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JAC • Class X • Social Science • Ch 5
Estimated Time: 45 Mins
Study Progress: In Progress

Print Culture and the Modern World

मुद्रण या छपाई के बिना आज की आधुनिक दुनिया की कल्पना करना भी असंभव है। हमारे चारों ओर किताबें, पत्रिकाएं, अखबार, कैलेंडर, विधेयक और विज्ञापन फैले हुए हैं। मुद्रण का यह सफर पूर्वी एशिया से शुरू हुआ। चीन, जापान और कोरिया में हाथ से काठ के तख्तों (Woodblocks) पर छपाई की जाती थी। 1295 में मार्को पोलो इस तकनीक को चीन से इटली लेकर आया। 1430 से 1448 के मध्य जर्मनी के स्ट्रासबर्ग में जोहान गुटेनबर्ग ने जैतून के तेल निकालने वाले यंत्र से प्रेरणा लेकर धातु के चल अक्षरों (Movable Metal Type) वाली पहली प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किया और बाइबिल की छपाई की। मुद्रण क्रांति ने केवल पुस्तकों की संख्या में ही विस्फोट नहीं किया, बल्कि लोगों की सोच, धर्म और राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। 1517 में मार्टिन लूथर के 'पचानवे प्रमेयों' (Ninety-Five Theses) के मुद्रण ने रोमन कैथोलिक चर्च की सत्ता को हिला दिया और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार का बिगुल फूंका। 18वीं सदी के दार्शनिकों—वोल्टेयर और रूसो—के मुद्रित विचारों ने 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के वैचारिक आधार तैयार किए। 19वीं सदी में प्रिंटिंग प्रेस का विस्तार बच्चों, महिलाओं और कामगारों तक पहुंचा। भारत में 16वीं सदी के मध्य में पुर्तगाली जेसुइट मिशनरियों द्वारा गोवा में पहला प्रेस लाया गया। 1780 में जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने 'बंगाल गजट' की शुरुआत की। भारत में मुद्रण संस्कृति ने राजा राममोहन राय ('संवाद कौमुदी'), रससुंदरी देवी ('अमार जीबन'), ज्योतिराव फुले ('गुलामगिरी'), ताराबाई शिंदे और बाल गंगाधर तिलक ('केसरी') के माध्यम से सामाजिक सुधार, जाति-विरोधी चेतना, स्त्री विमर्श और उपनिवेश-विरोधी राष्ट्रवाद को प्रखर बनाया, जिसके दमन हेतु ब्रिटिश हुकूमत ने 1878 का कुख्यात 'वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट' पारित किया।

क्या कागज और स्याही की एक मशीन किसी धर्म और साम्राज्य को हिला सकती थी?

1517 में जर्मनी के एक साधारण धर्मशास्त्री मार्टिन लूथर ने कैथोलिक चर्च की भ्रष्ट प्रथाओं के खिलाफ 95 प्रमेय लिखे और उन्हें विटेनबर्ग के चर्च के दरवाजे पर टांग दिया। किसी ने उसकी एक प्रति प्रिंटिंग प्रेस में छपवा दी। कुछ ही हफ्तों में लूथर के विचार पूरे यूरोप में लाखों लोगों के हाथों में पहुंच गए! स्वयं लूथर ने विस्मय में कहा: 'मुद्रण ईश्वर की दी हुई सबसे बड़ी देन है, उसका सबसे महान उपहार!' जिस चर्च के आगे राजा-महाराजा थर-थर कांपते थे, उसे कागज और स्याही के एक छोटे से यंत्र ने दो फाड़ कर दिया। आइए जानें कि कैसे छपाई ने इंसान की सोच में सबसे बड़ा धमाका किया!

Why This Chapter Matters

JAC और CBSE कक्षा 10वीं बोर्ड परीक्षा में 'मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया' इतिहास का सर्वाधिक वैचारिक व अंक-प्रदाता अध्याय है। गुटेनबर्ग की प्रिंटिंग प्रेस की कार्यप्रणाली, मुद्रण क्रांति और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार (मार्टिन लूथर), 18वीं सदी में 'पढ़ने का उन्माद' (Reading Mania), मुद्रण संस्कृति और फ्रांसीसी क्रांति के अंतर्संबंध, भारत में 19वीं सदी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन (राजा राममोहन राय, फुले), महिलाओं पर मुद्रण का प्रभाव, तथा 1878 के वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट पर 3 से 5 अंकों के प्रश्न प्रतिवर्ष अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।

Before You Begin (Prerequisites)

  • मध्यकालीन यूरोप और चर्च के वर्चस्व की सामान्य समझ।
  • पुनर्जागरण (Renaissance) और वैज्ञानिक खोजों की बुनियादी जानकारी।
  • भारत में 19वीं सदी के सामाजिक सुधार आंदोलनों (सती प्रथा उन्मूलन, स्त्री शिक्षा) से परिचय।

What You Will Learn (Core Objectives)

  • चीन, जापान और कोरिया में आरंभिक काष्ठ ब्लॉक छपाई और गुटेनबर्ग की प्रिंटिंग प्रेस तकनीक के विकास का विश्लेषण करना।
  • मुद्रण क्रांति के सामाजिक-धार्मिक प्रभावों तथा मार्टिन लूथर के प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार आंदोलन का मूल्यांकन करना।
  • 18वीं सदी के यूरोप में मुद्रण संस्कृति, ज्ञानोदय (Enlightenment) के विचारकों और फ्रांसीसी क्रांति के अंतर्संबंधों का परीक्षण करना।
  • 19वीं सदी में भारत में मुद्रण के आगमन, धार्मिक बहसों (संवाद कौमुदी, समाचार चंद्रिका, देवबंद) और जाति व स्त्री सुधार साहित्य की व्याख्या करना।
  • ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार द्वारा प्रेस पर नियंत्रण के प्रयासों, विशेष रूप से 1878 के 'वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट' और राष्ट्रवादी प्रेस (तिलक का केसरी) का समालोचनात्मक अध्ययन करना।

Chapter Roadmap & Progression

1 1. मुद्रण की शुरुआत: पूर्वी एशिया स...
2 2. जोहान गुटेनबर्ग और प्रिंटिंग प्र...
3 3. धार्मिक सुधार, पढ़ने का उन्माद औ...
4 4. भारत में मुद्रण का आगमन और धार्म...
5 5. महिलाएँ, दलित साहित्य, प्रेस की...

Complete Concept Guide (100% Curriculum Coverage)

1. मुद्रण की शुरुआत: पूर्वी एशिया से यूरोप तक का सफर

1.1 चीन, जापान और कोरिया में हाथ से छपाई

मुद्रण की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई:

  • काष्ठ ब्लॉक प्रिंटिंग (Woodblock Printing): 594 ईस्वी से चीन में स्याही लगे काठ के तख्तों (Woodblocks) पर कागज को रगड़कर छपाई की जाती थी। चूंकि पारंपरिक चीनी कागज पतला और छिद्रयुक्त होता था, इसलिए उसके दोनों तरफ छपाई नहीं हो सकती थी; अतः किताबों को मोड़कर किनारे से सिल दिया जाता था जिसे 'एकार्डियन' शैली (Accordion style) कहा जाता था।
  • चीन में मुद्रण का विस्तार: चीन में सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से अधिकारियों की विशाल नौकरशाही नियुक्त होती थी। परीक्षार्थियों के लिए लाखों पाठ्यपुस्तकें छापी जाती थीं। 16वीं सदी में परीक्षार्थियों की संख्या बढ़ने से मुद्रण में भारी उछाल आया। 17वीं सदी तक शंघाई नई मुद्रण संस्कृति का केंद्र बन गया।
  • जापान में मुद्रण: चीनी बौद्ध मिशनरियों ने लगभग 768-770 ईस्वी में छपाई की तकनीक जापान पहुंचाई। 868 ईस्वी में छपी 'डायमंड सूत्र' (Diamond Sutra) जापान की सबसे पुरानी मुद्रित पुस्तक है, जिसमें काठ पर खुदे 6 पृष्ठ और चित्र हैं। 18वीं सदी में कितागावा उतामारो ने 'उकियो-ए' (Ukiyo-e - तैरती दुनिया के चित्र) नामक अनूठी कला शैली विकसित की।

1.2 यूरोप में मुद्रण का आगमन और मार्को पोलो

सदियों तक रेशम और मसाले रेशम मार्ग से यूरोप पहुंचते थे। 11वीं सदी में चीनी कागज उसी रास्ते यूरोप पहुंचा जिससे पांडुलिपियों की नकल आसान हुई।

  • 1295 में मार्को पोलो: महान इतालवी यात्री मार्को पोलो कई वर्षों तक चीन में रहने के बाद 1295 में इटली लौटा। वह अपने साथ काठ की तख्ती (Woodblock) वाली छपाई की तकनीक लेकर आया। इटली के लोगों ने काष्ठ ब्लॉक से किताबें छापना शुरू किया और जल्द ही यह तकनीक पूरे यूरोप में फैल गई।
  • पांडुलिपियों की सीमाएँ: अमीर और कुलीन वर्ग अभी भी वल्लम (Vellum - जानवरों के चमड़े से बनी लेखन सतह) पर हाथ से सुंदर अक्षरों में लिखी गई हस्तलिखित पांडुलिपियों को ही शुद्ध व गरिमापूर्ण मानते थे। परंतु पांडुलिपियाँ अत्यधिक महंगी, श्रमसाध्य और नाजुक होती थीं जिन्हें संभालना और कहीं ले जाना कठिन था। पुस्तकों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए छपाई की तेज तकनीक की सख्त जरूरत थी।

2. जोहान गुटेनबर्ग और प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार

2.1 गुटेनबर्ग का नवाचार (1430–1448)

जर्मनी के स्ट्रासबर्ग में एक व्यापारी के बेटे जोहान गुटेनबर्ग (Johann Gutenberg) ने आधुनिक प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किया:

  • प्रेरणा के स्रोत: गुटेनबर्ग बचपन से शराब और जैतून का तेल निकालने वाले यंत्रों (Presses) को देखता बड़ा हुआ था। वह पत्थरों को तराशने और सोने के गहने बनाने (शीशे और धातु के सांचे ढालने) का पारखी कारीगर था।
  • धातु का चल टाइप (Movable Metal Type): उसने जैतून के प्रेस के स्क्रू हैंडल के सिद्धांत का उपयोग प्रिंटिंग प्रेस के रूप में किया और वर्णमाला के सभी 26 अक्षरों के लिए सीसे (Lead) की धातु के अलग-अलग मूवेबल टाइप (सांचे) ढाले। इन टाइपों को जोड़कर कोई भी शब्द या पंक्ति बनाई जा सकती थी।
  • पहली मुद्रित पुस्तक: 1448 तक उसका यह यंत्र पूरी तरह तैयार हुआ। उसके छापेखाने से निकलने वाली पहली पुस्तक 'बाइबिल' (Bible) थी। इसकी लगभग 180 प्रतियाँ छापी गईं, जिन्हें पूरा करने में 3 साल लगे (जो उस समय के लिहाज से एक चमत्कारिक गति थी)।
  • आरंभिक मुद्रित पुस्तकें हाथ से लिखी पांडुलिपियों की हूबहू नकल जैसी दिखती थीं; बॉर्डर और खाली जगहों को हाथ से रंगों और चित्रों से सजाया जाता था ताकि अमीर खरीदार अपनी पसंद का अलंकरण करवा सकें।

2.2 मुद्रण क्रांति और नया पाठक वर्ग

1450 से 1550 के बीच यूरोप के अधिकांश देशों में छापेखाने स्थापित हो गए। इसे 'मुद्रण क्रांति' (Print Revolution) कहा गया:

मुद्रण क्रांति के प्रभाव:
1. लागत और समय में नाटकीय कमी: पुस्तकों की छपाई में लगने वाला समय और श्रम अत्यधिक घट गया। पुस्तकें सस्ती हो गईं और बाजार किताबों से पट गया।
2. पाठक वर्ग का उदय: पहले किताबें केवल अभिजात और पादरी वर्ग तक सीमित थीं क्योंकि वे बहुत महंगी थीं। अब आम जनता भी किताबें खरीदने लगी। पढ़ने की संस्कृति (Reading Culture) का जन्म हुआ।
3. मौखिक और मुद्रित संस्कृति का संलयन: चूंकि यूरोप में साक्षरता दर उस समय बहुत कम थी, इसलिए प्रकाशक लोकगीतों और लोककथाओं को सुंदर चित्रों के साथ छापने लगे। इन किताबों को गांवों के चौपालों और शराबखानों (Taverns) में ऊंचे स्वर में पढ़कर सुनाया जाता था। इस प्रकार अनपढ़ जनता भी मुद्रित विचारों से जुड़ गई।

3. धार्मिक सुधार, पढ़ने का उन्माद और ज्ञानोदय के विचार

3.1 मार्टिन लूथर और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार (1517)

मुद्रण ने स्थापित सत्ताओं, धार्मिक रूढ़ियों और चर्च के पाखंडों पर सीधे सवाल उठाने का लोकतांत्रिक हथियार आम लोगों को दे दिया:

  • 1517 में एक जर्मन धर्मशास्त्री मार्टिन लूथर (Martin Luther) ने रोमन कैथोलिक चर्च की 'पापमोचन पत्रों' (Indulgences) की बिक्री और भ्रष्ट रीति-रिवाजों की तीखी आलोचना करते हुए 'पचानवे प्रमेय' (Ninety-Five Theses) लिखे। उसने विटेनबर्ग के चर्च के दरवाजे पर इसे टांग दिया और चर्च को खुली बहस की चुनौती दी।
  • लूथर के इस लेख की प्रतियां तुरंत छापी गईं और कुछ ही हफ्तों में हजारों प्रतियां पूरे जर्मनी और यूरोप में फैल गईं।
  • लूथर ने न्यू टेस्टामेंट (बाइबिल का नया भाग) का जर्मन भाषा में अनुवाद किया, जिसकी कुछ ही दिनों में 5,000 प्रतियां बिक गईं।
  • लूथर के विचारों से रोमन कैथोलिक चर्च में ऐतिहासिक विभाजन हो गया और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार (Protestant Reformation) की शुरुआत हुई। लूथर ने घोषणा की: 'मुद्रण ईश्वर की दी हुई सबसे बड़ी देन है, उसका सबसे महान उपहार।'

3.2 मेनोक्कियो और रोमन चर्च का 'इंडेक्स' (प्रतिबंधित पुस्तकों की सूची)

मुद्रित पुस्तकों के आधार पर आम लोग भी बाइबिल की स्वतंत्र व्याख्या करने लगे:

  • इटली के एक चक्की-मजदूर मेनोक्कियो (Menocchio) ने अपने इलाके की उपलब्ध किताबों को पढ़ा और बाइबिल के अर्थ की पुनर्व्याख्या करते हुए ईश्वर और सृष्टि के बारे में ऐसे विचार व्यक्त किए जिससे कैथोलिक चर्च नाराज हो गया।
  • धर्म-अदालत (Inquisition) ने उस पर धर्मविरोधी होने का आरोप लगाया और अंततः उसे जिंदा जला दिया गया।
  • पुस्तकों के बढ़ते प्रभाव और धर्मद्रोह के भय से कैथोलिक चर्च ने 1558 से 'प्रतिबंधित पुस्तकों की सूची' (Index of Prohibited Books) रखना शुरू किया।

3.3 18वीं सदी का 'पढ़ने का उन्माद' (Reading Mania) और फ्रांसीसी क्रांति

17वीं और 18वीं सदी में यूरोप के ग्रामीण क्षेत्रों में चर्चों द्वारा स्कूल खोले जाने से साक्षरता दर 60% से 80% तक पहुंच गई:

पुस्तक का प्रकारविशेषताएँ एवं पाठक वर्ग
चैपबुक्स (Chapbooks)इंग्लैंड में एक पैसे में बिकने वाली छोटी पॉकेट बुक्स। इन्हें 'चैपमैन' (फेरीवाले) घूम-घूम कर बेचते थे ताकि गरीब भी खरीद सकें।
बिब्लियोथिक ब्ल्यू (Bibliothèque Bleue)फ्रांस में बिकने वाली सस्ती छोटी किताबें, जो घटिया कागज पर छपती थीं और उनका आवरण नीले रंग का होता था।
ज्ञानोदय (Enlightenment) साहित्यवोल्टेयर (Voltaire), जीन-जैक रूसो (Rousseau) और थॉमस पेन के विज्ञान, तर्क और स्वतंत्रता संबंधी विचारों को लाखों लोगों ने पढ़ा।
मुद्रण और फ्रांसीसी क्रांति (1789): कई इतिहासकारों का मानना है कि मुद्रण संस्कृति ने फ्रांसीसी क्रांति की जमीन तैयार की:
1. मुद्रण ने प्रबोधन विचारकों के तर्क और विवेक के विचारों को प्रसारित किया और चर्च की अंधश्रद्धा व राजशाही के दैवीय अधिकारों की धज्जियां उड़ाईं।
2. मुद्रण ने सार्वजनिक बहस और संवाद की एक नई संस्कृति को जन्म दिया जहाँ सभी परंपराओं पर सवाल खड़े किए गए।
3. 1780 के दशक तक राजशाही के ऐशो-आराम और अनैतिकता का मजाक उड़ाने वाले व्यंग्यचित्रों और साहित्यों की बाढ़ आ गई, जिसने जनता में राजतंत्र के विरुद्ध गहरा असंतोष भड़का दिया।
फ्रांसीसी उपन्यासकार लुई सेबेस्टियन मर्सिए (Louis-Sébastien Mercier) ने लिखा था: 'हे निरंकुश शासको, अब तुम्हारे कांपने का वक्त आ गया है! आभासी लेखक की कलम के जोर के आगे तुम्हारी सत्ता ढह जाएगी!'

4. भारत में मुद्रण का आगमन और धार्मिक-सामाजिक विमर्श

4.1 भारत में पांडुलिपियों की समृद्ध परंपरा एवं मुद्रण का आगमन

भारत में संस्कृत, अरबी, फारसी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में हस्तलिखित पांडुलिपियों (Manuscripts) की पुरानी परंपरा थी। पांडुलिपियाँ ताड़ के पत्तों या हाथ से बने कागज पर सुंदर सुलेखन (Calligraphy) में लिखी जाती थीं और उन्हें लकड़ी की पट्टियों के बीच बांध दिया जाता था।

  • 16वीं सदी (गोवा): भारत में पहला प्रिंटिंग प्रेस 16वीं सदी के मध्य में पुर्तगाली जेसुइट मिशनरियों के साथ गोवा में आया। जेसुइट पादरियों ने कोंकणी और कन्नड़ सीखी और कई पुस्तिकाएं छापीं।
  • 1579 में कोचीन में कैथोलिक पादरियों ने पहली तमिल पुस्तक छापी और 1713 में पहली मलयालम पुस्तक छापी गई।
  • 1780: जेम्स ऑगस्टस हिक्की का 'बंगाल गजट': 1780 से जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने 'बंगाल गजट' (Bengal Gazette) नामक एक साप्ताहिक पत्रिका का संपादन शुरू किया, जिसने खुद को 'सभी के लिए खुली, लेकिन किसी के प्रभाव में नहीं' व्यावसायिक पत्रिका बताया। उसने कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों की निजी गपशप और घोटालों को छापा, जिसके कारण गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने हिक्की पर मुकदमा चलाया और पत्रिका को जब्त कर लिया।
  • इसके बाद भारतीयों द्वारा पहला अखबार गंगाधर भट्टाचार्य का 'बंगाल गजट' प्रकाशित हुआ।

4.2 धार्मिक सुधार, सार्वजनिक बहसें और भारतीय भाषाएं

19वीं सदी की शुरुआत में समाज सुधारकों और रूढ़िवादियों के बीच तीखी धार्मिक बहसें मुद्रित पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से लड़ी गईं:

समाचार पत्र / संस्थासंस्थापक / संप्रदायवैचारिक रुख / महत्व
संवाद कौमुदी (1821)राजा राममोहन रायसती प्रथा, मूर्तिपूजा, बाल विवाह और जातिवाद के विरुद्ध तर्कसंगत लेख।
समाचार चंद्रिका (1821)हिंदू रूढ़िवादी समाजराजा राममोहन राय के सुधारवादी विचारों और सती प्रथा विरोधी कानूनों का कड़ा विरोध करने हेतु।
जाम-ए-जहाँ नुमा व शमसुल अख़बारफारसी समाचार पत्र (1822)मुस्लिम विद्वानों द्वारा समसामयिक घटनाओं व धर्म पर विमर्श।
देवबंद मदरसा (1867)देवबंदी उलेमा (उत्तर प्रदेश)मुसलमानों के दैनिक जीवन के आचरण और इस्लामी सिद्धांतों को स्पष्ट करने हेतु हजारों फतवे (Fatwas) मुद्रित किए।
नवल किशोर प्रेस (लखनऊ) व श्री वेंकटेश्वर प्रेस (बंबई)मुंशी नवल किशोर आदिरामायण, महाभारत और धार्मिक ग्रंथों को आम बोलचाल की भाषाओं में लाखों प्रतियों में छापा।

5. महिलाएँ, दलित साहित्य, प्रेस की स्वतंत्रता एवं सेंसरशिप

5.1 महिलाएँ और मुद्रण संस्कृति

महिलाओं के जीवन और भावनाओं पर मुद्रण का गहरा असर पड़ा। रूढ़िवादी हिंदू मानते थे कि पढ़ी-लिखी लड़की विधवा हो जाती है, और मुस्लिम मानते थे कि उर्दू उपन्यास पढ़ने से महिलाएं बिगड़ जाएंगी। इसके बावजूद महिलाओं ने गुप्त रूप से पढ़ना सीखा:

  • रससुंदरी देवी (पूर्वी बंगाल): एक रूढ़िवादी जमींदार परिवार की गृहिणी, जिन्होंने रसोई के चूल्हे की धीमी रोशनी में छुप-छुपकर पढ़ना सीखा और 1876 में अपनी आत्मकथा 'अमार जीबन' (Amar Jiban) प्रकाशित की। यह बंगाली भाषा में प्रकाशित पहली पूर्ण आत्मकथा थी।
  • कैलाशबाशिनी देवी: उन्होंने 1860 के दशक में बंगाली महिलाओं के घरेलू उत्पीड़न और अशिक्षा पर पुस्तकें लिखीं।
  • ताराबाई शिंदे और पंडिता रमाबाई (महाराष्ट्र): 1880 के दशक में ताराबाई शिंदे ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'स्त्री-पुरुष तुलना' लिखी जिसमें पुरुषों द्वारा महिलाओं पर थोपे गए दोहरे मापदंडों की धज्जियां उड़ाई गईं। पंडिता रमाबाई ने उच्च जाति की हिंदू विधवाओं की दयनीय दशा पर पुस्तकें लिखीं।

5.2 जातिगत उत्पीड़न के विरुद्ध मुद्रण और श्रमिक वर्ग

  • ज्योतिराव फुले: 1871 में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'गुलामगिरी' लिखी जिसमें उन्होंने जाति व्यवस्था के अन्याय और ब्राह्मणवादी वर्चस्व पर तीखा प्रहार किया तथा इसे अमेरिकी नीग्रो दासों की मुक्ति से जोड़ा।
  • 20वीं सदी में डॉ. बी.आर. अंबेडकर (महाराष्ट्र) और ई.वी. रामास्वामी नायकर 'पेरियार' (मद्रास) ने जातिगत असमानताओं और छुआछूत के खिलाफ शक्तिशाली पत्र-पत्रिकाएं निकालीं।
  • कानपुर के मिल मजदूर काशीबाबा ने 1938 में 'छोटे और बड़े का सवाल' लिखकर जाति और वर्ग शोषण के रिश्ते को उजागर किया। 1955 में कानपुर के एक अन्य मिल मजदूर ने 'सुदर्शन चक्र' नाम से अपनी कविताओं का संग्रह 'सच्ची कविताएं' प्रकाशित कराया।

5.3 मुद्रण और ब्रिटिश सेंसरशिप: 1878 का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों का भारतीय प्रेस के प्रति रवैया पूरी तरह बदल गया:

वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (1878):
1. पृष्ठभूमि: जैसे-जैसे भारतीय भाषाई (Vernacular) समाचार पत्रों में औपनिवेशिक सरकार की नीतियों की तीखी आलोचना और राष्ट्रवाद का प्रसार बढ़ा, वायसराय लॉर्ड लिटन ने 1878 में 'वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट' पारित किया। यह कानून आयरिश प्रेस कानूनों (Irish Press Laws) की तर्ज पर बनाया गया था।
2. कठोर प्रावधान: इसने सरकार को भाषाई समाचार पत्रों में छपने वाली रपटों और संपादकीय को सेंसर करने के व्यापक अधिकार दे दिए। यदि किसी रपट को 'देशद्रोही' पाया जाता था, तो पहले अखबार को चेतावनी दी जाती थी; और यदि उसने चेतावनी की अनदेखी की, तो प्रेस को जब्त कर लिया जाता था और उसकी छपाई की मशीनें छीन ली जाती थीं।
3. राष्ट्रवादियों का प्रतिरोध: दमनकारी कानूनों के बावजूद राष्ट्रवादी अखबारों की संख्या पूरे देश में बढ़ती रही। बाल गंगाधर तिलक ने अपने मराठी अखबार 'केसरी' (Kesari) में 1908 में पंजाब के क्रांतिकारियों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की, जिसके कारण उन्हें गिरफ्तार कर 6 वर्ष के लिए मांडले (बर्मा) जेल भेज दिया गया। तिलक की गिरफ्तारी के विरोध में पूरे भारत में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए।

Key Historical Terms, Chronology & Administrative Principles

594 ईस्वी (चीन)
काष्ठ ब्लॉक (Woodblock) पर रगड़कर स्याही से पहली हाथ की छपाई की शुरुआत।
868 ईस्वी (जापान)
'डायमंड सूत्र' (Diamond Sutra); जापान की सबसे पुरानी मुद्रित पुस्तक।
1295 (इटली)
मार्को पोलो चीन से यूरोप में काष्ठ ब्लॉक छपाई तकनीक लेकर लौटा।
1448 (जर्मनी)
जोहान गुटेनबर्ग द्वारा धातु के चल टाइप वाले आधुनिक प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार।
1517 (विटेनबर्ग)
मार्टिन लूथर के 'पचानवे प्रमेय' (95 Theses); प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार का आरंभ।
1558
रोमन कैथोलिक चर्च द्वारा प्रतिबंधित पुस्तकों की पहली सूची (Index of Prohibited Books)।
16वीं सदी मध्य (गोवा)
पुर्तगाली जेसुइट मिशनरियों द्वारा भारत में पहला प्रिंटिंग प्रेस लाया गया।
1780
जेम्स ऑगस्टस हिक्की द्वारा 'बंगाल गजट' (पहला साप्ताहिक अंग्रेजी अखबार) का प्रकाशन।
1821
राजा राममोहन राय का 'संवाद कौमुदी' एवं रूढ़िवादियों का 'समाचार चंद्रिका'।
1871
ज्योतिराव फुले द्वारा जाति व्यवस्था पर प्रहार करती पुस्तक 'गुलामगिरी' प्रकाशित।
1876
रससुंदरी देवी की 'अमार जीबन'; बंगाली भाषा में प्रकाशित पहली पूर्ण आत्मकथा।
1878
वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट; भारतीय भाषाई प्रेस पर ब्रिटिश सेंसरशिप व संपत्ति जब्ती कानून।

Conceptual Solved Examples & Case Studies

Example 1
जोहान गुटेनबर्ग कौन था? उसने आधुनिक प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किस प्रकार किया और उसकी पहली मुद्रित पुस्तक कौन सी थी?
Step-by-Step Solution:
गुटेनबर्ग का परिचय:
जोहान गुटेनबर्ग जर्मनी के स्ट्रासबर्ग नगर के एक व्यापारी का बेटा था। वह कृषि रियासत में पला-बढ़ा था और बचपन से ही शराब और जैतून का तेल निकालने वाले यंत्रों को देखता आया था। वह पत्थरों पर पॉलिश करने, सोने के आभूषण बनाने और शीशे के सांचे ढालने की कला में अत्यधिक निपुण था。

प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार:
1. तकनीकी संयोजन: गुटेनबर्ग ने अपने ज्ञान और पुराने आविष्कारों का सुंदर संयोजन किया। उसने जैतून के तेल निकालने वाले स्क्रू प्रेस के मॉडल का उपयोग प्रिंटिंग प्रेस के मुख्य ढांचे के रूप में किया।
2. मूवेबल मेटल टाइप: उसने वर्णमाला के अक्षरों के लिए सीसे की धातु के अलग-अलग सांचे (टाइप) ढाले जिन्हें आवश्यकतानुसार जोड़कर शब्द और पंक्तियां बनाई जा सकती थीं और दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता था।
3. पहली मुद्रित पुस्तक: 1448 तक उसका यह यंत्र पूरी तरह विकसित हो गया। उसके छापेखाने से निकलने वाली पहली पुस्तक 'बाइबिल' (Bible) थी। इसकी लगभग 180 प्रतियाँ छापी गईं, जिन्हें पूरा करने में 3 वर्ष का समय लगा। तत्कालीन परिस्थितियों में यह छपाई की अभूतपूर्व और चमत्कारिक गति थी।
Example 2
मार्टिन लूथर कौन था? मुद्रण संस्कृति ने प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार आंदोलन को जन्म देने में किस प्रकार सहायता की?
Step-by-Step Solution:
मार्टिन लूथर और पृष्ठभूमि:
मार्टिन लूथर 16वीं सदी का एक प्रसिद्ध जर्मन धर्मशास्त्री, भिक्षु और समाज सुधारक था। उस समय रोमन कैथोलिक चर्च में भारी भ्रष्टाचार, पाखंड और 'पापमोचन पत्रों' (Indulgences) की खुली बिक्री हो रही थी।

प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार में मुद्रण की भूमिका:
1. पचानवे प्रमेय (Ninety-Five Theses): 1517 में लूथर ने कैथोलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुए 'पचानवे प्रमेय' लिखे और उन्हें विटेनबर्ग चर्च के मुख्य द्वार पर चस्पा कर दिया।
2. विस्फोटक प्रसार: किसी ने लूथर के इस लेख की एक प्रति प्रिंटिंग प्रेस में छपवा दी। मुद्रण की गति के कारण कुछ ही हफ्तों में यह लेख पूरे जर्मनी में पढ़ा जाने लगा और कुछ महीनों में पूरे यूरोप में फैल गया।
3. जनसाधारण की भाषा में बाइबिल: लूथर ने लैटिन के बजाय आम जनता की जर्मन भाषा में न्यू टेस्टामेंट का अनुवाद किया। इसकी पहली 5,000 प्रतियां कुछ ही हफ्तों में बिक गईं।
4. चर्च का ऐतिहासिक विभाजन: मुद्रण के माध्यम से लूथर के क्रांतिकारी विचारों ने आम लोगों की चेतना को झकझोर दिया, जिससे रोमन कैथोलिक चर्च में विभाजन हुआ और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार का उदय हुआ। लूथर ने मुद्रण के महत्व को स्वीकारते हुए कहा था: 'मुद्रण ईश्वर की दी हुई सबसे बड़ी देन है, उसका सबसे महान उपहार।'
Example 3
'मुद्रण संस्कृति ने फ्रांसीसी क्रांति के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार कीं।' इस कथन के समर्थन में तीन प्रमुख तर्क दीजिए।
Step-by-Step Solution:
इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि मुद्रण संस्कृति ने 1789 की फ्रांसीसी क्रांति की वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार करने में निर्णायक भूमिका निभाई। इसके पक्ष में तीन प्रमुख तर्क निम्नलिखित हैं:

1. ज्ञानोदय के विचारकों के तर्कों का प्रसार: मुद्रण ने वॉल्टेयर, रूसो और दिदेरो जैसे प्रबोधन विचारकों के विचारों को जन-जन तक पहुंचाया। इन विचारकों ने चर्च के अंधविश्वासों, पुरोहितवाद और राजशाही के 'दैवीय अधिकारों' पर तर्क और विवेक की कसौटी पर कड़ा प्रहार किया। लोगों ने आंख मूंदकर राजा की आज्ञा मानना बंद कर दिया।
2. संवाद और सार्वजनिक वाद-विवाद की संस्कृति: मुद्रण ने सार्वजनिक विमर्श की एक नई संस्कृति गढ़ी। पुस्तकों, पुस्तिकाओं और पर्चों के माध्यम से समाज के सभी स्थापित मूल्यों, परंपराओं और संस्थाओं पर खुली बहस होने लगी। आम जनता यह समझने लगी कि समाज को विवेक और न्याय के आधार पर पुनर्गठित किया जा सकता है।
3. राजतंत्र की अनैतिकता का खुला उपहास: 1780 के दशक तक ऐसे मुद्रित साहित्य, व्यंग्य चित्रों (Cartoons) और नाटकों की बाढ़ आ गई थी जिनमें फ्रांस के राजघराने की विलासिता, ऐशो-आराम और अनैतिकता का क्रूर मजाक उड़ाया गया था, जबकि आम जनता भुखमरी और गरीबी से त्रस्त थी। इस मुद्रित सामग्री ने जनता के मन में राजशाही के विरुद्ध गहरी घृणा और विद्रोह की ज्वाला भड़का दी।
Example 4
उन्नीसवीं सदी के भारत में महिलाओं की स्थिति और सोच को बदलने में मुद्रण संस्कृति का क्या योगदान रहा? प्रमुख महिला लेखिकाओं के उदाहरण दीजिए।
Step-by-Step Solution:
19वीं सदी में भारत में मुद्रण संस्कृति के प्रसार ने महिलाओं के जीवन में एक मूक लेकिन अत्यंत शक्तिशाली क्रांति ला दी:

1. शिक्षा और चेतना का प्रसार: मध्यम वर्गीय परिवारों में महिलाओं की शिक्षा को लेकर चर्चाएं शुरू हुईं। कई उदारवादी पिताओं और पतियों ने बेटियों और पत्नियों को घर पर पढ़ाना शुरू किया या स्कूल भेजा। महिलाओं के लिए समर्पित पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होने लगीं जिनमें गृहस्थी के साथ-साथ नारी शिक्षा, अधिकारों और विधवा पुनर्विवाह पर लेख होते थे।
2. रूढ़िवादिता के विरुद्ध गुप्त संघर्ष: हिंदू और मुस्लिम दोनों रूढ़िवादी समाज महिलाओं को पढ़ाने के सख्त खिलाफ थे। इसके बावजूद महिलाओं ने अदम्य साहस दिखाया। पूर्वी बंगाल की रससुंदरी देवी ने अपनी रसोई के धुएं और चूल्हे की रोशनी में गुप्त रूप से पढ़ना सीखा और 1876 में अपनी आत्मकथा 'अमार जीबन' (Amar Jiban) प्रकाशित की, जो बंगाली भाषा की पहली पूर्ण आत्मकथा थी।
3. पुरुष प्रधान व्यवस्था पर तीखा प्रहार: 1880 के दशक में महाराष्ट्र में ताराबाई शिंदे ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'स्त्री-पुरुष तुलना' प्रकाशित की जिसमें उन्होंने पुरुषों द्वारा महिलाओं पर थोपे गए दोहरे नैतिक मापदंडों और शोषण की कठोर आलोचना की। उसी समय पंडिता रमाबाई ने उच्च जातियों की हिंदू विधवाओं के दयनीय जीवन को उजागर करते हुए अनेक पुस्तकें लिखीं।
इस प्रकार मुद्रण ने भारतीय महिलाओं को अपनी मूक पीड़ा को मुखर अभिव्यक्ति देने का एक ऐतिहासिक मंच प्रदान किया।
Example 5
1878 का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट क्या था? ब्रिटिश सरकार ने इसे क्यों पारित किया और भारतीय राष्ट्रवादियों ने इसका किस प्रकार मुकाबला किया?
Step-by-Step Solution:
वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (1878) का परिचय:
1878 में भारत के वायसराय लॉर्ड लिटन द्वारा पारित यह एक दमनकारी कानून था, जिसे ब्रिटिश सरकार ने भारतीय भाषाई (देशी भाषाओं) के समाचार पत्रों की स्वतंत्रता को कुचलने के लिए लागू किया था। यह कानून 'आयरिश प्रेस कानूनों' की तर्ज पर बनाया गया था。

कानून पारित करने के कारण:
1857 के विद्रोह के बाद और विशेष रूप से 1870 के दशक में अकाल और सरकारी उपेक्षा के कारण भारतीय भाषाओं के अखबारों में औपनिवेशिक सरकार की नीतियों की कटु आलोचना होने लगी थी। इन अखबारों ने जनता में राष्ट्रीय चेतना और ब्रिटिश-विरोधी भावनाएं तेजी से फैलाईं, जिससे ब्रिटिश हुकूमत घबरा गई。

कठोर प्रावधान:
1. सरकार को भाषाई समाचार पत्रों के संपादकीय और रपटों पर पहले से सेंसर लगाने का निरंकुश अधिकार मिल गया।
2. यदि किसी अखबार में कोई रपट सरकार विरोधी पाई जाती थी, तो मजिस्ट्रेट अखबार के संपादक को चेतावनी दे सकता था।
3. चेतावनी के बावजूद आलोचना जारी रहने पर सरकार को अखबार की संपत्ति, प्रेस और मुद्रण मशीनें जब्त (Confiscate) करने का अधिकार था।

राष्ट्रवादियों का मुकाबला:
दमनकारी कानूनों के बावजूद राष्ट्रवादी संपादकों ने झुकने से इनकार कर दिया। बाल गंगाधर तिलक ने अपने मराठी समाचार पत्र 'केसरी' (Kesari) के माध्यम से सरकार की दमनकारी नीतियों की धज्जियां उड़ाईं। जब 1908 में तिलक को गिरफ्तार कर 6 वर्ष के लिए बर्मा की मांडले जेल भेजा गया, तो पूरे भारत के मजदूरों और जनता ने हड़तालें कर ब्रिटिश सरकार की चूलें हिला दीं।

Common Misconceptions & Examiner Traps

Common Misconception

यह समझना कि मुद्रण का आविष्कार सबसे पहले 15वीं सदी में यूरोप में हुआ था।

Scientific Reality & Correction

मुद्रण की आरंभिक तकनीक (काष्ठ ब्लॉक प्रिंटिंग) 6वीं सदी में चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई थी। गुटेनबर्ग ने 1448 में यूरोप में धातु के 'चल टाइप' (Movable Type) का आविष्कार किया।

Common Misconception

जापान की सबसे पुरानी पुस्तक के रूप में बाइबिल या रामायण का नाम लिख देना।

Scientific Reality & Correction

जापान की सबसे पुरानी मुद्रित पुस्तक बौद्ध धर्म ग्रंथ 'डायमंड सूत्र' (868 ईस्वी) है।

Common Misconception

मार्टिन लूथर और मार्टिन लूथर किंग जूनियर को एक ही व्यक्ति समझना।

Scientific Reality & Correction

16वीं सदी में प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार शुरू करने वाले जर्मन धर्मशास्त्री 'मार्टिन लूथर' थे; जबकि 'मार्टिन लूथर किंग जूनियर' 20वीं सदी के अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन के नेता थे।

Common Misconception

भारत में पहला प्रिंटिंग प्रेस ईस्ट इंडिया कंपनी या अंग्रेजों द्वारा लाया गया मानना।

Scientific Reality & Correction

भारत में पहला प्रिंटिंग प्रेस 16वीं सदी के मध्य में पुर्तगाली जेसुइट मिशनरियों द्वारा गोवा में लाया गया था।

Common Misconception

1878 के वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट को अंग्रेजी अखबारों पर लागू समझना।

Scientific Reality & Correction

वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट केवल 'भाषाई' (भारतीय भाषाओं जैसे बंगाली, मराठी, तमिल) समाचार पत्रों पर लागू था, अंग्रेजी समाचार पत्रों पर नहीं। (अमृत बाजार पत्रिका रातोंरात बंगाली से अंग्रेजी अखबार बन गई थी)।

मुद्रण संस्कृति का वैश्विक विस्तार (चीन से गुटेनबर्ग और भारत तक)

मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया: पूर्वी एशिया से भारत तक का ऐतिहासिक सफर1. उद्भव व गुटेनबर्गकाष्ठ ब्लॉक से धातु प्रेस• चीन (594 ई.): काष्ठ ब्लॉक छपाई• जापान (868 ई.): डायमंड सूत्र• 1295: मार्को पोलो इटली लाया• 1448 गुटेनबर्ग (जर्मनी):धातु के चल टाइप; पहली बाइबिल• मुद्रण क्रांति: पुस्तकें सस्ती,विशाल नया पाठक वर्ग तैयार• मौखिक व मुद्रित का मिलन2. धर्मसुधार व ज्ञानोदयविचारों में महान विस्फोट• 1517: मार्टिन लूथर (95 प्रमेय)• प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार की शुरुआत• मेनोक्कियो व कैथोलिक इंडेक्स:1558 में प्रतिबंधित पुस्तकों की सूची• 18वीं सदी: चैपबुक्स व रीडिंग मेनिया• 1789 फ्रांसीसी क्रांति:वॉल्टेयर, रूसो के तर्कों से राजतंत्रव चर्च के विशेषाधिकारों पर चोट3. भारत में मुद्रण संस्कृतिसुधार, स्त्री विमर्श व सेंसरशिप• 16वीं सदी गोवा: पुर्तगाली जेसुइट• 1780: हिक्की का 'बंगाल गजट'• समाज सुधार व महिलाएँ:राममोहन (संवाद कौमुदी); रससुंदरी(अमार जीबन); ताराबाई शिंदे• फुले: 'गुलामगिरी' (जाति विरोध)• 1878 वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट:सेंसरशिप; तिलक का केसरी व संघर्षबोर्ड परीक्षा के प्रमुख ऐतिहासिक संप्रत्यय (Golden Revision Capsule)मार्टिन लूथर (1517):'मुद्रण ईश्वर की दी हुई सबसे बड़ी देन है'; 95 प्रमेयों से प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार प्रारंभ।रससुंदरी देवी (1876):रसोई में गुप्त पढ़ाई; बंगाली में पहली पूर्ण आत्मकथा 'अमार जीबन' प्रकाशित की।वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (1878):लॉर्ड लिटन का दमनकारी कानून; भाषाई प्रेस पर सेंसरशिप व प्रेस संपत्ति जब्ती।

Chapter Summary & 10 Key Takeaways

Takeaway 1
मुद्रण की पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में काष्ठ ब्लॉक (Woodblock) पर हाथ से छपाई के रूप में विकसित हुई।
Takeaway 2
जापान की सबसे पुरानी पुस्तक 868 ईस्वी में छपी बौद्ध धर्म ग्रंथ 'डायमंड सूत्र' थी।
Takeaway 3
1295 में महान यात्री मार्को पोलो चीन से वुडब्लॉक छपाई की तकनीक इटली लेकर आया, जहाँ से यह पूरे यूरोप में फैली।
Takeaway 4
1448 में जर्मनी के स्ट्रासबर्ग में जोहान गुटेनबर्ग ने धातु के चल टाइप वाली आधुनिक प्रिंटिंग प्रेस बनाई और पहली पुस्तक 'बाइबिल' छापी।
Takeaway 5
1517 में मार्टिन लूथर ने कैथोलिक चर्च की कुरीतियों के विरुद्ध 'पचानवे प्रमेय' लिखे, जिससे प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार का जन्म हुआ।
Takeaway 6
18वीं सदी में 'चैपबुक्स' और सस्ती किताबों के प्रसार से पढ़ने का उन्माद (Reading Mania) फैला और साक्षरता दर 80% तक पहुंच गई।
Takeaway 7
वोल्टेयर और रूसो जैसे प्रबोधन विचारकों के मुद्रित तर्कों ने 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के लिए वैचारिक आधार तैयार किया।
Takeaway 8
भारत में 16वीं सदी के मध्य में पुर्तगाली जेसुइट मिशनरियों द्वारा गोवा में पहला प्रिंटिंग प्रेस लाया गया; 1780 में हिक्की ने 'बंगाल गजट' निकाला।
Takeaway 9
राजा राममोहन राय (संवाद कौमुदी), रससुंदरी देवी (अमार जीबन), ज्योतिराव फुले (गुलामगिरी) और ताराबाई शिंदे ने मुद्रण से समाज सुधार की अलख जगाई।
Takeaway 10
1878 में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय भाषाई प्रेस को कुचलने हेतु 'वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट' पारित किया, जिसके विरुद्ध बाल गंगाधर तिलक (केसरी) ने प्रखर संघर्ष किया।

Check Your Understanding (Diagnostic Practice Questions)

Diagnostic questions testing core conceptual clarity. Answers are hidden initially — solve each problem first, then click to reveal the step-by-step verified solution.

1
मुद्रण की तकनीक चीन से यूरोप कैसे पहुंची और इसका श्रेय किसे दिया जाता है?
Reveal Answer & Explanation
Answer: 1295 में प्रसिद्ध इतालवी यात्री मार्को पोलो चीन में कई वर्षों तक रहने के बाद इटली लौटा। वह अपने साथ काष्ठ ब्लॉक (Woodblock) छपाई की तकनीक लेकर आया जिससे यूरोप में मुद्रण का तेजी से प्रसार हुआ।
2
मार्टिन लूथर ने मुद्रण के बारे में क्या कहा और क्यों?
Reveal Answer & Explanation
Answer: मार्टिन लूथर ने कहा कि 'मुद्रण ईश्वर की दी हुई सबसे बड़ी देन है, उसका सबसे महान उपहार।' क्योंकि मुद्रण के कारण ही उसके 95 प्रमेय और बाइबिल का जर्मन अनुवाद कुछ ही हफ्तों में लाखों लोगों तक पहुंचा और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार संभव हुआ।
3
रससुंदरी देवी कौन थीं और उनका भारतीय मुद्रण इतिहास में क्या विशिष्ट स्थान है?
Reveal Answer & Explanation
Answer: वे 19वीं सदी की पूर्वी बंगाल की एक रूढ़िवादी गृहिणी थीं जिन्होंने रसोई के चूल्हे की रोशनी में गुप्त रूप से पढ़ना सीखा और 1876 में 'अमार जीबन' (Amar Jiban) लिखी, जो बंगाली भाषा में प्रकाशित पहली पूर्ण आत्मकथा है।
4
1878 का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट क्या था और इसके तहत क्या कार्रवाई की जा सकती थी?
Reveal Answer & Explanation
Answer: यह लॉर्ड लिटन द्वारा भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों पर नियंत्रण हेतु बनाया गया दमनकारी कानून था। इसके तहत सरकार को देशद्रोही रपटों पर चेतावनी देने और चेतावनी न मानने पर प्रेस व मुद्रण मशीनें जब्त करने का अधिकार था।
5
ज्योतिराव फुले ने 1871 में कौन सी पुस्तक लिखी और उसका मुख्य विषय क्या था?
Reveal Answer & Explanation
Answer: ज्योतिराव फुले ने 1871 में 'गुलामगिरी' (Gulamgiri) लिखी। इसमें उन्होंने भारत की जाति व्यवस्था, छुआछूत और ब्राह्मणवादी वर्चस्व पर तीखा प्रहार किया और इसे अमेरिकी नीग्रो दासों की मुक्ति के संघर्ष से जोड़ा।
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