1.1 चीन, जापान और कोरिया में हाथ से छपाई
मुद्रण की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई:
- काष्ठ ब्लॉक प्रिंटिंग (Woodblock Printing): 594 ईस्वी से चीन में स्याही लगे काठ के तख्तों (Woodblocks) पर कागज को रगड़कर छपाई की जाती थी। चूंकि पारंपरिक चीनी कागज पतला और छिद्रयुक्त होता था, इसलिए उसके दोनों तरफ छपाई नहीं हो सकती थी; अतः किताबों को मोड़कर किनारे से सिल दिया जाता था जिसे 'एकार्डियन' शैली (Accordion style) कहा जाता था।
- चीन में मुद्रण का विस्तार: चीन में सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से अधिकारियों की विशाल नौकरशाही नियुक्त होती थी। परीक्षार्थियों के लिए लाखों पाठ्यपुस्तकें छापी जाती थीं। 16वीं सदी में परीक्षार्थियों की संख्या बढ़ने से मुद्रण में भारी उछाल आया। 17वीं सदी तक शंघाई नई मुद्रण संस्कृति का केंद्र बन गया।
- जापान में मुद्रण: चीनी बौद्ध मिशनरियों ने लगभग 768-770 ईस्वी में छपाई की तकनीक जापान पहुंचाई। 868 ईस्वी में छपी 'डायमंड सूत्र' (Diamond Sutra) जापान की सबसे पुरानी मुद्रित पुस्तक है, जिसमें काठ पर खुदे 6 पृष्ठ और चित्र हैं। 18वीं सदी में कितागावा उतामारो ने 'उकियो-ए' (Ukiyo-e - तैरती दुनिया के चित्र) नामक अनूठी कला शैली विकसित की।
1.2 यूरोप में मुद्रण का आगमन और मार्को पोलो
सदियों तक रेशम और मसाले रेशम मार्ग से यूरोप पहुंचते थे। 11वीं सदी में चीनी कागज उसी रास्ते यूरोप पहुंचा जिससे पांडुलिपियों की नकल आसान हुई।
- 1295 में मार्को पोलो: महान इतालवी यात्री मार्को पोलो कई वर्षों तक चीन में रहने के बाद 1295 में इटली लौटा। वह अपने साथ काठ की तख्ती (Woodblock) वाली छपाई की तकनीक लेकर आया। इटली के लोगों ने काष्ठ ब्लॉक से किताबें छापना शुरू किया और जल्द ही यह तकनीक पूरे यूरोप में फैल गई।
- पांडुलिपियों की सीमाएँ: अमीर और कुलीन वर्ग अभी भी वल्लम (Vellum - जानवरों के चमड़े से बनी लेखन सतह) पर हाथ से सुंदर अक्षरों में लिखी गई हस्तलिखित पांडुलिपियों को ही शुद्ध व गरिमापूर्ण मानते थे। परंतु पांडुलिपियाँ अत्यधिक महंगी, श्रमसाध्य और नाजुक होती थीं जिन्हें संभालना और कहीं ले जाना कठिन था। पुस्तकों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए छपाई की तेज तकनीक की सख्त जरूरत थी।