12 अगस्त 1765 को मुगल बादशाह ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल का दीवान बनाया। अब कंपनी का मुख्य उद्देश्य अधिकतम लगान वसूलना और सस्ते दामों पर भारतीय वस्तुएँ खरीदकर निर्यात करना था।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था का संकट (1770 का अकाल):
कंपनी की भारी लगान वसूली के कारण कारीगर गाँव छोड़कर भाग रहे थे, किसान लगान नहीं चुका पा रहे थे और खेती चौपट हो रही थी। 1770 के भयानक अकाल में बंगाल की एक-तिहाई आबादी (लगभग 1 करोड़ लोग) भुखमरी से मारी गई, किंतु कंपनी ने लगान में कोई छूट नहीं दी!
स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement - 1793):
खेती में सुधार और राजस्व की नियमित आमदनी सुनिश्चित करने के लिए गवर्नर जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस ने 1793 में बंगाल, बिहार और ओडिशा में स्थायी बंदोबस्त लागू किया:
- लगान की राशि हमेशा के लिए निश्चित: कंपनी को दी जाने वाली राजस्व राशि हमेशा के लिए तय कर दी गई; भविष्य में इसमें कोई वृद्धि नहीं की जा सकती थी।
- राजाओं व ताल्लुकदारों को जमींदार माना गया: उन्हें किसानों से लगान वसूल कर कंपनी को चुकाने का दायित्व दिया गया।
- सूर्यास्त कानून (Sunset Law): यदि जमींदार निश्चित तिथि को सूर्यास्त से पहले लगान नहीं चुका पाता, तो उसकी जमींदारी नीलाम कर दी जाती थी। अनेक पुराने जमींदारों की जमींदारियाँ नीलाम हो गईं।
- किसानों पर अत्याचार: लगान निश्चित होने के बावजूद जमींदार किसानों से मनमाना लगान वसूलते थे। किसान कर्ज के दुष्चक्र में फँसते चले गए।