Follow Us
Select Medium / माध्यम चुनें:
Eng (English) Hindi (हिन्दी)
JAC • Class XII • Chemistry • Ch 5
Estimated Time: 45 Mins
Study Progress: In Progress

Coordination Compounds

उपसहसंयोजन यौगिक (Coordination Compounds) या जटिल यौगिक (Complex Compounds) रसायन विज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं क्रांतिकारी वर्ग हैं, जिसमें एक केंद्रीय धातु परमाणु या आयन निश्चित संख्या में उदासीन अणुओं या ऋणायनों (जिन्हें लिगैंड कहा जाता है) द्वारा उपसहसंयोजक बंधों (Coordinate Covalent Bonds) से घिरा रहता है। प्रस्तुत अध्याय में द्विक लवण (Double Salt) तथा संकुल यौगिक के मध्य मूलभूत अंतर से आरंभ करते हुए, अल्फ्रेड वर्नर के उपसहसंयोजन सिद्धांत (Werner's Theory) के प्राथमिक एवं द्वितीयक संयोजकता की विस्तृत व्याख्या की गई है। लिगैंडों के प्रकार—एकदंतुक, द्विदंतुक, बहुदंतुक, कीलेट लिगैंड (Chelate Ligands एवं कीलेट प्रभाव), तथा उभयदंतुक लिगैंड (Ambidentate Ligands) का उदाहरण सहित विश्लेषण किया गया है। IUPAC नामकरण के मानक नियमों, संरचनात्मक समावयवता (आयनन, बंधन, जलयोजन, उपसहसंयोजन) तथा त्रिविम समावयवता (ज्यामितीय $cis/trans, fac/mer$ एवं प्रकाशिक) को चरणबद्ध सारणियों द्वारा स्पष्ट किया गया है। आबंधन के आधुनिक सिद्धांतों—संयोजकता आबंध सिद्धांत (VBT) द्वारा संकरण ($sp^3, dsp^2, sp^3d^2, d^2sp^3$) व चुंबकीय व्यवहार की व्याख्या, तथा क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (CFT) द्वारा अष्टफलकीय व चतुष्फलकीय क्षेत्रों में $d$-कक्षकों के विपाटन ($t_{2g}$ व $e_g$), स्पेक्ट्रोकेमिकल श्रेणी (Spectrochemical Series), संकुलों के रंग एवं इनके जैविक व औद्योगिक अनुप्रयोगों (उदा. हीमोग्लोबिन, विटामिन $\text{B}_{12}$, सिस्प्लैटिन) का संपूर्ण बोर्ड-उन्मुख संकलन प्रस्तुत किया गया है।

हमारे रक्त का लाल रंग और पत्तियों की हरीतिमा—इनके पीछे कौन सा अद्भुत रासायनिक बंधन छिपा है?

क्या आप जानते हैं कि हमारे शरीर में करोड़ों कोशिकाओं तक ऑक्सीजन पहुंचाने वाला हीमोग्लोबिन वास्तव में आयरन ($\text{Fe}$) का एक उपसहसंयोजन संकुल है? और पेड़-पौधों में सूर्य के प्रकाश को सोखकर भोजन बनाने वाला क्लोरोफिल मैग्नीशियम ($\text{Mg}$) का संकुल है! इतना ही नहीं, कैंसर के इलाज की क्रांतिकारी दवा 'सिस्प्लैटिन' (Cisplatin) प्लैटिनम का एक संकुल है। उपसहसंयोजन यौगिक केवल प्रयोगशाला के टेस्ट ट्यूब तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह पूरे जीव जगत और आधुनिक चिकित्सा का आधार हैं। आइए समझें कि कैसे धातुएं और लिगैंड मिलकर इन चमत्कारी अणुओं की रचना करते हैं!

Why This Chapter Matters

JAC एवं CBSE 12वीं बोर्ड परीक्षा में 'उपसहसंयोजन यौगिक' से 7 अंकों के महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे जाते हैं। IUPAC नामकरण (2-3 अंक), वर्नर का सिद्धांत (प्राथमिक व द्वितीयक संयोजकता), कीलेट लिगैंड एवं उभयदंतुक लिगैंड (परिभाषा व उदाहरण), संयोजकता आबंध सिद्धांत (VBT) के आधार पर $[\text{Fe(CN)}_6]^{3-}$ अथवा $[\text{Ni(CO)}_4]$ का संकरण व ज्यामिति ज्ञात करना, तथा क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा ($\Delta_o$ व $\Delta_t$) का आरेख एवं स्पेक्ट्रोकेमिकल श्रेणी हर वर्ष बोर्ड परीक्षा में अवश्य पूछे जाने वाले प्रश्न हैं।

Before You Begin (Prerequisites)

  • संक्रमण तत्वों (d-ब्लॉक) के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास का ज्ञान।
  • सहसंयोजक एवं उपसहसंयोजक बंध (Coordinate Bond / Dative Bond) की अवधारणा।
  • ऑक्सीकरण संख्या (Oxidation State) की गणना करने की विधि।

What You Will Learn (Core Objectives)

  • द्विक लवण एवं उपसहसंयोजन संकुल के मध्य विभेद करना तथा वर्नर सिद्धांत की अभिधारणाओं को समझाना।
  • विभिन्न प्रकार के लिगैंडों (एकदंतुक, द्विदंतुक, कीलेट, उभयदंतुक) को पहचानना एवं वर्गीकृत करना।
  • उपसहसंयोजन यौगिकों का त्रुटिरहित IUPAC नामकरण करना एवं सूत्र लिखना।
  • संकुलों में संरचनात्मक एवं त्रिविम समावयवता (ज्यामितीय व प्रकाशिक) की व्याख्या करना।
  • VBT द्वारा संकरण व चुंबकीय प्रकृति तथा CFT द्वारा $d$-कक्षक विपाटन एवं रंग की वैज्ञानिक व्याख्या करना।

Chapter Roadmap & Progression

1 1. द्विक लवण, संकुल यौगिक एवं वर्नर...
2 2. लिगैंड, शब्दावली एवं IUPAC नामकर...
3 3. उपसहसंयोजन यौगिकों में समावयवता...
4 4. आबंधन सिद्धांत: VBT एवं CFT

Complete Concept Guide (100% Curriculum Coverage)

1. द्विक लवण, संकुल यौगिक एवं वर्नर का उपसहसंयोजन सिद्धांत

1.1 द्विक लवण (Double Salts) बनाम उपसहसंयोजन यौगिक (Coordination Compounds)

लक्षणद्विक लवण (Double Salt)उपसहसंयोजन यौगिक (Coordination Compound)
जलीय विलयन में व्यवहारजल में घोलने पर यह अपने सभी संघटक आयनों में पूर्णतः वियोजित (dissociate) हो जाते हैं।जल में घोलने पर संकुल आयन अपनी पहचान बनाए रखता है तथा संघटक आयनों में वियोजित नहीं होता।
आयनों का परीक्षणयह अपने सभी संघटक आयनों का धनात्मक रासायनिक परीक्षण देते हैं।संकुल मंडल (Coordination sphere) में उपस्थित धातु व लिगैंड अपना स्वतंत्र परीक्षण नहीं देते।
आबंधनइनमें केवल सामान्य आयनिक बंध होते हैं।इनमें केंद्रीय धातु एवं लिगैंडों के मध्य उपसहसंयोजक बंध होते हैं।
प्रमुख उदाहरण• मोहर लवण: $\text{FeSO}_4\cdot(\text{NH}_4)_2\text{SO}_4\cdot 6\text{H}_2\text{O} \to \text{Fe}^{2+} + 2\text{NH}_4^+ + 2\text{SO}_4^{2-}$
• पोटाश फिटकरी: $\text{K}_2\text{SO}_4\cdot\text{Al}_2(\text{SO}_4)_3\cdot 24\text{H}_2\text{O}$
• पोटैशियम फेरोसाइनाइड: $\text{K}_4[\text{Fe(CN)}_6] \to 4\text{K}^+ + [\text{Fe(CN)}_6]^{4-}$ (यह $\text{Fe}^{2+}$ या $\text{CN}^-$ का परीक्षण नहीं देता!)

1.2 वर्नर का उपसहसंयोजन सिद्धांत (Werner's Theory)

अल्फ्रेड वर्नर (उपसहसंयोजन रसायन के जनक, 1913 नोबेल पुरस्कार) के अनुसार धातुएं दो प्रकार की संयोजकताएं प्रदर्शित करती हैं:

  1. प्राथमिक संयोजकता (Primary Valency):
    • यह आयननीय (Ionizable) होती है।
    • यह धातु की ऑक्सीकरण अवस्था (Oxidation State) से संबंधित होती है।
    • यह केवल ऋणायनों (Anions) द्वारा संतुष्ट होती है।
    • यह अ-दिशात्मक होती है (संरचना या ज्यामिति तय नहीं करती)। इसे बिंदुदार रेखाओं (dashed lines $---$) से दर्शाते हैं।
  2. द्वितीयक संयोजकता (Secondary Valency):
    • यह अ-आयननीय (Non-ionizable) होती है।
    • यह धातु की उपसहसंयोजन संख्या (Coordination Number) के बराबर होती है।
    • यह उदासीन अणुओं (उदा. $\text{NH}_3, \text{H}_2\text{O}$) अथवा ऋणायनों द्वारा संतुष्ट होती है।
    • यह दिशात्मक (Directional) होती है तथा संकुल की त्रिविम ज्यामिति (जैसे अष्टफलकीय, चतुष्फलकीय, वर्ग समतलीय) निर्धारित करती है। इसे ठोस रेखाओं (solid lines —) से दर्शाते हैं।
वर्नर सिद्धांत का प्रायोगिक प्रमाण ($\text{AgNO}_3$ के साथ अवक्षेपण):
• $[\text{Co(NH}_3)_6]\text{Cl}_3 + 3\text{AgNO}_3 \longrightarrow 3\text{AgCl} \downarrow$ (3 $\text{Cl}^-$ प्राथमिक संयोजकता में हैं)
• $[\text{Co(NH}_3)_5\text{Cl}]\text{Cl}_2 + 2\text{AgNO}_3 \longrightarrow 2\text{AgCl} \downarrow$ (2 $\text{Cl}^-$ प्राथमिक, 1 $\text{Cl}^-$ द्वितीयक संयोजकता में)
• $[\text{Co(NH}_3)_4\text{Cl}_2]\text{Cl} + 1\text{AgNO}_3 \longrightarrow 1\text{AgCl} \downarrow$ (1 $\text{Cl}^-$ प्राथमिक, 2 $\text{Cl}^-$ द्वितीयक संयोजकता में)

2. लिगैंड, शब्दावली एवं IUPAC नामकरण

2.1 लिगैंडों का वर्गीकरण (Classification of Ligands)

वे उदासीन अणु अथवा आयन जो केंद्रीय धातु परमाणु/आयन को कम से कम एक इलेक्ट्रॉन युग्म दान कर उपसहसंयोजक बंध बनाते हैं, लिगैंड कहलाते हैं (लुईस क्षार)।

  • एकदंतुक लिगैंड (Monodentate): केवल एक दाता परमाणु होता है। उदा. $\text{Cl}^-$, $\text{Br}^-$, $\text{H}_2\text{O}$ (एक्वा), $\text{NH}_3$ (एम्मीन), $\text{CO}$ (कार्बोनिल), $\text{CN}^-$ (सायनिडो)।
  • द्विदंतुक लिगैंड (Bidentate): दो दाता परमाणु उपस्थित होते हैं।
    • एथिलीनडाईऐमीन (en): $\text{H}_2\text{N}-\text{CH}_2-\text{CH}_2-\text{NH}_2$ (उदासीन, दो N दाता)
    • ऑक्सालेट आयन ($\text{ox}^{2-}$): $^-\text{OOC}-\text{COO}^-$ (द्वि-ऋणावेशित, दो O दाता)
  • बहुदंतुक लिगैंड (Polydentate): उदा. $\text{EDTA}^{4-}$ (एथिलीनडाईऐमीनटेट्राएसीटेट आयन)—यह एक षट्दंतुक (Hexadentate) लिगैंड है जिसमें 2 नाइट्रोजन एवं 4 ऑक्सीजन दाता परमाणु होते हैं।
  • कीलेट लिगैंड एवं कीलेट प्रभाव (Chelating Ligand & Chelate Effect): जब द्विदंतुक या बहुदंतुक लिगैंड केंद्रीय धातु के साथ बंध बनाकर 5 या 6 सदस्यीय वलय (Ring) जैसी संरचना बनाते हैं, तो इन्हें कीलेट लिगैंड कहते हैं। वलय बनने के कारण संकुल का स्थायित्व अत्यधिक बढ़ जाता है, जिसे कीलेट प्रभाव कहते हैं।
  • उभयदंतुक लिगैंड (Ambidentate Ligands): वे एकदंतुक लिगैंड जिनमें दो भिन्न दाता परमाणु होते हैं, किंतु एक समय में केवल एक ही दाता परमाणु धातु से जुड़ता है।
    • $\text{NO}_2^-$: यदि N जुड़े तो नाइट्रो (नाइट्राइटो-N); यदि O जुड़े तो नाइट्राइटो (नाइट्राइटो-O, $\text{ONO}^-$)
    • $\text{SCN}^-$: यदि S जुड़े तो थायोसायनेटो; यदि N जुड़े तो आइसोथायोसायनेटो ($\text{NCS}^-$)

2.2 IUPAC नामकरण के नियम एवं उदाहरण

नियम संक्षेप:
1. यौगिक में सबसे पहले धनायन का नाम, फिर ऋणायन का नाम लिखा जाता है।
2. उपसहसंयोजन मंडल के भीतर लिगैंडों का नाम उनके वर्णानुक्रम (Alphabetical order) में लिखा जाता है (ऋणात्मक लिगैंड के अंत में '-ओ' जैसे क्लोरिडो, सल्फेटो; उदासीन लिगैंड: $\text{H}_2\text{O}$ = एक्वा, $\text{NH}_3$ = एम्मीन, $\text{CO}$ = कार्बोनिल)।
3. यदि संकुल आयन धनायनी या उदासीन है, तो धातु का नाम सामान्य रहता है (उदा. कोबाल्ट, प्लैटिनम, आयरन)।
4. यदि संकुल आयन ऋणायनी है, तो धातु के नाम के अंत में '-एट' (-ate) प्रत्यय लगाते हैं (उदा. कोबाल्टेट, प्लैटिनेट, फेरेट, क्यूप्रेट, अर्जेन्टेट)।
5. धातु के नाम के तुरंत बाद कोष्ठक में उसकी ऑक्सीकरण संख्या रोमन अंकों में लिखी जाती है।

सूत्रप्रकृतिIUPAC नाम
$\text{K}_4[\text{Fe(CN)}_6]$ऋणायनी संकुलपोटैशियम हेक्सासायनिडोफेरेट(II)
$[\text{Co(NH}_3)_6]\text{Cl}_3$धनायनी संकुलहेक्साएम्मीनकोबाल्ट(III) क्लोराइड
$[\text{Pt(NH}_3)_2\text{Cl}_2]$उदासीन संकुलडाईएम्मीनडाईक्लोरिडोप्लैटिनम(II)
$\text{K}_3[\text{Al(C}_2\text{O}_4)_3]$ऋणायनी संकुलपोटैशियम ट्राईऑक्सालेटोएल्युमिनेट(III)
$[\text{Cr(H}_2\text{O)}_4\text{Cl}_2]\text{Cl}$धनायनी संकुलटेट्राएक्वाडाईक्लोरिडोक्रोमियम(III) क्लोराइड
$[\text{Ni(CO)}_4]$उदासीन संकुलटेट्राकार्बोनिलनिकेल(0)

3. उपसहसंयोजन यौगिकों में समावयवता (Isomerism)

3.1 संरचनात्मक समावयवता (Structural Isomerism)

  • 1. आयनन समावयवता (Ionisation Isomerism): जब संकुल यौगिकों का अणुसूत्र समान हो किंतु जलीय विलयन में वे भिन्न-भिन्न आयन उत्पन्न करें (उपसहसंयोजन मंडल और आयनन मंडल के मध्य ऋणायनों का आदान-प्रदान)।
    उदा. $[\text{Co(NH}_3)_5\text{SO}_4]\text{Br}$ (लाल, $\text{BaCl}_2$ के साथ कोई अवक्षेप नहीं देता, $\text{AgNO}_3$ के साथ पीला $\text{AgBr}$ देता है)
    एवं $[\text{Co(NH}_3)_5\text{Br}]\text{SO}_4$ (बैंगनी, $\text{BaCl}_2$ के साथ सफेद $\text{BaSO}_4$ अवक्षेप देता है)।
  • 2. जलयोजन/विलायकयोजन समावयवता (Hydrate / Solvate Isomerism): जब जल के अणु लिगैंड के रूप में अथवा क्रिस्टलन जल के रूप में भिन्न संख्या में उपस्थित होते हैं।
    उदा. $[\text{Cr(H}_2\text{O)}_6]\text{Cl}_3$ (बैंगनी), $[\text{Cr(H}_2\text{O)}_5\text{Cl}]\text{Cl}_2\cdot\text{H}_2\text{O}$ (धूसर-हरा), $[\text{Cr(H}_2\text{O)}_4\text{Cl}_2]\text{Cl}\cdot 2\text{H}_2\text{O}$ (गहरा हरा)।
  • 3. बंधन समावयवता (Linkage Isomerism): यह उभयदंतुक लिगैंडों (जैसे $\text{NO}_2^-, \text{SCN}^-$) की उपस्थिति के कारण होती है।
    उदा. $[\text{Co(NH}_3)_5(\text{NO}_2)]\text{Cl}_2$ (पीला, कोबाल्ट-नाइट्रोजन बंध) तथा $[\text{Co(NH}_3)_5(\text{ONO})]\text{Cl}_2$ (लाल, कोबाल्ट-ऑक्सीजन बंध)।
  • 4. उपसहसंयोजन समावयवता (Coordination Isomerism): जब यौगिक में धनायनी एवं ऋणायनी दोनों भाग संकुल आयन हों और उनके मध्य लिगैंडों का आदान-प्रदान हो।
    उदा. $[\text{Co(NH}_3)_6][\text{Cr(CN)}_6]$ तथा $[\text{Cr(NH}_3)_6][\text{Co(CN)}_6]$।

3.2 त्रिविम समावयवता (Stereoisomerism)

1. ज्यामितीय समावयवता (Geometrical Isomerism - Cis / Trans):
• वर्ग समतलीय संकुल $[\text{MA}_2\text{B}_2]$: उदा. $[\text{Pt(NH}_3)_2\text{Cl}_2]$ में जब दोनों समान लिगैंड निकटवर्ती ($90^\circ$) हों तो cis रूप (सिस्प्लैटिन—एंटीकैंसर दवा) तथा जब विपरीत ($180^\circ$) हों तो trans रूप।
• अष्टफलकीय संकुल $[\text{MA}_4\text{B}_2]$: उदा. $[\text{Co(NH}_3)_4\text{Cl}_2]^+$ में cis (बैंगनी) एवं trans (हरा) रूप।
• $[\text{MA}_3\text{B}_3]$ प्रकार में फलकीय (facial - fac) एवं रेखांशिक (meridional - mer) समावयवी बनते हैं।

2. प्रकाशिक समावयवता (Optical Isomerism):
वे संकुल जो एक-दूसरे पर अनतिव्याप्य (Non-superimposable) दर्पण प्रतिबिंब होते हैं (कायरल अणु), प्रकाशिक समावयवी कहलाते हैं। ये समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को क्रमशः दाईं ओर (d-रूप) या बाईं ओर (l-रूप) घुमाते हैं।
उदा. $[\text{Co(en)}_3]^{3+}$ तथा cis-$[\text{Co(en)}_2\text{Cl}_2]^+$ प्रकाशिक सक्रिय होते हैं (जबकि trans रूप में सममिति तल होने से वह प्रकाशिक अक्रिय होता है)।

4. आबंधन सिद्धांत: VBT एवं CFT

4.1 संयोजकता आबंध सिद्धांत (Valence Bond Theory - VBT)

पॉलिंग के अनुसार केंद्रीय धातु अपनी उपसहसंयोजन संख्या के बराबर रिक्त संकरित कक्षक उपलब्ध कराती है, जिनमें लिगैंड अपने एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म दान कर बंध बनाते हैं।

संकुल आयनधातु का विन्याससंकरणज्यामितिअयुग्मित $e^-$चुंबकीय प्रकृति
$[\text{Ni(CO)}_4]$$\text{Ni}(0) = 3d^8 4s^2 \to 3d^{10}$$sp^3$चतुष्फलकीय0प्रतिचुंबकीय (Diamagnetic)
$[\text{Ni(CN)}_4]^{2-}$$\text{Ni}^{2+} = 3d^8$ (युग्मित)$dsp^2$वर्ग समतलीय0प्रतिचुंबकीय
$[\text{NiCl}_4]^{2-}$$\text{Ni}^{2+} = 3d^8$ (अयुग्मित)$sp^3$चतुष्फलकीय2अनुचुंबकीय (Paramagnetic)
$[\text{Fe(CN)}_6]^{3-}$$\text{Fe}^{3+} = 3d^5$ (युग्मित)$d^2sp^3$ (आंतरिक कक्षक)अष्टफलकीय1अनुचुंबकीय (दुर्बल)
$[\text{FeF}_6]^{3-}$$\text{Fe}^{3+} = 3d^5$ (अयुग्मित)$sp^3d^2$ (बाह्य कक्षक)अष्टफलकीय5अत्यधिक अनुचुंबकीय

4.2 क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (Crystal Field Theory - CFT)

CFT धातु एवं लिगैंड के मध्य बंध को पूर्णतः स्थिरविद्युत (Electrostatic) मानती है।
अष्टफलकीय संकुलों में $d$-कक्षकों का विपाटन (Splitting in Octahedral Field):
अष्टफलकीय संकुल में लिगैंड अक्षों ($x, y, z$) के अनुदिश आते हैं। अतः अक्षीय कक्षक ($d_{x^2-y^2}, d_{z^2}$) प्रतिकर्षण के कारण उच्च ऊर्जा स्तर $e_g$ में चले जाते हैं, जबकि अक्षों के मध्य स्थित कक्षक ($d_{xy}, d_{yz}, d_{zx}$) निम्न ऊर्जा स्तर $t_{2g}$ में चले जाते हैं। दोनों के मध्य ऊर्जा अंतर को क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा ($\Delta_o$) कहते हैं।

स्पेक्ट्रोकेमिकल श्रेणी (Spectrochemical Series):
लिगैंडों को उनकी विपाटन सामर्थ्य के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित करने पर प्राप्त श्रेणी:
$$\text{I}^- < \text{Br}^- < \text{S}^{2-} < \text{Cl}^- < \text{F}^- < \text{OH}^- < \text{C}_2\text{O}_4^{2-} < \text{H}_2\text{O} < \text{NCS}^- < \text{EDTA}^{4-} < \text{NH}_3 < \text{en} < \text{CN}^- < \text{CO}$$
• प्रबल क्षेत्र लिगैंड ($\Delta_o > P$): इलेक्ट्रॉनों का युग्मन (Pairing) होता है $\to$ निम्न चक्रण संकुल (Low Spin Complex) बनते हैं।
• दुर्बल क्षेत्र लिगैंड ($\Delta_o < P$): इलेक्ट्रॉन हुंड के नियमानुसार उच्च $e_g$ में जाते हैं $\to$ उच्च चक्रण संकुल (High Spin Complex) बनते हैं।

चतुष्फलकीय संकुलों में विपाटन: चतुष्फलकीय क्षेत्र में विपाटन अष्टफलकीय का उल्टा होता है ($e$ निम्न ऊर्जा, $t_2$ उच्च ऊर्जा)। विपाटन ऊर्जा कम होती है: $\Delta_t = \frac{4}{9}\Delta_o$ (अतः ये सदैव उच्च चक्रण संकुल बनाते हैं)।

Key Formulas, Reactions & Definitions

वर्नर सिद्धांत प्राथमिक संयोजकता
$$\text{Primary Valency} = \text{Oxidation State of Metal}$$
वर्नर सिद्धांत द्वितीयक संयोजकता
$$\text{Secondary Valency} = \text{Coordination Number of Metal}$$
चक्रण-मात्र चुंबकीय आघूर्ण
$$\mu = \sqrt{n(n+2)} \text{ BM}$$
क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन संबंध (अष्टफलकीय/चतुष्फलकीय)
$$\Delta_t = \frac{4}{9}\Delta_o$$
क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकरण ऊर्जा (CFSE - अष्टफलकीय)
$$\text{CFSE} = [-0.4 n(t_{2g}) + 0.6 n(e_g)]\Delta_o + mP$$
प्रबल क्षेत्र लिगैंड शर्त (निम्न चक्रण)
$$\Delta_o > P \quad (P = \text{Pairing Energy})$$
दुर्बल क्षेत्र लिगैंड शर्त (उच्च चक्रण)
$$\Delta_o < P$$
स्पेक्ट्रोकेमिकल श्रेणी क्रम
$$\text{I}^- < \text{Br}^- < \text{Cl}^- < \text{F}^- < \text{OH}^- < \text{H}_2\text{O} < \text{NH}_3 < \text{en} < \text{CN}^- < \text{CO}$$
कीलेट वलय स्थायित्व
$$\text{Stability} \propto \text{Number of Chelate Rings (Entropy driven)}$$
प्रकाशिक सक्रियता शर्त
$$\text{Non-superimposable mirror images (Chiral, no plane of symmetry)}$$

Conceptual Solved Examples & Case Studies

Example 1
निम्नलिखित उपसहसंयोजन यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए:
(i) $[\text{Co(NH}_3)_5\text{Cl}]\text{Cl}_2$
(ii) $\text{K}_3[\text{Fe(CN)}_6]$
(iii) $[\text{Pt(en)}_2\text{Cl}_2]\text{SO}_4$
(iv) $[\text{Ni(CO)}_4]$
Step-by-Step Solution:
(i) $[\text{Co(NH}_3)_5\text{Cl}]\text{Cl}_2$:
• संकुल धनायनी है। लिगैंड: 5 एम्मीन (उदासीन), 1 क्लोरिडो ($-1$), बाहर 2 क्लोराइड आयन हैं।
• Co की ऑक्सीकरण अवस्था: $x + 5(0) + (-1) + 2(-1) = 0 \implies x = +3$
• IUPAC नाम: पेंटाएम्मीनक्लोरिडोकोबाल्ट(III) क्लोराइड

(ii) $\text{K}_3[\text{Fe(CN)}_6]$:
• संकुल भाग ऋणायनी है, अतः धातु के नाम के अंत में 'फेरेट' लगेगा।
• Fe की ऑक्सीकरण अवस्था: $3(+1) + x + 6(-1) = 0 \implies x = +3$
• IUPAC नाम: पोटैशियम हेक्सासायनिडोफेरेट(III)

(iii) $[\text{Pt(en)}_2\text{Cl}_2]\text{SO}_4$:
• लिगैंड: डाईक्लोरिडो, बिस(एथेन-1,2-डाईऐमीन)।
• Pt की ऑक्सीकरण अवस्था: $x + 2(0) + 2(-1) + (-2) = 0 \implies x = +4$
• IUPAC नाम: डाईक्लोरिडोबिस(एथेन-1,2-डाईऐमीन)प्लैटिनम(IV) सल्फेट

(iv) $[\text{Ni(CO)}_4]$:
• CO एक उदासीन लिगैंड है, Ni की ऑक्सीकरण अवस्था $= 0$।
• IUPAC नाम: टेट्राकार्बोनिलनिकेल(0)
Example 2
संयोजकता आबंध सिद्धांत (VBT) के आधार पर $[\text{Fe(CN)}_6]^{4-}$ एवं $[\text{Fe(H}_2\text{O)}_6]^{2+}$ के संकरण, ज्यामिति तथा चुंबकीय व्यवहार की तुलना कीजिए।
Step-by-Step Solution:
दोनों संकुलों में केंद्रीय धातु $\text{Fe}^{2+}$ है।
$\text{Fe}$ ($Z=26$) = $[\text{Ar}] 3d^6 4s^2 \implies \text{Fe}^{2+} = [\text{Ar}] 3d^6 4s^0$

1. $[\text{Fe(CN)}_6]^{4-}$ के लिए:
• $\text{CN}^-$ एक प्रबल क्षेत्र लिगैंड (Strong field ligand) है।
• यह $3d$ के 6 इलेक्ट्रॉनों का युग्मन (Pairing) करा देता है, जिससे दो भीतरी $3d$ कक्षक रिक्त हो जाते हैं।
• संकरण = $d^2sp^3$ (आंतरिक कक्षक अष्टफलकीय संकुल - Inner orbital octahedral complex)।
• अयुग्मित इलेक्ट्रॉन $n = 0$ $\implies$ यह प्रतिचुंबकीय (Diamagnetic) एवं निम्न चक्रण (Low spin) है।

2. $[\text{Fe(H}_2\text{O)}_6]^{2+}$ के लिए:
• $\text{H}_2\text{O}$ एक दुर्बल क्षेत्र लिगैंड (Weak field ligand) है।
• यह $3d$ इलेक्ट्रॉनों का युग्मन कराने में असमर्थ रहता है ($3d^6$ में 4 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन बने रहते हैं)।
• संकरण हेतु बाह्य $4d$ कक्षकों का उपयोग होता है: संकरण = $sp^3d^2$ (बाह्य कक्षक अष्टफलकीय संकुल - Outer orbital complex)।
• अयुग्मित इलेक्ट्रॉन $n = 4$ $\implies$ यह अनुचुंबकीय (Paramagnetic) एवं उच्च चक्रण (High spin) है।
चुंबकीय आघूर्ण $\mu = \sqrt{4(4+2)} = \sqrt{24} \approx 4.90\text{ BM}$।
Example 3
क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (CFT) के आधार पर अष्टफलकीय क्षेत्र में $d$-कक्षकों के विपाटन को स्वच्छ नामांकित आरेख द्वारा समझाइए तथा $\Delta_o$ एवं $P$ में संबंध के आधार पर उच्च चक्रण व निम्न चक्रण संकुलों को परिभाषित कीजिए।
Step-by-Step Solution:
1. अष्टफलकीय क्षेत्र में विपाटन:
मुक्त गैसीय धातु आयन में सभी पांचों $d$-कक्षक समान ऊर्जा के (समभ्रंश - degenerate) होते हैं। जब 6 लिगैंड अष्टफलकीय सममिति में अक्षों ($x, y, z$) के अनुदिश धातु की ओर बढ़ते हैं, तो अक्षीय कक्षक ($d_{x^2-y^2}, d_{z^2}$) लिगैंड के इलेक्ट्रॉन मेघ से अधिक प्रतिकर्षण अनुभव करते हैं, जिससे उनकी ऊर्जा बढ़ जाती है। इन्हें $e_g$ कक्षक कहते हैं।
इसके विपरीत, अक्षों के मध्य स्थित कक्षक ($d_{xy}, d_{yz}, d_{zx}$) कम प्रतिकर्षण अनुभव कर निम्न ऊर्जा स्तर पर चले जाते हैं। इन्हें $t_{2g}$ कक्षक कहते हैं।
दोनों स्तरों के ऊर्जा अंतर को अष्टफलकीय क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा $\Delta_o$ कहते हैं (जहाँ $e_g$ बेरीसेंटर से $+0.6\Delta_o$ ऊपर तथा $t_{2g}$ $-0.4\Delta_o$ नीचे होता है)।

2. उच्च चक्रण बनाम निम्न चक्रण संकुल:
• यदि $\Delta_o > P$ (प्रबल क्षेत्र लिगैंड): विपाटन ऊर्जा युग्मन ऊर्जा ($P$) से अधिक होती है, अतः चौथा इलेक्ट्रॉन $e_g$ में जाने के बजाय $t_{2g}$ में ही युग्मित हो जाता है ($t_{2g}^4 e_g^0$)। इसे निम्न चक्रण संकुल (Low Spin Complex) कहते हैं।
• यदि $\Delta_o < P$ (दुर्बल क्षेत्र लिगैंड): विपाटन ऊर्जा कम होने से चौथा इलेक्ट्रॉन हुंड के नियमानुसार उच्च $e_g$ कक्षक में प्रवेश करता है ($t_{2g}^3 e_g^1$)। इसे उच्च चक्रण संकुल (High Spin Complex) कहते हैं।
Example 4
उभयदंतुक लिगैंड (Ambidentate Ligand) एवं कीलेट लिगैंड (Chelating Ligand) की उदाहरण सहित परिभाषा दीजिए तथा 'कीलेट प्रभाव' का क्या महत्व है?
Step-by-Step Solution:
1. उभयदंतुक लिगैंड: वे एकदंतुक लिगैंड जिनमें दो भिन्न दाता परमाणु उपस्थित होते हैं, किंतु संकुल बनते समय एक बार में केवल एक ही दाता परमाणु केंद्रीय धातु आयन से उपसहसंयोजक बंध बनाता है।
उदाहरण:
• नाइट्रो समूह ($\text{NO}_2^-$): यदि नाइट्रोजन धातु से जुड़े तो $\text{M} \leftarrow \text{NO}_2$ (नाइट्रो), और यदि ऑक्सीजन जुड़े तो $\text{M} \leftarrow \text{ONO}$ (नाइट्राइटो)।
• थायोसायनेट समूह ($\text{SCN}^-$): धातु से सल्फर जुड़ने पर थायोसायनेटो तथा नाइट्रोजन जुड़ने पर आइसोथायोसायनेटो ($\text{NCS}^-$)। इनके कारण यौगिकों में 'बंधन समावयवता' (Linkage Isomerism) उत्पन्न होती है।

2. कीलेट लिगैंड एवं कीलेट प्रभाव: जब कोई द्विदंतुक या बहुदंतुक लिगैंड एक ही धातु आयन के साथ दो या अधिक दाता परमाणुओं द्वारा बंध बनाकर 5 या 6 सदस्यीय वलय (Ring) का निर्माण करता है, तो ऐसे लिगैंड को कीलेट लिगैंड (उदा. एथिलीनडाईऐमीन $\text{en}$, ऑक्सालेट आयन $\text{ox}^{2-}$) तथा निर्मित संकुल को कीलेट कहते हैं।
महत्व: कीलेट वलय निर्माण के कारण संकुल की एन्ट्रॉपी ($\Delta S$) में अत्यधिक वृद्धि होती है, जिससे कीलेट संकुल सामान्य एकदंतुक लिगैंड वाले संकुलों की तुलना में बहुत अधिक स्थायी होते हैं। इस अतिरिक्त स्थायित्व को कीलेट प्रभाव (Chelate Effect) कहते हैं।
Example 5
एक उपसहसंयोजन यौगिक $\text{CoCl}_3\cdot 5\text{NH}_3$ के जलीय विलयन में आधिक्य $\text{AgNO}_3$ मिलाने पर प्रति मोल संकुल 2 मोल $\text{AgCl}$ का अवक्षेप प्राप्त होता है। वर्नर सिद्धांत के आधार पर संकुल का संरचना सूत्र तथा IUPAC नाम लिखिए।
Step-by-Step Solution:
1. वर्नर सिद्धांत के आधार पर विश्लेषण:
• प्रति मोल संकुल से 2 मोल $\text{AgCl}$ अवक्षेपित होता है। इसका अर्थ है कि संकुल के आयनन मंडल (बाहरी क्षेत्र) में दो क्लोराइड आयन ($2\text{Cl}^-$) उपस्थित हैं जो प्राथमिक संयोजकता को संतुष्ट करते हैं और जल में आयनित होते हैं।
• यौगिक में कुल 3 क्लोराइड आयन हैं, अतः शेष 1 क्लोराइड आयन तथा सभी 5 अमोनिया अणु ($\text{NH}_3$) केंद्रीय धातु कोबाल्ट ($\text{Co}$) के साथ उपसहसंयोजन मंडल (आंतरिक क्षेत्र) के भीतर उपस्थित हैं जो द्वितीयक संयोजकता को संतुष्ट करते हैं।
• कोबाल्ट की उपसहसंयोजन संख्या $= 5 + 1 = 6$ (अष्टफलकीय)।

2. संरचना सूत्र:
$$\mathbf{[\text{Co(NH}_3)_5\text{Cl}]\text{Cl}_2}$$
3. IUPAC नाम:
• कोबाल्ट की ऑक्सीकरण अवस्था $= +3$
• पेंटाएम्मीनक्लोरिडोकोबाल्ट(III) क्लोराइड

Common Misconceptions & Examiner Traps

Common Misconception

मोहर लवण और पोटैशियम फेरोसाइनाइड दोनों को संकुल यौगिक मान लेना।

Scientific Reality & Correction

मोहर लवण एक द्विक लवण (Double salt) है जो जल में Fe2+, NH4+ व SO4(2-) में वियोजित हो जाता है, जबकि K4[Fe(CN)6] संकुल है जो [Fe(CN)6]4- आयन को पृथक नहीं होने देता।

Common Misconception

ऋणायनी संकुल में धातु के नाम में '-एट' प्रत्यय लगाना भूल जाना।

Scientific Reality & Correction

यदि संकुल आयन ऋणायनी है (उदा. K3[Al(C2O4)3]), तो धातु एल्युमिनेट (Aluminate) कहलाएगी, न कि केवल एल्युमिनियम।

Common Misconception

[Ni(CO)4] में निकल की ऑक्सीकरण अवस्था को +2 मान लेना।

Scientific Reality & Correction

CO एक उदासीन लिगैंड है, अतः [Ni(CO)4] में Ni की ऑक्सीकरण अवस्था शून्य (0) होती है।

Common Misconception

अष्टफलकीय CFT विपाटन में eg को निम्न ऊर्जा और t2g को उच्च ऊर्जा मान लेना।

Scientific Reality & Correction

अष्टफलकीय क्षेत्र में अक्षीय eg कक्षक अधिक प्रतिकर्षण के कारण उच्च ऊर्जा स्तर पर तथा t2g कक्षक निम्न ऊर्जा स्तर पर होते हैं।

Common Misconception

trans-[Co(en)2Cl2]+ को प्रकाशिक सक्रिय मानना।

Scientific Reality & Correction

trans रूप में सममिति तल (Plane of symmetry) उपस्थित होने के कारण यह प्रकाशिक अक्रिय (Achiral) होता है; केवल cis रूप प्रकाशिक सक्रिय होता है।

उपसहसंयोजन यौगिक: वर्नर सिद्धांत, लिगैंड, समावयवता एवं CFT विपाटन

उपसहसंयोजन यौगिक (Coordination Compounds): वर्नर, IUPAC, समावयवता व CFT1. वर्नर सिद्धांत व लिगैंडWerner & Ligands• प्राथमिक संयोजकता (Primary):आयननीय, ऑक्सीकरण अवस्था (---)• द्वितीयक संयोजकता (Secondary):अ-आयननीय, उपसहसंयोजन संख्या (—)• कीलेट लिगैंड (en, ox²⁻):वलय निर्माण, अतिरिक्त स्थायित्व• उभयदंतुक (NO₂⁻ / ONO⁻):दो दाता परमाणु, बंधन समावयवता• षट्दंतुक: EDTA⁴⁻ (6 दाता)2. समावयवता (Isomerism)Structural & Stereoisomerism• आयनन: [Co(NH₃)₅SO₄]Brव [Co(NH₃)₅Br]SO₄ (भिन्न आयन)• बंधन: [Co(NH₃)₅NO₂]²⁺ (पीला)व [Co(NH₃)₅ONO]²⁺ (लाल)• ज्यामितीय (Cis / Trans):cis-[Pt(NH₃)₂Cl₂] (सिस्प्लैटिन दवा)• प्रकाशिक (Optical - d & l):[Co(en)₃]³⁺ अनतिव्याप्य दर्पण प्रतिबिंबtrans-[Co(en)₂Cl₂]⁺ अक्रिय (सममित)3. क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (CFT)Crystal Field Splitting (Δₒ)• अष्टफलकीय विपाटन (Octahedral):उच्च ऊर्जा: eg (dx²-y², dz²) [+0.6Δₒ]निम्न ऊर्जा: t₂g (dxy, dyz, dzx) [-0.4Δₒ]• स्पेक्ट्रोकेमिकल श्रेणी:I⁻ < Cl⁻ < F⁻ < H₂O < NH₃ < en < CN⁻ < CO• प्रबल क्षेत्र (Δₒ > P):युग्मन होता है → निम्न चक्रण संकुल• चतुष्फलकीय विपाटन: Δt = 4/9 Δₒसदैव उच्च चक्रण (e निम्न, t₂ उच्च)उपसहसंयोजन यौगिक त्वरित परीक्षा कैप्सूल (Master Concept Summary)वर्नर संयोजकता:प्राथमिक = ऑक्सीकरण संख्या (आयननीय); द्वितीयक = उपसहसंयोजन संख्या (अ-आयननीय, दिशात्मक)।IUPAC व समावयवता:ऋणायनी संकुल में धातु + '-एट'; उभयदंतुक से बंधन समावयवता; cis-[Pt(NH₃)₂Cl₂] एंटीकैंसर दवा।CFT विपाटन व रंग:अष्टफलकीय में t₂g निम्न (-0.4Δₒ) व eg उच्च (+0.6Δₒ); Δₒ > P पर निम्न चक्रण; d-d संक्रमण से रंग।

Chapter Summary & 10 Key Takeaways

Takeaway 1
द्विक लवण जलीय विलयन में पूर्णतः आयनित हो जाते हैं, जबकि उपसहसंयोजन संकुल अपनी पहचान बनाए रखते हैं।
Takeaway 2
वर्नर सिद्धांत के अनुसार प्राथमिक संयोजकता आयननीय (ऑक्सीकरण संख्या) तथा द्वितीयक संयोजकता अ-आयननीय (उपसहसंयोजन संख्या) होती है।
Takeaway 3
लिगैंड लुईस क्षार होते हैं; द्विदंतुक/बहुदंतुक लिगैंड धातु के साथ वलय बनाकर 'कीलेट प्रभाव' द्वारा संकुल को अतिरिक्त स्थायित्व देते हैं।
Takeaway 4
उभयदंतुक लिगैंड (उदा. NO₂⁻, SCN⁻) में दो भिन्न दाता परमाणु होते हैं, जिससे 'बंधन समावयवता' (Linkage Isomerism) उत्पन्न होती है।
Takeaway 5
IUPAC नामकरण में धनायन पहले, लिगैंड वर्णानुक्रम में, तथा ऋणायनी संकुल में धातु के नाम के अंत में '-एट' लगाया जाता है।
Takeaway 6
संरचनात्मक समावयवता के अंतर्गत आयनन, जलयोजन, बंधन तथा उपसहसंयोजन समावयवता आती हैं।
Takeaway 7
cis-[Pt(NH₃)₂Cl₂] (सिस्प्लैटिन) एक प्रभावी एंटीकैंसर दवा है, जबकि trans रूप अक्रिय होता है।
Takeaway 8
[Co(en)₃]³⁺ तथा cis-[Co(en)₂Cl₂]⁺ कायरल होने के कारण प्रकाशिक सक्रिय होते हैं, जबकि trans रूप में सममिति तल होता है।
Takeaway 9
VBT के अनुसार प्रबल लिगैंड इलेक्ट्रॉनों का युग्मन कर d²sp³ (आंतरिक कक्षक) संकरण तथा दुर्बल लिगैंड sp³d² संकरण बनाते हैं।
Takeaway 10
CFT में अष्टफलकीय क्षेत्र में d-कक्षक t₂g (निम्न) तथा eg (उच्च) में विपाटित होते हैं; Δₒ > P होने पर निम्न चक्रण संकुल बनते हैं।

Check Your Understanding (Diagnostic Practice Questions)

Diagnostic questions testing core conceptual clarity. Answers are hidden initially — solve each problem first, then click to reveal the step-by-step verified solution.

1
द्विक लवण (Double Salt) एवं उपसहसंयोजन यौगिक (Coordination Compound) में दो मुख्य अंतर उदाहरण सहित समझाइए।
Reveal Answer & Explanation
Answer:
  1. द्विक लवण (उदा. मोहर लवण FeSO₄·(NH₄)₂SO₄·6H₂O) जल में घोलने पर अपने सभी संघटक आयनों (Fe²⁺, NH₄⁺, SO₄²⁻) में पूर्णतः वियोजित हो जाते हैं तथा अपने सभी आयनों का स्वतंत्र परीक्षण देते हैं। 2. उपसहसंयोजन यौगिक (उदा. K₄[Fe(CN)₆]) जल में घोलने पर संकुल आयन ([Fe(CN)₆]⁴⁻) के रूप में अपनी रासायनिक पहचान बनाए रखते हैं और Fe²⁺ अथवा CN⁻ आयनों में वियोजित नहीं होते, अतः ये इन आयनों का परीक्षण नहीं देते।

2
कीलेट लिगैंड (Chelate Ligand) किसे कहते हैं? कीलेट संकुल साधारण संकुलों से अधिक स्थायी क्यों होते हैं?
Reveal Answer & Explanation
Answer: जब कोई द्विदंतुक या बहुदंतुक लिगैंड (उदा. एथिलीनडाईऐमीन 'en', ऑक्सालेट ion) अपने दो या दो से अधिक दाता परमाणुओं द्वारा एक ही केंद्रीय धातु आयन से जुड़कर 5 या 6 सदस्यीय वलय (Ring) जैसी संरचना बनाता है, तो उसे कीलेट लिगैंड कहते हैं। वलय बनने के प्रक्रम में विलायक के कई अणु मुक्त होते हैं, जिससे निकाय की एन्ट्रॉपी (ΔS) में अत्यधिक धनात्मक वृद्धि होती है (गिब्स मुक्त ऊर्जा ΔG = ΔH - TΔS अधिक ऋणात्मक हो जाती है)। इस एन्ट्रॉपी-चालित प्रभाव (कीलेट प्रभाव) के कारण कीलेट संकुल एकदंतुक लिगैंडों वाले संकुलों की तुलना में बहुत अधिक स्थायी होते हैं।
3
संकुल आयन [Fe(CN)₆]³⁻ दुर्बल अनुचुंबकीय है जबकि [FeF₆]³⁻ प्रबल अनुचुंबकीय है। VBT के आधार पर कारण स्पष्ट कीजिए।
Reveal Answer & Explanation
Answer: दोनों संकुलों में केंद्रीय धातु Fe³⁺ है जिसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar] 3d⁵ है। CN⁻ एक प्रबल क्षेत्र लिगैंड है जो 3d के 5 इलेक्ट्रॉनों का युग्मन करा देता है, जिससे केवल 1 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन शेष बचता है (संकरण d²sp³), अतः यह दुर्बल अनुचुंबकीय (μ ≈ 1.73 BM) होता है। इसके विपरीत F⁻ एक दुर्बल क्षेत्र लिगैंड है जो 3d इलेक्ट्रॉनों का युग्मन कराने में असमर्थ रहता है, जिससे सभी 5 इलेक्ट्रॉन अयुग्मित रहते हैं (संकरण sp³d²), अतः यह प्रबल अनुचुंबकीय (μ ≈ 5.92 BM) होता है।
4
निम्नलिखित संकुलों में किस प्रकार की समावयवता पाई जाती है? प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए:
(i) [Co(NH₃)₅SO₄]Br एवं [Co(NH₃)₅Br]SO₄
(ii) [Co(NH₃)₅(NO₂)]Cl₂ एवं [Co(NH₃)₅(ONO)]Cl₂
Reveal Answer & Explanation
Answer: (i) [Co(NH₃)₅SO₄]Br एवं [Co(NH₃)₅Br]SO₄ में 'आयनन समावयवता' (Ionisation Isomerism) पाई जाती है, क्योंकि दोनों का अणुसूत्र समान है किंतु जलीय विलयन में पहला Br⁻ आयन तथा दूसरा SO₄²⁻ आयन मुक्त करता है। (ii) [Co(NH₃)₅(NO₂)]Cl₂ एवं [Co(NH₃)₅(ONO)]Cl₂ में 'बंधन समावयवता' (Linkage Isomerism) पाई जाती है, क्योंकि इनमें उभयदंतुक लिगैंड (NO₂⁻) एक रूप में नाइट्रोजन परमाणु से तथा दूसरे रूप में ऑक्सीजन परमाणु से धातु से बंधित है।
5
सिस्प्लैटिन (Cisplatin) का रासायनिक सूत्र, संरचना एवं चिकित्सा विज्ञान में इसका प्रमुख उपयोग लिखिए।
Reveal Answer & Explanation
Answer: सिस्प्लैटिन का रासायनिक सूत्र cis-[Pt(NH₃)₂Cl₂] है। इसका IUPAC नाम 'cis-डाईएम्मीनडाईक्लोरिडोप्लैटिनम(II)' है। इसकी ज्यामिति वर्ग समतलीय (Square planar) होती है जिसमें दोनों अमोनिया लिगैंड एक-दूसरे के निकटवर्ती (90°) तथा दोनों क्लोरिडो लिगैंड एक-दूसरे के निकटवर्ती होते हैं। चिकित्सा विज्ञान में उपयोग: सिस्प्लैटिन एक अत्यंत प्रभावी एवं जीवन रक्षक एंटीकैंसर (Antineoplastic / Chemotherapeutic) औषधि है, जिसका उपयोग विशेष रूप से वृषण कैंसर (Testicular cancer), डिम्बग्रंथि कैंसर (Ovarian cancer) तथा फेफड़ों के ट्यूमर के उपचार में कीमोथेरेपी के लिए किया जाता है।
Finished Studying This Chapter?
READY TO PRACTICE?

Timed CBT Practice Tests (Exam Simulator)

Put your concepts to the test with official curriculum-aligned Foundation and Advanced practice tests. Get instant accuracy scores, time metrics, and step-by-step verified explanations.