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WBB • कक्षा 9 • Social Science • अध्याय 15
अनुमानित समय: 60 मिनट
प्रगति: अध्ययनरत

West Bengal

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 9 इतिहास एवं पर्यावरण के प्रथम अध्याय फ्रांसीसी क्रांति के कुछ पहलू (Some Aspects of the French Revolution - Topic ID: 2682) के संपूर्ण, प्रामाणिक और उच्च-स्तरीय अध्ययन सामग्री में आपका स्वागत है। यह अध्याय 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक और राजनीतिक कारणों तथा उसके युगांतरकारी वैश्विक प्रभावों का गहन और वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में फ्रांस की प्राचीन व्यवस्था (Ancien Régime) एक भयंकर संरचनात्मक संकट से जूझ रही थी। समाज तीन असमान एस्टेटों में विभाजित था, जहां मात्र दो प्रतिशत जनसंख्या वाले पादरी और कुलीन वर्ग देश की लगभग पैंतीस प्रतिशत उपजाऊ भूमि पर काबिज थे और सभी प्रत्यक्ष करों से पूरी तरह मुक्त थे, जबकि अट्ठानवे प्रतिशत जनसंख्या वाले तृतीय एस्टेट (बुर्जुआ, किसान और शहरी श्रमिक साँ-कुलोत्त) पर टाइल, टाइथ, विंग्तिएम, गैबेल और कोरवी जैसी बेगार का अमानवीय बोझ लाद दिया गया था। अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में फ्रांस की भागीदारी और वर्साय के शाही दरबार के अंधाधुंध अपव्यय ने राजकोष को पूरी तरह दिवालिया कर दिया और राष्ट्रीय ऋण दो अरब लिव्रे के पार पहुंच गया। तुर्गो, नेकर और कैलोन जैसे वित्त नियंत्रकों के कर सुधारों को स्वार्थी कुलीनों ने ठुकरा दिया, जिससे कुलीन विद्रोह (1787-88) भड़का। इसी पृष्ठभूमि में प्रबोधन काल के महान दार्शनिकों—मॉन्टेस्क्यू की शक्ति पृथक्करण की अवधारणा, वॉल्टेयर के धार्मिक पाखंड पर तीखे व्यंग्य, ज्यां-जैक्स रूसो की लोक संप्रभुता व सामान्य इच्छा का सिद्धांत, तथा दीदरो के विश्वकोश और फिजियोक्रेट्स के मुक्त व्यापार के विचारों ने शोषित जनता को क्रांति की वैचारिक मशाल थमाई। 5 मई 1789 को एक सौ पचहत्तर वर्षों बाद जब लुई सोलहवें ने एस्टेट्स जनरल की बैठक बुलाई, तो मतदान पद्धति के विवाद ने क्रांति को जन्म दिया। तृतीय एस्टेट ने 17 जून को नेशनल असेंबली की घोषणा की और 20 जून 1789 को ऐतिहासिक टेनिस कोर्ट की शपथ लेकर संविधान निर्माण का संकल्प लिया। 14 जुलाई 1789 को क्रुद्ध पेरिस की जनता द्वारा बास्तील दुर्ग का पतन निरंकुश राजशाही के अंत का प्रतीक बना। इसके बाद ग्रामीण क्षेत्रों में फैला महाभय (La Grande Peur), 4 अगस्त की रात्रि को सामंतवाद और सभी विशेषाधिकारों की ऐतिहासिक समाप्ति, 26 अगस्त 1789 को मानव एवं नागरिक अधिकारों की युगांतरकारी घोषणा, और 5-6 अक्टूबर को महिलाओं का वर्साय मार्च घटित हुआ। राष्ट्रीय संविधान सभा ने फ्रांस को 83 विभागों में पुनर्गठित किया, मीट्रिक प्रणाली लागू की, चर्च की संपत्ति का राष्ट्रीयकरण कर असाइनेट्स मुद्रा जारी की और 1790 में पादरियों का सिविल संविधान बनाया। 1791 के संविधान ने संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना की, किंतु इसमें मताधिकार को संपत्तिशाली सक्रिय नागरिकों तक सीमित रखकर निष्क्रिय नागरिकों व महिलाओं को वंचित रखा गया। 1792 में विदेशी युद्धों के भड़कने, तुइलेरी महल के पतन और सितंबर हत्याकांड के बाद 21 सितंबर 1792 को प्रथम फ्रांसीसी गणराज्य की घोषणा की गई और 21 जनवरी 1793 को देशद्रोह के आरोप में लुई सोलहवें को गिलोटिन पर मृत्युदंड दिया गया। 1793 से 1794 के बीच मैक्सिमिलियन रोबस्पियर के नेतृत्व में जैकोबिन दल ने लोक सुरक्षा समिति के माध्यम से आतंक का राज (Reign of Terror) स्थापित किया, जिसमें संदिग्धों के कानून और क्रांतिकारी ट्रिब्यूनल के जरिए हजारों लोगों को मौत के घाट उतारा गया, जब तक कि 9 थर्मिडोर (27 जुलाई 1794) को स्वयं रोबस्पियर का पतन नहीं हो गया। फ्रांसीसी क्रांति ने न केवल फ्रांस में सामंतवाद और दैवी राजतंत्र का खात्मा किया, बल्कि संपूर्ण मानव जाति को स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व (Liberté, Égalité, Fraternité) का अमर त्रयी आदर्श दिया, जिसने आधुनिक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्यों की मजबूत नींव रखी।

क्या आपने कभी सोचा है?

14 जुलाई 1789 की सुबह जब पेरिस की भूखी और आक्रोशित जनता ने बास्तील के दुर्भेद्य राजसी किले पर धावा बोलकर उसकी एक-एक ईंट उखाड़ फेंकी, तो यह केवल एक जेल का पतन नहीं था—बल्कि सदियों पुरानी सामंती निरंकुशता, सामाजिक विषमता और ईश्वरीय राजतंत्र की कब्र खुदने का ऐतिहासिक उद्घोष था। कैसे केवल 2% पादरियों और कुलीनों ने 98% शोषित फ्रांसीसी जनता को बेगार, भूख और दमनकारी करों में जकड़ रखा था, और कैसे मॉन्टेस्क्यू, वॉल्टेयर और रूसो के प्रबोधनकारी विचारों ने साधारण किसानों, दस्तकारों और बुर्जुआ वर्ग को 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व' के लिए जान की बाजी लगाने को प्रेरित किया?

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए फ्रांसीसी क्रांति के विभिन्न पहलुओं को समझना इसलिए अनिवार्य है क्योंकि 1789 की यह महाक्रांति केवल फ्रांस के इतिहास की एक घटना नहीं थी, बल्कि यह आधुनिक विश्व के जन्म का प्रस्थान बिंदु थी। आज हम जिस आधुनिक लोकतांत्रिक दुनिया में जीते हैं—जहां मौलिक अधिकार, कानून के समक्ष समानता, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, जन संप्रभुता और चुनी हुई सरकार की अवधारणाएं सर्वोपरि हैं—उन सभी का सर्वप्रथम व्यावहारिक उद्घोष इसी फ्रांसीसी क्रांति की कोख से हुआ था। इस अध्याय का अध्ययन विद्यार्थियों को यह सिखाता है कि जब कोई राजनीतिक सत्ता अत्यधिक निरंकुश हो जाती है, आर्थिक विषमताएं चरम पर पहुंच जाती हैं और शासक वर्ग आम जनता की बुनियादी जरूरतों (जैसे रोटी और आजीविका) की अनदेखी करता है, तो सामाजिक क्रांति अपरिहार्य हो जाती है। रूसो, मॉन्टेस्क्यू और वॉल्टेयर के विचार यह स्पष्ट करते हैं कि कलम और विचार तलवार और तोपों से अधिक शक्तिशाली होते हैं, और कैसे वैचारिक प्रबोधन अन्यायपूर्ण व्यवस्था की नींव हिला सकता है। इसके साथ ही, आतंक के राज और रोबस्पियर की तानाशाही का विश्लेषण विद्यार्थियों को यह गंभीर ऐतिहासिक सबक देता है कि क्रांति और राष्ट्रवाद के नाम पर जब कानून के शासन और मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रख दिया जाता है, तो स्वतंत्रता स्वयं अपने ही बच्चों को निगलने लगती है। भारत के संदर्भ में भी, टीपू सुल्तान से लेकर राजा राममोहन राय तक, हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के कर्णधारों ने फ्रांसीसी क्रांति के स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों से गहरी प्रेरणा प्राप्त की थी। अतः यह अध्याय इतिहास के विद्यार्थियों में आलोचनात्मक ऐतिहासिक चेतना, लोकतांत्रिक निष्ठा और नागरिक अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता का निर्माण करने का आधार स्तंभ है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • 18वीं शताब्दी के यूरोपीय सामंतवाद, निरंकुश राजतंत्रों (Divine Right of Kings) तथा कैथोलिक चर्च के सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव की बुनियादी समझ।
  • यूरोप में प्रबोधन काल (Age of Enlightenment) और वैज्ञानिक तर्कवाद के उदय की रूपरेखा, जिसने अंधविश्वास, असहिष्णुता और मध्यकालीन रूढ़ियों को चुनौती दी।
  • वाणिज्यिक क्रांति, नए मध्यम वर्ग (बुर्जुआ) का आर्थिक उत्थान तथा अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम (1776) में फ्रांस की भागीदारी और उसके वित्तीय प्रभावों की सामान्य जानकारी।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • प्राचीन व्यवस्था (Ancien Régime) के तहत फ्रांसीसी समाज के तीन एस्टेटों (प्रथम: पादरी, द्वितीय: कुलीन, तृतीय: बुर्जुआ, किसान व मजदूर) के बीच मौजूद सामाजिक-आर्थिक विषमताओं और कर-विशेषाधिकारों का वैज्ञानिक विश्लेषण करना।
  • फ्रांस के वित्तीय दिवालियापन के कारणों (युद्ध ऋण, वर्साय का विलास, त्रुटिपूर्ण कर-प्रणाली: टाइल, टाइथ, गैबेल, कोरवी) और कुलीनों द्वारा वित्तीय सुधारों के विरोध (कुलीन विद्रोह 1787-88) को स्पष्ट करना।
  • प्रबोधनकालीन दार्शनिकों—मॉन्टेस्क्यू (शक्ति पृथक्करण), वॉल्टेयर (चर्च-विरोधी तर्कवाद) और रूसो (सामान्य इच्छा व लोक संप्रभुता) तथा विश्वकोशकारों और फिजियोक्रेट्स के वैचारिक योगदान का मूल्यांकन करना।
  • 1789 के युगांतरकारी घटनाक्रमों—एस्टेट्स जनरल की बैठक, टेनिस कोर्ट की शपथ, बास्तील का पतन (14 जुलाई), महाभय (La Grande Peur), 4 अगस्त को सामंतवाद की समाप्ति और मानव एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा (26 अगस्त) के कारणों व प्रभावों को क्रमबद्ध समझाना।
  • राष्ट्रीय संविधान सभा के सुधारों, पादरियों के सिविल संविधान (1790) तथा 1791 के संविधान में 'सक्रिय' और 'निष्क्रिय' नागरिकों के विभाजन और वारेन के पलायन (Flight to Varennes) के राजनीतिक निहितार्थों की समीक्षा करना।
  • प्रथम फ्रांसीसी गणराज्य की स्थापना (1792), लुई सोलहवें को मृत्युदंड, गिरोंदिस्ट-जैकोबिन संघर्ष, मैक्सिमिलियन रोबस्पियर के नेतृत्व में 'आतंक के राज' (Reign of Terror 1793-94) की नीतियों तथा विश्व इतिहास पर 'स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व' के स्थायी प्रभाव को रेखांकित करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 मॉड्यूल 1: प्राचीन व्यवस्था (Ancien...
2 मॉड्यूल 2: दिवालिया राजतंत्र, वित्त...
3 मॉड्यूल 3: बौद्धिक जागरण: प्रबोधनका...
4 मॉड्यूल 4: 1789 का क्रांतिकारी विस्...
5 मॉड्यूल 5: राष्ट्रीय संविधान सभा के...
6 मॉड्यूल 6: उग्र गणतंत्र, आतंक का रा...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

मॉड्यूल 1: प्राचीन व्यवस्था (Ancien Régime) और त्रि-स्तरीय सामाजिक विषमता

1.1 प्राचीन व्यवस्था (Ancien Régime) का ऐतिहासिक स्वरूप

1789 ईस्वी से पूर्व फ्रांस की संपूर्ण सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था को 'प्राचीन व्यवस्था' (Ancien Régime) कहा जाता है। यह व्यवस्था विशेषाधिकारों, सामंती शोषण और निरंकुश राजतंत्र पर आधारित थी। इस समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि शासन, धर्म और सेना के शीर्ष पदों पर आसीन अल्पसंख्यक वर्ग सभी अधिकारों का उपभोग करता था, जबकि उत्पादन करने वाला और करों का बोझ उठाने वाला बहुसंख्यक वर्ग मानवीय गरिमा से भी वंचित था।

फ्रांसीसी समाज कानूनी तौर पर तीन वर्गों या 'एस्टेट्स' (Three Estates) में बंटा हुआ था:

1.2 प्रथम एस्टेट: पादरी वर्ग (Clergy)

कैथोलिक चर्च का फ्रांस में असाधारण प्रभाव था। देश की कुल 2.5 करोड़ आबादी में पादरियों की संख्या लगभग 1,30,000 (लगभग 0.5%) थी।

  • भूमि व धन-संपत्ति: चर्च फ्रांस की लगभग 10% उपजाऊ कृषि भूमि का स्वामी था। चर्च के अपने विशाल मठ, महल और अपार जागीरें थीं।
  • धार्मिक कर (टाइथ / Tithe): चर्च को किसानों से उनकी कृषि उपज का दसवां भाग (लगभग 8% से 10%) धार्मिक कर के रूप में वसूलने का विशेषाधिकार प्राप्त था, जिसे 'टाइथ' कहा जाता था।
  • कर-मुक्ति: चर्च राज्य को कोई प्रत्यक्ष कर नहीं देता था। वह अपनी मर्जी से केवल राजा को एक नगण्य 'स्वैच्छिक उपहार' (Don Gratuit) भेंट करता था।
  • आंतरिक विभाजन (उच्च बनाम निम्न पादरी):
    • उच्च पादरी (Higher Clergy): आर्चबिशप, बिशप और मठाधीश, जो कुलीन परिवारों से आते थे। वे वर्साय के राजदरबार में विलासितापूर्ण जीवन जीते थे और धार्मिक कर्तव्यों की पूरी उपेक्षा करते थे।
    • निम्न पादरी (Lower Clergy / क्योर - Curés): लगभग 50,000 ग्रामीण पुरोहित। वे अत्यंत साधारण व निर्धन जीवन जीते थे। वे किसानों के दुख-दर्द से गहराई से जुड़े थे, इसलिए क्रांति के समय उन्होंने तीसरे एस्टेट का खुलकर समर्थन किया।
1.3 द्वितीय एस्टेट: कुलीन वर्ग (Nobility)

द्वितीय एस्टेट में सामंत और रईस शामिल थे, जिनकी संख्या लगभग 3,50,000 (लगभग 1.5%) थी।

  • भूमि पर आधिपत्य: कुलीन वर्ग के पास फ्रांस की 20% से 25% भूमि थी।
  • पदों पर एकाधिकार: सेना के सभी उच्च अधिकारी पद, प्रांतीय सूबेदारी, न्यायिक पद और राजदरबार के सम्माननीय पद केवल कुलीनों के लिए आरक्षित थे।
  • सामंती विशेषाधिकार: कुलीन वर्ग राज्य के सभी प्रत्यक्ष करों (जैसे टाइल) से पूर्णतः मुक्त था। इसके अतिरिक्त वे किसानों से सामंती कर, टोल टैक्स (मार्ग कर) और शिकार के विशेष अधिकार वसूलते थे।
  • कुलीनों के दो प्रमुख वर्ग:
    • तलवार के कुलीन (Nobles of the Sword / Nobles d'Épée): प्राचीन वंशानुगत सामंत, जो अपनी वंशावली और सैन्य परंपरा पर गर्व करते थे। वे वर्साय के दरबार में रहते थे।
    • पोशाक के कुलीन (Nobles of the Robe / Nobles de Robe): अमीर बुर्जुआ, जिन्होंने राजा से प्रशासनिक या न्यायिक पद (जैसे पार्लमां के न्यायाधीश पद) खरीदकर कुलीनता का दर्जा हासिल किया था। वे पुराने कुलीनों की तुलना में अधिक रूढ़िवादी और विशेषाधिकारों के रक्षक थे।
1.4 तृतीय एस्टेट (Third Estate): 98% शोषित जनता

फ्रांस की शेष 98% जनसंख्या (लगभग 2.5 करोड़ लोग) तृतीय एस्टेट में शामिल थी। यह वर्ग आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यधिक विषम था:

  1. बुर्जुआ वर्ग (Bourgeoisie - मध्यम वर्ग): इसमें बड़े व्यापारी, साहूकार, उद्योगपति, जहाज मालिक, वकील, डॉक्टर, प्रोफेसर, लेखक और सरकारी कर्मचारी शामिल थे। वे शिक्षित, विचारवान और आर्थिक रूप से संपन्न थे। फ्रांस के व्यापार और धन के निर्माता होने के बावजूद उन्हें कोई राजनीतिक अधिकार या सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं थी। उच्च पदों पर केवल कुलीनों का कब्जा था। इस अपमान और उपेक्षा ने बुर्जुआ वर्ग को क्रांति का बौद्धिक और संगठनात्मक नेता बना दिया।
  2. किसान वर्ग (Peasantry): फ्रांस की कुल आबादी का लगभग 80% भाग किसान थे। यद्यपि अधिकांश किसान कानूनी रूप से स्वतंत्र थे, फिर भी वे सामंती बंधनों में जकड़े हुए थे:
    • कोरवी (Corvée): बिना मजदूरी के सड़कों और शाही महलों के निर्माण के लिए किया जाने वाला अनिवार्य बेगार श्रम।
    • बनालिते (Banalités): सामंत की चक्की में आटा पीसने, उसके तंदूर में रोटी पकाने और उसके कोल्हू में अंगूर पेरने के लिए दिया जाने वाला अनिवार्य शुल्क।
    • चंपार्ट (Champart) व सेंसीव (Censive): सामंत को दी जाने वाली नकद व जिंस लगान। अपनी कुल आय का 70% से 80% भाग किसान राजा, चर्च और सामंत को करों के रूप में चुका देते थे।
  3. शहरी दस्तकार, शिल्पी और मजदूर (साँ-कुलोत्त - Sans-culottes): पेरिस और अन्य नगरों में रहने वाले बढ़ई, मोची, लोहार, दिहाड़ी मजदूर और घरेलू नौकर। ये लोग महंगाई, ब्रेड (रोटी) की कमी और भुखमरी से सबसे ज्यादा त्रस्त थे। इन्हें 'साँ-कुलोत्त' (बिना घुटने वाली पैंट पहनने वाले) कहा जाता था, जो क्रांति के सबसे उग्र सिपाही बने।
एस्टेट (सामाजिक वर्ग) जनसंख्या प्रतिशत भूमि स्वामित्व प्रमुख विशेषाधिकार कर दायित्व
प्रथम एस्टेट (पादरी - Clergy) लगभग 0.5% (1,30,000) 10% उपजाऊ भूमि किसानों से 'टाइथ' कर वसूली, स्वतंत्र न्यायालय, सेंसरशिप अधिकार सभी प्रत्यक्ष करों से पूर्ण मुक्त (केवल स्वैच्छिक उपहार)
द्वितीय एस्टेट (कुलीन - Nobility) लगभग 1.5% (3,50,000) 20% - 25% भूमि सेना व प्रशासन के शीर्ष पदों पर एकाधिकार, सामंती कर, शिकार का अधिकार टाइल जैसे मुख्य राज्य करों से मुक्त
तृतीय एस्टेट (Third Estate) 98% (लगभग 2.5 करोड़) 65% - 70% (विखंडित) शून्य विशेषाधिकार; राजनीतिक शक्ति और सामाजिक सम्मान से पूर्ण वंचित राज्य, चर्च और सामंतों के समस्त प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष करों का 100% भार
समकालीन लोकप्रिय कहावत:

"पादरी प्रार्थना करते हैं, कुलीन युद्ध करते हैं, और तृतीय एस्टेट इन दोनों का खर्च चलाने के लिए कर चुकाता है।" (The clergy pray, the nobles fight, the third estate pays for all.) यह कहावत प्राचीन व्यवस्था की क्रूर सच्चाई को उजागर करती है।

मॉड्यूल 2: दिवालिया राजतंत्र, वित्तीय संकट और दमनकारी कर व्यवस्था

2.1 युद्ध व्यय और असह्य राष्ट्रीय ऋण

18वीं शताब्दी में फ्रांस का राजकोष निरंतर युद्धों के कारण खोखला हो चुका था:

  • लुई चौदहवें व पंद्रहवें के युद्ध: स्पेनिश उत्तराधिकार युद्ध, ऑस्ट्रियाई उत्तराधिकार युद्ध और विशेषकर सप्तवर्षीय युद्ध (Seven Years' War 1756–1763) ने फ्रांस को भारी कर्ज में डुबो दिया। इस युद्ध में फ्रांस ने भारत और उत्तरी अमेरिका में अपने समृद्ध उपनिवेश ब्रिटेन के हाथों गंवा दिए।
  • अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम (1775–1783): ब्रिटेन से बदला लेने के लिए लुई सोलहवें ने अमेरिकी उपनिवेशों को भारी सैन्य व आर्थिक सहायता दी। जनरल लफायेत के नेतृत्व में फ्रांसीसी सेना अमेरिका भेजी गई। इस युद्ध ने फ्रांस पर 1 अरब से अधिक लिव्रे (Livre - फ्रांसीसी मुद्रा) का नया ऋण लाद दिया।
  • कुल ऋण और ब्याज का संकट: 1789 तक फ्रांस का कुल राष्ट्रीय ऋण 2 अरब लिव्रे से भी अधिक हो चुका था। राज्य के वार्षिक बजट का लगभग 50% भाग केवल पिछले ऋणों का ब्याज चुकाने में खर्च हो रहा था। नया कर्ज देने से साहूकारों ने इनकार कर दिया था।
2.2 वर्साय के राजदरबार का अंधाधुंध अपव्यय

पेरिस से 12 मील दूर स्थित वर्साय का राजमहल (Palace of Versailles) विलासिता और अपव्यय का केंद्र था। दरबार में 15,000 से अधिक दरबारी, रानियों के नौकर और अनुत्पादक कर्मचारी रहते थे, जिन पर राष्ट्रीय राजस्व का 6% से 10% भाग पानी की तरह बहाया जाता था। ऑस्ट्रियाई राजकुमारी और लुई सोलहवें की रानी मैरी एंटोइनेट (Marie Antoinette) अपने अत्यधिक खर्चीले स्वभाव, जुए और महलों के निर्माण के कारण जनता में 'मैडम डेफिसिट' (Madam Deficit / घाटे की रानी) के नाम से कुख्यात थीं।

2.3 दमनकारी कर व्यवस्था (Taxation System)

फ्रांस की कर-प्रणाली अत्यंत अन्यायपूर्ण, दोषपूर्ण और अव्यवस्थित थी। अमीर वर्ग करों से मुक्त था और निर्धन वर्ग से जबरन कर वसूले जाते थे:

कर का नाम कर का प्रकार किससे वसूला जाता था कर का विवरण एवं प्रभाव
टाइल (Taille) प्रत्यक्ष कर (Direct Tax) केवल तृतीय एस्टेट (विशेषकर किसान) प्रमुख भूमि कर। पादरी और कुलीन इससे पूर्णतः मुक्त थे। सरकार अपनी मर्जी से इसे बढ़ा देती थी।
कैपिटेशियन (Capitation) प्रत्यक्ष कर प्रति व्यक्ति कर सिद्धांत रूप में सभी पर लागू, किंतु कुलीन और पादरी नाममात्र देकर बच निकलते थे, भार गरीबों पर पड़ा।
विंग्तिएम (Vingtième) प्रत्यक्ष कर आय का 1/20वां भाग (5% आयकर) युद्ध काल में लगाया गया संपत्ति कर। कुलीनों ने इसे चुकाने से हमेशा इनकार किया।
गैबेल (Gabelle) अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax) नमक पर अनिवार्य कर 8 वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक व्यक्ति के लिए सरकार से निर्धारित मात्रा में महंगा नमक खरीदना कानूनन बाध्यकारी था। नमक तस्करी पर मौत की सजा दी जाती थी।
एड्स (Aides) व त्रेट (Traites) अप्रत्यक्ष कर मदिरा व आंतरिक चुंगी कर एड्स मदिरा की बिक्री पर कर था; त्रेट फ्रांस के विभिन्न प्रांतों के बीच माल ले जाने पर लगने वाला चुंगी शुल्क था, जिससे व्यापार अवरुद्ध होता था।
2.4 कर वसूली ठेकेदारों द्वारा (Ferme Générale)

फ्रांस में अप्रत्यक्ष करों की वसूली सरकार स्वयं नहीं करती थी, बल्कि निजी ठेकेदारों की संस्था 'फार्मे जेनराले' (Ferme Générale / Tax Farmers) को नीलाम कर दी जाती थी। ये ठेकेदार राजा को एकमुश्त राशि देकर जनता से क्रूरतापूर्वक मनमाना कर वसूलते थे और अपना खजाना भरते थे। जनता में इनके प्रति अगाध घृणा थी।

2.5 वित्तीय सुधारों की विफलता और कुलीन विद्रोह (1787–1788)

दिवालियापन से बचने के लिए लुई सोलहवें ने कई योग्य वित्त मंत्रियों को नियुक्त किया:

  1. तुर्गो (Turgot, 1774–1776): फिजियोक्रेट अर्थशास्त्री। उन्होंने सरकारी खर्च घटाने, अनाज के मुक्त व्यापार और सामंतों व पादरियों पर भी भूमि कर लगाने का प्रस्ताव रखा। कुलीनों और रानी के दबाव में राजा ने उन्हें बर्खास्त कर दिया। तुर्गो ने राजा को चेतावनी दी थी: "महामहिम, याद रखें कि दुर्बलता ने ही चार्ल्स प्रथम का सिर कटवाया था!"
  2. जाक नेकर (Jacques Necker, 1776–1781): स्विस बैंकर। उन्होंने 1781 में पहली बार फ्रांस का राष्ट्रीय बजट 'कॉम्पते रेंडू' (Compte Rendu au Roi) सार्वजनिक कर दिया, जिससे दरबार के अपव्यय की पोल खुल गई। उन्हें भी हटा दिया गया।
  3. कैलोन (Calonne, 1783–1787): कैलोन ने महसूस किया कि बिना विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों पर कर लगाए देश नहीं बच सकता। उन्होंने 1787 में 'संभ्रांतों की सभा' (Assembly of Notables) बुलाई और सभी वर्गों पर समान सार्वभौमिक भूमि कर का प्रस्ताव रखा। कुलीनों ने इसे मानने से साफ इनकार कर दिया।
  4. कुलीन विद्रोह (Aristocratic Revolt): जब ब्रिएन (Brienne) ने पेरिस की 'पार्लमां' (सर्वोच्च सामंती अदालत) में कर अध्यादेश पंजीकृत कराना चाहा, तो पार्लमां ने इनकार कर दिया और दावा किया कि 'केवल एस्टेट्स जनरल (Estates-General) ही नए कर स्वीकृत कर सकती है।' कुलीनों के इस हठ ने अनजाने में क्रांति का द्वार खोल दिया और राजा को 175 वर्षों से बंद पड़ी एस्टेट्स जनरल की बैठक बुलाने पर विवश कर दिया।

मॉड्यूल 3: बौद्धिक जागरण: प्रबोधनकालीन दार्शनिकों एवं विचारकों का क्रांतिकारी योगदान

3.1 प्रबोधन काल (Age of Enlightenment) और बौद्धिक पृष्ठभूमि

18वीं शताब्दी को यूरोप में 'प्रबोधन काल' या 'ज्ञानोदय' (Age of Enlightenment) कहा जाता है। इस काल के विचारकों ने आस्था और अंधविश्वास के स्थान पर वैज्ञानिक तर्कवाद (Rationalism), मानवीय स्वतंत्रता और समानता को सर्वोच्च मूल्य माना। फ्रांस इस बौद्धिक आंदोलन का केंद्र था। इन दार्शनिकों ने प्राचीन व्यवस्था की सड़ी-गली नींव पर इतने तीखे वैचारिक प्रहार किए कि निरंकुश राजतंत्र और चर्च का नैतिक आधार ढह गया।

3.2 बैरन द मॉन्टेस्क्यू (Montesquieu, 1689–1755)

मॉन्टेस्क्यू बोर्दो पार्लमां के अध्यक्ष और उच्च कुलीन परिवार के कानूनविद थे:

  • 'द स्पिरिट ऑफ द लॉज' (The Spirit of the Laws - 1748): यह उनकी कालजयी कृति थी। इसमें उन्होंने राजा के 'दैवी अधिकार के सिद्धांत' (Divine Right of Kings) को सिरे से खारिज किया।
  • शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत (Separation of Powers): मॉन्टेस्क्यू ने तर्क दिया कि यदि शासन की तीनों शक्तियां—विधायिका (Legislature), कार्यपालिका (Executive) और न्यायपालिका (Judiciary)—एक ही व्यक्ति या संस्था (राजा) के हाथों में केंद्रित रहेंगी, तो निरंकुशता और तानाशाही का जन्म होगा। स्वतंत्रता की रक्षा के लिए इन तीनों अंगों को एक-दूसरे से स्वतंत्र और अलग होना चाहिए। यह सिद्धांत आगे चलकर 1791 के फ्रांसीसी संविधान और अमेरिकी संविधान का मुख्य आधार बना।
  • पर्शियन लेटर्स (Persian Letters - 1721): इसमें उन्होंने दो काल्पनिक ईरानी यात्रियों के पत्रों के माध्यम से फ्रांसीसी राजदरबार, पोप और सामाजिक पाखंड पर तीखा व्यंग्य किया।
3.3 वॉल्टेयर (Voltaire, 1694–1778)

फ्रांस्वा-मारी अरूए (वॉल्टेयर) 18वीं सदी के सबसे प्रखर लेखक, इतिहासकार और व्यंग्यकार थे:

  • चर्च और पाखंड पर प्रहार: वॉल्टेयर ने कैथोलिक चर्च की असहिष्णुता, पाखंड, संपत्ति लोलुपता और धार्मिक उत्पीड़न पर भीषण प्रहार किए। उन्होंने चर्च को 'ल इन्फाम' (L'Infâme - कुख्यात संस्था) कहा और प्रसिद्ध नारा दिया: "Écrasez l'infâme!" (इस कुख्यात संस्था को कुचल डालो!)
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मसीहा: वे विचारों की स्वतंत्रता के प्रबल पक्षधर थे। उनका प्रसिद्ध कथन अमर है: "हो सकता है कि मैं आपके विचारों से पूरी तरह असहमत होऊं, लेकिन आपके विचार व्यक्त करने के अधिकार की रक्षा के लिए मैं अपने प्राण भी दे दूंगा।"
  • रचनाएं: उनकी पुस्तक 'लेटर्स ऑन द इंग्लिश' (Letters on the English - 1734) में उन्होंने ब्रिटिश संवैधानिक स्वतंत्रता और धार्मिक सहिष्णुता की प्रशंसा कर फ्रांसीसी निरंकुशता को आईना दिखाया। 'कैंडिड' (Candide) उनकी प्रसिद्ध व्यंग्यात्मक रचना थी।
3.4 ज्यां-जैक्स रूसो (Jean-Jacques Rousseau, 1712–1778)

रूसो को 'फ्रांसीसी क्रांति का आध्यात्मिक जनक' माना जाता है। नेपोलियन ने बाद में कहा था: "यदि रूसो न होता, तो फ्रांसीसी क्रांति संभव न होती।"

  • 'द सोशल कॉन्ट्रैक्ट' (The Social Contract - 1762): इस युगांतरकारी पुस्तक का पहला ही वाक्य क्रांति का अमर उद्घोष बना: "मनुष्य स्वतंत्र जन्म लेता है, किंतु सर्वत्र वह जंजीरों में जकड़ा हुआ है" (Man is born free, and everywhere he is in chains)।
  • लोक संप्रभुता (Popular Sovereignty): रूसो ने प्रतिपादित किया कि राज्य किसी दैवी कृपा से नहीं, बल्कि समाज के सभी नागरिकों के आपसी 'सामाजिक समझौते' से बना है। इसलिए राज्य की वास्तविक संप्रभुता राजा में नहीं, बल्कि संपूर्ण जनता में निहित है।
  • सामान्य इच्छा का सिद्धांत (General Will): शासन जनता की 'सामान्य इच्छा' के अनुसार चलना चाहिए। यदि कोई राजा जनता के कल्याण और स्वतंत्रता की रक्षा करने में विफल रहता है, तो जनता को ऐसे निरंकुश शासक को उखाड़ फेंकने का पूर्ण नैतिक और कानूनी अधिकार है। इस विचार ने जनता के भीतर क्रांति का बारूद भर दिया।
3.5 विश्वकोशकार (Encyclopedists) एवं फिजियोक्रेट्स (Physiocrats)
  • दीदरो (Denis Diderot) और द'आलम्बर्ट (D'Alembert): इन्होंने 1751 से 1772 के बीच 28 खंडों में विशाल 'इंसाइक्लोपीडिया' (Encyclopédie / विश्वकोश) का संपादन किया। इसमें समकालीन विज्ञान, दर्शन, उद्योग और समाज का तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया और सामंतवाद, अंधविश्वास और दैवी राजतंत्र की धज्जियां उड़ाई गईं।
  • फिजियोक्रेट्स (Physiocrats - अर्थशास्त्री): फ्रांस्वा क्वेसने (François Quesnay) और विंसेंट द गुर्ने (Vincent de Gournay) जैसे विचारकों ने राज्य द्वारा व्यापार पर लगाए गए सामंती प्रतिबंधों और चुंगी का विरोध किया। उन्होंने 'Laissez-faire, laissez-passer' (अहस्तक्षेप और मुक्त व्यापार) का नारा दिया और कृषि को वास्तविक धन का स्रोत बताया।
ऐतिहासिक मूल्यांकन: क्या दार्शनिकों ने क्रांति उत्पन्न की?

इतिहासकारों का मानना है कि दार्शनिकों ने स्वयं कोई क्रांति की योजना नहीं बनाई थी, और न ही वे हिंसा के समर्थक थे (रूसो और वॉल्टेयर क्रांति से 11 वर्ष पूर्व 1778 में ही दिवंगत हो चुके थे)। किंतु उन्होंने प्राचीन व्यवस्था के दोषों को उजागर करके जनता के मन से राजतंत्र और चर्च का भय समाप्त कर दिया। उन्होंने बारूद का ढेर नहीं बनाया (जो आर्थिक और सामाजिक संकट ने बनाया था), किंतु उस बारूद में चिंगारी लगाने का कार्य इन्हीं दार्शनिक विचारों ने किया।

मॉड्यूल 4: 1789 का क्रांतिकारी विस्फोट: एस्टेट्स जनरल से बास्तील पतन और मानव अधिकार

4.1 एस्टेट्स जनरल का अधिवेशन (5 मई 1789) और मतदान विवाद

वित्तीय दिवालियापन से विवश होकर लुई सोलहवें ने 175 वर्षों बाद (1614 के बाद पहली बार) 5 मई 1789 को वर्साय में एस्टेट्स जनरल की बैठक बुलाई। इसमें प्रथम एस्टेट (पादरी) के 308, द्वितीय एस्टेट (कुलीन) के 285 और तृतीय एस्टेट के 621 प्रतिनिधि उपस्थित हुए।

  • मतदान पद्धति पर विवाद: प्राचीन परंपरा के अनुसार प्रत्येक एस्टेट का केवल एक वोट होता था (Order Voting)। इस तरह प्रथम और द्वितीय एस्टेट मिलकर 2-1 के बहुमत से तृतीय एस्टेट को पराजित कर देते थे।
  • प्रति व्यक्ति मतदान की मांग: तृतीय एस्टेट के प्रतिनिधियों (जिनका नेतृत्व बुर्जुआ वर्ग कर रहा था) ने मांग की कि पूरी सभा एक साथ बैठे और प्रत्येक सदस्य को एक वोट (One Man, One Vote) का अधिकार दिया जाए। जब राजा और कुलीनों ने इसे ठुकरा दिया, तो गतिरोध पैदा हो गया।
  • आबे सिएस (Abbé Sieyès) का पैम्फलेट: जनवरी 1789 में पादरी आबे सिएस ने एक अत्यंत प्रसिद्ध पैम्फलेट प्रकाशित किया: "तृतीय एस्टेट क्या है? सब कुछ। अब तक राजनीति में इसका क्या स्थान रहा? कुछ नहीं। यह क्या बनना चाहता है? कुछ बनना चाहता है!"
  • नेशनल असेंबली की घोषणा (17 जून 1789): 17 जून को तृतीय एस्टेट के प्रतिनिधियों ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए घोषणा की कि वे अकेले ही फ्रांस की 98% जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए वे स्वयं 'नेशनल असेंबली' (National Assembly / राष्ट्रीय सभा) हैं।
4.2 टेनिस कोर्ट की ऐतिहासिक शपथ (20 जून 1789)

20 जून 1789 की सुबह जब तृतीय एस्टेट के प्रतिनिधि सभा भवन पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि राजा के आदेश पर भवन के दरवाजे बंद कर दिए गए थे और बाहर सैनिक तैनात थे। इससे विचलित हुए बिना, ज्यां-सिल्वेन बेली (Jean-Sylvain Bailly) और उदारवादी कुलीन काउंट मीराबाई (Honoré Mirabeau) के नेतृत्व में प्रतिनिधि पास ही स्थित एक इनडोर टेनिस कोर्ट (Jeu de Paume) में एकत्र हुए।

वहां सभी सदस्यों ने एक स्वर में ऐतिहासिक शपथ ली: "हम शपथ लेते हैं कि हम तब तक कभी अलग नहीं होंगे और जहां भी परिस्थितियां मांग करेंगी वहीं एकत्र होंगे, जब तक कि फ्रांस के राज्य का एक मजबूत संविधान निर्मित और स्थापित न हो जाए!"

23 जून को जब शाही दूत ने सभा भंग करने का आदेश दिया, तो मीराबाई ने अमर उत्तर दिया: "जाओ अपने मालिक से कह दो कि हम यहां जनता की इच्छा से एकत्र हुए हैं और हमें संगीनों की नोक के बिना यहां से नहीं हटाया जा सकता!" अंततः 27 जून को राजा को झुकना पड़ा और उसने तीनों एस्टेटों को एक साथ बैठने की अनुमति दे दी। 9 जुलाई को इसने स्वयं को 'नेशनल कांस्टीट्यूएंट असेंबली' (National Constituent Assembly / राष्ट्रीय संविधान सभा) घोषित किया।

4.3 बास्तील दुर्ग का पतन (14 जुलाई 1789)

राजा लुई सोलहवें ने दिखने में तो समझौता कर लिया, किंतु गुप्त रूप से पेरिस और वर्साय के चारों ओर 20,000 विदेशी भाड़े के सैनिकों को तैनात करना शुरू कर दिया। 11 जुलाई को उसने लोकप्रिय सुधारवादी वित्त मंत्री जाक नेकर को बर्खास्त कर दिया।

  • पेरिस में जन-उभार: नेकर की बर्खास्तगी और सेना की घेराबंदी से पेरिस में अफवाह फैल गई कि राजा जनता पर गोलियां चलवाने और नेशनल असेंबली को कुचलने वाला है। इसके साथ ही भीषण अकाल के कारण ब्रेड (रोटी) की कीमतें आसमान छू रही थीं।
  • बास्तील पर धावा: 14 जुलाई 1789 की सुबह हजारों क्रुद्ध नागरिकों ने 'इन्वेलिड्स' (सैन्य अस्पताल) से 30,000 बंदूकें लूट लीं, किंतु बारूद नहीं मिला। बारूद की खोज में भीड़ ने बास्तील के मध्यकालीन किले (Bastille) का घेराव कर लिया। बास्तील केवल गोला-बारूद का भंडार नहीं था; वह बूर्बों राजवंश की निरंकुशता और अमानवीय दमन का सबसे बड़ा प्रतीक था।
  • किले का ध्वंस: कई घंटों की गोलीबारी के बाद जनता ने पुल गिरा दिया और किले पर कब्जा कर लिया। बास्तील के गवर्नर द'लॉने (De Launay) का सिर काटकर भाले पर टांग दिया गया। जेल में बंद कैदियों को मुक्त कराया गया और जनता ने बास्तील के दुर्भेद्य पत्थरों को एक-एक कर उखाड़ फेंका।
  • ऐतिहासिक महत्व: बास्तील का पतन निरंकुश राजशाही की नैतिक और भौतिक पराजय थी। जब लुई सोलहवें ने पूछा: "क्या यह कोई विद्रोह है?", तो ड्यूक द लियानकोर्ट ने उत्तर दिया: "नहीं महाराज, यह एक महाक्रांति है!" पेरिस पर क्रांतिकारियों का नियंत्रण हो गया। एक नागरिक नगरपालिका 'पेरिस कम्यून' बनी और नेशनल असेंबली की रक्षा के लिए 'नेशनल गार्ड' (National Guard) का गठन किया गया, जिसकी कमान अमेरिकी युद्ध के नायक मार्क्विस द लफायेत (Lafayette) को सौंपी गई। 14 जुलाई को आज भी फ्रांस का राष्ट्रीय दिवस (Bastille Day) मनाया जाता है।
4.4 महाभय (La Grande Peur) और 4 अगस्त 1789 की रात्रि (सामंतवाद का अंत)

बास्तील के पतन की गूंज गांवों में पहुंची। जुलाई-अगस्त 1789 में ग्रामीण इलाकों में एक भयानक अफवाह फैल गई कि कुलीनों ने डाकुओं और भाड़े के सैनिकों के गिरोह भेजे हैं जो किसानों की पकी फसलें नष्ट कर देंगे। इस दहशत को इतिहास में 'महाभय' (La Grande Peur / The Great Fear) कहा जाता है।

भय और क्रोध से पागल होकर लाखों किसानों ने कुल्हाड़ियों और हंसियों के साथ सामंती महलों (Châteaux) पर धावा बोल दिया। उन्होंने कुलीनों को खदेड़ दिया और सामंती कर-अभिलेखों और पट्टों 'तेरिये' (Terriers) को आग के हवाले कर दिया।

4 अगस्त 1789 की ऐतिहासिक रात्रि: किसानों के इस देशव्यापी विद्रोह से भयभीत होकर नेशनल असेंबली ने एक रात के विशेष सत्र में युगांतरकारी घोषणाएं कीं:

  • फ्रांस में सदियों पुराने सामंतवाद (Feudalism) को पूर्णतः समाप्त घोषित कर दिया गया।
  • व्यक्तिगत दासता, कोरवी (बेगार श्रम), बनालिते और सामंती न्यायालयों का उन्मूलन किया गया।
  • चर्च द्वारा वसूला जाने वाला धार्मिक कर 'टाइथ' (Tithe) हमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया।
  • कुलीनों और पादरियों के सभी कर-विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गए और सभी नागरिकों पर समान कर व्यवस्था लागू की गई।
4.5 मानव एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा (26 अगस्त 1789)

26 अगस्त 1789 को नेशनल असेंबली ने विश्व प्रसिद्ध 'मानव एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा' (Declaration of the Rights of Man and of the Citizen) को अंगीकार किया। इसका प्रारूप लफायेत ने थॉमस जेफरसन के परामर्श से तैयार किया था। इसमें 17 धाराएं थीं।

  • मूल सिद्धांत:
    1. "सभी मनुष्य जन्म से स्वतंत्र हैं और अधिकारों में समान रहते हैं।" (Men are born and remain free and equal in rights.)
    2. मानव के प्रमुख प्राकृतिक और अहस्तांतरणीय अधिकार हैं: स्वतंत्रता, संपत्ति, सुरक्षा और अत्याचार का विरोध करने का अधिकार।
    3. संप्रभुता का मूल स्रोत राष्ट्र (जनता) में निहित है; कोई भी व्यक्ति ऐसा अधिकार नहीं चला सकता जो स्पष्ट रूप से जनता से न मिला हो।
    4. कानून सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति है। सभी नागरिकों को इसके निर्माण में भाग लेने का अधिकार है और कानून के समक्ष सभी समान हैं।
    5. धार्मिक सहिष्णुता, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मनुष्य के सबसे अनमोल अधिकारों में से हैं।
4.6 महिलाओं का वर्साय मार्च (5–6 अक्टूबर 1789)

राजा लुई सोलहवें ने 4 अगस्त के सामंती उन्मूलन अध्यादेशों और मानव अधिकारों की घोषणा पर हस्ताक्षर करने में टालमटोल की। इसी बीच पेरिस में ब्रेड की भयंकर कमी हो गई और अफवाह उड़ी कि वर्साय में सैनिकों ने क्रांतिकारी तिरंगे कॉकेड (Tricolor Cockade) को पैरों तले रौंदा है।

5 अक्टूबर 1789 को पेरिस की लगभग 7,000 गरीब महिलाएं हथियारों, भालों और तोपों के साथ मूसलाधार बारिश में 12 मील पैदल चलकर वर्साय के महल पहुंचीं। उन्होंने महल को घेर लिया। 6 अक्टूबर को राजा को विवश होकर जनता की मांगें माननी पड़ीं। महिलाएं राजपरिवार (लुई सोलहवें, रानी मैरी एंटोइनेट और राजकुमार) को पेरिस के तुइलेरी महल (Tuileries Palace) ले आईं। वे गा रही थीं: "हम रोटी वाले (राजा), रोटी वाली (रानी) और छोटे रसोइए (राजकुमार) को लेकर आ रहे हैं, अब हमें रोटी की कमी नहीं होगी!" इसके साथ ही सत्ता का वास्तविक केंद्र वर्साय से स्थानांतरित होकर पेरिस की क्रांतिकारी जनता के हाथों में आ गया।

मॉड्यूल 5: राष्ट्रीय संविधान सभा के सुधार और 1791 का संविधान

5.1 प्रशासनिक और आर्थिक पुनर्गठन

1789 से 1791 के बीच नेशनल कांस्टीट्यूएंट असेंबली ने फ्रांस के पूरे प्रशासनिक और आर्थिक ढांचे को आधुनिक स्वरूप प्रदान किया:

  • 83 विभागों (Departments) में विभाजन: फ्रांस के पुराने सामंती प्रांतों को भंग कर दिया गया। पूरे देश को प्रशासनिक एकरूपता और भौगोलिक सुविधा के आधार पर 83 विभागों (Departments), जिलों, कैंटन्स और कम्यून्स में विभाजित किया गया। सभी स्थानीय अधिकारियों का चुनाव जनता द्वारा तय किया गया।
  • दशमलव मीट्रिक प्रणाली (Metric System): पुराने जटिल और भ्रामक सामंती नाप-तौल के स्थान पर वैज्ञानिक दशमलव मीट्रिक प्रणाली (मीटर, किलोग्राम, लीटर) की शुरुआत की गई।
  • आंतरिक व्यापारिक बाधाओं का अंत: फ्रांस के सभी आंतरिक चुंगी नाके (Tolls), गिल्ड व्यवस्था (व्यापारिक संघों का एकाधिकार) और व्यापारिक प्रतिबंध समाप्त कर दिए गए, जिससे राष्ट्रीय बाजार का निर्माण हुआ।
5.2 चर्च की संपत्ति का राष्ट्रीयकरण और 'असाइनेट्स' (Assignats) मुद्रा

वित्तीय संकट से निपटने के लिए नवंबर 1789 में बिशप तालेरां के प्रस्ताव पर नेशनल असेंबली ने चर्च की समस्त विशाल संपत्ति और भूमि का राष्ट्रीयकरण कर लिया। इस सरकारी संपत्ति की जमानत पर एक नई कागजी मुद्रा जारी की गई, जिसे 'असाइनेट्स' (Assignats) कहा जाता था। प्रारंभ में इसने राजकोष को संभाला, किंतु बाद में सरकार ने अंधाधुंध असाइनेट्स छापे, जिससे इसका अवमूल्यन हो गया और भयानक मुद्रास्फीति व महंगाई फैल गई।

5.3 पादरियों का सिविल संविधान (Civil Constitution of the Clergy - 1790)

12 जुलाई 1790 को असेंबली ने 'पादरियों का सिविल संविधान' (Civil Constitution of the Clergy) पारित किया। यह क्रांति का सबसे विवादास्पद कदम साबित हुआ:

  • चर्च राज्य के अधीन: कैथोलिक चर्च को राज्य की एक प्रशासनिक शाखा बना दिया गया। पोप का फ्रांस के चर्च पर प्रशासनिक अधिकार समाप्त कर दिया गया।
  • पुरोहितों का चुनाव व वेतन: बिशपों और पादरियों का चुनाव आम नागरिकों द्वारा तय किया गया और उन्हें राज्य द्वारा सरकारी वेतन दिया जाने लगा।
  • शपथ पर विवाद व विभाजन: सभी पादरियों के लिए नए संविधान के प्रति वफादारी की शपथ लेना अनिवार्य कर दिया गया।
    • ज्यूरिंग पादरी (Juring Clergy): लगभग आधे पादरियों ने यह सरकारी शपथ स्वीकार कर ली।
    • रिफ्रैक्टरी पादरी (Refractory Clergy): शेष पादरियों ने इसे धर्म-विरोधी मानकर शपथ लेने से इनकार कर दिया।
  • धार्मिक असंतोष: 1791 में पोप पियस षष्ठम ने इस कानून की कड़ी निंदा की। इससे फ्रांस के गहरे धार्मिक ग्रामीण किसान, कैथोलिक जनता और राजा स्वयं क्रांति के विरोधी हो गए। बाद में पश्चिमी फ्रांस (वांदे - Vendée) में भड़का भीषण गृहयुद्ध इसी असंतोष की परिणति था।
5.4 1791 का संविधान: संवैधानिक राजतंत्र और नागरिक विभाजन

1791 में संविधान सभा ने फ्रांस के लिए प्रथम लिखित संविधान का निर्माण पूरा किया। इसने फ्रांस को एक 'संवैधानिक राजतंत्र' (Constitutional Monarchy) में बदल दिया:

  • शक्तियों का विभाजन: मॉन्टेस्क्यू के सिद्धांत के अनुसार शक्तियों को कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका में बांटा गया।
    • कार्यपालिका: राजा कार्यपालिका का प्रमुख रहा, किंतु उसकी शक्तियां अत्यंत सीमित कर दी गईं। उसे केवल 4 वर्ष के लिए 'निलंबनकारी वीटो' (Suspensive Veto) का अधिकार दिया गया; वह युद्ध या संधि की घोषणा स्वयं नहीं कर सकता था।
    • विधायिका: एक सदनीय 'लेजिस्लेटिव असेंबली' (Legislative Assembly) बनाई गई, जिसमें 745 सदस्य थे। इनका कार्यकाल 2 वर्ष का था।
    • न्यायपालिका: स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना हुई और न्यायाधीशों का चुनाव जनता द्वारा किया जाने लगा।
  • नागरिकों का विभाजन (सक्रिय बनाम निष्क्रिय नागरिक): संविधान ने सभी नागरिकों को समान अधिकार नहीं दिए, बल्कि मताधिकार को केवल संपत्तिशाली वर्ग तक सीमित रखा:
    • सक्रिय नागरिक (Active Citizens): 25 वर्ष से अधिक उम्र के वे पुरुष जो कम से कम 3 दिन की मजदूरी के बराबर प्रत्यक्ष कर चुकाते थे। फ्रांस की 2.5 करोड़ आबादी में केवल लगभग 43 लाख पुरुषों को यह मताधिकार मिला।
    • निष्क्रिय नागरिक (Passive Citizens): लगभग 30 लाख निर्धन पुरुष और समाज की सभी 100% महिलाएं, जिन्हें कोई मताधिकार नहीं दिया गया।
ओलम्प द गूज (Olympe de Gouges) का प्रतिरोध:

1791 के संविधान में महिलाओं को निष्क्रिय नागरिक बनाकर अधिकारों से वंचित किए जाने के विरोध में लेखिका ओलम्प द गूज ने 1791 में 'महिला एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा' (Declaration of the Rights of Woman and of the Female Citizen) प्रकाशित की। उन्होंने घोषणा की: "औरत स्वतंत्र पैदा होती है और अधिकारों में पुरुष के समान रहती है।" उन्होंने मांग की कि महिलाओं को भी मतदान और संपत्ति का समान अधिकार मिलना चाहिए। (बाद में आतंक के राज के दौरान रोबस्पियर की सरकार ने उन्हें गिलोटिन पर चढ़ा दिया था)।

5.5 वारेन का पलायन (Flight to Varennes - 20–21 जून 1791)

राजा लुई सोलहवें संविधान सभा के सुधारों और पादरियों के सिविल संविधान से अत्यधिक क्षुब्ध था। 20 जून 1791 की रात को राजपरिवार गुप्त वेश बदलकर तुइलेरी महल से फरार हो गया। राजा की योजना ऑस्ट्रियाई सीमा के पास स्थित मोंतमेदी में वफादार शाही सेना से मिलकर विदेशी सेनाओं की सहायता से पेरिस पर हमला करने और क्रांति को कुचलने की थी।

किंतु सीमा से कुछ मील पहले वारेन (Varennes) नामक कस्बे में एक स्थानीय पोस्टमास्टर द्रुए ने मुद्रा पर छपे चित्र से राजा को पहचान लिया। राजपरिवार को पकड़कर बंदी के रूप में पेरिस वापस लाया गया।

ऐतिहासिक परिणाम: वारेन के पलायन ने राजा के 'देशभक्ति' के ढोंग का पर्दाफाश कर दिया। जनता की नजरों में राजा एक गद्दार साबित हुआ जो अपने ही देश के खिलाफ विदेशी आक्रमण की साजिश रच रहा था। इस घटना के बाद फ्रांस में राजतंत्र के पूर्ण खात्मे और 'गणराज्य' (Republic) की मांग ने व्यापक जोर पकड़ लिया।

मॉड्यूल 6: उग्र गणतंत्र, आतंक का राज (1792–1794) और क्रांति का युगांतरकारी वैश्विक प्रभाव

6.1 विदेशी युद्धों की शुरुआत और 'ला मार्सेइले' (La Marseillaise)

फ्रांसीसी क्रांति से यूरोप के अन्य निरंकुश राजा (विशेषकर ऑस्ट्रिया और प्रशा) भयभीत हो उठे। उन्हें डर था कि क्रांति की यह आग उनके देशों में भी फैल जाएगी। 1791 में ऑस्ट्रिया के सम्राट और प्रशा के राजा ने 'पिल्निट्ज की घोषणा' (Declaration of Pillnitz) जारी कर फ्रांसीसी राजतंत्र की पुनर्स्थापना की धमकी दी।

  • युद्ध की घोषणा (अप्रैल 1792): अप्रैल 1792 में फ्रांस की लेजिस्लेटिव असेंबली ने ऑस्ट्रिया और प्रशा के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इसे 'जनता का निरंकुश राजाओं के विरुद्ध युद्ध' माना गया। पूरे फ्रांस से हजारों स्वयंसेवक सेना में भर्ती होने पेरिस पहुंचे।
  • 'ला मार्सेइले' का जन्म: मार्सिले से पेरिस मार्च करते समय स्वयंसेवकों ने कवि और सैन्य अधिकारी रूजे दे लिसले (Rouget de Lisle) द्वारा रचित एक ओजस्वी युद्ध गीत गाया। यह गीत 'ला मार्सेइले' (La Marseillaise) कहलाया, जो बाद में चलकर फ्रांस का राष्ट्रगान बना।
  • ब्रंसविक घोषणापत्र (जुलाई 1792): प्रशा के सेनापति ड्यूक ऑफ ब्रंसविक ने घोषणापत्र जारी कर धमकी दी कि यदि पेरिस की जनता ने शाही महल को छुआ, तो पेरिस को तहस-नहस कर दिया जाएगा। इससे फ्रांसीसी जनता का क्रोध भड़क उठा और उन्होंने समझ लिया कि राजा दुश्मनों से मिला हुआ है।
6.2 10 अगस्त 1792 का जन-विद्रोह और प्रथम गणराज्य
  • तुइलेरी महल पर आक्रमण (10 अगस्त 1792): उग्र जैकोबिनों और साँ-कुलोत्तों के नेतृत्व में हजारों सशस्त्र नागरिकों ने तुइलेरी महल पर धावा बोल दिया। राजा के स्विस अंगरक्षकों को मार डाला गया और राजपरिवार को बंदी बनाकर टेम्पल जेल में डाल दिया गया। असेंबली ने राजतंत्र को निलंबित कर दिया।
  • सितंबर हत्याकांड (September Massacres): सितंबर 1792 में पेरिस की जेलों में बंद 1,200 से अधिक संदिग्ध राजभक्तों और पादरियों की भीड़ ने हत्या कर दी।
  • प्रथम फ्रांसीसी गणराज्य (21 सितंबर 1792): सार्वभौमिक पुरुष मताधिकार (21 वर्ष से ऊपर के सभी पुरुषों को बिना संपत्ति भेद के मतदान अधिकार) के आधार पर नई सभा चुनी गई, जिसे 'नेशनल कन्वेंशन' (National Convention) कहा गया। 21 सितंबर 1792 को कन्वेंशन ने राजतंत्र का पूर्ण अंत कर फ्रांस को 'गणराज्य' (Republic) घोषित किया। 1792 को 'गणराज्य का वर्ष I' घोषित किया गया।
  • लुई सोलहवें को मृत्युदंड (21 जनवरी 1793): तुइलेरी महल में मिले गुप्त लोहे की तिजोरी के दस्तावेजों से सिद्ध हो गया कि लुई सोलहवें ने ऑस्ट्रिया और दुश्मनों को फ्रांस की सैन्य योजनाएं भेजी थीं। कन्वेंशन ने देशद्रोह के आरोप में राजा पर मुकदमा चलाया और उसे मृत्युदंड दिया। 21 जनवरी 1793 को पेरिस के प्लेस दे ला कॉनकॉर्ड में लुई सोलहवें का गिलोटिन (Guillotine) पर सिर काटकर वध कर दिया गया। अक्टूबर 1793 में रानी मैरी एंटोइनेट को भी गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया।
6.3 राजनीतिक गुटबाजी: गिरोंदिस्ट बनाम जैकोबिन

कन्वेंशन में दो परस्पर विरोधी राजनीतिक दलों के बीच भीषण सत्ता संघर्ष शुरू हुआ:

तुलना के बिंदु गिरोंदिस्ट (Girondins) जैकोबिन दल (The Mountain / Montagnards)
सामाजिक आधार प्रांतीय, समृद्ध बुर्जुआ वर्ग, बड़े व्यापारी व वकील (गिरोंद विभाग से संबंधित) पेरिस के उग्र निम्न-मध्यम वर्ग, छोटे दस्तकार, मजदूर व साँ-कुलोत्त
प्रमुख नेता जाक पियरे ब्रिसो, वर्नियो, मैडम रोलां, कोंदोरसे मैक्सिमिलियन रोबस्पियर, जाँ-पॉल मारात, जॉर्जेस दांतों, लुई सेंट-जस्ट
राजनीतिक दृष्टिकोण उदारवादी गणतंत्री, कानून का शासन, आर्थिक अहस्तक्षेप (मुक्त बाजार), राजा की प्राण रक्षा के पक्षधर कट्टर उग्र क्रांतिकारी, केंद्रीकृत पेरिस सत्ता, मूल्य नियंत्रण और राजा को तत्काल मृत्युदंड के समर्थक
कन्वेंशन में स्थान दायीं ओर (Right Wing) ऊंची बेंचों पर बाईं ओर ('पर्वत दल' - Left Wing)
6.4 आतंक का राज (Reign of Terror: 1793–1794)

1793 के प्रारंभ में फ्रांस अस्तित्व के सबसे भीषण संकट में फंस गया: बाहर से ऑस्ट्रिया, प्रशा, ब्रिटेन, स्पेन और हॉलैंड के प्रथम गठबंधन ने फ्रांस को चारों तरफ से घेर लिया था; अंदर वांदे में कैथोलिक किसानों का विद्रोह भड़क उठा था और ब्रेड की कीमतें आसमान छू रही थीं। जून 1793 में जैकोबिनों ने साँ-कुलोत्तों की मदद से गिरोंदिस्ट नेताओं को गिरफ्तार कर लिया और कन्वेंशन पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया।

लोक सुरक्षा समिति (Committee of Public Safety): देश को विनाश से बचाने के लिए कन्वेंशन ने 12 सदस्यों की एक सर्वोच्च कार्यकारी समिति बनाई, जिसका निर्विवाद नेता मैक्सिमिलियन रोबस्पियर (Maximilien Robespierre) बना। रोबस्पियर ने घोषणा की: "शांति के समय लोक-सरकार का आधार सद्गुण है; क्रांति के समय सद्गुण और आतंक दोनों हैं; सद्गुण के बिना आतंक विनाशकारी है, और आतंक के बिना सद्गुण शक्तिहीन है!"

  • संदिग्धों का कानून (Law of Suspects - 17 सितंबर 1793): इसके तहत किसी भी व्यक्ति को केवल क्रांति के प्रति 'अनिष्टकारी' होने के संदेह पर गिरफ्तार किया जा सकता था। क्रांतिकारी ट्रिब्यूनल (अदालत) में न कोई गवाह था, न अपील। केवल दो फैसले होते थे: रिहाई या मौत।
  • गिलोटिन (Guillotine) का तांडव: डॉ. जोसेफ इग्नास गिलोटिन द्वारा बनाई गई यह मशीन त्वरित मृत्युदंड का प्रतीक बन गई। लगभग 14 महीनों में 40,000 से अधिक लोगों को मार डाला गया, जिनमें महारानी मैरी एंटोइनेट, गिरोंदिस्ट नेता, वैज्ञानिक लावोइशिए, और यहां तक कि रोबस्पियर के अपने साथी जॉर्जेस दांतों (जिन्होंने आतंक कम करने की वकालत की थी) भी शामिल थे।
  • कठोर आर्थिक नीतियां:
    • अधिकतम मूल्य नियंत्रण कानून (Law of the Maximum): खाद्यान्न, मांस, तेल और सभी आवश्यक वस्तुओं के अधिकतम मूल्य और मजदूरों की अधिकतम मजदूरी तय कर दी गई। जमाखोरों के लिए मृत्युदंड का नियम बनाया गया।
    • समानता की रोटी (Pain d'égalité): सफेद आटे पर प्रतिबंध लगा दिया गया; सभी नागरिकों के लिए साबुत अनाज से बनी 'समानता की रोटी' खाना अनिवार्य कर दिया गया।
  • लेवी एन मासे (Levée en masse - सार्वभौमिक सैन्य भर्ती): अगस्त 1793 में देश के इतिहास में पहली बार सार्वभौमिक सैन्य भर्ती लागू की गई। अविवाहित युवकों को सेना में भेजा गया, विवाहित पुरुषों ने हथियार बनाए, और महिलाओं ने अस्पतालों में काम किया। 8 लाख सैनिकों की विशाल नागरिक सेना तैयार हुई, जिसने सभी विदेशी आक्रमणकारियों को खदेड़ दिया।
  • ईसाइयत का उन्मूलन और सर्वोच्च सत्ता की पूजा: चर्चों को बंद कर दिया गया और उन्हें सैनिकों की छावनी बनाया गया। रविवार का अवकाश समाप्त कर दिया गया। रोबस्पियर ने नास्तिकता को नकारते हुए तार्किकता पर आधारित 'सर्वोच्च सत्ता की पूजा' (Cult of the Supreme Being) की शुरुआत की।
6.5 थर्मिडोरियन प्रतिक्रिया (Thermidorian Reaction) और रोबस्पियर का अंत

जब विदेशी युद्धों का संकट टल गया, तो कन्वेंशन के सदस्यों में भय फैल गया कि कहीं रोबस्पियर अगली सूची में उनका नाम न डाल दे। कन्वेंशन के भयभीत और असंतुष्ट सदस्यों ने मिलकर रोबस्पियर के खिलाफ बगावत कर दी।

9 थर्मिडोर (27 जुलाई 1794): कन्वेंशन में रोबस्पियर और उसके सहयोगियों (सेंट-जस्ट, कूटों) को चिल्लाकर बोलने से रोक दिया गया और उनकी गिरफ्तारी का आदेश दिया गया। 28 जुलाई 1794 को मैक्सिमिलियन रोबस्पियर और उसके 21 साथियों को पेरिस में गिलोटिन पर मृत्युदंड दे दिया गया।

इसके साथ ही 'आतंक के राज' का अंत हुआ। जैकोबिन क्लब बंद कर दिए गए, कैदियों को रिहा किया गया और मध्यम वर्ग ने पुनः सत्ता संभाल ली। इसके बाद 1795 में 'डायरेक्टरी' (Directory - 5 निदेशकों का शासन) की स्थापना हुई, जिसकी राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार ने 1799 में नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Bonaparte) के सैन्य अधिनायकवाद का मार्ग प्रशस्त किया।

6.6 फ्रांसीसी क्रांति का विश्व इतिहास पर स्थायी प्रभाव एवं अमर आदर्श

फ्रांसीसी क्रांति आधुनिक मानव इतिहास की सबसे युगांतरकारी घटना थी। इसने संपूर्ण विश्व को निम्नलिखित शाश्वत मूल्य प्रदान किए:

  1. अमर त्रयी आदर्श (The Trinity of Ideals):
    • स्वतंत्रता (Liberté): व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति, प्रेस और धर्म की आजादी। इसने दैवी राजतंत्र और तानाशाही का सदा के लिए अंत कर दिया।
    • समानता (Égalité): जन्मजात विशेषाधिकारों और सामंतवाद का स्थायी खात्मा। कानून के समक्ष सभी नागरिकों की समानता और योग्यता के आधार पर अवसर।
    • बंधुत्व (Fraternité): सभी नागरिकों और राष्ट्रों के बीच साझा मानवीय भाईचारा और सहयोग।
  2. आधुनिक राष्ट्रवाद (Nationalism) का उदय: क्रांति ने 'राजा का देश' के स्थान पर 'जनता का राष्ट्र' की संकल्पना दी। जनता के भीतर देश के प्रति सामूहिक पहचान, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का जन्म हुआ, जिसने 19वीं सदी में इटली और जर्मनी के एकीकरण तथा विश्व भर के मुक्ति संग्रामों को प्रेरित किया।
  3. धर्मनिरपेक्ष राज्य (Secular State): राजनीति को धर्म और चर्च के चंगुल से मुक्त कर आधुनिक धर्मनिरपेक्ष शासन प्रणाली की आधारशिला रखी गई।
  4. भारतीय परिप्रेक्ष्य में प्रभाव:
    • मैसूर के शासक टीपू सुल्तान फ्रांसीसी क्रांति से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने श्रीरंगपटनम में 'स्वतंत्रता का वृक्ष' (Tree of Liberty) लगाया और फ्रांसीसी जैकोबिन क्लब की सदस्यता ग्रहण कर स्वयं को 'नागरिक टीपू' (Citizen Tipu) घोषित किया।
    • आधुनिक भारत के जनक राजा राममोहन राय क्रांति के आदर्शों के अनन्य प्रशंसक थे। 1823 में जब नेपल्स की क्रांति सफल हुई तो उन्होंने भोज दिया था, और लंदन जाते समय जब उन्होंने एक फ्रांसीसी जहाज पर तिरंगा झंडा देखा तो वे अस्वस्थ होने पर भी उसे सलाम करने गए थे।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

प्राचीन व्यवस्था का समाजशास्त्रीय समीकरण (Three Estates Structure)
सामंती शोषण व विशेषाधिकार विषमता समीकरण
पादरी टाइथ धार्मिक कर वसूलते थे; कुलीन सामंती बनालिते व कोरवी बेगार वसूलते थे।
फ्रांसीसी राजतंत्र का वित्तीय दिवालियापन समीकरण (Financial Crisis Model)
राजकोषीय पतन व कुलीन विद्रोह सूत्र
1787-88 में संभ्रांतों की सभा और पार्लमां ने नए करों का विरोध कर राजा को एस्टेट्स जनरल बुलाने पर बाध्य किया।
प्रबोधनकालीन दार्शनिकों का वैचारिक संश्लेषण सूत्र (Enlightenment Matrix)
क्रांति का वैचारिक उत्प्रेरक सूत्र
दीदरो का विश्वकोश और फिजियोक्रेट्स का Laissez-faire आर्थिक दर्शन भी इसमें सहायक रहे।
1789 के क्रांतिकारी प्रस्फोट का कालक्रम सूत्र (1789 Breakthrough Chronology)
1789 के क्रांतिकारी मील के पत्थर
14 जुलाई फ्रांस का राष्ट्रीय दिवस बना; 4 अगस्त को सामंतवाद व टाइथ हमेशा के लिए समाप्त हुआ।
1791 के संविधान का शासन व मताधिकार सूत्र (1791 Constitutional Matrix)
बुर्जुआ संवैधानिक राजतंत्र मॉडल
ओलम्प द गूज ने 1791 में 'महिला एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा' के जरिए इस विभाजन का विरोध किया।
आतंक के राज का अधिनायकवादी तंत्र समीकरण (Reign of Terror Machinery)
क्रांतिकारी अधिनायकवाद व तानाशाही मॉडल
जनरल मैक्सिमम कानून से मूल्य नियंत्रण व 'समानता की रोटी' अनिवार्य की गई।
फ्रांसीसी क्रांति के सार्वभौमिक आदर्शों का अमर त्रयी सूत्र (Universal Legacy Matrix)
आधुनिक लोकतंत्र की वैश्विक आधारशिला
भारत में टीपू सुल्तान (जैकोबिन क्लब व स्वतंत्रता का वृक्ष) और राजा राममोहन राय इससे गहरे प्रेरित थे।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्राचीन व्यवस्था (Ancien Régime) के तहत फ्रांस के त्रि-स्तरीय सामाजिक विभाजन और तृतीय एस्टेट के विभिन्न वर्गों की स्थिति व असंतोष का विस्तृत विश्लेषण कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

1789 से पूर्व फ्रांस की संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था विशेषाधिकारों और अन्यायपूर्ण विषमता पर आधारित थी। फ्रांसीसी समाज तीन एस्टेटों में बंटा हुआ था:

  1. प्रथम एस्टेट (पादरी - Clergy): जनसंख्या मात्र 0.5% (लगभग 1,30,000), किंतु देश की 10% उपजाऊ भूमि के स्वामी। वे किसानों से उपज का 1/10वां भाग धार्मिक कर (टाइथ) वसूलते थे और राज्य के सभी प्रत्यक्ष करों से पूर्ण मुक्त थे। उच्च पादरी विलासी थे, जबकि 50,000 ग्रामीण क्योर (निम्न पादरी) निर्धन थे और किसानों के प्रति सहानुभूति रखते थे।
  2. द्वितीय एस्टेट (कुलीन - Nobility): जनसंख्या 1.5% (लगभग 3,50,000), और 20-25% भूमि पर आधिपत्य। सेना, प्रशासन और न्यायपालिका के सभी शीर्ष पदों पर इनका एकाधिकार था। वे सभी प्रत्यक्ष करों से मुक्त थे और किसानों से सामंती कर व बनालिते वसूलते थे।
  3. तृतीय एस्टेट (Third Estate - 98% जनता): यह वर्ग अत्यंत विविधतापूर्ण था:
    • बुर्जुआ (मध्यम वर्ग): व्यापारी, वकील, डॉक्टर और बुद्धिजीवी। वे शिक्षित और धनवान थे, किंतु उच्च प्रशासनिक पदों और सामाजिक सम्मान से वंचित थे। वे राजनीतिक समानता चाहते थे।
    • किसान (80% आबादी): सामंती जुल्मों के मुख्य शिकार। वे कोरवी (बेगार श्रम), बनालिते (चक्की-तंदूर शुल्क) और टाइल जैसे भारी करों से दबे थे। अपनी कुल कमाई का 70-80% वे करों में गंवा देते थे।
    • साँ-कुलोत्त (शहरी मजदूर व दस्तकार): महंगाई और रोटी की कमी से भुखमरी की कगार पर थे। निष्कर्ष: इस व्यवस्था ने एक विस्फोटक स्थिति पैदा कर दी थी। सारा कर भार वहन करने वाला 98% वर्ग अधिकारों से वंचित था, जिसने क्रांति की सामाजिक आधारशिला रखी।
उदाहरण 2
18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में फ्रांस के भीषण वित्तीय संकट के क्या कारण थे? विभिन्न वित्त मंत्रियों द्वारा सुझाए गए सुधार क्यों विफल रहे?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

1789 तक फ्रांस का राजकोष पूरी तरह दिवालिया हो चुका था। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:

  1. युद्ध व्यय और राष्ट्रीय ऋण: सप्तवर्षीय युद्ध (1756-63) और अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम (1775-83) में फ्रांस की भागीदारी ने राजकोष को तबाह कर दिया। फ्रांस पर कुल राष्ट्रीय ऋण 2 अरब लिव्रे से अधिक हो गया, और बजट का 50% केवल ऋणों का ब्याज चुकाने में जा रहा था।
  2. वर्साय का अंधाधुंध अपव्यय: वर्साय के भव्य राजमहल में रानी मैरी एंटोइनेट ('मैडम डेफिसिट') और दरबारियों के विलासितापूर्ण जीवन पर राजस्व का 6-10% व्यय होता था।
  3. दोषपूर्ण कर व्यवस्था: सबसे धनी वर्ग (पादरी और कुलीन) करों से मुक्त थे, और केवल निर्धन तृतीय एस्टेट पर टाइल, गैबेल और विंग्तिएम का भार था। कर वसूली निजी ठेकेदारों (Ferme Générale) के हाथों में थी जो भारी लूट करते थे।
  4. सुधारों की विफलता:
    • तुर्गो (1774-76): फिजियोक्रेट तुर्गो ने खर्च घटाने और विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों पर भूमि कर लगाने का प्रस्ताव रखा, किंतु रानी और दरबारी कुलीनों के दबाव में उन्हें हटा दिया गया।
    • जाक नेकर (1776-81): नेकर ने 1781 में 'कॉम्पते रेंडू' द्वारा शाही बजट सार्वजनिक कर दिया, जिससे नाराज होकर उन्हें पदच्युत कर दिया गया।
    • कैलोन (1783-87): कैलोन ने 1787 में संभ्रांतों की सभा बुलाई और सभी वर्गों पर समान भूमि कर का प्रस्ताव रखा। कुलीनों ने इसे ठुकरा दिया और पार्लमां ने कर अध्यादेश पंजीकृत करने से मना कर दिया। निष्कर्ष: कुलीनों की स्वार्थी हठधर्मिता ने वित्तीय सुधारों को विफल कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप राजा को 175 वर्ष बाद एस्टेट्स जनरल बुलाने पर विवश होना पड़ा।
उदाहरण 3
1789 की फ्रांसीसी क्रांति की वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार करने में प्रबोधनकालीन दार्शनिकों—मॉन्टेस्क्यू, वॉल्टेयर और रूसो—के योगदान का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

18वीं सदी के फ्रांसीसी दार्शनिकों ने प्राचीन व्यवस्था के वैचारिक और नैतिक आधार को नष्ट कर क्रांति की बौद्धिक पृष्ठभूमि तैयार की:

  1. मॉन्टेस्क्यू (1689-1755): अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द स्पिरिट ऑफ द लॉज' (1748) में उन्होंने राजा के दैवी अधिकारों के सिद्धांत का खंडन किया। उन्होंने शक्ति पृथक्करण (Separation of Powers) का सिद्धांत दिया, जिसके अनुसार विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को एक-दूसरे से स्वतंत्र होना चाहिए ताकि निरंकुशता रोकी जा सके।
  2. वॉल्टेयर (1694-1778): उन्होंने कैथोलिक चर्च के अंधविश्वास, पाखंड और असहिष्णुता पर तीखे व्यंग्य किए। उनका उद्घोष था—'Écrasez l'infâme' (इस कुख्यात संस्था को कुचल दो)। वे व्यक्तिगत विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सबसे बड़े समर्थक थे।
  3. ज्यां-जैक्स रूसो (1712-1778): क्रांति के सबसे प्रभावशाली विचारक। अपनी अमर कृति 'द सोशल कॉन्ट्रैक्ट' (1762) में उन्होंने घोषणा की: 'मनुष्य स्वतंत्र जन्म लेता है, किंतु सर्वत्र वह जंजीरों में जकड़ा है।' उन्होंने जनता की संप्रभुता (Popular Sovereignty) और 'सामान्य इच्छा' (General Will) का सिद्धांत दिया, जिसने यह सिद्ध किया कि शासन जनता के कल्याण के लिए है और निरंकुश राजा को हटाने का अधिकार जनता को है।
  4. विश्वकोशकार व फिजियोक्रेट्स: दीदरो के विश्वकोश ने वैज्ञानिक तर्कवाद का प्रसार किया, जबकि क्वेसने व गुर्ने जैसे फिजियोक्रेट्स ने अहस्तक्षेप (Laissez-faire) और मुक्त व्यापार की मांग की। निष्कर्ष: यद्यपि दार्शनिकों ने स्वयं प्रत्यक्ष क्रांति नहीं की, किंतु उन्होंने प्राचीन व्यवस्था के अन्याय को जनता की चेतना में स्पष्ट कर दिया और क्रांति को 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व' के अमर आदर्श प्रदान किए।
उदाहरण 4
14 जुलाई 1789 को बास्तील दुर्ग का पतन किन परिस्थितियों में हुआ, और इसे फ्रांसीसी क्रांति का प्रस्थान बिंदु व ऐतिहासिक मील का पत्थर क्यों माना जाता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

14 जुलाई 1789 को पेरिस में बास्तील के मध्यकालीन किले का पतन फ्रांसीसी क्रांति का सबसे युगांतरकारी मोड़ था:

  1. तात्कालिक परिस्थितियां:
    • सैन्य घेराबंदी की अफवाह: लुई सोलहवें ने पेरिस और वर्साय के आसपास 20,000 विदेशी भाड़े के सैनिकों को तैनात किया था, जिससे जनता में डर था कि राजा नेशनल असेंबली को भंग कर जनता का कत्लेआम करवाएगा।
    • नेकर की बर्खास्तगी: 11 जुलाई को जनता के चहेते सुधारक वित्त मंत्री जाक नेकर को राजा द्वारा बर्खास्त किए जाने से पेरिस में भारी आक्रोश फैल गया।
    • रोटी का अकाल: 1788-89 के भयंकर अकाल के कारण रोटी की कीमतें आसमान पर थीं और भुखमरी से पीड़ित जनता हिंसक हो उठी थी।
  2. बास्तील पर धावा: 14 जुलाई की सुबह हजारों नागरिकों ने हथियार एकत्र करने के लिए बास्तील के किले को घेर लिया। यह किला केवल बारूद का गोदाम नहीं था, बल्कि बूर्बों राजशाही के क्रूर अत्याचारों और गुप्त कैद का प्रतीक था। जनता ने गवर्नर द'लॉने को मारकर किले पर कब्जा कर लिया और उसकी एक-एक ईंट उखाड़ फेंकी।
  3. ऐतिहासिक महत्व:
    • निरंकुशता का प्रतीकात्मक अंत: बास्तील के ध्वंस ने यह साबित कर दिया कि बूर्बों राजतंत्र अब अजेय नहीं रहा।
    • जनता की शक्ति की विजय: राजा को सेना हटाने और नेशनल असेंबली को मान्यता देने पर विवश होना पड़ा।
    • क्रांतिकारी संस्थाओं का जन्म: पेरिस कम्यून (नागरिक सरकार) बनी और लफायेत के नेतृत्व में नेशनल गार्ड का गठन हुआ।
    • राष्ट्रीय दिवस: 14 जुलाई को आज भी फ्रांस के राष्ट्रीय दिवस (Bastille Day) के रूप में मनाया जाता है।
उदाहरण 5
26 अगस्त 1789 को नेशनल असेंबली द्वारा जारी 'मानव एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा' के प्रमुख सिद्धांतों का वर्णन कीजिए। इसकी ऐतिहासिक महत्ता व सीमाएं क्या थीं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

26 अगस्त 1789 को नेशनल असेंबली द्वारा स्वीकृत 'मानव एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा' (Declaration of the Rights of Man and of the Citizen) आधुनिक लोकतंत्र का मैग्नाकार्टा मानी जाती है। लफायेत द्वारा प्रारूपित इस घोषणापत्र के मुख्य सिद्धांत निम्नलिखित थे:

  1. प्राकृतिक व अहस्तांतरणीय अधिकार:
    • "सभी मनुष्य जन्म से स्वतंत्र और अधिकारों में समान हैं।"
    • मनुष्य के प्राकृतिक अधिकार हैं: स्वतंत्रता, संपत्ति, व्यक्तिगत सुरक्षा और दमन का विरोध करने का अधिकार।
  2. जन संप्रभुता और कानून का शासन: संप्रभुता का स्रोत किसी राजा में नहीं, बल्कि राष्ट्र (जनता) में निहित है। कानून सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति है और कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं।
  3. नागरिक स्वतंत्रताएं: विचार, भाषण, प्रेस और धार्मिक विश्वास की पूर्ण स्वतंत्रता, जब तक कि इससे सार्वजनिक व्यवस्था भंग न हो।
  4. समान कर व्यवस्था: कर सभी नागरिकों पर उनकी क्षमता के अनुसार समान रूप से लगाए जाने चाहिए। ऐतिहासिक महत्ता: इसने सामंतवाद, विशेषाधिकार और दैवी राजतंत्र की कब्र खोद दी। इसने दुनिया को यह संदेश दिया कि राज्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए है, न कि नागरिक राजा की सेवा के लिए। सीमाएं:
  • यह घोषणा सार्वभौमिक नहीं थी। इसमें महिलाओं के अधिकारों की पूरी उपेक्षा की गई।
  • फ्रांसीसी उपनिवेशों में दासों के अधिकारों का इसमें कोई उल्लेख नहीं था।
  • बाद में 1791 के संविधान में संपत्ति के आधार पर 'सक्रिय' और 'निष्क्रिय' नागरिकों का भेद करके निर्धनों को मताधिकार से वंचित कर दिया गया।
उदाहरण 6
मैक्सिमिलियन रोबस्पियर के नेतृत्व में 'आतंक के राज' (Reign of Terror 1793-1794) की स्थापना की ऐतिहासिक परिस्थितियां, नीतियां और इसके पतन के कारणों का विश्लेषण कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

1793 से 1794 के मध्य फ्रांस में रोबस्पियर के नेतृत्व में स्थापित 'आतंक का राज' (Reign of Terror) फ्रांसीसी क्रांति का सबसे खूनी किंतु निर्णायक चरण था:

  1. स्थापना की परिस्थितियां:
    • विदेशी आक्रमण: ऑस्ट्रिया, प्रशा, ब्रिटेन, स्पेन के प्रथम गठबंधन ने फ्रांस को चारों तरफ से घेर लिया था।
    • आंतरिक गृहयुद्ध: पश्चिमी फ्रांस (वांदे) में कैथोलिक किसानों और राजभक्तों ने बगावत कर दी थी।
    • आर्थिक संकट: महंगाई, रोटी की कमी और असाइनेट्स का अवमूल्यन चरम पर था। इन परिस्थितियों में कन्वेंशन ने 12 सदस्यीय 'लोक सुरक्षा समिति' को तानाशाही शक्तियां सौंप दीं।
  2. आतंक के राज की प्रमुख नीतियां:
    • संदिग्धों का कानून (Law of Suspects - 1793): क्रांति के प्रति तनिक भी संदेहास्पद आचरण वाले किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा सकता था। क्रांतिकारी ट्रिब्यूनल द्वारा लगभग 40,000 लोगों को गिलोटिन पर मौत के घाट उतारा गया।
    • सख्त आर्थिक नियंत्रण: 'जनरल मैक्सिमम' कानून द्वारा आवश्यक वस्तुओं के दाम और मजदूरी तय की गई। सभी के लिए साबुत अनाज की 'समानता की रोटी' अनिवार्य की गई।
    • लेवी एन मासे (सार्वभौमिक सैन्य भर्ती): 8 लाख नागरिकों की सेना खड़ी कर विदेशी सेनाओं को पराजित किया गया।
    • ईसाइयत का उन्मूलन: चर्च बंद किए गए और 'सर्वोच्च सत्ता की पूजा' लागू की गई।
  3. पतन के कारण (थर्मिडोरियन प्रतिक्रिया):
    • जब विदेशी युद्धों का खतरा टल गया, तब भी रोबस्पियर ने आतंक बंद नहीं किया। उसने अपने साथी जॉर्जेस दांतों और हर्बर्ट को भी गिलोटिन पर चढ़ा दिया।
    • कन्वेंशन के सदस्य भयभीत हो गए कि उनका नंबर न आ जाए। 9 थर्मिडोर (27 जुलाई 1794) को कन्वेंशन ने रोबस्पियर की गिरफ्तारी का आदेश दिया।
    • 28 जुलाई 1794 को रोबस्पियर को गिलोटिन पर मृत्युदंड दिए जाने के साथ आतंक के राज का अंत हुआ।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

टाइथ (Tithe) और टाइल (Taille) करों के बीच अंतर न समझ पाना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

'टाइथ' (Tithe) चर्च द्वारा किसानों से उनकी उपज का 1/10वां भाग वसूला जाने वाला धार्मिक कर था। जबकि 'टाइल' (Taille) फ्रांसीसी राजतंत्र द्वारा केवल तृतीय एस्टेट पर लगाया जाने वाला प्रमुख प्रत्यक्ष भूमिकर था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि फ्रांसीसी दार्शनिकों ने स्वयं प्रत्यक्ष रूप से क्रांति का आयोजन या नेतृत्व किया था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वॉल्टेयर और रूसो दोनों की मृत्यु क्रांति से 11 वर्ष पूर्व 1778 में ही हो चुकी थी, जबकि मॉन्टेस्क्यू की मृत्यु 1755 में हुई थी। उन्होंने कोई प्रत्यक्ष आंदोलन नहीं किया; उन्होंने केवल विचारों के माध्यम से प्राचीन व्यवस्था की निरंकुशता और धार्मिक पाखंड पर प्रहार कर क्रांति की वैचारिक जमीन तैयार की थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

1791 के संविधान के तहत फ्रांस को एक 'गणराज्य' (Republic) मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

1791 के संविधान ने फ्रांस को 'संवैधानिक राजतंत्र' (Constitutional Monarchy) बनाया था, जहां लुई सोलहवें राजा बना रहा किंतु उसकी शक्तियां सीमित कर दी गईं। प्रथम फ्रांसीसी गणराज्य की स्थापना 21 सितंबर 1792 को 'नेशनल कन्वेंशन' द्वारा की गई थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सक्रिय नागरिक (Active Citizens) और निष्क्रिय नागरिक (Passive Citizens) के वर्गीकरण में लिंग और संपत्ति का भेद भूल जाना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

1791 के संविधान में मताधिकार केवल 'सक्रिय नागरिकों' को मिला—यानी 25 वर्ष से अधिक उम्र के वे पुरुष जो कम से कम 3 दिन की मजदूरी के बराबर प्रत्यक्ष कर देते थे (लगभग 43 लाख)। शेष निर्धन पुरुष और सभी 100% महिलाएं 'निष्क्रिय नागरिक' थीं और उन्हें वोट देने का कोई अधिकार नहीं था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गिरोंदिस्ट (Girondins) और जैकोबिन (Jacobins) दलों की विचारधारा और सामाजिक आधार में भ्रम।

सही वैज्ञानिक तथ्य

गिरोंदिस्ट प्रांतीय, समृद्ध बुर्जुआ व्यापारी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे और कानून के शासन व मुक्त व्यापार के पक्षधर उदारवादी थे। जबकि जैकोबिन पेरिस के उग्र निम्न-मध्यम वर्ग और साँ-कुलोत्तों के समर्थक थे, जिन्होंने मूल्य नियंत्रण और आतंक के राज का संचालन किया।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

मैक्सिमिलियन रोबस्पियर और जॉर्जेस दांतों को एक ही विचारधारा का मानकर अंत तक एक साथ दिखाना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यद्यपि दोनों जैकोबिन थे, किंतु 1794 में दांतों ने आतंक को समाप्त करने और नरसंहार रोकने की वकालत की ('द इंडल्जेंट्स')। इससे नाराज होकर रोबस्पियर ने अप्रैल 1794 में दांतों पर मुकदमा चलाकर उन्हें भी गिलोटिन पर चढ़वा दिया था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

14 जुलाई 1789 और 4 अगस्त 1789 के ऐतिहासिक निर्णयों को आपस में मिला देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

14 जुलाई 1789 को पेरिस की आम जनता द्वारा बास्तील दुर्ग का पतन हुआ था। जबकि सामंतवाद, व्यक्तिगत दासता और टाइथ की समाप्ति की ऐतिहासिक घोषणा नेशनल असेंबली द्वारा '4 अगस्त 1789 की रात' को की गई थी।

फ्रांसीसी क्रांति का वैचारिक प्रवाह एवं ऐतिहासिक विकासक्रम (WBBSE Class 9 Chapter 1)

1789 — 1799 ERA Some Aspects of the French Revolution: Core Architecture & Timeline (1789–1799) West Bengal Board of Secondary Education (WBBSE) • Class IX Social Science (History) I 1. The Ancien Régime (Social & Financial Crisis) First Estate: Clergy (~0.5% pop, collected Tithe, tax exempt) Second Estate: Nobility (~1.5% pop, feudal dues, monopolies) Third Estate: Bourgeoisie, Peasants & Urban Poor (~98% carrying all taxes) Fiscal Bankruptcy: War debts, Taille, Gabelle & feudal exploitation II 2. Intellectual Catalyst: The Philosophers Montesquieu: 'Spirit of the Laws' (Separation of Powers) Voltaire: Crusaded against church fanaticism, despotism & privilege Rousseau: 'Social Contract' (Popular Sovereignty & General Will) Encyclopaedists & Physiocrats: Diderot, rationalism & free enterprise III 3. Outbreak & Constitutional Monarchy (1789–1792) Estates-General (5 May 1789): Voting dispute (order vs. head) Tennis Court Oath (20 June): National Assembly resolves constitution Storming of the Bastille (14 July 1789): Shattered Bourbon absolutism Declaration of the Rights of Man (26 Aug) & Constitution of 1791 IV 4. The Radical Republic & Reign of Terror (1792–1794) Fall of Monarchy: Tuileries stormed, First Republic (21 Sept 1792) Execution of King Louis XVI (21 Jan 1793) & Foreign Coalitions Jacobins vs. Girondins; Committee of Public Safety formed Reign of Terror (Robespierre), Law of Suspects & Thermidorian Reaction Enduring Ideals: Liberty (Liberté) • Equality (Égalité) • Fraternity (Fraternité) • Feudalism Abolished

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. प्राचीन व्यवस्था की सामाजिक विषमता: 1789 से पूर्व फ्रांसीसी समाज तीन एस्टेटों में विभाजित था। मात्र 2% विशेषाधिकार प्राप्त पादरी और कुलीन वर्ग 35% भूमि के स्वामी थे और सभी प्रत्यक्ष करों से मुक्त थे, जबकि 98% तृतीय एस्टेट (बुर्जुआ, किसान व साँ-कुलोत्त) सारा कर भार वहन करता था और राजनीतिक अधिकारों से वंचित था।
मुख्य बिंदु 2
  1. दिवालिया राजतंत्र व दमनकारी कर: सप्तवर्षीय युद्ध और अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम (1 अरब लिव्रे कर्ज) ने फ्रांस को 2 अरब लिव्रे के कर्ज में डुबो दिया। बजट का 50% केवल ब्याज भुगतान में जाता था। टाइल (भूमिकर), टाइथ (चर्च कर) और गैबेल (नमक कर) ने जनता की कमर तोड़ दी। कुलीनों ने तुर्गो, नेकर और कैलोन के कर सुधार ठुकरा दिए, जिससे 1787-88 का कुलीन विद्रोह हुआ।
मुख्य बिंदु 3
  1. प्रबोधनकालीन दार्शनिकों का बौद्धिक प्रहार: मॉन्टेस्क्यू ने 'द स्पिरिट ऑफ द लॉज' में शक्ति पृथक्करण दिया; वॉल्टेयर ने 'Écrasez l'infâme' के साथ चर्च के पाखंड और असहिष्णुता पर चोट की; और रूसो ने 'द सोशल कॉन्ट्रैक्ट' में सामान्य इच्छा और जनता की संप्रभुता का प्रतिपादन कर क्रांति की वैचारिक मशाल जलाई।
मुख्य बिंदु 4
  1. 1789 का क्रांतिकारी विस्फोट: 5 मई 1789 को एस्टेट्स जनरल में मतदान विवाद के बाद तृतीय एस्टेट ने 17 जून को 'नेशनल असेंबली' और 20 जून को 'टेनिस कोर्ट की शपथ' ली। 14 जुलाई 1789 को पेरिस की जनता द्वारा बास्तील दुर्ग का पतन निरंकुश राजतंत्र के खात्मे का प्रतीक बना (फ्रांस का राष्ट्रीय दिवस)।
मुख्य बिंदु 5
  1. सामंतवाद का अंत और मानव अधिकार: ग्रामीण महाभय (La Grande Peur) के बाद 4 अगस्त 1789 की रात्रि को सामंतवाद, बनालिते और टाइथ का पूर्ण खात्मा हुआ। 26 अगस्त 1789 को लफायेत द्वारा प्रारूपित 'मानव एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा' ने स्वतंत्रता, समानता और संपत्ति को सार्वभौमिक प्राकृतिक अधिकार घोषित किया। 5-6 अक्टूबर को महिलाओं के वर्साय मार्च ने राजा को पेरिस ला दिया।
मुख्य बिंदु 6
  1. संविधान सभा के सुधार व 1791 का संविधान: फ्रांस को 83 विभागों में बांटा गया, मीट्रिक प्रणाली लागू हुई, चर्च की संपत्ति से असाइनेट्स मुद्रा जारी हुई और पादरियों का सिविल संविधान (1790) बना। 1791 के संविधान ने संवैधानिक राजतंत्र स्थापित किया, किंतु मताधिकार केवल करदाता 'सक्रिय नागरिकों' तक सीमित रखा। 20-21 जून 1791 को वारेन के पलायन ने राजा के देशद्रोह को उजागर किया।
मुख्य बिंदु 7
  1. प्रथम गणराज्य और आतंक का राज (1793-94): विदेशी युद्धों (पिल्निट्ज, ला मार्सेइले) के बाद 10 अगस्त 1792 को राजतंत्र गिरा, 21 सितंबर 1792 को प्रथम फ्रांसीसी गणराज्य बना और 21 जनवरी 1793 को लुई सोलहवें को गिलोटिन पर मृत्युदंड दिया गया। मैक्सिमिलियन रोबस्पियर के नेतृत्व में जैकोबिनों ने 'लोक सुरक्षा समिति', संदिग्धों के कानून और गिलोटिन के जरिए आतंक का राज चलाया (40,000 मृत्युदंड), जिसका अंत 28 जुलाई 1794 (9 थर्मिडोर) को रोबस्पियर के वध से हुआ।
मुख्य बिंदु 8
  1. क्रांति का अमर वैश्विक प्रभाव: फ्रांसीसी क्रांति ने विश्व को 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व' (Liberté, Égalité, Fraternité) का अमर त्रयी आदर्श दिया। इसने सामंतवाद, निरंकुश राजतंत्र और विशेषाधिकारों का स्थायी अंत कर आधुनिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद और लोकतांत्रिक मानवाधिकारों की मजबूत नींव रखी, जिससे भारत में टीपू सुल्तान और राजा राममोहन राय भी गहराई से प्रेरित हुए।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
प्राचीन व्यवस्था में तृतीय एस्टेट के अंतर्गत बुर्जुआ वर्ग शिक्षित और धनी होने के बावजूद क्रांति का समर्थक क्यों बना?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: बुर्जुआ वर्ग (व्यापारी, वकील, डॉक्टर, उद्योगपति) आर्थिक रूप से संपन्न और प्रबोधन के विचारों से भली-भांति परिचित था। किंतु प्राचीन व्यवस्था में सेना, न्यायपालिका और राजदरबार के सभी उच्च पद केवल जन्मजात कुलीनों के लिए आरक्षित थे। भारी कर चुकाने के बावजूद उन्हें कोई राजनीतिक अधिकार या सामाजिक सम्मान प्राप्त नहीं था। इस सामाजिक अपमान और कुलीनों के विशेषाधिकारों को समाप्त करने के लिए बुर्जुआ वर्ग ने क्रांति का नेतृत्व किया।
योग्यता और संपत्ति होने पर भी उच्च प्रशासनिक पदों और राजनीतिक शक्ति से वंचित रखे जाने पर विचार करें।
2
20 जून 1789 को ली गई 'टेनिस कोर्ट की शपथ' का फ्रांस के संवैधानिक इतिहास में क्या महत्व था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: जब राजा ने तृतीय एस्टेट के सभा भवन में ताला लगवा दिया, तो प्रतिनिधियों ने बेली और मीराबाई के नेतृत्व में टेनिस कोर्ट में एकत्र होकर शपथ ली कि वे तब तक अलग नहीं होंगे जब तक फ्रांस का संविधान नहीं बन जाता। इसका ऐतिहासिक महत्व यह था कि इसने राजा के दैवी अधिकारों को सीधे चुनौती दी और यह स्थापित किया कि वास्तविक राजनीतिक सत्ता राजा की आज्ञा में नहीं, बल्कि जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों में निहित है।
संविधान निर्माण के संकल्प और राजा की निरंकुश आज्ञा की खुली अवहेलना को याद करें।
3
1790 में पारित 'पादरियों का सिविल संविधान' (Civil Constitution of the Clergy) क्रांति के लिए आत्मघाती कदम क्यों सिद्ध हुआ?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: इस कानून द्वारा चर्च को राज्य का अंग बना दिया गया, पोप का प्रशासनिक अधिकार समाप्त हुआ और पादरियों का जनता द्वारा चुनाव व सरकारी वेतन अनिवार्य किया गया। जब पादरियों पर संविधान की शपथ लेना बाध्यकारी हुआ, तो लगभग आधे पादरियों (रिफ्रैक्टरी) ने इनकार कर दिया। पोप द्वारा इसकी भर्त्सना के बाद फ्रांस के धार्मिक ग्रामीण किसान, कैथोलिक जनता और राजा क्रांति के कट्टर विरोधी बन गए, जिससे वांदे में खूनी गृहयुद्ध भड़का।
कैथोलिक आस्था, वफादारी की शपथ और ग्रामीण किसानों व पोप के विरोध पर ध्यान दें।
4
1791 के संविधान में 'सक्रिय' और 'निष्क्रिय' नागरिकों के वर्गीकरण की क्या प्रमुख आलोचना थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 1791 के संविधान ने 26 अगस्त 1789 की मानव अधिकारों की घोषणा ('सभी मनुष्य समान हैं') का खुला उल्लंघन किया। इसमें केवल 3 दिन की मजदूरी के बराबर प्रत्यक्ष कर देने वाले 25+ वर्ष के पुरुषों (43 लाख सक्रिय नागरिक) को वोट का अधिकार मिला। 30 लाख निर्धन पुरुषों और समाज की सभी 100% महिलाओं को निष्क्रिय नागरिक बनाकर मताधिकार से वंचित कर दिया गया। इसने सिद्ध किया कि क्रांति ने कुलीनों के विशेषाधिकार समाप्त कर केवल धनी बुर्जुआ वर्ग के विशेषाधिकार स्थापित किए थे।
समानता के दावे के बावजूद संपत्ति के आधार पर निर्धनों और महिलाओं को मताधिकार से वंचित रखने पर विचार करें।
5
मैक्सिमिलियन रोबस्पियर के 'आतंक के राज' (Reign of Terror) के दौरान 'संदिग्धों के कानून' और क्रांतिकारी ट्रिब्यूनल की कार्यप्रणाली क्या थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 17 सितंबर 1793 के 'संदिग्धों के कानून' के तहत किसी भी व्यक्ति को केवल क्रांति के प्रति असंतोष व्यक्त करने, कानून का पालन न करने या कुलीन वर्ग से संबंध होने के संदेह पर तुरंत गिरफ्तार किया जा सकता था। क्रांतिकारी ट्रिब्यूनल (अदालत) में न कोई निष्पक्ष सुनवाई होती थी और न वकील रखने की अनुमति थी। अदालत केवल दो निर्णय देती थी: बरी या गिलोटिन पर मृत्युदंड। इसके तहत लगभग 40,000 निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया।
बिना सबूत गिरफ्तारी, कानूनी बचाव के अधिकार की समाप्ति और गिलोटिन के क्रूर प्रयोग को याद करें।
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