ICSE • कक्षा 6 • Mathematics • अध्याय 6
अनुमानित समय: 45-60 मिनट
प्रगति: अध्ययनरत
दशमलव (Decimals)
दशमलव संख्याएं प्रारंभिक गणित के इतिहास में सबसे क्रांतिकारी और व्यावहारिक संकल्पनाओं में से एक हैं। काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशंस (CISCE) के कक्षा 6 के गणित पाठ्यक्रम में यह अध्याय छात्रों को असतत पूर्ण वस्तुओं की गिनती से आगे ले जाकर सतत वास्तविक भौतिक राशियों के सूक्ष्म व यथार्थ मापन की ओर अग्रसर करता है। हमारी पारंपरिक आधार-दस (डेसिमल) स्थानीय मान प्रणाली में, जब भी हम इकाई के स्थान से बाईं ओर एक पद बढ़ते हैं, तो स्थानीय मान दस गुना बढ़ जाता है: इकाई से दहाई (दस गुना), दहाई से सैकड़ा (दस गुना), और सैकड़े से हजार (दस गुना)। सदियों तक यह नियम इकाई के स्थान पर आकर ठहर जाता था। दशमलव भिन्नों का मूलभूत वैचारिक चमत्कार इस सत्य को समझने में निहित है कि यही नियम इकाई के स्थान के दाईं ओर भी अनंत तक उसी क्रम में लागू रहता है, जहाँ प्रत्येक अगला दायां स्थान अपने ठीक पिछले बाएं स्थान के मान का दसवां भाग (अर्थात एक बटा दस) होता है। इस प्रकार इकाई के ठीक दाईं ओर चलने पर दशांश (दसवां भाग या 1/10 = 0.1), उसके आगे शतांश (सौवां भाग या 1/100 = 0.01), उसके आगे सहस्त्रांश (हजारवां भाग या 1/1000 = 0.001), और इसी क्रम में दस-सहस्त्रांश तथा लक्ष्यांश आदि स्थान प्राप्त होते हैं।
संरचनात्मक रूप से किसी भी दशमलव संख्या के तीन अभिन्न अंग होते हैं: पहला, पूर्ण संख्या भाग (या पूर्णांक भाग) जो दशमलव बिंदु के बाईं ओर स्थित होता है; दूसरा, दशमलव बिंदु, जो एक छोटा सा बिंदु या डॉट होता है तथा पूर्ण इकाइयों और भिन्नात्मक भागों के बीच विभाजक सीमा रेखा का कार्य करता है; और तीसरा, दशमलव भिन्नात्मक भाग, जो दशमलव बिंदु के ठीक दाईं ओर स्थित होता है। उदाहरण के लिए, दशमलव संख्या पच्चीस दशमलव सात चार (25.74) में 25 पूर्णांक भाग है, बिंदु दशमलव विभाजक है, तथा 7 दशांश और 4 शतांश मिलकर भिन्नात्मक भाग बनाते हैं। यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण भाषाई व गणितीय नियम का पालन करना अनिवार्य है: दशमलव बिंदु के बाईं ओर की पूर्ण संख्या को हम एक साथ संयुक्त संख्या के रूप में पढ़ते हैं (जैसे पच्चीस), किंतु दशमलव बिंदु के दाईं ओर के अंकों को सदैव पृथक-पृथक एक-एक अंक करके पढ़ा जाता है (सात चार, कभी भी चौहत्तर नहीं), क्योंकि प्रत्येक अंक दस की एक विशिष्ट भिन्नात्मक घात का प्रतिनिधित्व करता है न कि पूर्ण दहाई या इकाई का।
दशमलव स्थानीय मान सारणी दशमलव संख्याओं के विश्लेषण और प्रसारित रूप का सबसे सशक्त आधार प्रस्तुत करती है। जिस प्रकार किसी पूर्ण संख्या को उसके अंकों के स्थानीय मानों के योग के रूप में प्रसारित किया जाता है, उसी प्रकार किसी भी दशमलव संख्या को दो प्रकार से प्रसारित किया जा सकता है: भिन्नात्मक प्रसारित रूप और दशमलव प्रसारित रूप। उदाहरण के लिए, तीन सौ पचहत्तर दशमलव चार आठ दो (375.482) का भिन्नात्मक प्रसारित रूप तीन सौ धन सत्तर धन पांच धन चार बटा दस धन आठ बटा सौ धन दो बटा एक हजार होता है। इसी संख्या का दशमलव प्रसारित रूप तीन सौ धन सत्तर धन पांच धन शून्य दशमलव चार धन शून्य दशमलव शून्य आठ धन शून्य दशमलव शून्य शून्य दो होता है। यह विभाजन स्पष्ट करता है कि किसी अंक का वास्तविक मान उसके अंकीय मान (अंकित मान) तथा उसके स्थानीय मान के गुणनफल के बराबर होता है।
संख्या रेखा पर दशमलवों का ज्यामितीय निरूपण छात्रों को उनकी वास्तविक माप और परिमाण की सहज समझ प्रदान करता है। संख्या रेखा पर शून्य और एक के बीच की दूरी एक पूर्ण इकाई को दर्शाती है। यदि इस दूरी को दस बराबर भागों में बांट दिया जाए, तो प्रत्येक भाग एक दशांश (0.1) को व्यक्त करता है, जिन्हें शून्य दशमलव एक, शून्य दशमलव दो से लेकर शून्य दशमलव नौ तक चिह्नित किया जाता है। यदि शून्य दशमलव छह और शून्य दशमलव सात के बीच के अंतराल को आवर्धित (ज़ूम) करके पुनः दस बराबर उप-भागों में विभाजित किया जाए, तो प्रत्येक सूक्ष्म कदम एक शतांश (0.01) को निरूपित करता है, जिससे शून्य दशमलव छह चार जैसे बिंदुओं को अत्यंत सटीकता से दर्शाया जा सकता है। संख्या रेखा का यह मॉडल दशमलवों की तुलना का स्वर्णिम नियम स्थापित करता है: जो दशमलव संख्या संख्या रेखा पर किसी दूसरी संख्या के बाईं ओर स्थित होती है वह उससे सदैव छोटी होती है, तथा जो संख्या दाईं ओर स्थित होती है वह उससे सदैव बड़ी होती है।
पाठ्यक्रम का एक अन्य महत्वपूर्ण स्तंभ समान दशमलव और असमान दशमलव की संकल्पना है। जिन दशमलव संख्याओं में दशमलव बिंदु के बाद अंकों की संख्या बिल्कुल समान होती है, उन्हें समान दशमलव कहा जाता है, जैसे तीन दशमलव चार पांच और बारह दशमलव शून्य आठ। जिन दशमलव संख्याओं में दशमलव बिंदु के बाद अंकों की संख्या भिन्न-भिन्न होती है, उन्हें असमान दशमलव कहा जाता है, जैसे पांच दशमलव दो और आठ दशमलव सात तीन नौ। यहाँ अंतिम शून्यों का अपरिवर्तनीयता नियम अत्यंत प्रभावी सिद्ध होता है: किसी भी दशमलव संख्या के भिन्नात्मक भाग के चरम दाईं ओर कितने भी शून्य बढ़ा दिए जाएं या हटा दिए जाएं, उस संख्या के मूल संख्यात्मक मान में रत्ती भर भी अंतर नहीं आता। उदाहरण के लिए, शून्य दशमलव पांच का मान शून्य दशमलव पांच शून्य के समान है, और यही मान शून्य दशमलव पांच शून्य शून्य के समान है, क्योंकि पांच दशांश, पचास शतांश, और पांच सौ सहस्त्रांश सभी सरलतम रूप में एक बटा दो के ही बराबर होते हैं। इस नियम का प्रयोग करके किसी भी असमान दशमलव समूह को उनके दाईं ओर शून्य जोड़कर सरलता से समान दशमलवों में परिवर्तित किया जाता है, जो कि दशमलवों के जोड़, घटाव और तुलना की प्राथमिक अनिवार्यता है।
दशमलव और साधारण भिन्नों के बीच का द्विमार्गी रूपांतरण सेतु पाठ्यक्रम का एक अनिवार्य व्यावहारिक भाग है। किसी शांत दशमलव को सरलतम भिन्न में बदलने के लिए दशमलव बिंदु को हटाकर पूरी संख्या को अंश में लिखा जाता है, तथा हर में एक के आगे दशमलव स्थानों जितने शून्य लगाए जाते हैं, तत्पश्चात अंश और हर को उनके महत्तम समापवर्तक (HCF) से विभाजित करके सरलतम रूप प्राप्त किया जाता है। इसके विपरीत, किसी साधारण भिन्न को दशमलव में बदलने के दो प्रमुख तरीके हैं: पहला, तुल्य भिन्न विधि जिसमें भिन्न के हर को दस, सौ, या एक हजार की घात में बदला जाता है (जैसे तीन बटा चार में अंश और हर को पच्चीस से गुणा करके पचहत्तर बटा सौ अर्थात शून्य दशमलव सात पांच प्राप्त करना); और दूसरा, दीर्घ भाग विधि जिसमें अंश को हर से विभाजित किया जाता है और आवश्यकतानुसार दशमलव बिंदु लगाकर शून्य बढ़ाए जाते हैं।
अंत में, दशमलवों पर चार मूलभूत गणितीय संक्रियाएं—योग, व्यवकलन, गुणन एवं भाग—दैनिक जीवन और मापन प्रणालियों के संचालन का आधार हैं। दशमलवों के जोड़ और घटाव का स्वर्णिम नियम यह है कि सभी संख्याओं के दशमलव बिंदुओं को एक सीधी ऊर्ध्वाधर रेखा में संरेखित किया जाए, आवश्यकतानुसार दाईं ओर शून्य जोड़कर उन्हें समान दशमलव बनाया जाए, और फिर साधारण पूर्ण संख्याओं की भांति हासिल और उधार लेते हुए संक्रिया संपन्न की जाए। गुणन के नियम के अंतर्गत, पहले दशमलव बिंदुओं की उपेक्षा करते हुए संख्याओं का साधारण गुणन किया जाता है, फिर दोनों संख्याओं के दशमलव स्थानों का योग करके, गुणनफल में चरम दाईं ओर से उतने ही अंक गिनकर दशमलव बिंदु लगाया जाता है। दस, सौ, या एक हजार जैसी दस की घातों से गुणा करने पर दशमलव बिंदु क्रमशः एक, दो, या तीन स्थान दाईं ओर खिसकता है, जबकि दस की घातों से भाग देने पर दशमलव बिंदु बाईं ओर खिसकता है। भाग की संक्रिया में यदि भाजक में दशमलव बिंदु उपस्थित हो, तो भाजक और भाज्य दोनों को दस की उपयुक्त घात से गुणा करके पहले भाजक को एक पूर्ण संख्या बनाया जाता है, जिसके बाद सामान्य भाग संपन्न होता है। इन सभी नियमों का सुदृढ़ अभ्यास छात्रों को उच्चतर कक्षाओं के भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, वाणिज्य तथा व्यावहारिक जीवन में सटीक गणनाएं करने में पूर्णतः समर्थ बनाता है।