भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में चरवाहों का जीवन ऋतुओं के चक्र—गर्मियों और सर्दियों के बदलाव—से पूरी तरह संचालित होता है। इस मौसमी प्रवास को भूगोल में ऋतु-प्रवास (Transhumance) कहा जाता है।
गुर्जर बकरवाल (जम्मू और कश्मीर):
- ये भेड़ों और बकरियों के बड़े-बड़े रेवड़ (Flocks) पालते हैं। 19वीं सदी में वे बेहतर चरागाहों की तलाश में कश्मीर आए थे।
- सर्दियों का चक्र: जब ऊंची पहाड़ियां बर्फ से ढक जाती हैं, तो वे शिवालिक की निचली पहाड़ियों में आ जाते हैं। यहाँ सूखी झाड़ियां और जंगल बकरियों के लिए चारा प्रदान करते हैं।
- गर्मियों का चक्र: अप्रैल के अंत में बर्फ पिघलने पर वे उत्तर की ओर कश्मीर घाटी के लिए कूच करते हैं। कई परिवार मिलकर यात्रा करते हैं जिसे 'काफिला' (Kafila) कहा जाता है। वे पीर पंजाल के दर्रों को पार कर ऊंची अल्पाइन चरागाहों में पहुंचते हैं, जहाँ बर्फ पिघलने से हरी-भरी पौष्टिक घास उग चुकी होती है। सितंबर के अंत में वे पुनः नीचे की ओर लौटना शुरू कर देते हैं।
गद्दी चरवाहे (हिमाचल प्रदेश):
गद्दी भी ऐसा ही मौसमी चक्र अपनाते हैं। वे सर्दियों में कांगड़ा और शिवालिक की निचली पहाड़ियों में मवेशी चराते हैं। अप्रैल तक वे उत्तर की ओर लाहौल और स्पीति की ओर बढ़ते हैं। गर्मियों में बर्फ पिघलने पर वे ऊंचे दर्रों को पार करके पट्टन घाटी की हरी चरागाहों में चले जाते हैं। सितंबर तक वे वापसी शुरू करते हैं और रास्ते में लाहौल-स्पीति के किसानों की गर्मियों की फसल (फापर) काटते और सर्दियों की फसल (गेहूं) बोते हैं।
गढ़वाल, कुमाऊं और पूर्वोत्तर के चरवाहे:
गढ़वाल और कुमाऊं के गुर्जर मवेशी पालक सर्दियों में 'भाबर' (शिवालिक की तलहटी में सूखा जंगल) में रहते हैं और गर्मियों में 10,000 फीट से अधिक ऊंचे विशाल मखमली घास के मैदानों—'बुग्याल' (Bugyals) की ओर चढ़ जाते हैं। इसी प्रकार हिमालय के अन्य समुदायों—भोटिया, शेरपा और किन्नौरी भी ऋतु-प्रवास करते हैं।