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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा XII • Chemistry • अध्याय 8
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

ऐल्डिहाइड, कीटोन तथा कार्बोक्सिलिक अम्ल (Aldehydes, Ketones & Acids)

कार्बोनिल समूह ($>C=O$) युक्त कार्बनिक यौगिक—ऐल्डिहाइड ($R-CHO$), कीटोन ($R-CO-R'$) तथा कार्बोक्सिलिक अम्ल ($R-COOH$) कार्बनिक रसायन विज्ञान के सर्वाधिक क्रियाशील, बहुमुखी तथा औद्योगिक दृष्टि से मूल्यवान परिवार हैं। कार्बोनिल कार्बन $sp^2$ संकरित तथा अत्यधिक ध्रुवीय ($\overset{\delta^+}{C}=\overset{\delta^-}{O}$) होता है, जो इसे नाभिकरागी योग अभिक्रियाओं (Nucleophilic Addition Reactions) के प्रति अत्यंत संवेदनशील बनाता है। त्रिविम बाधा तथा प्रेरणिक प्रभाव के कारण ऐल्डिहाइड सामान्यतः कीटोनों की तुलना में अधिक क्रियाशील होते हैं। अध्याय का प्रमुख आकर्षण ऐल्डिहाइड व कीटोन में विभेद करने वाले विशिष्ट रासायनिक परीक्षण हैं: टॉलेन परीक्षण (रजत दर्पण Tollens' Silver Mirror Test), फेलिंग परीक्षण ($Cu_2O$ का लाल अवक्षेप) तथा मैथिल कीटोन समूह ($CH_3-CO-$) की पहचान करने वाला आयोडोफॉर्म परीक्षण ($CHI_3$)। कार्बोनिल यौगिकों के $\alpha$-हाइड्रोजन की विशिष्ट अम्लीयता के फलस्वरूप होने वाली ऐल्डोल संघनन (Aldol Condensation) तथा $\alpha$-हाइड्रोजन रहित ऐल्डिहाइडों की असमानुपातन अभिक्रिया कैनिजारो अभिक्रिया (Cannizzaro Reaction) बोर्ड परीक्षाओं के सबसे पसंदीदा प्रश्न हैं। अध्याय के द्वितीय खंड में कार्बोक्सिलिक अम्लों की विशिष्ट अम्लीय सामर्थ्य (कार्बोक्सिलेट आयन $R-COO^-$ के समतुल्य अनुनाद संरचनाओं), प्रतिस्थापियों के प्रभाव (हैलोजनों का $-I$ प्रभाव अम्लीयता बढ़ाता है) तथा हेल-वोलहार्ड-जेलिंस्की (HVZ) अभिक्रिया का गहन विश्लेषण किया गया है।

दर्पण के पीछे का चांदी का लेप और चींटी के डंक का अम्ल: कार्बोनिल रसायन का चमत्कार!

क्या आपने कभी शीशे (Mirror) में अपना चेहरा देखते हुए सोचा है कि काँच की चिकनी सतह पर चांदी की वह पतली, चमकदार परत कैसे चिपकाई जाती है? यह किसी मशीन से नहीं, बल्कि ग्लूकोज या फॉर्मेल्डिहाइड द्वारा 'टॉलेन अभिकर्मक' ($[Ag(NH_3)_2]^+$) के अपचयन से उत्पन्न विशुद्ध धात्विक चांदी (Ag) का रासायनिक अवक्षेपण है! और क्या आप जानते हैं कि जब लाल चींटी काटती है, तो जो तीखी जलन होती है, वह 'फॉर्मिक एसिड' ($HCOOH$) के कारण होती है, जबकि सिरके का खट्टा स्वाद 'एसीटिक एसिड' ($CH_3COOH$) के कारण होता है! एक ही कार्बोनिल समूह ($>C=O$) प्रकृति में मीठी वनीला सुगंध (Vanillin) से लेकर तीखे अम्लों तक के असंख्य रासायनिक चमत्कार कैसे रचता है? आइए समझें इस अध्याय में!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

JAC और CBSE बोर्ड परीक्षा में कार्बनिक रसायन का सर्वाधिक अंकभार (8 अंक) इसी अध्याय से होता है: 1. नेम रिएक्शंस (Name Reactions): ऐल्डोल संघनन, क्रॉस-ऐल्डोल, कैनिजारो अभिक्रिया, क्लीमेन्सन अपचयन ($Zn-Hg/HCl$), वोल्फ-किश्नर अपचयन ($NH_2NH_2/KOH$), रोजेनमुंड अपचयन ($H_2/Pd-BaSO_4$), इटार्ड अभिक्रिया तथा HVZ अभिक्रिया। 2. विभेदक परीक्षण (Chemical Distinctions): टॉलेन परीक्षण, फेलिंग परीक्षण तथा आयोडोफॉर्म परीक्षण द्वारा ऐल्डिहाइड, कीटोन व ऐल्कोहॉल में विभेद। 3. कार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्लीयता की तुलना: फीनॉल व ऐल्कोहॉल से तुलना, तथा फ्लोरो, क्लोरो, ब्रोमो एसीटिक अम्लों के अम्लीय सामर्थ्य का क्रम ($F-CH_2COOH > Cl-CH_2COOH > Br-CH_2COOH > CH_3COOH$)।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • संकरण ($sp^2$) एवं द्विध्रुव आघूर्ण।
  • प्रेरणिक प्रभाव ($-I$ एवं $+I$) और अनुनाद प्रभाव।
  • अम्ल-क्षार साम्यावस्था एवं $pK_a$ का मान।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • कार्बोनिल समूह पर नाभिकरागी योग अभिक्रियाओं की क्रियाविधि एवं ऐल्डिहाइड व कीटोन की सापेक्ष क्रियाशीलता समझाना।
  • टॉलेन, फेलिंग एवं आयोडोफॉर्म परीक्षणों के रासायनिक समीकरण लिखना तथा अज्ञात यौगिकों की पहचान करना।
  • ऐल्डोल संघनन एवं कैनिजारो अभिक्रियाओं के क्रियाविधि-आधारित उत्पादों का सही निर्माण करना।
  • कार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्लीयता पर प्रतिस्थापियों के प्रभाव की तर्कसंगत व्याख्या करना।
  • HVZ, क्लीमेन्सन एवं वोल्फ-किश्नर अपचयन द्वारा वांछित कार्बनिक रूपांतरण संपन्न करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. कार्बोनिल समूह की प्रकृति एवं ना...
2 2. रासायनिक विभेद: टॉलेन, फेलिंग एव...
3 3. महत्वपूर्ण नेम रिएक्शंस: ऐल्डोल,...
4 4. कार्बोक्सिलिक अम्ल: अम्लीय सामर्...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. कार्बोनिल समूह की प्रकृति एवं नाभिकरागी योग अभिक्रियाएं

कार्बोनिल समूह की संरचना एवं ध्रुवता:

कार्बोनिल कार्बन $sp^2$ संकरित होता है और तीन $\sigma$-आबंध बनाता है जो एक ही समतल में 120° के कोण पर स्थित होते हैं। असंकरित $2p$ कक्षक ऑक्सीजन के $2p$ कक्षक से पार्श्व अतिव्यापन कर $\pi$-आबंध बनाता है।

  • ऑक्सीजन की उच्च विद्युत-ऋणात्मकता के कारण $\pi$-इलेक्ट्रॉन ऑक्सीजन की ओर आकर्षित रहते हैं:

$$>\overset{\delta^+}{C}=\overset{\delta^-}{O} \longleftrightarrow >\overset{+}{C}-\overset{-}{O}$$

  • क्रियाशीलता क्रम (ऐल्डिहाइड बनाम कीटोन): ऐल्डिहाइड नाभिकरागी आक्रमण के प्रति कीटोनों से अधिक क्रियाशील होते हैं। इसके 2 कारण हैं:
    1. प्रेरणिक प्रभाव (Electronic factor): कीटोनों में दो एल्किल समूह ($+I$) कार्बोनिल कार्बन के धनावेश को घटाकर उसे कम इलेक्ट्रॉनरागी बना देते हैं, जबकि ऐल्डिहाइड में केवल एक एल्किल समूह होता है:

$$HCHO > CH_3CHO > CH_3COCH_3$$

  1. त्रिविम बाधा (Steric factor): कीटोनों में दो बड़े एल्किल समूह आने वाले नाभिकरागी के मार्ग में भारी रुकावट डालते हैं।

प्रमुख नाभिकरागी योग अभिक्रियाएं:

  1. हाइड्रोजन सायनाइड ($HCN$) का योग: सायनोहाइड्रिन बनते हैं:

$$>C=O + HCN \xrightarrow{OH^-} >C(OH)(CN)$$

  1. सोडियम हाइड्रोजनसल्फाइट ($NaHSO_3$) का योग: क्रिस्टलीय बाइसल्फाइट योगोत्पाद बनते हैं (शोधन हेतु प्रयुक्त)।
  2. अमोनिया व्युत्पन्नों ($H_2N-Z$) का योग (जल का निष्कासन):
    • हाइड्रॉक्सिलएमीन ($H_2N-OH$) $\rightarrow$ ऑक्सिम ($>C=N-OH$)
    • हाइड्रेजीन ($H_2N-NH_2$) $\rightarrow$ हाइड्राजोन ($>C=N-NH_2$)
    • 2,4-डाइनाइट्रोफेनिलहाइड्रेजीन (2,4-DNP) $\rightarrow$ नारंगी/पीला अवक्षेप (कार्बोनिल समूह की पहचान का Brady's परीक्षण)

2. रासायनिक विभेद: टॉलेन, फेलिंग एवं आयोडोफॉर्म परीक्षण

(क) टॉलेन परीक्षण (Tollens' Test - रजत दर्पण परीक्षण):

  • अभिकर्मक: अमोनियामय सिल्वर नाइट्रेट का ताजा विलयन ($[Ag(NH_3)_2]^+ OH^-$)।
  • सिद्धांत: ऐल्डिहाइड दुर्बल ऑक्सीकारकों द्वारा भी आसानी से कार्बोक्सिलेट आयन में ऑक्सीकृत हो जाते हैं और धात्विक सिल्वर ($Ag$) अवक्षेपित होकर परखनली की दीवार पर दर्पण जैसा चमकता है:

$$R-CHO + 2[Ag(NH_3)_2]^+ + 3OH^- \xrightarrow{\Delta} R-COO^- + 2Ag\downarrow (\text{रजत दर्पण}) + 4NH_3 + 2H_2O$$

कीटोन यह परीक्षण नहीं देते! एलिफैटिक तथा ऐरोमैटिक (जैसे बेन्जैल्डिहाइड) दोनों ऐल्डिहाइड यह परीक्षण देते हैं।

(ख) फेलिंग परीक्षण (Fehling's Test):

  • अभिकर्मक: फेलिंग विलयन A (जलीय $CuSO_4$) + फेलिंग विलयन B (रोशेल लवण: सोडियम पोटैशियम टार्टरेट का क्षारीय विलयन)।
  • सिद्धांत: एलिफैटिक ऐल्डिहाइड को फेलिंग विलयन के साथ गर्म करने पर $Cu^{2+}$ आयन $Cu_2O$ में अपचयित होकर लाल-भूरा अवक्षेप देते हैं:

$$R-CHO + 2Cu^{2+} + 5OH^- \xrightarrow{\Delta} R-COO^- + Cu_2O\downarrow (\text{लाल अवक्षेप}) + 3H_2O$$

कीटोन तथा ऐरोमैटिक ऐल्डिहाइड (जैसे बेन्जैल्डिहाइड) यह परीक्षण नहीं देते!

(ग) आयोडोफॉर्म परीक्षण (Iodoform Test - मैथिल कीटोन की पहचान):

  • शर्त: जिस यौगिक में मैथिल कार्बोनिल समूह ($CH_3-C=O$) अथवा ऑक्सीकरण पर इसे देने वाला $CH_3-CH(OH)-$ समूह उपस्थित हो:
  • जब इसे आयोडीन ($I_2$) तथा जलीय $NaOH$ के साथ गर्म किया जाता है, तो आयोडोफॉर्म ($CHI_3$) का चमकीला पीला क्रिस्टलीय अवक्षेप (विशिष्ट गंध युक्त) प्राप्त होता है:

$$CH_3-CO-R + 3I_2 + 4NaOH \rightarrow CHI_3\downarrow (\text{पीला अवक्षेप}) + R-COONa + 3NaI + 3H_2O$$

उदाहरण: एसीटोन, एसीटैल्डिहाइड, एथेनॉल, प्रोपेन-2-ऑल यह परीक्षण देते हैं; परंतु मेथेनॉल, प्रोपेनल, बेन्जोफीनोन यह परीक्षण नहीं देते!

3. महत्वपूर्ण नेम रिएक्शंस: ऐल्डोल, कैनिजारो व अपचयन

1. ऐल्डोल संघनन (Aldol Condensation):

  • शर्त: कम से कम एक $\alpha$-हाइड्रोजन उपस्थित होना अनिवार्य है!
  • तनु क्षार (तनु $NaOH$ या $Ba(OH)_2$) की उपस्थिति में दो अणु संघनित होकर $\beta$-हाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड (ऐल्डोल) बनाते हैं, जो गर्म करने पर जल ($H_2O$) त्यागकर $\alpha,\beta$-असंतृप्त कार्बोनिल यौगिक देते हैं:

$$2CH_3-CHO \xrightarrow{\text{तनु } NaOH} \underset{\text{3-हाइड्रॉक्सीब्यूटेनल (ऐल्डोल)}}{CH_3-CH(OH)-CH_2-CHO} \xrightarrow{\Delta, -H_2O} \underset{\text{ब्यूट-2-ईनैल (क्रोटोनैल्डिहाइड)}}{CH_3-CH=CH-CHO}$$

2. कैनिजारो अभिक्रिया (Cannizzaro Reaction):

  • शर्त: जिनमें कोई $\alpha$-हाइड्रोजन नहीं होता (जैसे $HCHO, C_6H_5CHO, (CH_3)_3C-CHO$)!
  • सांद्र क्षार (50% $NaOH$) के साथ गर्म करने पर एक अणु का ऑक्सीकरण होकर कार्बोक्सिलेट लवण तथा दूसरे अणु का अपचयन होकर ऐल्कोहॉल बनता है (स्वतः ऑक्सीकरण-अपचयन / Disproportionation):

$$2HCHO + \text{सांद्र } NaOH \rightarrow \underset{\text{मेथेनॉल}}{CH_3OH} + \underset{\text{सोडियम फॉर्मेट}}{HCOONa}$$

$$2C_6H_5CHO + \text{सांद्र } NaOH \rightarrow C_6H_5CH_2OH (\text{बेंजिल ऐल्कोहॉल}) + C_6H_5COONa (\text{सोडियम बेंजोएट})$$

3. हाइड्रोकार्बन में अपचयन:

  1. क्लीमेन्सन अपचयन (Clemmensen Reduction): जिंक अमलगम तथा सांद्र $HCl$ द्वारा कार्बोनिल समूह ($>C=O$) सीधे मेथिलीन समूह ($>CH_2$) में अपचयित हो जाता है:

$$>C=O + 4[H] \xrightarrow{Zn-Hg / \text{सांद्र } HCl} >CH_2 + H_2O$$

  1. वोल्फ-किश्नर अपचयन (Wolff-Kishner Reduction): हाइड्रेजीन तथा $KOH$ के साथ एथिलीन ग्लाइकॉल में गर्म करने पर:

$$>C=O \xrightarrow{NH_2NH_2} >C=N-NH_2 \xrightarrow{KOH / \text{ग्लाइकॉल}, \Delta} >CH_2 + N_2\uparrow$$

4. कार्बोक्सिलिक अम्ल: अम्लीय सामर्थ्य एवं HVZ अभिक्रिया

कार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्लीयता का रहस्य:

कार्बोक्सिलिक अम्ल ($R-COOH$) फीनॉल तथा ऐल्कोहॉल दोनों से कहीं अधिक प्रबल अम्ल होते हैं।

  • प्रोटॉन त्यागने पर बनने वाला कार्बोक्सिलेट आयन ($R-COO^-$) दो समतुल्य (Equally Stable) अनुनादी संरचनाओं द्वारा स्थायीकृत होता है, जिसमें ऋणावेश दो उच्च विद्युत-ऋणात्मक ऑक्सीजन परमाणुओं पर समान रूप से विस्थानिकृत रहता है:

$$R-C(=O)-O^- \longleftrightarrow R-C(-O^-)=O$$

  • इसके विपरीत फीनॉक्साइड आयन में ऋणावेश कम विद्युत-ऋणात्मक कार्बन परमाणुओं पर जाता है, जो कम प्रभावी होता है।

प्रतिस्थापियों का अम्लीय सामर्थ्य पर प्रभाव:

  • इलेक्ट्रॉन-आकर्षी समूह ($-I, -R$ प्रभाव, जैसे $-NO_2, -CN, -F, -Cl$): कार्बोक्सिलेट आयन के ऋणावेश को आकर्षित कर उसे अधिक स्थायी बनाते हैं, अतः अम्लीय सामर्थ्य बढ़ता है।
  • इलेक्ट्रॉन-दाता समूह ($+I$ प्रभाव, जैसे $-CH_3, -C_2H_5$): ऋणावेश को बढ़ाकर अस्थायी करते हैं, अतः अम्लीयता घटती है।
  • महत्वपूर्ण अम्लीयता क्रम:

$$F-CH_2COOH > Cl-CH_2COOH > Br-CH_2COOH > I-CH_2COOH > HCOOH > CH_3COOH$$

$$CCl_3COOH > CHCl_2COOH > CH_2ClCOOH > CH_3COOH$$

हेल-वोलहार्ड-जेलिंस्की (HVZ) अभिक्रिया:

$\alpha$-हाइड्रोजन युक्त कार्बोक्सिलिक अम्ल लाल फॉस्फोरस की अल्प मात्रा की उपस्थिति में क्लोरीन या ब्रोमीन से क्रिया करके $\alpha$-हैलोकार्बोक्सिलिक अम्ल बनाते हैं:

$$R-CH_2-COOH + X_2 \xrightarrow{\text{Red } P / H_2O} \underset{\alpha\text{-हैलोकार्बोक्सिलिक अम्ल}}{R-CH(X)-COOH} + HX \quad (X = Cl, Br)$$

महत्वपूर्ण रासायनिक सूत्र, अभिक्रियाएँ एवं समीकरण

कार्बोनिल क्रियाशीलता क्रम
HCHO > CH3CHO > CH3COCH3 > बेन्जैल्डिहाइड > एसीटोफीनोन (कारण: +I प्रभाव तथा त्रिविम बाधा बढ़ने पर क्रियाशीलता घटती है)।
रासायनिक विभेदक परीक्षण
टॉलेन: ऐल्डिहाइड -> Ag दर्पण; फेलिंग: एलिफैटिक ऐल्डिहाइड -> Cu2O लाल अवक्षेप; आयोडोफॉर्म: CH3-C=O या CH3-CH(OH)- समूह -> CHI3 पीला अवक्षेप।
ऐल्डोल बनाम कैनिजारो शर्तें
ऐल्डोल: α-H उपस्थित (तनु NaOH) -> β-हाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड -> α,β-असंतृप्त ऐल्डिहाइड; कैनिजारो: α-H अनुपस्थित (50% NaOH) -> 1 अणु ऐल्कोहॉल + 1 अणु कार्बोक्सिलेट।
कार्बोक्सिलिक अम्ल अम्लीयता व HVZ
अम्लीयता: CF3COOH > CCl3COOH > CH2FCOOH > CH2ClCOOH > HCOOH > C6H5COOH > CH3COOH; HVZ: R-CH2COOH + Cl2/Red P -> R-CH(Cl)COOH।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
रासायनिक समीकरण सहित समझाइए: (i) ऐल्डोल संघनन (Aldol Condensation) (ii) कैनिजारो अभिक्रिया (Cannizzaro Reaction) (iii) क्लीमेन्सन अपचयन (Clemmensen Reduction) (JAC Board 5 Marks Question)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: (i) ऐल्डोल संघनन: जब $\alpha$-हाइड्रोजन युक्त ऐल्डिहाइड या कीटोन के दो अणु तनु क्षार (तनु $NaOH$) की उपस्थिति में परस्पर जुड़ते हैं, तो $\beta$-हाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड (ऐल्डोल) बनता है, जिसे गर्म करने पर जल का एक अणु निकलकर $\alpha,\beta$-असंतृप्त ऐल्डिहाइड (जैसे ब्यूट-2-ईनैल) बनता है:

$$2CH_3CHO \xrightarrow{\text{तनु } NaOH} CH_3-CH(OH)-CH_2-CHO \xrightarrow{\Delta, -H_2O} CH_3-CH=CH-CHO$$

(ii) कैनिजारो अभिक्रिया: जिन ऐल्डिहाइडों में कोई $\alpha$-हाइड्रोजन परमाणु नहीं होता (जैसे फॉर्मेल्डिहाइड या बेन्जैल्डिहाइड), वे सांद्र क्षार (50% $NaOH$) के साथ गर्म करने पर स्वतः ऑक्सीकरण-अपचयन दर्शाते हैं। एक अणु ऐल्कोहॉल में अपचयित तथा दूसरा अणु कार्बोक्सिलिक अम्ल के लवण में ऑक्सीकृत हो जाता है:

$$2HCHO + \text{सांद्र } NaOH \xrightarrow{\Delta} CH_3OH (\text{मेथेनॉल}) + HCOONa (\text{सोडियम फॉर्मेट})$$

(iii) क्लीमेन्सन अपचयन: जब किसी ऐल्डिहाइड या कीटोन को जिंक अमलगम ($Zn-Hg$) तथा सांद्र $HCl$ के साथ गर्म किया जाता है, तो कार्बोनिल समूह ($>C=O$) सीधे मेथिलीन समूह ($>CH_2$) में अपचयित होकर संबंधित हाइड्रोकार्बन (ऐल्केन) बनाता है:

$$CH_3-CO-CH_3 (\text{एसीटोन}) + 4[H] \xrightarrow{Zn-Hg / \text{सांद्र } HCl} CH_3-CH_2-CH_3 (\text{प्रोपेन}) + H_2O$$

उदाहरण 2
निम्नलिखित युग्मों में विभेद करने के लिए एक सरल रासायनिक परीक्षण लिखिए तथा रासायनिक समीकरण दीजिए: (i) एसीटैल्डिहाइड ($CH_3CHO$) तथा एसीटोन ($CH_3COCH_3$) (ii) पेन्टेन-2-ओन तथा पेन्टेन-3-ओन (iii) बेन्जैल्डिहाइड तथा एसीटोफीनोन
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: (i) टॉलेन परीक्षण द्वारा विभेद:

  • एसीटैल्डिहाइड को टॉलेन अभिकर्मक के साथ गर्म करने पर परखनली की दीवार पर चमकीला रजत दर्पण (Silver Mirror) बनता है:

$$CH_3CHO + 2[Ag(NH_3)_2]^+ + 3OH^- \rightarrow CH_3COO^- + 2Ag\downarrow + 4NH_3 + 2H_2O$$

  • एसीटोन एक कीटोन है, अतः यह टॉलेन परीक्षण नहीं देता (कोई रजत दर्पण नहीं बनता)।

(ii) आयोडोफॉर्म परीक्षण द्वारा विभेद:

  • पेन्टेन-2-ओन ($CH_3-CO-CH_2CH_2CH_3$) में मैथिल कीटोन समूह ($CH_3CO-$) उपस्थित है, अतः यह $I_2/NaOH$ के साथ गर्म करने पर आयोडोफॉर्म ($CHI_3$) का पीला अवक्षेप देता है।
  • पेन्टेन-3-ओन ($CH_3CH_2-CO-CH_2CH_3$) में मैथिल कीटोन समूह नहीं है, अतः यह आयोडोफॉर्म का पीला अवक्षेप नहीं देता।

(iii) टॉलेन या आयोडोफॉर्म परीक्षण द्वारा विभेद:

  • बेन्जैल्डिहाइड ($C_6H_5CHO$) ऐल्डिहाइड होने के कारण टॉलेन परीक्षण देता है (रजत दर्पण बनाता है) किंतु आयोडोफॉर्म परीक्षण नहीं देता।
  • एसीटोफीनोन ($C_6H_5COCH_3$) मैथिल कीटोन होने के कारण $I_2/NaOH$ के साथ आयोडोफॉर्म का पीला अवक्षेप देता है किंतु टॉलेन परीक्षण नहीं देता।
उदाहरण 3
क्लोरोएसीटिक अम्ल, एसीटिक अम्ल से अधिक प्रबल क्यों होता है? फ्लोरोएसीटिक अम्ल तथा क्लोरोएसीटिक अम्ल की अम्लीयता की तुलना कीजिए। (JAC Board High-Yield Question)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. क्लोरोएसीटिक अम्ल बनाम एसीटिक अम्ल:
  • क्लोरोएसीटिक अम्ल ($Cl-CH_2COOH$) में उपस्थित क्लोरीन परमाणु का प्रबल ऋणात्मक प्रेरणिक प्रभाव ($-I$ effect) होता है। यह इलेक्ट्रॉन घनत्व को अपनी ओर खींचकर $O-H$ आबंध को दुर्बल बनाता है तथा प्रोटॉन त्यागने के बाद बनने वाले क्लोरोएसीटेट ऋणायन ($Cl-CH_2COO^-$) के ऋणावेश को विस्थानिकृत कर उसे अत्यधिक स्थायी बनाता है।
  • इसके विपरीत एसीटिक अम्ल ($CH_3COOH$) में उपस्थित मैथिल समूह का धनात्मक प्रेरणिक प्रभाव ($+I$ effect) होता है जो एसीटेट आयन ($CH_3COO^-$) पर ऋणावेश बढ़ाकर उसे अस्थायी करता है। अतः क्लोरोएसीटिक अम्ल एसीटिक अम्ल से बहुत अधिक प्रबल अम्ल है ($K_a$ मान लगभग 80 गुना अधिक होता है)।
  1. फ्लोरोएसीटिक अम्ल बनाम क्लोरोएसीटिक अम्ल: फ्लोरीन की विद्युत-ऋणात्मकता ($4.0$) क्लोरीन ($3.0$) से अधिक होती है, अतः फ्लोरीन का $-I$ प्रभाव क्लोरीन से कहीं अधिक शक्तिशाली होता है। परिणामस्वरूप फ्लोरोएसीटेट आयन अधिक स्थायी होता है। अतः अम्लीयता का क्रम है: $F-CH_2COOH > Cl-CH_2COOH$।
उदाहरण 4
हेल-वोलहार्ड-जेलिंस्की (HVZ) अभिक्रिया क्या है? रासायनिक समीकरण लिखिए तथा स्पष्ट कीजिए कि फॉर्मिक अम्ल यह अभिक्रिया क्यों नहीं देता?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. HVZ अभिक्रिया: जब $\alpha$-हाइड्रोजन युक्त किसी एलिफैटिक कार्बोक्सिलिक अम्ल की अभिक्रिया लाल फॉस्फोरस की अल्प मात्रा की उपस्थिति में क्लोरीन या ब्रोमीन के साथ कराई जाती है, तो $\alpha$-कार्बन का हाइड्रोजन हैलोजन द्वारा प्रतिस्थापित हो जाता है और $\alpha$-हैलोकार्बोक्सिलिक अम्ल बनता है। इस अभिक्रिया को हेल-वोलहार्ड-जेलिंस्की अभिक्रिया कहते हैं:

$$CH_3-COOH + Cl_2 \xrightarrow{\text{Red } P / H_2O} \underset{\alpha\text{-क्लोरोएसीटिक अम्ल}}{Cl-CH_2-COOH} + HCl$$

  1. फॉर्मिक अम्ल द्वारा यह अभिक्रिया न देने का कारण: HVZ अभिक्रिया के लिए कार्बोक्सिलिक अम्ल में कम से कम एक $\alpha$-कार्बन तथा उस पर $\alpha$-हाइड्रोजन का होना अनिवार्य है। फॉर्मिक अम्ल ($H-COOH$) में $-COOH$ समूह के अतिरिक्त कोई अन्य कार्बन ($\alpha$-कार्बन) उपस्थित ही नहीं है। अतः $\alpha$-हाइड्रोजन के अभाव में फॉर्मिक अम्ल HVZ अभिक्रिया नहीं दे सकता।
उदाहरण 5
एक कार्बनिक यौगिक (A) जिसका आण्विक सूत्र $C_3H_6O$ है, 2,4-DNP के साथ नारंगी अवक्षेप देता है तथा टॉलेन अभिकर्मक को अपचयित नहीं करता। यह $I_2/NaOH$ के साथ गर्म करने पर पीला अवक्षेप देता है। यौगिक (A) की पहचान कीजिए तथा संबंधित रासायनिक समीकरण लिखिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. तथ्यों का विश्लेषण: (i) यौगिक (A) 2,4-DNP के साथ नारंगी अवक्षेप देता है, इसका अर्थ है कि इसमें कार्बोनिल समूह ($>C=O$) उपस्थित है (यह या तो ऐल्डिहाइड है या कीटोन)। (ii) यह टॉलेन अभिकर्मक को अपचयित नहीं करता, इसका अर्थ है कि यह ऐल्डिहाइड नहीं है बल्कि कीटोन है। (iii) तीन कार्बन वाला एकमात्र संभव कीटोन प्रोपेनोन (एसीटोन, $CH_3-CO-CH_3$) है। (iv) यह $I_2/NaOH$ के साथ पीला अवक्षेप देता है, जो इसमें मैथिल कीटोन समूह ($CH_3CO-$) की उपस्थिति की पुष्टि करता है।

  2. निष्कर्ष: यौगिक (A) का नाम प्रोपेनोन (एसीटोन) तथा सूत्र $CH_3-CO-CH_3$ है।

  3. रासायनिक समीकरण: (क) 2,4-DNP के साथ:

$$CH_3COCH_3 + H_2N-NH-C_6H_3(NO_2)_2 \rightarrow (CH_3)_2C=N-NH-C_6H_3(NO_2)_2 (\text{नारंगी अवक्षेप}) + H_2O$$

(ख) आयोडोफॉर्म परीक्षण:

$$CH_3COCH_3 + 3I_2 + 4NaOH \rightarrow CHI_3\downarrow (\text{आयोडोफॉर्म का पीला अवक्षेप}) + CH_3COONa + 3NaI + 3H_2O$$

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

बेन्जैल्डिहाइड को फेलिंग विलयन के साथ लाल अवक्षेप देते हुए दिखा देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

बेन्जैल्डिहाइड टॉलेन परीक्षण तो देता है किंतु फेलिंग विलयन को अपचयित नहीं कर सकता; केवल एलिफैटिक ऐल्डिहाइड फेलिंग परीक्षण देते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

फॉर्मेल्डिहाइड में ऐल्डोल संघनन करा देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

फॉर्मेल्डिहाइड में कोई $\alpha$-हाइड्रोजन नहीं होता, अतः यह ऐल्डोल संघनन नहीं बल्कि कैनिजारो अभिक्रिया दर्शाता है।

ऐल्डिहाइड, कीटोन व कार्बोक्सिलिक अम्ल: विभेदक परीक्षण एवं नेम रिएक्शंस

विभेदक परीक्षण (Chemical Tests) • Tollens: ऐल्डिहाइड → Ag दर्पण • Fehling: R-CHO → Cu₂O लाल अवक्षेप • Iodoform: CH₃CO- → CHI₃ पीला अवक्षेप • 2,4-DNP: कार्बोनिल → नारंगी रंग • NaHCO₃: R-COOH → CO₂ बुदबुदाहट बोर्ड परीक्षा का सर्वाधिक अंकदायी खंड ऐल्डोल बनाम कैनिजारो • ऐल्डोल: α-H अनिवार्य (तनु NaOH) • 2 CH₃CHO → ब्यूट-2-ईनैल • कैनिजारो: α-H रहित (50% NaOH) • 2 HCHO → CH₃OH + HCOONa • क्लीमेन्सन: >C=O + Zn-Hg/HCl → >CH₂ C-C आबंध निर्माण की सर्वोत्तम विधियां कार्बोक्सिलिक अम्ल व HVZ • R-COO⁻ समतुल्य अनुनाद संरचनाएं • अम्लीयता: R-COOH > फीनॉल > ROH • -I प्रभाव (हैलोजन) अम्लीयता बढ़ाता है • F-CH₂COOH > Cl-CH₂COOH • HVZ: R-CH₂COOH + Cl₂/Red P α-हैलोजनीकरण का सटीक प्रक्रम

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
कार्बोनिल कार्बन sp² संकरित तथा ध्रुवीय होने से नाभिकरागी योग अभिक्रियाएं दर्शाता है।
मुख्य बिंदु 2
ऐल्डिहाइड कम त्रिविम बाधा व कम +I प्रभाव के कारण कीटोनों से अधिक क्रियाशील होते हैं।
मुख्य बिंदु 3
टॉलेन परीक्षण में ऐल्डिहाइड रजत दर्पण तथा फेलिंग परीक्षण में एलिफैटिक ऐल्डिहाइड Cu₂O का लाल अवक्षेप देते हैं।
मुख्य बिंदु 4
मैथिल कीटोन (CH₃CO-) या CH₃CH(OH)- युक्त यौगिक I₂/NaOH के साथ आयोडोफॉर्म (CHI₃) का पीला अवक्षेप देते हैं।
मुख्य बिंदु 5
ऐल्डोल संघनन में α-हाइड्रोजन युक्त कार्बोनिल तनु क्षार में संघनित होकर α,β-असंतृप्त ऐल्डिहाइड/कीटोन बनाते हैं।
मुख्य बिंदु 6
कैनिजारो अभिक्रिया में α-हाइड्रोजन रहित ऐल्डिहाइड (HCHO, C₆H₅CHO) सांद्र क्षार में स्वतः ऑक्सीकृत व अपचयित होते हैं।
मुख्य बिंदु 7
क्लीमेन्सन अपचयन (Zn-Hg/HCl) तथा वोल्फ-किश्नर अपचयन (NH₂NH₂/KOH) कार्बोनिल (>C=O) को हाइड्रोकार्बन (>CH₂) में बदलते हैं।
मुख्य बिंदु 8
कार्बोक्सिलेट आयन (R-COO⁻) दो समतुल्य अनुनादी संरचनाओं द्वारा स्थायी होता है, अतः यह फीनॉल से अधिक अम्लीय है।
मुख्य बिंदु 9
इलेक्ट्रॉन-आकर्षी समूह (-I प्रभाव) अम्लीयता बढ़ाते हैं (F-CH₂COOH > Cl-CH₂COOH > CH₃COOH)।
मुख्य बिंदु 10
HVZ अभिक्रिया में α-हाइड्रोजन युक्त कार्बोक्सिलिक अम्ल लाल फॉस्फोरस व हैलोजन से क्रिया कर α-हैलो अम्ल बनाते हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
निम्नलिखित में से कौन सा यौगिक आयोडोफॉर्म परीक्षण नहीं देगा?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C
2
कैनिजारो अभिक्रिया दर्शाने वाला उपयुक्त ऐल्डिहाइड कौन सा है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
3
सर्वाधिक प्रबल अम्लीय कार्बोक्सिलिक अम्ल कौन सा है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C
4
क्लीमेन्सन अपचयन में प्रयुक्त होने वाला अभिकर्मक कौन सा है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
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