1. विविधता क्या है? (What is Diversity?)
जब हम अपने चारों ओर दृष्टि डालते हैं, तो हमें दिखाई देता है कि कोई भी दो मनुष्य बिल्कुल एक जैसे नहीं होते। हमारी कक्षा, हमारे पड़ोस और हमारे समाज में रहने वाले लोगों के चेहरे-मोहरे, रंग-रूप, शारीरिक बनावट, भाषा, खान-पान, वेशभूषा, धर्म और पूजा-पद्धति में अंतर होता है। इस स्वाभाविक भिन्नता और विभिन्न जीवनशैलियों के सह-अस्तित्व को ही विविधता (Diversity) कहा जाता है।
विविधता का अर्थ केवल बाहरी भिन्नता नहीं है, बल्कि यह मानव समाज की वह संपन्नता है जो हमारे जीवन को अधिक समृद्ध, रोचक और सुंदर बनाती है। यदि सब लोग एक जैसा सोचते, एक जैसा भोजन करते और एक जैसे गीत गाते, तो समाज में कोई नयापन या रचनात्मकता नहीं बचती।
2. हमारे दैनिक जीवन में विविधता के विभिन्न आयाम
भारत जैसे विशाल देश में विविधता पग-पग पर दिखाई देती है:
- खान-पान की विविधता: उत्तर भारत में गेहूँ की रोटी और दाल मुख्य आहार हैं, जबकि दक्षिण एवं पूर्वी भारत (जैसे बिहार, पश्चिम बंगाल, केरल) में चावल और मछली प्रमुखता से खाई जाती है। बिहार में लिट्टी-चोखा, मखाना और ठेकुआ लोकप्रिय हैं, तो पंजाब में मक्के की रोटी-सरसों का साग और दक्षिण में इडली-डोसा चाव से खाया जाता है।
- पहनावे की विविधता: राजस्थान में पगड़ी और घाघरा-चोली, कश्मीर में फेरन, असम में मेखेला चादर, केरल में मुंडू तथा बिहार में पारंपरिक धोती-कुर्ता और सूती साड़ियाँ पहनी जाती हैं।
- भाषा और बोलियों की विविधता: भारत के संविधान की 8वीं अनुसूची में 22 प्रमुख भाषाएँ मान्यता प्राप्त हैं, और देश भर में सैकड़ों स्थानीय बोलियाँ बोली जाती हैं। अकेले बिहार में भोजपुरी, मैथिली, मगही, अंगिका और बज्जिका जैसी समृद्ध भाषाएँ और बोलियाँ जन-जन के हृदय में रची-बसी हैं।
- धार्मिक एवं उत्सवों की विविधता: भारत में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी आदि धर्मों के लोग मिल-जुलकर रहते हैं। होली, दिवाली, ईद, मुहर्रम, छठ पूजा, क्रिसमस, गुरुपर्व, दुर्गा पूजा और ओणम पूरे देश में उल्लास के साथ मनाए जाते हैं।
| विविधता का क्षेत्र | उदाहरण 1 (उत्तर / पूर्व भारत) | उदाहरण 2 (दक्षिण / पश्चिम भारत) |
|---|---|---|
| पारंपरिक आहार | दाल-चावल, लिट्टी-चोखा (बिहार), रोटी-सब्जी | इडली, डोसा, सांभर (केरल/तमिलनाडु), ढोकला (गुजरात) |
| लोक त्योहार | छठ पूजा, मकर संक्रांति, दुर्गा पूजा | ओणम, पोंगल, गणेश चतुर्थी |
| पारंपरिक वेशभूषा | कुर्ता-पायजामा, धोती, साड़ी | मुंडू (केरल), वेष्टि (तमिलनाडु), पगड़ी व अंगरखा |
| नृत्य एवं संगीत | कथक, झिझिया (बिहार), बिहू (असम) | कथकली, मोहिनीअट्टम, भरतनाट्यम, गरबा |
3. विविधता हमारे जीवन को कैसे समृद्ध करती है?
जरा सोचिए, यदि बाल साहित्य या कहानियों के सभी लेखक एक ही स्थान पर रहे होते, उन्होंने केवल एक ही जानवर (जैसे हिरण) को देखा होता और केवल एक ही खेल खेला होता, तो क्या वे इतनी रोचक और कल्पनाशील कहानियाँ लिख पाते? विविधता हमें विभिन्न दृष्टिकोणों, नए अनुभवों, जीवन के अलग-अलग स्वादों और साझी मानवीय संवेदनाओं से जोड़ती है।