्ट्रोड लगाए गए, जिनके माध्यम से 60,000 वोल्ट का उच्च वोल्टेज विद्युत स्फुलिंग (Electric Spark) लगातार 7 दिनों (एक सप्ताह) तक प्रवाहित किया गया। यह आकाशीय बिजली का कृत्रिम रूप था। तापमान लगभग 800°C रखा गया।
  • कंडेनसर (Condenser) एवं यू-ट्रैप (U-trap): स्फुलिंग कक्ष से निकलने वाली गैसों और भाप को एक जल शीतलक (Condenser) से गुजारा गया, जिससे वे संघनित होकर तरल बन गईं और उपकरण के निचले भाग में लगे 'यू-ट्रैप' (U-shaped trap) में एकत्र होती रहीं।

प्रायोगिक परिणाम एवं क्रोमैटोग्राफी विश्लेषण:

  • एक सप्ताह बाद यू-ट्रैप में जमा तरल का रंग पारदर्शी से बदलकर गहरा लाल-भूरा हो गया था।
  • जब मिलर ने इस तरल का कागज क्रोमैटोग्राफी (Paper Chromatography) और रासायनिक परीक्षण किया, तो वे आश्चर्यचकित रह गए। उस निर्जीव गैसीय मिश्रण से जीवन के निर्माणकारी खंड सरल अमीनो अम्ल संश्लेषित हो चुके थे!
  • प्राप्त प्रमुख यौगिक:
    1. अमीनो अम्ल: ग्लाइसिन (Glycine - सबसे सरल), ऐलेनिन (Alanine), और एस्पार्टिक एसिड (Aspartic acid)।
    2. कार्बनिक अम्ल: फॉर्मिक एसिड, एसिटिक एसिड, लैक्टिक एसिड, ग्लाइकोलिक एसिड और सक्सीनिक एसिड।
    3. अन्य यौगिक: यूरिया, हाइड्रोजन सायनाइड (HCN), और फॉर्मेल्डिहाइड (HCHO)।
  • निष्कर्ष एवं ऐतिहासिक महत्व: मिलर और यूरे के प्रयोग ने निर्विवाद रूप से सिद्ध कर दिया कि आदिम पृथ्वी के अपचायक वातावरण में अकार्बनिक गैसों से कार्बनिक अणुओं का स्वतः अजैविक संश्लेषण (Abiotic Synthesis) पूर्णतः संभव था। इसने ओपेरिन-हाल्डेन की परिकल्पना को वैज्ञानिक तथ्य में बदल दिया।
2.5 प्रारंभिक जैव विकास: आरएनए वर्ल्ड, सायनोबैक्टीरिया एवं एंडोसिम्बायोसिस
  • आरएनए वर्ल्ड परिकल्पना (RNA World Hypothesis): वैज्ञानिक वॉल्टर गिल्बर्ट (1986) ने प्रतिपादित किया कि डीएनए और प्रोटीन से पहले पृथ्वी पर जीवन 'आरएनए' (RNA) पर आधारित था। आरएनए न केवल आनुवंशिक सूचनाओं का भंडारण कर सकता था, बल्कि थॉमस चेक और सिडनी ऑल्टमैन द्वारा खोजे गए 'राइबोजाइम' (Ribozyme) की भांति उत्प्रेरक (एंजाइम) का कार्य भी कर सकता था। बाद में अधिक स्थिरता के कारण डीएनए ने आनुवंशिक पदार्थ और प्रोटीनों ने उत्प्रेरक का स्थान ले लिया।
  • प्रथम जीव (First Living Organisms): पृथ्वी पर सबसे पहले विकसित होने वाले जीव एककोशिकीय, अवायवीय (Anaerobic), प्रोकैरियोटिक और विषमपोषी (Heterotrophic) थे। वे महासागरों के 'तप्त तनु सूप' में मौजूद कार्बनिक पदार्थों को किण्वन (Fermentation) द्वारा ग्रहण करते थे।
  • सायनोबैक्टीरिया एवं ऑक्सीजन क्रांति (The Great Oxidation Event): लगभग 2.5 से 2.8 अरब वर्ष पूर्व नील-हरित शैवाल (Cyanobacteria / Blue-Green Algae) का प्रादुर्भाव हुआ। इन्होंने पृथ्वी पर पहली बार ऑक्सीजन जनित प्रकाश संश्लेषण (Oxygenic Photosynthesis) प्रारंभ किया, जिसमें जल (H₂O) का विखंडन कर सह-उत्पाद के रूप में स्वतंत्र ऑक्सीजन (O₂) गैस वायुमंडल में मुक्त की गई।
    इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी का अपचायक वायुमंडल ऑक्सीकारक (Oxidizing) वायुमंडल में परिवर्तित हो गया। इसे 'द ग्रेट ऑक्सीडेशन इवेंट' (Great Oxidation Event) कहते हैं। स्वतंत्र O₂ से समताप मंडल में ओजोन परत (O₃ Shield) का निर्माण हुआ, जिसने घातक UV विकिरणों को रोककर जीवों के जल से निकलकर स्थल पर आने का मार्ग प्रशस्त किया।
  • एंडोसिम्बायोटिक सिद्धांत (Endosymbiotic Theory): अमेरिकी जीवविज्ञानी लिन मार्गुलीस (Lynn Margulis, 1967) ने प्रतिपादित किया कि यूकैरियोटिक कोशिकाओं के भीतर उपस्थित दो प्रमुख कोशिकांग—माइटोकॉन्ड्रिया (श्वसन अंगक) और क्लोरोप्लास्ट (प्रकाश संश्लेषक अंगक)—वास्तव में स्वतंत्र रहने वाले प्राचीन आदिम प्रोकैरियोटिक जीवाणु थे। आदिम यूकैरियोट्स ने इनका अंतर्ग्रहण किया, किंतु इन्हें पचाने के बजाय इनके साथ स्थायी अंतःसहजीवन (Endosymbiosis) स्थापित कर लिया। प्रमाण: माइटोकॉन्ड्रिया और क्लोरोप्लास्ट दोनों के पास अपना स्वयं का वृत्ताकार डीएनए (Circular DNA) और 70S प्रोकैरियोटिक राइबोसोम होते हैं, और वे द्विखंडन द्वारा विभाजित होते हैं।

मॉड्यूल 3: जैव विविधता एवं उसका संरक्षण (Biodiversity and Conservation)

3.1 जैव विविधता की अवधारणा एवं परिभाषा (Concept & Definition)

पृथ्वी पर उपस्थित सूक्ष्मजीवों, कवकों, पौधों और जंतुओं की प्रजातियों की विशाल संख्या, उनकी परस्पर विविधता और उनके पारिस्थितिक तंत्रों की समृद्ध जटिलता को जैव विविधता (Biological Diversity / Biodiversity) कहा जाता है।

  • शब्द का उद्भव: 'बायोडायवर्सिटी' (Biodiversity) शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अमेरिकी वैज्ञानिक वाल्टर जी. रोसेन (Walter G. Rosen, 1985) ने किया था।
  • वैज्ञानिक प्रसार: प्रसिद्ध अमेरिकी कीटविज्ञानी और पर्यावरणविद एडवर्ड ओ. विल्सन (Edward O. Wilson) ने इस अवधारणा को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाया, जिसके लिए उन्हें 'जैव विविधता का जनक' (Father of Biodiversity) कहा जाता है।
3.2 जैव विविधता के तीन पदानुक्रमिक स्तर (Three Levels of Biodiversity)

जैव विविधता का अध्ययन निम्नलिखित तीन स्पष्ट स्तरों पर किया जाता है:

  1. आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity): एक ही प्रजाति के विभिन्न जीवों के बीच जीनों (Genes) और डीएनए अनुक्रमों में पाई जाने वाली विभिन्नता को आनुवंशिक विविधता कहते हैं। यह विविधता प्रजातियों को बदलते पर्यावरण और रोगों के प्रति अनुकूलन क्षमता प्रदान करती है।
    उदाहरण:
    • भारत में अकेले धान (Oryza sativa) की 50,000 से अधिक आनुवंशिक किस्में और आम (Mangifera indica) की 1,000 से अधिक किस्में पाई जाती हैं।
    • हिमालय की विभिन्न श्रेणियों में उगने वाले औषधीय पौधे सर्पगंधा (Rauvolfia vomitoria) में पाए जाने वाले सक्रिय रसायन 'रिसरपिन' की क्षमता और सांद्रता में आनुवंशिक भिन्नता होती है।
  2. प्रजातीय विविधता (Species Diversity): किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र या समुदाय में पाई जाने वाली विभिन्न प्रजातियों की संख्या (प्रजाति प्रचुरता - Species Richness) और उनकी सापेक्ष प्रचुरता (Species Evenness) को प्रजातीय विविधता कहते हैं।
    उदाहरण: भारत के पश्चिमी घाट (Western Ghats) में उभयचरों (मेंढकों) की प्रजाति विविधता पूर्वी घाट (Eastern Ghats) की तुलना में कहीं अधिक समृद्ध है।
  3. पारिस्थितिक या समुदाय विविधता (Ecosystem Diversity): किसी विशाल भौगोलिक क्षेत्र में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के आवासों, जैविक समुदायों और पारिस्थितिक तंत्रों (जैसे वर्षावन, प्रवाल भित्ति, मैंग्रोव, घास के मैदान, रेगिस्तान, आर्द्रभूमि) की विविधता को पारिस्थितिक विविधता कहते हैं।
    पारिस्थितिकविद आर.एच. व्हिटेकर (R.H. Whittaker, 1972) ने पारिस्थितिक विविधता को तीन घटकों में वर्गीकृत किया:
    • अल्फा विविधता (Alpha Diversity - α): एक ही स्थानीय समुदाय या आवास के भीतर उपस्थित प्रजातियों की संख्या।
    • बीटा विविधता (Beta Diversity - β): दो संलग्न या भिन्न आवासों के बीच प्रजातियों के बदलाव या प्रतिस्थापन की दर (प्रजाति विस्थापन)।
    • गामा विविधता (Gamma Diversity - γ): एक संपूर्ण बड़े भौगोलिक क्षेत्र, प्रदेश या बायोम में पाई जाने वाली कुल प्रजातीय विविधता।
3.3 जैव विविधता का महत्व एवं आर्थिक-औषधीय उपयोग

जैव विविधता मानव सभ्यता के अस्तित्व और आर्थिक समृद्धि का मूल आधार है:

  1. प्रत्यक्ष आर्थिक उपयोग: भोजन (अनाज, फल, सब्जियां), इमारती लकड़ी (सागौन, साल), वस्त्र निर्माण हेतु प्राकृतिक रेशे (कपास, पटसन, रेशम), गोंद, राल, रबर और सुगंधित तेल।
  2. जीवनरक्षक औषधियां (Medicinal Value): आधुनिक एलोपैथिक दवाओं में से 25% से अधिक औषधियां सीधे पौधों और कवकों से प्राप्त होती हैं। प्रमुख औषधीय पादप एवं उनके सक्रिय घटक निम्नलिखित हैं:
पौधा / स्रोत (वैज्ञानिक नाम) प्रयुक्त अंग सक्रिय क्षार / रसायन चिकित्सीय उपयोग एवं रोग निवारण
सिनकोना (Cinchona officinalis) तने की छाल (Bark) कुनैन (Quinine) विश्व-प्रसिद्ध मलेरिया रोधी (Antimalarial) अचूक औषधि
सर्पगंधा (Rauvolfia serpentina) जड़ (Root) रिसरपिन (Reserpine) उच्च रक्तचाप (Hypertension) नियंत्रण एवं मानसिक अनिद्रा रोधी
सदाबहार / नयनतारा (Catharanthus roseus) पत्तियां एवं जड़ विनब्लास्टिन एवं विनक्रिस्टिन ल्यूकेमिया (रक्त कैंसर) तथा हॉजकिन्स लिंफोमा का जीवनरक्षक उपचार
पेनिसिलियम कवक (Penicillium notatum) कवक जाल (माइसेलियम) पेनिसिलिन (Penicillin) विश्व की प्रथम चमत्कारिक एंटीबायोटिक (प्रतिजैविक) औषधि
अफीम पोस्त (Papaver somniferum) अधपके फल का दूध (Latex) मॉर्फिन (Morphine) व कोडीन अत्यंत शक्तिशाली दर्द निवारक (Analgesic / Sedative) औषधि
बेलाडोना (Atropa belladonna) पत्तियां एवं जड़ एट्रोपिन (Atropine) आंख की पुतली फैलाने एवं तंत्रिका तंत्र के दर्द निवारण हेतु

3. पारिस्थितिक सेवाएं (Ecosystem Services):

  • परागण (Pollination): मधुमक्खियों, तितलियों, चमगादड़ों और पक्षियों द्वारा कृषि फसलों और जंगली पौधों का परागण, जिसके बिना विश्व की 80% खाद्य फसलों का उत्पादन असंभव है।
  • गैसीय संतुलन: वनों द्वारा प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से वायुमंडल से CO₂ का अवशोषण और O₂ की निरंतर आपूर्ति (उदा. अमेजन वर्षावन को 'पृथ्वी का फेफड़ा' कहा जाता है)।
  • पोषक तत्व चक्रण व अपघटन: जीवाणुओं और कवकों द्वारा मृत कार्बनिक पदार्थों का अपघटन कर खनिजों को पुनः मृदा में लौटाना (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, कार्बन चक्र)।
  • मृदा व जल संरक्षण: वृक्षों की जड़ें मृदा अपरदन को रोकती हैं और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देती हैं।
3.4 जैव विविधता ह्रास के कारण ("The Evil Quartet")

मानवीय हस्तक्षेप के कारण आज प्रजातियों के विलुप्त होने की दर प्राकृतिक दर से 100 से 1,000 गुना अधिक तीव्र हो चुकी है। जीवविज्ञानी एडवर्ड ओ. विल्सन ने जैव विविधता ह्रास के चार प्रमुख कारणों को "द इविल क्वार्टेट" (The Evil Quartet - विनाश के चार दैत्य) का नाम दिया:

  1. आवास विनाश एवं विखंडन (Habitat Loss & Fragmentation): यह जैव विविधता के विनाश का सबसे प्रमुख और विनाशकारी कारण है। कृषि विस्तार, शहरीकरण, खनन, और बांध निर्माण के लिए वनों को अंधाधुंध काटा जा रहा है। उष्णकटिबंधीय वर्षावन जो कभी पृथ्वी के 14% भूभाग पर फैले थे, आज घटकर 6% से भी कम रह गए हैं। जब बड़े आवास छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट जाते हैं, तो बड़े क्षेत्र में विचरण करने वाले स्तनधारी और प्रवासी पक्षी सबसे पहले प्रभावित होते हैं।
  2. अति-दोहन (Over-exploitation): जब मानव की आवश्यकताएं लालच में बदल जाती हैं, तो प्रजातियों का अत्यधिक शिकार, वध और कटाई शुरू हो जाती है। पिछले 500 वर्षों में मानव द्वारा अति-दोहन के कारण कई प्रजातियां हमेशा के लिए विलुप्त हो गईं—जैसे डोडो पक्षी (मॉरीशस), यात्री कबूतर (Passenger Pigeon), और स्टेलर की समुद्री गाय (Steller's Sea Cow)।
  3. विदेशी प्रजातियों का आक्रमण (Alien Species Invasions): जब किसी गैर-स्थानीय प्रजाति को जानबूझकर या अनजाने में किसी नए पारितंत्र में लाया जाता है, तो वहां प्राकृतिक परभक्षियों के अभाव में वे अनियंत्रित रूप से फैलकर स्थानीय देशज प्रजातियों को नष्ट कर देती हैं।
    प्रमुख उदाहरण:
    • जलकुंभी (Eichhornia crassipes): इसे इसके सुंदर फूलों के लिए भारत लाया गया था। यह जलाशयों में इतनी तेजी से फैलती है कि पानी की सतह को पूरी तरह ढककर ऑक्सीजन सोख लेती है (Eutrophication), जिससे मछलियां और अन्य जलीय जीव दम घुटने से मर जाते हैं। इसे "बंगाल का आतंक" (Terror of Bengal) कहा जाता है।
    • गाजर घास / पार्थेनियम (Parthenium hysterophorus): आयातित गेहूं के साथ भारत आई यह आक्रामक खरपतवार हमारे चरागाहों और स्थानीय वनस्पतियों को नष्ट कर रही है और मनुष्यों में त्वचा एलर्जी और दमा पैदा करती है।
    • तिलापिया मछली (Oreochromis mossambicus) व अफ्रीकी कैटफिश (Clarias gariepinus): ये जलीय तंत्रों में देशी मांगुर और अन्य स्थानीय मछलियों का अस्तित्व समाप्त कर रही हैं।
  4. सह-विलुप्ति (Co-extinctions): जब दो प्रजातियां एक-दूसरे पर अनिवार्य रूप से आश्रित होती हैं (जैसे पारस्परिक सहजीवन या परजीवी-पोषक संबंध), तो पोषक प्रजाति के विलुप्त होने पर उस पर आश्रित दूसरी प्रजाति भी स्वतः अनिवार्य रूप से विलुप्त हो जाती है। उदा. किसी विशिष्ट पौधे के विलुप्त होने पर उसका अनन्य परागणकर्ता कीट भी समाप्त हो जाता है।
3.5 जैव विविधता हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspots)

जैव विविधता हॉटस्पॉट पृथ्वी के वे विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र हैं जहां प्रजाति प्रचुरता और स्थानिक प्रजातियों की सघनता असाधारण रूप से उच्च होती है, किंतु साथ ही वे मानव गतिविधियों के कारण गंभीर संकट में होते हैं।

  • संकल्पना: यह अवधारणा ब्रिटिश पर्यावरणविद नॉर्मन मायर्स (Norman Myers) द्वारा वर्ष 1988 में प्रस्तुत की गई थी।
  • हॉटस्पॉट निर्धारण के दो अनिवार्य कठोर मानदंड (Norman Myers' Criteria):
    1. असाधारण स्थानिकता (High Endemism): उस क्षेत्र में कम से कम 1,500 स्थानिक संवहनी पौधे (Vascular Plants) पाए जाने चाहिए (यानी वे पौधे पूरी दुनिया में केवल उसी क्षेत्र में पाए जाते हों)।
    2. गंभीर आवास संकट (Degree of Threat): उस क्षेत्र का कम से कम 70% मूल प्राकृतिक आवास हमेशा के लिए नष्ट हो चुका हो (यानी केवल 30% या उससे कम मूल वनस्पति शेष बची हो)।
  • वैश्विक एवं भारतीय परिदृश्य:
    वर्तमान में संपूर्ण विश्व में 36 जैव विविधता हॉटस्पॉट चिन्हित हैं, जो पृथ्वी के मात्र 2.4% भूभाग को घेरते हैं, किंतु इनमें विश्व की 50% से अधिक पादप प्रजातियां और 42% स्थलीय कशेरुकी पाए जाते हैं।
    भारत के समृद्ध जैव भूगोल में 4 प्रमुख हॉटस्पॉट्स का विस्तार है:
    1. पश्चिमी घाट एवं श्रीलंका (Western Ghats and Sri Lanka): महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु की पर्वत श्रृंखलाएं। यह क्षेत्र सदाबहार वनों, स्थानिक उभयचरों (मेंढक), सरीसृपों और लायन-टेल्ड मकाक (Lion-tailed Macaque) का घर है।
    2. पूर्वी हिमालय (Eastern Himalayas): सिक्किम, पश्चिम बंगाल (दार्जिलिंग), असम, अरुणाचल प्रदेश और भूटान का पर्वतीय क्षेत्र। यह लाल पांडा (Red Panda), कस्तूरी मृग और हजारों दुर्लभ ऑर्किड्स के लिए प्रसिद्ध है।
    3. इंडो-बर्मा (Indo-Burma): पूर्वोत्तर भारत (असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम आदि) से लेकर म्यांमार, थाईलैंड और वियतनाम तक फैला विशाल क्षेत्र।
    4. सुंडालैंड (Sundaland): भारत का अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह इसी हॉटस्पॉट के अंतर्गत आता है (जो आगे इंडोनेशिया और मलेशिया तक विस्तृत है)। यह प्रवाल भित्तियों और मैंग्रोव विविधता के लिए विख्यात है।

मॉड्यूल 4: वर्गिकी, सिस्टेमैटिक्स एवं लिनियन पदानुक्रम (Taxonomy & Linnaean Hierarchy)

4.1 वर्गिकी एवं सिस्टेमैटिक्स की अवधारणा (Taxonomy & Systematics)

पृथ्वी पर ज्ञात लगभग 17-18 लाख प्रजातियों का व्यक्तिगत रूप से अध्ययन करना असंभव है। अतः सजीवों की समानताओं और विभिन्नताओं के आधार पर उन्हें समूहों में व्यवस्थित करना अनिवार्य है।

  • वर्गिकी (Taxonomy): जीव विज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत सजीवों की पहचान (Identification), नामकरण (Nomenclature) और वर्गीकरण (Classification) के नियमों एवं सिद्धांतों का अध्ययन किया जाता है।
    'टैक्सोनॉमी' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग फ्रांसीसी वनस्पतिशास्त्री ए.पी. डी केंडोल (A.P. de Candolle, 1813) ने अपनी पुस्तक 'थ्योरी एलिमेंटेयर डे ला बोटैनिक' में किया था।
  • सिस्टेमैटिक्स (Systematics): लैटिन शब्द 'सिस्टेमा' (Systema) से बना है, जिसका अर्थ है जीवों की नियमित सुव्यवस्थित व्यवस्था। सिस्टेमैटिक्स में न केवल जीवों की पहचान और वर्गीकरण शामिल है, बल्कि उनके बीच मौजूद विकासीय एवं तुलनात्मक जातिवृत्तीय संबंधों (Evolutionary & Phylogenetic Relationships) का समग्र वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है।
4.2 कैरोलस लिनियस: वर्गिकी के जनक (Carolus Linnaeus: Father of Taxonomy)

स्वीडिश प्रकृतिवादी और चिकित्सक कैरोलस लिनियस (1707-1778) को आधुनिक 'वर्गिकी का जनक' (Father of Taxonomy) कहा जाता है। उन्होंने जीवों के वर्गीकरण को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया और द्विनाम पद्धति की नींव रखी।

  • ऐतिहासिक पुस्तकें:
    • 'स्पीशीज प्लांटारम' (Species Plantarum - 1 मई 1753): इस अमर ग्रंथ में लिनियस ने पौधों की 5,900 प्रजातियों का वैज्ञानिक वर्णन किया और वनस्पति नामकरण की द्विनाम पद्धति प्रस्तुत की।
    • 'सिस्टेमा नेचुरी' (Systema Naturae - 1758 का 10वां संस्करण): 1 अगस्त 1758 को प्रकाशित इस 10वें संस्करण में जंतुओं के वैज्ञानिक नामकरण की आधिकारिक शुरुआत मानी जाती है।
4.3 लिनियन पदानुक्रम के 7 अनिवार्य स्तर (The Linnaean Hierarchy)

वर्गीकरण कोई एकल चरण वाली प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसमें पदानुक्रमिक चरणों (Hierarchy of Steps) की एक श्रृंखला होती है, जिसमें प्रत्येक स्तर को 'संवर्ग' (Category) या 'टैक्सॉन' (Taxon, बहुवचन Taxa) कहा जाता है।

लिनियस द्वारा प्रतिपादित 7 अनिवार्य संवर्गों का अवरोही क्रम (Descending Order) निम्नलिखित है:

लिनियन पदानुक्रम का निश्चित क्रम:
जगत (Kingdom) → संघ / प्रभाग (Phylum / Division) → वर्ग (Class) → गण (Order) → कुल (Family) → वंश (Genus) → जाति (Species)
*नोट: जंतुओं के लिए 'संघ' (Phylum) और पौधों के लिए 'प्रभाग' (Division) शब्द प्रयुक्त होता है।
  • जाति (Species): यह वर्गीकरण की मूलभूत, सबसे छोटी और वास्तविक प्राकृतिक इकाई (Basic Unit of Classification) है। 'स्पीशीज' शब्द जॉन रे (John Ray) ने दिया था। अर्न्स्ट मेयर (Ernst Mayr) की जैविक जाति संकल्पना के अनुसार: "जाति आपस में स्वतंत्र अंतःप्रजनन (Interbreeding) करने में सक्षम और जननक्षम संतान पैदा करने वाले जीवों का वास्तविक प्राकृतिक समूह है।"
  • वंश (Genus): परस्पर निकट संबंध रखने वाली जातियों का समूह (उदा. शेर, बाघ और तेंदुआ तीनों अलग जातियां हैं किंतु समान लक्षणों के कारण एक ही वंश Panthera में आते हैं)।
  • कुल (Family): संबंधित वंशों का समूह (उदा. बिल्ली वंश Felis और शेर-बाघ वंश Panthera एक ही कुल Felidae में आते हैं)।
  • गण (Order): मिलते-जुलते कुलों का समूह (उदा. मांसाहारी कुल Felidae और Canidae गण Carnivora में आते हैं)।
  • वर्ग (Class): संबंधित गणों का समूह (उदा. गण Carnivora और Primata वर्ग Mammalia में आते हैं)।
  • संघ / प्रभाग (Phylum / Division): संबंधित वर्गों का विशाल समूह (उदा. वर्ग Pisces, Amphibia, Reptilia, Aves, Mammalia संघ Chordata में आते हैं)।
  • जगत (Kingdom): वर्गीकरण का सर्वोच्च और सबसे बड़ा संवर्ग (उदा. सभी जंतु जगत Animalia में आते हैं)।
पदानुक्रमिक संवर्ग (Category) मानव (Human) का वर्गीकरण आम (Mango) का वर्गीकरण
1. जगत (Kingdom) एनिमेलिया (Animalia) प्लांटी (Plantae)
2. संघ / प्रभाग (Phylum / Division) कॉर्डेटा (Chordata) एंजियोस्पर्माई (Angiospermae)
3. वर्ग (Class) स्तनधारी / मैमेलिया (Mammalia) द्विबीजपत्री / डाइकोटिलीडोने (Dicotyledonae)
4. गण (Order) प्राइमेट्स / प्राइमाटा (Primata) सैपिंडेल्स (Sapindales)
5. कुल (Family) होमिनिडी (Hominidae) एनाकार्डिएसी (Anacardiaceae)
6. वंश (Genus) Homo Mangifera
7. जाति (Species) Homo sapiens Mangifera indica
4.4 द्विनाम पद्धति एवं इसके अंतरराष्ट्रीय नियम (Binomial Nomenclature & Code Rules)

संसार के विभिन्न देशों और क्षेत्रों में एक ही जीव के अलग-अलग स्थानीय नाम होते हैं (जैसे गौरैया को हिंदी में गौरैया, बंगाली में चोड़ाई, अंग्रेजी में हाउस स्पैरो और स्पैनिश में गोरीओन कहा जाता है)। इस भ्रम को दूर करने के लिए कैरोलस लिनियस ने द्विनाम पद्धति (Binomial Nomenclature) का प्रतिपादन किया, जिसमें प्रत्येक जीव को एक सार्वभौमिक वैज्ञानिक नाम दिया जाता है।

यह प्रणाली अंतरराष्ट्रीय संहिताओं—ICN / ICBN (International Code of Botanical Nomenclature) तथा ICZN (International Code of Zoological Nomenclature)—द्वारा शासित होती है:

द्विनाम नामकरण के 5 सर्वमान्य अंतरराष्ट्रीय नियम:
  1. दो लैटिन पद: प्रत्येक वैज्ञानिक नाम में दो पद होते हैं—पहला पद वंश का नाम (Generic Name) और दूसरा पद जाति संकेत पद (Specific Epithet) होता है। ये नाम लैटिन भाषा से लिए जाते हैं या उनका लैटिनीकरण किया जाता है।
  2. कैपिटल एवं स्मॉल अक्षर का नियम: वंश के नाम का पहला अक्षर सदैव बड़ा (Capital) होना चाहिए, जबकि जाति संकेत पद का पहला अक्षर सदैव छोटा (Small/Lowercase) होना चाहिए (उदा. Homo sapiens, न कि Homo Sapiens)।
  3. मुद्रण नियम: छपाई या मुद्रण में वैज्ञानिक नाम सदैव तिरछे अक्षरों (Italics) में छापे जाते हैं, जो उनके लैटिन उद्भव को दर्शाता है।
  4. हस्तलेखन नियम: जब हाथ से पेन या पेंसिल से लिखा जाए, तो वंश और जाति दोनों पदों को अलग-अलग रेखांकित (Underlined separately) करना अनिवार्य है (उदा. Homo sapiens)।
  5. खोजकर्ता का नाम: जाति के नाम के अंत में उस वैज्ञानिक का नाम संक्षेप में लिखा जाता है जिसने सर्वप्रथम उस प्रजाति का वर्णन किया था (उदा. Mangifera indica Linn. — यहां Linn. लिनियस को दर्शाता है)।

पाठ्यक्रम के 12 अत्यंत महत्वपूर्ण सजीवों के मानक वैज्ञानिक नाम:

क्र. सं. सामान्य नाम (Common Name) वैज्ञानिक नाम (Scientific Name - Binomial) वर्ग / समूह
1मानव (Human)Homo sapiensस्तनधारी (Mammalia)
2बाघ / रॉयल बंगाल टाइगरPanthera tigrisस्तनधारी (राष्ट्रीय पशु)
3शेर (Lion)Panthera leoस्तनधारी (Mammalia)
4भारतीय मोर (Peacock)Pavo cristatusपक्षी (राष्ट्रीय पक्षी)
5रोहू मछली (Rohu carp)Labeo rohitaअस्थियुक्त मछली (Osteichthyes)
6कबूतर (Pigeon)Columba liviaपक्षी (Aves)
7भारतीय मेढक (Bullfrog)Hoplobatrachus tigerinusउभयचर (Amphibia)
8बरगद का वृक्ष (Banyan)Ficus benghalensisआवृतबीजी (राष्ट्रीय वृक्ष)
9धान (Rice)Oryza sativaएकबीजपत्री पादप (Monocot)
10उद्यान मटर (Pea)Pisum sativumद्विबीजपत्री पादप (Dicot)
11आम (Mango)Mangifera indicaद्विबीजपत्री (राष्ट्रीय फल)
12घरेलू मक्खी (Housefly)Musca domesticaकीट / आर्थ्रोपोडा

मॉड्यूल 5: व्हिटेकर का पांच-जगत वर्गीकरण (Whittaker's Five-Kingdom Classification, 1969)

5.1 पांच-जगत प्रणाली के वैज्ञानिक आधार (Criteria of Whittaker's System)

प्रारंभ में कैरोलस लिनियस ने सजीवों को केवल दो जगतों—पादप (Plantae) और जंतु (Animalia)—में बांटा था। किंतु इसमें प्रोकैरियोट्स और यूकैरियोट्स, एककोशिकीय और बहुकोशिकीय, तथा प्रकाश संश्लेषक और मृतोपजीवी कवकों को एक साथ रख दिया गया था।

वर्ष 1969 में प्रख्यात अमेरिकी पारिस्थितिकविद रॉबर्ट एच. व्हिटेकर (Robert H. Whittaker) ने एक क्रांतिकारी पांच-जगत वर्गीकरण प्रणाली (Five-Kingdom Classification) प्रस्तुत की। व्हिटेकर ने इस वर्गीकरण के लिए निम्नलिखित पांच प्रमुख वैज्ञानिक आधार (Five Criteria) निर्धारित किए:

व्हिटेकर वर्गीकरण के 5 आधारभूत मापदंड:
  1. कोशिकीय संरचना की जटिलता (Complexity of Cell Structure): कोशिका प्रोकैरियोटिक (अविकसित केंद्रक, झिल्ली रहित) है अथवा यूकैरियोटिक (सुस्पष्ट केंद्रक, झिल्लीयुक्त अंगक युक्त)।
  2. शारीरिक संगठन की जटिलता (Complexity of Body Organization): शरीर एककोशिकीय (Unicellular) है अथवा बहुकोशिकीय (Multicellular: ऊतक/अंग स्तर का)।
  3. पोषण की विधि (Mode of Nutrition): पोषण स्वपोषी (प्रकाश/रसायन संश्लेषक) है अथवा विषमपोषी (अवशोषी मृतोपजीवी अथवा अंतर्ग्रहणी होलोजोइक)।
  4. पारिस्थितिक भूमिका / जीवन शैली (Ecological Role / Life Style): पारितंत्र में जीव की भूमिका उत्पादक (Producer - पादप), उपभोक्ता (Consumer - जंतु), अथवा अपघटक (Decomposer - कवक) की है।
  5. जातिवृत्तीय विकासीय संबंध (Phylogenetic Relationships): जीवों का विकासीय इतिहास और पूर्वजों के साथ उनके संबंध (सरल से जटिल की ओर)।
5.2 पांचों जगतों का विस्तृत वैज्ञानिक विवरण
  1. 1. जगत मोनेरा (Kingdom Monera):
    • कोशिका प्रकार: सभी एककोशिकीय प्रोकैरियोटिक (Unicellular Prokaryotes) जीव। इनमें वास्तविक केंद्रक झिल्ली और केंद्रिका अनुपस्थित होती है (आनुवंशिक पदार्थ नग्न डीएनए 'न्यूक्लियोइड' के रूप में होता है)।
    • कोशिकांग: झिल्लीयुक्त अंगक (माइटोकॉन्ड्रिया, गॉल्जी बॉडी, एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम) अनुपस्थित। केवल 70S प्रकार के राइबोसोम पाए जाते हैं।
    • कोशिका भित्ति: दृढ़ कोशिका भित्ति उपस्थित, जो पेप्टिडोग्लाइकन / म्यूरिन (Peptidoglycan / Murein) और अमीनो शर्करा की बनी होती है (पादप सेल्यूलोज की नहीं)।
    • पोषण: स्वपोषी (प्रकाश संश्लेषक जैसे सायनोबैक्टीरिया, या रसायन संश्लेषक जैसे नाइट्रिफाइंग बैक्टीरिया) अथवा विषमपोषी (मृतोपजीवी या परजीवी)।
    • प्रमुख उदाहरण: एस्चेरिचिया कोलाई (E. coli), नोस्टॉक (Nostoc), एनाबीना (Anabaena), लैक्टोबैसिलस, तथा माइकोप्लाज्मा (Mycoplasma / PPLO - कोशिका भित्ति रहित सबसे छोटा जीवित प्रोकैरियोट)।
  2. 2. जगत प्रोटिस्टा (Kingdom Protista):
    • कोशिका प्रकार: सभी एककोशिकीय यूकैरियोटिक (Unicellular Eukaryotes) जीव। अधिकांश जलीय होते हैं।
    • कोशिकांग: सुस्पष्ट केंद्रक (द्विस्तरीय केंद्रक झिल्ली युक्त) तथा सभी झिल्लीयुक्त कोशिकांग (माइटोकॉन्ड्रिया, ER, गॉल्जी उपकरण) उपस्थित। राइबोसोम 80S प्रकार के होते हैं।
    • चलन अंग (Locomotion): गमन हेतु कूटपाद (Pseudopodia - अमीबा में), सिलिया (Cilia - पैरामीशियम में), अथवा कशाभिका (Flagella - यूग्लीना में) पाए जाते हैं।
    • पोषण: प्रकाश संश्लेषक स्वपोषी (डायटम), अथवा होलोजोइक विषमपोषी (अमीबा), अथवा मिश्रपोषी (Mixotrophic - यूग्लीना प्रकाश में स्वपोषी और अंधकार में विषमपोषी पोषण करता है, इसलिए इसे पादप और जंतु के बीच की संयोजक कड़ी कहते हैं)।
    • प्रमुख उदाहरण: अमीबा (Amoeba proteus), पैरामीशियम (Paramecium caudatum), यूग्लीना (Euglena viridis), डायटम्स (Diatoms), और प्लाज्मोडियम (Plasmodium vivax - मलेरिया परजीवी)।
  3. 3. जगत कवक / फंजाई (Kingdom Fungi):
    • मुख्य लक्षण: पर्णहरित रहित (Achlorophyllous), विषमपोषी, यूकैरियोटिक जीव। ये कभी भी प्रकाश संश्लेषण नहीं कर सकते।
    • शारीरिक संरचना: यीस्ट (एककोशिकीय) को छोड़कर सभी कवक बहुकोशिकीय तंतुमय होते हैं। इनके धागे जैसे पतले तंतुओं को हाइफी (Hyphae) और हाइफी के सघन जाल को माइसेलियम (Mycelium / कवकजाल) कहते हैं।
    • कोशिका भित्ति: इनकी कोशिका भित्ति नाइट्रोजनयुक्त जटिल पॉलीसैकेराइड काइटिन (Chitin) और फंगल सेल्यूलोज की बनी होती है।
    • पोषण की विधि: अवशोषी विषमपोषी (Absorptive Heterotrophs)। अधिकांश मृतोपजीवी (Saprophytes) होते हैं जो मृत कार्बनिक पदार्थों पर पाचक एंजाइम स्रावित कर उन्हें बाहर ही पचाते हैं और फिर तरल पोषक तत्वों को अवशोषित करते हैं। कुछ परजीवी या सहजीवी (लाइकेन) होते हैं।
    • संचित भोजन: पादपों की तरह स्टार्च नहीं, बल्कि ग्लाइकोजन एवं वसा (Glycogen & Oil droplets) के रूप में संचित रहता है।
    • प्रमुख उदाहरण: यीस्ट (Saccharomyces cerevisiae - बेकरी व मद्य निर्माण में उपयोगी), राइजोपस (Rhizopus - ब्रेड मोल्ड), पेनिसिलियम (Penicillium), एगेरिकस (Agaricus - खाने योग्य कुकुरमुत्ता / मशरूम), और एस्परगिलस।
  4. 4. जगत प्लांटी (Kingdom Plantae):
    • मुख्य लक्षण: सभी बहुकोशिकीय, यूकैरियोटिक, स्वपोषी (Autotrophic) पादप।
    • प्रकाश संश्लेषण: कोशिकाओं में पर्णहरित (क्लोरोफिल a एवं b) तथा अन्य वर्णक उपस्थित होते हैं, जिससे ये सौर ऊर्जा का उपयोग कर प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। ये पारिस्थितिक तंत्र के प्राथमिक उत्पादक (Producers) हैं।
    • कोशिका भित्ति एवं संचित भोजन: दृढ़ कोशिका भित्ति सेल्यूलोज (Cellulose) की बनी होती है। संचित भोजन स्टार्च (Starch / मंड) होता है।
    • शारीरिक संगठन: स्पष्ट ऊतक और अंग स्तर का संगठन। अधिकांश स्थिर (Non-motile) होते हैं।
    • प्रमुख उदाहरण: सभी शैवाल, ब्रायोफाइटा (मॉस), टेरिडोफाइटा (फर्न), जिम्नोस्पर्म (चीड़) और एंजियोस्पर्म (फूलदार पौधे)।
  5. 5. जगत एनिमेलिया (Kingdom Animalia):
    • मुख्य लक्षण: सभी बहुकोशिकीय, यूकैरियोटिक, विषमपोषी (Heterotrophic) जंतु।
    • कोशिका विशेषताएं: कोशिकाओं में कोशिका भित्ति (Cell Wall) और पर्णहरित पूर्णतः अनुपस्थित होते हैं। कोशिका के बाहर केवल लचीली प्लाज्मा झिल्ली होती है।
    • पोषण की विधि: प्राणिसमभोजी / होलोजोइक (Holozoic) पोषण—यानी भोजन का ठोस या तरल रूप में अंतर्ग्रहण (Ingestion), आंतरिक पाचन और अवशोषण। ये पारिस्थितिक तंत्र के उपभोक्ता (Consumers) हैं।
    • संचित भोजन: ग्लाइकोजन और वसा।
    • गतिशीलता व तंत्रिका तंत्र: अधिकांश जंतु भोजन और सुरक्षा के लिए चलनशील (Motile) होते हैं। इनमें उद्दीपनों को ग्रहण करने और अनुक्रिया व्यक्त करने के लिए विकसित तंत्रिका तंत्र (Nervous System) और संवेदी अंग पाए जाते हैं।
    • प्रमुख उदाहरण: स्पंज से लेकर कीट, घोंघा, मछली, मेंढक, पक्षी और स्तनधारी (मनुष्य सहित)।
5.3 पांचों जगतों की व्यापक तुलनात्मक तालिका (Comparative Master Chart)
लक्षण मोनेरा (Monera) प्रोटिस्टा (Protista) कवक (Fungi) प्लांटी (Plantae) एनिमेलिया (Animalia)
1. कोशिका प्रकार प्रोकैरियोटिक यूकैरियोटिक यूकैरियोटिक यूकैरियोटिक यूकैरियोटिक
2. कोशिका भित्ति पेप्टिडोग्लाइकन युक्त कुछ में उपस्थित (सेल्यूलोज) काइटिन (Chitin) की बनी सेल्यूलोज की बनी पूर्णतः अनुपस्थित
3. केंद्रक झिल्ली अनुपस्थित उपस्थित उपस्थित उपस्थित उपस्थित
4. शारीरिक संगठन एककोशिकीय एककोशिकीय बहुकोशिकीय तंतुमय (माइसेलियम) बहुकोशिकीय, ऊतक/अंग बहुकोशिकीय, अंग/अंग-तंत्र
5. पोषण की विधि स्वपोषी या विषमपोषी स्वपोषी / होलोजोइक / मिश्रपोषी अवशोषी विषमपोषी (मृतोपजीवी) प्रकाश संश्लेषक स्वपोषी होलोजोइक विषमपोषी (अंतर्ग्रहण)
6. संचित भोजन ग्लाइकोजन / वसा स्टार्च / लिपिड ग्लाइकोजन एवं तेल स्टार्च (मंड) ग्लाइकोजन एवं वसा
5.4 व्हिटेकर प्रणाली की सीमाएं एवं कमियां (Limitations of Five-Kingdom System)

यद्यपि व्हिटेकर की प्रणाली अत्यधिक वैज्ञानिक और व्यापक रूप से स्वीकृत है, फिर भी इसमें कुछ महत्वपूर्ण कमियां हैं:

  • वायरस, विरोइड्स और प्रियोन्स को स्थान नहीं: यह प्रणाली अकोशिकीय (Acellular) संरचनाओं—जैसे विषाणु (Viruses), विरोइड्स (Viroids) और प्रियोन्स (Prions)—को किसी भी जगत में स्थान नहीं दे सकी। विषाणु सजीव और निर्जीव के बीच की सीमा रेखा पर स्थित होते हैं।
  • प्रोटिस्टा जगत की अत्यधिक विषमता: प्रोटिस्टा जगत में पादप-सम (शैवाल/डायटम्स), कवक-सम (स्लाइम मोल्ड्स) और जंतु-सम (प्रोटोजोआ) जीवों को केवल एककोशिकीय यूकैरियोट होने के आधार पर एक साथ ठूंस दिया गया है, जिनके बीच कोई निकट विकासीय संबंध नहीं है।
  • शैवालों का विखंडन: एककोशिकीय शैवालों (जैसे Chlamydomonas) को प्रोटिस्टा में और बहुकोशिकीय शैवालों (जैसे Spirogyra) को प्लांटी जगत में अलग-अलग कर दिया गया, जबकि वे संरचना और कार्य में अत्यधिक निकट हैं।

मॉड्यूल 6: पादप जगत के प्रमुख प्रभाग (Major Plant Divisions)

6.1 पादपों का समग्र वर्गीकरण प्रवाह (Plant Classification Outline)

पादप जगत (Kingdom Plantae) को बीज निर्माण की क्षमता के आधार पर दो मुख्य उप-जगतों में बांटा जाता है:

  • 1. अपुष्पोद्भिद (Cryptogamae): अप्रत्यक्ष जननांग वाले पौधे, जिनमें पुष्प और बीज नहीं बनते (बीजाणुओं द्वारा जनन)। इसमें तीन प्रभाग आते हैं: थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा, और टेरिडोफाइटा।
  • 2. पुष्पोद्भिद (Phanerogamae / Spermatophyta): विकसित जननांग वाले पौधे, जिनमें बीज (Seeds) बनते हैं। इसमें दो प्रभाग आते हैं: जिम्नोस्पर्म (अनावृतबीजी) और एंजियोस्पर्म (आवृतबीजी)।
6.2 अपुष्पोद्भिद के तीन प्रभाग (Cryptogams)
  1. 1. प्रभाग थैलोफाइटा (Thallophyta - शैवाल / Algae):
    • थैलस शरीर: इनका शरीर जड़, तना और पत्तियों में विभेदित नहीं होता, बल्कि एक अविभेदित सुकाय सदृश 'थैलस' (Thallus) होता है।
    • संवहन ऊतक: जाइलम और फ्लोएम जैसे संवहन ऊतक पूर्णतः अनुपस्थित होते हैं।
    • जनन अंग: जननांग एककोशिकीय होते हैं और उनके चारों ओर कोई सुरक्षात्मक बंध्य आवरण नहीं होता। निषेचन के बाद भ्रूण (Embryo) का निर्माण नहीं होता।
    • आवास व पोषण: अधिकांश जलीय (अलवणीय व समुद्री)। पर्णहरित युक्त स्वपोषी होते हैं।
    • प्रमुख उदाहरण: स्पाइरोगाइरा (Spirogyra - जल का रेशम / Pond silk, रिबन जैसा सर्पिलाकार क्लोरोप्लास्ट), क्लैमाइडोमोनास (Chlamydomonas - एककोशिकीय कशाभिकायुक्त शैवाल), कारा (Chara), और वॉल्वॉक्स (Volvox)।
  2. 2. प्रभाग ब्रायोफाइटा (Bryophyta - "पादप जगत के उभयचर" / Amphibians of Plant Kingdom):
    • पादप शरीर: थैलस जैसा (रिक्सिया) अथवा तना-पत्ती जैसी अक्षीय संरचना में विभेदित (फ्यूनेरिया)। किंतु इनमें वास्तविक जड़, तना और पत्ती अनुपस्थित होते हैं।
    • राइजोइड्स (मूलाभास): वास्तविक जड़ों के स्थान पर जल और खनिज अवशोषण तथा पौधे को आधार से चिपकाने के लिए धागे जैसे एककोशिकीय या बहुकोशिकीय 'राइजोइड्स' (Rhizoids) पाए जाते हैं।
    • संवहन ऊतक: संवहन ऊतक (जाइलम व फ्लोएम) अनुपस्थित होते हैं। पदार्थों का संवहन सरल मृदूतक (Parenchyma) कोशिकाओं द्वारा होता है।
    • "पादप जगत का उभयचर" क्यों कहा जाता है? (Board Favorite Question):
      ब्रायोफाइट्स भूमि पर (नम, छायादार स्थानों पर) उगते हैं, किंतु लैंगिक जनन और निषेचन (Fertilization) को पूरा करने के लिए उन्हें जल की अनिवार्य आवश्यकता होती है। इनके कशाभिकायुक्त नर युग्मक (एंथरोजोइड्स) जल की पतली परत में तैरकर मादा जननांग (आर्कीगोनियम) तक पहुंचते हैं। जिस प्रकार जंतु जगत के उभयचर (मेंढक) थल पर रहते हुए भी अंडे देने हेतु जल पर निर्भर हैं, उसी प्रकार ब्रायोफाइट्स को "पादप जगत का उभयचर" (Amphibians of the Plant Kingdom) कहा जाता है।
    • प्रमुख उदाहरण: रिक्सिया (Riccia), मार्केन्शिया (Marchantia - लिवरवर्ट), फ्यूनेरिया (Funaria - मॉस), और स्फैग्नम (Sphagnum - पीट मॉस, जल धारण क्षमता हेतु विख्यात)।
  3. 3. प्रभाग टेरिडोफाइटा (Pteridophyta - "संवहनी अपुष्पोद्भिद" / Vascular Cryptogams):
    • प्रथम संवहनी पादप: यह पृथ्वी का प्रथम स्थलीय पादप समूह है जिसमें वास्तविक संवहन ऊतक (जाइलम और फ्लोएम) विकसित हुए। इसलिए इन्हें 'संवहनी अपुष्पोद्भिद' (Vascular Cryptogams) अथवा 'पादप जगत के सरीसृप' कहा जाता है।
    • संवहन ऊतकों की विशेषता: जाइलम में वास्तविक वाहिकाओं (Vessels) का अभाव होता है (केवल ट्रेकिड्स पाए जाते हैं), और फ्लोएम में सहकोशिकाओं (Companion cells) का अभाव होता है (केवल सीव कोशिकाएं पाई जाती हैं)।
    • शारीरिक विभेदन: पादप शरीर वास्तविक जड़, तना (प्रायः भूमिगत प्रकंद / Rhizome) और पत्तियों में स्पष्ट विभेदित होता है।
    • सोराई एवं बीजाणु: पत्तियों के नीचे भूरे रंग के बीजाणुधानी पुंज बनते हैं जिन्हें सोराई (Sori) कहते हैं। इनमें बीजाणु (Spores) उत्पन्न होते हैं। पत्तियां कुंडलित अवस्था में खुलती हैं जिसे 'सर्सिनेट वर्नेशन' कहते हैं।
    • प्रमुख उदाहरण: ड्रायोप्टेरिस (Dryopteris - फर्न), मार्सिलिया (Marsilea), लाइकोपोडियम (क्लब मॉस), और इक्विसीटम (हॉर्सटेल)।
6.3 पुष्पोद्भिद / बीजयुक्त पादप (Phanerogams / Spermatophyta)
  1. 1. प्रभाग जिम्नोस्पर्म (Gymnospermae / अनावृतबीजी):
    • नग्न बीज (Naked Seeds): ग्रीक शब्द Gymnos = नग्न + Sperma = बीज। इनके बीज किसी फल के भीतर बंद नहीं होते, बल्कि बीजांड नग्न (Naked Ovules) अवस्था में शंकु की शल्कों पर खुले पाए जाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इनमें अंडाशय (Ovary) और फल का पूर्ण अभाव होता है।
    • शंकु (Cones): इनमें वास्तविक पुष्प नहीं बनते। जनन अंग सघन संरचनाओं के रूप में होते हैं जिन्हें नर शंकु (Male Cones) और मादा शंकु (Female Cones) कहा जाता है।
    • पत्तियां एवं संवहन ऊतक: पत्तियां प्रायः कठोर, सुई जैसी (Needle-like) होती हैं, जिन पर मोटा क्यूटिकल और धंसे हुए रंध्र (Sunken Stomata) पाए जाते हैं, जो मरुद्भिदी (Xerophytic) परिस्थितियों में जल ह्रास को रोकते हैं। जाइलम में वाहिकाएं नहीं होतीं।
    • प्रमुख उदाहरण: पाइनस (Pinus - चीड़), साइकस (Cycas), और जिन्कगो बाइलोबा (Ginkgo biloba - जीवित जीवाश्म / Living Fossil)।
  2. 2. प्रभाग एंजियोस्पर्म (Angiospermae / आवृतबीजी):
    • फल में बंद बीज (Enclosed Seeds): ग्रीक शब्द Angion = खोल/पात्र + Sperma = बीज। यह पृथ्वी का सबसे बड़ा, सबसे विकसित और प्रभावी पादप समूह है। इनके बीज सदैव फल (Fruit - परिपक्व अंडाशय) के भीतर सुरक्षित बंद रहते हैं।
    • पुष्प एवं दोहरा निषेचन: इनमें आकर्षक और वास्तविक पुष्प (Flowers) बनते हैं। इनमें एक अद्वितीय प्रक्रिया पाई जाती है जिसे दोहरा निषेचन (Double Fertilization) एवं त्रिसंलयन (Triple Fusion) कहते हैं, जिसके फलस्वरूप त्रिगुणित (3n) भ्रूणपोष (Endosperm) का निर्माण होता है जो विकासशील भ्रूण को पोषण देता है।
    • संवहन ऊतक: जाइलम में वास्तविक वाहिकाएं (Vessels) और फ्लोएम में सहकोशिकाएं (Companion Cells) उपस्थित होती हैं, जिससे जल और भोजन का संवहन अत्यंत तीव्र होता है।
6.4 एकबीजपत्री बनाम द्विबीजपत्री पौधों का विस्तृत तुलनात्मक चार्ट (Monocots vs Dicots)

आवृतबीजी (एंजियोस्पर्म) पौधों को उनके बीज में मौजूद बीजपत्रों की संख्या के आधार पर दो वर्गों में विभाजित किया जाता है:

तुलनात्मक लक्षण एकबीजपत्री (Monocotyledons) द्विबीजपत्री (Dicotyledons)
1. बीजपत्रों की संख्या (Cotyledons) केवल 1 बीजपत्र उपस्थित (जैसे धान में स्कुटेलम) 2 बीजपत्र उपस्थित (जैसे चना या मटर की दो दालें)
2. पत्तियों का शिराविन्यास (Venation) समानांतर शिराविन्यास (Parallel Venation) — शिराएं एक-दूसरे के समानांतर दौड़ती हैं (घास, केला) जालिकावत शिराविन्यास (Reticulate Venation) — शिराएं जाल जैसा नेटवर्क बनाती हैं (पीपल, आम)
3. जड़ तंत्र (Root System) झकड़ा / अपस्थानिक जड़ तंत्र (Fibrous Root System) — प्राथमिक जड़ जल्दी नष्ट हो जाती है मूसला जड़ तंत्र (Tap Root System) — एक मुख्य गहरी जड़ और उसकी शाखाएं
4. संवहन बंडल (Vascular Bundles) तने के भरण ऊतक में बिखरे हुए (Scattered), संवहन बंडल बंद (Closed - कैम्बियम रहित) तने में एक निश्चित वलय (Ring) में व्यवस्थित, संवहन बंडल खुले (Open - कैम्बियम उपस्थित)
5. द्वितीयक वृद्धि (Secondary Growth) कैम्बियम के अभाव में द्वितीयक वृद्धि अनुपस्थित होती है (तना मोटा नहीं होता) संवहन कैम्बियम के कारण द्वितीयक वृद्धि उपस्थित होती है (मोटा प्रकाष्ठ बनता है)
6. पुष्पीय भाग (Floral Parts) त्रि-तयी (Trimerous) — पंखुड़ियां 3 या उसके गुणज (3, 6) में होती हैं चतुष्-तयी या पंच-तयी (Tetramerous/Pentamerous) — पंखुड़ियां 4 या 5 के गुणज में
7. प्रमुख उदाहरण धान (Oryza), गेहूं, मक्का, प्याज, बांस, केला, घास, ताड़ चना (Cicer), मटर (Pisum), आम, सरसों, सूरजमुखी, नीम, बरगद

मॉड्यूल 7: जंतु जगत के प्रमुख संघ (Major Animal Phyla)

7.1 जंतु वर्गीकरण के आधारभूत सिद्धांत (Foundations of Animal Classification)

जंतु जगत (Animalia) को वर्गीकृत करने के लिए जीववैज्ञानिक निम्नलिखित प्रमुख शारीरिक लक्षणों का उपयोग करते हैं:

  • शारीरिक संगठन का स्तर: कोशिकीय स्तर (पोरीफेरा), ऊतक स्तर (नाइडेरिया, टीनोफोरा), अंग स्तर (प्लैटिहेल्मिन्थीज), तथा अंग-तंत्र स्तर (नेमाटोडा से कॉर्डेटा तक)।
  • शारीरिक सममिति (Symmetry): असममित (स्पंज), अरीय सममिति (नाइडेरिया, वयस्क एकाइनोडर्मेटा), तथा द्विपार्श्व सममिति (कृमि, कीट, कशेरुकी)।
  • जनन स्तर (Germ Layers): द्विकोरकी / डिप्लोब्लास्टिक (एक्टोडर्म + एंडोडर्म: नाइडेरिया), अथवा त्रिकोरकी / ट्रिप्लोब्लास्टिक (एक्टोडर्म + मेसोडर्म + एंडोडर्म: प्लैटिहेल्मिन्थीज से कॉर्डेटा तक)।
  • देहगुहा / प्रगुहा (Coelom): अगुहीय / Acoelomate (प्लैटिहेल्मिन्थीज), कूट-प्रगुहीय / Pseudocoelomate (नेमाटोडा), तथा वास्तविक प्रगुहीय / Eucoelomate (एनेलिडा से कॉर्डेटा तक)।
7.2 अकशेरुकी के 9 प्रमुख संघ (Nine Non-Chordate Phyla)
  1. 1. संघ पोरीफेरा (Phylum Porifera - स्पंज):
    • छिद्रयुक्त शरीर: लैटिन Porus = छिद्र + Ferre = धारण करना। शरीर पर जल प्रवेश हेतु असंख्य सूक्ष्म छिद्र ऑस्टिया (Ostia) और शीर्ष पर जल निकास हेतु एक बड़ा छिद्र ऑस्कुलम (Osculum) पाया जाता है।
    • नाल तंत्र (Canal System): इनमें एक अद्वितीय जल संवहन नाल तंत्र पाया जाता है जो पोषण, श्वसन और उत्सर्जन का कार्य करता है। जल केंद्रीय गुहा स्पॉन्जोसील (Spongocoel) में बहता है।
    • कॉलर कोशिकाएं / कोएनोसाइट्स (Choanocytes): स्पॉन्जोसील और नालों को आस्तरित करने वाली अद्वितीय कशाभिकायुक्त कॉलर कोशिकाएं, जो जल धारा उत्पन्न करती हैं और भोजन के कणों को छानती हैं।
    • कंकाल व संगठन: कोशिकीय स्तर का संगठन, असममित। अंतःकंकाल कैल्शियम या सिलिका की कंटिकाओं (Spicules) अथवा प्रोटीनयुक्त स्पॉन्जिन रेशों का बना होता है।
    • प्रमुख उदाहरण: साइकॉन (Sycon), स्पॉन्जिला (Spongilla - स्वच्छ जलीय स्पंज), और यूस्पॉन्जिया (Euspongia - बाथ स्पंज)।
  2. 2. संघ नाइडेरिया / सीलेंट्रेटा (Phylum Cnidaria / Coelenterata):
    • दंश कोशिकाएं / नाइडोब्लास्ट (Cnidoblasts / Nematocysts): स्पर्शकों पर पाई जाने वाली अद्वितीय दंश कोशिकाएं, जिनमें विषैला तरल हिप्नोटॉक्सिन (Hypnotoxin) भरा होता है। ये शिकार को बेहोश करने, आत्मरक्षा और आधार से चिपकने में काम आती हैं।
    • सीलेंट्रॉन (Coelenteron): शरीर के भीतर एक केंद्रीय जठरसंवहनी गुहा पाई जाती है जिसका केवल एक ही निकास/प्रवेश मुख होता है।
    • सममिति व संगठन: ऊतक स्तर का संगठन, अरीय सममिति (Radial Symmetry), और द्विस्तरीय (Diploblastic: एक्टोडर्म व एंडोडर्म के बीच अकोशिकीय मेसोग्लिया)।
    • पॉलिप और मेड्यूसा: दो रूप—बेलनाकार स्थिर 'पॉलिप' (Hydra) और छतरीनुमा स्वतंत्र तैरने वाला 'मेड्यूसा' (Jellyfish)।
    • प्रमुख उदाहरण: हाइड्रा (Hydra), ऑरेलिया (Aurelia - जेलिफ़िश), ओबेलिया, और मेट्रिडियम (समुद्री एनीमोन)।
  3. 3. संघ टीनोफोरा (Phylum Ctenophora - कॉम्ब जेली / सी वॉलनट):
    • कंकत पट्टिकाएं (Comb Plates): शरीर की बाह्य सतह पर पक्ष्माभों (Cilia) की 8 अनुदैर्ध्य कंकत पट्टिकाएं पाई जाती हैं, जो चलन में सहायता करती हैं।
    • कोलोब्लास्ट कोशिकाएं: शिकार पकड़ने हेतु स्पर्शकों पर विशेष चिपकने वाली कोशिकाएं (Colloblasts) पाई जाती हैं (दंश कोशिकाएं अनुपस्थित)।
    • जैव-संदीप्ति (Bioluminescence): अंधेरे में सजीवों द्वारा प्रकाश उत्सर्जित करने का अद्वितीय गुण इनमें अत्यंत स्पष्ट होता है। पूर्णतः समुद्री जीव।
    • प्रमुख उदाहरण: प्लूरॉब्रेकिया (Pleurobrachia) और टीनोप्लाना (Ctenoplana)।
  4. 4. संघ प्लैटीहेल्मिन्थीज (Phylum Platyhelminthes - चपटे कृमि / Flatworms):
    • चपटा शरीर: पृष्ठाधर रूप से चपटा (Dorso-ventrally flattened) फीते जैसा शरीर।
    • अगुहीय एवं त्रिकोरकी: त्रिकोरकी (Triploblastic: तीनों जनन स्तर उपस्थित), द्विपार्श्व सममिति, किंतु देहगुहा पूर्णतः अनुपस्थित (Acoelomate) होती है (अंगों के बीच पैरेन्काइमा ऊतक भरा होता है)।
    • ज्वाला कोशिकाएं (Flame Cells / Solenocytes): उत्सर्जन और परासरण नियंत्रण (Osmoregulation) हेतु अद्वितीय पक्ष्माभी 'ज्वाला कोशिकाएं' पाई जाती हैं।
    • परजीवी अनुकूलन: अधिकांश अंतःपरजीवी, पोषक के शरीर से चिपकने हेतु चूषक (Suckers) व हुक (Hooks) उपस्थित। आहार नाल अधूरी या अनुपस्थित।
    • प्रमुख उदाहरण: टीनिया सोलियम (Taenia solium - फीताकृमि), फैसिओला हेपेटिका (Fasciola hepatica - यकृत कृमि), और प्लेनेरिया (Planaria - इसमें असाधारण पुनरुद्भवन क्षमता / Regeneration होती है)।
  5. 5. संघ ऐस्केलमिन्थीज / नेमाटोडा (Phylum Aschelminthes / Nematoda - गोलकृमि):
    • बेलनाकार शरीर: अनुप्रस्थ काट में शरीर पूर्ण गोलाकार दिखाई देता है, इसलिए इन्हें गोलकृमि (Roundworms) कहते हैं। दोनों सिरे नुकीले होते हैं।
    • कूट-प्रगुहा (Pseudocoelom): इनकी देहगुहा वास्तविक प्रगुहा नहीं होती, बल्कि मेसोडर्म द्वारा पूरी तरह आस्तरित न होकर छोटी थैलियों के रूप में बिखरी होती है। इसे कूट-प्रगुहा (Pseudocoelom) कहते हैं।
    • आहार नाल: पूर्ण आहार नाल (मुख से गुदा तक) उपस्थित, जिसमें सुविकसित पेशीय ग्रसनी (Muscular Pharynx) पाई जाती है।
    • लैंगिक द्विरूपता (Sexual Dimorphism): नर और मादा अलग-अलग होते हैं; मादा कृमि नर की तुलना में स्पष्ट रूप से लंबी और सीधी होती है (नर का पिछला सिरा मुड़ा हुआ और पीनियल स्पिक्यूल युक्त होता है)।
    • प्रमुख उदाहरण: एस्केरिस (Ascaris lumbricoides - आंत्र गोलकृमि), वुचेरेरिया बैंक्राफ्टी (Wuchereria bancrofti - फाइलेरिया / हाथीपांव रोग का कारक), और एनसाइलोस्टोमा (Ancylostoma - हुकवर्म)।
  6. 6. संघ एनेलिडा (Phylum Annelida - खंडीभूत कृमि):
    • विखंडी खंडीभवन (Metameric Segmentation): शरीर बाह्य और आंतरिक दोनों रूपों से वलयों या छल्लों (Annuli) के समान खंडों में बंटा होता है।
    • वास्तविक प्रगुहा (True Coelom / Schizocoelom): प्रथम जंतु समूह जिनमें मेसोडर्म के फटने से बनी वास्तविक देहगुहा उपस्थित होती है।
    • नेफ्रीडिया (Nephridia): प्रत्येक खंड में कुंडलित उत्सर्जी नलिकाएं पाई जाती हैं जिन्हें नेफ्रीडिया (वृक्कक) कहते हैं।
    • गमन अंग एवं परिसंचरण: गमन हेतु काइटिनयुक्त सीटी (Setae) अथवा मांसल पैरापोडिया (Parapodia) पाए जाते हैं। बंद रुधिर परिसंचरण तंत्र (Closed Circulatory System) उपस्थित होता है; हीमोग्लोबिन रक्त प्लाज्मा में घुला रहता है (RBC अनुपस्थित)।
    • प्रमुख उदाहरण: केंचुआ (Pheretima posthuma - किसानों का मित्र), जोंक (Hirudinaria granulosa - रक्तचोषक, लार में हिरुडिन थक्कारोधी), और नेरीस (Nereis)।
  7. 7. संघ आर्थ्रोपोडा (Phylum Arthropoda - संधिपाद):
    • प्राणी जगत का सबसे बड़ा संघ (Largest Phylum): पृथ्वी पर सभी ज्ञात जंतु प्रजातियों का दो-तिहाई (लगभग 80% से अधिक) भाग आर्थ्रोपोडा का है।
    • संधित पाद (Jointed Appendages): ग्रीक Arthros = संधि/जोड़ + Poda = पैर। इनके पैर और उपांग जोड़ों में जुड़े होते हैं।
    • काइटिनयुक्त बाह्यकंकाल (Chitinous Exoskeleton): शरीर एक कठोर, जलरोधी काइटिन के बाह्यकंकाल से ढका रहता है, जिसे वृद्धि के समय समय-समय पर उतारा जाता है—इस प्रक्रिया को निर्मोचन / त्वचापतन (Ecdysis / Moulting) कहते हैं।
    • खुला परिसंचरण एवं हीमोसील: रक्त वाहिकाओं से बाहर रक्त से भरी गुहाओं में बहता है, जिसे हीमोसील (Haemocoel) कहते हैं।
    • श्वसन एवं उत्सर्जन अंग: श्वसन गिल्स (झींगा), बुक गिल्स (किंग क्रैब), बुक लंग्स (बिच्छू), अथवा श्वासनलिका तंत्र (Trachea - कीटों में) द्वारा होता है। उत्सर्जन मैलपिघी नलिकाओं (Malpighian Tubules) अथवा हरित ग्रंथियों (Green Glands) द्वारा होता है। सिर पर संयुक्त नेत्र (Compound Eyes) पाए जाते हैं।
    • प्रमुख उदाहरण: तिलचट्टा (Periplaneta), झींगा मछली (Penaeus), बिच्छू (Palamnaeus), मकड़ी, तितली, मच्छर, और रेशम कीट (Bombyx)।
  8. 8. संघ मोलस्का (Phylum Mollusca - कोमल देही):
    • प्राणी जगत का दूसरा सबसे बड़ा संघ (Second Largest Phylum): शरीर अत्यंत कोमल, अखंडित और श्लेष्मयुक्त होता है।
    • कैल्शियमी कवच एवं मेंटल (Mantle): शरीर प्रायः एक कठोर कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO₃) के सुरक्षात्मक कवच से ढका रहता है। शरीर के ऊपर कोमल त्वचा की एक झिल्लीदार परत होती है जिसे मेंटल (Mantle) कहते हैं, जो कवच का स्राव करती है। मेंटल और शरीर के बीच की जगह को 'मेंटल गुहा' कहते हैं।
    • रेडुला (Radula): मुख के भीतर भोजन को रेतने या चबाने के लिए एक रेती जैसा दांतेदार अंग पाया जाता है जिसे रेडुला कहते हैं।
    • परिसंचरण एवं हीमोसायनिन: खुला परिसंचरण तंत्र (ऑक्टोपस में बंद)। इनके रुधिर में तांबा युक्त श्वसन वर्णक हीमोसायनिन (Haemocyanin) पाया जाता है, जिसके कारण ऑक्सीजन युक्त रक्त का रंग हल्का नीला होता है।
    • प्रमुख उदाहरण: घोंघा (Pila globosa), सीपी / यूनियो (Unio), ऑक्टोपस (Octopus - शैतानी मछली, कवच विहीन), और सेपिया (कटलफिश)।
  9. 9. संघ एकाइनोडर्मेटा (Phylum Echinodermata - कंटकी त्वचा वाले):
    • कंटकमय त्वचा: ग्रीक Echinos = कांटा + Derma = त्वचा। त्वचा के नीचे कैल्शियम युक्त पट्टिकाएं और सतह पर नुकीले कांटे (Spines) पाए जाते हैं। सभी सदस्य पूर्णतः समुद्री (Exclusively Marine) होते हैं।
    • विशिष्ट सममिति: इनके वयस्क में पंच-अरीय सममिति (Pentaradial Symmetry) पाई जाती है, किंतु इनके मुक्त तैरने वाले लार्वा में द्विपार्श्व सममिति (Bilateral Symmetry) होती है (यह इनके उच्च विकासीय स्तर को दर्शाता है)।
    • जल संवहन तंत्र (Water Vascular System / Ambulacral System): यह इनका सबसे अनूठा लक्षण है। यह नाल तंत्र सिलिया और द्रव से संचालित होता है जो गमन, श्वसन और भोजन पकड़ने का कार्य करता है।
    • नालपाद (Tube Feet / Podia): गमन और आधार से चिपकने हेतु छोटे, कोमल, चूषक युक्त अंग जिन्हें नालपाद कहते हैं। सिर और उत्सर्जी अंग अनुपस्थित होते हैं।
    • प्रमुख उदाहरण: तारा मछली (Asterias / Starfish), समुद्री अर्चिन (Echinus), समुद्री खीरा (Cucumaria), और पंख तारा (Antedon)।
7.3 संघ कॉर्डेटा के 4 मूलभूत निदान सूचक लक्षण (Chordate Diagnostic Hallmarks)

संघ कॉर्डेटा (Phylum Chordata) के सभी सदस्यों में उनके जीवन-चक्र की किसी न किसी अवस्था में निम्नलिखित चार मूलभूत लक्षण (Four Hallmarks) अनिवार्य रूप से पाए जाते हैं:

कॉर्डेटा के 4 शाश्वत मूलभूत लक्षण:
  1. नोटोकॉर्ड / पृष्ठदंड (Notochord): शरीर के पृष्ठीय भाग में आहार नाल और तंत्रिका रज्जु के बीच स्थित एक लचीली, ठोस, छड़ जैसी आंतरिक आलम्बी संरचना। कशेरुकियों में यह भ्रूणावस्था में उपस्थित होती है और वयस्क में कशेरुक दंड (Vertebral Column / रीढ़ की हड्डी) द्वारा प्रतिस्थापित हो जाती है।
  2. पृष्ठीय खोखली तंत्रिका रज्जु (Dorsal Hollow Nerve Cord): नोटोकॉर्ड के ऊपर पृष्ठीय तल पर स्थित एक एकल, खोखली, नलिकाकार तंत्रिका रज्जु। इसका अग्र भाग विकसित होकर मस्तिष्क (Brain) और पश्च भाग मेरुरज्जु (Spinal Cord) बनाता है (अकशेरुकियों में यह अधर तल पर दोहरी व ठोस होती है)।
  3. ग्रसनी क्लोम दरारें (Pharyngeal Gill Slits): ग्रसनी (Pharynx) की दीवार में युग्मित छिद्र या दरारें। जलीय कॉर्डेट्स में ये श्वसन हेतु गिल्स बनाती हैं, जबकि स्थलीय कशेरुकियों में ये केवल भ्रूणावस्था में दिखाई देती हैं और बाद में बंद हो जाती हैं।
  4. पश्च-गुदा पुच्छ (Post-anal Tail): गुदा छिद्र के पीछे स्थित शरीर का पेशीय पश्च विस्तार, जो संतुलन और तैराकी में सहायक होता है (वयस्क मानव में यह अवशेषी कॉक्सिक्स के रूप में सीमित रह जाता है)।
7.4 उपसंघ कशेरुकी / वर्टिब्रेटा के 6 प्रमुख वर्ग (Vertebrate Classes)
  1. 1. वर्ग कॉन्ड्रिक्थीज (Class Chondrichthyes - उपास्थियुक्त मछलियां):
    • उपास्थिमय कंकाल: अंतःकंकाल पूरी तरह लचीली उपास्थि (Cartilage) का बना होता है।
    • प्लेकॉइड शल्क (Placoid Scales): त्वचा अत्यंत खुरदरी होती है और उस पर सूक्ष्म दांतों जैसे नुकीले प्लेकॉइड शल्क पाए जाते हैं।
    • मुख एवं गिल्स: मुख सिर के अधर तल (Ventral side) पर स्थित होता है। 5-7 जोड़ी क्लोम दरारें खुली होती हैं—इनके ऊपर कोई सुरक्षात्मक आवरण या ऑपरकुलम (Operculum / गिल कवर) अनुपस्थित होता है।
    • वायुकोष विहीन: इनमें तैरने वाला वायुकोष (Air Bladder / Swim Bladder) अनुपस्थित होता है, जिसके कारण पानी में डूबने से बचने के लिए इन्हें लगातार तैरते रहना पड़ता है। पूंछ असममित (Heterocercal) होती है। अधिकांश समुद्री व हिंसक।
    • प्रमुख उदाहरण: डॉगफिश / शार्क (Scoliodon), विद्युत रे (Torpedo - विद्युत झटका उत्पन्न करने वाला), और प्रिस्टिस (आरा मछली)।
  2. 2. वर्ग ऑस्टिक्थीज (Class Osteichthyes - अस्थियुक्त मछलियां):
    • अस्थिमय कंकाल: अंतःकंकाल कठोर अस्थि (Bone) का बना होता है।
    • साइक्लॉइड / टीनॉइड शल्क: त्वचा पर चिकने, गोलाकार साइक्लॉइड या टीनॉइड शल्क पाए जाते हैं।
    • मुख एवं ऑपरकुलम: मुख प्रायः सिर के अग्र सिरे (Terminal position) पर होता है। सिर के दोनों ओर 4 जोड़ी गिल्स पाए जाते हैं जो एक सुरक्षात्मक ढक्कन ऑपरकुलम (Operculum) से पूरी तरह ढके रहते हैं।
    • वायुकोष उपस्थित: इनमें गैस से भरा वायुकोष (Air Bladder) उपस्थित होता है, जो उत्प्लावकता (Buoyancy) प्रदान करता है; अतः ये बिना तैरे भी पानी में किसी भी गहराई पर स्थिर रह सकती हैं। पूंछ सममित (Homocercal) होती है।
    • प्रमुख उदाहरण: रोहू (Labeo rohita), कतला (Catla catla), हिप्पोकैम्पस (समुद्री घोड़ा - नर में शिशुधानी), और एनाबास (कोई मछली)।
  3. 3. वर्ग एम्फीबिया (Class Amphibia - उभयचर):
    • द्वैध जीवन: ग्रीक Amphi = दोनों + Bios = जीवन। जल और थल दोनों आवासों में रहने में सक्षम।
    • नम नग्न त्वचा: त्वचा सदैव नम, चिकनी और श्लेष्म ग्रंथियुक्त होती है। बाह्य शल्क पूर्णतः अनुपस्थित होते हैं।
    • हृदय एवं श्वसन: हृदय 3-कक्षीय (Three-chambered: 2 अलिंद + 1 निलय) होता है। असमतापी / शीतरक्तीय (Poikilothermic)। श्वसन त्वचा (त्वचीय श्वसन), फेफड़ों और मुखगुहा द्वारा होता है (लार्वा में गिल्स द्वारा)।
    • कायांतरण (Metamorphosis): बाह्य निषेचन जल में होता है। अंडे जेली से ढके होते हैं। डिंब से शाकाहारी लार्वा टैडपोल (Tadpole) निकलता है, जो कायांतरण द्वारा मांसाहारी वयस्क में बदलता है।
    • प्रमुख उदाहरण: मेंढक (Rana / Hoplobatrachus), टोड (Bufo), सेलामैंडर (Salamandra), और इक्थियोफिस (Ichthyophis - पादविहीन उभयचर)।
  4. 4. वर्ग सरीसृप (Class Reptilia - रेंगने वाले जीव):
    • प्रथम वास्तविक स्थलीय कशेरुकी: रेंगकर या घिसटकर चलने वाले प्राणी।
    • शुष्क शृंगीय त्वचा: त्वचा पूरी तरह शुष्क, जलरोधी और एपिडर्मल शल्कों या स्क्यूट्स (Scutes) से ढकी होती है, जो थल पर जल ह्रास रोकती है।
    • हृदय की संरचना: हृदय अपूर्ण रूप से 4-कक्षीय (3-कक्षीय: 2 अलिंद और आंशिक रूप से विभाजित 1 निलय)।
      महत्वपूर्ण अपवाद (Examiner Trap): मगरमच्छ (Crocodile) में हृदय पूर्णतः 4-कक्षीय (2 अलिंद + 2 निलय) होता है!
    • क्लीडोइक अंडे (Cleidoic Eggs): आंतरिक निषेचन। मादा भूमि पर कठोर कैल्शियम कार्बोनेट के कवच से ढके अंडे देती है, जिनमें भ्रूण की सुरक्षा हेतु उल्व (Amnion) झिल्ली होती है। असमतापी जीव।
    • प्रमुख उदाहरण: घरेलू छिपकली (Hemidactylus), भारतीय कोबरा / नाग (Naja naja), मगरमच्छ (Crocodylus), कछुआ (Testudo), और गिरगिट (Chameleon)।
  5. 5. वर्ग एवीज (Class Aves - पक्षी):
    • परों का आवरण: शरीर पंखों या परों (Feathers) से ढका रहता है, जो ऊष्मा रोधी होते हैं और शरीर का तापमान स्थिर रखते हैं।
    • अग्रपाद पंखों में रूपांतरित: उड़ने के लिए अग्रपाद पंखों (Wings) में बदल जाते हैं। जबड़े दांत रहित शृंगीय चोंच (Beak) में रूपांतरित हो जाते हैं।
    • वातिल हड्डियां (Pneumatic Bones): हड्डियां खोखली, अत्यधिक हल्की और वायु से भरी होती हैं, जो उड़ते समय शरीर का भार कम करती हैं।
    • हृदय एवं समतापी: हृदय पूर्णतः 4-कक्षीय (2 अलिंद + 2 निलय) होता है। ये समतापी / उष्णरक्तीय (Homeothermic) होते हैं (शरीर का तापमान सदैव स्थिर रहता है)। फेफड़ों से अतिरिक्त वायुकोश (Air Sacs) जुड़े होते हैं जो निरंतर श्वसन ऊर्जा देते हैं।
    • प्रमुख उदाहरण: कबूतर (Columba livia), भारतीय मोर (Pavo cristatus), तोता (Psittacula), और शुतुरमुर्ग (Struthio camelus - उड़नहीन सबसे बड़ा पक्षी)।
  6. 6. वर्ग स्तनधारी (Class Mammalia - स्तनपायी):
    • स्तन ग्रंथियां (Mammary Glands): मादा में नवजात शिशुओं को पोषण देने के लिए दूध स्रावित करने वाली स्तन ग्रंथियां पाई जाती हैं (यह इनका सबसे अद्वितीय विशिष्ट लक्षण है)।
    • त्वचा के रोम व ग्रंथियां: शरीर पर रोम या बाल (Hair) पाए जाते हैं। त्वचा में स्वेद ग्रंथियां (Sweat Glands) और तैल ग्रंथियां (Sebaceous Glands) उपस्थित होती हैं। बाह्य कान में मांसल कर्णपल्लव (Pinna) पाया जाता है।
    • अकेंद्रकीय RBC: परिपक्व लाल रुधिर कणिकाएं (RBC) गोल, उभयावतल और केंद्रक रहित (Enucleated) होती हैं (अपवाद: ऊंट और लामा की RBC में केंद्रक होता है)। हृदय पूर्णतः 4-कक्षीय होता है। समतापी प्राणी।
    • जरायुज (Viviparous): अधिकांश स्तनधारी सीधे जीवित बच्चों को जन्म देते हैं और भ्रूण माता के गर्भाशय में प्लेसेंटा (Placenta / अपरा) द्वारा पोषण पाता है।
      महत्वपूर्ण अपवाद: डक-बिल्ड प्लैटिपस (Ornithorhynchus) और एकिडना (Echidna) अंडे देने वाले आदिम स्तनधारी (Monotremes) हैं!
    • प्रमुख उदाहरण: मनुष्य (Homo sapiens), बाघ (Panthera tigris), चमगादड़ (उड़ने वाला स्तनधारी), नीली व्हेल (Balaenoptera - सबसे बड़ा जलीय स्तनधारी), और कंगारू (Macropus - धानी प्राणी)।

महत्वपूर्ण रासायनिक सूत्र, अभिक्रियाएँ एवं समीकरण

उपापचय का द्वैध संतुलन सूत्र (Dual Metabolic Balance Matrix)
जैविक ऊर्जा व द्रव्यमान संतुलन समीकरण
हक्सले ने जीवद्रव्य को जीवन का भौतिक आधार कहा; वाल्टर कैनन ने इस संतुलन को होमियोस्टैसिस (समस्थापन) नाम दिया।
रासायनिक जैव विकास एवं मिलर-उरे प्रयोग समीकरण (Chemical Evolution & Miller-Urey Formula)
अजैविक रासायनिक संश्लेषण मॉडल (Abiotic Synthesis)
कोएसरवेट्स (ओपेरिन) और प्रोटीनोइड माइक्रोस्फीयर्स (सिडनी फॉक्स) प्रथम कोशिका सदृश आद्य-जीव (Protobionts) थे।
जैव विविधता संरक्षण एवं हॉटस्पॉट मानदंड सूत्र (Biodiversity Hotspot & Evil Quartet Matrix)
नॉर्मन मायर्स जैव विविधता हॉटस्पॉट मापदंड
औषधीय मूल्य: सिनकोना → कुनैन (मलेरिया); सर्पगंधा → रिसरपिन (रक्तचाप); सदाबहार → विनब्लास्टिन/विनक्रिस्टिन (कैंसर)।
लिनियन पदानुक्रम एवं द्विनाम नामकरण नियम सूत्र (Linnaean Hierarchy & Binomial Rulebook)
कैरोलस लिनियस की द्विनाम पद्धति (ICBN/ICZN)
मानव: Homo sapiens | बाघ: Panthera tigris | मोर: Pavo cristatus | रोहू: Labeo rohita | आम: Mangifera indica Linn.
व्हिटेकर की 5-जगत वर्गीकरण कसौटी मैट्रिक्स (Whittaker's 5-Kingdom Diagnostic Matrix)
1969 व्हिटेकर पांच-जगत प्रणाली
कवक को अलग जगत बनाया गया क्योंकि इसकी कोशिका भित्ति काइटिन की बनी है और पोषण अवशोषी मृतोपजीवी है।
पादप जगत के 5 प्रभागों का विकासीय विभेदन सूत्र (Plant Kingdom Evolutionary Matrix)
पादप जगत का विकासीय प्रगति मॉडल
एकबीजपत्री: 1 बीजपत्र, समानांतर शिराविन्यास, झकड़ा जड़ (धान) | द्विबीजपत्री: 2 बीजपत्र, जालिकावत शिराविन्यास, मूसला जड़ (मटर)।
कॉर्डेटा बनाम अकशेरुकी एवं कशेरुकी के 6 वर्गों का तुलनात्मक शारीरिक सूत्र (Vertebrate Comparative Anatomy Matrix)
कशेरुकी शारीरिक विकास एवं अनुकूलन समीकरण
अपवाद: मगरमच्छ में 4-कक्षीय हृदय होता है; प्लैटिपस अंडा देने वाला स्तनधारी है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
उपचयी उपापचय (Anabolism) और अपचयी उपापचय (Catabolism) में क्या अंतर है? एक जीव के शरीर में दोनों के बीच असंतुलन का क्या जैविक प्रभाव पड़ता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उपापचय (Metabolism) सजीवों की कोशिकाओं में चलने वाली सभी जैव रासायनिक अभिक्रियाओं का कुल योग है। यह दो परस्पर पूरक प्रक्रियाओं में विभाजित है:

  1. उपचयी उपापचय (Anabolism):

    • यह एक रचनात्मक या संश्लेषणात्मक (Constructive) प्रक्रिया है जिसमें सरल अकार्बनिक अणुओं से जटिल कार्बनिक अणुओं का निर्माण होता है।
    • यह ऊर्जा-संचयी (Endergonic) प्रक्रिया है, जिसमें ऊर्जा रासायनिक बंधों के रूप में संचित होती है।
    • इसके कारण सजीव के शुष्क भार (Dry Weight) में वृद्धि होती है।
    • उदाहरण: प्रकाश संश्लेषण (6CO₂ + 12H₂O → C₆H₁₂O₆ + 6O₂ + 6H₂O), प्रोटीन संश्लेषण, ग्लाइकोजन निर्माण।
  2. अपचयी उपापचय (Catabolism):

    • यह एक विनाशात्मक या विघटनकारी (Destructive) प्रक्रिया है जिसमें जटिल कार्बनिक अणु टूटकर सरल पदार्थों में विखंडित होते हैं।
    • यह ऊर्जा-विमोचक (Exergonic) प्रक्रिया है, जिसमें संचित रासायनिक ऊर्जा ATP के रूप में मुक्त होती है।
    • इसके कारण सजीव के शुष्क भार में ह्रास (कमी) होता है।
    • उदाहरण: कोशिकीय श्वसन (C₆H₁₂O₆ + 6O₂ → 6CO₂ + 6H₂O + 38 ATP ऊर्जा), उत्सर्जन, पाचन।
  3. उपापचयी असंतुलन का जैविक प्रभाव:

    • यदि उपचय > अपचय (Anabolism > Catabolism): शरीर में नए ऊतकों और जीवद्रव्य का निर्माण अधिक होता है, जिसके परिणामस्वरूप जीव में सक्रिय शारीरिक वृद्धि और विकास (Positive Growth) होता है (जैसे शैशवावस्था एवं किशोरावस्था में)।
    • यदि उपचय < अपचय (Anabolism < Catabolism): शरीर के ऊतकों का विघटन निर्माण की तुलना में तेज होता है, जिससे शरीर का वजन घटता है, कमजोरी आती है, और वार्धक्य (Senescence / बुढ़ापा) आता है। भुखमरी या गंभीर बीमारी में यह स्थिति जानलेवा हो सकती है।
    • यदि उपचय = अपचय (Anabolism = Catabolism): शरीर का भार स्थिर रहता है और एक स्वस्थ वयस्क समस्थापन (Homeostasis) बना रहता है।
उदाहरण 2
मिलर और यूरे के 1953 के प्रयोग का स्वच्छ नामांकित विवरण दीजिए। इस प्रयोग ने ओपेरिन-हाल्डेन के रासायनिक विकास सिद्धांत को किस प्रकार अकाट्य रूप से प्रमाणित किया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

1953 में शिकागो विश्वविद्यालय के स्टैनली मिलर और हेरोल्ड यूरे ने प्रयोगशाला में आदिम पृथ्वी की परिस्थितियों का कृत्रिम रूप से अनुकरण करके जीवन की रासायनिक उत्पत्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत किया:

  1. प्रायोगिक उपकरण एवं परिस्थितियां:

    • स्पार्क डिस्चार्ज ग्लास उपकरण: उन्होंने एक वायुरोधी कांच का बंद उपकरण तैयार किया जिससे हवा (O₂) पूरी तरह निकाल दी गई थी।
    • गैसीय मिश्रण एवं अनुपात: 5-लीटर के मुख्य फ्लास्क में आदिम अपचायक वायुमंडल का प्रतिनिधित्व करने वाली गैसें भरी गईं: मीथेन (CH₄) : अमोनिया (NH₃) : हाइड्रोजन (H₂) को 2 : 2 : 1 के अनुपात में लिया गया।
    • जलवाष्प का संवहन: एक छोटे फ्लास्क में जल को लगातार उबाला गया, जिससे उत्पन्न जलवाष्प गैसों के साथ चक्रित होती रही (आदिम वर्षा व महासागरों का अनुकरण)।
    • ऊर्जा स्रोत: मुख्य फ्लास्क में लगे दो टंगस्टन इलेक्ट्रोडों के बीच 60,000 वोल्ट का निरंतर विद्युत स्फुलिंग (Electric Spark) 7 दिनों (एक सप्ताह) तक प्रवाहित किया गया, जो आकाशीय बिजली का प्रतीक था। तापमान लगभग 800°C रखा गया।
    • कंडेनसर एवं यू-ट्रैप: गैसों को संघनित कर निचले यू-ट्रैप में एकत्र किया गया।
  2. प्रायोगिक परिणाम:

    • एक सप्ताह बाद यू-ट्रैप में गहरे लाल-भूरे रंग का तरल एकत्र हुआ।
    • कागज क्रोमैटोग्राफी और रासायनिक विश्लेषण द्वारा इसमें प्रोटीन निर्माणकारी सरल अमीनो अम्ल—ग्लाइसिन (Glycine), ऐलेनिन (Alanine), और एस्पार्टिक एसिड (Aspartic Acid)—पाए गए।
    • इसके अतिरिक्त यूरिया, लैक्टिक एसिड, फॉर्मिक एसिड और हाइड्रोजन सायनाइड की भी पहचान हुई।
  3. ओपेरिन-हाल्डेन सिद्धांत की पुष्टि:

    • रूसी वैज्ञानिक ओपेरिन और ब्रिटिश वैज्ञानिक हाल्डेन ने परिकल्पना की थी कि आदिम पृथ्वी पर अकार्बनिक रसायनों से ऊर्जा के प्रभाव में कार्बनिक अणु बने थे (तप्त तनु सूप)।
    • मिलर-यूरे प्रयोग ने यह निर्विवाद रूप से सिद्ध कर दिया कि बिना किसी सजीव कोशिका या अलौकिक शक्ति के, केवल भौतिक-रासायनिक परिस्थितियों में निर्जीव अणुओं से अमीनो अम्लों का स्वतः अजैविक संश्लेषण (Abiotic Synthesis) पूर्णतः संभव था। इसने रासायनिक जैव विकास को एक अकाट्य वैज्ञानिक सत्य बना दिया।
उदाहरण 3
जैव विविधता ह्रास के प्रमुख कारण 'द इविल क्वार्टेट' (The Evil Quartet) की विस्तृत व्याख्या कीजिए। भारत के जैव विविधता हॉटस्पॉट्स के नाम और विशेषताएं बताइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

प्रसिद्ध पारिस्थितिकविद एडवर्ड ओ. विल्सन ने मानव गतिविधियों द्वारा जैव विविधता के विनाश के चार मुख्य कारणों को 'द इविल क्वार्टेट' (The Evil Quartet - विनाश के चार दैत्य) कहा है:

  1. आवास विनाश एवं विखंडन (Habitat Loss & Fragmentation):
    • यह प्रजातियों के विलोपन का सबसे प्रमुख और घातक कारण है। कृषि, औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के लिए वनों को काटा जा रहा है। उष्णकटिबंधीय वर्षावन जो पृथ्वी के 14% भाग पर थे, अब 6% से भी कम रह गए हैं।
    • आवासों के टुकड़ों में बंटने से बड़े स्तनधारियों और प्रवासी पक्षियों का प्रजनन व अस्तित्व संकट में पड़ जाता है।
  2. अति-दोहन (Over-exploitation):
    • मानव द्वारा व्यावसायिक लाभ के लिए वन्यजीवों का अत्यधिक शिकार, वध और कटाई। उदाहरण: यात्री कबूतर (Passenger Pigeon), डोडो और स्टेलर की समुद्री गाय अति-दोहन के कारण विलुप्त हो गए।
  3. विदेशी प्रजातियों का आक्रमण (Alien Invasive Species):
    • जब बाहरी प्रजातियों को नए पारितंत्र में लाया जाता है, तो वे स्थानीय प्रजातियों को नष्ट कर देती हैं। उदाहरण: जलकुंभी (Eichhornia crassipes / "बंगाल का आतंक") पानी की ऑक्सीजन सोखकर मछलियों को मार देती है; पार्थेनियम (गाजर घास) देशी चरागाहों को नष्ट कर रही है।
  4. सह-विलुप्ति (Co-extinctions):
    • जब दो प्रजातियां अनिवार्य रूप से एक-दूसरे पर आश्रित होती हैं, तो पोषक के विलुप्त होने पर उस पर आश्रित परजीवी या अनन्य परागणकर्ता कीट भी अनिवार्य रूप से विलुप्त हो जाता है।

भारत के जैव विविधता हॉटस्पॉट्स (नॉर्मन मायर्स के मानदंड: ≥1,500 स्थानिक पौधे एवं >70% प्राकृतिक आवास क्षति):

  1. पश्चिमी घाट एवं श्रीलंका: अत्यधिक वर्षा वाले सदाबहार वन, स्थानिक उभयचर, और लायन-टेल्ड मकाक।
  2. पूर्वी हिमालय: सिक्किम, दार्जिलिंग, अरुणाचल प्रदेश; लाल पांडा (Red Panda) और दुर्लभ ऑर्किड्स।
  3. इंडो-बर्मा: पूर्वोत्तर भारत से म्यांमार तक का समृद्ध वन क्षेत्र।
  4. सुंडालैंड: भारत का अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, जो प्रवाल भित्तियों और समुद्री जैव विविधता का केंद्र है।
उदाहरण 4
द्विनाम नामकरण पद्धति (Binomial Nomenclature) के अंतरराष्ट्रीय नियम क्या हैं? किन्हीं चार सामान्य जीवों (मनुष्य, बाघ, रोहू मछली, आम) के वैज्ञानिक नाम लिखकर समझाइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

कैरोलस लिनियस द्वारा प्रतिपादित द्विनाम पद्धति (Binomial Nomenclature) के अनुसार प्रत्येक जीव को दो लैटिन पदों वाला एक सार्वभौमिक वैज्ञानिक नाम दिया जाता है। यह नामकरण ICBN (पादप) तथा ICZN (जंतु) संहिताओं के नियमों द्वारा शासित होता है:

  1. द्विनाम पद्धति के प्रमुख नियम:

    • दो लैटिन पद: वैज्ञानिक नाम में दो शब्द होते हैं। प्रथम शब्द वंश (Genus) को और द्वितीय शब्द जाति संकेत पद (Specific Epithet) को दर्शाता है। नाम लैटिन भाषा में होते हैं।
    • कैपिटल एवं स्मॉल अक्षर: वंश के नाम का पहला अक्षर सदैव बड़ा (Capital) होना चाहिए, जबकि जाति के नाम का पहला अक्षर सदैव छोटा (Small) होना चाहिए।
    • मुद्रण नियम: छपाई में वैज्ञानिक नाम सदैव तिरछे अक्षरों (Italics) में मुद्रित किए जाते हैं, जो उनके लैटिन उद्गम को प्रकट करता है।
    • हस्तलेखन नियम: हाथ से लिखते समय वंश और जाति दोनों शब्दों को अलग-अलग रेखांकित (Underlined separately) करना अनिवार्य है।
    • खोजकर्ता का नाम: जाति के नाम के बाद वैज्ञानिक का नाम संक्षेप में लिखा जाता है (जैसे Mangifera indica Linn.)।
  2. चार प्रमुख जीवों के वैज्ञानिक नाम:

    • मनुष्य (Human): Homo sapiens (हस्तलिखित: Homo sapiens) — यहां Homo वंश है और sapiens जाति है।
    • बाघ (Royal Bengal Tiger): Panthera tigris (हस्तलिखित: Panthera tigris) — यहां Panthera वंश है और tigris जाति है।
    • रोहू मछली (Rohu Carp): Labeo rohita (हस्तलिखित: Labeo rohita) — यहां Labeo वंश है और rohita जाति है।
    • आम (Mango): Mangifera indica Linn. (हस्तलिखित: Mangifera indica Linn.) — यहां Mangifera वंश, indica जाति और Linn. लिनियस को दर्शाता है।
उदाहरण 5
आर.एच. व्हिटेकर के पांच-जगत वर्गीकरण के पांचों आधार क्या हैं? कवक (फंजाई) को प्लांटी जगत से अलग करके एक स्वतंत्र जगत में क्यों रखा गया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

1969 में रॉबर्ट एच. व्हिटेकर (R.H. Whittaker) ने पांच-जगत वर्गीकरण प्रस्तुत किया। इसके पांच प्रमुख वैज्ञानिक आधार निम्नलिखित हैं:

  1. कोशिकीय संरचना की जटिलता: प्रोकैरियोटिक (अविकसित केंद्रक, जैसे मोनेरा) बनाम यूकैरियोटिक (सुविकसित केंद्रक, जैसे प्रोटिस्टा, कवक, प्लांटी, एनिमेलिया)।
  2. शारीरिक संगठन की जटिलता: एककोशिकीय (मोनेरा, प्रोटिस्टा) बनाम बहुकोशिकीय ऊतक/अंग स्तर (कवक, प्लांटी, एनिमेलिया)।
  3. पोषण की विधि: स्वपोषी प्रकाश संश्लेषक (प्लांटी), अवशोषी मृतोपजीवी (कवक), तथा अंतर्ग्रहणी प्राणिसमभोजी/होलोजोइक (एनिमेलिया)।
  4. पारिस्थितिक भूमिका: उत्पादक (प्लांटी), उपभोक्ता (एनिमेलिया), तथा अपघटक (कवक)।
  5. जातिवृत्तीय संबंध: जीवों का विकासीय इतिहास (सरल से जटिल की ओर)।

कवक (Fungi) को प्लांटी जगत से अलग करने का वैज्ञानिक औचित्य: प्रारंभिक द्विजगत वर्गीकरण में स्थिर रहने और कोशिका भित्ति होने के कारण कवकों को पादप मान लिया गया था, किंतु व्हिटेकर ने इन्हें निम्नलिखित ठोस कारणों से अलग जगत बनाया:

  • पर्णहरित का अभाव: पादप स्वपोषी होते हैं और क्लोरोफिल द्वारा प्रकाश संश्लेषण करते हैं। इसके विपरीत कवक पूर्णतः पर्णहरित रहित (Achlorophyllous) होते हैं और कभी प्रकाश संश्लेषण नहीं कर सकते।
  • पोषण की भिन्नता: कवक अवशोषी विषमपोषी (Absorptive Heterotrophs / मृतोपजीवी) होते हैं। वे अपने शरीर से पाचक एंजाइम बाहर छोड़कर सड़े-गले कार्बनिक पदार्थों को बाहर ही पचाते हैं और फिर तरल पोषण सोखते हैं।
  • कोशिका भित्ति का रासायनिक संगठन: पादपों की कोशिका भित्ति सेल्यूलोज की बनी होती है, जबकि कवकों की कोशिका भित्ति नाइट्रोजनयुक्त काइटिन (Chitin) की बनी होती है।
  • संचित भोजन: पादपों में संचित भोजन स्टार्च होता है, जबकि कवकों में संचित भोजन जंतुओं के समान ग्लाइकोजन एवं वसा होता है।
  • पारिस्थितिक भूमिका: पादप पारितंत्र के 'उत्पादक' हैं, जबकि कवक 'अपघटक' (Decomposers) हैं।
उदाहरण 6
ब्रायोफाइटा को 'पादप जगत का उभयचर' क्यों कहा जाता है? एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री पौधों के बीच कम से कम चार मुख्य संरचनात्मक अंतर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. ब्रायोफाइटा को 'पादप जगत का उभयचर' (Amphibians of the Plant Kingdom) कहे जाने का कारण:

    • जिस प्रकार जंतु जगत के उभयचर (जैसे मेंढक) भूमि पर रहते हैं किंतु अपने अंडे देने और प्रजनन के लिए अनिवार्य रूप से जल पर निर्भर होते हैं, ठीक उसी प्रकार ब्रायोफाइटा (जैसे फ्यूनेरिया, रिक्सिया) के पौधे भूमि पर नम व छायादार स्थानों पर उगते हैं, किंतु लैंगिक जनन और निषेचन (Fertilization) के लिए उन्हें जल की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
    • इनके कशाभिकायुक्त नर युग्मक (एंथरोजोइड्स) जल की बूंदों या पतली परत में तैरकर मादा जननांग (आर्कीगोनियम) तक पहुंचते हैं। जल के बिना इनका निषेचन और जीवन-चक्र पूरा नहीं हो सकता। अतः इन्हें 'पादप जगत का उभयचर' कहा जाता है।
  2. एकबीजपत्री (Monocot) बनाम द्विबीजपत्री (Dicot) पौधों में चार मुख्य संरचनात्मक अंतर:

    • क. बीजपत्रों की संख्या:

      • एकबीजपत्री: बीज में केवल एक बीजपत्र (Single Cotyledon) होता है (उदा. धान, गेहूं, मक्का)।
      • द्विबीजपत्री: बीज में दो बीजपत्र (Two Cotyledons) पाए जाते हैं (उदा. चना, मटर, आम)।
    • ख. पत्तियों का शिराविन्यास (Venation):

      • एकबीजपत्री: पत्तियों में समानांतर शिराविन्यास (Parallel Venation) पाया जाता है, जहां शिराएं एक-दूसरे के समानांतर चलती हैं (उदा. घास, बांस, केला)।
      • द्विबीजपत्री: पत्तियों में जालिकावत शिराविन्यास (Reticulate Venation) पाया जाता है, जहां शिराएं जाल जैसा तंत्र बनाती हैं (उदा. पीपल, आम, सरसों)।
    • ग. जड़ तंत्र (Root System):

      • एकबीजपत्री: इनमें प्राथमिक जड़ अल्पकालिक होती है और तने के आधार से रेशेदार झकड़ा / अपस्थानिक जड़ तंत्र (Fibrous Root System) निकलता है।
      • द्विबीजपत्री: इनमें मूलांकुर से विकसित एक मुख्य गहरी जड़ और उसकी शाखाओं वाला मूसला जड़ तंत्र (Tap Root System) पाया जाता है।
    • घ. संवहन बंडल एवं द्वितीयक वृद्धि:

      • एकबीजपत्री: तने में संवहन बंडल भरण ऊतक में बिखरे हुए और बंद (Closed - कैम्बियम रहित) होते हैं, अतः इनमें द्वितीयक वृद्धि नहीं होती।
      • द्विबीजपत्री: तने में संवहन बंडल एक वलय में व्यवस्थित और खुले (Open - कैम्बियम उपस्थित) होते हैं, जिससे इनमें द्वितीयक वृद्धि होकर मोटा काष्ठ बनता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

उपचय (Anabolism) और अपचय (Catabolism) के शुष्क भार प्रभाव को उल्टा लिख देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

उपचय (जैसे प्रकाश संश्लेषण) एक रचनात्मक प्रक्रिया है जिसमें नए कार्बनिक पदार्थ बनने से सजीव के शुष्क भार में वृद्धि होती है। अपचय (जैसे श्वसन) एक विनाशात्मक प्रक्रिया है जिसमें ग्लूकोज के टूटने से शुष्क भार में ह्रास (कमी) होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

आदिम पृथ्वी के वायुमंडल में स्वतंत्र ऑक्सीजन (Free O₂) की उपस्थिति मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

आदिम पृथ्वी का वायुमंडल अपचायक (Reducing) था, जिसमें स्वतंत्र O₂ गैस 0% (शून्य) थी। यदि ऑक्सीजन होती तो अमीनो अम्ल बनते ही ऑक्सीकृत होकर नष्ट हो जाते। मिलर-यूरे ने केवल मीथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन और जलवाष्प का प्रयोग किया था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

मिलर-यूरे प्रयोग में प्रयुक्त गैसों के अनुपात (CH₄ : NH₃ : H₂) को उलट देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मिलर-यूरे उपकरण में गैसों का निश्चित आयतन अनुपात मीथेन (CH₄) : अमोनिया (NH₃) : हाइड्रोजन (H₂) = 2 : 2 : 1 था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

वैज्ञानिक नाम लिखते समय दोनों शब्दों को एक साथ रेखांकित कर देना या जाति का पहला अक्षर बड़ा लिखना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

द्विनाम पद्धति के कठोर नियम के अनुसार: वंश का पहला अक्षर सदैव Capital और जाति का पहला अक्षर सदैव lowercase होना चाहिए। हस्तलेखन में दोनों शब्दों को अलग-अलग रेखांकित किया जाना चाहिए (जैसे Homo अलग रेखांकित, sapiens अलग रेखांकित)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

कवक (Fungi) की कोशिका भित्ति को सेल्यूलोज की बनी बताना या उसे स्वपोषी समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

कवक में पर्णहरित नहीं होता, वे अवशोषी मृतोपजीवी होते हैं। उनकी कोशिका भित्ति काइटिन (Chitin) की बनी होती है, सेल्यूलोज की नहीं (सेल्यूलोज केवल पादपों में होता है)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

ब्रायोफाइटा और टेरिडोफाइटा में संवहन ऊतकों (Vascular Tissues) की उपस्थिति को लेकर भ्रम।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ब्रायोफाइटा संवहन ऊतक रहित (Non-vascular) पौधे हैं। पृथ्वी पर प्रथम संवहनी पादप 'टेरिडोफाइटा' (फर्न) हैं, जिनमें जाइलम और फ्लोएम विकसित हुए।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

मगरमच्छ (Crocodile) के हृदय को सामान्य सरीसृपों के समान 3-कक्षीय मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यद्यपि सरीसृपों का हृदय सामान्यतः 3-कक्षीय (अपूर्ण 4-कक्षीय) होता है, किंतु मगरमच्छ (Crocodile) इसका प्रसिद्ध अपवाद है जिसका हृदय पूर्णतः 4-कक्षीय (2 अलिंद + 2 निलय) होता है।

जीवन की उत्पत्ति, जैव विविधता एवं वर्गीकरण का वैज्ञानिक मानचित्र (WBBSE Class 9 Chapter 1)

WBBSE CLASS IX SCIENCE जीवन और उसकी विविधता: मूल संकल्पना एवं वर्गीकरण (WBBSE कक्षा 9 जीवन विज्ञान) जीवन की उत्पत्ति • व्हिटेकर की पांच-जगत प्रणाली • पादप एवं जंतु जगत का वर्गीकरण I 1. जीवन की उत्पत्ति एवं मिलर-उरे प्रयोग ओपेरिन-हाल्दाने सिद्धांत: आदिम अपचायक वातावरण व तप्त तप्त सूप रासायनिक विकास: मीथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन (2:2:1) व जलवाष्प मिलर-उरे प्रयोग (1953): प्रयोगशाला में अमीनो अम्लों का संश्लेषण प्रोटोबायोन्ट: ओपेरिन का कोएसरवेट व फॉक्स का माइक्रोस्फीयर II 2. वर्गिकी एवं द्विपद नामकरण पद्धति कैरोलस लिनियस: वर्गिकी के जनक (सिस्टेमा नेचुरी एवं स्पीशीज प्लांटेरम) लिनियन पदानुक्रम: जगत -> संघ -> वर्ग -> गण -> कुल -> वंश -> जाति ICBN व ICZN नियम: वंश (कैपिटल) व जाति (स्मॉल) लैटिन भाषा में जैव विविधता के स्तर: आनुवंशिक, प्रजाति व पारिस्थितिक विविधता III 3. व्हिटेकर की पांच-जगत वर्गीकरण प्रणाली मोनेरा: प्रोकैरियोटिक, एककोशिकीय, पेप्टिडोग्लाइकन भित्ति (जीवाणु) प्रोटिस्टा: यूकैरियोटिक, एककोशिकीय प्रोटोजोआ (अमीबा, पैरामीशियम) कवक (फंजाई): काइटिन युक्त कोशिका भित्ति, मृतोपजीवी पोषण (म्यूकर) पादप (प्लांटी) स्वपोषी एवं जंतु (एनिमेलिया) परपोषी बहुकोशिकीय IV 4. पादप एवं जंतु जगत की विविधता पादप: थैलोफाइटा (शैवाल), ब्रायोफाइटा (उभयचर), टेरिडोफाइटा, अनावृतबीजी व आवृतबीजी अकशेरुकी: पोरिफेरा, निडेरिया, प्लेटीहेल्मिंथीज, एनेलिडा, आर्थ्रोपोडा, मोलस्का कॉर्डेटा: नोटोकॉर्ड, पृष्ठीय तंत्रिका रज्जु एवं ग्रसनी क्लोम छिद्र की उपस्थिति कशेरुकी: मत्स्य (उपास्थि व अस्थि), उभयचर, सरीसृप, पक्षी एवं स्तनधारी वर्ग जीवन का सार्वभौमिक आधार: प्रोटोप्लाज्मीय संगठन • उपापचय (उपचय/अपचय) • आनुवंशिकी • अनुकूलन

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. जीवन का भौतिक आधार एवं उपापचय: थॉमस हक्सले ने जीवद्रव्य (प्रोटोप्लाज्म) को जीवन का भौतिक आधार कहा। सजीवों में चलने वाली समस्त रासायनिक क्रियाओं का योग उपापचय (Metabolism) कहलाता है। उपचय रचनात्मक, ऊर्जा संचयी व शुष्क भार बढ़ाने वाला (प्रकाश संश्लेषण) तथा अपचय विनाशात्मक, ऊर्जा विमोचक व शुष्क भार घटाने वाला (श्वसन) प्रक्रम है। समस्थापन (होमियोस्टैसिस) आंतरिक वातावरण को स्थिर रखता है।
मुख्य बिंदु 2
  1. रासायनिक जैव विकास एवं मिलर-उरे प्रयोग: आदिम अपचायक वायुमंडल में स्वतंत्र O₂ अनुपस्थित थी। ओपेरिन-हाल्डेन के रासायनिक विकास सिद्धांत (तप्त तनु सूप, कोएसरवेट्स) को 1953 में स्टैनली मिलर और हेरोल्ड यूरे ने स्पार्क डिस्चार्ज उपकरण में CH₄, NH₃, H₂ (2:2:1) और 60,000V स्फुलिंग द्वारा अमीनो अम्लों (ग्लाइसिन, ऐलेनिन, एस्पार्टिक एसिड) का संश्लेषण कर अकाट्य रूप से सिद्ध किया। सायनोबैक्टीरिया ने ग्रेट ऑक्सीडेशन इवेंट द्वारा वायुमंडल को ऑक्सीकारक बनाया।
मुख्य बिंदु 3
  1. जैव विविधता एवं संरक्षण: जैव विविधता (वाल्टर रोसेन, एडवर्ड विल्सन) के तीन स्तर हैं: आनुवंशिक, प्रजातीय, और पारिस्थितिक (अल्फा, बीटा, गामा)। सिनकोना से मलेरिया रोधी कुनैन, सर्पगंधा से रक्तचाप रोधी रिसरपिन, तथा सदाबहार से कैंसर रोधी विनब्लास्टिन प्राप्त होता है। जैव विविधता ह्रास के 4 कारण (The Evil Quartet) हैं: आवास विनाश, अति-दोहन, विदेशी प्रजाति आक्रमण (जलकुंभी), और सह-विलुप्ति। भारत में 4 हॉटस्पॉट्स (पश्चिमी घाट, पूर्वी हिमालय, इंडो-बर्मा, सुंडालैंड) हैं।
मुख्य बिंदु 4
  1. लिनियन पदानुक्रम एवं द्विनाम पद्धति: कैरोलस लिनियस (वर्गिकी के जनक) ने 7 अनिवार्य पदानुक्रमिक स्तर दिए: जगत -> संघ -> वर्ग -> गण -> कुल -> वंश -> जाति (मूलभूत इकाई)। द्विनाम पद्धति (ICBN/ICZN) में दो लैटिन पद होते हैं: वंश (Capital प्रथम अक्षर) और जाति (lowercase प्रथम अक्षर), जो मुद्रण में तिरछे और हस्तलेखन में पृथक रेखांकित होते हैं (जैसे मानव: Homo sapiens, बाघ: Panthera tigris, आम: Mangifera indica)।
मुख्य बिंदु 5
  1. व्हिटेकर का पांच-जगत वर्गीकरण (1969): पांच वैज्ञानिक आधारों (कोशिकीय जटिलता, शारीरिक संगठन, पोषण विधि, पारिस्थितिक भूमिका, जातिवृत्त) पर 5 जगत बनाए गए: 1. मोनेरा (प्रोकैरियोटिक, पेप्टिडोग्लाइकन भित्ति - जीवाणु), 2. प्रोटिस्टा (एककोशिकीय यूकैरियोटिक - अमीबा, यूग्लीना), 3. कवक (काइटिन भित्ति, अवशोषी मृतोपजीवी - यीस्ट, राइजोपस), 4. प्लांटी (सेल्यूलोज भित्ति, स्वपोषी - पादप), और 5. एनिमेलिया (भित्ति रहित, होलोजोइक - जंतु)। सीमा: वायरस को स्थान नहीं।
मुख्य बिंदु 6
  1. पादप जगत के 5 प्रभाग: थैलोफाइटा (अविभेदित थैलस, संवहन रहित - शैवाल: स्पाइरोगाइरा); ब्रायोफाइटा ('पादप जगत के उभयचर', राइजोइड्स, निषेचन हेतु जल आवश्यक - फ्यूनेरिया); टेरिडोफाइटा ('संवहनी अपुष्पोद्भिद', जाइलम ट्रेकिड्स - ड्रायोप्टेरिस); जिम्नोस्पर्म (नग्न बीज, शंकु, फल रहित - पाइनस); और एंजियोस्पर्म (फल में बंद बीज, दोहरा निषेचन, पुष्प)। एकबीजपत्री में 1 बीजपत्र, समानांतर शिराविन्यास व झकड़ा जड़ (धान) तथा द्विबीजपत्री में 2 बीजपत्र, जालिकावत शिराविन्यास व मूसला जड़ (मटर) होती है।
मुख्य बिंदु 7
  1. अकशेरुकी के 9 संघ: पोरीफेरा (ऑस्टिया, ऑस्कुलम, नाल तंत्र, कोएनोसाइट्स - साइकॉन); नाइडेरिया (दंश कोशिकाएं, सीलेंट्रॉन - हाइड्रा); टीनोफोरा (8 कंकत पट्टिकाएं, जैव-संदीप्ति - प्लूरोब्रेकिया); प्लैटीहेल्मिन्थीज (चपटे कृमि, ज्वाला कोशिकाएं, अगुहीय - फीताकृमि); नेमाटोडा (गोलकृमि, कूट-प्रगुहा - एस्केरिस); एनेलिडा (विखंडी खंडीभवन, नेफ्रीडिया, सीटी, बंद रक्त तंत्र - केंचुआ); आर्थ्रोपोडा (सबसे बड़ा संघ, संधित पाद, काइटिन बाह्यकंकाल, हीमोसील, मैलपिघी नलिकाएं - तिलचट्टा); मोलस्का (कोमल देह, मेंटल, कैल्शियमी कवच, रेडुला - घोंघा); एकाइनोडर्मेटा (कंटकी त्वचा, जल संवहन तंत्र, नालपाद, पंच-अरीय सममिति - तारा मछली)।
मुख्य बिंदु 8
  1. कॉर्डेटा एवं कशेरुकी के 6 वर्ग: कॉर्डेटा के 4 मूलभूत लक्षण: नोटोकॉर्ड, पृष्ठीय खोखली तंत्रिका रज्जु, ग्रसनी क्लोम दरारें, और पश्च-गुदा पुच्छ। कशेरुकी वर्ग: 1. कॉन्ड्रिक्थीज (उपास्थि, प्लेकॉइड शल्क, ऑपरकुलम रहित - शार्क), 2. ऑस्टिक्थीज (अस्थि, साइक्लॉइड शल्क, ऑपरकुलम व वायुकोष उपस्थित - रोहू), 3. एम्फीबिया (नम नग्न त्वचा, 3-कक्षीय हृदय, कायांतरण - मेंढक), 4. सरीसृप (शुष्क शल्क, 3-कक्षीय/मगरमच्छ में 4-कक्षीय, कवचित अंडे - छिपकली), 5. एवीज (पर, वातिल हड्डियां, 4-कक्षीय, समतापी - कबूतर), और 6. स्तनधारी (स्तन ग्रंथियां, रोम, पिन्ना, अकेंद्रकीय RBC, जरायुज - मनुष्य)।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
यदि किसी जीवित कोशिका में अपचयी क्रियाओं (Catabolism) की दर उपचयी क्रियाओं (Anabolism) से अधिक हो जाए, तो कोशिका के शुष्क भार और जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अपचय एक विनाशात्मक प्रक्रिया है जिसमें कार्बनिक अणुओं का विघटन होता है, जबकि उपचय में नए पदार्थों का निर्माण होता है। यदि अपचय की दर उपचय से अधिक हो जाए, तो कोशिका के संचित पदार्थों और संरचनात्मक प्रोटीनों का तेजी से क्षरण होगा, जिससे कोशिका का शुष्क भार लगातार घटेगा। यह स्थिति वार्धक्य (बुढ़ापा), दुर्बलता और लंबे समय तक बने रहने पर कोशिका की मृत्यु का कारण बनती है।
उपचय = रचनात्मक/भार वृद्धि, अपचय = विनाशात्मक/भार ह्रास के संतुलन पर विचार करें।
2
मिलर और यूरे के प्रयोग में यदि गैस फ्लास्क में स्वतंत्र ऑक्सीजन (O₂) गैस उपस्थित होती, तो प्रयोग के परिणामों पर क्या प्रभाव पड़ता?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: यदि फ्लास्क में स्वतंत्र O₂ उपस्थित होती, तो विद्युत स्फुलिंग के प्रभाव में मीथेन और अमोनिया जैसे अपचायक यौगिक तुरंत जलकर कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), जल और नाइट्रोजन ऑक्साइड में ऑक्सीकृत हो जाते। परिणामस्वरूप सरल अमीनो अम्लों (ग्लाइसिन, ऐलेनिन आदि) का अजैविक संश्लेषण असंभव हो जाता, क्योंकि कार्बनिक अणुओं का निर्माण केवल अपचायक (Reducing) वातावरण में ही हो सकता था।
ऑक्सीजन की तीव्र ऑक्सीकारक प्रकृति और आदिम अपचायक वायुमंडल के महत्व को याद करें।
3
जलकुंभी (Eichhornia crassipes) को 'बंगाल का आतंक' (Terror of Bengal) क्यों कहा जाता है, और यह जैव विविधता ह्रास के किस कारक का उदाहरण है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: जलकुंभी एक विदेशी आक्रामक प्रजाति (Alien Invasive Species) है जिसे उसके सुंदर बैंगनी फूलों के कारण भारत लाया गया था। यह बंगाल के पोखरों और जलाशयों में कायिक प्रवर्धन द्वारा इतनी तीव्र गति से फैली कि इसने जल की सतह को पूरी तरह ढक दिया। यह पानी में घुली हुई ऑक्सीजन (Dissolved O₂) को तेजी से सोख लेती है (Eutrophication), जिससे सूर्य का प्रकाश नीचे नहीं पहुंच पाता और मछलियों व अन्य जलीय जीवों का दम घुटने से सामूहिक विनाश हो जाता है। यह जैव विविधता ह्रास के 'विदेशी प्रजातियों के आक्रमण' का प्रमुख उदाहरण है।
विदेशी आक्रामक प्रजाति, जल में ऑक्सीजन की कमी और मछलियों की मृत्यु पर ध्यान दें।
4
एक अज्ञात पौधा प्राप्त हुआ है जिसकी पत्तियों में समानांतर शिराविन्यास है, जड़ें झकड़ा हैं और बीज में केवल एक दाल (बीजपत्र) है। यह एंजियोस्पर्म के किस वर्ग से संबंधित है और इसके तने के संवहन बंडलों की क्या विशेषता होगी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: यह पौधा स्पष्ट रूप से 'एकबीजपत्री' (Monocotyledonae) वर्ग से संबंधित है। इसके तने की आंतरिक संरचना में संवहन बंडल (Vascular Bundles) भरण ऊतक में बिखरे हुए (Scattered) होंगे, और प्रत्येक संवहन बंडल 'बंद' (Closed) होगा—अर्थात जाइलम और फ्लोएम के बीच कैम्बियम अनुपस्थित होगा, जिसके कारण इस पौधे में द्वितीयक वृद्धि (मोटाई में वृद्धि) नहीं होगी।
एकबीजपत्री पौधों के बाह्य एवं आंतरिक लक्षणों (संवहन बंडल बिखरे व बंद) को याद करें।
5
शार्क (कॉन्ड्रिक्थीज) और रोहू (ऑस्टिक्थीज) दोनों मछलियां हैं, किंतु यदि शार्क तैरना बंद कर दे तो वह पानी में डूब जाएगी जबकि रोहू स्थिर रह सकती है। इसका क्या कारण है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: रोहू (अस्थियुक्त मछली - ऑस्टिक्थीज) के शरीर में गैस से भरा 'वायुकोष' या स्विम ब्लैडर (Air Bladder / Swim Bladder) पाया जाता है, जो उसे हाइड्रोस्टैटिक उत्प्लावकता (Buoyancy) प्रदान करता है, जिससे वह बिना तैरे भी पानी में किसी भी गहराई पर आसानी से स्थिर रह सकती है। इसके विपरीत शार्क (उपास्थियुक्त मछली - कॉन्ड्रिक्थीज) में वायुकोष पूर्णतः अनुपस्थित होता है, अतः डूबने से बचने के लिए उसे पानी में लगातार तैरते रहना पड़ता है।
ऑस्टिक्थीज में वायुकोष (Air Bladder) की उपस्थिति और कॉन्ड्रिक्थीज में इसके अभाव पर विचार करें।
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