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NIOS • कक्षा X • Science & Technology (212) • अध्याय 22
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

जैव प्रक्रम-1: पोषण, वहन, श्वसन एवं उत्सर्जन (Life Processes - 1)

सजीवों और निर्जीवों के मध्य सबसे मूलभूत अंतर उनकी आंतरिक आणविक गतियों और जैविक निरंतरता का है। वे सभी प्रक्रम जो संयुक्त रूप से जीवों के अनुरक्षण (Maintenance), मरम्मत, वृद्धि और जीवन को बनाए रखने का कार्य करते हैं, उन्हें जैव प्रक्रम (Life Processes) कहा जाता है। किसी भी सजीव के अस्तित्व के लिए चार मूलभूत जैव प्रक्रम अनिवार्य हैं: (1) पोषण (Nutrition)—शरीर की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु भोजन ग्रहण करना, (2) श्वसन (Respiration)—कोशिका के स्तर पर भोजन (ग्लूकोज) का विखंडन कर जैव-रासायनिक ऊर्जा (ATP) प्राप्त करना, (3) वहन या परिसंचरण (Transportation)—पोषक तत्वों, ऑक्सीजन और उत्सर्जी पदार्थों को शरीर के एक भाग से दूसरे भाग तक पहुँचाना, तथा (4) उत्सर्जन (Excretion)—उपापचयी क्रियाओं में बने विषैले अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निष्कासित करना। पौधों में पोषण स्वपोषी (Autotrophic) होता है, जहाँ वे सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल की उपस्थिति में जल और कार्बन डाइऑक्साइड से प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) द्वारा अपने भोजन का निर्माण करते हैं तथा उप-उत्पाद के रूप में प्राणवायु ऑक्सीजन ($O_2$) छोड़ते हैं। इसके विपरीत, जंतु विषमपोषी (Heterotrophic) होते हैं। अमीबा में कूटपादों (Pseudopodia) द्वारा भोजन का अंतर्ग्रहण होता है, जबकि मनुष्य में एक अत्यधिक विकसित 9 मीटर लंबी आहार नाल (Alimentary Canal) होती है जिसमें मुख, आमाशय, यकृत, अग्न्याशय और क्षुद्रांत्र द्वारा पाचक एंजाइमों (एमाइलेज, पेप्सिन, ट्रिप्सिन, लाइपेस) की सहायता से भोजन का पाचन और विली (Villi) द्वारा अवशोषण होता है। श्वसन तंत्र में ग्लूकोज का विखंडन कोशिकाद्रव्य में पाइरूवेट में होता है, जो आगे ऑक्सीजन की उपलब्धता के आधार पर तीन भिन्न मार्गों (यीस्ट में किण्वन, पेशी में लैक्टिक अम्ल, तथा माइटोकॉन्ड्रिया में पूर्ण ऑक्सीकरण $\to$ 38 ATP) से गुजरता है। मनुष्य का चार कोष्ठों वाला पेशीय हृदय दोहरे परिसंचरण (Double Circulation) द्वारा ऑक्सीजनित और विऑक्सीजनित रुधिर को आपस में मिलने से रोकता है। पादपों में जल एवं खनिजों का संवहन जाइलम (Xylem) द्वारा तथा प्रकाश संश्लेषित भोज्य पदार्थों का स्थानांतरण फ्लोएम (Phloem) द्वारा होता है। अंततः वृक्क में स्थित लाखों निस्यंदक इकाइयाँ—नेफ्रॉन (वृक्काणु)—रक्त को छानकर यूरिया जैसे हानिकारक अपशिष्टों को मूत्र के रूप में निष्कासित करती हैं। झारखंड बोर्ड (NIOS Class 10) विज्ञान परीक्षा में यह अध्याय 8 से 10 अंकों का सर्वाधिक अंक भार रखने वाला जीवविज्ञान का सबसे प्रमुख अध्याय है। इसमें मानव हृदय का नामांकित चित्र व दोहरा परिसंचरण, नेफ्रॉन की संरचना व कार्यप्रणाली, प्रकाश संश्लेषण का रासायनिक समीकरण, वायवीय बनाम अवायवीय श्वसन, तथा जाइलम व फ्लोएम में अंतर पर प्रश्न निश्चित रूप से पूछे जाते हैं।

🫀 क्या आपने कभी सोचा है: जब आप गहरी नींद में सो रहे होते हैं, तब भी आपके शरीर में कौन-सी अदृश्य मोटर लगातार चालू रहती है?

जरा सोचिए: आप दिन भर काम करने के बाद थककर आंखें बंद कर देते हैं, आपकी आंखें बंद हो जाती हैं, हाथ-पैर आराम करते हैं और दिमाग शांत हो जाता है। लेकिन आपके शरीर के अंदर एक ऐसी अद्भुत पेशीय मोटर है जो आपके जन्म से लेकर मृत्यु तक एक सेकंड के लिए भी विश्राम योग्य नहीं है - वह है आपका मानव हृदय (मानव हृदय)!

24 घंटे में हमारी हृदय गति लगभग 1,00,000 (एक लाख) बार धड़कती है और प्रतिदिन लगभग 7,500 किलोलीटर रक्त पूरे शरीर में 1,00,000 किलोमीटर लंबी रक्त वाहिकाएँ पंप करती है - यह दूरी पूरी पृथ्वी के तेज़ चक्कर के बराबर है!

इतना ही नहीं, क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप दौड़ते हैं तो आपके प्लास्टर में अचानक भयानक 'ऐंठन' (ऐंठन) क्यों होती है? ऊँचे पेड़ों की 100 मीटर ऊँची गाड़ियों तक बिना किसी बिजली की मोटर का पानी कैसे पहुँचाया जाता है? और हमारे दोनों किडनी (गुर्दे) हर दिन 180 लीटर खून कैसे अच्छे होते हैं, जबकि हम केवल 1-2 लीटर ही मूत्र विसर्जित करते हैं? आओ, मानव शरीर और प्रकृति के इस विस्मयकारी जैविक तंत्र का अध्ययन करें!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

इस अध्याय का अध्ययन आपके लिए क्यों आवश्यक है?

  1. बोर्ड परीक्षा में अधिकतम अंक भार: NIOS कक्षा 10वीं बोर्ड परीक्षा में "मानव हृदय का सम्मिलित चित्र एवं डबल सर्कुलेशन", "नेफ्रॉन (वृक्षानु) की संरचना मूत्र निर्माण", "वायवीय एवं अवायवीय श्वसन में अंतर", और "जिलम तथा फ्लोएम में अंतर" पर 3 से 5 बजे तक के प्रश्न प्रमुख शत-प्रतिशत आते हैं।
  2. मेडिकल (एनईईटी) एवं मानव शरीर क्रिया विज्ञान (फिजियोलॉजी) का आधार: डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ बनने की दिशा में मानव शरीर रचना (एनाटॉमी) और जैविक विज्ञान की पहली विस्तृत समझ विकसित होती है।
  3. स्वास्थ्य, पोषण एवं नैतिकता की समझ:अस्थिर आहार, हृदय स्वास्थ्य, उच्च रक्तचाप (उच्च रक्तचाप), गुर्दे की विफलता (किडनी विफलता) और डायबीटीज जैसी गंभीर चिकित्सा की स्थिति।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • पादप एवं जंतु कोशिका की संरचना तथा कोशिकांगों (माइटोकॉन्ड्रिया, क्लोरोप्लास्ट, कोशिकाद्रव्य) के कार्य।
  • विसरण (प्रसार) एवं परासरण (ऑस्मोसिस) की भौतिक क्रियाविधि।
  • जैव-अणुओं (कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा) का प्राथमिक परिचय।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • स्वपोषी पोषण (प्रकाश संश्लेषण के चरण एवं रंध्रों की भूमिका) और विषमपोषी पोषण (अमीबा व मनुष्य) की व्याख्या कर सकेंगे।
  • मानव आहार नाल के विभिन्न अंगों, पाचक ग्रंथियों एवं उनके द्वारा स्रावित एंजाइमों की क्रियाविधि का सचित्र वर्णन कर सकेंगे।
  • ग्लूकोज विखंडन के तीन अलग-अलग परिपथों (वायवीय, अवायवीय, लैक्टिक एसिड) और माइटोकॉन्ड्रिया में एटीपी निर्माण का रेखाचित्र बनाया गया।
  • मानव हृदय की संरचना, कपाट (वाल्व) की भूमिका और गैंग सर्कुलेशन (डबल सर्कुलेशन) के महत्व को सिद्ध कर दिया गया है।
  • पादपों में जाइलम द्वारा जल परिवहन (वाष्पोत्सर्जन खिंचाव) एवं फ्लोएम द्वारा भोजन स्थानांतरण (ऊर्जा प्रयुक्त) की तुलना कर सकेंगे।
  • मानव वृक्क में नेफ्रॉन (वृक्काणु) द्वारा रक्त निस्यंदन, चयनात्मक पुनरावशोषण तथा कृत्रिम वृक्क (डायलिसिस) के सिद्धांत का विश्लेषण कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. पोषण: स्वपोषी (प्रकाश संश्लेषण)...
2 2. मानव पाचन तंत्र (मानव पाचन तंत्र...
3 3. श्वसन: ग्लूकोज के विखंडन के विभि...
4 4. वहन एवं परिसंचरण तंत्र: मानव हृद...
5 5. उत्सर्जन तंत्र: मानव नेफ्रॉन एवं...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. पोषण: स्वपोषी (प्रकाश संश्लेषण) एवं विषमपोषी पोषण

(के) स्वपोषी पोषण एवं प्रकाश संश्लेषण (प्रकाश संश्लेषण)

हरे उपचार सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग करके अकार्बनिक पदार्थ ($CO_2$ तथा $H_2O$) से ध्रुवीय भोज्य पदार्थ (ग्लूकोज) का चित्र बनाते हैं। इस कार्यक्रम को प्रकाश वृत्तांत कहते हैं:

$$6CO_2 + 12H_2O \xrightarrow[\text{सूर्य का प्रकाश}]{\text{क्लोरोफिल}} C_6H_{12}O_6 \text{ (ग्लूकोज)} + 6O_2↑ + 6H_2O$$

प्रकाश प्रवचन के तीन प्रमुख चरण:

  1. प्रकाश ऊर्जा का उद्देश्य: सूर्य के प्रकाश का अवलोकन सूर्य के प्रकाश का अवलोकन क्लोरोफिल सूर्य के प्रकाश का अवशोषण।
  2. ऊर्जा रूपांतरण एवं जल का प्राकृतिक अपघटन: प्रकाश ऊर्जा का रासायनिक ऊर्जा का रूपांतरण तथा जल ($H_2O$) के पेट्रोलियम का सौर ऊर्जा एवं ऑक्सीजन ($O_2$) विखंडन में।
  3. कार्बन प्लाज्मा का अपचयन: साधारण द्वारा $CO_2$ का अपचयन कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज) का निर्माण।

(ख) रंध्र (स्टोमेटा) एवं द्वारका (गार्ड कोशिकाएँ)

पट्टियों की सतह पर पाए जाने वाले सूक्ष्म छिद्रों को रंध्र कहते हैं, माध्यम से गैसों ($CO_2$ व $O_2$) का खनिज तथा वाष्पोत्सर्जन होता है। रंध्रों का खुलना और बंद होना द्वार नाखून (गार्ड सेल) की स्फीति (टर्गिडिटी) पर प्रतिबंध है:

  • जब द्वार सागर में जल प्रवेश करता है, तो वे फूल जाते हैं और रंध्र का छिद्र खुल जाता है.
  • जब द्वार नाविक से जल बाहर निकल जाता है, तो वे अभिनव दांत होते हैं और रंध्र का छिद्र बंद हो जाता है.

(जी) विषमपोषी पोषण: अमीबा में पोषण के पांचवें चरण

अमीबा एककोशिकीय जीवसम्भोजी जीव है। पोषण पाँचवें चरण में पूर्ण होता है:

  1. अंतरग्राह (अंतर्ग्रहण): अमीबा भोजन के कण के चारों ओर का भाग जैसे आकार प्रवर्ध—कूटपाद (स्यूडोपोडिया)—बनाकर उसे घेरता है और खाद्य रिक्तिका (खाद्य रिक्तिका) बनाता है।
  2. पाचन (पाचन): खाद्य पदार्थों में पाचक एंजाइम भोजन को सरल आहार में तोड़ते हैं।
  3. अवशोषण (अवशोषण): पचा हुआ भोजन सीधे तौर पर कीटनाशक द्रव्य में विसर्जित हो जाता है।
  4. स्वांगीकरण (एसिमिलेशन): भोजन का उपयोग वृद्धि और ऊर्जा प्राप्ति में होता है।
  5. बहिःक्षेपण (उत्सर्जन): अपाचा भोजन कोशिकाओं की सतह पर बाह्य त्वचा पर त्याग दिया जाता है।

2. मानव पाचन तंत्र (मानव पाचन तंत्र)

मानव में पाचन मुख से प्रारंभ में लगभग 9 मीटर लंबा आहार नाल में प्रोटीन होता है:

अंग / ग्रंथ श्रवित रस /एन्जेमिन कार्य एवं पाचन क्रिया विधि
मुख गुला (लार ग्रंथियाँ) लार एमाइलेज (टायलिन) भोजन को गंध करना और ड्रसा (जटिल मंड) को माल्टोज़ ग्लूकोज को तोड़ना।
आमाशय (जठर रस) 1. $HCl$
2. पेप्सिन
3. म्यूकस (म्यूकस)
• $HCl$: अम्लीय माध्यम तैयार होता है और बैक्टीरिया बैक्टीरिया को मारता है।
• पेप्सिन: अम्लीय माध्यम में प्रोटीन को सरल पेप्टोन में पचाता है।
• श्लेष्मा: अमाशय की आंतरिक दीवार को सांद्र $HCl$ से जलने से बचाता है।
यकृत (यकृत - शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि) पित्त रस (पित्त रस) (पित्तशय में संचित) 1. आमाशय से अम्लीय आहार को क्षारीयबनाना (ताकी अग्न्याशयी एंजाइम काम कर)।
2. इमल्सीफिकेशन (पायसीकरण): वसा की बड़ी-बड़ी गोलियाँ को छोटी-छोटी गोलियाँ में तोड़ना।
अग्न्याशय (अग्न्याशय) 1. ट्रिप्सिन
2. लाइपेसस
3. अग्न्याशयी एमाइलेज
• ट्रिप्सिन: आहार माध्यम में प्रोटीन का पाचन होता है।
• लैइपेस: इमल्सीफाइड वसा को वासा एमिल एवं ग्लिसरॉल में बदल रहा है।
क्षुद्रांत्र (छोटी आंत) आंत्र रस (आंतों का रस) पाचन का पूरा होना: कार्बोहाइड्रेट $\to$ ग्लूकोज, प्रोटीन $\to$ अमीनो एसिड, वसा $\to$ वसा अम्ल और ग्लिसरॉल।
💡 दीर्घरोम (विली) की संरचना एवं कार्य: क्षुद्रांत्र की आंतरिक संरचना पर विशाल सूक्ष्म सूक्ष्म आकृतियाँ जैसी होती हैं जिनमें दीर्घ्रोम या विली कहते हैं। इस सारांश का पृष्ठीय फिल्मांकन गोंद में कई पुष्ट उद्धरण हैं और इनमें रुधिर वेसेल्स का घना जाल होता है, जो पचे हुए भोजन को ग्रहण करके शरीर की प्रत्येक कोशिका तक पहुंचाते हैं।

3. श्वसन: ग्लूकोज के विखंडन के विभिन्न पथ एवं मानव श्वसन तंत्र

(के) ग्लूकोज विखंडन के तीन प्रमुख पथ (बोर्ड परीक्षा का अनिवार्य आण्विक)

कोशिका के अंदर 6-कार्बन वाले ग्लूकोज अन्टों का 3-कार्बन वाले पाइरूवेट (पाइरूवेट) में विखंडन होता है (ग्लाइको बस)। इसके बाद की परिस्थितियाँ अनुसार तीन अलग-अलग पथ होते हैं:

  1. ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में (किन्वन - यीस्ट में):
    पिरुवेट एथेनॉल, कार्बन डाइऑक्साइड और वॉल्यूम 2 एटीपी ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है: $$\text{पाइरूवेट} \xrightarrow{\text{ऑक्सीजन की अनुपस्थिति (यीस्ट)}} C_2H_5OH \text{ (एथेनॉल)} + CO_2 + \text{ऊर्जा (2 ATP)}$$
  2. ऑक्सीजन की कमी में (हमारी पारंपरिक तकनीक - अत्यधिक व्यायाम के समय):
    जब तेजी से दौड़ने पर मांसपेशियों में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, तो पिरूवेट 3-कार्बन वाले लैंटिक एसिड (लैक्टिक एसिड) में बदल जाता है: $$\text{पाइरूवेट} \xrightarrow{\text{ऑक्सीजन का अभाव (पेशी)}} \text{लैक्टिक अम्ल} + \text{ऊर्जा}$$ मांसपेशियों में ऐंठन (ऐंठन) का कारण: पेशी नल में इसी लैक्टिक एसिड के जमाव के कारण भयंकर दर्द और ऐंठन होती है।
  3. ऑक्सीजन की उपस्थिति में (वायवीय श्वसन - माइटोकॉन्ड्रिया में):
    ऑक्सीजन का उपयोग करके पीरूवेट पूर्णत: वि थोकता कार्बन डाइऑक्साइड, जल और प्रचुर मात्रा में 38 एटीपी ऊर्जा प्रदान करता है: $$\text{पाइरूवेट} \xrightarrow{\text{ऑक्सीजन की उपस्थिति (माइटोकॉन्ड्रिया)}} CO_2 + H_2O + \text{ऊर्जा (38 ATP)}$$

(ख) कूपिकाएँ (एल्वियोली) एवं गैसों का विनिमय

मानव फेफड़े के भीतरी श्वासनली सूक्ष्मदर्शी रेडियोधर्मी में विभाजित अंत में कारखाने जैसे लाखों संख्या में समाप्त होते हैं, जिनमें कुपिका (एल्वियोली) कहा जाता है:

  • कूप डॉक्टर की झोपड़ी बहुत ही आकर्षक होती है और रुधिर बेसिन के घने जाल से घिरी होती है।
  • दोनों यंग लॅन्ग की रसोई का विवरण उपलब्ध कराया जाता है, तो यह लगभग 80 वर्ग मीटर (एक टेनिस कोर्ट) का विशाल पृष्ठीय फिल्म प्रदर्शित करता है।
  • श्वसन वर्णक (हीमोग्लोबिन): मानव शरीर का आकार इतना विशाल है कि केवल ऑक्सीजन द्वारा दर्शन तक पहुंच संभव नहीं है (यदि विसर्जन पर मंजूरी होती है तो फेफड़े से पैर के आसंजन तक 3 वर्ष की छूट होती है!)। हमारे लाल रक्त सीरम (RBC) में हीमोग्लोबिन नामक श्वसन वर्णक होता है, ऑक्सीजन के प्रति उच्च बंधता होता है और वह फेफड़े से ऑक्सीजन को शरीर की संपूर्ण क्षमता तक गति गति से लाता है।

4. वहन एवं परिसंचरण तंत्र: मानव हृदय, रुधिर एवं पादप परिवहन

(क) मानव हृदय की संरचना एवं दोहरा परिसंचरण (Double Circulation)

मानव हृदय एक पेशीय अंग है जो हमारी बंद मुट्ठी के आकार का होता है। इसमें चार कोष्ठक (Chambers) होते हैं:

  • ऊपरी दो कोष्ठक: दायाँ अलिंद (Right Atrium) एवं बायाँ अलिंद (Left Atrium)।
  • निचले दो कोष्ठक: दायाँ निलय (Right Ventricle) एवं बायाँ निलय (Left Ventricle)।
  • निलय की पेशीय दीवारें अलिंद की तुलना में अधिक मोटी होती हैं क्योंकि निलय को पूरे शरीर में रक्त को उच्च दाब से पंप करना होता है।

दोहरा परिसंचरण (Double Circulation):
मानव शरीर में रक्त को एक चक्र पूर्ण करने के लिए हृदय से दो बार गुजरना पड़ता है:

  1. फुफ्फुसीय परिसंचरण (Pulmonary Circulation): शरीर से आया अशुद्ध ($CO_2$-युक्त) रक्त महाशिरा द्वारा दाएँ अलिंद में आता है $\to$ दाएँ निलय में जाता है $\to$ फुफ्फुस धमनी द्वारा फेफड़ों में ऑक्सीजनित होने जाता है।
  2. दैहिक परिसंचरण (Systemic Circulation): फेफड़ों से आया शुद्ध ($O_2$-युक्त) रक्त फुफ्फुस शिरा द्वारा बाएँ अलिंद में आता है $\to$ बाएँ निलय में जाता है $\to$ मुख्य धमनी (महाधमनी / Aorta) द्वारा पूरे शरीर के अंगों में पंप किया जाता है।

महत्व: यह दोहरा परिसंचरण ऑक्सीजनित और विऑक्सीजनित रुधिर को मिलने से पूरी तरह रोकता है, जिससे पक्षियों और स्तनधारियों को अपने शरीर का उच्च तापमान (37°C) स्थिर बनाए रखने हेतु अत्यधिक ऊर्जा प्राप्त होती है।

(ख) धमनी बनाम शिरा (Artery vs Vein)

तुलना का बिंदु धमनी (Artery) शिरा (Vein)
रुधिर प्रवाह की दिशाहृदय से शरीर के विभिन्न अंगों की ओर।शरीर के विभिन्न अंगों से वापस हृदय की ओर।
रुधिर की प्रकृतिशुद्ध (ऑक्सीजनित) रुधिर ले जाती हैं। (अपवाद: फुफ्फुस धमनी)।अशुद्ध (विऑक्सीजनित) रुधिर ले जाती हैं। (अपवाद: फुफ्फुस शिरा)।
भित्ति (दीवार)मोटी, अत्यधिक लचीली एवं पेशीय होती है।पतली एवं कम लचीली होती है।
कपाट (Valves)कपाट अनुपस्थित होते हैं (रक्त उच्च दाब से बहता है)।कपाट उपस्थित होते हैं (रक्त को उल्टी दिशा में बहने से रोकते हैं)।

(ग) पादपों में वहन: जाइलम बनाम फ्लोएम

  • जाइलम (Xylem): जड़ों द्वारा अवशोषित जल एवं खनिज लवणों का संवहन पत्तियों तक करता है। यह संवहन एकदिशीय (केवल ऊपर की ओर) होता है तथा यह वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (Transpiration Pull) के भौतिक बल द्वारा संपन्न होता है (इसमें ATP ऊर्जा खर्च नहीं होती)।
  • फ्लोएम (Phloem): पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण द्वारा बने भोजन (सुक्रोज) का पौधे के सभी संचय और वृद्धि अंगों तक संवहन करता है। इसे स्थानांतरण (Translocation) कहते हैं। यह द्विदिशीय (ऊपर और नीचे दोनों ओर) होता है तथा इसमें ATP ऊर्जा का सक्रिय उपयोग होता है।

5. उत्सर्जन तंत्र: मानव नेफ्रॉन एवं कृत्रिम वृक्क (डायलिसिस)

(क) मानव क्रिया तंत्र एवं नेफ्रोन (वृक्काणु) की सोलो

मानव कार्य तंत्र में एक जोड़ा मूत्रवाहिनी (मूत्रवाहिनी), एक मूत्राशय (मूत्र मूत्राशय) और एक मूत्रमार्ग (मूत्रमार्ग)होता है। प्रत्येक व्रिक में लगभग 10 से 12 लाख सूक्ष्म निस्यन्दन इकाइयाँ शामिल हैं जिनमें नेफ्रोन (वृक्षानु) कहते हैं।

नेफ्रोन में मूत्र निर्माण के तीन चरण:

  1. केशिकागुच्छ निस्यंदन (ग्लोमेरुलर निस्पंदन): रीनल ग्रंथि द्वारा लाया गया रक्त बोमन संपूत (बोमन कैप्सूल) में स्थित परत वाली परत वाली रक्त नलिकाओं के गुच्छे (केशिकागुच्छ) में उच्च दाब पर छनता है। ग्लूकोज, अमीनो एसिड, लवण और नमक और सोडियम क्लोराइड नेफ्रोन नालिका में मिलते हैं। (प्रतिदिन 180 लीटर प्राथमिक निस्यांद बनता है)।
  2. चयनात्मक पुनर्अवशोषण (चयनात्मक पुनर्अवशोषण): जब निस्यांद नेफ्रॉन की लंबी कुंडलित नालिका से प्राप्त होता है, तो शरीर के लिए उपयोगी पदार्थ-जैसे ग्लूकोज, अमीनो एसिड, आवश्यक लवण और जल की अधिकांश मात्रा-वापस केश रसायन द्वारा बनाई जा सकती है।
  3. नालिकाकार स्रावण एवं मूत्र निर्माण: अंत में केवल नमक, यूरिक एसिड, अतिरिक्त लवण और अतिरिक्त जल बचाता है, जो मूत्र (मूत्र) निकलता है। यह संग्रह नालिका से होता है जो मूत्रवाहिनी द्वारा मूत्राशय में एक साथ होता है और समय-समय पर विसर्जित होता है (प्रतिदिन लगभग 1.5 से 2 लीटर)।

(ख) कृत्रिम व्रिक (हीमोडायसिस - हेमोडायलिसिस)

जब किसी व्यक्ति के दोनों कमर दर्द, चोट या उच्च रक्तचाप के कारण काम करना बंद कर देते हैं, तो शरीर में भारी मात्रा में तापमान जमा होने लगता है जिससे मृत्यु हो सकती है। ऐसे समुद्र तट के रक्त को एक कृत्रिम मशीन द्वारा छाना जाता है जिसे हीमो डाया बस कहते हैं:

  • रोगी की ग्रंथि से रक्त स्राव उसे सेलोफेन की अर्धपारगम्य नल आकाशगंगा में प्रवाहित किया जाता है जो एकडायलाइजिंग द्रव्य (जिसका परासरण दाब रक्त के समान होता है उसमें कोई भी रासायनिक द्रव्य नहीं होता है) में डूबी होती हैं।
  • विसर्जन द्वारा सागर और विषैले अपशिष्ट डायलाइजिंग द्रव में ले जाया जाता है और शुद्ध रक्त को वापस मरीजों के शिरा में पंप कर दिया जाता है। (अंतर: इसमें पुनरावशोषण का चरण नहीं होता है).

महत्वपूर्ण रासायनिक सूत्र, अभिक्रियाएँ एवं समीकरण

प्रकाश संश्लेषण समीकरण
6CO₂ + 12H₂O —सूर्य प्रकाश/क्लोरोफिल→ C₆H₁₂O₆ + 6O₂↑ + 6H₂O
ग्लाइकोलिसिस (कोशिकाद्रव्य)
ग्लूकोज (6-कार्बन) → 2 पाइरूवेट (3-कार्बन) + 2 ATP ऊर्जा
अवायवीय श्वसन (किण्वन - यीस्ट)
पाइरूवेट —O₂ अनुपस्थिति→ 2C₂H₅OH (एथेनॉल) + 2CO₂ + 2 ATP
पेशी कोशिकाओं में अवायवीय श्वसन
पाइरूवेट —O₂ अभाव→ लैक्टिक अम्ल + 2 ATP (मांसपेशियों में ऐंठन)
वायवीय श्वसन (माइटोकॉन्ड्रिया)
पाइरूवेट + O₂ → 6CO₂ + 6H₂O + 38 ATP ऊर्जा
लार एमाइलेज अभिक्रिया
स्टार्च (मंड) —लार एमाइलेज / pH 6.8→ माल्टोज शर्करा
पेप्सिन प्रोटीन पाचन
प्रोटीन —पेप्सिन / अम्लीय HCl→ पेप्टोन + प्रोटीयोज
ट्रिप्सिन प्रोटीन पाचन
पेप्टोन —ट्रिप्सिन / क्षारीय पित्त रस→ पेप्टाइड्स एवं अमीनो अम्ल
लाइपेस वसा पाचन
इमल्सीकृत वसा —लाइपेस→ वसा अम्ल + ग्लिसरॉल
सामान्य रक्तचाप (बीपी) मान
120/80 mmHg (प्रकुंचन/अनुशिथिलन - सिस्टोलिक/डायस्टोलिक)
रक्तचाप मापक यंत्र
स्फाइग्मोमैनोमीटर (Sphygmomanometer)
वृक्कों में दैनिक प्राथमिक निस्यंद
180 लीटर / दिन (जिसमें से 99% पुनरावशोषित होकर 1.5 L मूत्र बनता है)

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1 (अति लघु उत्तरीय - 1 अंक): हमारे जैसे बहुकोशिकीय स्तर में ऑक्सीजन की आवश्यकता पूरी करने के लिए विसर्जन (प्रसार) क्यों चाहिए?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
बहुकोशिकीय पर्यावरण परत (मनुष्य की तरह) का शरीर अत्यंत विशाल और जटिल होता है और शरीर की सभी प्रजातियों के साथ सीधे संपर्क में नहीं होता है। विसर्जन एक अत्यंत मंदा भौतिक प्रक्रिया है। यदि हमारे शरीर में केवल ऑक्सीजन का संवहन होता है, तो फेफड़े से पैर के निर्धारण तक ऑक्सीजन का एक ऑक्सीजन ऑक्सीजन में लगभग 3 वर्ष का समय लग जाता है! मूल रूप से बहुकोशिकीय ऊर्जा में उच्च ऊर्जा आवश्यकताओं की गति के लिए एक विकसित श्वसन तंत्र (हीमोग्लोबिन) और दोहराव परिसंचरण तंत्र आवश्यक है।
उदाहरण 2
प्रश्न 2 (लघु उत्तरीय - 2 अंक): वायवीय और अवायवीय श्वसन में कोई दो प्रमुख अंतर लिखिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
वायवीय बनाम अवायवीय श्वसन:
  1. ऑक्सीजन की आवश्यकता: वायवीय श्वसन ऑक्सीजन की उपस्थिति माइटोकॉन्ड्रिया के अंदर होती है, जबकि अवायवीय श्वसन ऑक्सीजन की पूर्ण अनुपस्थिति में माइटोकॉन्ड्रिया में होता है।
  2. उत्पादन एवं ऊर्जा उत्पादन: वायवीय श्वसन में ग्लूकोज का पूर्ण सहायक उपकरण $CO_2$ एवं $H_2O$ निर्मित तथा भारी ऊर्जा (38 ATP) मुक्त है; जबकि अवायवीय श्वसन में एथेनॉल/$CO_2$ या लैक्टिक अम्ल बनता है और अत्यधिक कम ऊर्जा (मातृ 2 एटीपी) उत्पन्न होती है।
उदाहरण 3
प्रश्न 3 (लघु उत्तरीय - 3 अंक): भोजन के पाचन में लार (लार) और पित्त रस (पित्त रस) की क्या भूमिका है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
(1) लार की भूमिका:
मुंह में लार स्टेरॉयड द्वारा स्रावित लार में लार एमाइलेज (टायलिन) नामक एंजाइम होता है, जो भोजन के कॉम्प्लेक्स अघुलनशील शराब (मंड) को सरल माल्टोज़ ग्लूकोज में तोड़ देता है। साथ ही लार भोजन को छोटे भोजन में सहायता प्रदान करता है।
(2) पित्त रस की भूमिका:
जिगर द्वारा स्रावित पित्त रस में कोई पाचक एंजाइम नहीं होता, फिर भी यह पाचन के लिए दो अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य करता है:
  1. मध्यम को आहार बनाना: अमाशय से अत्याधिक अम्लीय भोजन को आहार बनाना है ताकि अग्न्याशयी एंजाइम (जैसे ट्रिप्सिन और लाइपेस) सक्रिय अभ्यास कार्य कर सहायक।
  2. वासा का इमल्सीकरण (इमल्सीफिकेशन): पित्त लवण वसा की बड़ी-बड़ी गोल इकाइयों को छोटे-छोटे गोल इकाइयों में बदल दिया जाता है, जिससे लिपेसे एंजाइम की मात्रा कई गुना बढ़ जाती है।
उदाहरण 4
प्रश्न 4 (दीर्घ उत्तरीय - 5 अंक): मानव हृदय में "दोहरा परिसंचरण" (डबल सर्कुलेशन) किसे कहते हैं? इसके दोनों चक्रों का नाम लिखा है और स्पष्ट किग कि स्तनधारी और पक्षी में यह क्यों आवश्यक है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
दोहरे परिक्रमा की परिभाषा:
मानव शरीर में रक्त के विभिन्न अंगों में एक बार पूर्ण चक्र के उपयोग के लिए हृदय से दो बारज़िला है। इस व्यवस्था को दोहरा परिसंचरण (डबल सर्कुलेशन) कहते हैं।
इसके दो प्रमुख चक्र:
  1. फुफ़ुसीय परिसंचरण (फुफ्फुसीय परिसंचरण):
    शरीर के सभी अंगों से लाया गया ऑक्सीजन ऑक्सीजन दाएं अलिंद में आता है $\to$ दाइयां निलय में प्रवेश करती है $\to$ दाइयां निलय इसे फुफ्यूस ग्रंथि के माध्यम से फेफड़ों में भेजा जाता है जहां से $CO_2$ बाहरी अंगों और रक्त ऑक्सीजन करता है है।
  2. दैहिक परिसंचरण (प्रणालीगत परिसंचरण):
    फेफड़े से आया शुद्ध (ऑक्सीजेनिट) रक्त फुफ्यूस शिरा हृदय के बाएं अलिंद में दिखता है $\to$ बाएँ निलय में जाता है $\to$ फेफड़ों से आया शुद्ध रक्त महाधमनी (महाधमनी) पूरे शरीर के अंगों द्वारा, और में पंप कर देता है.

स्तान स्ट्राट एवं बर्ड्स के लिए इसकी अनिवार्यता:
स्तनधारी (मनुष्य सहित) और पक्षी समतापी (गर्म रक्त वाले) जीव होते हैं। उनके बाहरी पर्यावरण के तापमान में बदलाव के बावजूद उनके शरीर का आंतरिक तापमान हमेशा स्थिर (मानव में 37°C) बना रहता है। इसके लिए उन्हें निरंतर भारी मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता है। डबल ऑक्सीजन सर्कुलेशनिट और ऑक्सीजेनिट रक्त को बैठक में पूरी तरह से मध्यस्थित किया जाता है, जिससे कोहरे को ज्यादातर मात्रा में शुद्ध ऑक्सीजन प्राप्त होता है और उच्च ऊर्जा उत्पादन संभव होता है।
उदाहरण 5
प्रश्न 5 (दीर्घ उत्तरीय - 5 अंक): नेफ्रॉन (वृक्काणु) की रचना तथा मूत्र निर्माण की कार्यविधि का सचित्र सविस्तार वर्णन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
नेफ्रोन की संरचना:
नेफ्रोन प्रत्येक व्रक्क की वातानुकूलित निस्यान्दन इकाई है। इसका मुख्य भाग निम्नलिखित हैं:
  • बोमन संपूत (बोमन कैप्सूल): कप के आकार की गुड़िया के दरवाजे वाली स्टॉल, जिसके अंदर रक्त केश शास्त्र का एक घना संबंध होता है जिसे केशिकागुच्छ (ग्लोमेरुलस) कहते हैं।
  • कुंडलित नलिका (ट्यूब्यूल): संपुट से आगे नलिकाकार भाग नक्षत्र है जो हेनले डीपीआरके (हेनले लूप) की रचनाएँ हुई हैं, जो कुंडलित नलिका में खुलता है।

नेफ्रोन में मूत्र निर्माण की प्रस्तुति:
  1. अतिसूक्ष्म निसंयंदन (ग्लोमेरुलर अल्ट्राफिल्ट्रेशन):
    रीनल कोशिका रसायन युक्त रक्त से केशिकागुच्छ में लाती है। यहां रक्त उच्च दाब पर क्लिक किया जाता है। रक्त शर्करा और प्रोटीन बड़े के कारण नहीं छन सीम, अणु जल, ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, सोडियम और लवण चंकर बोमन संपुट की गुला में चले जाते हैं। इसे प्राथमिक निस्यान्द कहते हैं।
  2. चयनात्मक पुनरावशोषण (चयनात्मक पुनर्अवशोषण):
    जैसे-प्राथमिक निस्यांद लंबी नलिका में आगे की वृद्धि होती है, नलिका के चारों ओर और लाल रक्त केशिकाएं उपयोगी पदार्थ-जैसे ग्लूकोज, अमीनो एसिड, उपयोगी लवण और जल की मात्रा-को पुनः निर्माण करके रक्त की मात्रा वापस मिलती हैं। जल का पुनरुत्पादन शरीर में उपलब्ध अतिरिक्त जल की मात्रा और संतृप्त होने वाले विलेय पर प्रतिबंध लगाता है।
  3. नालिकाकार स्रावण एवं मूत्र निर्माण:
    अंत में केवल पेट्रोलियम उत्पाद (यूरिया, यूरिक एसिड) और अतिरिक्त जल ही नलिका में शेष रह जाते हैं, जिन्हें मूत्र कहा जाता है। यह संग्रहित कणिकाओं से मूत्रवाहिनी द्वारा मूत्राशय में जमा होता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि प्रकाश संश्लेषण के दौरान निकलने वाली ऑक्सीजन कार्बन डाइऑक्साइड से आती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ये ग़लत है. प्रकाश वाद्ययंत्र में मुक्त होने वाली ऑक्सीजन गैस कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) से नहीं, बल्कि जल ($H_2O$) के प्रकाशिक अपघटन (फोटोलिसिस ऑफ वॉटर) से नष्ट हो गया है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

धमनी और शिरा के रक्त प्रकार को बिना अपवाद के रटना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सभी धमनियाँ शुद्ध रक्त ले जाती हैं, सिवाय फेफड़ों की धमनी (फुफ्फुसीय धमनी) के, जो फेफड़ों में रक्त रक्त ले जाती हैं। सभी शिराएं ऑक्सीजन युक्त रक्त ले जाती हैं, सिवाय फुफ्फुस शिरा (फुफ्फुसीय नस) के, जो फेफड़े से शुद्ध रक्त हृदय में लाती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

पित्त रस में एंजाइम उपस्थित होने का भ्रम।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पित्त रस (Bile Juice) में कोई भी पाचक एंजाइम नहीं होता! यह केवल आपके पित्त लवणों द्वारा वसा का यांत्रिक अवशोषण करता है और माध्यम को क्रियाशील बनाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

जाइलम और फ्लोएम दोनों को अक्रिय संवहन नलिका मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

जाइलम में जल का परिवहन मुख्य रूप से निर्जीव जहाजों द्वारा वैटोत्सर्जन से होता है, जो कि भौतिक बल से होता है (ऊर्जा व्यय नहीं होता); जबकि फ्लोएम में भोजन का सचिवालय सजीव चैलनी नल इंजीनियर द्वारा एटीपी एनर्जी का उपयोग करके सोया होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

श्वसन और श्वास लेना (सांस लेना) एक ही मानदंड है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

श्वास लेना केवल फेफड़ों द्वारा गैसों का भौतिक विनिमय (सांस इनसाइड-बाहर करना) है; जबकि श्वास (श्वसन) एक जटिल जैव-रसायनिक कार्यक्रम है जो कि शैवाल के माइटोकॉन्ड्रिया में ग्लूकोज को एटीपी ऊर्जा मुक्त करता है।

मानव पाचन, श्वसन एवं नेफ्रॉन मूत्र निर्माण चक्र

🧬 जैव प्रक्रम के चार आधार स्तंभ (Core Life Processes)

1. पोषण (Nutrition)

• स्वपोषी: प्रकाश संश्लेषण (ग्लूकोज निर्माण)
• विषमपोषी: आहार नाल में जटिल से सरल भोजन (एमाइलेज, पेप्सिन, ट्रिप्सिन, लाइपेस)

2. श्वसन (Respiration)

• कूपिकाओं (Alveoli) में गैस विनिमय
• हीमोग्लोबिन द्वारा O₂ वहन
• माइटोकॉन्ड्रिया में 38 ATP ऊर्जा

3. वहन (Circulation)

• 4-कोष्ठकीय मानव हृदय
• दोहरा परिसंचरण (फुफ्फुसीय + दैहिक)
• पादप: जाइलम (जल) + फ्लोएम (भोजन)

4. उत्सर्जन (Excretion)

• वृक्क में 10 लाख नेफ्रॉन (वृक्काणु)
• केशिकागुच्छ निस्यंदन + पुनरावशोषण
• यूरिया व अपशिष्टों का निष्कासन

⚡ ऊर्जा मुद्रा: सभी जैव प्रक्रमों की सार्वभौमिक ऊर्जा इकाई एटीपी (ATP - एडिनोसिन ट्राइफॉस्फेट) है।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. वे सभी प्रक्रम जो जीवों में अनुरक्षण व जीवन बनाए रखते हैं, जैव प्रक्रम (पोषण, श्वसन, वहन, उत्सर्जन) कहलाते हैं।
मुख्य बिंदु 2
  1. प्रकाश सर्किट में क्लोरोफिल सूर्य प्रकाश उपकरण कर जल का अपघटन और CO₂ का अपचयन कर ग्लूकोज़ बनाया जाता है।
मुख्य बिंदु 3
  1. रंध्रों का खुलना व बंद होना द्वार कोशिकाओं की स्फीति और जल प्रवेश पर निर्भर करता है।
मुख्य बिंदु 4
  1. आमाशय में पेप्सिन प्रोटीन पचाता है; यकृत का पित्त रस वसा का इमल्सीकरण करता है; अग्न्याशय का ट्रिप्सिन व लाइपेस भोजन पचाते हैं।
मुख्य बिंदु 5
  1. क्षुद्रांत्र की विली (दीर्घरोम) अवशोषण का क्षेत्रफल बढ़ाकर पचे भोजन को रक्त में मिलाती हैं।
मुख्य बिंदु 6
  1. ग्लूकोज का विखंडन: यीस्ट में एथेन (2 एटीपी), मस्की में लैक्टिक एसिड (एटीपी), और मायटोकॉन्ड्रिया में पूर्ण दहन (38 एटीपी) देता है।
मुख्य बिंदु 7
  1. फेफड़ों की कूपिकाएं गैस विनिमय का विशाल क्षेत्रफल (80 m²) देती हैं तथा हीमोग्लोबिन O₂ का प्रमुख वाहक है।
मुख्य बिंदु 8
  1. मानव हृदय में 4 कोष्ठ होते हैं; दोहरा परिसंचरण शुद्ध व अशुद्ध रक्त को अलग रखकर निरंतर उच्च ऊर्जा देता है।
मुख्य बिंदु 9
  1. जाइलम जल व खनिजों को ऊपर ले जाता है (वाष्पोत्सर्जन बल); फ्लोएम सुक्रोज को ऊर्जा प्रयुक्त कर सभी अंगों में स्थानांतरित करता है।
मुख्य बिंदु 10
  1. नेफ्रॉन (वृक्काणु) रक्त को छानकर यूरिया व विषैले अपशिष्टों को मूत्र के रूप में बाहर करता है (180 L प्राथमिक निस्यंद से 1.5 L मूत्र)।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
1. प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक चार मूलभूत घटकों के नाम लिखिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (1) सूर्य का प्रकाश, (2) क्लोरोफिल (पर्णहरित), (3) कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), और (4) जल (H₂O)।
2
2. आमाशय में हाइड्रोक्लोरिक एसिड (HCl) के दो प्रमुख कार्य क्या हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (1) यह पेप्सिन एंजाइम की सक्रियता के लिए अम्लीय माध्यम तैयार करता है, तथा (2) भोजन के साथ आए हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करता है।
3
3. अत्यधिक शारीरिक व्यायाम या दौड़ने के बाद मसालों में ऐंठन (ऐंठन) क्यों होती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: ऑक्सीजन की कमी के कारण पेशी कोशिकाओं में ग्लूकोज का अवायवीय विखंडन होकर लैक्टिक अम्ल बन जाता है; मांसपेशियों में लैक्टिक अम्ल के जमाव से ही ऐंठन होती है।
4
4. जाइलम और फ्लोएम में पदार्थों के परिवहन में क्या मूलभूत अंतर है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: जाइलम में जल एवं खनिजों का परिवहन केवल ऊपर की ओर (एकादिशीय) बिना ऊर्जा खर्च किए वाष्पोत्सर्जन से होता है; जबकि फ्लोएम में भोजन का परिवहन दिशाओं में (द्वितीय) एटीपी ऊर्जा का उपयोग होता है।
5
5. कृत्रिम वृक्क (हीमोडायलिसिस) किस सिद्धांत पर कार्य करता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: यह अर्धपारगम्य सेलोफेन नलिकाओं में रक्त के विसरण सिद्धांत पर कार्य करता है, जहाँ रक्त से यूरिया और विषैले नाइट्रोजनी अपशिष्ट डायलाइजिंग द्रव में चले जाते हैं और शुद्ध रक्त रोगी के शरीर में लौट जाता है।
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