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JAC • Class X • Social Science • Ch 4
Estimated Time: 45 Mins
Study Progress: In Progress

The Age of Industrialisation

औद्योगिकीकरण का इतिहास अक्सर बड़े कारखानों, चिमनियों से निकलते धुएं, वाष्प इंजनों और मशीनी उत्पादन की गाथा के रूप में देखा जाता है। परंतु इंग्लैंड और यूरोप में फैक्ट्रियों की स्थापना से बहुत पहले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन हो रहा था। इतिहासकार इस चरण को 'आदि-औद्योगिकीकरण' (Proto-industrialisation) कहते हैं, जहाँ उत्पादन कारखानों में नहीं बल्कि ग्रामीण किसानों व दस्तकारों के घरों में होता था। 18वीं सदी के अंत में भाप की शक्ति, रिचर्ड आर्कराइट की सूती कपड़ा मिल और नई तकनीकों ने उत्पादन के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया। विक्टोरियाई ब्रिटेन में मानव श्रम की प्रचुरता के कारण उद्योगपति मशीनों के बजाय हाथ के श्रम को प्राथमिकता देते थे, क्योंकि कुलीन वर्ग हस्तनिर्मित और परिष्कृत चीजों को पसंद करता था। उपनिवेशों में, विशेष रूप से भारत में, औद्योगिकीकरण का प्रभाव बहुत जटिल रहा। ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय सूती व रेशमी वस्त्रों पर एकाधिकार जमाने के लिए 'गुमाश्ता' तैनात किए, जिससे परंपरागत बुनकर बर्बाद हो गए। 19वीं सदी में जब मैनचेस्टर के मशीनी कपड़े भारत पहुंचे, तो भारतीय बुनकरों के सामने दोहरा संकट खड़ा हो गया। इसके बावजूद, 19वीं सदी के उत्तरार्ध में बंबई (1854) और बंगाल (1855) में पहली कपड़ा व जूट मिलें लगीं। द्वारकानाथ टैगोर, जमशेदजी टाटा और सेठ हुकुमचंद जैसे भारतीय उद्यमियों ने औपनिवेशिक बंधनों के बावजूद भारतीय उद्योगों की नींव रखी। प्रथम विश्व युद्ध ने भारतीय मिलों को अभूतपूर्व जीवनदान दिया, और विज्ञापनों, कैलेंडरों तथा भगवानों के चित्रों के माध्यम से भारत में एक नए उपभोक्ता बाजार का निर्माण हुआ।

जब लंदन को दुनिया का 'फिनिशिंग सेंटर' कहा जाता था, तब कपड़े वास्तव में कहाँ बनते थे?

क्या आप जानते हैं कि जब भाप के इंजन और विशाल कारखाने बने भी नहीं थे, तब भी पूरे यूरोप के लोग उन कपड़ों को पहनते थे जो हजारों किलोमीटर दूर गाँवों की झोपड़ियों में बुने जाते थे? शहरों के धनी सौदागर गाँवों में जाते थे, किसानों को पेशगी (Advance) देते थे, ऊन को गाँव-दर-गाँव काता, बुना और रंगा जाता था। अंत में कपड़े को लंदन भेजा जाता था जहाँ केवल उसकी अंतिम छंटाई और फिनिशिंग (Finishing) होती थी। इसलिए लंदन को 'फिनिशिंग सेंटर' कहा गया! आइए जानें कि कैसे आदि-औद्योगिकीकरण की झोपड़ियों से निकलकर दुनिया विशाल कारखानों के आधुनिक युग में पहुंची।

Why This Chapter Matters

JAC एवं CBSE 10वीं बोर्ड परीक्षा में 'औद्योगिकीकरण का युग' इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। 'आदि-औद्योगिकीकरण' (Proto-industrialisation) की अवधारणा, विक्टोरियाई ब्रिटेन में हाथ के श्रम की मशीनों पर वरीयता, 'गुमाश्ता' की भूमिका व बुनकरों का शोषण, भारत में मैनचेस्टर के आगमन के प्रभाव, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय उद्योगों का तीव्र विकास, तथा विज्ञापनों द्वारा नए बाजार के निर्माण पर 3 से 5 अंकों के विस्तृत प्रश्न प्रतिवर्ष पूछे जाते हैं। यह अध्याय भारत के आधुनिक औद्योगिक विकास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करता है।

Before You Begin (Prerequisites)

  • 18वीं और 19वीं सदी की औद्योगिक क्रांति और वैज्ञानिक आविष्कारों (भाप इंजन, कताई मशीन) की सामान्य समझ।
  • ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार और भारत में औपनिवेशिक शोषण की पृष्ठभूमि।
  • हस्तशिल्प, कुटीर उद्योग और बड़े पैमाने के कारखानों के बीच का बुनियादी अंतर।

What You Will Learn (Core Objectives)

  • आदि-औद्योगिकीकरण (Proto-industrialisation) की संकल्पना और गिल्ड्स के प्रभाव का विश्लेषण करना।
  • विक्टोरियाई ब्रिटेन में उद्योगपतियों द्वारा मशीनों की तुलना में हाथ के श्रम को प्राथमिकता देने के सामाजिक-आर्थिक कारणों को समझना।
  • ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा 'गुमाश्ता' की नियुक्ति और इसके कारण भारतीय पारंपरिक बुनकरों पर पड़े विनाशकारी प्रभावों की व्याख्या करना।
  • 19वीं सदी में 'मैनचेस्टर के आगमन' से भारतीय कपड़ा उद्योग के समक्ष उत्पन्न संकट और बुनकरों की दुर्दशा का परीक्षण करना।
  • प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय उद्योगों के अप्रत्याशित विस्तार और उपभोक्ता बाजार के निर्माण में विज्ञापनों व कैलेंडरों की भूमिका का मूल्यांकन करना।

Chapter Roadmap & Progression

1 1. औद्योगिक क्रांति से पहले: आदि-औद...
2 2. कारखानों का उदय एवं हाथ का श्रम...
3 3. उपनिवेशों में औद्योगिकीकरण: भारत...
4 4. भारत में शुरुआती कारखाने, उद्योग...
5 5. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान औद्यो...

Complete Concept Guide (100% Curriculum Coverage)

1. औद्योगिक क्रांति से पहले: आदि-औद्योगिकीकरण (Proto-industrialisation)

1.1 आदि-औद्योगिकीकरण क्या है?

इंग्लैंड और यूरोप में कारखानों की स्थापना से पहले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होने लगा था। यह उत्पादन कारखानों में न होकर पारिवारिक इकाइयों द्वारा गांवों में होता था। इतिहासकार औद्योगिकीकरण के इस चरण को 'आदि-औद्योगिकीकरण' (Proto-industrialisation) कहते हैं।

  • सौदागरों का गांवों की ओर रुख: 17वीं और 18वीं सदी में विश्व व्यापार के विस्तार और उपनिवेशों की स्थापना से वस्तुओं की मांग तेजी से बढ़ी। परंतु सौदागर शहरों में अपना कारोबार नहीं बढ़ा सकते थे, क्योंकि शहरों में शहरी दस्तकारी संघ या गिल्ड्स (Urban Crafts Guilds) अत्यधिक शक्तिशाली थे।
  • गिल्ड्स का एकाधिकार: गिल्ड्स कारीगरों को प्रशिक्षित करते थे, उत्पादकों पर नियंत्रण रखते थे, कीमतें तय करते थे और नए लोगों को व्यवसाय में आने से रोकते थे। शासकों ने भी विभिन्न गिल्ड्स को विशिष्ट वस्तुओं के उत्पादन और व्यापार का एकाधिकार दिया हुआ था। अतः सौदागर गांवों की ओर मुड़े।
  • ग्रामीण किसानों के लिए वरदान: गांवों में खुले खेत (Open fields) गायब हो रहे थे और साझा जमीनों की बाड़ाबंदी (Enclosure) हो रही थी। छोटे किसानों और काश्तकारों के पास गुजारे लायक जमीन नहीं थी। जब सौदागरों ने उन्हें अग्रिम पेशगी दी, तो वे सहर्ष तैयार हो गए क्योंकि इससे वे अपने परिवार के सभी सदस्यों के श्रम का उपयोग कर अतिरिक्त आय कमा सकते थे।

1.2 उत्पादन की कार्यप्रणाली और लंदन का 'फिनिशिंग सेंटर'

आदि-औद्योगिक व्यवस्था में उत्पादन कई चरणों और अलग-अलग स्थानों पर बंटा हुआ था:

उत्पादन का चरणकार्यप्रणाली एवं श्रमिक
स्टैपलर (Stapler)वह व्यक्ति जो रेशों के हिसाब से ऊन को छांटता (Sort) था। सौदागर ऊन खरीदकर स्टैपलरों को देते थे।
कताई (Spinning)ऊन को गांवों में ले जाया जाता था जहाँ कत्तिनें (मुख्यतः महिलाएं) चरखों पर सूत कातती थीं।
फुलर (Fuller) / बुनकरफुलर्स वह व्यक्ति होता था जो चुनटों (Pleats) के सहारे कपड़े को इकट्ठा करता था; बुनकर कपड़ा बुनते थे।
रंगाई (Dyeing)कपड़े को रंगसाजों के पास विभिन्न रंगों में रंगने हेतु भेजा जाता था।
लंदन: फिनिशिंग सेंटरतैयार कपड़े की अंतिम छंटाई और फिनिशिंग (Finishing) केवल लंदन में होती थी, जिसके बाद सौदागर उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचते थे। इसीलिए लंदन को 'फिनिशिंग सेंटर' (Finishing Centre) कहा गया।

2. कारखानों का उदय एवं हाथ का श्रम बनाम वाष्प शक्ति

2.1 कारखानों का उदय और कपड़ा मिल

इंग्लैंड में सबसे पहले 1730 के दशक में कारखाने खुले, लेकिन 18वीं सदी के अंत में उनकी संख्या में भारी वृद्धि हुई:

  • कपास का पहला प्रतीक: नए युग का पहला प्रतीक कपास (सूती वस्त्र) था। 1760 में ब्रिटेन अपने सूती उद्योग के लिए 25 लाख पाउंड कच्चे कपास का आयात करता था, जो 1787 तक बढ़कर 220 लाख पाउंड तक पहुंच गया।
  • रिचर्ड आर्कराइट (Richard Arkwright): उन्होंने सूती कपड़ा मिल (Cotton Mill) की रूपरेखा तैयार की। अब तक कपड़ा पूरे देहात में फैला हुआ था, लेकिन अब महंगी मशीनें खरीदकर एक ही छत के नीचे लगाई जा सकती थीं।
  • उत्पादन प्रक्रिया के सभी चरण—कताई, बुनाई, रंगाई—एक छत के नीचे आने से गुणवत्ता पर बेहतर नियंत्रण, श्रम की निगरानी और समय की बचत संभव हुई।

2.2 विक्टोरियाई ब्रिटेन में हाथ का श्रम और मशीनें

अक्सर माना जाता है कि मशीनें आने के बाद उद्योगपति केवल मशीनों पर निर्भर हो गए, परंतु विक्टोरियाई ब्रिटेन (19वीं सदी) में स्थिति भिन्न थी:

उद्योगपतियों द्वारा हाथ के श्रम को प्राथमिकता देने के कारण:
1. मानव श्रम की प्रचुरता: गांवों से भारी संख्या में गरीब किसान और मजदूर काम की तलाश में शहरों में आ रहे थे। अतः मजदूरी बहुत कम थी; उद्योगपतियों को श्रमिकों की कोई कमी नहीं थी।
2. मौसमी उद्योग (Seasonal Industries): कई उद्योगों में काम केवल कुछ खास महीनों में होता था—जैसे गैस घरों और शराबखानों (Breweries) में सर्दियों में काम ज्यादा होता था, जहाजों की मरम्मत जाड़ों में होती थी, और क्रिसमस के समय प्रिंटरों और बुकबाइंडरों को ज्यादा काम मिलता था। ऐसे मौसमी उद्योगों के लिए उद्योगपति महंगी मशीनें खरीदने के बजाय केवल मौसम के लिए मजदूरों को काम पर रखना बेहतर समझते थे।
3. परिष्कृत एवं विविधतापूर्ण उत्पाद: मशीनों से केवल एक जैसे, मानकीकृत (Standardized) उत्पाद ही बन सकते थे। परंतु बाजार में ऐसे बारीक डिजाइनों और खास आकारों वाली चीजों की मांग थी जो केवल हाथ से बन सकती थीं। ब्रिटेन का उच्च और कुलीन वर्ग (Aristocrats) हाथ से बनी चीजों को अपनी प्रतिष्ठा का प्रतीक मानता था। मशीनी उत्पाद औपनिवेशिक देशों को निर्यात के लिए होते थे।
4. मशीनों की अत्यधिक लागत व खराबी: तत्कालीन मशीनें बहुत महंगी थीं और बार-बार खराब हो जाती थीं। उनकी मरम्मत में भारी खर्च आता था और वे निर्माताओं के दावों जितनी प्रभावी नहीं थीं।

2.3 मजदूरों का जीवन और स्पिनिंग जेनी का विरोध

  • काम की तलाश में शहरों में आए हजारों मजदूरों को कई हफ्तों तक सड़कों पर, पुलों के नीचे या रैनबसेरों (Night Refuges) में सोना पड़ता था। नौकरी मिलना इस बात पर निर्भर करता था कि कारखाने में उनका कोई रिश्तेदार या दोस्त है या नहीं।
  • स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny): 1764 में जेम्स हारग्रीव्स (James Hargreaves) ने स्पिनिंग जेनी का आविष्कार किया, जिसने एक ही पहिया घुमाकर एक साथ कई तकलियों को घुमा दिया और एक मजदूर कई धागे कात सकता था।
  • जब कताई में इस मशीन का उपयोग शुरू हुआ, तो हाथ से ऊन कातने वाली महिलाओं ने बेरोजगारी के डर से स्पिनिंग जेनी मशीनों पर हमले कर दिए और उन्हें तोड़ना शुरू कर दिया। यह मशीनों के प्रति मजदूरों के आक्रोश का जीवंत उदाहरण था।

3. उपनिवेशों में औद्योगिकीकरण: भारत में बुनकरों का संकट और मैनचेस्टर का आगमन

3.1 भारतीय वस्त्रों का स्वर्णिम युग और पुराने बंदरगाहों का पतन

मशीनी उद्योगों के युग से पहले अंतरराष्ट्रीय कपड़ा बाजार में भारत के रेशमी और बारीक सूती वस्त्रों (Fine Cotton) का एकछत्र वर्चस्व था। आर्मेनियाई और फारसी सौदागर पंजाब से अफगानिस्तान, पूर्वी फारस और मध्य एशिया के रास्ते माल ले जाते थे।

  • गुजरात तट पर सूरत बंदरगाह भारत को खाड़ी और लाल सागर के बंदरगाहों से जोड़ता था। कोरोमंडल तट पर मसूलीपट्टनम और बंगाल में हुगली के दक्षिण-पूर्व एशियाई बंदरगाहों के साथ व्यापारिक संबंध थे।
  • 1750 के दशक तक भारतीय सौदागरों और बैंकरों का यह नेटवर्क टूटने लगा क्योंकि यूरोपीय कंपनियों ने पहले स्थानीय दरबारों से व्यापारिक रियायतें हासिल कीं और फिर व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त कर लिया।
  • सूरत और हुगली जैसे पुराने ऐतिहासिक बंदरगाह वीरान हो गए और उनकी जगह औपनिवेशिक सत्ता के नए केंद्र—बंबई (मुंबई) और कलकत्ता (कोलकाता) उभरे।

3.2 ईस्ट इंडिया कंपनी, गुमाश्ता और बुनकरों का शोषण

1760 के दशक में बंगाल और कर्नाटक में राजनीतिक सत्ता स्थापित करने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार पर अपना एकाधिकार सुनिश्चित करने के लिए एक नई व्यवस्था लागू की:

गुमाश्ता (Gomastha) की व्यवस्था:
1. कंपनी ने कपड़े के व्यापार में सक्रिय पुराने दलालों और व्यापारियों को खत्म करने का प्रयास किया और बुनकरों पर सीधा नियंत्रण स्थापित करने के लिए एक वेतनभोगी कर्मचारी नियुक्त किया जिसे 'गुमाश्ता' कहा जाता था। उसका काम बुनकरों की निगरानी करना, माल इकट्ठा करना और कपड़े की गुणवत्ता जांचना था।
2. पेशगी की प्रणाली (System of Advances): कंपनी ने बुनकरों को कच्चा माल खरीदने के लिए अग्रिम कर्ज (Loan) देना शुरू किया। जो बुनकर कर्ज लेते थे, उन्हें अपना तैयार कपड़ा केवल कंपनी के गुमाश्ता को ही बेचना पड़ता था; वे किसी अन्य व्यापारी को कपड़ा नहीं बेच सकते थे।
3. गुमाश्ता का क्रूर व्यवहार: गुमाश्ता का गांव से कोई सामाजिक संबंध नहीं होता था। वे सिपाहियों और चपरासियों के साथ अकड़कर आते थे और माल की आपूर्ति में देरी होने पर बुनकरों को पीटते और कोड़े लगवाते थे। बुनकरों को कपड़े की जो कीमत मिलती थी, वह बहुत कम होती थी और वे कर्ज के अंतहीन जाल में फंस गए।

इसके परिणामस्वरूप कई गांवों में बुनकरों और गुमाश्ताओं के बीच हिंसक टकराव हुए। कई बुनकर अपनी करघों को छोड़कर दूसरे गांवों में चले गए और कई ने हमेशा के लिए बुनाई का पुश्तैनी पेशा छोड़ दिया।

3.3 भारत में मैनचेस्टर का आगमन

19वीं सदी की शुरुआत में भारत के कपड़ा निर्यात में भारी गिरावट आई। 1811-12 में भारत के कुल निर्यात में सूती कपड़े का हिस्सा 33% था, जो 1850-51 तक घटकर मात्र 3% रह गया।

  • कारण: इंग्लैंड के कपास उद्योगपतियों ने सरकार पर दबाव डाला कि वह आयातित कपड़ों पर भारी आयात शुल्क (Import Duty) लगाए ताकि मैनचेस्टर में बने कपड़े बिना किसी प्रतिस्पर्धा के बिक सकें। साथ ही उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी पर भारतीय बाजारों में ब्रिटिश कपड़ा बेचने का दबाव बनाया।
  • भारतीय बुनकरों के समक्ष दोहरा संकट:
    • उनका विदेशी निर्यात बाजार पूरी तरह समाप्त हो गया।
    • स्थानीय बाजार मैनचेस्टर के सस्ते, मशीनी कपड़ों से पट गया। मशीनों पर बने कपड़े इतने सस्ते और आकर्षक होते थे कि भारतीय बुनकर उनका मुकाबला नहीं कर सके।
  • कच्चे कपास का संकट (1860 का दशक): 1861 में जब अमेरिकी गृहयुद्ध (American Civil War) शुरू हुआ, तो अमेरिका से ब्रिटेन को कच्चे कपास का आयात बंद हो गया। ब्रिटेन ने भारत से कच्चा कपास मंगाना शुरू किया। परिणामस्वरूप भारत में कच्चे कपास की कीमतें आसमान छूने लगीं। भारतीय बुनकरों को कच्चा माल मिलना बंद हो गया और वे भुखमरी के कगार पर पहुंच गए।

4. भारत में शुरुआती कारखाने, उद्योगपति और श्रमिकों का जीवन

4.1 भारत में पहली मिलें और शुरुआती उद्योगपति

19वीं सदी के उत्तरार्ध में भारत में आधुनिक कारखानों का युग शुरू हुआ:

वर्ष / स्थानउद्योग / मिलसंस्थापक एवं ऐतिहासिक महत्व
1854 (बंबई)पहली सूती कपड़ा मिलकावासजी नानाभाई डाबर द्वारा स्थापित; 1856 में उत्पादन शुरू हुआ।
1855 (बंगाल)पहली जूट मिल (रिशरा में)जॉर्ज ऑकलैंड द्वारा स्थापित; भारत में जूट उद्योग की नींव पड़ी।
1860 का दशकएल्गिन मिल (कानपुर)उत्तरी भारत में सूती वस्त्र उत्पादन का प्रमुख केंद्र बनी।
1874 (मद्रास)पहली कताई व बुनाई मिलदक्षिण भारत में आधुनिक कपड़ा उद्योग की शुरुआत।

प्रारंभिक भारतीय उद्यमी:

  • द्वारकानाथ टैगोर (बंगाल): उन्होंने चीन के साथ अफीम और चाय व्यापार से धन कमाया और 1830 व 1840 के दशक में छह संयुक्त उद्यम (Joint Stock) कंपनियां स्थापित कीं।
  • जमशेदजी नसरवानजी टाटा (बंबई): चीन और इंग्लैंड के साथ व्यापार कर विशाल संपत्ति अर्जित की और 1912 में जमशेदपुर में भारत का पहला आधुनिक लौह-इस्पात संयंत्र (TISCO - Tata Iron and Steel Company) स्थापित किया।
  • सेठ हुकुमचंद: मारवाड़ी व्यवसायी जिन्होंने 1917 में कलकत्ता में पहली भारतीय जूट मिल स्थापित की।
  • जी.डी. बिड़ला: प्रमुख उद्योगपति जिन्होंने स्वतंत्र भारत के विशाल औद्योगिक साम्राज्य की नींव रखी।

4.2 मजदूरों की भर्ती और 'जॉबर' (Jobber)

कारखानों में काम करने के लिए आसपास के जिलों से किसान और कारीगर आते थे (जैसे बंबई की मिलों में 50% से अधिक मजदूर पास के रत्नागिरी जिले से आए थे)।

  • उद्योगपति नए मजदूरों की भर्ती के लिए एक 'जॉबर' (Jobber / मिस्त्री या सरदार) रखते थे। जॉबर कोई पुराना और विश्वसनीय मजदूर होता था।
  • वह अपने गांव से लोगों को लाता था, उन्हें शहर में बसने में मदद करता था और संकट के समय पैसे उधार देता था।
  • धीरे-धीरे जॉबर ताकतवर बन गया और उसने मजदूरों से मदद के बदले पैसे और उपहार (रिश्वत) मांगना तथा उनकी जिंदगियों को नियंत्रित करना शुरू कर दिया।

5. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान औद्योगिक उछाल एवं वस्तुओं के लिए बाजार

5.1 प्रथम विश्व युद्ध और भारतीय उद्योगों का अप्रत्याशित विकास

प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) ने भारतीय उद्योगों के लिए एक नाटकीय बदलाव पैदा कर दिया:

  1. ब्रिटिश आयात में भारी गिरावट: ब्रिटिश कारखाने सेना की आवश्यकताओं और युद्ध सामग्री के उत्पादन में व्यस्त हो गए। इंग्लैंड से भारत में आयात अचानक घट गया।
  2. घरेलू बाजार पर भारतीय मिलों का नियंत्रण: आयात गिरने से भारतीय कपड़ा मिलों को घरेलू बाजार की विशाल मांग पूरी करने का अप्रत्याशित अवसर मिला।
  3. सैन्य आपूर्ति के ऑर्डर: जैसे-जैसे युद्ध लंबा खिंचता गया, भारतीय कारखानों को सेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े ऑर्डर दिए गए—जूट की बोरियां, सैनिकों की वर्दियां, टेंट, चमड़े के जूते और काठी आदि।
  4. नये कारखाने व अतिरिक्त पारियाँ: पुराने कारखानों में कई पारियों (Shifts) में काम चलने लगा और हजारों नए श्रमिकों को रोजगार मिला। युद्ध के वर्षों में भारतीय औद्योगिक उत्पादन कई गुना बढ़ गया।
युद्धोपरांत स्थिति: युद्ध के बाद ब्रिटेन भारत के बाजार में अपनी पुरानी श्रेष्ठता कभी दोबारा हासिल नहीं कर सका। आधुनिक तकनीक में पिछड़ने और अमेरिका-जापान से पिछड़ जाने के कारण ब्रिटिश अर्थव्यवस्था चरमरा गई, जबकि भारतीय उद्योगपतियों ने स्थानीय बाजार पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली।

5.2 वस्तुओं के लिए बाजार का निर्माण (Market for Goods)

उत्पादक नए ग्राहकों को आकर्षित करने और अपनी वस्तुओं के प्रति निष्ठा पैदा करने के लिए विभिन्न मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक माध्यमों का प्रयोग करते थे:

1. विज्ञापनों और लेबलों की भूमिका

कपड़े के बंडलों पर लेबल लगाए जाते थे ताकि खरीदार को कंपनी का नाम और उत्पादन का स्थान पता चल सके। जब लेबल पर मोटे अक्षरों में 'मेड इन मैनचेस्टर' (Made in Manchester) लिखा होता था, तो यह गुणवत्ता का प्रतीक माना जाता था।

2. देवी-देवताओं और राष्ट्रीय नायकों के चित्र

लेबलों पर भारतीय देवी-देवताओं—सरस्वती, लक्ष्मी, कृष्ण—के चित्र छापे जाते थे। इससे यह संदेश दिया जाता था कि यह वस्तु ईश्वर द्वारा अनुशंसित है और इसे खरीदना शुभ है। बाद में राष्ट्रीय नेताओं (जैसे गांधीजी, नेहरू) और नवाबों के चित्र छापे जाने लगे।

3. कैलेंडरों का वितरण

19वीं सदी के अंत से उत्पादक कैलेंडर छापने लगे। कैलेंडर उन लोगों के घरों में भी पूरे साल टंगे रहते थे जो पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे। चाय की दुकानों, गरीब बस्तियों और दफ्तरों में विज्ञापन दिन-रात लोगों की आंखों के सामने रहते थे।

4. राष्ट्रवादी संदेश

स्वदेशी आंदोलन के दौरान भारतीय उत्पादकों ने राष्ट्रवादी संदेश दिए: 'यदि आप राष्ट्र की परवाह करते हैं, तो उन चीजों को खरीदिए जो भारतीयों द्वारा बनाई गई हैं।' विज्ञापन स्वदेशी के प्रसार का प्रमुख माध्यम बन गए।

Key Historical Terms, Chronology & Administrative Principles

आदि-औद्योगिकीकरण
कारखानों की स्थापना से पूर्व अंतरराष्ट्रीय बाजार हेतु देहातों में होने वाला उत्पादन।
1764 स्पिनिंग जेनी
जेम्स हारग्रीव्स द्वारा आविष्कृत कताई मशीन; महिलाओं द्वारा बेरोजगार होने के डर से विरोध।
1781 भाप इंजन पेटेंट
जेम्स वाट द्वारा न्यूकॉमन के भाप इंजन में सुधार व मैथ्यू बोल्टन द्वारा निर्माण।
लंदन: फिनिशिंग सेंटर
आदि-औद्योगिक व्यवस्था में कपड़ों की अंतिम फिनिशिंग का वैश्विक केंद्र।
गुमाश्ता (Gomastha)
ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा बुनकरों पर निगरानी व कपड़ा एकत्र करने हेतु नियुक्त वेतनभोगी एजेंट।
1854 (बंबई)
भारत की पहली सफल सूती कपड़ा मिल की स्थापना (कावासजी नानाभाई डाबर)।
1855 (रिशरा, बंगाल)
भारत की पहली जूट मिल की स्थापना।
1861 - 1865
अमेरिकी गृहयुद्ध; भारत से ब्रिटेन को कच्चे कपास का भारी निर्यात, भारतीय बुनकरों पर संकट।
1912 TISCO जमशेदपुर
जमशेदजी टाटा द्वारा भारत का पहला आधुनिक लौह एवं इस्पात संयंत्र।
जॉबर (Jobber / मिस्त्री)
कारखानों में नए मजदूरों की भर्ती करने वाला पुराना व भरोसेमंद मध्यस्थ।
मेड इन मैनचेस्टर
ब्रिटिश कपड़ा मिलों द्वारा भारतीय बाजारों में गुणवत्ता विश्वास जमाने हेतु लगाया गया लेबल।
1914 - 1918 प्रथम विश्व युद्ध
ब्रिटिश आयात ठप होने से भारतीय उद्योगों का तीव्र गति से अभूतपूर्व विस्तार।

Conceptual Solved Examples & Case Studies

Example 1
आदि-औद्योगिकीकरण (Proto-industrialisation) से आप क्या समझते हैं? इस व्यवस्था में उत्पादन किस प्रकार संगठित होता था?
Step-by-Step Solution:
आदि-औद्योगिकीकरण का अर्थ:
इंग्लैंड और यूरोप में कारखानों (कारखाना-आधारित उत्पादन) के उदय से बहुत पहले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए बड़े पैमाने पर होने वाले औद्योगिक उत्पादन को इतिहासकार 'आदि-औद्योगिकीकरण' कहते हैं। यह उत्पादन कारखानों के बजाय देहातों में किसानों और दस्तकारों के घरों में होता था।

उत्पादन का संगठन:
1. सौदागरों की गांवों में पैठ: शहरों में गिल्ड्स के शक्तिशाली एकाधिकार और पाबंदियों के कारण नए व्यापारी शहरों में व्यवसाय नहीं बढ़ा सकते थे। अतः वे गांवों में गए और गरीब किसानों को पेशगी (Advance) रकम देकर उत्पादन शुरू कराया।
2. पारिवारिक श्रम का उपयोग: खुले खेतों के समाप्त होने से संकटग्रस्त किसान परिवारों ने अपनी खाली बैठी श्रम शक्ति का उपयोग किया। पूरा परिवार कताई, बुनाई और धुलाई के काम में लग गया।
3. चरणबद्ध नेटवर्क: एक सौदागर ऊन स्टैपलर से ऊन खरीदता था, उसे कत्तिनों के पास कतवाता था, फिर बुनकरों के पास कपड़ा बुनवाया जाता था और रंगसाजों से रंगवाया जाता था।
4. लंदन में फिनिशिंग: अंत में कपड़े को लंदन भेजा जाता था जहाँ उसकी अंतिम फिनिशिंग की जाती थी। इसके बाद सौदागर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कपड़ा बेचते थे। इस प्रकार लंदन इस पूरी व्यवस्था का 'फिनिशिंग सेंटर' था।
Example 2
उन्नीसवीं सदी के विक्टोरियाई ब्रिटेन में उद्योगपति मशीनों के बजाय हाथ के श्रम को प्राथमिकता क्यों देते थे? स्पष्ट कीजिए।
Step-by-Step Solution:
औद्योगिक क्रांति के बावजूद 19वीं सदी के ब्रिटेन में उद्योगपति मशीनों के प्रयोग से हिचकिचाते थे और हाथ के श्रम को प्राथमिकता देते थे। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:

1. श्रमिकों की प्रचुरता और कम मजदूरी: कृषि संकट और बाड़ाबंदी के कारण लाखों गरीब ग्रामीण काम की तलाश में शहरों में आ रहे थे। श्रमिकों की भारी उपलब्धता के कारण मजदूरी की दरें बहुत कम थीं। अतः उद्योगपतियों को महंगी मशीनें लगाने की कोई आर्थिक आवश्यकता महसूस नहीं हुई।
2. मौसमी उद्योग (Seasonal Work): कई उद्योगों—जैसे गैस कारखाने, बीयर भट्टियाँ, जहाजरानी और बुकबाइंडिंग—में काम साल के कुछ निश्चित महीनों (सर्दियों या त्योहारों) में ही होता था। पूरे साल मशीनों का रखरखाव करने के बजाय केवल जरूरत के समय मजदूरों को रखना अधिक किफायती था।
3. बारीक और विशिष्ट डिजाइनों की मांग: मशीनें केवल मानकीकृत और एकरूप वस्तुएं ही बना सकती थीं। विक्टोरियन ब्रिटेन का धनी और कुलीन वर्ग (Aristocrats) हाथ से बनी बारीक, नक्काशीदार और अद्वितीय वस्तुओं को अपनी उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक मानता था।
4. मशीनों की अत्यधिक लागत व अविश्वसनीयता: तत्कालीन मशीनें अत्यधिक महंगी थीं, जल्दी खराब हो जाती थीं और उनकी मरम्मत का खर्च बहुत ज्यादा था। वे निर्माताओं के विज्ञापनों जितनी सक्षम नहीं थीं।
Example 3
ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा नियुक्त 'गुमाश्ता' कौन था? उसके द्वारा अपनाई गई कार्यप्रणाली का भारतीय बुनकरों पर क्या विनाशकारी प्रभाव पड़ा?
Step-by-Step Solution:
गुमाश्ता का परिचय:
ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के समृद्ध कपड़ा व्यापार से भारतीय दलालों और व्यापारियों को बाहर करने तथा बुनकरों पर सीधा प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित करने के लिए एक वेतनभोगी कर्मचारी नियुक्त किया जिसे 'गुमाश्ता' (Gomastha) कहा जाता था। उसका मुख्य कार्य बुनकरों को कर्ज बांटना, करघों की निगरानी करना, तैयार कपड़ा एकत्र करना और कपड़े की गुणवत्ता जांचना था।

बुनकरों पर विनाशकारी प्रभाव:
1. अन्य खरीदारों से संपर्क समाप्त: कंपनी ने बुनकरों को कच्चा माल खरीदने हेतु 'पेशगी' (अग्रिम ऋण) दी। जो बुनकर ऋण स्वीकार करते थे, वे कानूनी रूप से बाध्य हो जाते थे कि वे अपना सारा तैयार माल केवल कंपनी के गुमाश्ता को ही देंगे। वे स्वतंत्र बाजार में किसी अन्य व्यापारी को अधिक दाम पर माल नहीं बेच सकते थे।
2. अमानवीय शोषण और शारीरिक यातनाएँ: गुमाश्ता बाहरी लोग होते थे जिनका गांवों से कोई सामाजिक संबंध नहीं था। वे पुलिस और चपरासियों के साथ आते थे। माल की आपूर्ति में जरा सी भी देरी होने पर वे बुनकरों को बुरी तरह पीटते और सार्वजनिक रूप से कोड़े लगवाते थे।
3. अत्यल्प पारिश्रमिक और कर्ज का दुष्चक्र: कंपनी कपड़े की जो कीमत देती थी, वह इतनी कम थी कि बुनकर अपना मूल कर्ज भी नहीं चुका पाते थे।
4. विद्रोह और पलायन: इन क्रूरताओं से तंग आकर अनेक बुनकरों ने करघों को तोड़ दिया, पुश्तैनी काम छोड़ दिया और गांवों से भागकर अन्य प्रांतों में खेतिहर मजदूर बन गए।
Example 4
19वीं सदी में 'मैनचेस्टर के भारत आगमन' से भारतीय पारंपरिक बुनकरों के सामने कौन सी गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न हुईं?
Step-by-Step Solution:
19वीं सदी के मध्य में जब इंग्लैंड के औद्योगिक शहर मैनचेस्टर से निर्मित सूती वस्त्रों का भारत में बड़े पैमाने पर आयात शुरू हुआ, तो भारतीय पारंपरिक हथकरघा बुनकरों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया:

1. विदेशी निर्यात बाजारों का पतन: ब्रिटिश कपड़ा उद्योगपतियों के दबाव में ब्रिटिश संसद ने भारतीय कपड़ों के आयात पर भारी सीमा शुल्क (Import Duty) लगा दिया। फलस्वरूप, इंग्लैंड और यूरोप के बाजारों से भारतीय बारीक कपड़ा बाहर हो गया और भारत का निर्यात व्यापार 33% से घटकर 3% रह गया。
2. घरेलू बाजार में मैनचेस्टर की बाढ़: ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में ब्रिटिश आयातों पर शुल्क हटा दिया या न्यूनतम रखा। मैनचेस्टर के कारखानों में बड़ी मशीनों पर बनने वाला कपड़ा अत्यधिक सस्ता और चमकदार होता था। भारतीय बुनकर अपने हाथ से बने महंगे कपड़े से उसकी कीमत का मुकाबला नहीं कर सके। उनका घरेलू बाजार भी छिन गया।
3. कच्चे कपास का अकाल (1860 का दशक): 1861 में अमेरिकी गृहयुद्ध छिड़ने से ब्रिटेन को अमेरिका से कपास मिलना बंद हो गया। अंग्रेजों ने भारत से कच्चा कपास भारी मात्रा में ब्रिटेन भेजना शुरू किया। भारत में कच्चे कपास की कीमतें इतनी बढ़ गईं कि बुनकरों को कच्चा माल मिलना असंभव हो गया।
4. व्यापक भुखमरी और बेकारी: इन दोहरी-तिहरी मार से भारत का सदियों पुराना हथकरघा उद्योग नष्ट हो गया और लाखों कुशल बुनकर बेरोजगार होकर दर-दर भटकने लगे।
Example 5
प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) ने भारतीय औद्योगिक विकास को किस प्रकार एक अप्रत्याशित बढ़ावा दिया? विस्तार से समझाइए।
Step-by-Step Solution:
प्रथम विश्व युद्ध भारतीय उद्योगों के लिए एक ऐतिहासिक वरदान साबित हुआ। इसने भारतीय उद्योगों को निम्नलिखित प्रकार से अभूतपूर्व गति प्रदान की:

1. ब्रिटिश आयातों का अचानक बंद होना: युद्ध छिड़ते ही ब्रिटिश कारखाने अपनी पूरी क्षमता के साथ सैन्य साजो-सामान और युद्ध सामग्री के उत्पादन में झोंक दिए गए। इंग्लैंड से भारत आने वाले माल का आयात लगभग ठप हो गया।
2. घरेलू बाजार पर भारतीय मिलों का अधिकार: आयात बंद होने से भारतीय कपड़ा और उपभोक्ता मिलों के सामने अपने ही देश का एक विशाल, खाली बाजार उपलब्ध हो गया, जिसे उन्होंने तुरंत अपने नियंत्रण में ले लिया।
3. विशाल युद्ध आपूर्ति के ऑर्डर: युद्ध के लंबा खिंचने पर ब्रिटिश सरकार ने अपनी सेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारतीय कारखानों को बड़े-बड़े ऑर्डर दिए—जैसे जूट की बोरियां, सैनिकों की वर्दियां, टेंट, चमड़े के बूट और घोड़ों की काठियां।
4. उत्पादन क्षमता का विस्तार: मांग पूरी करने के लिए नए कारखाने लगाए गए, पुराने कारखानों में चौबीसों घंटे कई पारियों (Shifts) में काम चलने लगा और लाखों नए मजदूरों को रोजगार मिला।
5. स्थानीय उद्योगपतियों की स्थायी पकड़: युद्ध के बाद ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था इतनी कमजोर हो चुकी थी कि वह अमेरिका और जापान से पिछड़ गया और भारत में अपनी पुरानी श्रेष्ठता कभी पुनः स्थापित नहीं कर सका। भारतीय उद्योगपतियों ने औपनिवेशिक बाजार पर स्थायी रूप से अपना आधिपत्य जमा लिया।

Common Misconceptions & Examiner Traps

Common Misconception

यह मानना कि औद्योगिकीकरण की शुरुआत केवल कारखानों और विशाल भाप इंजनों के निर्माण से हुई थी।

Scientific Reality & Correction

कारखानों से पहले भी 'आदि-औद्योगिकीकरण' (Proto-industrialisation) का एक लंबा दौर था, जिसमें व्यापारी अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए गांवों में लाखों किसानों व दस्तकारों से बड़े पैमाने पर उत्पादन करवाते थे।

Common Misconception

यह सोचना कि 19वीं सदी के ब्रिटेन में उद्योगपति हाथ के मजदूरों को हटाकर केवल मशीनों से ही काम कराते थे।

Scientific Reality & Correction

विक्टोरियाई ब्रिटेन में मजदूर बहुत सस्ते थे, कई उद्योग मौसमी थे, और कुलीन वर्ग हाथ से बनी बारीक चीजों को पसंद करता था। इसलिए उद्योगपति मशीनों से ज्यादा हाथ के श्रम को तरजीह देते थे।

Common Misconception

गुमाश्ता को भारतीय बुनकरों का हितैषी या स्थानीय नेता समझ लेना।

Scientific Reality & Correction

गुमाश्ता ईस्ट इंडिया कंपनी का एक वेतनभोगी दमनकारी एजेंट था, जो बुनकरों पर नजर रखता था, उनका शोषण करता था और देर होने पर उन्हें शारीरिक दंड देता था।

Common Misconception

भारत की पहली सूती कपड़ा मिल को 1854 में कलकत्ता में स्थापित मानना।

Scientific Reality & Correction

भारत की पहली सफल सूती कपड़ा मिल 1854 में बंबई (मुंबई) में कावासजी नानाभाई डाबर द्वारा लगाई गई थी। 1855 में रिशरा (बंगाल) में पहली जूट मिल लगी थी।

Common Misconception

स्पिनिंग जेनी मशीन को भाप से चलने वाला इंजन समझना।

Scientific Reality & Correction

स्पिनिंग जेनी (1764) जेम्स हारग्रीव्स द्वारा बनाई गई हाथ से चलने वाली सूत कातने की मशीन थी, जिसमें एक पहिया घुमाने से एक साथ कई तकलियाँ घूमती थीं।

औद्योगिकीकरण का विकास क्रम: आदि-उद्योग से आधुनिक कारखानों तक

औद्योगिकीकरण का युग: आदि-औद्योगीकरण, भारतीय बुनकर व युद्धकालीन उछाल1. आदि-औद्योगिकीकरणकारखानों से पूर्व देहाती उत्पादन• सौदागरों का गांवों में प्रवेश• शहरी गिल्ड्स का एकाधिकार• स्टैपलर, कताई, बुनाई व रंगाई• लंदन: फिनिशिंग सेंटर• रिचर्ड आर्कराइट: सूती मिल• विक्टोरियाई ब्रिटेन: हाथ का श्रमसस्ता; मौसमी काम; बारीक डिजाइन• 1764 स्पिनिंग जेनी विरोध2. भारतीय बुनकर व संकटगुमाश्ता व मैनचेस्टर आगमन• सूरत व हुगली पुराने बंदरगाह ढहे• बंबई व कलकत्ता नए केंद्र बने• गुमाश्ता का क्रूर नियंत्रण:अग्रिम पेशगी, कोड़े, बुनकर पलायन• मैनचेस्टर का भारत आगमन:निर्यात ढहा (33% से 3%), सस्ता कपड़ा• 1861 अमेरिकी गृहयुद्ध:कपास निर्यात से स्थानीय अकाल3. भारतीय उद्योग व युद्धमिलों का उदय व नया बाजार• 1854 बंबई: पहली सूती मिल• 1855 रिशरा: पहली जूट मिल• उद्यमी: टैगोर, टाटा, बिड़ला• जॉबर द्वारा मजदूरों की भर्ती• 1914-18 प्रथम विश्व युद्ध:ब्रिटिश आयात बंद; सैन्य ऑर्डर;भारतीय मिलों का अभूतपूर्व उछाल• विज्ञापन, कैलेंडर व देवी-देवताबोर्ड परीक्षा के प्रमुख संप्रत्यय (Key Examination Takeaways)गुमाश्ता (Gomastha):ईस्ट इंडिया कंपनी का वेतनभोगी एजेंट; बुनकरों पर कठोर नियंत्रण, पेशगी ऋण और उत्पीड़न।मैनचेस्टर का संकट:सस्ते मशीनी कपड़ों से भारतीय घरेलू बाजार पटा और हथकरघा बुनकरों की आजीविका नष्ट हुई।प्रथम विश्व युद्ध प्रभाव:ब्रिटिश आयातों में गिरावट से भारतीय मिलों को घरेलू व सैन्य मांग पूरी कर भारी लाभ मिला।

Chapter Summary & 10 Key Takeaways

Takeaway 1
आदि-औद्योगिकीकरण (Proto-industrialisation) कारखानों से पहले का वह दौर था जिसमें अंतरराष्ट्रीय बाजार हेतु ग्रामीण परिवारों द्वारा उत्पादन किया जाता था।
Takeaway 2
शहरी गिल्ड्स के व्यापारिक एकाधिकार के कारण सौदागरों ने देहातों का रुख किया और किसानों को अग्रिम पेशगी देकर ऊन व कपड़े का उत्पादन कराया।
Takeaway 3
लंदन को 'फिनिशिंग सेंटर' कहा जाता था क्योंकि देहातों में बुने गए कपड़ों की अंतिम छंटाई और फिनिशिंग केवल लंदन में होती थी।
Takeaway 4
विक्टोरियाई ब्रिटेन में श्रमिकों की प्रचुरता, सस्ते श्रम, मौसमी उद्योगों और कुलीन वर्ग द्वारा हाथ से बनी अनूठी चीजों की पसंद के कारण उद्योगपति मशीनों पर हाथ के श्रम को तरजीह देते थे।
Takeaway 5
1764 में जेम्स हारग्रीव्स द्वारा आविष्कृत स्पिनिंग जेनी मशीन पर कताई करने वाली महिलाओं ने बेरोजगारी के डर से हिंसक हमले किए।
Takeaway 6
ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय कपड़ा व्यापार पर एकाधिकार जमाने के लिए 'गुमाश्ता' (वेतनभोगी एजेंट) नियुक्त किए, जिन्होंने पेशगी व्यवस्था के जरिए बुनकरों को कंगाल बना दिया।
Takeaway 7
19वीं सदी में मैनचेस्टर के सस्ते मशीनी वस्त्रों के भारत आगमन ने भारतीय निर्यात को नष्ट कर दिया और स्थानीय बुनकरों को भुखमरी के कगार पर ला दिया।
Takeaway 8
भारत में पहली सफल सूती कपड़ा मिल 1854 में बंबई में और पहली जूट मिल 1855 में रिशरा (बंगाल) में स्थापित की गई।
Takeaway 9
द्वारकानाथ टैगोर, जमशेदजी टाटा, सेठ हुकुमचंद और जी.डी. बिड़ला ने औपनिवेशिक भेदभाव के बावजूद भारतीय उद्योगों की मजबूत नींव रखी।
Takeaway 10
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश आयात ठप होने और भारी सैन्य ऑर्डर मिलने से भारतीय उद्योगों का अप्रत्याशित विस्तार हुआ; विज्ञापनों व कैलेंडरों ने नया बाजार रचा।

Check Your Understanding (Diagnostic Practice Questions)

Diagnostic questions testing core conceptual clarity. Answers are hidden initially — solve each problem first, then click to reveal the step-by-step verified solution.

1
आदि-औद्योगिकीकरण (Proto-industrialisation) क्या है और सौदागरों ने शहरों के बजाय गांवों का रुख क्यों किया?
Reveal Answer & Explanation
Answer: कारखानों की स्थापना से पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार हेतु देहातों में होने वाले बड़े पैमाने के उत्पादन को आदि-औद्योगिकीकरण कहते हैं। शहरों में शक्तिशाली गिल्ड्स के एकाधिकार और नियमों के कारण नए व्यापारियों को काम करने की अनुमति नहीं थी, इसलिए सौदागरों ने गांवों का रुख किया।
2
विक्टोरियाई ब्रिटेन में उद्योगपति मशीनों की तुलना में हाथ के श्रम को क्यों प्राथमिकता देते थे?
Reveal Answer & Explanation
Answer: क्योंकि ब्रिटेन में सस्ते मानवीय श्रम की प्रचुरता थी, कई उद्योग केवल कुछ महीनों (मौसमी) के लिए चलते थे, मशीनें बहुत महंगी व जल्दी खराब होने वाली थीं, और अमीर वर्ग हाथ से बनी परिष्कृत व अद्वितीय चीजों को पसंद करता था।
3
ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा नियुक्त 'गुमाश्ता' कौन था और उसका बुनकरों के साथ क्या संबंध था?
Reveal Answer & Explanation
Answer: गुमाश्ता कंपनी का एक वेतनभोगी कर्मचारी था जो बुनकरों पर नजर रखता था, कच्चा माल खरीदने हेतु कर्ज देता था और कपड़ा इकट्ठा करता था। उसका व्यवहार अत्यंत क्रूर और दमनकारी था; वह देरी होने पर बुनकरों को कोड़ों से पिटवाता था।
4
1860 के दशक में भारतीय बुनकरों के सामने कच्चे कपास का गंभीर संकट क्यों पैदा हुआ?
Reveal Answer & Explanation
Answer: 1861 में अमेरिकी गृहयुद्ध शुरू होने से ब्रिटेन को अमेरिका से कपास मिलना बंद हो गया। अंग्रेजों ने अपनी मिलों के लिए भारत से भारी मात्रा में कच्चा कपास मंगाना शुरू किया, जिससे भारत में कपास की कीमतें अत्यधिक बढ़ गईं और भारतीय बुनकरों को कच्चा माल मिलना असंभव हो गया।
5
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय उद्योगों का तेजी से विकास क्यों हुआ?
Reveal Answer & Explanation
Answer: क्योंकि ब्रिटिश कारखाने युद्ध सामग्री बनाने में व्यस्त हो गए और इंग्लैंड से भारत आने वाला आयात बंद हो गया। भारतीय मिलों को घरेलू बाजार पर एकाधिकार मिला और सेना के लिए वर्दी, टेंट व बोरियां बनाने के भारी सरकारी ऑर्डर मिले।
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