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JAC • Class 8 • Social Science • Ch 17
Estimated Time: 45 Mins
Study Progress: In Progress

Judiciary

झारखण्ड शैक्षणिक परिषद् (JAC) एवं NCERT पाठ्यक्रम पर आधारित कक्षा 8 नागरिक शास्त्र का चौथा अध्याय "न्यायपालिका" (Judiciary) भारत की स्वतंत्र, निष्पक्ष व एकीकृत न्यायिक व्यवस्था का संपूर्ण प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करता है। न्यायपालिका कानून के शासन (Rule of Law) की संरक्षक और संविधान की अंतिम व्याख्याकार है। इस अध्याय में यह गहराई से उद्घाटित किया गया है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ क्या है—कार्यपालिका और विधायिका का न्यायाधीशों की नियुक्ति और कार्यप्रणाली में दखल न होना, तथा न्यायाधीशों के पद की सुरक्षा। अध्याय में भारत की एकीकृत न्यायिक संरचना के तीन स्तरों—(1) भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India, नई दिल्ली - शीर्ष अदालत), (2) उच्च न्यायालय (High Courts - जैसे राँची स्थित झारखण्ड उच्च न्यायालय), तथा (3) अधीनस्थ या जिला न्यायालय (Subordinate/District Courts)—का पदानुक्रम और अपीलीय व्यवस्था (Appellate System) स्पष्ट की गई है। इसके साथ ही फौजदारी कानून (Criminal Law) और दीवानी कानून (Civil Law) का विस्तृत तुलनात्मक अंतर, 1980 के दशक में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शुरू की गई जनहित याचिका (PIL - Public Interest Litigation) की युगांतरकारी क्रांति (जिससे स्कूली बच्चों को मिड-डे मील का अधिकार मिला), तथा "देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है" (Justice Delayed is Justice Denied) की व्यावहारिक चुनौतियों का व्यापक व परीक्षा-उन्मुख विश्लेषण संकलित है।

⚡ यदि किसी ताकतवर राजनेता या खरबपति उद्योगपति के खिलाफ किसी गरीब किसान या आम नागरिक का विवाद हो जाए, तो कौन सी ऐसी संस्था है जो बिना किसी डर के न्याय का तराजू सीधा रखती है?

कल्पना कीजिए एक ऐसी अदालत की जहाँ जज को किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के फोन पर फैसला सुनाना पड़े—क्या वहाँ किसी आम नागरिक को कभी न्याय मिल पाएगा? बिल्कुल नहीं! यही कारण है कि भारत के संविधान ने न्यायपालिका को सरकार और नेताओं के नियंत्रण से 100% स्वतंत्र रखा है। जब दिल्ली में जहरीला प्रदूषण फैला या जब अकाल के समय गोदामों में अनाज सड़ रहा था और लोग भूख से मर रहे थे, तो सुप्रीम कोर्ट के एक पोस्टकार्ड ने सरकार को सभी सरकारी स्कूलों में दोपहर का भोजन (Mid-Day Meal) मुफ्त देने का आदेश दे दिया! भारत की यह चमत्कारी न्यायिक प्रणाली कैसे कार्य करती है? आइए समझें!

Why This Chapter Matters

न्यायपालिका नागरिकों के मौलिक अधिकारों की ढाल है। झारखण्ड के राँची स्थित उच्च न्यायालय और जिला अदालतों ने विस्थापन, भूमि अधिग्रहण और मानवाधिकारों के संरक्षण में अनेक ऐतिहासिक फैसले देकर समाज के सबसे कमजोर तबके की रक्षा की है।

Before You Begin (Prerequisites)

  • कानून के शासन (Rule of Law) का सिद्धांत।
  • संविधान में उल्लिखित मौलिक अधिकार (विशेषकर अनुच्छेद 32)।
  • सरकार के तीन अंगों में विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों की बुनियादी समझ।

What You Will Learn (Core Objectives)

  • स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा और इसके आवश्यक संवैधानिक सुरक्षा उपायों की व्याख्या कर सकेंगे।
  • भारत की एकीकृत न्यायिक व्यवस्था के तीन स्तरों (सर्वोच्च, उच्च और अधीनस्थ अदालतें) और अपीलीय तंत्र को समझ सकेंगे।
  • फौजदारी कानून (आपराधिक) और दीवानी कानून (नागरिक) के बीच के मूलभूत अंतरों को सोदाहरण स्पष्ट कर सकेंगे।
  • जनहित याचिका (PIL) के उद्भव, प्रक्रिया और आम जनता के अधिकारों पर इसके क्रांतिकारी प्रभावों का मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • न्याय तक आम जनता की पहुँच में आने वाली चुनौतियों (न्यायिक देरी, अदालती खर्च) का आलोचनात्मक विश्लेषण कर सकेंगे।

Chapter Roadmap & Progression

1 1. न्यायपालिका की क्या भूमिका है? (...
2 2. स्वतंत्र न्यायपालिका क्या होती ह...
3 3. भारत में अदालतों की संरचना और अप...
4 4. फौजदारी बनाम दीवानी कानून और जनह...

Complete Concept Guide (100% Curriculum Coverage)

1. न्यायपालिका की क्या भूमिका है? (Role of the Judiciary)

न्यायपालिका देश में कानून का राज बनाए रखने के लिए मुख्य रूप से तीन प्रकार के कार्य करती है:

  • 1. विवादों का निपटारा (Dispute Resolution): यह नागरिकों के बीच, नागरिक और सरकार के बीच, दो या दो से अधिक राज्य सरकारों के बीच, तथा केंद्र और राज्य सरकार के बीच उत्पन्न विवादों को सुलझाती है।
  • 2. न्यायिक समीक्षा (Judicial Review): न्यायपालिका संविधान की अंतिम व्याख्याकार है। यदि उसे लगता है कि संसद द्वारा पारित कोई कानून संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है, तो वह उसे असंवैधानिक घोषित कर निरस्त कर सकती है।
  • 3. मौलिक अधिकारों का संरक्षण (Enforcing Fundamental Rights): यदि किसी नागरिक को लगता है कि उसके मौलिक अधिकारों का हनन हुआ है, तो वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय या अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय जा सकता है (जैसे हाकिम शेख केस में स्वास्थ्य के अधिकार को जीवन का अधिकार माना गया)।

2. स्वतंत्र न्यायपालिका क्या होती है? (What is an Independent Judiciary?)

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ है कि न्यायाधीश बिना किसी राजनीतिक दबाव या पक्षपात के निष्पक्ष न्याय दे सकें:

  • शक्तियों का पृथक्करण: विधायिका और कार्यपालिका अदालतों के दैनिक कार्यों में दखल नहीं दे सकतीं। जज सरकार के कर्मचारी नहीं होते।
  • नियुक्ति की स्वायत्तता: सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप न्यूनतम होता है।
  • पद की सुरक्षा (Security of Tenure): एक बार नियुक्त होने के बाद किसी न्यायाधीश को उसके पद से हटाना अत्यंत कठिन है। किसी जज को केवल संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत द्वारा "महाभियोग" (Impeachment) प्रस्ताव पारित करके ही हटाया जा सकता है।

3. भारत में अदालतों की संरचना और अपीलीय व्यवस्था (Structure of Courts & Appellate System)

भारत में एकीकृत (Integrated) न्यायिक प्रणाली है, जिसका अर्थ है कि ऊपरी अदालत के फैसले निचली अदालतों पर बाध्यकारी होते हैं:

न्यायालय का स्तरक्षेत्राधिकार व स्थितिअपीलीय भूमिका
1. सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court)नई दिल्ली (प्रधान न्यायाधीश - CJI की अध्यक्षता में)देश की सबसे बड़ी अपील अदालत; इसके फैसले भारत की सभी अदालतों को मानने होते हैं।
2. उच्च न्यायालय (High Court)राज्यों की शीर्ष अदालत (झारखण्ड उच्च न्यायालय, राँची)जिला अदालतों के फैसलों के विरुद्ध अपील सुनती है; रिट जारी करने की शक्ति।
3. अधीनस्थ / जिला अदालतें (Subordinate Courts)प्रत्येक जिले में जिला एवं सत्र न्यायाधीश (District & Sessions Judge)अधिकांश आम नागरिकों का वास्ता इसी स्तर पर मुकदमों की सुनवाई से पड़ता है।

अपीलीय व्यवस्था (Appellate System): यदि किसी व्यक्ति को निचली अदालत का फैसला न्यायसंगत नहीं लगता, तो वह उसके खिलाफ उच्च न्यायालय और अंत में सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकता है (जैसे लक्ष्मण कुमार बनाम दिल्ली प्रशासन दहेज हत्या केस)।

4. फौजदारी बनाम दीवानी कानून और जनहित याचिका (Criminal vs Civil Law & PIL)

भारतीय विधि व्यवस्था दो मुख्य शाखाओं में बँटी है, साथ ही जनहित याचिका ने न्याय तक आम जन की पहुँच को सुगम बनाया है:

बिंदुफौजदारी कानून (Criminal Law)दीवानी कानून (Civil Law)
विषय वस्तुऐसे अपराध जो समाज के विरुद्ध माने जाते हैं (चोरी, हत्या, डकैती, दहेज प्रताड़ना)व्यक्तियों के आपसी अधिकारों के उल्लंघन के मामले (जमीन विवाद, किराया, तलाक, अनुबंध)
प्रक्रियापुलिस में प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज होने से शुरुआत; पुलिस जांच करती है।प्रभावित पक्ष द्वारा सीधे दीवानी अदालत में याचिका (Petition) दायर की जाती है।
अदालती निर्णयदोषी पाए जाने पर जेल की सजा, जुर्माना या मृत्युदंड।मुआवजा, बकाया किराया वसूली, संपत्ति की वापसी या अनुबंध का पालन।

जनहित याचिका (PIL): 1980 के दशक में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पी. एन. भगवती और वी. आर. कृष्णा अय्यर द्वारा शुरू की गई। इसके तहत कोई भी व्यक्ति या संस्था ऐसे गरीबों और वंचितों की ओर से सीधे सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में पत्र या टेलीग्राम भेजकर न्याय की गुहार लगा सकती है जिनके अधिकारों का हनन हो रहा हो। इसी से स्कूलों में मिड-डे मील की व्यवस्था लागू हुई।

Key Historical Terms, Chronology & Administrative Principles

भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court)
स्थापना: 26 जनवरी 1950 | स्थान: तिलक मार्ग, नई दिल्ली
देश का शीर्ष न्यायालय, जिसके प्रमुख भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) होते हैं।
अदालतों की त्रिस्तरीय संरचना
सर्वोच्च न्यायालय (शीर्ष) → उच्च न्यायालय (राज्य स्तर) → जिला व अधीनस्थ अदालतें (जिला स्तर)
भारत में एकीकृत न्यायपालिका है; ऊपर की अदालत के निर्णय निचली अदालतों पर बाध्यकारी होते हैं।
झारखण्ड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court)
स्थापना: 15 नवंबर 2000 | स्थान: राँची (डोरंडा/धुर्वा)
झारखण्ड राज्य के गठन के साथ ही राँची में राज्य के शीर्ष उच्च न्यायालय की स्थापना हुई।
प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR)
First Information Report (धारा 154, CrPC)
फौजदारी मामलों में पुलिस FIR दर्ज होने के बाद ही औपचारिक जांच प्रारंभ करती है।
जनहित याचिका (PIL)
Public Interest Litigation (अनुच्छेद 32 एवं 226)
गरीबों और वंचितों के मानवाधिकारों के संरक्षण हेतु न्यायिक प्रक्रिया का सरलीकरण।

Conceptual Solved Examples & Case Studies

Example 1
प्रश्न 1: स्वतंत्र न्यायपालिका (Independent Judiciary) से क्या अभिप्राय है? इसे सुनिश्चित करने के दो संवैधानिक उपाय लिखिए।
Step-by-Step Solution:

उत्तर: स्वतंत्र न्यायपालिका का अर्थ है कि देश की अदालतें किसी भी राजनीतिक दल, सरकार, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के दबाव में काम नहीं करतीं और कानून के अनुसार पूरी निष्पक्षता से फैसला सुनाती हैं। इसे सुनिश्चित करने के दो संवैधानिक उपाय:

  1. शक्तियों का पृथक्करण: सरकार के अन्य दो अंग—विधायिका और कार्यपालिका—अदालत के कार्यों में तनिक भी हस्तक्षेप नहीं कर सकते।
  2. न्यायाधीशों के पद की सुरक्षा: जजों को एक बार नियुक्त करने के बाद उनके पद से हटाना लगभग असंभव होता है। उन्हें केवल संसद में दोनों सदनों के दो-तिहाई बहुमत द्वारा महाभियोग (Impeachment) प्रस्ताव पास करके ही हटाया जा सकता है।
Example 2
प्रश्न 2: भारत की एकीकृत न्यायिक व्यवस्था (Integrated Judicial System) में "अपीलीय प्रणाली" क्या है? उदाहरण देकर समझाइए।
Step-by-Step Solution:
उत्तर: एकीकृत न्यायिक व्यवस्था का अर्थ है कि देश की सभी अदालतें एक सूत्र में जुड़ी हैं और शीर्ष अदालत का निर्णय नीचे की सभी अदालतों पर बाध्यकारी होता है। अपीलीय प्रणाली: यदि किसी मुकदमे में किसी नागरिक को लगता है कि निचली अदालत (जैसे जिला अदालत) ने उसके साथ न्याय नहीं किया है या गलत फैसला दिया है, तो वह उस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय (High Court) में अपील कर सकता है। यदि वह हाई कोर्ट के फैसले से भी असंतुष्ट है, तो वह अंतिम अपील सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में कर सकता है। उदाहरण: दिल्ली के सुधा गोयल दहेज हत्या मामले में निचली अदालत ने आरोपियों को मौत की सजा दी, हाई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया, लेकिन अंततः सुप्रीम कोर्ट ने पति और सास को दोषी मानकर उम्रकैद की सजा सुनाई।
Example 3
प्रश्न 3: फौजदारी कानून (Criminal Law) और दीवानी कानून (Civil Law) में कोई तीन मुख्य अंतर लिखिए।
Step-by-Step Solution:

उत्तर: दोनों में मुख्य अंतर इस प्रकार हैं:

  1. अपराध का स्वरूप: फौजदारी कानून ऐसे कृत्यों से संबंधित है जिन्हें समाज के विरुद्ध अपराध माना जाता है (जैसे हत्या, डकैती, चोरी, दहेज प्रताड़ना)। जबकि दीवानी कानून दो व्यक्तियों के निजी अधिकारों के हनन से संबंधित होता है (जैसे जमीन का विवाद, किराया समझौता, तलाक)।
  2. शुरुआत की प्रक्रिया: फौजदारी मामलों की शुरुआत पुलिस थाने में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने से होती है जिसके बाद पुलिस जांच करती है। जबकि दीवानी मामलों में पीड़ित पक्ष सीधे अदालत में याचिका (Petition) दायर करता है।
  3. परिणाम / फैसला: फौजदारी मामले में दोषी को जेल की सजा या जुर्माना होता है। दीवानी मामले में अदालत नुकसान की भरपाई, मुआवजा देने या मकान खाली कराने का आदेश देती है।
Example 4
प्रश्न 4: जनहित याचिका (PIL) क्या है और इसने आम जनता तक न्याय की पहुँच को कैसे बदला?
Step-by-Step Solution:

उत्तर: जनहित याचिका (Public Interest Litigation - PIL): 1980 के दशक में सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित याचिका की क्रांतिकारी व्यवस्था शुरू की। इसके अनुसार, यदि किसी गरीब, अशिक्षित या शोषित वर्ग के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा हो और वे अदालत जाने में असमर्थ हों, तो उनकी ओर से कोई भी अन्य नागरिक या सामाजिक संगठन सीधे हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सकता है। बदलाव:

  1. इसके लिए भारी फीस या वकीलों के लंबे तामझाम की जरूरत नहीं है; एक साधारण पत्र या पोस्टकार्ड को भी अदालत रिट याचिका मान सकती है।
  2. इसके माध्यम से बिहार के विचाराधीन कैदियों की रिहाई, बंधुआ मजदूरों की मुक्ति और सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए दोपहर के भोजन (Mid-Day Meal) की व्यवस्था जैसे ऐतिहासिक जन-कल्याणकारी फैसले हुए।
Example 5
प्रश्न 5: "देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है" (Justice Delayed is Justice Denied)—इस कथन की समीक्षा भारतीय अदालतों के संदर्भ में कीजिए।
Step-by-Step Solution:

उत्तर: इस कथन का अर्थ है कि यदि किसी पीड़ित को न्याय मिलने में कई दशक बीत जाएँ, तो उस न्याय का कोई मानवीय या व्यावहारिक मूल्य नहीं रह जाता। भारतीय संदर्भ में चुनौतियाँ:

  1. मुकदमों का भारी अंबार: भारत की अदालतों में करोड़ों मुकदमे वर्षों से लंबित (Pending) हैं।
  2. न्यायाधीशों की कमी: देश की जनसंख्या के अनुपात में जजों की संख्या बहुत कम है, जिससे मुकदमों की सुनवाई में तारीख पर तारीख मिलती रहती है।
  3. आम जनता की पीड़ा: कई मामलों में पीड़ित या गवाह की पूरी जिंदगी बीत जाती है, भारी धन खर्च हो जाता है और न्याय मिलने तक उसकी मृत्यु हो जाती है। अतः अदालतों में त्वरित न्याय (Fast-track justice) की व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है।

Common Misconceptions & Examiner Traps

Common Misconception

छात्र अक्सर मान लेते हैं कि पुलिस ही अदालत की तरह सजा सुना सकती है।

Scientific Reality & Correction

पुलिस का कार्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना, FIR दर्ज करना और अपराध की जांच करना है। किसी को दोषी या निर्दोष ठहराने और सजा सुनाने का एकमात्र अधिकार न्यायपालिका (अदालत) को है।

Common Misconception

यह भ्रम होना कि PIL केवल वही व्यक्ति दायर कर सकता है जिसका व्यक्तिगत नुकसान हुआ हो।

Scientific Reality & Correction

PIL की यही खासियत है कि कोई भी जागरूक नागरिक या गैर-सरकारी संगठन (NGO) किसी अन्य वंचित समूह के जनहित के मुद्दे पर अदालत जा सकता है।

Common Misconception

यह समझना कि हाई कोर्ट का फैसला सुप्रीम कोर्ट से बड़ा या अंतिम होता है।

Scientific Reality & Correction

भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) देश की शीर्ष अदालत है। इसका फैसला सभी हाई कोर्ट्स और निचली अदालतों पर अंतिम और सर्वोपरि होता है।

Visual Learning & Conceptual Map

भारत की एकीकृत न्यायपालिका का पदानुक्रम (Hierarchy of Indian Judiciary) स्वतंत्र, निष्पक्ष व एकीकृत अपीलीय प्रणाली (Integrated Appellate System) 1. भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India - नई दिल्ली) • देश की शीर्ष अदालत • मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता में • संविधान का अंतिम व्याख्याकार • इसके फैसले देश की सभी अदालतों पर अंतिम व बाध्यकारी अपीलीय मार्ग 2. उच्च न्यायालय (High Courts - जैसे झारखण्ड उच्च न्यायालय, राँची) • प्रत्येक राज्य की सर्वोच्च अदालत • मुख्य न्यायाधीश व अन्य जज • जिला अदालतों के फैसलों के विरुद्ध अपील की सुनवाई • मौलिक अधिकारों हेतु रिट जारी करने की शक्ति 3. अधीनस्थ एवं जिला अदालतें (Subordinate & District Courts) फौजदारी अदालतें (सत्र न्यायालय - Sessions Court) • अपराध, हत्या, चोरी, डकैती, मारपीट के मुकदमे पुलिस FIR से प्रक्रिया शुरू • सजा या कारावास दीवानी अदालतें (सिविल कोर्ट - Civil Court) • जमीन, संपत्ति, अनुबंध, किराया, तलाक के विवाद पीड़ित द्वारा अर्जी • क्षतिपूर्ति व राहत का आदेश

Chapter Summary & 10 Key Takeaways

Takeaway 1
  1. न्यायपालिका देश में कानून के शासन (Rule of Law) की संरक्षक और संविधान की अंतिम व्याख्याकार संस्था है।
Takeaway 2
  1. स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए शक्तियों का पृथक्करण और न्यायाधीशों के पद की संवैधानिक सुरक्षा (महाभियोग प्रक्रिया) आवश्यक है।
Takeaway 3
  1. भारत में एकीकृत त्रिस्तरीय न्यायिक व्यवस्था है: सर्वोच्च न्यायालय (शीर्ष), उच्च न्यायालय (राज्य स्तर), और जिला व अधीनस्थ अदालतें।
Takeaway 4
  1. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय देश की सभी निचली अदालतों पर अनिवार्य और अंतिम रूप से बाध्यकारी होते हैं।
Takeaway 5
  1. अपीलीय प्रणाली के तहत यदि कोई नागरिक निचली अदालत के निर्णय से असंतुष्ट है, तो वह उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकता है।
Takeaway 6
  1. फौजदारी कानून समाज के विरुद्ध गंभीर अपराधों (हत्या, चोरी, दहेज उत्पीड़न) से संबंधित है, जिसकी शुरुआत पुलिस FIR से होती है।
Takeaway 7
  1. दीवानी कानून व्यक्तियों के निजी अधिकारों (जमीन विवाद, अनुबंध, किराया, तलाक) से संबंधित है जिसमें सीधे अदालत में याचिका दायर की जाती है।
Takeaway 8
  1. 1980 के दशक में शुरू हुई जनहित याचिका (PIL) ने न्याय तक आम और गरीब जनता की पहुँच को क्रांतिकारी रूप से सुलभ बना दिया।
Takeaway 9
  1. जनहित याचिका के ऐतिहासिक फैसलों द्वारा ही देश के सभी सरकारी स्कूलों में बच्चों को दोपहर का मुफ्त भोजन (Mid-Day Meal) मिलना शुरू हुआ।
Takeaway 10
  1. अदालतों में लंबित करोड़ों मुकदमे और जजों की कमी "देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है" की सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

Check Your Understanding (Diagnostic Practice Questions)

Diagnostic questions testing core conceptual clarity. Answers are hidden initially — solve each problem first, then click to reveal the step-by-step verified solution.

1
भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना किस तिथि को हुई थी?
Reveal Answer & Explanation
Answer: 26 जनवरी 1950
भारत के गणतंत्र बनने के साथ ही 26 जनवरी 1950 को सर्वोच्च न्यायालय की विधिवत स्थापना हुई थी।
2
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और सर्वोच्च न्यायालय के जजों को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या कहलाती है?
Reveal Answer & Explanation
Answer: महाभियोग (Impeachment)
न्यायाधीशों को केवल संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत द्वारा महाभियोग प्रस्ताव पारित करके ही हटाया जा सकता है।
3
फौजदारी (आपराधिक) कानून के मामलों में अदालती या पुलिस प्रक्रिया किस दस्तावेज के दर्ज होने से शुरू होती है?
Reveal Answer & Explanation
Answer: प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR - First Information Report)
पुलिस किसी भी संज्ञेय अपराध की जांच थाने में FIR दर्ज करने के बाद ही विधिवत प्रारंभ करती है।
4
जनहित याचिका (PIL) का पूरा नाम क्या है?
Reveal Answer & Explanation
Answer: पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (Public Interest Litigation)
PIL का अर्थ जनहित याचिका है, जो गरीबों और वंचितों के सामूहिक अधिकारों की रक्षा हेतु कोई भी नागरिक दायर कर सकता है।
5
झारखण्ड उच्च न्यायालय (High Court) किस शहर में स्थित है?
Reveal Answer & Explanation
Answer: राँची
15 नवंबर 2000 को झारखण्ड राज्य निर्माण के साथ ही राजधानी राँची में झारखण्ड उच्च न्यायालय स्थापित किया गया।
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