जीवन (Life) सजीवों की एक अद्वितीय, अत्यंत जटिल और स्व-नियंत्रित अवस्था है जो उन्हें निर्जीव पदार्थों से अलग करती है। जीवन कोई एकल भौतिक पदार्थ नहीं है, बल्कि यह कोशिकाओं के भीतर होने वाली अनगिनत समन्वित रासायनिक अभिक्रियाओं, ऊर्जा परिवर्तनों और जैविक सूचनाओं के प्रवाह का कुल परिणाम है।
आधुनिक जीव विज्ञान के अनुसार: "सजीव वह स्व-प्रतिकृतिकारी (self-replicating), स्व-नियामक (self-regulating) और विकासशील परस्पर क्रियात्मक प्रणाली है जो बाह्य उद्दीपनों के प्रति संवेदनशील होकर अनुक्रिया व्यक्त करने में सक्षम होती है।"
वर्ष 1839 में चेक वैज्ञानिक जे.ई. पुरकिंजे (J.E. Purkinje) ने कोशिका के भीतर उपस्थित जीवित, चिपचिपे, पारभासी तरल पदार्थ के लिए सर्वप्रथम 'प्रोटोप्लाज्म' (जीवद्रव्य) शब्द का प्रयोग किया। इसके उपरांत 1868 में प्रसिद्ध ब्रिटिश जीवविज्ञानी थॉमस हेनरी हक्सले (Thomas Henry Huxley) ने जीवद्रव्य के असाधारण महत्व को रेखांकित करते हुए अपना ऐतिहासिक कथन दिया:
जीवद्रव्य की भौतिक-रासायनिक विशेषताएं:
- भौतिक प्रकृति: यह एक जटिल, रंगहीन, अर्द्ध-पारदर्शी, चिपचिपा और जैली जैसा कोलाइडल घोल (Colloidal Solution) है। इसमें प्रकीर्णन माध्यम जल है और प्रकीर्णित प्रावस्था प्रोटीन, लिपिड व कार्बोहाइड्रेट हैं। यह 'सॉल' (तरल) और 'जेल' (अर्द्ध-ठोस) अवस्थाओं में परस्पर रूपांतरित हो सकता है।
- रासायनिक संगठन: जीवद्रव्य में लगभग 75% से 85% जल, 10% से 15% प्रोटीन, 2% से 4% लिपिड, 1% कार्बोहाइड्रेट तथा 1% अकार्बनिक लवण (आयन) पाए जाते हैं। इसके मुख्य चार तत्व कार्बन (C), हाइड्रोजन (H), ऑक्सीजन (O) और नाइट्रोजन (N) हैं, जो इसके कुल भार का 96% बनाते हैं।
- जैविक गुण: जीवद्रव्य में निरंतर चक्रीय गति होती रहती है जिसे साइक्लोसिस (Cyclosis) या जीवद्रव्यी भ्रमण कहते हैं (उदा. अमीबा व हाइड्रिला की कोशिकाओं में)।
सजीव शरीर की प्रत्येक जीवित कोशिका में हर क्षण हजारों रासायनिक अभिक्रियाएं चलती रहती हैं। सजीव के शरीर में संपन्न होने वाली इन सभी रासायनिक अभिक्रियाओं के कुल योग को उपापचय (Metabolism) कहा जाता है। उपापचय को दो परस्पर विरोधी किंतु अनिवार्य श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:
- उपचयी उपापचय / उपचय (Anabolism - रचनात्मक उपापचय):
- यह एक संश्लेषणात्मक या रचनात्मक (Constructive) प्रक्रिया है जिसमें सरल अकार्बनिक या कार्बनिक अणुओं के संयोजन से जटिल कार्बनिक अणुओं का निर्माण होता है।
- यह एक ऊर्जा-शोषी या ऊर्जा-संचयी (Endergonic) प्रक्रिया है, जिसमें बाह्य ऊर्जा (जैसे सौर ऊर्जा या ATP) रासायनिक बंधों के रूप में संचित होती है।
- इसके फलस्वरूप जीव के शुष्क भार (Dry Weight) में वृद्धि होती है।
- प्रमुख उदाहरण:
क. प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis): पौधे सूर्य के प्रकाश और पर्णहरित की उपस्थिति में जल और कार्बन डाइऑक्साइड से ग्लूकोज बनाते हैं:6CO₂ + 12H₂O + प्रकाश ऊर्जा → C₆H₁₂O₆ + 6O₂ + 6H₂O
ख. प्रोटीन संश्लेषण: अमीनो अम्लों के पेप्टाइड बंधों द्वारा जुड़कर शरीर की नई कोशिकाओं व ऊतकों का निर्माण।
ग. ग्लाइकोजेनेसिस: अतिरिक्त ग्लूकोज का यकृत व पेशियों में ग्लाइकोजन के रूप में संचयन।
- अपचयी उपापचय / अपचय (Catabolism - विनाशात्मक उपापचय):
- यह एक विघटनकारी या विनाशात्मक (Destructive) प्रक्रिया है जिसमें जटिल कार्बनिक अणु टूटकर सरल पदार्थों में परिवर्तित होते हैं।
- यह एक ऊर्जा-विमोचक (Exergonic) प्रक्रिया है, जिसमें अणुओं के बंध टूटने से संचित ऊर्जा ATP के रूप में मुक्त होती है, जो जैविक कार्यों में उपयोग होती है।
- इसके कारण जीव के शुष्क भार (Dry Weight) में कमी आती है।
- प्रमुख उदाहरण:
क. कोशिकीय श्वसन (Respiration): ग्लूकोज का ऑक्सीजन की उपस्थिति में ऑक्सीकरण होकर ऊर्जा, CO₂ और जल का बनना:C₆H₁₂O₆ + 6O₂ → 6CO₂ + 6H₂O + ऊर्जा (38 ATP / 686 kcal)
ख. उत्सर्जन (Excretion): नाइट्रोजनी अपशिष्टों (यूरिया, यूरिक अम्ल) का विखंडन और शरीर से निष्कासन।
ग. पाचन एवं लिपिड अपघटन: जटिल वसा और प्रोटीनों का सरल घटकों में टूटना।
| तुलना का आधार | उपचयी उपापचय (Anabolism) | अपचयी उपापचय (Catabolism) |
|---|---|---|
| 1. प्रक्रिया की प्रकृति | रचनात्मक / संश्लेषणात्मक (Constructive) | विनाशात्मक / विघटनकारी (Destructive) |
| 2. ऊर्जा विनिमय | ऊर्जा-शोषी / संचयी (Endergonic) — ऊर्जा संचित होती है | ऊर्जा-विमोचक (Exergonic) — ATP ऊर्जा मुक्त होती है |
| 3. शुष्क भार पर प्रभाव | जीव के शुष्क भार में वृद्धि होती है (भार बढ़ता है) | जीव के शुष्क भार में ह्रास होता है (भार घटता है) |
| 4. रासायनिक परिवर्तन | सरल अणुओं से जटिल कार्बनिक यौगिकों का संश्लेषण | जटिल अणुओं का टूटकर सरल पदार्थों में रूपांतरण |
| 5. प्रमुख उदाहरण | प्रकाश संश्लेषण, प्रोटीन संश्लेषण, स्टार्च निर्माण | श्वसन (Respiration), पाचन, उत्सर्जन |
| 6. जैविक महत्व | शरीर की वृद्धि, ऊतकों की मरम्मत और ऊर्जा संचय हेतु | दैनिक जैविक गतिविधियों हेतु तत्पर ऊर्जा (ATP) आपूर्ति |
उपापचय के अतिरिक्त सजीवों में निम्नलिखित अनिवार्य जैविक लक्षण पाए जाते हैं:
- वृद्धि (Growth): सजीवों में वृद्धि एक आंतरिक और अपरिवर्तनीय (Internal & Irreversible) प्रक्रिया है, जो नई कोशिकाओं के बनने और जीवद्रव्य के संचय से होती है। इसे 'अन्तःप्रवेश' (Intussusception) कहते हैं। इसके विपरीत, निर्जीवों (जैसे रेत के टीले या क्रिस्टल) में वृद्धि केवल बाहरी सतह पर पदार्थों के जमाव (Accretion) से होती है।
वृद्धि का गतिक संतुलन: यदि उपचय > अपचय हो, तो शरीर में धनात्मक वृद्धि होती है। यदि उपचय = अपचय हो, तो वयस्क संतुलन रहता है। यदि उपचय < अपचय हो, तो वजन घटता है और वार्धक्य आता है। - संवेदनशीलता / उद्दीपनशीलता (Irritability / Sensitivity): बाह्य या आंतरिक वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को उद्दीपक (Stimulus) कहते हैं (जैसे प्रकाश, ताप, स्पर्श, ध्वनि, रसायन)। इन उद्दीपनों को ग्रहण कर उनके प्रति शारीरिक या व्यावहारिक प्रतिक्रिया (Response) व्यक्त करने की क्षमता को उद्दीपनशीलता कहते हैं।
उदाहरण: छुईमुई (Mimosa pudica) की पत्तियों को छूते ही उनका झुक जाना (कंपानुकुंचन / Thigmonasty); पौधों के प्ररोह का प्रकाश की ओर मुड़ना (प्रकाशानुवर्तन / Phototropism); तेज प्रकाश में मानव आंख की पुतली का सिकुड़ जाना। - समस्थापन / होमियोस्टैसिस (Homeostasis): बाह्य पर्यावरण में निरंतर उतार-चढ़ाव होने के बावजूद सजीव शरीर द्वारा अपने आंतरिक वातावरण (Internal Environment / Milieu Intérieur) को एक स्थिर, अनुकूल और संतुलित अवस्था में बनाए रखने की क्षमता को समस्थापन कहते हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ: फ्रांसीसी शरीरक्रियाविज्ञानी क्लाउड बर्नार्ड (Claude Bernard) ने सर्वप्रथम 'आंतरिक वातावरण की स्थिरता' की संकल्पना दी, और अमेरिकी वैज्ञानिक वाल्टर बी. कैनन (Walter B. Cannon, 1932) ने इसके लिए 'होमियोस्टैसिस' शब्द गढ़ा।
उदाहरण: अत्यधिक गर्मी में पसीना निकलकर मानव शरीर का तापमान 37°C पर स्थिर रहना (थर्मोरेग्युलेशन); रक्त में ग्लूकोज का स्तर 80-120 mg/100ml पर नियंत्रित रहना (इंसुलिन व ग्लूकागन हार्मोन द्वारा); जल-खनिज संतुलन (ऑस्मोरिग्युलेशन)। - जनन (Reproduction): अपनी जाति के अस्तित्व और आनुवंशिक निरंतरता को बनाए रखने के लिए अपने जैसी नई संतान उत्पन्न करने की क्षमता। यह अलैंगिक (Asexual - विखंडन, मुकुलन, बीजाणुजनन) या लैंगिक (Sexual - युग्मक संलयन) विधि से होता है।
- वार्धक्य एवं जैविक मृत्यु (Senescence & Death): समय बीतने के साथ कोशिकाओं और ऊतकों की उपापचयी कार्यक्षमता का धीरे-धीरे ह्रास होना वार्धक्य कहलाता है। अंततः जब शरीर की सभी समन्वित उपापचयी क्रियाएं और जीवद्रव्यी गतिविधियां स्थायी रूप से बंद हो जाती हैं, तो उसे मृत्यु कहते हैं। मृत्यु सजीवों की जीवन-चक्र की अंतिम अपरिहार्य अवस्था है।