1.1 जल की उपलब्धता: कुछ महत्वपूर्ण तथ्य एवं आंकड़े
जल एक नवीकरण योग्य प्राकृतिक संसाधन है जो निरंतर जलीय चक्र (Hydrological Cycle) के माध्यम से गतिशील और नवीकृत रहता है:
- विश्व का 96.5% जल महासागरों में उपस्थित है जो अत्यधिक खारा (Saline) होने के कारण मानव उपयोग के योग्य नहीं है।
- केवल 2.5% जल ही अलवणीय (मीठा/ताजा) जल है।
- अलवणीय जल का लगभग 70% भाग अंटार्कटिका, ग्रीनलैंड और पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ की चादरों व हिमानियों के रूप में जमा है।
- अलवणीय जल का 30% से भी कम भाग भौम जल (Groundwater) के रूप में भूमिगत जलभृतों (Aquifers) में संचित है।
- भारत की स्थिति: भारत को विश्व की कुल वर्षा का लगभग 4% हिस्सा प्राप्त होता है। प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष जल उपलब्धता के मामले में भारत का विश्व में 133वां स्थान है। अनुमान है कि 2025 तक भारत का एक बड़ा हिस्सा पूर्ण जल अभाव की स्थिति में पहुंच जाएगा।
1.2 जल दुर्लभता (Water Scarcity) के प्रमुख कारण
जल दुर्लभता का अर्थ केवल पानी की कमी नहीं, बल्कि उपयोग योग्य जल का अभाव है। इसके दो मुख्य आयाम हैं:
| आयाम | प्रमुख कारण | प्रभाव एवं उदाहरण |
|---|---|---|
| 1. मात्रात्मक कमी (Quantitative Shortage) | • जनसंख्या विस्फोट: घरेलू उपयोग और अनाज उत्पादन हेतु जल की अत्यधिक मांग। • कृषि में अति-दोहन: शुष्क ऋतु में भी नकदी फसलें उगाने हेतु नलकूपों द्वारा भूजल का अनियंत्रित दोहन, जिससे जल स्तर (Water Table) नीचे गिर रहा है। • उद्योग व शहरीकरण: बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा विद्युत उत्पादन (भारत में 22% बिजली जल विद्युत से) और औद्योगिक प्रक्रियाओं में अत्यधिक जल का उपभोग। | शहरों में पानी के टैंकरों के लिए लंबी कतारें; कुओं और नलकूपों का सूखना। |
| 2. गुणात्मक ह्रास (Qualitative Degradation) | जल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने के बावजूद प्रदूषित होने के कारण मानव उपयोग के योग्य नहीं रह गया है: • घरेलू सीवेज और कचरे का नदियों में निस्तारण। • उद्योगों का अनुपचारित जहरीला रासायनिक अपशिष्ट। • कृषि में अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और खरपतवारनाशकों का उपयोग जो रिसकर भूजल को विषाक्त बना देते हैं। | गंगा, यमुना जैसी प्रमुख नदियों का 'विषाक्त नालों' में बदल जाना; जल-जनित महामारियां। |