ICSE • कक्षा 6 • Mathematics • अध्याय 9
अनुमानित समय: 45-60 मिनट
प्रगति: अध्ययनरत
ऐकिक नियम (Unitary Method)
ऐकिक नियम (Unitary Method) अंकगणित की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मौलिक विधि है, जिसका उपयोग समानुपातिक राशियों से संबंधित प्रश्नों को हल करने के लिए किया जाता है। इस विधि की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें दी गई अनेक इकाइयों के कुल मान से पहले भाग (Division) द्वारा एक एकल इकाई (1 Unit) का मान ज्ञात किया जाता है, और फिर उस एकल मान में अभीष्ट इकाइयों की संख्या से गुणा (Multiplication) करके कुल मान प्राप्त किया जाता है। हिंदी में 'ऐकिक' शब्द की उत्पत्ति 'एक' (एकल इकाई) से हुई है, ठीक उसी प्रकार जैसे अंग्रेजी में 'Unitary' शब्द 'Unit' (अर्थात एक) से बना है। यह विधि दो चरणों वाले एक तार्किक सेतु की तरह कार्य करती है: पहले भाग देकर अनेक वस्तुओं से एक वस्तु पर आना (मान का संकुचन), और फिर गुणा करके एक वस्तु से अभीष्ट अनेक वस्तुओं पर पहुंचना (मान का विस्तार)। यह सार्वभौमिक नियम प्राथमिक अंकगणित को बीजगणित, प्रतिशत, लाभ-हानि, चाल-दूरी और वाणिज्यिक गणित के उच्च सिद्धांतों से जोड़ता है।
काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशंस (CISCE) एवं आईसीएसई (ICSE) कक्षा 6 गणित के पाठ्यक्रम में ऐकिक नियम का अध्ययन मुख्यतः प्रत्यक्ष विचरण (Direct Variation या सीधा विचरण) के संदर्भ में किया जाता है। दो राशियां प्रत्यक्ष विचरण में तब मानी जाती हैं, जब एक राशि में वृद्धि होने पर दूसरी राशि में भी उसी अनुपात में वृद्धि होती है, अथवा एक राशि में कमी होने पर दूसरी राशि में भी उसी अनुपात में कमी आती है, बशर्ते कि प्रति इकाई दर सदैव स्थिर रहे। प्रत्यक्ष विचरण में दोनों राशियों का भागफल या अनुपात सदैव एक धनात्मक नियतांक k के बराबर होता है। उदाहरण के लिए, यदि खरीदी जाने वाली पुस्तकों की संख्या दोगुनी कर दी जाए, तो कुल व्यय भी ठीक दोगुना हो जाएगा। यदि कोई वाहन एकसमान चाल से चल रहा है, तो यात्रा का समय दोगुना होने पर तय की गई दूरी भी ठीक दोगुनी हो जाएगी। चूंकि प्रति इकाई दर अपरिवर्तित रहती है, अतः ठीक एक इकाई का मान ज्ञात करना वह आधारशिला बन जाता है जिससे भविष्य की किसी भी मात्रा का सटीक मूल्यांकन किया जा सकता है।
कक्षा 6 के स्तर पर ऐकिक नियम के प्रश्नों को अज्ञात राशि के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है:
प्रकार A प्रश्न (दी गई संख्या हेतु कुल मूल्य ज्ञात करना): इस श्रेणी के प्रश्नों में n वस्तुओं का कुल मूल्य दिया गया होता है, और m वस्तुओं का कुल मूल्य ज्ञात करने को कहा जाता है। इसके समाधान का निश्चित कलन-विधि (Algorithm) क्रम इस प्रकार है: सर्वप्रथम, दिए गए कुल मूल्य में n से भाग देकर 1 वस्तु का मूल्य निकालें। तत्पश्चात, 1 वस्तु के मूल्य में अभीष्ट संख्या m से गुणा करें। अर्थात, अभीष्ट मूल्य बराबर होता है (दिया गया कुल मूल्य / n) × m। चाहे अभीष्ट संख्या m दी गई संख्या n से बड़ी हो (मात्रा में वृद्धि) अथवा m का मान n से छोटा हो (मात्रा में कमी), दोनों ही स्थितियों में यह समान द्वि-चरणीय तर्क निर्बाध रूप से लागू होता है।
प्रकार B प्रश्न (दिए गए बजट या धनराशि में वस्तुओं की संख्या ज्ञात करना): इस विपरीत दृष्टिकोण वाले प्रश्नों में n वस्तुओं का मूल्य दिया होता है, किंतु एक निश्चित उपलब्ध धनराशि या बजट B देकर यह पूछा जाता है कि इस राशि में कुल कितनी वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं। इसके समाधान हेतु विद्यार्थी पहले भाग द्वारा 1 वस्तु का मूल्य निकालते हैं, और फिर उपलब्ध कुल धनराशि B में 1 वस्तु के मूल्य से भाग देकर अभीष्ट वस्तुओं की संख्या प्राप्त करते हैं (वस्तुओं की संख्या = कुल बजट / 1 वस्तु का मूल्य)। वैकल्पिक रूप से, विद्यार्थी यह भी निकाल सकते हैं कि 1 रुपये में कितनी वस्तुएं आती हैं और फिर उसे B से गुणा कर सकते हैं।
दैनिक जीवन की वस्तुओं के क्रय-विक्रय के अतिरिक्त, ऐकिक नियम एकसमान गति, चाल, दूरी और समय की समस्याओं का मूलभूत आधार है। एकसमान चाल (Speed) की परिभाषा ही यह है कि एकांक समय (1 घंटा, 1 मिनट या 1 सेकंड) में तय की गई दूरी। अतः जब हम कुल दूरी में कुल समय से भाग देकर 1 घंटे में तय की गई दूरी निकालते हैं, तो हम वस्तुतः ऐकिक नियम की प्रथम संक्रिया कर रहे होते हैं। एक बार चाल (1 घंटे की दूरी) ज्ञात हो जाने पर, अभीष्ट समय से गुणा करके दूरी निकाली जा सकती है, अथवा अभीष्ट दूरी में चाल से भाग देकर आवश्यक समय ज्ञात किया जा सकता है।
आईसीएसई बोर्ड परीक्षाओं का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील बिंदु मात्रक समांगीकरण (Unit Homogenisation) और व्यापारिक गणना मात्रकों का ज्ञान है। परीक्षा के प्रश्नों में अक्सर विभिन्न मात्रकों का मिश्रण जानबूझकर दिया जाता है ताकि विद्यार्थी की सतर्कता की जांच की जा सके। विद्यार्थियों को पारंपरिक व्यापारिक मात्रक रूपांतरणों का पूर्ण ज्ञान होना अनिवार्य है: 1 दर्जन में 12 इकाइयां होती हैं; 1 कोरी (Score) में 20 इकाइयां होती हैं; तथा 1 ग्रॉस (Gross) में 12 दर्जन अर्थात 144 इकाइयां होती हैं। इसके अतिरिक्त, मीट्रिक प्रणाली के रूपांतरण जैसे किलोग्राम से ग्राम (1 किग्रा = 1,000 ग्राम), लीटर से मिलीलीटर (1 लीटर = 1,000 मिलीलीटर), मीटर से सेंटीमीटर (1 मीटर = 100 सेमी), तथा घंटा से मिनट (1 घंटा = 60 मिनट) को भाग की संक्रिया करने से पहले ही एक समान इकाई में बदलना अनिवार्य है।
अंत में, पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को प्रत्यक्ष विचरण और प्रतिलोम विचरण (Inverse Variation) के अंतर से भी परिचित कराता है। यद्यपि कक्षा 6 में मुख्य ध्यान प्रत्यक्ष विचरण पर होता है जहाँ 'अधिक वस्तुएं = अधिक मूल्य, तथा कम वस्तुएं = कम मूल्य' का नियम चलता है, परंतु मजदूरों और कार्य दिवसों से संबंधित प्रश्नों में स्थिति विपरीत होती है ('अधिक मजदूर = कम दिन, तथा कम मजदूर = अधिक दिन')। विद्यार्थी सीखते हैं कि किसी भी प्रश्न को हल करने से पहले यह जांचना अनिवार्य है कि राशियां समान दिशा में घट-बढ़ रही हैं या विपरीत दिशा में। इस सतर्क दृष्टिकोण से विद्यार्थी परीक्षा में बिना किसी त्रुटि के पूर्ण अंक प्राप्त करते हैं।