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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा X • Social Science • अध्याय 2
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

भारत में राष्ट्रवाद (Nationalism in India)

भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद का उदय औपनिवेशिक विरोधी आंदोलन (Anti-colonial Movement) के साथ गहरे तौर पर जुड़ा हुआ था। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के उत्पीड़न और साझा शोषण ने विभिन्न वर्गों, जातियों और समुदायों के बीच एक साझा बंधन का निर्माण किया। 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा पर आधारित 'सत्याग्रह' के जन-आंदोलन का नया दर्शन पेश किया। प्रथम विश्व युद्ध से उपजी आर्थिक कठिनाइयों, रॉलेट एक्ट (1919) के काले कानून और जलियांवाला बाग के जघन्य नरसंहार ने देशव्यापी आक्रोश को जन्म दिया, जिसके परिणामस्वरूप गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन को साथ लेकर 1920 में 'असहयोग आंदोलन' (Non-Cooperation Movement) की शुरुआत की। इस अध्याय में हम असहयोग आंदोलन की नगरों, ग्रामीण किसानों (बाबा रामचंद्र), जनजातीय विद्रोही समूहों (अल्लूरी सीताराम राजू) और असम के चाय बागान मजदूरों के बीच फैली विभिन्न धाराओं, चौरी-चौरा की घटना (1922), साइमन कमीशन (1928), 1929 के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' की ऐतिहासिक मांग, 1930 की ऐतिहासिक दांडी नमक यात्रा और सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) का विस्तृत अध्ययन करेंगे। साथ ही, गांधी-इरविन समझौता (1931), पूना पैक्ट (1932), डॉ. बी.आर. अंबेडकर व दलित आंदोलन, मुस्लिम लीग की चिंताएँ, और 'सामूहिक अपनेपन का भाव' गढ़ने वाले सांस्कृतिक प्रतीकों—जैसे भारत माता की छवि (अबनींद्रनाथ टैगोर), 'वंदे मातरम्', राष्ट्रीय ध्वज का विकास, तथा लोककथाओं के पुनरुद्धार का गहन, प्रामाणिक और बोर्ड-उन्मुख विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

क्या मुट्ठी भर नमक ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिला सकता था?

12 मार्च 1930 को 61 वर्षीय महात्मा गांधी अपने 78 विश्वसनीय आश्रमवासियों के साथ साबरमती आश्रम से 240 मील दूर दांडी के समुद्र तट की ओर पैदल चल पड़े। अंग्रेजों ने सोचा कि यह बूढ़ा संत नमक बनाकर उनका क्या बिगाड़ लेगा? लेकिन 6 अप्रैल 1930 को जब गांधीजी ने समुद्र के पानी को उबालकर एक मुट्ठी नमक बनाया, तो यह केवल एक कानून का उल्लंघन नहीं था—बल्कि 30 करोड़ भारतीयों द्वारा ब्रिटिश हुकूमत के एकाधिकार और औपनिवेशिक सत्ता को दी गई खुली चुनौती थी! नमक जैसी बुनियादी चीज ने अमीर-गरीब, हिंदू-मुस्लिम सबको एक साझा मंच पर ला खड़ा किया।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

झारखंड अधिविद्य परिषद् (JAC) एवं CBSE कक्षा 10वीं बोर्ड परीक्षा में 'भारत में राष्ट्रवाद' इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण और सर्वाधिक अंक दिलाने वाला अध्याय है। सत्याग्रह के विचार, रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग कांड, असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों की तुलना, अल्लूरी सीताराम राजू का विद्रोह, पूना पैक्ट और 'सामूहिक अपनेपन का भाव' पर 3 से 5 अंकों के प्रश्न प्रतिवर्ष अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं। साथ ही, भारत के राजनीतिक मानचित्र (Map Work) पर दांडी, चंपारण, खेड़ा, अमृतसर, चौरी-चौरा और नागपुर को दर्शाने वाले प्रश्न 100% निश्चित होते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन और 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की बुनियादी जानकारी।
  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885) और आरंभिक उदारवादी-उग्रवादी धाराओं से परिचय।
  • प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) में ब्रिटेन की भागीदारी और भारत पर उसके आर्थिक-सैन्य प्रभावों की समझ।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • महात्मा गांधी के सत्याग्रह दर्शन (सत्य की शक्ति और अहिंसा का आग्रह) तथा चंपारण, खेड़ा व अहमदाबाद के प्रारंभिक आंदोलनों का विश्लेषण करना।
  • प्रथम विश्व युद्ध के आर्थिक व राजनीतिक प्रभावों तथा रॉलेट एक्ट व जलियांवाला बाग हत्याकांड की पृष्ठभूमि का मूल्यांकन करना।
  • असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारणों, कार्यपद्धति, सामाजिक सहभागिता और सीमाओं में अंतर स्पष्ट करना।
  • अवध के किसान आंदोलन (बाबा रामचंद्र), गुडेम पहाड़ियों के आदिवासी संघर्ष (अल्लूरी सीताराम राजू) और असम के बागान मजदूरों की स्वराज आकांक्षाओं को समझना।
  • पूना पैक्ट (1932) के संदर्भ में गांधीजी और डॉ. अंबेडकर के दृष्टिकोण तथा भारत माता, राष्ट्रीय ध्वज व लोकगीतों द्वारा राष्ट्रवाद के निर्माण का परीक्षण करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. प्रथम विश्व युद्ध, खिलाफत और सत्...
2 2. खिलाफत मुद्दा और असहयोग आंदोलन क...
3 3. सविनय अवज्ञा आंदोलन की ओर: साइमन...
4 4. आंदोलन की सामाजिक सहभागिता, सीमा...
5 5. सामूहिक अपनेपन का भाव (Sense of...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. प्रथम विश्व युद्ध, खिलाफत और सत्याग्रह का विचार

1.1 प्रथम विश्व युद्ध के सामाजिक व आर्थिक प्रभाव (1914–1918)

प्रथम विश्व युद्ध ने भारत में एक नई आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी:

  • रक्षा व्यय में भारी वृद्धि: युद्ध के खर्चों की पूर्ति के लिए ब्रिटिश सरकार ने भारी कर्जे लिए और करों में वृद्धि की। सीमा शुल्क बढ़ा दिया गया और पहली बार आयकर (Income Tax) शुरू किया गया।
  • असहनीय महंगाई: 1913 से 1918 के बीच कीमतें दोगुनी हो गईं, जिससे आम जनता की मुश्किलें अत्यधिक बढ़ गईं।
  • जबरन भर्ती (Forced Recruitment): ग्रामीण इलाकों में ब्रिटिश सेना के लिए युवाओं को जबरन भर्ती किया गया, जिससे देहातों में गहरा आक्रोश फैला।
  • फसलें नष्ट और महामारी (1918-1921): भारत के कई हिस्सों में फसलें खराब हुईं, जिससे भोजन का गंभीर अभाव पैदा हो गया। उसी समय इन्फ्लुएंजा महामारी (Influenza Epidemic) फैल गई। 1921 की जनगणना के अनुसार अकाल और महामारी के कारण 120 से 130 लाख (12-13 मिलियन) लोग काल के गाल में समा गए।

1.2 सत्याग्रह का विचार (The Idea of Satyagraha)

जनवरी 1915 में महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे, जहाँ उन्होंने एक नस्लभेदी शासन के विरुद्ध सत्याग्रह के अभिनव तरीके से सफलतापूर्वक जन-आंदोलन चलाया था।

सत्याग्रह का मूल दर्शन: सत्याग्रह के विचार में सत्य की शक्ति पर आग्रह और सत्य की खोज पर जोर दिया जाता था। गांधीजी के अनुसार, यदि उद्देश्य सच्चा है और संघर्ष अन्याय के खिलाफ है, तो उत्पीड़क से मुकाबला करने के लिए भौतिक बल (शारीरिक हिंसा) की आवश्यकता नहीं है। प्रतिशोध की भावना या आक्रामकता का सहारा लिए बिना, सत्याग्रही केवल अहिंसा के सहारे जीत हासिल कर सकता है। इसके लिए अंतरात्मा को झकझोरना अनिवार्य है।

भारत आगमन के बाद गांधीजी द्वारा संचालित तीन प्रारंभिक सफल सत्याग्रह:

वर्षस्थान / आंदोलनकारणपरिणाम
1917चंपारण (बिहार)तिनकठिया प्रणाली के तहत यूरोपीय बागान मालिकों द्वारा किसानों को नील की अनिवार्य खेती हेतु बाध्य करना।गांधीजी का भारत में पहला सफल सत्याग्रह; जांच आयोग गठित, किसानों को राहत मिली।
1917खेड़ा (गुजरात)फसल खराब होने और प्लेग महामारी के कारण किसान लगान चुकाने में असमर्थ थे और लगान माफी चाहते थे।सरकार ने किसानों से गोपनीय समझौता किया और समर्थ किसानों से ही लगान लेने का आदेश दिया।
1918अहमदाबाद (गुजरात)सूती कपड़ा मिल मजदूरों और मालिकों के बीच प्लेग बोनस की समाप्ति और 35% वेतन वृद्धि का विवाद।गांधीजी की पहली भूख हड़ताल; मिल मालिक मजदूरों को 35% मजदूरी वृद्धि देने पर सहमत हुए।

1.3 रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919)

1919 में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ने भारतीय सदस्यों के भारी विरोध के बावजूद रॉलेट एक्ट (Rowlatt Act) को जल्दबाजी में पारित कर दिया:

  • प्रावधान: इस कानून ने औपनिवेशिक सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने और राजनीतिक कैदियों को बिना मुकदमा चलाए 2 वर्ष तक जेल में बंद रखने का निरंकुश अधिकार दिया। इसे 'बिना वकील, बिना दलील, बिना अपील' का काला कानून कहा गया।
  • रॉलेट सत्याग्रह: 6 अप्रैल 1919 को गांधीजी ने राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया। दुकानों को बंद किया गया, रैलियाँ निकाली गईं।
  • जलियांवाला बाग नरसंहार (13 अप्रैल 1919):
    • अमृतसर में स्थानीय नेता डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल की गिरफ्तारी के विरोध में तथा वार्षिक बैसाखी मेले में भाग लेने के लिए जलियांवाला बाग मैदान में एक विशाल शांतिपूर्ण जनसमूह इकट्ठा हुआ था।
    • शहर में मार्शल लॉ लागू था जिसकी जानकारी बाहर से आए ग्रामीणों को नहीं थी।
    • जनरल डायर (General Dyer) हथियारबंद सैनिकों के साथ बाग में दाखिल हुआ, एकमात्र संकरे निकास द्वार को बंद किया और निहत्थी भीड़ पर बिना चेतावनी गोलियां चलवा दीं। सैकड़ों मासूम मारे गए और हजारों घायल हुए।
    • डायर का घोषित उद्देश्य भारतीयों के मन में 'दहशत और विस्मय' (Terror and Awe) का भाव पैदा करना था।
    • रवींद्रनाथ टैगोर ने इस अमानवीय कृत्य के विरोध में अपनी ब्रिटिश पदवी 'नाइटहुड' (Knighthood) त्याग दी। गांधीजी ने हिंसा फैलते देख रॉलेट सत्याग्रह वापस ले लिया।

2. खिलाफत मुद्दा और असहयोग आंदोलन का प्रसार

2.1 खिलाफत का मुद्दा और हिंदू-मुस्लिम एकता

प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की (ऑटोमन साम्राज्य) की पराजय हो चुकी थी। इस बात की अफवाह थी कि ऑटोमन सम्राट, जो इस्लामिक जगत का आध्यात्मिक प्रमुख—खलीफा (Caliph) था, पर एक अपमानजनक संधि थोपी जाएगी।

  • खलीफा की तत्कालीन शक्तियों की रक्षा के लिए मार्च 1919 में बंबई में खिलाफत समिति (Khilafat Committee) का गठन किया गया।
  • दो युवा भाइयों—मुहम्मद अली और शौकत अली (अली बंधु) ने इस मुद्दे पर संयुक्त जन-आंदोलन के लिए गांधीजी से चर्चा की।
  • गांधीजी ने इसे हिंदुओं और मुसलमानों को एक साझा राष्ट्रीय आंदोलन के मंच पर लाने का स्वर्णिम अवसर समझा।
  • सितंबर 1920 (कलकत्ता अधिवेशन): कांग्रेस ने खिलाफत और पंजाब के अन्यायों के विरोध तथा 'स्वराज' की मांग हेतु असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया।
  • दिसंबर 1920 (नागपुर अधिवेशन): असहयोग कार्यक्रम पर अंतिम मुहर लगी और इसे विधिवत स्वीकार किया गया।

2.2 आंदोलन के विभिन्न चरण और कार्यपद्धति

गांधीजी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'हिंद स्वराज' (1909) में लिखा था कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही स्थापित हुआ था और यह केवल इसी सहयोग के कारण चल रहा है। यदि भारतीय अपना सहयोग वापस ले लें, तो ब्रिटिश राज साल भर में ढह जाएगा और स्वराज की स्थापना हो जाएगी।

असहयोग आंदोलन चरणबद्ध तरीके से चलना था:

  1. पदवियों और उपाधियों का त्याग: सरकार द्वारा दी गई मानद उपाधियों को लौटाना (गांधीजी ने 'कैसर-ए-हिंद' पदक लौटाया)।
  2. बहिष्कार (Boycott): सरकारी स्कूलों, कॉलेजों, अदालतों, विधायी परिषदों (Councils) और विदेशी वस्तुओं का पूर्ण बहिष्कार।
  3. सविनय अवज्ञा: यदि सरकार दमन का रास्ता अपनाती है, तो पूर्ण सविनय अवज्ञा (कर न देना) आंदोलन शुरू करना।

2.3 आंदोलन के भीतर अलग-अलग धाराएँ (Differing Strands within the Movement)

समाज के विभिन्न समूहों ने 'स्वराज' का अर्थ अपने-अपने संदर्भ और कष्टों के आधार पर निकाला:

सामाजिक समूहआंदोलन का स्वरूपप्रमुख नेता / प्रतीकविशिष्ट मांग / परिणाम
शहरी मध्यम वर्गछात्रों ने स्कूल छोड़े, वकीलों ने अदालतें छोड़ीं; विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई। विदेशी कपड़ों का आयात 1921-22 में 102 करोड़ से घटकर 57 करोड़ रु. रह गया।शिक्षक, वकील, व्यापारी।खादी कपड़ा मिलों के कपड़े से महंगा था, और वैकल्पिक भारतीय शैक्षणिक संस्थानों का अभाव था; अतः धीरे-धीरे लोग वापस लौटने लगे।
अवध के किसान (ग्रामीण क्षेत्र)तालुकदारों और जमींदारों के खिलाफ आंदोलन जो अत्यधिक लगान और 'बेगार' (बिना मजदूरी श्रम) कराते थे। नाई-धोबी बंद संगठित किए गए।बाबा रामचंद्र (संन्यासी, जो फिजी में गिरमिटिया मजदूर रह चुके थे) और जवाहरलाल नेहरू।अक्टूबर 1920 में 'अवध किसान सभा' की स्थापना; घरों पर हमले, अनाज के गोदाम लूटे गए।
आंध्र की गुडेम पहाड़ियों के आदिवासीऔपनिवेशिक वन कानूनों के खिलाफ उग्र गुरिल्ला युद्ध (Guerrilla Movement) क्योंकि सरकार ने मवेशी चराने और लकड़ी बीनने पर रोक लगा दी थी तथा सड़क निर्माण हेतु बेगार मांगी थी।अल्लूरी सीताराम राजू (दावा करते थे कि उनके पास चमत्कारी शक्तियां हैं और गोलियां भी उन्हें नहीं मार सकतीं)।राजू गांधीजी के प्रशंसक थे और खादी पहनने व शराब छोड़ने की सीख देते थे, परंतु उनका मानना था कि भारत अहिंसा से नहीं बल्कि केवल बल प्रयोग से आजाद हो सकता है। 1924 में राजू पकड़े गए और फांसी दे दी गई।
असम के बागान मजदूरइनलैंड इमिग्रेशन एक्ट 1859 (Inland Emigration Act of 1859) के तहत चाय बागानों के मजदूरों को बिना अनुमति बागान छोड़ने की छूट नहीं थी। उनके लिए स्वराज का अर्थ था अपने गांवों से संपर्क बनाए रखने की आजादी।हजारों मजदूरों ने अधिकारियों के आदेशों की अवहेलना की और घर की ओर चल पड़े।रेलवे और स्टीमर हड़ताल के कारण वे रास्ते में फंस गए और पुलिस द्वारा बेरहमी से पीटे गए।

2.4 चौरी-चौरा कांड और आंदोलन की वापसी (फरवरी 1922)

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा में 4 फरवरी 1922 को बाजार से गुजर रहा एक शांतिपूर्ण जुलूस पुलिस के साथ हिंसक टकराव में बदल गया। पुलिस ने भीड़ पर गोली चलाई, जिसके जवाब में आक्रोशित किसानों ने थाने को आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी जिंदा जल गए।

आंदोलन की वापसी: इस हिंसा से दुखी होकर महात्मा गांधी ने 12 फरवरी 1922 को असहयोग आंदोलन तत्काल वापस ले लिया। गांधीजी का मानना था कि आंदोलनकारियों को व्यापक जन-आंदोलन के लिए अहिंसा का समुचित प्रशिक्षण देना अभी बाकी है।

3. सविनय अवज्ञा आंदोलन की ओर: साइमन कमीशन और दांडी यात्रा

3.1 स्वराज पार्टी का गठन और आंतरिक बहस

असहयोग आंदोलन की वापसी के बाद कांग्रेस में दो मुख्य विचारधाराएँ उभरीं:

  • स्वराज पार्टी (जनवरी 1923): चित्तरंजन दास (सी.आर. दास) और मोतीलाल नेहरू ने प्रांतीय परिषदों के चुनावों में भाग लेकर 'अंदर से' ब्रिटिश नीतियों का विरोध करने के लिए स्वराज पार्टी बनाई।
  • युवा क्रांतिकारी नेता: जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा नेताओं ने अधिक उग्र जन-आंदोलन और 'पूर्ण स्वतंत्रता' (पूर्ण स्वराज) के लिए दबाव बनाया।

3.2 साइमन कमीशन का आगमन (1928)

ब्रिटेन की टोरी सरकार ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक वैधानिक आयोग (Statutory Commission) का गठन किया जिसका कार्य भारत में संवैधानिक व्यवस्था की समीक्षा करना और सुधारों का सुझाव देना था:

  • विरोध का मुख्य कारण: इस सात-सदस्यीय आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था; सभी सदस्य अंग्रेज थे।
  • 'साइमन वापस जाओ' (Simon Go Back): फरवरी 1928 में जब आयोग भारत पहुंचा, तो काले झंडों, हड़तालों और नारों के साथ उसका व्यापक विरोध हुआ।
  • लाहौर में विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करते हुए लाला लाजपत राय पर ब्रिटिश पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनका निधन हो गया।

3.3 लाहौर कांग्रेस अधिवेशन (1929): पूर्ण स्वराज का संकल्प

दिसंबर 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन संपन्न हुआ:

  • पूर्ण स्वराज का संकल्प: कांग्रेस ने औपनिवेशिक स्वशासन (डोमिनियन स्टेटस) को खारिज कर 'पूर्ण स्वराज' (संपूर्ण स्वतंत्रता) को अपना आधिकारिक लक्ष्य घोषित किया।
  • 26 जनवरी 1930: इस दिन को पूरे देश में प्रथम 'स्वतंत्रता दिवस' के रूप में मनाने का निश्चय किया गया, जहाँ लोगों ने आजादी के संघर्ष की शपथ ली।

3.4 नमक यात्रा (Salt March) और सविनय अवज्ञा की शुरुआत (1930)

महात्मा गांधी ने 31 जनवरी 1930 को वायसराय लॉर्ड इरविन को एक पत्र भेजा जिसमें 11 मांगें शामिल थीं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण मांग नमक कर (Salt Tax) को समाप्त करना थी। नमक अमीर और गरीब सभी के भोजन का अपरिहार्य हिस्सा था, और उस पर कर लगाना ब्रिटिश शासन का सबसे दमनकारी चेहरा था।

  • इरविन ने इन मांगों पर ध्यान नहीं दिया, जिसके बाद गांधीजी ने प्रसिद्ध नमक सत्याग्रह शुरू किया।
  • यात्रा का विवरण: 12 मार्च 1930 को गांधीजी 78 आश्रमवासियों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी (गुजरात तट) के लिए रवाना हुए। कुल दूरी 240 मील (लगभग 385 किमी) थी, जिसे 24 दिनों में प्रतिदिन 10 मील चलकर पूरा किया गया।
  • 6 अप्रैल 1930: गांधीजी दांडी पहुंचे और समुद्र के पानी को उबालकर प्रतीकात्मक रूप से नमक बनाकर सरकारी कानून तोड़ा। यहीं से सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) का औपचारिक शुभारंभ हुआ।
असहयोग और सविनय अवज्ञा में मूलभूत अंतर: असहयोग आंदोलन में जनता से केवल 'ब्रिटिश सरकार का सहयोग न करने' का आह्वान किया गया था, जबकि सविनय अवज्ञा आंदोलन में जनता से न केवल असहयोग करने बल्कि 'औपनिवेशिक कानूनों को शांतिपूर्वक तोड़ने' का स्पष्ट आह्वान किया गया। जैसे नमक कानून तोड़ना, वन कानूनों का उल्लंघन करना, और चौकीदारी कर देने से मना करना।

4. आंदोलन की सामाजिक सहभागिता, सीमाएँ एवं पूना पैक्ट

4.1 विभिन्न सामाजिक वर्गों की भागीदारी

सविनय अवज्ञा आंदोलन में विभिन्न वर्गों ने किन कारणों से भाग लिया:

  • संपन्न किसान (गुजरात के पाटीदार और यूपी के जाट): मंदी और गिरती कीमतों के कारण वे लगान चुकाने में असमर्थ थे। उनके लिए स्वराज का अर्थ लगान में भारी कमी था।
  • गरीब किसान: वे जमींदारों से ली गई जमीन पर खेती करते थे। वे चाहते थे कि बकाया किराया माफ किया जाए (किराया-विरोधी अभियान)। परंतु कांग्रेस बड़े जमींदारों को नाराज न करने के डर से इन अभियानों को पूरा समर्थन देने से हिचकती रही।
  • व्यवसायी वर्ग: प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारी मुनाफा कमाने वाले भारतीय उद्योगपति (जैसे पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास और जी.डी. बिड़ला) विदेशी वस्तुओं के आयात से सुरक्षा और रुपिया-स्टर्लिंग विनिमय अनुपात में बदलाव चाहते थे। उन्होंने 1927 में भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (FICCI) का गठन किया और आंदोलन को वित्तीय सहायता दी।
  • औद्योगिक मजदूर वर्ग: छोटानागपुर के टिन खदान मजदूरों और रेलवे कर्मचारियों को छोड़कर बड़े पैमाने पर मजदूरों ने भाग नहीं लिया, क्योंकि उद्योगपति कांग्रेस के नजदीक थे।
  • महिलाएँ: आंदोलन में महिलाओं ने ऐतिहासिक रूप से बड़े पैमाने पर भाग लिया। हजारों महिलाओं ने नमक बनाया, विदेशी कपड़ों और शराब की दुकानों की पिकेटिंग की तथा जेल गईं।

4.2 गांधी-इरविन समझौता और दूसरा गोलमेज सम्मेलन (1931)

  • ब्रिटिश सरकार के क्रूर दमन (अब्दुल गफ्फार खान और गांधीजी की गिरफ्तारी) के बाद 5 मार्च 1931 को गांधी-इरविन समझौता (Gandhi-Irwin Pact) हुआ।
  • गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित करने और लंदन में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (Second Round Table Conference) में भाग लेने की सहमति दी। बदले में सरकार ने राजनीतिक कैदियों को रिहा करने का वचन दिया।
  • दिसंबर 1931 में लंदन वार्ता असफल रही (ब्रिटिश सरकार अल्पसंख्यकों के पृथक निर्वाचक मंडल पर अड़ी रही), और गांधीजी निराश लौट आए। भारत लौटकर उन्होंने आंदोलन फिर शुरू किया, परंतु 1934 तक इसने अपनी गति खो दी।

4.3 सविनय अवज्ञा की सीमाएँ और पूना पैक्ट (1932)

सभी सामाजिक समूह स्वराज की अमूर्त अवधारणा से प्रभावित नहीं थे:

  • दलितों (अछूतों) की भागीदारी:
    • कांग्रेस लंबे समय तक सनातनी रूढ़िवादी उच्च जातियों को नाराज न करने के भय से दलितों के मुद्दों से बचती रही। गांधीजी ने उन्हें 'हरिजन' (ईश्वर की संतान) कहा और छुआछूत मिटाने के लिए शौचालयों की सफाई तक की।
    • दलित नेता अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए संगठित हुए। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने 1930 में 'दमित वर्ग एसोसिएशन' (Depressed Classes Association) की स्थापना की।
    • दूसरे गोलमेज सम्मेलन में अंबेडकर ने दलितों के लिए 'पृथक निर्वाचक मंडल' (Separate Electorates) की मांग की, जिसे ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने स्वीकार कर लिया (कम्युनल अवार्ड)।
    • गांधीजी का मानना था कि पृथक निर्वाचक मंडल से हिंदू समाज का विघटन हो जाएगा; अतः वे यरवदा जेल (पुणे) में आमरण अनशन पर बैठ गए।
    • पूना पैक्ट (सितंबर 1932): अंबेडकर ने गांधीजी की बात मानी। समझौते के तहत दलित वर्गों (बाद में अनुसूचित जाति) को प्रांतीय और केंद्रीय विधान परिषदों में आरक्षित सीटें दी गईं, परंतु उनका मतदान सामान्य निर्वाचन क्षेत्र में ही होना तय हुआ।
  • मुस्लिम संगठनों की उपेक्षा: असहयोग-खिलाफत आंदोलन के बिखरने के बाद मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग कांग्रेस से अलग-थलग महसूस करने लगा। मुहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम बहुल प्रांतों (बंगाल और पंजाब) में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग की, परंतु 1928 में एम.आर. जयकर (हिंदू महासभा) के कड़े विरोध के बाद समझौता वार्ता टूट गई।

5. सामूहिक अपनेपन का भाव (Sense of Collective Belonging)

5.1 सांस्कृतिक प्रक्रियाओं द्वारा राष्ट्र का निर्माण

राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक या आर्थिक संघर्षों से ही नहीं पनपता। इतिहास और साहित्य, लोककथाएँ और गीत, चित्र और प्रतीक—इन सभी ने राष्ट्रवाद को साकार करने में विशिष्ट योगदान दिया:

1. भारत माता की छवि

राष्ट्र की पहचान को सबसे अधिक किसी आकृति या रूपक में ढाला जाता है। 1870 के दशक में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने मातृभूमि की स्तुति के रूप में 'वंदे मातरम्' गीत लिखा, जिसे बाद में उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल किया गया। 1905 में अबनींद्रनाथ टैगोर ने भारत माता की पहली विख्यात पेंटिंग बनाई जिसमें उन्हें एक संन्यासिनी के रूप में शांत, गंभीर, दैवीय और आध्यात्मिक दिखाया गया।

2. लोक साहित्य और लोककथाओं का पुनर्जीवन

राष्ट्रवादियों ने लोकगीतों और जनश्रुतियों को दर्ज करना शुरू किया। उनका मानना था कि ये पारंपरिक संस्कृति की सच्ची तस्वीर पेश करते हैं जो विदेशी प्रभाव से दूषित नहीं हुई। रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वयं बंगाल में लोक-गाथागीत (Ballads) और नर्सरी राइम्स एकत्र कीं। मद्रास में नटेसा शास्त्री ने चार खंडों में तमिल लोककथाओं का विशाल संकलन 'द फोकलोर ऑफ सदर्न इंडिया' (The Folklore of Southern India) प्रकाशित किया।

3. राष्ट्रीय ध्वज का विकास

बंगाल में स्वदेशी आंदोलन के दौरान तिरंगा झंडा (लाल, हरा, पीला) तैयार किया गया, जिसमें ब्रिटिश भारत के 8 प्रांतों का प्रतिनिधित्व करने वाले 8 कमल और हिंदुओं-मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक अर्धचंद्र शामिल था। 1921 तक गांधीजी ने स्वराज का तिरंगा (सफेद, हरा, लाल) तैयार किया जिसके केंद्र में स्वावलंबन का प्रतीक 'चरखा' रखा गया।

4. इतिहास की पुनर्व्याख्या

अंग्रेज भारतीयों को पिछड़ा, असभ्य और स्वशासन के अयोग्य मानते थे। इसके जवाब में भारतीय इतिहासकारों ने भारत के गौरवशाली प्राचीन अतीत—कला, वास्तुकला, विज्ञान, गणित और दर्शन की उपलब्धियों की खोज की और लोगों को अपने इतिहास पर गर्व करने तथा ब्रिटिश गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने के लिए प्रेरित किया।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

जनवरी 1915
महात्मा गांधी का दक्षिण अफ्रीका से भारत आगमन।
1917 - 1918
गांधीजी के आरंभिक सत्याग्रह: चंपारण (नील), खेड़ा (लगान), अहमदाबाद (मिल मजदूर 35%)।
मार्च 1919
रॉलेट एक्ट पारित; मुंबई में खिलाफत समिति का गठन।
13 अप्रैल 1919
जलियांवाला बाग नरसंहार (अमृतसर), जनरल डायर द्वारा गोलीबारी।
दिसंबर 1920
नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में असहयोग आंदोलन कार्यक्रम पर अंतिम स्वीकृति।
4 फरवरी 1922
चौरी-चौरा कांड (गोरखपुर); 12 फरवरी को असहयोग आंदोलन वापस लिया गया।
फरवरी 1928
साइमन कमीशन भारत पहुंचा; 'साइमन वापस जाओ' (Simon Go Back) के नारे।
दिसंबर 1929
लाहौर कांग्रेस अधिवेशन (अध्यक्ष: जवाहरलाल नेहरू); 'पूर्ण स्वराज' का प्रस्ताव पारित।
12 मार्च - 6 अप्रैल 1930
दांडी नमक यात्रा (240 मील, 78 अनुयायी); सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ।
5 मार्च 1931
गांधी-इरविन समझौता; सविनय अवज्ञा स्थगित, गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने की सहमति।
सितंबर 1932
पूना पैक्ट (गांधीजी व डॉ. अंबेडकर); दलितों को संयुक्त निर्वाचन में आरक्षित सीटें।
1859 इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट
चाय बागान मजदूरों को बिना अनुमति बागान छोड़ने पर कानूनी रोक।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
सत्याग्रह के विचार से आप क्या समझते हैं? गांधीजी द्वारा भारत में किए गए किन्हीं दो प्रारंभिक सत्याग्रह आंदोलनों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
सत्याग्रह का अर्थ ও दर्शन:
सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ है 'सत्य के प्रति आग्रह'। महात्मा गांधी के अनुसार यह केवल निष्क्रिय प्रतिरोध (Passive Resistance) या दुर्बलों का हथियार नहीं, बल्कि शुद्ध आत्मिक और नैतिक बल है। इसके मुख्य सिद्धांत निम्नलिखित हैं:
1. यदि संघर्ष का उद्देश्य सच्चा है और अन्याय के विरुद्ध है, तो उत्पीड़क से लड़ने के लिए भौतिक बल अथवा हिंसा की आवश्यकता नहीं होती।
2. सत्याग्रही प्रतिशोध या घृणा की भावना रखे बिना केवल अहिंसा के माध्यम से विरोधी की अंतरात्मा को सत्य स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता है।

भारत में दो प्रारंभिक सफल सत्याग्रह:
1. चंपारण सत्याग्रह (1917, बिहार): यूरोपीय बागान मालिक किसानों को अपनी 3/20 भाग भूमि पर जबरन नील की खेती (तिनकठिया प्रणाली) करने के लिए बाध्य कर रहे थे। गांधीजी ने वहाँ पहुंचकर किसानों को एकजुट किया और सरकार को बाध्य कर दमनकारी प्रणाली को समाप्त करवाया।
2. खेड़ा सत्याग्रह (1917, गुजरात): फसल बर्बाद हो जाने और प्लेग महामारी के कारण किसान लगान देने की स्थिति में नहीं थे। गांधीजी और सरदार पटेल के नेतृत्व में किसानों ने लगान देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद सरकार ने लगान वसूली में राहत प्रदान की।
उदाहरण 2
असहयोग आंदोलन आरंभ करने के क्या कारण थे? गांधीजी ने इसे 1922 में वापस क्यों ले लिया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
असहयोग आंदोलन शुरू करने के प्रमुख कारण:
1. प्रथम विश्व युद्ध का असंतोष: युद्ध के दौरान भारी टैक्स, महंगाई और जबरन सेना में भर्ती से ग्रामीण और शहरी जनता त्रस्त थी।
2. रॉलेट एक्ट (1919): भारतीयों के भारी विरोध के बावजूद पारित इस काले कानून ने बिना किसी मुकदमे के 2 साल तक जेल में बंद रखने की शक्ति पुलिस को दी।
3. जलियांवाला बाग नरसंहार (13 अप्रैल 1919): जनरल डायर द्वारा अमृतसर में निहत्थी सभा पर गोलियां बरसाकर सैकड़ों मासूमों की हत्या ने पूरे देश में ब्रिटिश शासन के प्रति गहरा आक्रोश पैदा कर दिया।
4. खिलाफत का प्रश्न: ऑटोमन साम्राज्य के विघटन और खलीफा के अपमान से भारतीय मुसलमान क्षुब्ध थे। गांधीजी ने हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करने हेतु खिलाफत का समर्थन किया।

आंदोलन वापस लेने का कारण:
4 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस द्वारा बल प्रयोग किए जाने पर भीड़ अनियंत्रित हो गई और उसने पुलिस थाने को आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी जिंदा जल गए।
गांधीजी अहिंसा के सिद्धांत के प्रति पूर्णतः समर्पित थे। उन्होंने महसूस किया कि आंदोलन कई स्थानों पर हिंसक रूप ले रहा है और सत्याग्रहियों को अहिंसक संघर्ष का पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिला है। अतः 12 फरवरी 1922 को उन्होंने आंदोलन स्थगित करने की घोषणा की।
उदाहरण 3
असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन के बीच प्रमुख अंतरों की तुलना कीजिए। (तालिका रूप में)
विस्तृत समाधान / उत्तर:
असहयोग आंदोलन (1920-22) और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दो महत्वपूर्ण मील के पत्थर थे। इनके बीच मुख्य अंतर निम्न प्रकार हैं:

तुलना का आधारअसहयोग आंदोलन (1920-1922)सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-1934)
मूल उद्देश्यस्वराज की प्राप्ति तथा पंजाब व खिलाफत के अन्यायों का परिमार्जन।'पूर्ण स्वराज' (संपूर्ण स्वतंत्रता) की प्राप्ति।
कार्यपद्धति की प्रकृतिकेवल ब्रिटिश शासन के साथ 'असहयोग' करना (उपाधियाँ लौटाना, विदेशी वस्तुओं व संस्थाओं का बहिष्कार)।असहयोग के साथ-साथ 'औपनिवेशिक कानूनों का सक्रिय और शांतिपूर्ण उल्लंघन' (नमक कानून, वन कानून तोड़ना)।
मुस्लिम सहभागिताखिलाफत मुद्दे के कारण मुसलमानों की व्यापक और ऐतिहासिक भागीदारी रही।मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच अविश्वास के कारण मुस्लिम भागीदारी अपेक्षाकृत काफी कम रही।
महिलाओं की भूमिकामहिलाओं की भागीदारी सीमित थी, वे मुख्यतः चरखा कातने तक केंद्रित थीं।महिलाओं ने अभूतपूर्व पैमाने पर जुलूस निकाले, नमक बनाया और जेल यात्रा की।
शुरुआत का प्रतीककलकत्ता व नागपुर कांग्रेस अधिवेशनों के प्रस्तावों से।गांधीजी की ऐतिहासिक दांडी नमक यात्रा (6 अप्रैल 1930) से।
उदाहरण 4
अल्लूरी सीताराम राजू कौन थे? गुडेम पहाड़ियों में उनके नेतृत्व में चले आदिवासी आंदोलन का स्वरूप क्या था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
अल्लूरी सीताराम राजू और गुडेम पहाड़ी विद्रोह:
1. पृष्ठभूमि: आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों में 1920 के दशक की शुरुआत में एक उग्र गुरिल्ला आंदोलन फैला। औपनिवेशिक सरकार ने आदिवासियों के जंगलों में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिससे वे न तो अपने मवेशी चरा सकते थे और न ही ईंधन की लकड़ी बीन सकते थे। साथ ही, सड़क निर्माण के लिए सरकार उन्हें 'बेगार' करने को मजबूर कर रही थी।
2. राजू का व्यक्तित्व: अल्लूरी सीताराम राजू इस आंदोलन के करिश्माई नेता बने। वे दावा करते थे कि उनके पास चमत्कारी शक्तियां हैं—वे सटीक खगोलीय गणना कर सकते हैं, लोगों को चंगा कर सकते हैं और गोलियां भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं। आदिवासियों ने उन्हें भगवान का अवतार मान लिया।
3. गांधीजी का प्रभाव और हिंसा का रास्ता: राजू महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से अत्यधिक प्रेरित थे। उन्होंने आदिवासियों को खादी पहनने और मदिरापान छोड़ने के लिए प्रेरित किया। परंतु गांधीजी के विपरीत, उनका दृढ़ विश्वास था कि भारत केवल 'सशस्त्र बल प्रयोग' (Use of Force) से ही आजाद हो सकता है, अहिंसा से नहीं।
4. विद्रोह की गतिविधियाँ व अंत: गुडेम विद्रोहियों ने पुलिस थानों पर हमले किए, ब्रिटिश अधिकारियों को निशाना बनाया और गुरिल्ला युद्ध जारी रखा। अंततः 1924 में राजू को अंग्रेजों ने पकड़ लिया और उन्हें फांसी दे दी गई। वे लोकनायकों (Folk Heroes) के रूप में अमर हो गए।
उदाहरण 5
भारत में राष्ट्रवाद की भावना पनपने में 'सामूहिक अपनेपन के भाव' का क्या योगदान था? विभिन्न प्रतीकों और सांस्कृतिक प्रक्रियाओं के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भारत में राष्ट्रवाद की भावना केवल राजनीतिक आंदोलनों से ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक प्रक्रियाओं के संगम से विकसित हुई, जिसने भारतीयों के दिलों में सामूहिक अपनेपन का भाव पैदा किया:
1. भारत माता की छवि: राष्ट्र की पहचान को एक मानवीय रूप दिया गया। 1870 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 'वंदे मातरम्' लिखा। 1905 में अबनींद्रनाथ टैगोर ने भारत माता को एक दैवीय, शांत और संन्यासिनी रूप में चित्रित किया। भारत माता के प्रति श्रद्धा राष्ट्रवाद का साक्ष्य मानी जाने लगी।
2. राष्ट्रीय प्रतीकों और झंडों का विकास: बंगाल में स्वदेशी आंदोलन के दौरान 8 कमलों (8 ब्रिटिश प्रांत) और अर्धचंद्र युक्त तिरंगा तैयार हुआ। 1921 में गांधीजी ने स्वराज का तिरंगा बनाया जिसके मध्य में स्वावलंबन का प्रतीक 'चरखा' था। जुलूसों में झंडा थामना औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ अवज्ञा का खुला प्रतीक था।
3. लोक साहित्य और जनश्रुतियों का पुनरुद्धार: राष्ट्रवादियों ने यह माना कि विदेशी शासकों द्वारा हमारी संस्कृति को विकृत किया गया है। रवींद्रनाथ टैगोर ने लोकगीतों व गाथाओं को संकलित किया। दक्षिण भारत में नटेसा शास्त्री ने तमिल लोककथाओं का संग्रह 'द फोकलोर ऑफ सदर्न इंडिया' प्रकाशित कर इसे राष्ट्रीय साहित्य बताया।
4. इतिहास की पुनर्व्याख्या: अंग्रेजों द्वारा भारतीयों को हीन और स्वशासन के अयोग्य ठहराए जाने के विरुद्ध भारतीय इतिहासकारों ने प्राचीन काल के विज्ञान, खगोल, कला, साहित्य और दर्शन की गौरवशाली गाथा को उजागर कर देशवासियों में खोया हुआ आत्मसम्मान पुनः जगाया।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि गांधीजी ने भारत आकर पहला सत्याग्रह 1919 में रॉलेट एक्ट के खिलाफ किया था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

गांधीजी का भारत में पहला सत्याग्रह 1917 में बिहार के चंपारण में नील किसानों के पक्ष में था। रॉलेट सत्याग्रह (1919) उनका पहला 'राष्ट्रव्यापी' (All-India) आंदोलन था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन को एक ही समझना अथवा उनके वर्षों में भ्रम (असहयोग को 1930 लिख देना)।

सही वैज्ञानिक तथ्य

असहयोग आंदोलन 1920 से 1922 तक चला (लक्ष्य: सहयोग न करना), जबकि सविनय अवज्ञा आंदोलन 1930 से 1934 तक चला (लक्ष्य: कानूनों का सविनय उल्लंघन करना)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

पूना पैक्ट को गांधीजी और अंग्रेजों के बीच हुआ समझौता समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पूना पैक्ट (सितंबर 1932) महात्मा गांधी और डॉ. बी.आर. अंबेडकर के मध्य हुआ था, जिसमें दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की जगह सामान्य निर्वाचन में सीटें आरक्षित की गईं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

अल्लूरी सीताराम राजू को अहिंसावादी गांधीवादी सत्याग्रही मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

राजू गांधीजी के खादी और मदिरा-त्याग के विचारों के प्रशंसक थे, परंतु वे अहिंसा में विश्वास नहीं करते थे; उनका विश्वास सशस्त्र गुरिल्ला युद्ध में था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

जलियांवाला बाग हत्याकांड के समय वायसराय या जनरल के नाम में जनरल डायर और माइकल ओ'डायर को लेकर भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

जलियांवाला बाग में निहत्थी भीड़ पर गोलियां चलाने का प्रत्यक्ष आदेश सैन्य कमांडर ब्रिगेडियर-जनरल आर.ई.एच. डायर (General Dyer) ने दिया था।

भारत में राष्ट्रवाद का ऐतिहासिक प्रवाह (1915 - 1932) और प्रमुख मोड़

भारत में राष्ट्रवाद (1915–1934): प्रमुख चरण एवं ऐतिहासिक संधियाँचरण 1: 1915 - 1919सत्याग्रह का प्रादुर्भाव• 1915: गांधीजी की वापसी• 1917: चंपारण (नील किसान)• 1917: खेड़ा (लगान माफी)• 1918: अहमदाबाद (35% बोनस)• 1919: रॉलेट एक्ट विरोध• 13 अप्रैल 1919: जलियांवालाबाग नरसंहार (जनरल डायर)• खिलाफत समिति (मुंबई)चरण 2: 1920 - 1924असहयोग व विविध धाराएँ• नागपुर 1920: आंदोलन स्वीकृत• विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार• अवध: बाबा रामचंद्र (किसान सभा)• गुडेम: अल्लूरी सीताराम राजू• असम: चाय बागान मजदूर पलायन• 4 फरवरी 1922: चौरी-चौराहिंसा; गांधीजी ने आंदोलन रोका• 1923: स्वराज पार्टी (दास, नेहरू)चरण 3: 1928 - 1932सविनय अवज्ञा व पूर्ण स्वराज• 1928: साइमन कमीशन विरोध• लाहौर 1929: पूर्ण स्वराज मांग• 12 मार्च - 6 अप्रैल 1930:दांडी यात्रा; नमक कानून तोड़ा• 1931: गांधी-इरविन समझौता• दूसरा गोलमेज सम्मेलन (लंदन)• सितंबर 1932: पूना पैक्टगांधी-अंबेडकर संयुक्त निर्वाचनराष्ट्रवाद के सांस्कृतिक स्तम्भ (सामूहिक अपनेपन का भाव)भारत माता की छवि:बंकिम चंद्र (वंदे मातरम्) एवं अबनींद्रनाथ टैगोर (दैवीय संन्यासिनी रूप)।राष्ट्रीय ध्वज का विकास:1906 स्वदेशी तिरंगा (8 कमल) एवं 1921 गांधीजी का स्वराज तिरंगा (चरखा युक्त)।लोक साहित्य व इतिहास:नटेसा शास्त्री (तमिल लोककथाएँ) तथा भारत के प्राचीन गौरव की पुनर्खोज।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
प्रथम विश्व युद्ध ने भारत में महंगाई, जबरन सेना भर्ती और भारी करों के माध्यम से गहरा आर्थिक व राजनीतिक संकट उत्पन्न किया।
मुख्य बिंदु 2
जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद गांधीजी ने चंपारण (1917), खेड़ा (1917) और अहमदाबाद (1918) में सत्याग्रह के सफल प्रयोग किए।
मुख्य बिंदु 3
1919 के रॉलेट एक्ट के विरोध में राष्ट्रव्यापी हड़ताल हुई, जिसके दौरान 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में जनरल डायर ने भीषण नरसंहार किया।
मुख्य बिंदु 4
खिलाफत के प्रश्न और स्वराज की मांग को जोड़कर गांधीजी ने 1920 में असहयोग आंदोलन शुरू किया (नागपुर अधिवेशन में स्वीकृत)।
मुख्य बिंदु 5
असहयोग आंदोलन में शहरों के मध्यम वर्ग, अवध के किसानों (बाबा रामचंद्र), गुडेम पहाड़ियों के आदिवासियों (अल्लूरी सीताराम राजू) और असम के चाय बागान मजदूरों ने अपने-अपने ढंग से भाग लिया।
मुख्य बिंदु 6
4 फरवरी 1922 को चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।
मुख्य बिंदु 7
1928 में बिना किसी भारतीय सदस्य वाले साइमन कमीशन का देश भर में 'साइमन गो बैक' के नारों के साथ कड़ा विरोध किया गया।
मुख्य बिंदु 8
दिसंबर 1929 के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में 'पूर्ण स्वराज' का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया गया।
मुख्य बिंदु 9
12 मार्च से 6 अप्रैल 1930 की दांडी नमक यात्रा के साथ महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की।
मुख्य बिंदु 10
डॉ. बी.आर. अंबेडकर और गांधीजी के बीच सितंबर 1932 में हुए 'पूना पैक्ट' ने दलितों को अलग निर्वाचक मंडल के बजाय सामान्य निर्वाचन में आरक्षित सीटें दीं; साथ ही भारत माता, तिरंगे और लोकसाहित्य ने सामूहिक राष्ट्रवाद को रचा।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
सत्याग्रह का मूल सिद्धांत क्या है और गांधीजी ने इसे शारीरिक बल से भिन्न क्यों बताया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सत्याग्रह सत्य की शक्ति पर आग्रह और सत्य की खोज पर बल देता है। यह शारीरिक बल से भिन्न है क्योंकि इसमें प्रतिशोध या हिंसा का सहारा लिए बिना केवल आत्मबल और अहिंसा द्वारा विरोधी की अंतरात्मा को झकझोर कर सत्य स्वीकार कराया जाता है।
2
रॉलेट एक्ट 1919 का भारतीयों द्वारा कड़ा विरोध क्यों किया गया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि यह एक निरंकुश काला कानून था जिसने ब्रिटिश सरकार को बिना किसी मुकदमे के राजनीतिक कैदियों को दो वर्ष तक जेल में बंद रखने की असीमित शक्ति प्रदान की थी।
3
अल्लूरी सीताराम राजू कौन थे और उनका आंदोलन गांधीजी के विचारों से किस बात में भिन्न था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: वे आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों में आदिवासी गुरिल्ला आंदोलन के नेता थे। वे गांधीजी के खादी व मद्यनिषेध विचारों से सहमत थे परंतु उनका दृढ़ विश्वास था कि भारत अहिंसा से नहीं बल्कि सशस्त्र बल प्रयोग से ही स्वतंत्र हो सकता है।
4
गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत के लिए नमक को ही मुख्य हथियार क्यों चुना?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि नमक का उपयोग अमीर और गरीब सभी समान रूप से करते थे। यह दैनिक भोजन का अनिवार्य हिस्सा था और इस पर ब्रिटिश कर व एकाधिकार औपनिवेशिक उत्पीड़न का सबसे घिनौना प्रतीक था।
5
पूना पैक्ट (1932) का मुख्य प्रावधान क्या था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पूना पैक्ट के तहत दलित वर्गों (अनुसूचित जातियों) के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की मांग वापस ले ली गई और इसके बदले उन्हें प्रांतीय व केंद्रीय विधायिकाओं में सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों के भीतर आरक्षित सीटें प्रदान की गईं।
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