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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा X • Social Science • अध्याय 7
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

वन एवं वन्यजीव संसाधन (Forest and Wildlife Resources)

भारत जैव विविधता (Biodiversity) की दृष्टि से विश्व के सबसे समृद्ध देशों में से एक है। यहाँ दुनिया की समस्त जैव उप-जातियों की लगभग 8% संख्या (लगभग 16 लाख प्रजातियाँ) पाई जाती है। परंतु मानवीय हस्तक्षेप, अंधाधुंध औद्योगिकीकरण, खनन, बड़े बांधों के निर्माण और अवैध शिकार के कारण वनस्पतिजात और प्राणिजात की अनेक प्रजातियाँ विलुप्ति की कगार पर पहुंच गई हैं। अंतरराष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण संघ (IUCN) ने पौधों और जीवों को छह श्रेणियों—सामान्य, संकटग्रस्त, सुभेद्य, दुर्लभ, स्थानिक और लुप्त जातियों—में वर्गीकृत किया है। भारत में 1952 में ही एशियाई चीते (Asiatic Cheetah) को आधिकारिक रूप से लुप्त घोषित कर दिया गया था। वनों के ह्रास ने केवल वन्यजीवों को ही संकट में नहीं डाला, बल्कि वनों पर आश्रित आदिवासी और ग्रामीण समुदायों की आजीविका और सांस्कृतिक अस्मिता को भी छीन लिया है। इस विनाश को रोकने के लिए 1972 में 'भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम' लागू किया गया और 1973 में बाघों के संरक्षण हेतु ऐतिहासिक 'प्रोजेक्ट टाइगर' शुरू किया गया। प्रशासनिक दृष्टि से भारत के वनों को आरक्षित (Reserved), रक्षित (Protected) और अवर्गीकृत (Unclassed) वनों में बांटा गया है। इस अध्याय में हम वनों के प्रशासनिक वर्गीकरण, चिपको आंदोलन, टिहरी के बीज बचाओ आंदोलन, राजस्थान के बिश्नोई समाज द्वारा वन्यजीवों की रक्षा, पवित्र उपवनों (Sacred Groves / देवराहा) की परंपरा, और 1988 में ओडिशा से शुरू हुए 'संयुक्त वन प्रबंधन' (JFM) के सामुदायिक संरक्षण मॉडल्स का गहन, प्रामाणिक और परीक्षा-उन्मुख अध्ययन करेंगे।

जब पेड़ों और हिरणों को बचाने के लिए लोगों ने अपनी जान की बाजी लगा दी!

राजस्थान के मारवाड़ में बिश्नोई समाज के गांवों में यदि आप जाएं, तो आप पाएंगे कि काले हिरण (चिंकारा), नीलगाय और मोर इंसानों के बीच ऐसे बेखौफ घूमते हैं जैसे वे परिवार के ही सदस्य हों! सदियों पहले अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 लोगों ने खेजड़ी के पेड़ों को कुल्हाड़ियों से बचाने के लिए अपने सिर कटवा दिए थे। उत्तराखंड की पहाड़ियों में महिलाओं ने पेड़ों को अपनी बांहों में भरकर 'चिपको आंदोलन' रचा। वन और वन्यजीव केवल सरकारी नियम-कायदों से नहीं, बल्कि भारत की उस महान सांस्कृतिक परंपरा से जीवित हैं जो प्रकृति की हर रचना को पवित्र मानती है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

JAC और CBSE कक्षा 10वीं बोर्ड परीक्षा में 'वन एवं वन्यजीव संसाधन' से IUCN की जातियों का वर्गीकरण (संकटग्रस्त बनाम सुभेद्य), वन विनाश के प्रमुख कारण (खनन, नदी घाटी परियोजनाएं), वनों का प्रशासनिक वर्गीकरण (आरक्षित, रक्षित, अवर्गीकृत वन), प्रोजेक्ट टाइगर (1973) की उपलब्धियां और प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान, तथा सामुदायिक संरक्षण के उदाहरण (चिपको आंदोलन, बिश्नोई समाज, पवित्र उपवन, JFM) पर 3 से 5 अंकों के विश्लेषणात्मक प्रश्न अवश्य पूछे जाते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) और खाद्य श्रृंखला (Food Chain) की मूलभूत समझ।
  • पादप और जंतु प्रजातियों (Flora & Fauna) की सामान्य जानकारी।
  • पर्यावरण प्रदूषण और वनों की कटाई (Deforestation) के प्रभावों से परिचय।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • भारत की समृद्ध जैव विविधता और IUCN द्वारा निर्धारित जातियों के छह श्रेणियों में वर्गीकरण का सटीक विश्लेषण करना।
  • स्वतंत्रता पूर्व और पश्चात वनों के विनाश के ऐतिहासिक व विकासात्मक कारकों (कृषि, बड़े बांध, खनन) की पहचान करना।
  • भारत में वनों के त्रि-स्तरीय प्रशासनिक वर्गीकरण (आरक्षित, रक्षित, अवर्गीकृत वन) के अंतर और वितरण को समझना।
  • भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 और प्रोजेक्ट टाइगर (1973) के उद्देश्यों व प्रमुख टाइगर रिजर्वों की सूची बनाना।
  • सामुदायिक संरक्षण आंदोलनों (चिपको, बिश्नोई परंपरा, पवित्र उपवन, संयुक्त वन प्रबंधन-JFM) की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. भारत में जैव विविधता एवं IUCN प्...
2 2. वन और वन्यजीव संसाधनों के ह्रास...
3 3. वनों का प्रशासनिक वर्गीकरण (आरक्...
4 4. सरकारी संरक्षण प्रयास: वन्यजीव स...
5 5. समुदाय और संरक्षण: चिपको, बिश्नो...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. भारत में जैव विविधता एवं IUCN प्रजातियों का वर्गीकरण

1.1 जैव विविधता और भारत की स्थिति

जैव विविधता (Biodiversity): पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीवों (वनस्पतियों, प्राणियों और सूक्ष्मजीवों) की विविधता, उनके आवासों और उनके मध्य जटिल पारिस्थितिक अंतर्संबंधों को जैव विविधता कहा जाता है।

  • भारत विश्व के 12 महा-विविधता (Mega-biodiversity) वाले देशों में से एक है।
  • भारत में लगभग 81,000 वन्यजीव प्रजातियाँ और 47,000 वनस्पति प्रजातियाँ पाई जाती हैं। वनस्पति प्रजातियों में लगभग 15,000 प्रजातियाँ देशज (स्थानिक) हैं जो केवल भारत में पाई जाती हैं।
  • वर्तमान में भारत में कम से कम 10% वन्य वनस्पतिजात और 20% स्तनधारियों के लुप्त होने का गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

1.2 IUCN के अनुसार प्रजातियों का वर्गीकरण

अंतरराष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण संघ (IUCN - International Union for Conservation of Nature and Natural Resources) के अनुसार पौधों और प्राणियों की जातियों को निम्नलिखित श्रेणियों में बांटा गया है:

श्रेणी का नामलक्षण एवं परिभाषाप्रमुख उदाहरण
1. सामान्य जातियाँ (Normal Species)वे जातियाँ जिनकी संख्या जीवित रहने के लिए सामान्य मानी जाती है।साल, चीड़, मवेशी, कृंतक (Rodents)।
2. संकटग्रस्त जातियाँ (Endangered Species)वे जातियाँ जिनके लुप्त होने का खतरा है। यदि विपरीत परिस्थितियाँ जारी रहीं तो इनका जीवित रहना कठिन हो जाएगा।काला हिरण (Black buck), मगरमच्छ, भारतीय जंगली गधा, गेंडा (Indian Rhino), शेर की पूंछ वाला मकाक बंदर, संगाई (मणिपुर का हिरण)।
3. सुभेद्य जातियाँ (Vulnerable Species)वे जातियाँ जिनकी संख्या लगातार घट रही है। यदि इनकी आबादी घटाने वाले कारकों को नहीं रोका गया तो ये संकटग्रस्त श्रेणी में आ जाएंगी।नीली भेड़, एशियाई हाथी, गंगा नदी की डॉल्फिन।
4. दुर्लभ जातियाँ (Rare Species)इन जातियों की संख्या बहुत कम या विषम है। यदि विपरीत परिस्थितियों में सुधार नहीं हुआ तो ये संकटग्रस्त या सुभेद्य बन सकती हैं।हिमालयी भूरा भालू, जंगली एशियाई भैंस, मरुस्थली लोमड़ी, हॉर्नबिल।
5. स्थानिक जातियाँ (Endemic Species)प्राकृतिक या भौगोलिक सीमाओं द्वारा अलग-थलग विशेष क्षेत्रों में ही पाई जाने वाली जातियाँ।अंडमानी टील (जंगली बत्तख), निकोबारी कबूतर, अंडमानी जंगली सूअर, मिथुन (अरुणाचल प्रदेश)।
6. लुप्त जातियाँ (Extinct Species)वे जातियाँ जो अपने आवास स्थलों में खोज करने पर पूरी तरह अनुपस्थित पाई गई हैं; जो पृथ्वी से हमेशा के लिए विलुप्त हो चुकी हैं।एशियाई चीता (1952 में भारत में लुप्त घोषित), गुलाबी सिर वाली बत्तख (Pink-headed duck)।

2. वन और वन्यजीव संसाधनों के ह्रास के कारण

2.1 ऐतिहासिक एवं औपनिवेशिक कारक

भारत में वनों के सबसे बड़े विनाश का आरंभ औपनिवेशिक काल (ब्रिटिश शासन) में हुआ:

  • रेलवे का विस्तार: रेल लाइनों के स्लीपर बनाने और इंजन के ईंधन के लिए लाखों हेक्टेयर वनों को अंधाधुंध काटा गया।
  • व्यावसायिक वानिकी (Commercial Forestry): अंग्रेजों ने वैज्ञानिक वानिकी के नाम पर प्राकृतिक वनों को काटकर केवल एक ही प्रजाति (जैसे सागौन या चीड़) के एकल वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया, जिससे जैव विविधता नष्ट हो गई।
  • कृषि का विस्तार: राजस्व बढ़ाने के लिए वनों को काटकर कृषि भूमि में बदला गया।

2.2 स्वतंत्रता के बाद वन विनाश के प्रमुख कारक

  1. कृषि भूमि का फैलाव: भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के अनुसार 1951 से 1980 के बीच 26,200 वर्ग किमी से अधिक वन क्षेत्र को कृषि भूमि में बदल दिया गया। पूर्वोत्तर और मध्य भारत में स्थानांतरी (झूम) खेती के कारण भी वनों का व्यापक ह्रास हुआ।
  2. विशाल नदी घाटी परियोजनाएं: 1951 से अब तक नदी घाटी परियोजनाओं के कारण 5,000 वर्ग किमी से अधिक वन जलमग्न हो चुके हैं। उदाहरणार्थ, मध्य प्रदेश में नर्मदा सागर परियोजना के कारण 40,000 हेक्टेयर वन क्षेत्र जलमग्न हो गया।
  3. खनन (Mining): खनन गतिविधियों ने वनों को तबाह कर दिया है। उदाहरणार्थ, पश्चिम बंगाल में बक्सा टाइगर रिजर्व (Buxa Tiger Reserve) डोलोमाइट के खनन के कारण गंभीर संकट में है। इसने कई प्रजातियों के प्राकृतिक आवास को खंडित कर दिया है और हाथियों के आवागमन के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया है।
  4. संसाधनों का असमान उपभोग: धनी वर्ग और विकसित देश पर्यावरण संसाधनों का गरीब लोगों की तुलना में कई गुना अधिक उपभोग करते हैं। भारत में सबसे धनी 5% लोग सबसे गरीब 25% लोगों की तुलना में पर्यावरण को कहीं अधिक नुकसान पहुंचाते हैं।

3. वनों का प्रशासनिक वर्गीकरण (आरक्षित, रक्षित एवं अवर्गीकृत वन)

3.1 भारत में वनों का त्रि-स्तरीय प्रशासनिक विभाजन

प्रशासन और संरक्षण की दृष्टि से वन विभाग ने भारत के वनों को तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया है:

श्रेणी का नामअनुपात एवं संरक्षण की स्थितिभौगोलिक वितरण (राज्य)
1. आरक्षित वन (Reserved Forests)देश के कुल वन क्षेत्र का 50% से अधिक भाग। यह वन और वन्यजीव संसाधनों के संरक्षण की दृष्टि से सर्वाधिक मूल्यवान माने जाते हैं। यहाँ बिना सरकारी अनुमति के लकड़ी काटना, शिकार करना और पशु चराना पूरी तरह वर्जित है।जम्मू-कश्मीर, आंध्र प्रदेश, उत्तराखंड, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, और महाराष्ट्र में वनों का एक बड़ा हिस्सा आरक्षित वन है।
2. रक्षित वन (Protected Forests)देश के कुल वन क्षेत्र का लगभग एक-तिहाई (33%) भाग। इन वनों को और अधिक नष्ट होने से बचाने के लिए सुरक्षित घोषित किया गया है। यहाँ स्थानीय ग्रामीणों को कुछ नियमों के तहत सूखी लकड़ी बीनने और पशु चराने की सीमित छूट दी जाती है।बिहार, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा और राजस्थान में कुल वन क्षेत्र का बड़ा हिस्सा रक्षित वनों के अंतर्गत आता है।
3. अवर्गीकृत वन (Unclassed Forests)अन्य सभी वन और बंजर भूमि जो सरकार, निजी व्यक्तियों और समुदायों के स्वामित्व में होते हैं। यहाँ लकड़ी काटने और चराई पर कोई सरकारी प्रतिबंध नहीं होता।पूर्वोत्तर के सभी राज्य (असम, नागालैंड, मेघालय आदि) और गुजरात के अधिकांश वन अवर्गीकृत हैं जिनका प्रबंधन स्थानीय समुदाय करते हैं।
स्थाई वन क्षेत्र (Permanent Forest Estate): आरक्षित और रक्षित वनों को मिलाकर 'स्थाई वन क्षेत्र' कहा जाता है, जिसका रखरखाव इमारती लकड़ी और अन्य वन उत्पादों की प्राप्ति तथा पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से किया जाता है। मध्य प्रदेश में देश का सर्वाधिक स्थाई वन क्षेत्र (लगभग 75%) है।

4. सरकारी संरक्षण प्रयास: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 एवं प्रोजेक्ट टाइगर

4.1 भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972

वन्यजीवों के तेजी से गिरते स्तर को देखते हुए 1972 में भारत सरकार ने भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम लागू किया:

  • मुख्य उद्देश्य: वन्यजीवों के आवासों (Habitats) का कानूनी संरक्षण करना और संकटग्रस्त प्रजातियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
  • शिकार (Poaching) पर पूरे देश में कानूनी रूप से पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया।
  • वन्यजीवों के व्यापार पर कठोर नियंत्रण और संकटग्रस्त जातियों के कानूनी संरक्षण की अखिल भारतीय सूची जारी की गई।
  • इसके तहत देश भर में राष्ट्रीय उद्यान (National Parks) और वन्यजीव अभयारण्य (Sanctuaries) स्थापित किए गए।

4.2 प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger - 1973)

बाघ (Tiger) वन्यजीव संरक्षण का सबसे प्रमुख प्रतीक है। 1973 में अधिकारियों ने पाया कि 20वीं सदी की शुरुआत में जहां भारत में बाघों की अनुमानित संख्या 55,000 थी, वहीं 1973 में यह घटकर मात्र 1,827 रह गई थी।

बाघों की आबादी घटने के कारण: शिकार (हड्डियों व खाल का अवैध व्यापार), प्राकृतिक आवासों का सिकुड़ना, और भोजन के लिए शिकार की कमी।
प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत: 1973 में भारत सरकार ने 'प्रोजेक्ट टाइगर' अभियान शुरू किया, जो केवल एक प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं था बल्कि संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र को सुरक्षित करने का एक विशाल जैव-संरक्षण उपक्रम था।

भारत के प्रमुख टाइगर रिजर्व (Tiger Reserves):

टाइगर रिजर्व का नामराज्यभौगोलिक महत्व
जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान (Jim Corbett)उत्तराखंडभारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान एवं प्रमुख बाघ आश्रय।
सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान (Sundarbans)पश्चिम बंगालमैंग्रोव दलदली वनों में रॉयल बंगाल टाइगर का प्राकृतिक आवास।
बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान (Bandhavgarh)मध्य प्रदेशसफेद बाघों और उच्च बाघ घनत्व वाला क्षेत्र।
सरिस्का वन्यजीव अभयारण्य (Sariska)राजस्थानअरावली पर्वत श्रृंखला में स्थित बाघ अभयारण्य।
मानस राष्ट्रीय उद्यान (Manas)असमबाघ, गेंडा और एशियाई हाथियों का प्रमुख जैवमंडल।
पेरियार टाइगर रिजर्व (Periyar)केरलपश्चिमी घाट का प्रसिद्ध हाथी एवं बाघ संरक्षण क्षेत्र।

5. समुदाय और संरक्षण: चिपको, बिश्नोई और संयुक्त वन प्रबंधन (JFM)

5.1 सामुदायिक संरक्षण की समृद्ध भारतीय परंपरा

भारत में संरक्षण केवल सरकारी संस्थाओं का काम नहीं है; स्थानीय समुदायों ने सदियों से जंगलों को अपना घर माना है और उनकी रक्षा की है:

1. सरिस्का एवं भैरोंदेव डाकव 'सोंचुरी'

राजस्थान के सरिस्का टाइगर रिजर्व में ग्रामीणों ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का हवाला देकर खनन के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी और खनन बंद करवाया। अलवर जिले के 5 गांवों के लोगों ने 1,200 हेक्टेयर वन भूमि को 'भैरोंदेव डाकव सोंचुरी' घोषित किया और अपने स्वयं के नियम बनाए—जहाँ शिकार पूरी तरह वर्जित है।

2. चिपको आंदोलन और बीज बचाओ

उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में प्रसिद्ध चिपको आंदोलन (Chipko Movement) ने न केवल वनों की कटाई को सफलतापूर्वक रोका बल्कि यह दिखाया कि स्थानीय प्रजातियों के वृक्षारोपण से सामुदायिक वनीकरण सफल हो सकता है। टिहरी में 'बीज बचाओ आंदोलन' और 'नवदान्य' ने बिना रासायनिक खादों के पारंपरिक बीजों से सफल जैविक खेती कर दिखाई।

3. पवित्र उपवन (Sacred Groves / देवराहा)

प्रकृति की पूजा सदियों पुरानी जनजातीय परंपरा है। छोटानागपुर क्षेत्र में मुंडा और संथाल जनजातियाँ महुआ और कदंब के पेड़ों की पूजा करती हैं। ओडिशा और बिहार की जनजातियाँ विवाह के समय इमली और आम के पेड़ों की पूजा करती हैं। इन जंगलों को 'देवी-देवताओं का वन' माना जाता है जहाँ कुल्हाड़ी चलाना वर्जित होता है।

4. बिश्नोई समाज की वन्यजीव रक्षा

राजस्थान में बिश्नोई गांवों के आसपास चिंकारा (काला हिरण), नीलगाय और मोरों के झुंड देखे जा सकते हैं जो वहाँ के अभिन्न अंग हैं और कोई भी उन्हें नुकसान नहीं पहुंचा सकता। जीव रक्षा उनके धार्मिक 29 नियमों का हिस्सा है।

5.2 संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management - JFM)

भारत में क्षरित वनों के पुनर्निर्माण और संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी का सबसे सफल उदाहरण संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) है:

  • शुरुआत: औपचारिक रूप से JFM की शुरुआत 1988 में ओडिशा राज्य द्वारा पहला प्रस्ताव पारित करने के साथ हुई।
  • कार्यपद्धति: इसके अंतर्गत ग्राम स्तर पर संस्थाएं बनाई जाती हैं जिनमें ग्रामीण और वन विभाग मिलकर क्षरित वन भूमि की सुरक्षा और प्रबंधन करते हैं।
  • पारस्परिक लाभ: बदले में ग्रामीणों को गैर-इमारती वन उत्पादों (जैसे महुआ, पत्तियां, गोंद, फल) के संग्रहण का अधिकार मिलता है और जब वन तैयार होते हैं, तो इमारती लकड़ी की बिक्री से प्राप्त आय में भी हिस्सा मिलता है।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

8% जैव विविधता
विश्व की कुल 16 लाख ज्ञात प्रजातियों का 8% हिस्सा भारत में विद्यमान।
1952 (एशियाई चीता)
भारत में एशियाई चीते को आधिकारिक रूप से लुप्त (Extinct) घोषित किया गया।
IUCN 6 श्रेणियां
सामान्य, संकटग्रस्त, सुभेद्य, दुर्लभ, स्थानिक और लुप्त जातियाँ।
1972 अधिनियम
भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम; शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध व आवासों को कानूनी सुरक्षा।
1973 प्रोजेक्ट टाइगर
बाघों की घटती संख्या (1,827) को रोकने हेतु शुरू किया गया ऐतिहासिक संरक्षण प्रोजेक्ट।
50% से अधिक वन
आरक्षित वन (Reserved Forests); सर्वाधिक मूल्यवान व सख्त कानूनी प्रतिबंध।
33% वन क्षेत्र
रक्षित वन (Protected Forests); सीमित चराई व वनोपज की अनुमति।
75% स्थाई वन (म.प्र.)
मध्य प्रदेश में देश का सर्वाधिक स्थाई वन क्षेत्र (आरक्षित + रक्षित वन)।
बक्सा टाइगर रिजर्व (प. बंगाल)
डोलोमाइट खनन के कारण हाथियों व वन्यजीवों का आवास गंभीर संकट में।
1988 (ओडिशा)
संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) का पहला आधिकारिक सरकारी संकल्प पारित।
पवित्र उपवन (देवराहा)
जनजातियों द्वारा देवी-देवताओं को समर्पित वन क्षेत्र जहाँ पेड़ों को काटना वर्जित है।
भैरोंदेव डाकव सोंचुरी
अलवर (राजस्थान) के 5 गांवों द्वारा 1,200 हेक्टेयर वन को खुद के नियमों से संरक्षित किया गया।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
अंतरराष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण संघ (IUCN) के अनुसार प्रजातियों का वर्गीकरण किन श्रेणियों में किया गया है? किन्हीं चार श्रेणियों के लक्षण और उदाहरण दीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
IUCN ने पौधों और प्राणियों की प्रजातियों को उनके अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरों के आधार पर छह मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया है:

1. संकटग्रस्त जातियाँ (Endangered Species): ये वे जातियाँ हैं जिनके लुप्त होने का तात्कालिक खतरा है। यदि इनकी संख्या घटाने वाली विषम परिस्थितियाँ जारी रहीं, तो इनका जीवित रहना असंभव हो जाएगा। उदाहरण: काला हिरण, मगरमच्छ, भारतीय जंगली गधा, गैंडा, शेर की पूंछ वाला मकाक बंदर और मणिपुर का संगाई हिरण।
2. सुभेद्य जातियाँ (Vulnerable Species): ये वे जातियाँ हैं जिनकी संख्या में निरंतर गिरावट आ रही है। यदि प्रतिकूल कारकों को नहीं सुधारा गया, तो वे निकट भविष्य में संकटग्रस्त श्रेणी में पहुंच जाएंगी। उदाहरण: नीली भेड़, एशियाई हाथी, और गंगा नदी की डॉल्फिन।
3. स्थानिक जातियाँ (Endemic Species): प्राकृतिक या भौगोलिक सीमाओं द्वारा अलग-थलग पड़े विशिष्ट क्षेत्रों में ही पाई जाने वाली जातियाँ। उदाहरण: अंडमानी टील (जंगली बत्तख), निकोबारी कबूतर, और अरुणाचल का मिथुन।
4. लुप्त जातियाँ (Extinct Species): वे जातियाँ जो अपने सामान्य या संभावित आवास क्षेत्रों में पूरी तरह खोजने पर भी नहीं मिलीं और पृथ्वी से हमेशा के लिए समाप्त हो चुकी हैं। उदाहरण: एशियाई चीता (1952 में भारत में लुप्त घोषित) और गुलाबी सिर वाली बत्तख।
उदाहरण 2
वनों और वन्यजीवों के विनाश के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारणों का विस्तार से विश्लेषण कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भारत में वनों और वन्यजीव संपदा के विनाश के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

1. औपनिवेशिक नीतियां: ब्रिटिश शासनकाल में रेलवे के विस्तार (स्लीपर निर्माण हेतु), जहाजरानी, व्यावसायिक फसलों (चाय, कॉफी, रबड़) के बागानों और एकल वृक्षारोपण (टीक और चीड़) के कारण लाखों हेक्टेयर प्राकृतिक मिश्रित वनों का सफाया किया गया।
2. कृषि भूमि का फैलाव: स्वतंत्रता के बाद बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए वनों को काटा गया। भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार 1951 से 1980 के मध्य 26,200 वर्ग किमी वन भूमि को खेतों में बदल दिया गया। इसके अलावा पूर्वोत्तर में 'झूम खेती' से भी वनों का ह्रास हुआ।
3. बड़ी नदी घाटी परियोजनाएं: बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं के कारण 1951 से अब तक 5,000 वर्ग किमी से अधिक वन जलमग्न हो चुके हैं। उदाहरणार्थ, मध्य प्रदेश में 'नर्मदा सागर परियोजना' से 40,000 हेक्टेयर वन जलमग्न हो गए।
4. खनन गतिविधियां (Mining): खदानों के लिए जंगलों की कटाई ने पारिस्थितिकी तंत्र को भारी क्षति पहुंचाई है। उदाहरणार्थ, पश्चिम बंगाल में 'बक्सा टाइगर रिजर्व' डोलोमाइट खनन के कारण गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो चुका है और इसने हाथियों के प्राकृतिक गलियारों को अवरुद्ध कर दिया है।
5. शिकार और अवैध तस्करी: बाघ की हड्डियों, खाल, हाथी दांत, गैंडे के सींग और कस्तूरी मृग के शिकार ने अनेक वन्यजीवों को विलुप्ति के कगार पर धकेल दिया है।
उदाहरण 3
प्रशासनिक दृष्टि से भारत के वनों का वर्गीकरण किस प्रकार किया गया है? आरक्षित, रक्षित और अवर्गीकृत वनों की तुलना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भारत के वन विभाग ने प्रशासनिक नियंत्रण और सुरक्षा के स्तर के आधार पर वनों को तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया है:

वर्गीकरण का आधारआरक्षित वन (Reserved Forests)रक्षित वन (Protected Forests)अवर्गीकृत वन (Unclassed Forests)
कुल वन क्षेत्र का अनुपात50% से अधिक (सर्वाधिक विस्तृत)।लगभग 33% (एक-तिहाई)।शेष वन व बंजर भूमि (पूर्वोत्तर व गुजरात)।
कानूनी सुरक्षा स्तरसर्वाधिक कठोर व मूल्यवान; यहाँ किसी भी अनाधिकृत व्यक्ति का प्रवेश, शिकार, लकड़ी काटना या चराई कानूनी रूप से पूर्णतः प्रतिबंधित है।मध्यम सुरक्षा; इन वनों को और अधिक विनाश से बचाने हेतु आरक्षित किया गया है।कोई विशेष सरकारी प्रतिबंध नहीं; यह सरकार, समुदाय और निजी व्यक्तियों के संयुक्त नियंत्रण में होते हैं।
स्थानीय लोगों को छूटशून्य (कोई मानवीय गतिविधि अनुमन्य नहीं)।ग्रामीणों को सख्त नियमों के तहत सूखी लकड़ी बीनने व नियंत्रित पशु चराने की अनुमति होती है।समुदायों और ग्रामीणों को परंपरागत उपयोग की पूरी स्वतंत्रता होती है।
प्रमुख राज्यमध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, आंध्र प्रदेश, उत्तराखंड, केरल, प. बंगाल, महाराष्ट्र।बिहार, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान।असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और गुजरात के अधिकांश भाग।
उदाहरण 4
'प्रोजेक्ट टाइगर' (1973) क्या है? इसके उद्देश्यों और भारत के किन्हीं चार प्रमुख टाइगर रिजर्वों का उल्लेख कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
प्रोजेक्ट टाइगर का परिचय व पृष्ठभूमि:
बाघ (Tiger) वन्यजीव संरक्षण और खाद्य श्रृंखला की स्थिरता का सर्वोच्च प्रतीक है। 1973 में जब भारत सरकार ने पाया कि 20वीं सदी के आरंभ में जहां देश में 55,000 बाघ थे, वे घटकर मात्र 1,827 रह गए हैं, तब इस गंभीर संकट से निपटने के लिए अप्रैल 1973 में विश्व प्रसिद्ध 'प्रोजेक्ट टाइगर' की शुरुआत की गई。

मुख्य उद्देश्य:
1. बाघों की तेजी से घटती आबादी को बचाना और उन्हें विलुप्त होने से रोकना।
2. बाघ के प्राकृतिक आवासों (Natural Habitats) को मानवीय अतिक्रमण और खनन से पूरी तरह मुक्त रखना।
3. केवल एक प्रजाति को नहीं, बल्कि उसके पूरे पारिस्थितिक तंत्र (शाकाहारी जीवों, वनों और जल स्रोतों) को संरक्षित करना।

चार प्रमुख टाइगर रिजर्व:
1. जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान (उत्तराखंड): भारत का सबसे पहला और विख्यात राष्ट्रीय उद्यान।
2. सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान (पश्चिम बंगाल): मैंग्रोव डेल्टा में रॉयल बंगाल टाइगर का अद्वितीय आवास।
3. बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान (मध्य प्रदेश): उच्च बाघ घनत्व और समृद्ध वन्य संपदा वाला पार्क।
4. सरिस्का वन्यजीव अभयारण्य (राजस्थान): अरावली की पहाड़ियों में स्थित ऐतिहासिक बाघ आश्रय।
उदाहरण 5
भारत में वन और वन्यजीव संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका का सोदाहरण वर्णन कीजिए। 'संयुक्त वन प्रबंधन' (JFM) क्या है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भारत में प्रकृति संरक्षण केवल सरकारी कानूनों पर निर्भर नहीं है, बल्कि ग्रामीण और जनजातीय समुदायों ने सदियों से जंगलों को पूज्य मानकर उनकी रक्षा की है:

1. चिपको आंदोलन (उत्तराखंड): हिमालय के पर्वतीय अंचल में महिलाओं ने वनों के व्यावसायिक कटान के विरोध में पेड़ों से चिपककर उनकी रक्षा की और यह सिद्ध किया कि सामुदायिक भागीदारी से वनीकरण संभव है।
2. भैरोंदेव डाकव 'सोंचुरी' (राजस्थान): अलवर जिले के पांच गांवों के लोगों ने 1,200 हेक्टेयर वन क्षेत्र को 'भैरोंदेव डाकव सोंचुरी' घोषित किया। उन्होंने अपने कड़े नियम बनाए और शिकार व बाहरी हस्तक्षेप को पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया।
3. बिश्नोई समाज की परंपरा: राजस्थान के बिश्नोई गांवों में काले हिरण (चिंकारा), नीलगाय और मोर समाज के बच्चों की तरह सुरक्षित घूमते हैं। जीव हिंसा उनके धार्मिक नियमों में वर्जित है।
4. पवित्र उपवन (Sacred Groves / देवराहा): छोटानागपुर के मुंडा और संथाल महुआ और कदंब के पेड़ों की तथा ओडिशा के आदिवासी इमली और आम के पेड़ों की पूजा करते हैं। इन पवित्र जंगलों में पेड़ काटना पाप माना जाता है。

संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management - JFM):
JFM क्षरित वनों के प्रबंधन और पुनर्निर्माण में स्थानीय समुदायों को शामिल करने की एक अत्यंत सफल सरकारी योजना है। इसकी औपचारिक शुरुआत 1988 में ओडिशा राज्य से हुई।
इसके तहत ग्राम स्तर पर वन सुरक्षा समितियां बनाई जाती हैं जो वन विभाग के साथ मिलकर वनों की रक्षा करती हैं। इसके बदले ग्रामीणों को गैर-इमारती वनोपज (महुआ, गोंद, पत्ते) और अंत में परिपक्व इमारती लकड़ी से होने वाली आय में निश्चित लाभांश मिलता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

एशियाई चीते (Cheetah) और तेंदुए (Leopard) को एक ही समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

चीता बिल्ली परिवार का दुनिया का सबसे तेज दौड़ने वाला स्तनधारी (112 किमी/घंटा) है जिसकी आंखों के कोने से मुंह तक आंसुओं जैसी लकीरें होती हैं। भारत में एशियाई चीते को 1952 में ही आधिकारिक रूप से लुप्त घोषित कर दिया गया था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत का वर्ष 1972 या 1980 लिख देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 में पारित हुआ था, जबकि 'प्रोजेक्ट टाइगर' 1973 में शुरू किया गया था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

आरक्षित और रक्षित वनों में भ्रम होना (रक्षित वन को अधिक सुरक्षित मानना)।

सही वैज्ञानिक तथ्य

आरक्षित वन (Reserved Forests) सबसे सख्त और मूल्यवान होते हैं जहाँ कोई मानवीय छूट नहीं होती। रक्षित वनों (Protected Forests) में कुछ शर्तों के साथ स्थानीय लोगों को सूखी लकड़ी व चराई की सीमित अनुमति होती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

स्थानिक जातियों (Endemic Species) को पूरे भारत में पाई जाने वाली जातियाँ समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

स्थानिक जातियाँ केवल किसी विशिष्ट और अलग-थलग भौगोलिक क्षेत्र (जैसे अंडमान या निकोबार द्वीप समूह) में ही पाई जाती हैं, जैसे अंडमानी टील या निकोबारी कबूतर।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) को केवल वन विभाग का एकतरफा कार्यक्रम मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

JFM वन विभाग और स्थानीय ग्रामीण समुदायों की औपचारिक साझेदारी है, जिसमें प्रबंधन की जिम्मेदारी और वनोपज का लाभ दोनों पक्षों में साझा होता है।

भारत में वन एवं वन्यजीव संरक्षण ढांचा: IUCN, श्रेणियां एवं सामुदायिक मॉडल

वन एवं वन्यजीव संसाधन: IUCN जातियाँ, प्रशासनिक वन एवं संरक्षण मॉडल1. IUCN प्रजाति वर्गीकरणविलुप्ति के खतरे के आधार पर• सामान्य: साल, चीड़, कृंतक• संकटग्रस्त: काला हिरण, गेंडा,मगरमच्छ, संगाई (मणिपुर हिरण)• सुभेद्य: नीली भेड़, गंगा डॉल्फिन• दुर्लभ: हिमालयी भालू, हॉर्नबिल• स्थानिक: अंडमानी टील, मिथुन• लुप्त (Extinct): एशियाई चीता(1952 भारत में लुप्त घोषित)2. प्रशासनिक वन वर्गीकरणसुरक्षा व प्रबंधन की दृष्टि से• आरक्षित वन (50%+):सर्वाधिक मूल्यवान; कटाई/चराई पूर्ण वर्जित(म.प्र., उत्तराखंड, केरल, प. बंगाल)• रक्षित वन (33% / एक-तिहाई):सीमित चराई व लकड़ी एकत्रण छूट(बिहार, पंजाब, हरियाणा, ओडिशा)• अवर्गीकृत वन:सरकार व निजी समुदाय (पूर्वोत्तर, गुजरात)3. कानून व सामुदायिक संरक्षणजनभागीदारी व सरकारी पहल• 1972 वन्यजीव संरक्षण कानून• 1973 प्रोजेक्ट टाइगर:कॉर्बेट, सुंदरबन, बांधवगढ़, पेरियार• चिपको आंदोलन (उत्तराखंड)• बिश्नोई समाज (हिरण/मोर रक्षा)• पवित्र उपवन (देवराहा / मुंडा, संथाल)• 1988 संयुक्त वन प्रबंधन (JFM):ओडिशा से प्रारंभ; साझा वनोपज लाभबोर्ड परीक्षा के प्रमुख संप्रत्यय (High-Yield Golden Capsule)एशियाई चीता (1952):दुनिया का सबसे तेज धावक; भारत में 1952 में आधिकारिक तौर पर लुप्त घोषित हुआ।आरक्षित वन (Reserved):देश के 50%+ वन; सबसे मूल्यवान; स्थायी इमारती लकड़ी व वन्यजीव आवास संरक्षण।संयुक्त वन प्रबंधन (1988):ओडिशा में शुरुआत; ग्रामीण समुदाय + वन विभाग साझेदारी से वनों की सुरक्षा।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
भारत विश्व के 12 महा-जैव-विविधता वाले देशों में शामिल है जहाँ विश्व की 8% प्रजातियाँ (लगभग 16 लाख) पाई जाती हैं।
मुख्य बिंदु 2
IUCN ने प्रजातियों को 6 श्रेणियों—सामान्य, संकटग्रस्त, सुभेद्य, दुर्लभ, स्थानिक और लुप्त जातियों—में वर्गीकृत किया है।
मुख्य बिंदु 3
एशियाई चीता (112 किमी/घंटा की गति वाला स्तनधारी) 1952 में भारत में आधिकारिक रूप से विलुप्त घोषित कर दिया गया।
मुख्य बिंदु 4
औपनिवेशिक काल में रेलवे विस्तार, व्यावसायिक वानिकी तथा स्वतंत्रता के बाद नदी घाटी परियोजनाओं और खनन (बक्सा टाइगर रिजर्व) ने वनों को भारी क्षति पहुंचाई।
मुख्य बिंदु 5
प्रशासनिक दृष्टि से भारत के वनों को आरक्षित वन (50% से अधिक, सर्वाधिक मूल्यवान), रक्षित वन (33%, सीमित छूट) और अवर्गीकृत वन (पूर्वोत्तर व गुजरात) में बांटा गया है।
मुख्य बिंदु 6
मध्य प्रदेश में देश का सबसे बड़ा स्थाई वन क्षेत्र (लगभग 75%) है।
मुख्य बिंदु 7
1972 में 'भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम' लागू किया गया जिसके तहत शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध और संकटग्रस्त जातियों को संरक्षण दिया गया।
मुख्य बिंदु 8
1973 में बाघों की घटती संख्या (1,827) को बचाने हेतु विश्व प्रसिद्ध 'प्रोजेक्ट टाइगर' शुरू किया गया (कॉर्बेट, सुंदरबन, बांधवगढ़, पेरियार आदि)।
मुख्य बिंदु 9
उत्तराखंड में चिपको आंदोलन, टिहरी का बीज बचाओ आंदोलन और राजस्थान में बिश्नोई समाज ने सामुदायिक स्तर पर वनों व वन्यजीवों की रक्षा की मिसाल कायम की।
मुख्य बिंदु 10
1988 में ओडिशा से शुरू हुआ 'संयुक्त वन प्रबंधन' (JFM) स्थानीय ग्रामीणों और वन विभाग की सफल साझेदारी का आदर्श मॉडल है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
संकटग्रस्त जातियों (Endangered Species) और सुभेद्य जातियों (Vulnerable Species) में क्या अंतर है? प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: संकटग्रस्त जातियाँ वे हैं जिनके लुप्त होने का तात्कालिक खतरा है और यदि विपरीत परिस्थितियाँ जारी रहीं तो वे विलुप्त हो जाएंगी (उदा: काला हिरण, गेंडा)। सुभेद्य जातियाँ वे हैं जिनकी आबादी निरंतर घट रही है और यदि ध्यान न दिया गया तो वे जल्द ही संकटग्रस्त श्रेणी में पहुंच जाएंगी (उदा: नीली भेड़, गंगा नदी की डॉल्फिन)।
2
आरक्षित वन (Reserved Forests) और रक्षित वन (Protected Forests) में क्या बुनियादी अंतर है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: आरक्षित वन देश के कुल वनों के 50% से अधिक हैं और सबसे मूल्यवान हैं जहाँ किसी भी प्रकार की कटाई या पशु चराई पर पूर्ण कानूनी प्रतिबंध होता है। रक्षित वन कुल वन क्षेत्र का एक-तिहाई हैं जहाँ स्थानीय ग्रामीणों को कुछ शर्तों पर सूखी लकड़ी बीनने व सीमित चराई की अनुमति दी जाती है।
3
प्रोजेक्ट टाइगर कब और क्यों शुरू किया गया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: प्रोजेक्ट टाइगर 1973 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य बाघों की तेजी से घटती संख्या (जो 1973 में घटकर मात्र 1,827 रह गई थी) को बचाना और संपूर्ण वन पारिस्थितिक तंत्र को संरक्षित करना था।
4
पवित्र उपवन (Sacred Groves) क्या हैं और वे जैव विविधता के संरक्षण में किस प्रकार सहायक हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पवित्र उपवन (देवराहा) वनों के वे भाग हैं जिन्हें स्थानीय जनजातियाँ अपने देवी-देवताओं का निवास मानकर सदियों से अछूता रखती आई हैं। इन वनों में किसी भी पेड़ को काटना या शिकार करना पूरी तरह वर्जित होता है, जिससे दुर्लभ वनस्पतियाँ और जीव सुरक्षित रहते हैं।
5
संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) कार्यक्रम की क्या कार्यप्रणाली है और इसकी औपचारिक शुरुआत कब और कहाँ हुई?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: JFM की शुरुआत 1988 में ओडिशा राज्य में हुई। इसके अंतर्गत ग्राम स्तर पर वन सुरक्षा समितियां बनाई जाती हैं जो वन विभाग के साथ मिलकर क्षरित वनों की रक्षा करती हैं। बदले में ग्रामीणों को गैर-इमारती वनोपज और लकड़ी की बिक्री से प्राप्त आय में हिस्सा मिलता है।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
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कक्षा 10 Social Science के सभी अध्याय

अध्याय 1: यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय (The Rise of Nationalism in Europe) अध्याय 2: भारत में राष्ट्रवाद (Nationalism in India) अध्याय 3: एक वैश्विक दुनिया का निर्माण (The Making of a Global World) अध्याय 4: औद्योगिकीकरण का युग (The Age of Industrialisation) अध्याय 5: मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया (Print Culture and the Modern World) अध्याय 6: संसाधन एवं विकास (Resources and Development) अध्याय 7: वन एवं वन्यजीव संसाधन (Forest and Wildlife Resources) अध्याय 8: जल संसाधन (Water Resources) अध्याय 9: कृषि (Agriculture) अध्याय 10: खनिज तथा ऊर्जा संसाधन (Minerals and Energy Resources) अध्याय 11: विनिर्माण उद्योग (Manufacturing Industries) अध्याय 12: राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की जीवन रेखाएँ (Lifelines of National Economy) अध्याय 13: विकास (Development) (Development) अध्याय 14: भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक (Sectors of the Indian Economy) अध्याय 15: मुद्रा और साख (Money and Credit) अध्याय 16: वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था (Globalisation and the Indian Economy) अध्याय 17: उपभोक्ता अधिकार (Consumer Rights) अध्याय 18: सत्ता की साझेदारी (Power-sharing) (Power Sharing) अध्याय 19: संघवाद (Federalism) (Federalism) अध्याय 20: लिंग, धर्म और जाति (Gender, Religion and Caste) अध्याय 21: राजनीतिक दल (Political Parties) (Political Parties) अध्याय 22: लोकतंत्र के परिणाम (Outcomes of Democracy)

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