1857 का विद्रोह अचानक नहीं हुआ था; यह पिछले 100 वर्षों से भारतीय समाज के प्रत्येक वर्ग में सुलग रहे असंतोष का विस्फोट था:
- नवाबों और राजाओं की छिनती सत्ता: 18वीं सदी के मध्य से ही राजाओं की संप्रभुता समाप्त हो रही थी। व्यपगत सिद्धांत द्वारा झाँसी, सतारा, नागपुर हड़पे गए। 1856 में अवध को "कुशासन" के झूठे आरोप पर हड़पा गया, जिससे अवध के नवाब के प्रति वफादार हजारों सैनिक आक्रोशित हो गए। पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहेब की पेंशन बंद कर दी गई।
- किसान और जमींदार: अत्यधिक भू-राजस्व और लगान वसूली के अमानवीय तरीकों से किसान तबाह थे। महाजनों के कर्ज न चुका पाने पर उनकी पुश्तैनी जमीनें हाथ से निकल रही थीं।
- भारतीय सिपाहियों का असंतोष: कंपनी की सेना में 87% भारतीय सिपाही थे। उन्हें कम वेतन, पदोन्नति में भेदभाव (सूबेदार से ऊपर कोई पद नहीं), तथा 1856 के जनरल सर्विस एनलिस्टमेंट एक्ट द्वारा समुद्र पार युद्ध के लिए जाने की बाध्यता थी (उस समय समुद्र यात्रा को धर्म भ्रष्ट माना जाता था)।
- धार्मिक और सामाजिक सुधारों पर संदेह: अंग्रेजों द्वारा सती प्रथा पर रोक (1829), विधवा पुनर्विवाह कानून (1856), अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार और ईसाई मिशनरियों को धर्मांतरण की खुली छूट देने से आम जनता को लगा कि अंग्रेज उनके पारंपरिक धर्म और संस्कृति को नष्ट करना चाहते हैं।