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ICSE • कक्षा 6 • Mathematics • अध्याय 4
अनुमानित समय: 45-60 मिनट
प्रगति: अध्ययनरत

ऋणात्मक संख्याएँ और पूर्णांक (Negative Numbers and Integers)

ऋणात्मक संख्याएँ और पूर्णांक (Negative Numbers and Integers) विद्यालयी गणित और उच्च वैज्ञानिक चिंतन का एक अत्यंत मौलिक और क्रांतिकारी अध्याय है। कक्षा 6 के सीआईएससीई (आईसीएसई) पाठ्यक्रम में यह अध्याय विद्यार्थियों को संख्याओं की उस नई दुनिया से परिचित कराता है जो शून्य के बाईं ओर अनंत तक फैली हुई है। प्रारंभिक कक्षाओं में विद्यार्थी केवल प्राकृत संख्याओं N अर्थात एक, दो, तीन, चार इत्यादि तथा शून्य को मिलाकर बनी पूर्ण संख्याओं W अर्थात शून्य, एक, दो, तीन इत्यादि से परिचित होते हैं। परंतु दैनिक जीवन, विज्ञान, वाणिज्य और भूगोल की अनगिनत परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं जिनमें केवल परिमाण ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि परिमाण के साथ दिशा का बोध होना भी अनिवार्य होता है। ऐसी राशियों को दिष्ट राशियां (Directed Quantities) कहा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि हम समुद्र तल को संदर्भ बिंदु अथवा शून्य मान लें, तो समुद्र तल से आठ सौ मीटर ऊपर उड़ता हुआ हवाई जहाज और समुद्र तल से आठ सौ मीटर नीचे तैरती हुई पनडुब्बी दोनों ही शून्य से समान दूरी पर हैं, परंतु उनकी दिशाएँ एक-दूसरे के सर्वथा विपरीत हैं। यदि हवाई जहाज की ऊंचाई को धन आठ सौ लिखा जाए, तो पनडुब्बी की गहराई को ऋण आठ सौ के रूप में व्यक्त करना अनिवार्य हो जाता है। ऐतिहासिक दृष्टि से ऋणात्मक संख्याओं की स्वीकार्यता आसान नहीं थी। प्राचीन यूनानी गणितज्ञ डायोफैंटस ने समीकरणों के ऋणात्मक हलों को अर्थहीन और असंभव कहकर नकार दिया था। परंतु भारतीय गणितीय परंपरा में सातवीं शताब्दी में ब्रह्मगुप्त ने व्यापारिक बहीखातों, ऋण और धन के माध्यम से ऋणात्मक संख्याओं के सटीक संक्रियात्मक नियम प्रतिपादित किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के पास उपस्थित संपत्ति को धन अर्थात धनात्मक संख्या से और उसके ऊपर बकाया कर्ज को ऋण अर्थात ऋणात्मक संख्या से दर्शाया जा सकता है। जब संपत्ति और कर्ज का मान बराबर होता है, तो उनका संयुक्त परिणाम शून्य प्राप्त होता है। इसी गुणधर्म को आज आधुनिक गणित में योज्य प्रतिलोम (Additive Inverse) कहा जाता है। सत्रहवीं शताब्दी में महान फ्रांसीसी दार्शनिक और गणितज्ञ रेने देकार्त ने जब कार्तीय निर्देशांक ज्यामिति का आविष्कार किया, तब उन्होंने संख्या रेखा पर शून्य के बाईं ओर ऋणात्मक संख्याओं को स्थापित कर उन्हें ज्यामितीय रूप से अटल मान्यता प्रदान की। जर्मन गणितज्ञों ने पूर्णांकों के समुच्चय को जाहलेन (Zahlen) नाम दिया, जिसका अर्थ संख्याएं होता है, और इसी कारण आज पूर्णांकों के समुच्चय को प्रतीक Z द्वारा दर्शाया जाता है। गणितीय संरचना के अनुसार, जब सभी प्राकृत संख्याओं के ऋणात्मक रूपों अर्थात ऋण एक, ऋण दो, ऋण तीन, ऋण चार इत्यादि को पूर्ण संख्याओं के समुच्चय में सम्मिलित कर लिया जाता है, तब प्राप्त होने वाले विशाल संख्या संग्रह को पूर्णांकों का समुच्चय Z कहा जाता है। इसे रोस्टर रूप में इस प्रकार लिखा जाता है: Z बराबर है कोष्ठक के भीतर अनंत से ऋण तीन, ऋण दो, ऋण एक, शून्य, एक, दो, तीन और अनंत तक। यहाँ यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि प्राकृत संख्याएँ पूर्ण संख्याओं का उप-समुच्चय हैं, और पूर्ण संख्याएँ पूर्णांकों का उप-समुच्चय हैं। पूर्णांकों को तीन स्पष्ट श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है: प्रथम, धनात्मक पूर्णांक जिन्हें Z-धन से व्यक्त किया जाता है और यह एक, दो, तीन, चार इत्यादि प्राकृत संख्याओं के समतुल्य होते हैं। सबसे छोटा धनात्मक पूर्णांक एक होता है, जबकि सबसे बड़े धनात्मक पूर्णांक का कोई अस्तित्व नहीं है क्योंकि संख्याएं अनंत हैं। द्वितीय, ऋणात्मक पूर्णांक जिन्हें Z-ऋण से व्यक्त किया जाता है और यह ऋण एक, ऋण दो, ऋण तीन इत्यादि होते हैं। सबसे बड़ा ऋणात्मक पूर्णांक ऋण एक होता है, जबकि सबसे छोटे ऋणात्मक पूर्णांक की कोई सीमा नहीं है। तृतीय, संख्या शून्य जो न तो धनात्मक है और न ही ऋणात्मक, बल्कि यह धनात्मक और ऋणात्मक संख्याओं के मध्य एक निष्पक्ष, तटस्थ और स्थिर विभाजक मूलबिंदु है। पूर्णांकों की संकल्पना को स्पष्ट करने का सबसे सशक्त माध्यम क्षैतिज संख्या रेखा (Number Line) है। संख्या रेखा के ठीक मध्य में शून्य स्थित होता है जिसे मूलबिंदु कहते हैं। शून्य के दाईं ओर समान दूरियों पर धनात्मक पूर्णांक बढ़ते क्रम में अंकित होते हैं, जबकि शून्य के बाईं ओर समान दूरियों पर ऋणात्मक पूर्णांक घटते क्रम में अंकित होते हैं। संख्या रेखा पर तुलना का सार्वभौमिक स्वर्णिम नियम यह है कि जो संख्या दूसरी संख्या के बाईं ओर स्थित होती है, वह सदैव उससे छोटी होती है, और जो संख्या दाईं ओर स्थित होती है, वह सदैव उससे बड़ी होती है। इस आधार पर, प्रत्येक धनात्मक पूर्णांक शून्य से बड़ा होता है; प्रत्येक ऋणात्मक पूर्णांक शून्य से छोटा होता है; और प्रत्येक धनात्मक पूर्णांक प्रत्येक ऋणात्मक पूर्णांक से सदैव बड़ा होता है। ऋणात्मक संख्याओं के क्रम में एक रोचक उलटफेर देखने को मिलता है: धनात्मक संख्याओं में जो संख्या जितनी बड़ी होती है, उसका ऋणात्मक रूप उतना ही छोटा हो जाता है। उदाहरण के लिए, आठ तीन से बड़ा है, परंतु संख्या रेखा पर ऋण आठ, ऋण तीन के बाईं ओर स्थित होता है, इसलिए ऋण आठ वास्तव में ऋण तीन से छोटा होता है। संख्या रेखा के साथ ही परम मान अथवा निरपेक्ष मान (Absolute Value) की अवधारणा का जन्म होता है। किसी पूर्णांक का परम मान, जिसे दो ऊर्ध्वाधर रेखाओं के मध्य लिखा जाता है, संख्या रेखा पर उस संख्या की शून्य से ज्यामितीय दूरी को प्रदर्शित करता है। चूँकि दूरी कभी ऋणात्मक नहीं हो सकती, इसलिए किसी भी संख्या का परम मान सदैव अऋणात्मक अर्थात शून्य या धनात्मक ही होता है। ऋण सात का परम मान सात होता है, और धन सात का परम मान भी सात ही होता है। शून्य का परम मान शून्य होता है। पूर्णांकों के अंकगणित में चार मूलभूत संक्रियाएँ होती हैं: योग, व्यवकलन (घटाना), गुणन और भाग। योग के नियमों के अंतर्गत, जब समान चिह्न वाले दो पूर्णांकों को जोड़ा जाता है, तो उनके निरपेक्ष मानों को जोड़कर वही उभयनिष्ठ चिह्न लगा दिया जाता है। जैसे ऋण चार और ऋण पाँच को जोड़ने पर ऋण नौ प्राप्त होता है। जब असमान चिह्न वाले दो पूर्णांकों को जोड़ा जाता है, तो बड़े निरपेक्ष मान में से छोटे निरपेक्ष मान को घटाया जाता है और परिणाम में उस पूर्णांक का चिह्न लगाया जाता है जिसका निरपेक्ष मान बड़ा था। जैसे धन दस और ऋण पंद्रह का योग ऋण पाँच होगा। व्यवकलन में पूर्णांकों की सबसे बड़ी विजय यह है कि पूर्ण संख्याओं के विपरीत, पूर्णांक व्यवकलन के अंतर्गत पूर्णतः संवृत (Closed) होते हैं। पूर्ण संख्याओं में तीन में से सात घटाना संभव नहीं था, परंतु पूर्णांकों में तीन में से सात घटाने पर ऋण चार प्राप्त होता है जो स्वयं एक पूर्णांक है। व्यवकलन का वास्तविक अर्थ घटाए जाने वाले पूर्णांक के योज्य प्रतिलोम को जोड़ना होता है। अतः जब किसी संख्या में से एक ऋणात्मक संख्या घटाई जाती है, तो दोहरा ऋण मिलकर धन बन जाता है, जैसे पाँच ऋण कोष्ठक में ऋण तीन बराबर पाँच धन तीन बराबर आठ होता है। गुणन और भाग के नियमों में समता (Parity) अत्यंत महत्वपूर्ण है: दो समान चिह्नों का गुणनफल सदैव धनात्मक होता है, जबकि दो विपरीत चिह्नों का गुणनफल सदैव ऋणात्मक होता है। जब कई ऋणात्मक संख्याओं का एक साथ निरंतर गुणन किया जाता है, तो यदि ऋणात्मक संख्याओं की कुल गिनती सम संख्या (जैसे दो, चार, छह) हो, तो अंतिम गुणनफल धनात्मक होता है; और यदि उनकी गिनती विषम संख्या (जैसे एक, तीन, पाँच) हो, तो अंतिम गुणनफल ऋणात्मक होता है। पूर्णांक भाग के अंतर्गत संवृत नहीं होते क्योंकि सात को दो से भाग देने पर पूर्णांक प्राप्त नहीं होता। साथ ही, किसी भी पूर्णांक को शून्य से भाग देना गणितीय रूप से सर्वथा अपरिभाषित है। यह अध्याय विद्यार्थियों में तार्किक संतुलन, बीजगणितीय परिपक्वता और वास्तविक दुनिया के गणितीय मॉडलिंग की आधारशिला रखता है।

क्या आपने कभी सोचा है?

कल्पना कीजिए कि एक व्यापारी किसी दिन 500 रुपये का लाभ कमाता है और अगले दिन उसे 500 रुपये की हानि हो जाती है। यदि हम दोनों राशियों को केवल 500 के रूप में लिखें, तो खाता बही में यह कैसे स्पष्ट होगा कि कौन सा धन आया और कौन सा गया? इसी प्रकार, हिमालय के ऊंचे ग्लेशियरों पर जब तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस से भी नीचे गिर जाता है, या समुद्र की अतल गहराइयों में जब कोई पनडुब्बी जलस्तर से नीचे उतरती है, तो केवल धनात्मक प्राकृत और पूर्ण संख्याएँ इन विपरीत दिशाओं को दर्शाने में असमर्थ सिद्ध होती हैं। प्राचीन भारत के महान खगोलशास्त्री एवं गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त ने 7वीं शताब्दी (628 ईस्वी) में अपने ग्रंथ ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त में ऋण (कर्ज) और धन (संपत्ति) के अद्भुत नियमों की स्थापना की थी। उन्होंने प्रतिपादित किया कि ऋण और धन का योग शून्य होता है, और दो ऋणों का गुणनफल सदैव धन होता है। यही अवधारणा आधुनिक गणित में पूर्णांकों (Integers) के विशाल साम्राज्य की नींव बनी, जिसने गणित को एक-दिशीय गणना से मुक्त कर पूर्णतः द्वि-दिशीय, संतुलित और व्यापक स्वरूप प्रदान किया।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पूर्णांकों की संकल्पना केवल पाठ्यपुस्तकीय गणित तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे आधुनिक वैज्ञानिक और तकनीकी समाज का आधारभूत स्तंभ है। मौसम विज्ञान में तापमान का सटीक मापन ऋणात्मक संख्याओं के बिना असंभव है। जब हम कहते हैं कि सियाचिन ग्लेशियर या लद्दाख में तापमान शून्य से पचास डिग्री सेल्सियस नीचे गिर गया है, तो इसे गणितीय भाषा में ऋण पचास डिग्री सेल्सियस लिखकर वैज्ञानिक विश्लेषण और कंप्यूटर सिमुलेशन में प्रयुक्त किया जाता है। वैश्विक वित्तीय प्रणाली और बैंकिंग व्यवस्था में ऋण और जमा का संतुलन पूरी तरह पूर्णांकों के सिद्धांतों पर कार्य करता है। बैंक खातों में जमा राशि को धनात्मक पूर्णांक से और एटीएम से की गई निकासी या ओवरड्राफ्ट ऋण को ऋणात्मक पूर्णांक से निरूपित किया जाता है। कंप्यूटर साइंस और सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग में बाइनरी अंकगणित, टूज कॉम्प्लिमेंट (Twos Complement) प्रणाली तथा ग्राफिक्स रेंडरिंग में स्क्रीन के पिक्सल निर्देशांक ऋणात्मक और धनात्मक मानों के सटीक संतुलन पर ही निर्भर करते हैं। समुद्र विज्ञान और वैमानिकी में पनडुब्बियों के नेविगेशन, उपग्रहों की कक्षा निर्धारण, लिफ्ट के स्वचालित नियंत्रण तथा जीपीएस प्रणालियों में गहराई और ऊंचाई की गणना हेतु दिष्ट संख्याओं का निरंतर उपयोग होता है। अतः पूर्णांकों की गहरी समझ विद्यार्थियों को वास्तविक दुनिया की जटिल समस्याओं को गणितीय समीकरणों में ढालने और उन्हें सटीकता से हल करने की अद्वितीय क्षमता प्रदान करती है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • प्राकृत संख्याओं (N = {1, 2, 3, ...}) एवं पूर्ण संख्याओं (W = {0, 1, 2, ...}) की आधारभूत समझ तथा उनकी मूलभूत संक्रियाएं।
  • क्षैतिज संख्या रेखा की संकल्पना तथा उस पर संख्याओं के निरूपण एवं तुलना की प्राथमिक जानकारी।
  • दैनिक जीवन में विपरीत परिस्थितियों जैसे लाभ-हानि, ऊंचाई-गहराई, चढ़ना-उतरना और तापमान में उतार-चढ़ाव की व्यावहारिक समझ।
  • अंकगणितीय संक्रियाओं (जोड़, घटाना, गुणा, भाग) एवं संक्रियाओं के बुनियादी क्रम (BODMAS नियम) से पूर्व-परिचय।
  • समानता, असमानता (बड़ा होना, छोटा होना) एवं संदर्भ बिंदु (मूलबिंदु शून्य) की ज्यामितीय और अंकगणितीय अवधारणा।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • दैनिक जीवन की विपरीत परिस्थितियों और दिष्ट राशियों को उपयुक्त धनात्मक (+) अथवा ऋणात्मक (-) चिह्नों के साथ आत्मविश्वास से व्यक्त करना।
  • पूर्णांकों के समुच्चय Z की औपचारिक परिभाषा समझना तथा प्राकृत (N), पूर्ण (W) और पूर्णांक (Z) संख्याओं के मध्य अंतर्भुक्ति संबंध (N ⊂ W ⊂ Z) की व्याख्या करना।
  • संख्या रेखा पर पूर्णांकों को सटीक रूप से अंकित करना और तुलना के स्वर्णिम नियम (बाईं ओर की संख्या सदैव छोटी) का कुशलतापूर्वक अनुप्रयोग करना।
  • पूर्णांकों के परम मान (निरपेक्ष मान |x|) की ज्यामितीय परिभाषा समझना और यह सिद्ध करना कि परम मान सदैव अऋणात्मक (≥ 0) होता है।
  • पूर्णांकों के अनुवर्ती (Successor: n + 1) और पूर्ववर्ती (Predecessor: n - 1) की गणना बिना किसी सीमा अवरोध के शुद्धता से करना।
  • समान और असमान चिह्न वाले पूर्णांकों के योग एवं व्यवकलन के नियमों में पारंगत होना तथा योज्य प्रतिलोम (a + (-a) = 0) के सिद्धांत को लागू करना।
  • गुणन एवं भाग के चिह्नों के नियमों तथा निरंतर गुणनफल में ऋणात्मक चिह्नों की समता (Parity: सम पर धनात्मक, विषम पर ऋणात्मक) का सही उपयोग करना।
  • कोष्ठकों के विभिन्न प्रकारों (रेखा, छोटा, मँझला, बड़ा) वाले जटिल व्यंजकों को BODMAS के अनुसार क्रमिक रूप से हल करना तथा व्यावहारिक समस्याओं का समाधान करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 मॉड्यूल 1: ऋणात्मक संख्याओं की ऐतिह...
2 मॉड्यूल 2: पूर्णांकों का समुच्चय (ℤ...
3 मॉड्यूल 3: संख्या रेखा पर निरूपण, प...
4 मॉड्यूल 4: पूर्णांकों का योग एवं सं...
5 मॉड्यूल 5: पूर्णांकों का व्यवकलन (घ...
6 मॉड्यूल 6: पूर्णांकों का गुणन एवं भ...
7 मॉड्यूल 7: कोष्ठक, BODMAS नियम एवं...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

मॉड्यूल 1: ऋणात्मक संख्याओं की ऐतिहासिक आवश्यकता एवं विपरीत परिमाण (Historical Need for Directed Numbers & Real-World Opposites)

1.1 संख्याओं में दिशा की आवश्यकता: एक-दिशीय गणना से दिष्ट राशियों तक

मानव सभ्यता के आरंभ में संख्याओं का आविष्कार वस्तुओं को गिनने के लिए हुआ था—जैसे भेड़ें, मटके, अनाज की बोरियाँ या दिन। इन गणनाओं के लिए केवल प्राकृत संख्याएँ $\mathbb{N} = \{1, 2, 3, 4, \dots\}$ और बाद में शून्य का समावेश कर पूर्ण संख्याएँ $\mathbb{W} = \{0, 1, 2, 3, \dots\}$ पर्याप्त थीं। परंतु जैसे-जैसे मानव जीवन, व्यापार और विज्ञान का विस्तार हुआ, ऐसी परिस्थितियाँ सामने आने लगीं जहाँ केवल परिमाण (Magnitude) जानना पर्याप्त नहीं था, बल्कि परिमाण के साथ-साथ दिशा (Direction) का बोध होना भी अनिवार्य हो गया।

यदि कोई व्यक्ति बैंक में ₹1,000 जमा करता है और दूसरा व्यक्ति अपने खाते से ₹1,000 निकालता है, तो दोनों ही स्थितियों में राशि ₹1,000 ही है। किंतु एक स्थिति संपत्ति में वृद्धि दर्शाती है जबकि दूसरी स्थिति संपत्ति में कमी। यदि हम दोनों को केवल '1,000' लिखें, तो खाते का वास्तविक संतुलन समझना असंभव हो जाएगा। ऐसी राशियों को गणित में दिष्ट राशियाँ (Directed Quantities) कहा जाता है।

1.2 ऐतिहासिक विकास: डायोफैंटस से ब्रह्मगुप्त एवं देकार्त तक

प्राचीन यूनान: डायोफैंटस का संशय

तीसरी शताब्दी में यूनानी गणितज्ञ डायोफैंटस ने समीकरण $4x + 20 = 4$ पर विचार करते हुए कहा कि $4x = -16$ का हल $x = -4$ 'अर्थहीन' और 'असंभव' है, क्योंकि उनके अनुसार वस्तुएं केवल धनात्मक हो सकती हैं।

भारत (628 ई.): ब्रह्मगुप्त का ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त

महान भारतीय गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त ने सर्वप्रथम ऋणात्मक संख्याओं को 'ऋण' (कर्ज) और धनात्मक संख्याओं को 'धन' (संपत्ति) के रूप में औपचारिक स्थान दिया। उन्होंने सिद्ध किया कि कर्ज और संपत्ति का योग शून्य होता है और ऋण × ऋण = धन होता है।

17वीं शताब्दी: रेने देकार्त एवं संख्या रेखा

रेने देकार्त ने कार्तीय निर्देशांक पद्धति (Cartesian Coordinates) में संख्या रेखा पर शून्य के बाईं ओर ऋणात्मक संख्याओं को स्थापित कर उन्हें पूर्ण ज्यामितीय वास्तविकता और वैज्ञानिक स्वीकृति प्रदान की।

1.3 दैनिक जीवन में विपरीत परिस्थितियों का गणितीय निरूपण

किसी भी भौतिक या आर्थिक संदर्भ में एक स्थिर मानक अवस्था को संदर्भ बिंदु (Reference Point / शून्य 0) मान लिया जाता है। इसके पश्चात एक दिशा को धनात्मक (+) तथा उसके ठीक विपरीत दिशा को ऋणात्मक (-) चिह्न आवंटित किया जाता है:

भौतिक / आर्थिक संदर्भ धनात्मक परिमाण (+) ऋणात्मक परिमाण (-) संदर्भ बिंदु (0)
तापमान (Temperature) शून्य से ऊपर: $+35^\circ\text{C}$ शून्य से नीचे (हिमांक): $-15^\circ\text{C}$ जल का हिमांक बिंदु ($0^\circ\text{C}$)
ऊंचाई एवं गहराई (Altitude) समुद्र तल से ऊपर: $+8,848\text{ m}$ (एवरेस्ट) समुद्र तल से नीचे: $-11,034\text{ m}$ (मारियाना गर्त) औसत समुद्र तल (Mean Sea Level = 0 m)
बैंकिंग एवं वाणिज्य (Finance) खाते में जमा / शुद्ध लाभ: $+₹5,000$ खाते से निकासी / हानि: $-₹2,500$ न लाभ न हानि / शून्य शेष (₹0)
भौगोलिक दिशाएँ (Directions) उत्तर दिशा / पूर्व दिशा: $+50\text{ km}$ दक्षिण दिशा / पश्चिम दिशा: $-50\text{ km}$ प्रस्थान मूलबिंदु (Starting Point = 0)
लिफ्ट की गति (Elevator Movement) ऊपरी मंजिलें (1st, 2nd, 3rd Floor): $+3$ भूमिगत बेसमेंट (Basement 1, 2): $-2$ भू-तल (Ground Floor = 0)

💡 मुख्य संकल्पनात्मक निष्कर्ष

ऋणात्मक संख्याएँ वास्तव में 'शून्य से कम' परिमाण को दर्शाती हैं, जब शून्य को एक मनमाना संदर्भ बिंदु माना जाता है। किसी धनात्मक संख्या के आगे धन का चिह्न ($+$) लगाना ऐच्छिक होता है (जैसे $+7 = 7$), परंतु किसी ऋणात्मक संख्या के आगे ऋण का चिह्न ($-$) लगाना सर्वथा अनिवार्य है (जैसे $-7$), क्योंकि यह चिह्न उसकी विपरीत दिशा और प्रकृति को परिभाषित करता है।

मॉड्यूल 2: पूर्णांकों का समुच्चय (ℤ) एवं गणितीय वर्गीकरण (The Set of Integers ℤ & Classification)

2.1 पूर्णांकों के समुच्चय की औपचारिक परिभाषा

जब सभी प्राकृत संख्याओं के ऋणात्मक रूपों अर्थात $\{-1, -2, -3, -4, \dots\}$ को पूर्ण संख्याओं के समुच्चय $\mathbb{W} = \{0, 1, 2, 3, \dots\}$ के साथ मिला दिया जाता है, तो इस प्रकार बनने वाले सम्पूर्ण संख्या संग्रह को पूर्णांकों का समुच्चय (Set of Integers) कहते हैं।

पूर्णांकों के समुच्चय को मानक गणित में प्रतीक $\mathbb{Z}$ (या $\mathbf{Z}$) द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। यह प्रतीक जर्मन शब्द 'Zahlen' (जिसका अर्थ 'संख्याएँ' होता है) के प्रथम अक्षर से लिया गया है।

रोस्टर रूप (Roster Form):

$$\mathbb{Z} = \{ \dots, -4, -3, -2, -1, 0, 1, 2, 3, 4, \dots \}$$

यहाँ दोनों ओर लगे बिंदु (Ellipsis $\dots$) यह दर्शाते हैं कि यह समुच्चय दोनों दिशाओं—बाईं ओर ऋणात्मक दिशा में अनंत ($-\infty$) तक तथा दाईं ओर धनात्मक दिशा में अनंत ($+\infty$) तक विस्तृत है।

2.2 पूर्णांकों का त्रिविध वर्गीकरण (Tripartite Classification)

1. धनात्मक पूर्णांक (Positive Integers: $\mathbb{Z}^+$)

यह शून्य से बड़े सभी पूर्णांक होते हैं: $\mathbb{Z}^+ = \{1, 2, 3, 4, \dots\}$।

  • यह प्राकृत संख्याओं के समुच्चय $\mathbb{N}$ के सर्वथा समरूप होते हैं ($\mathbb{Z}^+ = \mathbb{N}$)।
  • सबसे छोटा धनात्मक पूर्णांक: $1$
  • सबसे बड़ा धनात्मक पूर्णांक: कोई नहीं (अनंत तक विस्तृत)।

2. उदासीन शून्य (Neutral Zero: $0$)

शून्य धनात्मक और ऋणात्मक पूर्णांकों के मध्य एक निष्पक्ष विभाजक बिंदु है।

  • शून्य न तो धनात्मक है और न ही ऋणात्मक (Neither Positive nor Negative)।
  • यह प्रत्येक ऋणात्मक पूर्णांक से बड़ा होता है ($0 > -a$)।
  • यह प्रत्येक धनात्मक पूर्णांक से छोटा होता है ($0 < b$)।

3. ऋणात्मक पूर्णांक (Negative Integers: $\mathbb{Z}^-$)

यह शून्य से छोटे सभी पूर्णांक होते हैं: $\mathbb{Z}^- = \{-1, -2, -3, -4, \dots\}$।

  • यह प्राकृत संख्याओं के विपरीत (योज्य प्रतिलोम) होते हैं।
  • सबसे बड़ा ऋणात्मक पूर्णांक: $-1$ (क्योंकि यह संख्या रेखा पर सबसे दाईं ओर है)।
  • सबसे छोटा ऋणात्मक पूर्णांक: कोई नहीं (ऋणात्मक अनंत तक विस्तृत)।

2.3 समुच्चय अंतर्भुक्ति संबंध (Nested Subsets Hierarchy)

संख्याओं के तीनों मूलभूत समुच्चयों—प्राकृत संख्याएँ ($\mathbb{N}$), पूर्ण संख्याएँ ($\mathbb{W}$), तथा पूर्णांक ($\mathbb{Z}$)—के मध्य एक कड़ा अंतर्भुक्ति (Subsets) संबंध होता है:

$$\mathbb{N} \subset \mathbb{W} \subset \mathbb{Z}$$

(प्राकृत संख्याएँ $\subset$ पूर्ण संख्याएँ $\subset$ पूर्णांक)

✅ सत्य कथन (True Statements):

  • प्रत्येक प्राकृत संख्या एक पूर्णांक है।
  • प्रत्येक पूर्ण संख्या एक पूर्णांक है।
  • शून्य एक पूर्ण संख्या भी है और एक पूर्णांक भी।

❌ असत्य कथन (False Statements):

  • प्रत्येक पूर्णांक एक प्राकृत संख्या है (उदा. $-3 \in \mathbb{Z}$, किंतु $-3 \notin \mathbb{N}$)।
  • प्रत्येक पूर्णांक एक पूर्ण संख्या है (उदा. $-5 \in \mathbb{Z}$, किंतु $-5 \notin \mathbb{W}$)।
  • शून्य एक धनात्मक पूर्णांक है (शून्य उदासीन है)।

📌 महत्वपूर्ण पारिभाषिक अंतर: अऋणात्मक एवं अधनात्मक पूर्णांक

बोर्ड परीक्षाओं में अक्सर यह भ्रामक शब्दावली पूछी जाती है:

  • अऋणात्मक पूर्णांक (Non-negative Integers): इसमें शून्य तथा सभी धनात्मक पूर्णांक सम्मिलित होते हैं: $\{0, 1, 2, 3, \dots\} = \mathbb{W}$ (पूर्ण संख्याएँ)।
  • अधनात्मक पूर्णांक (Non-positive Integers): इसमें शून्य तथा सभी ऋणात्मक पूर्णांक सम्मिलित होते हैं: $\{\dots, -3, -2, -1, 0\}$।

मॉड्यूल 3: संख्या रेखा पर निरूपण, परम मान |x| एवं तुलना के नियम (Number Line, Ordering & Absolute Value)

3.1 पूर्णांक संख्या रेखा की ज्यामितीय संरचना

पूर्णांकों की संख्या रेखा एक ऐसी क्षैतिज रेखा होती है जो दोनों सिरों पर तीरों (Arrows) के साथ अनंत तक विस्तृत होती है। इसके प्रमुख ज्यामितीय लक्षण निम्नलिखित हैं:

  1. मूलबिंदु (Origin): रेखा के ठीक मध्य में बिंदु $0$ (शून्य) स्थित होता है। यह विभाजन और दिशा का संदर्भ बिंदु है।
  2. धनात्मक अर्ध-रेखा (Rightwards): $0$ के दाईं ओर समान इकाई दूरियों पर धनात्मक पूर्णांक $+1, +2, +3, +4, \dots$ अंकित होते हैं। जैसे-जैसे हम दाईं ओर बढ़ते हैं, मान बढ़ता जाता है।
  3. ऋणात्मक अर्ध-रेखा (Leftwards): $0$ के बाईं ओर समान इकाई दूरियों पर ऋणात्मक पूर्णांक $-1, -2, -3, -4, \dots$ अंकित होते हैं। जैसे-जैसे हम बाईं ओर बढ़ते हैं, मान घटता जाता है।

⭐ संख्या रेखा पर तुलना का स्वर्णिम नियम (Golden Ordering Law)

संख्या रेखा पर स्थित किन्हीं भी दो संख्याओं $a$ और $b$ के लिए:

जो संख्या दूसरी संख्या के बाईं (Left) ओर स्थित होती है, वह सदैव उससे छोटी होती है; तथा जो संख्या दाईं (Right) ओर स्थित होती है, वह सदैव बड़ी होती है।
$$a \text{ बाईं ओर है } b \text{ के } \iff a < b$$
1. धनात्मक vs शून्य: प्रत्येक धनात्मक पूर्णांक शून्य से बड़ा होता है ($+a > 0$)।
2. ऋणात्मक vs शून्य: प्रत्येक ऋणात्मक पूर्णांक शून्य से छोटा होता है ($-b < 0$)।
3. धनात्मक vs ऋणात्मक: प्रत्येक धनात्मक पूर्णांक किसी भी ऋणात्मक पूर्णांक से बड़ा होता है ($+a > -b$)।
4. ऋणात्मक व्युत्क्रम नियम: यदि $a > b > 0$, तो $-a < -b$ (उदा. $8 > 3 \implies -8 < -3$)।

3.2 अनुवर्ती (Successor) एवं पूर्ववर्ती (Predecessor)

पूर्णांकों के समुच्चय $\mathbb{Z}$ में किसी भी संख्या के अनुवर्ती और पूर्ववर्ती का निर्धारण संख्या रेखा पर ठीक एक कदम आगे या पीछे चलकर किया जाता है:

अनुवर्ती (Successor: $S(n)$)

संख्या रेखा पर ठीक 1 कदम दाईं ओर (Right) की संख्या:

$$S(n) = n + 1$$
  • $S(5) = 5 + 1 = 6$
  • $S(0) = 0 + 1 = 1$
  • $S(-1) = -1 + 1 = 0$
  • $S(-7) = -7 + 1 = -6$ ($-8$ नहीं!)

पूर्ववर्ती (Predecessor: $P(n)$)

संख्या रेखा पर ठीक 1 कदम बाईं ओर (Left) की संख्या:

$$P(n) = n - 1$$
  • $P(8) = 8 - 1 = 7$
  • $P(0) = 0 - 1 = -1$ (पूर्ण संख्याओं में यह संभव नहीं था!)
  • $P(-1) = -1 - 1 = -2$
  • $P(-5) = -5 - 1 = -6$ ($-4$ नहीं!)
परीक्षा टिप: पूर्ण संख्याओं $\mathbb{W}$ में शून्य ($0$) का कोई पूर्ववर्ती नहीं था। किंतु पूर्णांकों के समुच्चय $\mathbb{Z}$ में प्रत्येक पूर्णांक का एक अद्वितीय पूर्ववर्ती और एक अद्वितीय अनुवर्ती सदैव विद्यमान होता है।

3.3 परम मान या निरपेक्ष मान (Absolute Value: $|x|$)

किसी पूर्णांक का परम मान (Absolute Value / Modulus) संख्या रेखा पर उस पूर्णांक की मूलबिंदु शून्य ($0$) से ज्यामितीय दूरी को व्यक्त करता है। इसे संख्या के दोनों ओर दो ऊर्ध्वाधर सीधी रेखाओं $|\cdot|$ द्वारा दर्शाया जाता है।

$$|x| = \begin{cases} x, & \text{यदि } x \ge 0 \\ -x, & \text{यदि } x < 0 \end{cases}$$

चूँकि दूरी कभी ऋणात्मक नहीं हो सकती, इसलिए किसी भी पूर्णांक का परम मान सदैव अऋणात्मक ($|x| \ge 0$) होता है।

1. सममिति गुणधर्म (Symmetry):

किसी संख्या और उसके ऋणात्मक रूप का परम मान समान होता है: $|-a| = |a| = a$।
उदाहरण: $|-9| = |+9| = 9$।

2. शून्य का परम मान:

शून्य की स्वयं शून्य से दूरी शून्य होती है: $|0| = 0$। शून्य ही एकमात्र ऐसा पूर्णांक है जिसका परम मान शून्य है।

3. संक्रियात्मक नियम:

परम मान चिह्न के बाहर का ऋण चिह्न सुरक्षित रहता है: $-|-8| = -(8) = -8$। किंतु $|-8| = +8$ होता है।

मॉड्यूल 4: पूर्णांकों का योग एवं संख्या रेखा पर योज्य प्रतिलोम (Addition of Integers & Additive Inverse on the Number Line)

4.1 संख्या रेखा पर पूर्णांकों का योग: दिशा और विस्थापन

संख्या रेखा पर दो पूर्णांकों को जोड़ना वास्तव में एक बिंदु से प्रारंभ करके एक निश्चित दिशा में कदम बढ़ाने की ज्यामितीय प्रक्रिया है:

नियम 1: धनात्मक पूर्णांक जोड़ना ($+b$)

प्रथम संख्या से प्रारंभ करके संख्या रेखा पर दाईं ओर (Rightwards) बढ़ें।
उदाहरण: $(-3) + (+5) \implies -3$ से $5$ कदम दाईं ओर चलने पर $+2$ पर पहुँचते हैं।

नियम 2: ऋणात्मक पूर्णांक जोड़ना ($-b$)

प्रथम संख्या से प्रारंभ करके संख्या रेखा पर बाईं ओर (Leftwards) बढ़ें।
उदाहरण: $(+2) + (-6) \implies +2$ से $6$ कदम बाईं ओर चलने पर $-4$ पर पहुँचते हैं।

4.2 पूर्णांकों के योग के दो मौलिक बीजगणितीय नियम

केस 1: समान चिह्न वाले पूर्णांक (Like Signs)

जब दोनों पूर्णांक धनात्मक हों या दोनों ऋणात्मक हों:

  1. दोनों संख्याओं के निरपेक्ष मानों (परम मानों) को जोड़ें।
  2. परिणाम में वही उभयनिष्ठ चिह्न (Common Sign) लगाएँ।
• $(+7) + (+8) = +(7 + 8) = +15$
• $(-6) + (-9) = -(6 + 9) = -15$

केस 2: असमान चिह्न वाले पूर्णांक (Unlike Signs)

जब एक पूर्णांक धनात्मक और दूसरा ऋणात्मक हो:

  1. बड़े निरपेक्ष मान में से छोटे निरपेक्ष मान को घटाएँ (अंतर निकालें)।
  2. परिणाम में बड़े निरपेक्ष मान वाले पूर्णांक का चिह्न लगाएँ।
• $(+12) + (-5) = +(12 - 5) = +7$
• $(-18) + (+7) = -(18 - 7) = -11$

4.3 योज्य प्रतिलोम एवं योज्य तत्समक

योज्य प्रतिलोम (Additive Inverse / ऋणात्मक)

किसी पूर्णांक $a$ का योज्य प्रतिलोम $-a$ होता है, ऐसा कि दोनों का योग शून्य हो जाए:

$$a + (-a) = 0$$
  • $+15$ का योज्य प्रतिलोम = $-15$
  • $-28$ का योज्य प्रतिलोम = $+28$
  • $0$ का योज्य प्रतिलोम = $0$ (शून्य स्वयं का प्रतिलोम है)।

योज्य तत्समक (Additive Identity)

शून्य ($0$) पूर्णांकों के समुच्चय में योज्य तत्समक कहलाता है। किसी भी पूर्णांक में शून्य जोड़ने पर उसके मान में कोई परिवर्तन नहीं होता:

$$a + 0 = 0 + a = a$$
  • $(-9) + 0 = -9$
  • $0 + (+42) = +42$

📌 पूर्णांकों में योग के बीजगणितीय गुणधर्म:

  • संवृत गुणधर्म (Closure): किन्हीं भी दो पूर्णांकों का योग सदैव एक पूर्णांक होता है ($\forall a, b \in \mathbb{Z}, a + b \in \mathbb{Z}$)।
  • क्रमविनिमेय नियम (Commutative): $a + b = b + a$ (योग में क्रम बदलने से परिणाम नहीं बदलता)।
  • साहचर्य नियम (Associative): $(a + b) + c = a + (b + c)$ (समूहीकरण से परिणाम अपरिवर्तित रहता है)।

मॉड्यूल 5: पूर्णांकों का व्यवकलन (घटाना) एवं संवृत गुणधर्म (Subtraction of Integers & Full Closure in ℤ)

5.1 व्यवकलन की औपचारिक परिभाषा: योज्य प्रतिलोम का संयोजन

उच्च गणित में व्यवकलन (घटाना) वास्तव में योग की ही एक विपरीत संक्रिया है। किसी पूर्णांक $a$ में से पूर्णांक $b$ को घटाने का अर्थ है: $a$ में $b$ का योज्य प्रतिलोम जोड़ना।

$$a - b = a + (-b)$$

अतः व्यवकलन की किसी भी समस्या को तुरंत योग की समस्या में रूपांतरित किया जा सकता है।

⚡ दोहरा ऋण नियम (The Double Negative Law)

जब किसी संख्या में से एक ऋणात्मक पूर्णांक को घटाया जाता है, तो सूत्र $a - (-b)$ लागू होता है। चूँकि $-b$ का योज्य प्रतिलोम $+b$ होता है, इसलिए:

$$a - (-b) = a + b$$

तार्किक व्याख्या: 'कर्ज को माफ करना' संपत्ति जोड़ने के समान है! जब आप किसी के खाते से ₹500 का कर्ज ($-500$) हटा देते हैं, तो उसके पास ₹500 की वृद्धि हो जाती है।

• $8 - (-5) = 8 + 5 = 13$
• $(-12) - (-20) = -12 + 20 = +8$
• $(-7) - (-7) = -7 + 7 = 0$

5.2 व्यवकलन के अंतर्गत संवृत गुणधर्म (Full Closure in ℤ)

पूर्ण संख्याओं $\mathbb{W}$ में व्यवकलन संवृत नहीं था, क्योंकि $4 - 9 = ?$ का उत्तर पूर्ण संख्याओं में संभव नहीं था। किंतु पूर्णांकों के समुच्चय $\mathbb{Z}$ में यह बाधा पूरी तरह समाप्त हो जाती है:

पूर्णांक व्यवकलन के अंतर्गत पूर्णतः संवृत हैं: यदि $a, b \in \mathbb{Z}$, तो $(a - b) \in \mathbb{Z}$।

चाहे हम छोटी संख्या में से बड़ी संख्या घटाएँ ($3 - 8 = -5 \in \mathbb{Z}$) या ऋणात्मक में से धनात्मक घटाएँ ($-4 - 6 = -10 \in \mathbb{Z}$), परिणाम सदैव एक वैध पूर्णांक ही होता है।

⚠️ व्यवकलन में क्या लागू नहीं होता? (Non-Commutative & Non-Associative)

1. क्रमविनिमेय नहीं है ($a - b \ne b - a$):

$5 - 2 = 3$, किंतु $2 - 5 = -3$ ($3 \ne -3$)। क्रम बदलने पर संख्या का केवल चिह्न बदल जाता है।

2. साहचर्य नहीं है ($(a - b) - c \ne a - (b - c)$):

$(8 - 5) - 2 = 3 - 2 = 1$
$8 - (5 - 2) = 8 - 3 = 5$ ($1 \ne 5$)। कोष्ठकों का समूह बदलने पर परिणाम बदल जाता है।

मॉड्यूल 6: पूर्णांकों का गुणन एवं भाग — चिह्नों के नियम, समता एवं शून्य से भाग (Multiplication & Division Sign Matrix, Parity & Zero Division)

6.1 गुणन एवं भाग हेतु चिह्नों का चतुर्भुज नियम (Sign Quadrant Matrix)

पूर्णांकों के गुणन तथा भाग में चिह्नों के व्यवहार के सार्वभौमिक नियम निम्नलिखित सारणी द्वारा समझे जा सकते हैं:

$(+) \times (+) = (+)$  |  $(+) \div (+) = (+)$

समान धनात्मक चिह्न: गुणनफल सदैव धनात्मक होता है।
उदा: $(+6) \times (+7) = +42$,   $(+40) \div (+5) = +8$

$(-) \times (-) = (+)$  |  $(-) \div (-) = (+)$

समान ऋणात्मक चिह्न: दो ऋण मिलकर सदैव धनात्मक बनते हैं।
उदा: $(-6) \times (-7) = +42$,   $(-36) \div (-9) = +4$

$(+) \times (-) = (-)$  |  $(+) \div (-) = (-)$

असमान चिह्न: विपरीत चिह्नों का गुणनफल सदैव ऋणात्मक होता है।
उदा: $(+8) \times (-4) = -32$,   $(+24) \div (-6) = -4$

$(-) \times (+) = (-)$  |  $(-) \div (+) = (-)$

असमान चिह्न: विपरीत चिह्नों का भागफल सदैव ऋणात्मक होता है।
उदा: $(-8) \times (+4) = -32$,   $(-50) \div (+10) = -5$

🔢 निरंतर गुणनफल हेतु ऋणात्मक समता नियम (Parity Rule)

जब दो से अधिक पूर्णांकों का एक साथ निरंतर गुणनफल ज्ञात करना हो, तो अंतिम परिणाम का चिह्न केवल इस बात पर निर्भर करता है कि व्यंजक में ऋणात्मक गुणनखंडों की कुल संख्या कितनी है:

सम संख्या में ऋणात्मक (Even Count):

यदि ऋणात्मक पूर्णांकों की संख्या सम ($2, 4, 6, 8, \dots$) हो, तो अंतिम गुणनफल धनात्मक ($+$) होगा।
उदा: $(-2) \times (-3) \times (-4) \times (-5) = +(120)$ (4 ऋण चिह्न $\implies$ धनात्मक)।

विषम संख्या में ऋणात्मक (Odd Count):

यदि ऋणात्मक पूर्णांकों की संख्या विषम ($1, 3, 5, 7, \dots$) हो, तो अंतिम गुणनफल ऋणात्मक ($-$) होगा।
उदा: $(-2) \times (-3) \times (-4) = -(24)$ (3 ऋण चिह्न $\implies$ ऋणात्मक)।

घात नियम (Power of Negative): $(-1)^n = +1$ (यदि $n$ सम है) तथा $(-1)^n = -1$ (यदि $n$ विषम है)।

6.3 भाग की सीमाएं एवं शून्य से विभाजन की वर्जना

1. संवृतता का अभाव (Non-Closure):

पूर्णांक भाग के अंतर्गत संवृत नहीं हैं। किन्हीं दो पूर्णांकों का भागफल सदैव पूर्णांक नहीं होता। उदाहरणार्थ, $(-7) \div (+2) = -3.5 \notin \mathbb{Z}$।

2. शून्य से भाग अपरिभाषित (Division by Zero):

किसी भी पूर्णांक $a$ को शून्य से भाग देना गणितीय रूप से सर्वथा अपरिभाषित (Undefined) है ($a \div 0 =$ अपरिभाषित)। किंतु शून्य को किसी शून्येतर पूर्णांक से भाग देने पर शून्य ही प्राप्त होता है ($0 \div a = 0$, जहाँ $a \ne 0$)।

मॉड्यूल 7: कोष्ठक, BODMAS नियम एवं व्यावहारिक समस्याओं का गणितीय प्रतिरूपण (BODMAS with Signed Brackets & Real-World Modeling)

7.1 पूर्णांकों में कोष्ठकों का पदानुक्रम एवं BODMAS नियम

जब एक ही व्यंजक में धनात्मक और ऋणात्मक संख्याओं के साथ कई संक्रियाएँ और कोष्ठक उपस्थित हों, तो गणना को BODMAS के कठोर पदानुक्रम के अनुसार ही सरल किया जाना चाहिए:

प्राथमिकता संक्रिया / कोष्ठक प्रतीक सरलीकरण नियम
1 (सर्वोच्च) रेखा कोष्ठक (Vinculum / Bar) $\overline{a - b}$ बार के नीचे की संक्रिया सर्वप्रथम हल करें।
2 छोटा कोष्ठक (Parentheses / Round) $( \dots )$ सबसे आंतरिक छोटे कोष्ठक को हल करें।
3 मँझला कोष्ठक (Braces / Curly) $\{ \dots \}$ छोटे कोष्ठक के बाद मँझला कोष्ठक हल करें।
4 बड़ा कोष्ठक (Square Brackets) $[ \dots ]$ सबसे बाहरी बड़े कोष्ठक को हल करें।
5 का (Of) $\text{of} \implies \times$ गुणा के रूप में मूल्यांकन करें।
6, 7, 8, 9 भाग, गुणा, योग, घटाना $\div, \times, +, -$ बाएँ से दाएँ क्रम में निष्पादित करें।

7.2 व्यावहारिक समस्या का बीजगणितीय प्रतिरूपण (Case Study)

परिस्थिति: बहु-मंजिला भवन एवं भूमिगत बेसमेंट में लिफ्ट संचलन

एक लिफ्ट भूमिगत तीसरे तल (बेसमेंट 3, जिसे $-3$ माना गया है) से प्रारंभ होती है। यह पहले 8 तल ऊपर चढ़ती है, फिर 4 तल नीचे उतरती है, और अंत में 2 तल ऊपर चढ़ती है। लिफ्ट अब किस तल पर स्थित है?

चरण 1 (प्रारंभिक स्थिति): $P_0 = -3$

चरण 2 (ऊपर चढ़ना = धनात्मक विस्थापन): $+8 \implies P_1 = -3 + 8 = +5$ (5वीं मंजिल)

चरण 3 (नीचे उतरना = ऋणात्मक विस्थापन): $-4 \implies P_2 = +5 - 4 = +1$ (पहली मंजिल)

चरण 4 (पुनः ऊपर चढ़ना = धनात्मक विस्थापन): $+2 \implies P_3 = +1 + 2 = +3$ (तीसरी मंजिल)

संयुक्त समीकरण: $(-3) + (+8) + (-4) + (+2) = (-3 - 4) + (8 + 2) = -7 + 10 = +3$ (3rd Floor)।

महत्वपूर्ण सूत्र, सर्वसमिकाएँ एवं प्रमेय

समुच्चय अंतर्भुक्ति पदानुक्रम सूत्र (Set Inclusion Hierarchy Formula)
$$\mathbb{N} \subset \mathbb{W} \subset \mathbb{Z}$$
संख्या रेखा तुलना एवं व्युत्क्रम नियम (Number Line Ordering & Negative Inversion)
$$a < b ⇔ a बाईं ओर स्थित है b के; a > b > 0 ⇒ -a < -b$$
परम मान (मापांक) फलन सूत्र (Absolute Value / Modulus Metric)
$$|x| = \begin{cases} x, & x \ge 0 \\ -x, & x < 0 \end{cases} \quad \implies \quad |x| \ge 0, \quad |-a| = |a| = a$$
अनुवर्ती एवं पूर्ववर्ती सार्वभौमिक फलन (Successor & Predecessor Functions)
$$S(n) = n + 1, \quad P(n) = n - 1 \quad (\forall n \in \mathbb{Z})$$
योज्य प्रतिलोम एवं योग तत्समक नियम (Additive Inverse & Additive Identity)
$$a + (-a) = 0, \quad a + 0 = 0 + a = a$$
व्यवकलन का योज्य प्रतिलोम रूपांतरण सूत्र (Subtraction Reduction Equation)
$$a - b = a + (-b), \quad a - (-b) = a + b$$
निरंतर गुणनफल हेतु ऋणात्मक समता नियम (Parity Rule for Products)
$$(-1)^n = {cases} +1, & यदि n सम संख्या है -1, & यदि n विषम संख्या है {cases}$$
बीजगणितीय संवृतता परीक्षण आव्यूह (Algebraic Closure Matrix for ℤ)
$${Z} संवृत है under {+, -, ×}; {Z} संवृत नहीं है under $$

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
मान ज्ञात कीजिए: $|-18| - |-11| + S(-9) - P(-4)$, जहाँ $S(n)$ संख्या $n$ के अनुवर्ती (Successor) को तथा $P(n)$ संख्या $n$ के पूर्ववर्ती (Predecessor) को दर्शाता है।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
चरण 1: व्यक्तिगत पदों का मान ज्ञात करना:
• परम मान की परिभाषा से: $|-18| = 18$ तथा $|-11| = 11$
• अनुवर्ती सूत्र से: $S(-9) = -9 + 1 = -8$
• पूर्ववर्ती सूत्र से: $P(-4) = -4 - 1 = -5$

चरण 2: व्यंजक में मान प्रतिस्थापित करना:
$$\text{व्यंजक} = 18 - 11 + (-8) - (-5)$$

चरण 3: क्रमिक सरलीकरण:
• $18 - 11 = 7$
• $7 + (-8) = -(8 - 7) = -1$
• $-1 - (-5) = -1 + 5 = +(5 - 1) = 4$

अंतिम उत्तर:
अतः दिए गए व्यंजक का मान $4$ है।
उदाहरण 2
पूर्णांकों $(-85)$ और $37$ के योग में से $(-42)$ को घटाइए। अपने उत्तर का योज्य प्रतिलोम भी ज्ञात कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
चरण 1: प्रथम दो पूर्णांकों $(-85)$ और $37$ का योग:
चूँकि दोनों के चिह्न विपरीत हैं, हम बड़े निरपेक्ष मान में से छोटे को घटाते हैं और बड़े का चिह्न लगाते हैं:
$$(-85) + 37 = -(85 - 37) = -48$$

चरण 2: प्राप्त योग में से $(-42)$ को घटाना:
व्यवकलन के नियम $a - (-b) = a + b$ के अनुसार:
$$\text{परिणाम} = -48 - (-42) = -48 + 42$$
पुनः विपरीत चिह्न होने के कारण:
$$-48 + 42 = -(48 - 42) = -6$$

चरण 3: अंतिम परिणाम का योज्य प्रतिलोम ज्ञात करना:
किसी संख्या $x$ का योज्य प्रतिलोम $-x$ होता है।
अतः $-6$ का योज्य प्रतिलोम $= -(-6) = +6$ होगा।

अंतिम उत्तर:
व्यवकलन का परिणाम $-6$ है तथा इसका योज्य प्रतिलोम $+6$ है।
उदाहरण 3
मान ज्ञात कीजिए: $(-2) \times (-3) \times (-4) \times (-5) \times 6$। यदि इस गुणनफल में $(-1)$ का 15 बार गुणा और जोड़ दिया जाए, तो अंतिम परिणाम का चिह्न और मान क्या होगा?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
चरण 1: प्रारंभिक गुणनफल का मूल्यांकन:
व्यंजक: $(-2) \times (-3) \times (-4) \times (-5) \times 6$
यहाँ ऋणात्मक गुणनखंडों की कुल संख्या $= 4$ है।
चूँकि 4 एक सम संख्या (Even Number) है, अतः गुणनफल धनात्मक ($+$) होगा:
$$|-2| \times |-3| \times |-4| \times |-5| \times |6| = 2 \times 3 \times 4 \times 5 \times 6 = 720$$
अतः $(-2) \times (-3) \times (-4) \times (-5) \times 6 = +720$

चरण 2: $(-1)$ के 15 बार गुणन का मान:
घातांक नियम से: $(-1)^{15}$
चूँकि घात 15 एक विषम संख्या (Odd Number) है, अतः:
$$(-1)^{15} = -1$$

चरण 3: अंतिम संयुक्त गुणनफल:
$$\text{अंतिम परिणाम} = (+720) \times (-1) = -720$$

अंतिम उत्तर:
अंतिम परिणाम का चिह्न ऋणात्मक ($-$) है तथा इसका अभीष्ट मान $-720$ है।
उदाहरण 4
एक गहरे समुद्र की खोज करने वाली अनुसंधान पनडुब्बी समुद्र तल से 350 मीटर नीचे (अर्थात $-350\text{ m}$) तैर रही है। यह पहले 180 मीटर और नीचे गोता लगाती है, फिर 220 मीटर ऊपर उठती है, और अंत में 90 मीटर नीचे उतरती है। यदि उस गहराई पर समुद्री जल का तापमान प्रत्येक 100 मीटर नीचे जाने पर $2^\circ\text{C}$ घट जाता है और सतह पर तापमान $24^\circ\text{C}$ था, तो: (a) पनडुब्बी की अंतिम स्थिति क्या है? (b) उस गहराई पर जल का तापमान कितना होगा?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भाग (a): पनडुब्बी की अंतिम स्थिति की गणना:
हम समुद्र तल को $0\text{ m}$ मानते हैं। नीचे जाने को ऋणात्मक ($-$) तथा ऊपर उठने को धनात्मक ($+$) विस्थापन मानते हैं:
• प्रारंभिक गहराई: $P_0 = -350\text{ m}$
• प्रथम विस्थापन (180 m नीचे): $-180\text{ m}$
• द्वितीय विस्थापन (220 m ऊपर): $+220\text{ m}$
• तृतीय विस्थापन (90 m नीचे): $-90\text{ m}$

अंतिम स्थिति $P_f$ का समीकरण:
$$P_f = -350 + (-180) + (+220) + (-90)$$
समान चिह्न वाले पदों का समूहीकरण करने पर:
$$P_f = (-350 - 180 - 90) + 220 = -620 + 220 = -400\text{ m}$$
अतः पनडुब्बी समुद्र तल से 400 मीटर नीचे ($-400\text{ m}$) स्थित है।

भाग (b): उस गहराई पर तापमान की गणना:
• सतह पर तापमान ($0\text{ m}$ पर): $T_0 = +24^\circ\text{C}$
• कुल गहराई: $400\text{ m}$
• तापमान में गिरावट की दर: $2^\circ\text{C}$ प्रति $100\text{ m}$
• कुल तापमान गिरावट:
$$\Delta T = \frac{400}{100} \times (-2^\circ\text{C}) = 4 \times (-2^\circ\text{C}) = -8^\circ\text{C}$$
• अंतिम तापमान:
$$T_f = 24^\circ\text{C} + (-8^\circ\text{C}) = 24 - 8 = +16^\circ\text{C}$$

अंतिम उत्तर:
(a) पनडुब्बी की अंतिम स्थिति समुद्र तल से 400 मीटर नीचे ($-400\text{ m}$) है।
(b) उस गहराई पर समुद्री जल का तापमान $+16^\circ\text{C}$ है।
उदाहरण 5
सरल कीजिए: $18 - [ -4 + \{ 12 - (-3) \times (-2) - (8 - (-6)) \} ]$।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

चरण 1: सबसे आंतरिक छोटे कोष्ठकों को हल करना:
व्यंजक में दो आंतरिक भाग हैं:

  1. $(-3) \times (-2)$: दो ऋणात्मक संख्याओं का गुणनफल धनात्मक होता है:

$$(-3) \times (-2) = +6$$


2. $(8 - (-6))$: दोहरा ऋण नियम $a - (-b) = a + b$ लागू करने पर:

$$8 - (-6) = 8 + 6 = 14$$



व्यंजक अब बन जाता है:

$$18 - [ -4 + \{ 12 - (+6) - 14 \} ]$$



चरण 2: मँझले कोष्ठक $\{ \dots \}$ का सरलीकरण:

$$\{ 12 - 6 - 14 \} = \{ 6 - 14 \} = -8$$



चरण 3: बड़े कोष्ठक $[ \dots ]$ का मूल्यांकन:
व्यंजक में मँझले कोष्ठक का मान प्रतिस्थापित करने पर:

$$[ -4 + (-8) ]$$


समान चिह्न वाले दो ऋणात्मक पूर्णांकों को जोड़ने पर:

$$-4 + (-8) = -(4 + 8) = -12$$



चरण 4: अंतिम घटाने की संक्रिया:

$$18 - [ -12 ]$$


दोहरा ऋण नियम लागू करने पर:

$$18 - (-12) = 18 + 12 = 30$$



अंतिम उत्तर:
दिए गए व्यंजक का अभीष्ट सरल मान $30$ है।

उदाहरण 6
एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में स्थित क्रायोजेनिक परीक्षण चैंबर का प्रारंभिक तापमान सोमवार प्रातः 8:00 बजे $-12^\circ\text{C}$ था। अगले 5 दिनों में तापमान में निम्नलिखित क्रमिक परिवर्तन दर्ज किए गए:\n• सोमवार से मंगलवार: तापमान $8^\circ\text{C}$ बढ़ा।\n• मंगलवार से बुधवार: तापमान $15^\circ\text{C}$ गिरा।\n• बुधवार से गुरुवार: तापमान $6^\circ\text{C}$ बढ़ा।\n• गुरुवार से शुक्रवार: तापमान $11^\circ\text{C}$ गिरा।\n(a) प्रत्येक दिन (मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार) का तापमान ज्ञात कीजिए।\n(b) पूरे 5 दिनों में दर्ज किया गया उच्चतम (Maximum) एवं न्यूनतम (Minimum) तापमान क्या था?\n(c) उच्चतम एवं न्यूनतम तापमान के मध्य कुल तापांतर (Temperature Difference) ज्ञात कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

भाग (a): प्रत्येक दिन के तापमान की क्रमिक गणना:
हम वृद्धि को धनात्मक ($+$) तथा गिरावट को ऋणात्मक ($-$) परिवर्तन मानकर गणना करते हैं:

  1. सोमवार: $T_{\text{Mon}} = -12^\circ\text{C}$ (दिया गया है)

  2. मंगलवार: सोमवार के मान में $8^\circ\text{C}$ की वृद्धि:

$$T_{\text{Tue}} = -12 + 8 = -(12 - 8) = -4^\circ\text{C}$$


3. बुधवार: मंगलवार के मान में $15^\circ\text{C}$ की गिरावट:

$$T_{\text{Wed}} = -4 - 15 = -(4 + 15) = -19^\circ\text{C}$$


4. गुरुवार: बुधवार के मान में $6^\circ\text{C}$ की वृद्धि:

$$T_{\text{Thu}} = -19 + 6 = -(19 - 6) = -13^\circ\text{C}$$


5. शुक्रवार: गुरुवार के मान में $11^\circ\text{C}$ की गिरावट:

$$T_{\text{Fri}} = -13 - 11 = -(13 + 11) = -24^\circ\text{C}$$



भाग (b): उच्चतम एवं न्यूनतम तापमान की पहचान:
दर्ज किए गए सभी तापमानों का समुच्चय:

$$\{-12^\circ\text{C}, -4^\circ\text{C}, -19^\circ\text{C}, -13^\circ\text{C}, -24^\circ\text{C}\}$$


संख्या रेखा पर तुलना के नियम के अनुसार:
• जो संख्या सबसे दाईं ओर है, वह सबसे बड़ी है: $-4^\circ\text{C}$ (मंगलवार) $\implies$ उच्चतम तापमान ($T_{\max}$)।
• जो संख्या सबसे बाईं ओर है, वह सबसे छोटी है: $-24^\circ\text{C}$ (शुक्रवार) $\implies$ न्यूनतम तापमान ($T_{\min}$)।

भाग (c): तापांतर (Temperature Difference) की गणना:
तापांतर सूत्र = उच्चतम तापमान $-$ न्यूनतम तापमान:

$$\Delta T = T_{\max} - T_{\min} = (-4) - (-24)$$


दोहरा ऋण नियम $a - (-b) = a + b$ लागू करने पर:

$$\Delta T = -4 + 24 = +(24 - 4) = 20^\circ\text{C}$$



अंतिम सारांश उत्तर:
(a) मंगलवार = $-4^\circ\text{C}$, बुधवार = $-19^\circ\text{C}$, गुरुवार = $-13^\circ\text{C}$, शुक्रवार = $-24^\circ\text{C}$।
(b) उच्चतम तापमान = $-4^\circ\text{C}$; न्यूनतम तापमान = $-24^\circ\text{C}$।
(c) कुल तापांतर = $20^\circ\text{C}$।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि -8 संख्या -3 से बड़ी है क्योंकि 8 संख्या 3 से बड़ी होती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

-8 वास्तव में -3 से छोटी है (-8 < -3)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

संख्या -7 का पूर्ववर्ती (Predecessor) -6 लिख देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

-7 का पूर्ववर्ती -8 होता है (-7 - 1 = -8)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

व्यवकलन में दोहरा ऋण देखकर भ्रमित होना और 5 - (-3) = 2 लिख देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

5 - (-3) = 5 + 3 = 8 होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि किसी संख्या का परम मान ऋणात्मक हो सकता है (जैसे |-9| = -9 लिखना)।

सही वैज्ञानिक तथ्य

किसी भी पूर्णांक का परम मान सदैव अऋणात्मक होता है (|-9| = +9)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

ऋणात्मक संख्याओं के योग और गुणन के नियमों को मिला देना (जैसे (-4) + (-5) = +9 लिख देना)।

सही वैज्ञानिक तथ्य

(-4) + (-5) = -9 होता है, जबकि (-4) × (-5) = +20 होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

शून्य (0) को एक धनात्मक पूर्णांक मान लेना या शून्य से भाग को 0 लिख देना (जैसे 7 ÷ 0 = 0)।

सही वैज्ञानिक तथ्य

शून्य न तो धनात्मक है और न ही ऋणात्मक; तथा किसी भी संख्या को शून्य से भाग देना सर्वथा अपरिभाषित है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

आईसीएसई कक्षा 6 गणित • अध्याय 4: ऋणात्मक संख्याएँ और पूर्णांक (Integers) दिष्ट संख्याएँ • संख्या रेखा सममिति • परम मान |x| • चिह्नों के नियम (+ / -) • योज्य प्रतिलोम सीआईएससीई / आईसीएसई कक्षा 6 1. द्वि-दिश पूर्णांक संख्या रेखा एवं दिष्ट अंकगणितीय तंत्र (Number Line Engine) मूलबिंदु (0) 0 न तो + और न ही - +1 +2 +3 +4 +5 +6 -1 -2 -3 -4 -5 -6 जोड़ें (+5): दाईं ओर विस्थापन -> +2 घटाएं (+6): बाईं ओर विस्थापन -> -4 ऋणात्मक पूर्णांक (Z⁻ < 0) धनात्मक पूर्णांक (Z⁺ > 0) 2. समुच्चय अंतर्भुक्ति पदानुक्रम (Set Hierarchy) पूर्णांक समुच्चय (Z / Integers) {..., -3, -2, -1, 0, 1, 2, 3, ...} -5 -12 -1 -8 -42 -100 पूर्ण संख्याएँ (W / Whole) 0 प्राकृत (N / Natural) {1, 2, 3, 4, ...} 1 7 25 N ⊂ W ⊂ Z   (कड़े उप-समुच्चय संबंध) 3. परम मान |x| एवं विपरीत परिस्थितियाँ मापांक परिभाषा (0 से ज्यामितीय दूरी): |-a| = |+a| = a ≥ 0 • दूरी सदैव अऋणात्मक होती है: |-7| = 7 • परम मान दिशा-चिह्न को अनदेखा करता है। दैनिक जीवन में विपरीत परिस्थितियाँ: राशि / स्थिति धनात्मक (+) ऋणात्मक (-) तापमान 0°C से ऊपर 0°C से नीचे ऊंचाई / गहराई समुद्र तल से ऊपर समुद्र तल से नीचे वित्तीय लेन-देन लाभ / बैंक जमा हानि / निकासी गति / दिशा उत्तर / पूर्व दक्षिण / पश्चिम योज्य प्रतिलोम: a + (-a) = 0  (विपरीत मान परस्पर निरस्त) 4. चिह्नों के नियम एवं संक्रियाएं (Rules of Signs) गुणन एवं भाग हेतु चिह्नों की सारणी: (+) × (+) = (+) समान चिह्न: धनात्मक (-) × (-) = (+) समान चिह्न: धनात्मक (+) × (-) = (-) असमान चिह्न: ऋणात्मक (-) × (+) = (-) असमान चिह्न: ऋणात्मक योज्य प्रतिलोम द्वारा व्यवकलन: a - b = a + (-b) • दोहरा ऋण धन बन जाता है: a - (-b) = a + b गुणनफल हेतु समता नियम (Parity): • ऋणात्मक संख्या सम बार ⇒ गुणनफल धनात्मक (+) • ऋणात्मक संख्या विषम बार ⇒ गुणनफल ऋणात्मक (-) ⚠️ संवृतता: पूर्णांक +, -, × के अंतर्गत संवृत हैं (भाग में नहीं) टारगेटएग्जाम्स मास्टर अध्ययन सामग्री • सीआईएससीई / आईसीएसई कक्षा 6 गणित • अध्याय 4 सम्पूर्ण संरचना www.targetexams.com

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
दैनिक जीवन में विपरीत परिस्थितियों जैसे लाभ-हानि, ऊंचाई-गहराई, तापमान में उतार-चढ़ाव और बैंक जमा-निकासी को व्यक्त करने के लिए दिष्ट राशियों और ऋणात्मक संख्याओं की आवश्यकता होती है।
मुख्य बिंदु 2
पूर्णांकों के समुच्चय Z में सभी ऋणात्मक पूर्णांक, शून्य तथा सभी धनात्मक पूर्णांक सम्मिलित होते हैं: Z = {..., -3, -2, -1, 0, 1, 2, 3, ...}।
मुख्य बिंदु 3
संख्याओं के समुच्चयों में कड़ा अंतर्भुक्ति संबंध होता है: N ⊂ W ⊂ Z (प्राकृत संख्याएँ पूर्ण संख्याओं का तथा पूर्ण संख्याएँ पूर्णांकों का उप-समुच्चय हैं)।
मुख्य बिंदु 4
पूर्णांकों का त्रिविध वर्गीकरण: धनात्मक पूर्णांक Z+ (सबसे छोटा 1), ऋणात्मक पूर्णांक Z- (सबसे बड़ा -1), और शून्य जो न तो धनात्मक है और न ही ऋणात्मक।
मुख्य बिंदु 5
संख्या रेखा तुलना का स्वर्णिम नियम: जो संख्या दूसरी संख्या के बाईं ओर स्थित होती है वह सदैव उससे छोटी होती है (a < b यदि और केवल यदि a बाईं ओर है b के)।
मुख्य बिंदु 6
किसी पूर्णांक का परम मान |x| उसकी शून्य से दूरी को दर्शाता है और यह सदैव अऋणात्मक होता है (|x| ≥ 0 तथा |-a| = |a| = a)।
मुख्य बिंदु 7
अनुवर्ती S(n) = n + 1 (एक कदम दाईं ओर) तथा पूर्ववर्ती P(n) = n - 1 (एक कदम बाईं ओर); पूर्णांकों में प्रत्येक संख्या का अनुवर्ती और पूर्ववर्ती निश्चित रूप से विद्यमान होता है।
मुख्य बिंदु 8
योज्य प्रतिलोम का नियम: किसी पूर्णांक a का योज्य प्रतिलोम -a होता है, जिससे a + (-a) = 0 प्राप्त होता है; शून्य स्वयं का योज्य प्रतिलोम है।
मुख्य बिंदु 9
व्यवकलन और संवृतता: a - b = a + (-b) तथा a - (-b) = a + b। पूर्णांक योग, व्यवकलन और गुणन के अंतर्गत संवृत हैं, किंतु भाग के अंतर्गत संवृत नहीं हैं।
मुख्य बिंदु 10
चिह्नों के नियम एवं समता: गुणन/भाग में समान चिह्न धनात्मक (+) और असमान चिह्न ऋणात्मक (-) देते हैं; निरंतर गुणनफल में यदि ऋणात्मक गुणनखंड सम बार हों तो धनात्मक, विषम बार हों तो ऋणात्मक होता है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
संख्या रेखा की सहायता से मान ज्ञात कीजिए: (-4) + (+7)।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: संख्या रेखा पर -4 से प्रारंभ करके दाईं ओर 7 कदम चलने पर हम +3 पर पहुँचते हैं। अतः (-4) + (+7) = +3।
प्रारंभिक बिंदु -4 पर खड़े हों और धनात्मक 7 जोड़ने के लिए 7 कदम दाईं ओर चलें।
2
मान ज्ञात कीजिए: |-15| - |-8| + |0| - |-3|।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: |-15| = 15, |-8| = 8, |0| = 0, |-3| = 3। व्यंजक = 15 - 8 + 0 - 3 = 7 + 0 - 3 = 4।
सर्वप्रथम प्रत्येक पद का परम मान निकालें: |-a| = a और |0| = 0।
3
पूर्णांक -12 का अनुवर्ती (Successor) और पूर्ववर्ती (Predecessor) क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अनुवर्ती S(-12) = -12 + 1 = -11। पूर्ववर्ती P(-12) = -12 - 1 = -13।
अनुवर्ती = n + 1 (दाईं ओर 1 कदम) तथा पूर्ववर्ती = n - 1 (बाईं ओर 1 कदम)।
4
सरल कीजिए: (-25) - (-40) + (-15)।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (-25) - (-40) + (-15) = -25 + 40 - 15 = (40) - (25 + 15) = 40 - 40 = 0।
दोहरा ऋण नियम a - (-b) = a + b लागू करें, फिर समान चिह्नों को संयोजित करें।
5
गुणनफल का चिह्न और मान बताइए: (-1) × (-2) × (-3) × (-4) × (-5)।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: यहाँ 5 ऋणात्मक गुणनखंड हैं। विषम संख्या होने के कारण गुणनफल ऋणात्मक होगा: -(1 × 2 × 3 × 4 × 5) = -120।
ऋणात्मक गुणनखंडों की कुल संख्या गिनें: 5 विषम संख्या है।
6
एक नगर का प्रातः 6:00 बजे तापमान -3°C था। दोपहर 2:00 बजे तक तापमान 8°C बढ़ गया और रात्रि 10:00 बजे 5°C गिर गया। रात्रि 10:00 बजे तापमान क्या था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: T = -3 + 8 - 5 = (-3 - 5) + 8 = -8 + 8 = 0°C। अतः रात्रि 10:00 बजे तापमान 0°C था।
वृद्धि को धनात्मक (+8) और गिरावट को ऋणात्मक (-5) मानकर प्रारंभिक मान में जोड़ें।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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कक्षा 6 Mathematics के सभी अध्याय

अध्याय 1: संख्या प्रणाली (संख्या का समेकन) (Number System (Consolidating Sense of Number)) अध्याय 2: अनुमान और पूर्णांकन (Estimation and Rounding Off) अध्याय 3: प्राकृतिक संख्याएँ और पूर्ण संख्याएँ (Natural Numbers and Whole Numbers) अध्याय 4: ऋणात्मक संख्याएँ और पूर्णांक (Negative Numbers and Integers) अध्याय 5: भिन्न (Fractions) अध्याय 6: दशमलव (Decimals) अध्याय 7: सेट का विचार और सेट के प्रकार (Idea of Sets and Types of Sets) अध्याय 8: अनुपात और समानुपात (Ratio and Proportion) अध्याय 9: ऐकिक नियम (Unitary Method) अध्याय 10: बीजगणित की मूलभूत अवधारणाएँ (Fundamental Concepts of Algebra) अध्याय 11: एक चर वाले रैखिक समीकरण (Linear Equations) अध्याय 12: बुनियादी ज्यामितीय अवधारणाएँ (Basic Geometrical Concepts) अध्याय 13: त्रिभुज और चतुर्भुज (Triangles and Quadrilaterals) अध्याय 14: समतल आकृतियों का परिमाप और क्षेत्रफल (Perimeter and Area of Plane Figures) अध्याय 15: डेटा प्रबंधन (बार ग्राफ़ और टेबल्स) (Data Handling (Bar Graphs and Tables))

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