ICSE • कक्षा 6 • Mathematics • अध्याय 4
अनुमानित समय: 45-60 मिनट
प्रगति: अध्ययनरत
ऋणात्मक संख्याएँ और पूर्णांक (Negative Numbers and Integers)
ऋणात्मक संख्याएँ और पूर्णांक (Negative Numbers and Integers) विद्यालयी गणित और उच्च वैज्ञानिक चिंतन का एक अत्यंत मौलिक और क्रांतिकारी अध्याय है। कक्षा 6 के सीआईएससीई (आईसीएसई) पाठ्यक्रम में यह अध्याय विद्यार्थियों को संख्याओं की उस नई दुनिया से परिचित कराता है जो शून्य के बाईं ओर अनंत तक फैली हुई है। प्रारंभिक कक्षाओं में विद्यार्थी केवल प्राकृत संख्याओं N अर्थात एक, दो, तीन, चार इत्यादि तथा शून्य को मिलाकर बनी पूर्ण संख्याओं W अर्थात शून्य, एक, दो, तीन इत्यादि से परिचित होते हैं। परंतु दैनिक जीवन, विज्ञान, वाणिज्य और भूगोल की अनगिनत परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं जिनमें केवल परिमाण ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि परिमाण के साथ दिशा का बोध होना भी अनिवार्य होता है। ऐसी राशियों को दिष्ट राशियां (Directed Quantities) कहा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि हम समुद्र तल को संदर्भ बिंदु अथवा शून्य मान लें, तो समुद्र तल से आठ सौ मीटर ऊपर उड़ता हुआ हवाई जहाज और समुद्र तल से आठ सौ मीटर नीचे तैरती हुई पनडुब्बी दोनों ही शून्य से समान दूरी पर हैं, परंतु उनकी दिशाएँ एक-दूसरे के सर्वथा विपरीत हैं। यदि हवाई जहाज की ऊंचाई को धन आठ सौ लिखा जाए, तो पनडुब्बी की गहराई को ऋण आठ सौ के रूप में व्यक्त करना अनिवार्य हो जाता है।
ऐतिहासिक दृष्टि से ऋणात्मक संख्याओं की स्वीकार्यता आसान नहीं थी। प्राचीन यूनानी गणितज्ञ डायोफैंटस ने समीकरणों के ऋणात्मक हलों को अर्थहीन और असंभव कहकर नकार दिया था। परंतु भारतीय गणितीय परंपरा में सातवीं शताब्दी में ब्रह्मगुप्त ने व्यापारिक बहीखातों, ऋण और धन के माध्यम से ऋणात्मक संख्याओं के सटीक संक्रियात्मक नियम प्रतिपादित किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के पास उपस्थित संपत्ति को धन अर्थात धनात्मक संख्या से और उसके ऊपर बकाया कर्ज को ऋण अर्थात ऋणात्मक संख्या से दर्शाया जा सकता है। जब संपत्ति और कर्ज का मान बराबर होता है, तो उनका संयुक्त परिणाम शून्य प्राप्त होता है। इसी गुणधर्म को आज आधुनिक गणित में योज्य प्रतिलोम (Additive Inverse) कहा जाता है। सत्रहवीं शताब्दी में महान फ्रांसीसी दार्शनिक और गणितज्ञ रेने देकार्त ने जब कार्तीय निर्देशांक ज्यामिति का आविष्कार किया, तब उन्होंने संख्या रेखा पर शून्य के बाईं ओर ऋणात्मक संख्याओं को स्थापित कर उन्हें ज्यामितीय रूप से अटल मान्यता प्रदान की। जर्मन गणितज्ञों ने पूर्णांकों के समुच्चय को जाहलेन (Zahlen) नाम दिया, जिसका अर्थ संख्याएं होता है, और इसी कारण आज पूर्णांकों के समुच्चय को प्रतीक Z द्वारा दर्शाया जाता है।
गणितीय संरचना के अनुसार, जब सभी प्राकृत संख्याओं के ऋणात्मक रूपों अर्थात ऋण एक, ऋण दो, ऋण तीन, ऋण चार इत्यादि को पूर्ण संख्याओं के समुच्चय में सम्मिलित कर लिया जाता है, तब प्राप्त होने वाले विशाल संख्या संग्रह को पूर्णांकों का समुच्चय Z कहा जाता है। इसे रोस्टर रूप में इस प्रकार लिखा जाता है: Z बराबर है कोष्ठक के भीतर अनंत से ऋण तीन, ऋण दो, ऋण एक, शून्य, एक, दो, तीन और अनंत तक। यहाँ यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि प्राकृत संख्याएँ पूर्ण संख्याओं का उप-समुच्चय हैं, और पूर्ण संख्याएँ पूर्णांकों का उप-समुच्चय हैं। पूर्णांकों को तीन स्पष्ट श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है: प्रथम, धनात्मक पूर्णांक जिन्हें Z-धन से व्यक्त किया जाता है और यह एक, दो, तीन, चार इत्यादि प्राकृत संख्याओं के समतुल्य होते हैं। सबसे छोटा धनात्मक पूर्णांक एक होता है, जबकि सबसे बड़े धनात्मक पूर्णांक का कोई अस्तित्व नहीं है क्योंकि संख्याएं अनंत हैं। द्वितीय, ऋणात्मक पूर्णांक जिन्हें Z-ऋण से व्यक्त किया जाता है और यह ऋण एक, ऋण दो, ऋण तीन इत्यादि होते हैं। सबसे बड़ा ऋणात्मक पूर्णांक ऋण एक होता है, जबकि सबसे छोटे ऋणात्मक पूर्णांक की कोई सीमा नहीं है। तृतीय, संख्या शून्य जो न तो धनात्मक है और न ही ऋणात्मक, बल्कि यह धनात्मक और ऋणात्मक संख्याओं के मध्य एक निष्पक्ष, तटस्थ और स्थिर विभाजक मूलबिंदु है।
पूर्णांकों की संकल्पना को स्पष्ट करने का सबसे सशक्त माध्यम क्षैतिज संख्या रेखा (Number Line) है। संख्या रेखा के ठीक मध्य में शून्य स्थित होता है जिसे मूलबिंदु कहते हैं। शून्य के दाईं ओर समान दूरियों पर धनात्मक पूर्णांक बढ़ते क्रम में अंकित होते हैं, जबकि शून्य के बाईं ओर समान दूरियों पर ऋणात्मक पूर्णांक घटते क्रम में अंकित होते हैं। संख्या रेखा पर तुलना का सार्वभौमिक स्वर्णिम नियम यह है कि जो संख्या दूसरी संख्या के बाईं ओर स्थित होती है, वह सदैव उससे छोटी होती है, और जो संख्या दाईं ओर स्थित होती है, वह सदैव उससे बड़ी होती है। इस आधार पर, प्रत्येक धनात्मक पूर्णांक शून्य से बड़ा होता है; प्रत्येक ऋणात्मक पूर्णांक शून्य से छोटा होता है; और प्रत्येक धनात्मक पूर्णांक प्रत्येक ऋणात्मक पूर्णांक से सदैव बड़ा होता है। ऋणात्मक संख्याओं के क्रम में एक रोचक उलटफेर देखने को मिलता है: धनात्मक संख्याओं में जो संख्या जितनी बड़ी होती है, उसका ऋणात्मक रूप उतना ही छोटा हो जाता है। उदाहरण के लिए, आठ तीन से बड़ा है, परंतु संख्या रेखा पर ऋण आठ, ऋण तीन के बाईं ओर स्थित होता है, इसलिए ऋण आठ वास्तव में ऋण तीन से छोटा होता है।
संख्या रेखा के साथ ही परम मान अथवा निरपेक्ष मान (Absolute Value) की अवधारणा का जन्म होता है। किसी पूर्णांक का परम मान, जिसे दो ऊर्ध्वाधर रेखाओं के मध्य लिखा जाता है, संख्या रेखा पर उस संख्या की शून्य से ज्यामितीय दूरी को प्रदर्शित करता है। चूँकि दूरी कभी ऋणात्मक नहीं हो सकती, इसलिए किसी भी संख्या का परम मान सदैव अऋणात्मक अर्थात शून्य या धनात्मक ही होता है। ऋण सात का परम मान सात होता है, और धन सात का परम मान भी सात ही होता है। शून्य का परम मान शून्य होता है।
पूर्णांकों के अंकगणित में चार मूलभूत संक्रियाएँ होती हैं: योग, व्यवकलन (घटाना), गुणन और भाग। योग के नियमों के अंतर्गत, जब समान चिह्न वाले दो पूर्णांकों को जोड़ा जाता है, तो उनके निरपेक्ष मानों को जोड़कर वही उभयनिष्ठ चिह्न लगा दिया जाता है। जैसे ऋण चार और ऋण पाँच को जोड़ने पर ऋण नौ प्राप्त होता है। जब असमान चिह्न वाले दो पूर्णांकों को जोड़ा जाता है, तो बड़े निरपेक्ष मान में से छोटे निरपेक्ष मान को घटाया जाता है और परिणाम में उस पूर्णांक का चिह्न लगाया जाता है जिसका निरपेक्ष मान बड़ा था। जैसे धन दस और ऋण पंद्रह का योग ऋण पाँच होगा।
व्यवकलन में पूर्णांकों की सबसे बड़ी विजय यह है कि पूर्ण संख्याओं के विपरीत, पूर्णांक व्यवकलन के अंतर्गत पूर्णतः संवृत (Closed) होते हैं। पूर्ण संख्याओं में तीन में से सात घटाना संभव नहीं था, परंतु पूर्णांकों में तीन में से सात घटाने पर ऋण चार प्राप्त होता है जो स्वयं एक पूर्णांक है। व्यवकलन का वास्तविक अर्थ घटाए जाने वाले पूर्णांक के योज्य प्रतिलोम को जोड़ना होता है। अतः जब किसी संख्या में से एक ऋणात्मक संख्या घटाई जाती है, तो दोहरा ऋण मिलकर धन बन जाता है, जैसे पाँच ऋण कोष्ठक में ऋण तीन बराबर पाँच धन तीन बराबर आठ होता है।
गुणन और भाग के नियमों में समता (Parity) अत्यंत महत्वपूर्ण है: दो समान चिह्नों का गुणनफल सदैव धनात्मक होता है, जबकि दो विपरीत चिह्नों का गुणनफल सदैव ऋणात्मक होता है। जब कई ऋणात्मक संख्याओं का एक साथ निरंतर गुणन किया जाता है, तो यदि ऋणात्मक संख्याओं की कुल गिनती सम संख्या (जैसे दो, चार, छह) हो, तो अंतिम गुणनफल धनात्मक होता है; और यदि उनकी गिनती विषम संख्या (जैसे एक, तीन, पाँच) हो, तो अंतिम गुणनफल ऋणात्मक होता है। पूर्णांक भाग के अंतर्गत संवृत नहीं होते क्योंकि सात को दो से भाग देने पर पूर्णांक प्राप्त नहीं होता। साथ ही, किसी भी पूर्णांक को शून्य से भाग देना गणितीय रूप से सर्वथा अपरिभाषित है। यह अध्याय विद्यार्थियों में तार्किक संतुलन, बीजगणितीय परिपक्वता और वास्तविक दुनिया के गणितीय मॉडलिंग की आधारशिला रखता है।