1. पाठ प्रवेश एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
'बाल रामकथा' (पूरक पाठ्यपुस्तक) के अंतर्गत कथाकार मधुकर उपाध्याय द्वारा रचित अध्याय 'दो वरदान' रामायण के इतिहास का वह सबसे अधिक संवेदनशील, मार्मिक और युगांतरकारी मोड़ है, जहाँ से सुख और उल्लास की धारा अचानक दारुण वियोग और वनवास के महाशोक में बदल जाती है। पिछले अध्यायों में हमने देखा कि किस प्रकार महर्षि विश्वामित्र के साथ जाकर श्रीराम और लक्ष्मण ने ताड़का, सुबाहु और मारीच जैसी आसुरी शक्तियों का दमन किया, सिद्धाश्रम के पवित्र अनुष्ठान की रक्षा की और जनकपुर में भगवान शिव के दिव्य पिनाक धनुष को भंग कर सीता सहित चारों राजकुमारों का चतुर्मुखी विवाह संपन्न कराया।
विवाह के पश्चात चारों राजकुमार अयोध्या लौट आए। अयोध्या में कई वर्षों तक सुख, शांति, समृद्धि और धर्म का अखंड राज्य चलता रहा। इसी बीच भरत और शत्रुघ्न अपने मामा युधाजित के विशेष निमंत्रण पर अपने ननिहाल 'कैकेय देश' (राजा अश्वपति के राज्य) गए हुए थे। वहाँ उनका अत्यधिक आदर-सत्कार हो रहा था, किंतु उनके मन में अयोध्या और विशेषकर ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम की स्मृति सदैव बसी रहती थी।
2. राजा दशरथ का वृद्धावस्था विचार एवं श्रीराम के अद्वितीय सद्गुण
समय बीतने के साथ राजा दशरथ अत्यंत वृद्ध हो चले थे। उनके केश श्वेत हो चुके थे और वे अपने शरीर में शिथिलता का अनुभव कर रहे थे। उन्होंने अपने लंबे शासनकाल में रघुकुल की मर्यादा, प्रजा-रंजन और सत्य के नियमों का पूर्ण निष्ठा से पालन किया था। अब उनके मन में एक स्वाभाविक अभिलाषा जागी कि वे अपने जीते-जी अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को युवराज पद पर अभिषिक्त कर राजकाज का भार उन्हें सौंप दें।
श्रीराम के व्यक्तित्व के प्रमुख सद्गुण:
- शील एवं विनम्रता: अद्वितीय बलशाली और पराक्रमी होने के उपरांत भी श्रीराम में तनिक भी अहंकार नहीं था; वे बड़ों का आदर और छोटों से अपार स्नेह करते थे।
- न्यायप्रियता एवं निष्पक्षता: वे धर्म और नीति के गूढ़ ज्ञाता थे। प्रत्येक निर्णय में वे सत्य और जन-कल्याण को सर्वोपरि रखते थे।
- मृदुभाषिता एवं धैर्य: वे कभी कटु वचन नहीं बोलते थे और विषम से विषम परिस्थिति में भी उनका मुखमंडल शांत और प्रसन्न रहता था।
- प्रजा-वत्सलता: अयोध्या की संपूर्ण प्रजा श्रीराम को अपने प्राणों से अधिक चाहती थी और प्रत्येक नागरिक श्रीराम को अपना संरक्षक व आदर्श मानता था।
3. राजसभा का ऐतिहासिक निर्णय एवं पुष्य नक्षत्र की घोषणा
राजा दशरथ ने अपने इस विचार पर सर्वप्रथम कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ और प्रमुख मंत्रियों से गुप्त मंत्रणा की। सभी ने राजा के प्रस्ताव का सहर्ष अनुमोदन किया। इसके उपरांत राजा दशरथ ने विशाल राजसभा का आयोजन किया, जिसमें मुनि, विद्वान, सामंत, सेनापति और नगर के प्रमुख श्रेष्ठ जन उपस्थित हुए।
राजा दशरथ ने गंभीर वाणी में कहा: "हे सभासदों! मैं वृद्ध हो गया हूँ। मेरा शरीर अब राजकाज का भार उठाने में असमर्थ है। यदि आप सभी की अनुमति हो, तो मैं अपने ज्येष्ठ पुत्र राम को युवराज पद सौंपना चाहता हूँ।"
राजा का यह प्रस्ताव सुनते ही संपूर्ण सभा में हर्ष की लहर दौड़ गई। सभासदों ने एक स्वर में जय-जयकार करते हुए कहा: "महाराज! राम सर्वगुण संपन्न हैं। वे हमारे राजा बनने के सर्वथा योग्य हैं। आप अविलंब उनका राज्याभिषेक कीजिए।"
राजा दशरथ ने मुनि वशिष्ठ से परामर्श कर घोषणा की कि कल प्रातःकाल ही पुष्य नक्षत्र के पावन योग में श्रीराम का राज्याभिषेक होगा। यद्यपि भरत और शत्रुघ्न ननिहाल में थे, किंतु राजा दशरथ का विचार था कि शुभ कार्य में विलंब नहीं करना चाहिए और भरत का मन इतना पवित्र है कि वह अयोध्या लौटकर अपने भाई के राज्याभिषेक से अत्यंत आनंदित ही होगा।
4. अयोध्या में महोत्सव की तैयारियाँ एवं श्रीराम-सीता का व्रत
राज्याभिषेक की सूचना मिलते ही अयोध्या नगरी आनंद के सागर में हिलोरें लेने लगी:
- समस्त राजपथों को धोकर उन पर सुगंधित चंदन और गुलाब-जल का छिड़काव किया गया।
- घरों और द्वारों पर स्वर्ण-तोरण, आम के पल्लव, रंग-बिरंगी पताकाएँ और सुंदर दीपमालाएँ सजाई गईं।
- माता कौशल्या ने अत्यंत प्रसन्न होकर राजमहल में ब्राह्मणों को प्रचुर दान दिया और देव-मंदिरों में अखंड पूजा-अर्चना करवाई।
- महर्षि वशिष्ठ ने श्रीराम और सीता के कक्ष में जाकर उन्हें राज्याभिषेक के पूर्व का कठिन संयम-व्रत समझाया। श्रीराम और माता सीता ने अन्न-जल त्याग कर भूमि पर कुश की शय्या पर शयन करते हुए रात्रि भर ईश्वर-आराधना और उपवास का कठोर नियम धारण किया।