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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा XII • Biology • अध्याय 6
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

विकास (Evolution) (Evolution)

जैव विकास (Evolution) अरबों वर्षों के भूगर्भीय काल में पृथ्वी पर जीवन के सरलतम आद्य रूपों से क्रमिक, धीमी तथा निरंतर संचयी परिवर्तनों द्वारा आज की जटिल एवं विविधतापूर्ण प्रजातियों के प्रादुर्भाव की वैज्ञानिक गाथा है। प्रसिद्ध विकासवादी जीववैज्ञानिक थियोडोसियस डोबझान्स्की (Theodosius Dobzhansky) ने यथार्थ ही कहा था: 'जैव विकास के प्रकाश के बिना जीवविज्ञान में किसी भी तथ्य का कोई वैज्ञानिक औचित्य नहीं है।' प्रस्तुत अध्याय ब्रह्मांड एवं पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर आधुनिक मानव के क्रमिक विकास तक के संपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्यों एवं सिद्धांतों का गहरा विश्लेषण प्रस्तुत करता है: 1. जीवन की उत्पत्ति (Origin of Life): महाविस्फोट सिद्धांत (Big Bang Theory), आदिम पृथ्वी का अपचायक वातावरण, ओपेरिन एवं हाल्डेन का रासायनिक विकास का सिद्धांत (Chemical Evolution), तथा स्टेनली मिलर एवं हेरोल्ड उरे (Miller-Urey, 1953) का प्रायोगिक प्रमाण (स्पार्क डिस्चार्ज उपकरण, $800^\circ\text{C}$, $CH_4, NH_3, H_2, H_2O$ तथा अमीनो अम्लों का संश्लेषण)। 2. जैव विकास के प्रमाण (Evidences for Evolution): जीवाश्मीय प्रमाण (पैलियोन्टोलॉजी), तुलनात्मक शारीरिकी एवं आकारिकी—समजात अंग (Homologous Organs) व अपसारी विकास (Divergent Evolution), तथा समवृत्ति अंग (Analogous Organs) व अभिसारी विकास (Convergent Evolution); भ्रौणिकीय साक्ष्य (अर्न्स्ट हेकेल बनाम कार्ल अर्न्स्ट वॉन बेयर) एवं आणविक साक्ष्य। 3. विकास के प्रमुख सिद्धांत: लैमार्कवाद (उपार्जित लक्षणों की वंशागति एवं वीज़मैन द्वारा खंडन), डार्विन का प्राकृतिक वरण का सिद्धांत (Natural Selection, HMS बीगल यात्रा, गैलापागोस द्वीप समूह एवं डार्विन की फिंचें / अनुकूली विकिरण), तथा ह्यूगो डी व्रीज का उत्परिवर्तन सिद्धांत (म्यूटेशन, साल्टेशन एवं Oenothera lamarckiana)। 4. प्राकृतिक वरण के क्रियाशील उदाहरण: इंग्लैंड में औद्योगिक मेलेनिनता (Biston betularia), जीवाणुओं में एंटीबायोटिक प्रतिरोधकता, तथा प्राकृतिक वरण के तीन प्रकार—स्थिरकारी (Stabilizing), दिशात्मक (Directional) एवं विदारक (Disruptive) वरण। 5. हार्डी-वाइनबर्ग सिद्धांत (Hardy-Weinberg Principle): आनुवंशिक साम्यता, बीजीय समीकरण ($p^2 + 2pq + q^2 = 1$), तथा आनुवंशिक विचलन (Genetic Drift), संस्थापक प्रभाव (Founder Effect) व बॉटलनैक प्रभाव। 6. मानव का क्रमिक विकास (Human Evolution): ड्रायोपिथेकस से लेकर रामापिथेकस, ऑस्ट्रेलोपिथेकस, Homo habilis (650–800 cc), Homo erectus (900 cc), निएंडरथल मानव (1400 cc), तथा आधुनिक Homo sapiens तक का कालानुक्रमिक इतिहास।

आदिम समुद्र के खौलते सूप से उड़ने वाले डायनासोर और आपकी कलाई की अवशेषी मांसपेशी तक: 4 अरब वर्षों की रोमांचक यात्रा!

क्या आपने कभी अपनी कलाई को मोड़कर अंगूठे और छोटी अंगुली को आपस में छुआ है? यदि कलाई के बीच में एक उभरा हुआ कड़ा टेंडन दिखाई दे, तो बधाई हो—आप अपने शरीर में 4 करोड़ वर्ष पुराना एक आदिम अवशेष लेकर घूम रहे हैं! इसे पामेरिस लोंगास (Palmaris longus) पेशी कहते हैं, जो हमारे बंदर पूर्वजों को पेड़ों की डालियों पर झूलने में मदद करती थी। इतना ही नहीं, पक्षी वास्तव में कोई अलग जीव नहीं, बल्कि पंख वाले जीवित डायनासोर हैं! और 1953 में 23 साल के एक छात्र स्टेनली मिलर ने अपनी लैब के कांच के फ्लास्क में बिजली चमकाकर वह चमत्कार कर दिखाया जिसने सिद्ध कर दिया कि हम सब निर्जीव रसायनों के उस 'आदिम सूप' (Primordial Soup) की संतान हैं जो 4 अरब वर्ष पहले पृथ्वी के उबलते समुद्रों में बना था!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

JAC बोर्ड, CBSE तथा NEET-UG में यह अध्याय 6 से 8 अंकों का अनिवार्य हिस्सा है: 1. 5-अंकीय दीर्घ उत्तरीय प्रश्न: मिलर के प्रयोग का नामांकित चित्र एवं रासायनिक विकास का वर्णन, अथवा समजात बनाम समवृत्ति अंगों के आधार पर अपसारी व अभिसारी विकास, अथवा हार्डी-वाइनबर्ग संतुलन व इसे प्रभावित करने वाले 5 कारक। 2. 3-अंकीय तुलनात्मक प्रश्न: डार्विनवाद बनाम ह्यूगो डी व्रीज का उत्परिवर्तन सिद्धांत, अथवा मानव विकास के विभिन्न चरणों की कपाल गुहा (Cranial Capacity) की तुलना। 3. NEET-UG का अत्यंत पसंदीदा क्षेत्र: हार्डी-वाइनबर्ग के गणितीय संख्यात्मक प्रश्न ($p^2 + 2pq + q^2 = 1$), औद्योगिक मेलेनिनता, डार्विन की फिंचें (Adaptive Radiation), तथा होमो हैबिलिस (650-800 cc) व होमो इरेक्टस (900 cc) पर प्रतिवर्ष 3 प्रश्न पूछे जाते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • कोशिका विभाजन में क्रॉसिंग ओवर एवं पुनर्योजन (Recombination)।
  • जीन उत्परिवर्तन (Mutation) एवं युग्मविकल्पी आवृत्ति (Allele Frequency) की बुनियादी अवधारणा।
  • भूवैज्ञानिक काल मापक्रम (Geological Time Scale: कल्प, युग) का संक्षिप्त परिचय।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • मिलर-उरे प्रयोग के उपकरणों, गैसों के अनुपात एवं संश्लेषित कार्बनिक यौगिकों का सचित्र निरूपण करना।
  • समजात (Homologous) और समवृत्ति (Analogous) अंगों के उदाहरणों द्वारा अपसारी एवं अभिसारी विकास में अंतर स्पष्ट करना।
  • अनुकूली विकिरण (Adaptive Radiation) के सिद्धांतों को डार्विन की फिंचों एवं ऑस्ट्रेलियाई मार्सुपियल्स के उदाहरणों से समझाना।
  • हार्डी-वाइनबर्ग समीकरण ($p^2 + 2pq + q^2 = 1$) की सहायता से समष्टि में जीनोटाइपिक आवृत्तियों की सटीक गणना करना।
  • मानव विकास के विभिन्न पूर्वजों (ऑस्ट्रेलोपिथेकस, होमो हैबिलिस, होमो इरेक्टस, निएंडरथल) की कपाल गुहा, आहार तथा लक्षणों का कालानुक्रमिक विवरण प्रस्तुत करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. जीवन की उत्पत्ति एवं मिलर-उरे का...
2 2. जैव विकास के प्रमाण—समजातता, समव...
3 3. विकास के सिद्धांत—लैमार्क, डार्व...
4 4. प्राकृतिक वरण की क्रियाविधि एवं...
5 5. मानव का क्रमिक विकास (Origin and...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. जीवन की उत्पत्ति एवं मिलर-उरे का ऐतिहासिक प्रयोग

ब्रह्मांड की उत्पत्ति लगभग 20 अरब (20 Billion) वर्ष पूर्व एक महाविस्फोट यानी बिग बैंग (Big Bang) के फलस्वरूप हुई। सौरमंडल में हमारी पृथ्वी की उत्पत्ति लगभग 4.5 अरब वर्ष पूर्व हुई। प्रारंभिक पृथ्वी पर कोई वायुमंडल नहीं था। ज्वालामुखियों से निकली जलवाष्प, मेथेन ($CH_4$), अमोनिया ($NH_3$) तथा कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) ने पृथ्वी को ढक लिया। उस समय का वायुमंडल अपचायक (Reducing) था क्योंकि इसमें स्वतंत्र ऑक्सीजन ($O_2$) अनुपस्थित थी। सूर्य की पराबैंगनी (UV) किरणों ने जल को तोड़कर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभक्त किया। हल्की हाइड्रोजन अंतरिक्ष में पलायन कर गई। धीरे-धीरे पृथ्वी ठंडी हुई और जलवाष्प के संघनन से मूसलाधार वर्षा हुई जिसने विशाल गड्ढों को भरकर महासागरों का निर्माण किया। पृथ्वी पर जीवन का प्रथम प्रकटीकरण लगभग 4 अरब वर्ष पूर्व (यानी उत्पत्ति के 50 करोड़ वर्ष बाद) हुआ।

ओपेरिन-हाल्डेन का रासायनिक विकास सिद्धांत (Chemical Evolution):

रूस के ए. आई. ओपेरिन तथा इंग्लैंड के जे. बी. एस. हाल्डेन ने स्वतंत्र रूप से प्रतिपादित किया कि जीवन की उत्पत्ति निर्जीव कार्बनिक अणुओं (अजैविक रसायनों) से हुई है (Chemical Evolution followed by Biological Evolution)। आदिम समुद्र में अकार्बनिक तत्वों से सरल कार्बनिक अणु (शर्करा, अमीनो अम्ल, ग्लिसरॉल) बने, जिन्होंने मिलकर जटिल बहुलक (प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल) बनाए। हाल्डेन ने इस कार्बनिक अणुओं से समृद्ध गरम समुद्र को 'तप्त तनु सूप' (Hot Dilute Soup) कहा।

स्टेनली मिलर एवं हेरोल्ड उरे का प्रयोग (Miller-Urey Experiment, 1953):

शिकागो विश्वविद्यालय के स्टेनली मिलर ने अपने गुरु हेरोल्ड उरे के मार्गदर्शन में प्रयोगशाला में आदिम पृथ्वी जैसी परिस्थितियां निर्मित कीं:

  • स्पार्क डिस्चार्ज उपकरण: एक बड़े कांच के फ्लास्क में टंगस्टन के दो इलेक्ट्रोड लगाकर तड़ित-झंझावात (Lightning) के समान उच्च वोल्टेज (लगभग 75,000 वोल्ट) का विद्युत विसर्जन उत्पन्न किया गया।
  • गैसों का मिश्रण: फ्लास्क में मेथेन ($CH_4$), अमोनिया ($NH_3$), तथा हाइड्रोजन ($H_2$) को $2 : 1 : 2$ के अनुपात में लिया गया तथा लगातार जलवाष्प ($H_2O$) प्रवाहित की गई।
  • तापमान: उपकरण का तापमान लगभग $800^\circ\text{C}$ बनाए रखा गया।
  • संघनित्र (Condenser): गैसों के गैसीय मिश्रण को ठंडा कर द्रव में बदलने हेतु जल संघनित्र लगाया गया।

प्रायोगिक परिणाम: एक सप्ताह तक उपकरण को निरंतर चलाने के बाद जब लाल रंग के तरल का रासायनिक विश्लेषण (क्रोमैटोग्राफी) किया गया, तो उसमें कई प्रकार के अमीनो अम्ल—ग्लाइसीन (Glycine), ऐलैनिन (Alanine), तथा एस्पार्टिक एसिड (Aspartic acid) प्रचुर मात्रा में पाए गए! अन्य वैज्ञानिकों ने ऐसे ही प्रयोगों में शर्करा, नाइट्रोजनी क्षारक, वसा अम्ल तथा वर्णक प्राप्त किए। इस प्रयोग ने ओपेरिन-हाल्डेन के रासायनिक विकास सिद्धांत को प्रायोगिक आधार पर अकाट्य सिद्ध कर दिया।

2. जैव विकास के प्रमाण—समजातता, समवृत्तिता एवं अनुकूली विकिरण

जैव विकास के पक्ष में विभिन्न क्षेत्रों से अनेक सशक्त प्रमाण प्राप्त होते हैं:

1. तुलनात्मक शारीरिकी एवं आकारिकी के प्रमाण:

लक्षणसमजात अंग (Homologous Organs)समवृत्ति अंग (Analogous Organs)
मूल परिभाषाउत्पत्ति एवं आंतरिक संरचना में समान, किंतु कार्य में भिन्न।उत्पत्ति एवं आंतरिक संरचना में भिन्न, किंतु कार्य में समान।
विकास का प्रकारअपसारी विकास (Divergent Evolution)।अभिसारी विकास (Convergent Evolution)।
पूर्वजतासमान पूर्वजता (Common Ancestry) दर्शाते हैं।भिन्न पूर्वजता दर्शाते हैं; अनुकूलन समान होता है।
जंतु उदाहरणमानव के हाथ, चीते के अग्रपाद, व्हेल के फ्लिपर एवं चमगादड़ के पंख (सभी में ह्यूमरस, रेडियस-अल्ना, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स उपस्थित हैं)।तितली (कीट) के पंख एवं पक्षी/चमगादड़ के पंख (दोनों उड़ने का कार्य करते हैं किंतु संरचना भिन्न है); ऑक्टोपस एवं स्तनधारी की आंख।
पादप उदाहरणबोगेनविलिया के कांटे (Thorns) तथा कुकरबिटा के प्रतान (Tendrils) — दोनों कक्षीय कलिका (Axillary bud) के रूपांतरण हैं।शकरकंद (Sweet potato - रूपांतरित जड़) तथा आलू (Potato - रूपांतरित तना) — दोनों भोजन संचय करते हैं।

2. अनुकूली विकिरण (Adaptive Radiation):

एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र में एक मूल बिंदु (Common Ancestral Stock) से प्रारंभ होकर विभिन्न भौगोलिक एवं पारिस्थितिक आवासों के अनुसार नई प्रजातियों के शाखित विकास को अनुकूली विकिरण कहते हैं। यह अपसारी विकास का सजीव उदाहरण है।

  • डार्विन की फिंचें (Darwin's Finches): जब चार्ल्स डार्विन ने अपने जहाज HMS बीगल से गैलापागोस द्वीप समूह का भ्रमण किया, तो उन्होंने देखा कि मुख्य भूमि से आई एक सामान्य बीज-भक्षी चिड़िया (Seed-eating finch) विभिन्न द्वीपों पर फैल गई और भोजन की उपलब्धता के अनुसार उसकी चोंच में चमत्कारी रूपांतरण हुए: कुछ कीटभक्षी (Insectivorous), कुछ कैक्टस-भक्षी, तो कुछ शाकाहारी चोंच वाली 13 विभिन्न प्रजातियों में विकसित हो गईं!
  • ऑस्ट्रेलियाई मार्सुपियल्स (Australian Marsupials): मुख्य महाद्वीप से अलग-थलग पड़े ऑस्ट्रेलिया में एक मूल मार्सुपियल पूर्वज से मार्सुपियल चूहा, तस्मानियाई भेड़िया, कंगारू, कोआला, बैंडिकूट आदि अनेक स्तनधारी विकसित हुए।
  • अभिसारी अनुकूलन (Convergent Evolution): जब एक ही भौगोलिक क्षेत्र में पृथक पूर्वजों वाले दो विभिन्न समूह (जैसे अपरा स्तनी / Placental mammals तथा मार्सुपियल्स) समान आवास के लिए विकसित होते हैं, तो वे एक जैसे दिखाई देने लगते हैं (उदा. अपरा भेड़िया एवं तस्मानियाई मार्सुपियल भेड़िया; अपरा चींटीखोर एवं मार्सुपियल चींटीखोर)।

3. भ्रौणिकीय प्रमाण (Embryological Evidences):

अर्न्स्ट हेकेल (Ernst Haeckel) ने पुनरावृत्ति सिद्धांत (Biogenetic Law) दिया: 'Ontogeny recapitulates Phylogeny' (व्यक्तिवृत्त जातिवृत्त की पुनरावृत्ति करता है)। किंतु कार्ल अर्न्स्ट वॉन बेयर (Karl Ernst von Baer) ने गहन अध्ययन द्वारा इस सिद्धांत का खंडन किया और स्पष्ट किया कि भ्रूण कभी भी अन्य प्राणियों की वयस्क अवस्थाओं से होकर नहीं गुजरता, बल्कि केवल सामान्य लक्षण ही पहले प्रकट होते हैं।

3. विकास के सिद्धांत—लैमार्क, डार्विन एवं ह्यूगो डी व्रीज

जैव विकास की क्रियाविधि को समझाने हेतु तीन महान वैज्ञानिकों के सिद्धांत ऐतिहासिक महत्व रखते हैं:

1. लैमार्कवाद (Lamarckism - 1809):

फ्रांसीसी प्रकृतिविज्ञानी जीन बैप्टिस्ट डी लैमार्क ने अपनी पुस्तक 'Philosophie Zoologique' में उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धांत दिया:

  • वातावरण का सीधा प्रभाव एवं नई आवश्यकताएं जीवों में नए अंगों को जन्म देती हैं।
  • अंगों का उपयोग एवं अनुपयोग (Use and Disuse of Organs): जिन अंगों का जीव अधिक उपयोग करता है वे सुदृढ़ व विकसित हो जाते हैं (जैसे जिराफ द्वारा ऊंची डालियों की पत्तियां खाने हेतु गर्दन का निरंतर खींचना), तथा जिन अंगों का उपयोग बंद हो जाता है वे धीरे-धीरे अवशेषी (Vestigial) होकर विलुप्त हो जाते हैं (जैसे सांपों के पैर)।
  • उपार्जित लक्षणों की वंशागति: जीवनकाल में अर्जित लक्षण संतानों में जाते हैं।
  • खंडन: अगस्त वीज़मैन (August Weismann) ने 22 पीढ़ियों तक चूहों की पूंछ काटकर सिद्ध किया कि कायिक कोशिकाओं (Somatoplasm) में होने वाले उपार्जित परिवर्तन कभी वंशागत नहीं होते; केवल जननद्रव्य (Germplasm) में होने वाले परिवर्तन ही अगली पीढ़ी में संचरित होते हैं।

2. डार्विन का प्राकृतिक वरण का सिद्धांत (Darwinism - 1859):

चार्ल्स डार्विन ने 1859 में अपनी युगांतरकारी पुस्तक 'On the Origin of Species by Means of Natural Selection' प्रकाशित की। (अल्फ्रेड रसेल वॉलेस ने भी मलय द्वीप समूह में कार्य करते हुए स्वतंत्र रूप से इसी निष्कर्ष पर पहुंचे थे)। डार्विनवाद के प्रमुख स्तंभ:

  1. अत्यधिक संतानोत्पत्ति की क्षमता (Overproduction): सभी जीव ज्यामितीय अनुपात में तीव्र प्रजनन करते हैं।
  2. सीमित प्राकृतिक संसाधन (Limited Resources): भोजन और आवास सीमित होते हैं, अतः समष्टि का आकार स्थिर रहता है।
  3. जीवन संघर्ष (Struggle for Existence): सजातीय (Intraspecific - सबसे तीव्र), अंतरजातीय (Interspecific), तथा वातावरणीय संघर्ष।
  4. विभिन्नताएं (Variations): डार्विन के अनुसार विभिन्नताएं छोटी, क्रमिक तथा दिशात्मक (Continuous, small, directional) होती हैं।
  5. योग्यतम की उत्तरजीविता एवं प्राकृतिक वरण (Survival of the Fittest & Natural Selection): प्रकृति केवल उन्हीं जीवों का चयन करती है जो वातावरण के सर्वाधिक अनुकूल होते हैं; प्रतिकूल जीव नष्ट हो जाते हैं। सफल जीव अधिक संतानें छोड़ते हैं (विभेदक जनन / Differential reproduction)।

3. ह्यूगो डी व्रीज का उत्परिवर्तन सिद्धांत (Mutation Theory, 1901):

हॉलैंड के वैज्ञानिक ह्यूगो डी व्रीज ने सांध्य प्रिमरोज (Oenothera lamarckiana) पर प्रयोग करके उत्परिवर्तन सिद्धांत दिया:

लक्षणडार्विनवाद (Darwinism)डी व्रीज का उत्परिवर्तन सिद्धांत (Mutation Theory)
विभिन्नता का स्वरूपछोटी, धीमी, क्रमिक एवं निरंतर विभिन्नताएं।अचानक होने वाले बड़े, असतत एवं आकस्मिक परिवर्तन।
दिशात्मकतादिशात्मक (Directional) विकास।अयादृच्छिक एवं दिशाहीन (Random and Directionless)।
जाति उद्भवन की दरअनेक पीढ़ियों में क्रमिक, मंद विकास (Gradualism)।साल्टेशन (Saltation) — एकल पद बड़ा उत्परिवर्तन (Single-step large mutation) से तुरंत नई जाति का जन्म।

4. प्राकृतिक वरण की क्रियाविधि एवं हार्डी-वाइनबर्ग सिद्धांत

प्राकृतिक वरण का प्रत्यक्ष प्रमाण—औद्योगिक मेलेनिनता (Industrial Melanism):

इंग्लैंड में 1850 (औद्योगीकरण से पूर्व) तथा 1920 (औद्योगीकरण के पश्चात्) शलभ यानी पतंगे Biston betularia पर अध्ययन किया गया:

  • औद्योगीकरण से पूर्व (1850): पेड़ों के तनों पर सफेद लाइकेन (Lichens) उगे रहते थे। इस सफेद पृष्ठभूमि में सफेद पंखों वाले शलभ (Biston betularia typica) परभक्षी पक्षियों से छिप जाते थे (छलावरण / Camouflage), जबकि काले मेलेनिक शलभ (Biston betularia carbonaria) पक्षियों द्वारा आसानी से देखकर खा लिए जाते थे। अतः सफेद शलभों की संख्या बहुत अधिक थी।
  • औद्योगीकरण के पश्चात् (1920): कोयले के धुएं और कालिख से पेड़ काले पड़ गए तथा सल्फर डाइऑक्साइड प्रदूषण से लाइकेन नष्ट हो गए। अब काली पृष्ठभूमि में काले शलभ छिप गए और सफेद शलभ पक्षियों के शिकार बन गए! परिणामस्वरूप प्राकृतिक वरण द्वारा काले शलभों की आबादी अत्यधिक बढ़ गई। यह सिद्ध करता है कि प्रकृति सदैव उस रूप का वरण करती है जो बदले परिवेश में अधिक अनुकूलित हो।

प्राकृतिक वरण के तीन प्रकार (Types of Natural Selection):

  1. स्थिरकारी वरण (Stabilizing Selection): जब प्रकृति औसत या मध्यवर्ती लक्षणप्ररूपी (Mean character value) का चयन करती है तथा दोनों चरम सीमाओं (Extremes) को समाप्त कर देती है। लक्षण का वक्र संकरा और ऊंचा हो जाता है। उदाहरण: मानव नवजात शिशुओं का जन्म भार (2.5 से 3.5 किग्रा भार वाले बच्चों की जीवित रहने की दर सर्वाधिक होती है)।
  2. दिशात्मक वरण (Directional Selection): जब प्रकृति किसी एक चरम लक्षणप्ररूपी (One extreme value) का अनुकूलन मानकर वरण करती है। लक्षण का वक्र एक दिशा में खिसक जाता है। उदाहरण: औद्योगिक मेलेनिनता (काले शलभों की ओर झुकाव), जीवाणुओं में एंटीबायोटिक प्रतिरोधकता, मच्छरों में डीडीटी प्रतिरोधकता।
  3. विदारक / विखंडनकारी वरण (Disruptive Selection): जब प्रकृति दोनों चरम लक्षणप्ररूपों का एक साथ वरण करती है तथा मध्यवर्ती मान को अस्वीकार कर देती है। लक्षण के वक्र में दो शिखर (Two peaks) बन जाते हैं। यह नई प्रजातियों के उद्भवन (Speciation) का मुख्य कारक है।

हार्डी-वाइनबर्ग सिद्धांत (Hardy-Weinberg Principle, 1908):

ब्रिटिश गणितज्ञ जी. एच. हार्डी तथा जर्मन चिकित्सक विल्हेम वाइनबर्ग ने सिद्ध किया कि: 'एक बड़ी, यादृच्छिक मैथुन (Random mating) करने वाली समष्टि में जब तक कोई बाह्य विकासीय बल कार्य न करे, तब तक जीन आवृत्तियां (Allele Frequencies) पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थिर एवं अपरिवर्तित रहती हैं।' इसे आनुवंशिक साम्यता (Genetic Equilibrium) कहते हैं।

हार्डी-वाइनबर्ग समीकरण:

यदि एक द्विएलीलिक लोकस पर प्रभावी एलील '$A$' की आवृत्ति $p$ हो तथा अप्रभावी एलील '$a$' की आवृत्ति $q$ हो, तो:

$$p + q = 1$$

द्विपद प्रसार (Binomial Expansion) द्वारा समष्टि में तीनों जीनोटाइप की आवृत्तियां:

$$(p + q)^2 = p^2 + 2pq + q^2 = 1$$
  • $p^2$ = समयुग्मजी प्रभावी ($AA$) व्यक्तियों की आवृत्ति
  • $2pq$ = विषमयुग्मजी ($Aa$) व्यक्तियों की आवृत्ति
  • $q^2$ = समयुग्मजी अप्रभावी ($aa$) व्यक्तियों की आवृत्ति

हार्डी-वाइनबर्ग साम्यता को प्रभावित करने वाले 5 कारक:

  1. जीन प्रवाह / जीन पलायन (Gene Flow / Migration): समष्टि में नए जीवों का आगमन (आप्रवासन) या पलायन (उत्प्रवासन)।
  2. आनुवंशिक विचलन (Genetic Drift - सीवॉल राइट प्रभाव): छोटी समष्टियों में केवल संयोग (Chance) से किसी एलील की आवृत्ति में आकस्मिक तीव्र परिवर्तन।
    • संस्थापक प्रभाव (Founder Effect): जब किसी मूल समष्टि से कुछ जीव भटककर किसी नए निर्जन स्थान पर नई समष्टि बनाते हैं और उनका एलील अनुपात मूल समष्टि से भिन्न होकर नई जाति बना देता है।
    • बॉटलनैक प्रभाव (Bottleneck Effect): प्राकृतिक आपदा (बाढ़, आग, महामारी) से समष्टि की भारी तबाही के बाद बचे कुछ जीवों से समष्टि का पुनर्गठन।
  3. उत्परिवर्तन (Mutation): डीएनए में नए एलील्स का उद्भव।
  4. आनुवंशिक पुनर्योजन (Genetic Recombination): लैंगिक जनन में क्रॉसिंग ओवर द्वारा नवीन संयोजनों का निर्माण।
  5. प्राकृतिक वरण (Natural Selection): विभेदक प्रजनन द्वारा लाभकारी जीनों का प्रसार।

5. मानव का क्रमिक विकास (Origin and Evolution of Man)

मानव का विकास लगभग 1.5 करोड़ वर्ष पूर्व प्राइमेट्स पूर्वजों से प्रारंभ हुआ। मानव और कपियों (Chimpanzee, Gorilla) के पूर्वज समान थे। मानव विकास की मुख्य विशेषताएं: द्विपाद गमन (Bipedal locomotion - दो पैरों पर सीधा खड़ा होकर चलना), सीधी रीढ़ की हड्डी, कपाल गुहा (मस्तिष्क आकार) का निरंतर विस्तार, हाथों का औजार बनाने हेतु मुक्त होना, तथा विरोधी अंगूठा (Opposable thumb)।

मानव विकास का कालानुक्रमिक इतिहास:

  1. ड्रायोपिथेकस (Dryopithecus - लगभग 15 मिलियन वर्ष पूर्व):
    यह कपी (Ape) के समान था, इसके शरीर पर घने बाल थे, यह चार पैरों पर चलता था तथा पेड़ों पर रहता था।
  2. रामापिथेकस (Ramapithecus - लगभग 15 मिलियन वर्ष पूर्व):
    शिवालिक पहाड़ियों (भारत) तथा अफ्रीका से इसके जीवाश्म मिले। यह मानव के अधिक समान (More man-like) था, सीधा खड़ा होकर चलता था तथा इसके दांत मानव समान थे।
  3. ऑस्ट्रेलोपिथेकस (Australopithecus - लगभग 2 मिलियन वर्ष पूर्व):
    पूर्वी अफ्रीका के घास के मैदानों में रहता था (प्रसिद्ध जीवाश्म 'लूसी' / Lucy)। यह पत्थर के हथियारों से शिकार करता था किंतु मुख्यतः फलाहारी (फल खाने वाला) था। यह पूर्णतः सीधा खड़ा होकर चलता था।
  4. होमो हैबिलिस (Homo habilis - प्रथम मानव-समान प्राणी):
    इसे 'कारीगर मानव' (Tool maker man / Handy man) कहते हैं।
    • कपाल गुहा (मस्तिष्क क्षमता): 650 से 800 cc (Cranial Capacity)।
    • यह संभवतः मांस नहीं खाता था (शाकाहारी)।
  5. होमो इरेक्टस (Homo erectus - लगभग 1.5 मिलियन वर्ष पूर्व):
    1891 में जावा में इसका जीवाश्म खोजा गया (जावा मानव)।
    • कपाल गुहा: लगभग 900 cc।
    • यह सीधा चलता था और स्पष्ट रूप से मांस खाता था (Carnivorous)। इसने अग्नि का प्रथम उपयोग सीखा।
  6. निएंडरथल मानव (Homo neanderthalensis - 1,00,000 से 40,000 वर्ष पूर्व):
    पूर्वी एवं मध्य एशिया में रहता था।
    • कपाल गुहा: लगभग 1400 cc (आधुनिक मानव के लगभग बराबर)।
    • अपने शरीर की रक्षा हेतु जानवरों की खाल के वस्त्र पहनता था तथा मृतकों को कब्रों में धार्मिक रीति से दफनाता था।
  7. होमो सेपियंस (Homo sapiens - आधुनिक मानव):
    हिमयुग (Ice Age) के दौरान 75,000 से 10,000 वर्ष पूर्व अफ्रीका में आधुनिक Homo sapiens का उदय हुआ और वे विभिन्न महाद्वीपों में फैले।
    • प्रागैतिहासिक गुफा कला (Prehistoric cave art) लगभग 18,000 वर्ष पूर्व विकसित हुई (उदा. भीमबेटका, म.प्र.)।
    • कृषि (Agriculture) तथा मानव बस्तियों की स्थापना लगभग 10,000 वर्ष पूर्व प्रारंभ हुई, जहाँ से मानव सभ्यता का लिखित इतिहास प्रारंभ होता है।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

हार्डी-वाइनबर्ग एलील आवृत्ति समीकरण
p + q = 1
p = प्रभावी एलील (A) की आवृत्ति, q = अप्रभावी एलील (a) की आवृत्ति
हार्डी-वाइनबर्ग जीनोटाइप आवृत्ति समीकरण
p² + 2pq + q² = 1
p² = AA (समयुग्मजी प्रभावी), 2pq = Aa (विषमयुग्मजी), q² = aa (समयुग्मजी अप्रभावी)
मिलर-उरे गैस मिश्रण अनुपात
CH₄ : NH₃ : H₂ = 2 : 1 : 2 (जलवाष्प H₂O के साथ, 800°C पर)
अमीनो अम्ल उत्पाद: ग्लाइसीन, ऐलैनिन, एस्पार्टिक एसिड
मानव पूर्वज कपाल गुहा (Cranial Capacity) मान
होमो हैबिलिस = 650-800 cc | होमो इरेक्टस = 900 cc | निएंडरथल = 1400 cc | आधुनिक मानव = ~1350-1450 cc
NEET-UG का अत्यंत महत्वपूर्ण स्मृति आधारित तथ्य

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
एक यादृच्छिक संकरण करने वाली समष्टि में समयुग्मजी अप्रभावी जीनोटाइप ($aa$) की आवृत्ति 16% (0.16) है। हार्डी-वाइनबर्ग सिद्धांत के अनुसार विषमयुग्मजी जीनोटाइप ($Aa$) तथा समयुग्मजी प्रभावी जीनोटाइप ($AA$) की आवृत्ति ज्ञात कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

गणना:

  1. हार्डी-वाइनबर्ग समीकरण के अनुसार समयुग्मजी अप्रभावी जीनोटाइप ($aa$) की आवृत्ति $q^2$ होती है:
    $$q^2 = 0.16$$
  2. अतः अप्रभावी एलील '$a$' की आवृत्ति $q$ होगी:
    $$q = \sqrt{0.16} = 0.4$$
  3. चूंकि $p + q = 1$ होता है, अतः प्रभावी एलील '$A$' की आवृत्ति $p$ होगी:
    $$p = 1 - q = 1 - 0.4 = 0.6$$
  4. अब, समयुग्मजी प्रभावी ($AA$) जीनोटाइप की आवृत्ति ($p^2$):
    $$p^2 = (0.6)^2 = 0.36 \quad (\text{अर्थात् } 36\%)$$
  5. विषमयुग्मजी ($Aa$) जीनोटाइप की आवृत्ति ($2pq$):
    $$2pq = 2 \times 0.6 \times 0.4 = 0.48 \quad (\text{अर्थात् } 48\%)$$
  6. सत्यापन: $p^2 + 2pq + q^2 = 0.36 + 0.48 + 0.16 = 1.00$ (100%)।

उत्तर: विषमयुग्मजी ($Aa$) की आवृत्ति 48% (0.48) तथा समयुग्मजी प्रभावी ($AA$) की आवृत्ति 36% (0.36) होगी।

अंक योजना (Marking Scheme): q² = 0.16 से q = 0.4 निकालने पर (1 अंक) + p = 0.6 निकालने पर (1 अंक) + p² = 0.36 तथा 2pq = 0.48 निकालने पर (1 अंक) = कुल 3 अंक।
उदाहरण 2
समजात अंग (Homologous organs) तथा समवृत्ति अंग (Analogous organs) में अंतर स्पष्ट कीजिए। प्रत्येक का एक-एक पादप एवं एक-एक जंतु उदाहरण दीजिए। यह अपसारी एवं अभिसारी विकास को कैसे प्रमाणित करते हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

लक्षणसमजात अंग (Homologous Organs)समवृत्ति अंग (Analogous Organs)
परिभाषावे अंग जिनकी आंतरिक संरचना एवं भ्रूणीय उत्पत्ति समान होती है, किंतु भिन्न कार्यों हेतु अनुकूलित होते हैं।वे अंग जिनकी आंतरिक संरचना एवं उत्पत्ति भिन्न होती है, किंतु वे समान कार्य करते हैं।
विकास का प्रकारअपसारी विकास (Divergent Evolution) — एक मूल पूर्वज से विभिन्न दिशाओं में अनुकूलन।अभिसारी विकास (Convergent Evolution) — भिन्न पूर्वजों का एक समान आवास हेतु अनुकूलन।
जंतु उदाहरणमानव के हाथ, व्हेल के फ्लिपर, चीते के पैर एवं चमगादड़ के पंख (सभी में एक समान अस्थि विन्यास: ह्यूमरस, रेडियस, अल्ना)।तितली के पंख एवं चमगादड़ के पंख (दोनों उड़ने का कार्य करते हैं, किंतु तितली के पंख में अस्थियां नहीं होतीं)।
पादप उदाहरणबोगेनविलिया के कांटे तथा कुकरबिटा के प्रतान (दोनों कक्षीय कलिका के रूपांतरण हैं)।शकरकंद (रूपांतरित जड़) तथा सामान्य आलू (रूपांतरित तना) — दोनों भोजन संचय करते हैं।
अंक योजना (Marking Scheme): परिभाषा व अपसारी/अभिसारी विकास का संबंध (1.5 अंक) + जंतु एवं पादप उदाहरण (1.5 अंक) = कुल 3 अंक।
उदाहरण 3
स्टेनली मिलर के प्रयोग का सुस्पष्ट नामांकित चित्र बनाइए तथा इस प्रयोग द्वारा ओपेरिन-हाल्डेन के रासायनिक विकास सिद्धांत के सत्यापन की व्याख्या कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. उपकरण का विन्यास: मिलर ने निर्वातित कांच के बंद तंत्र में टंगस्टन इलेक्ट्रोडों द्वारा 75,000V का विद्युत स्पार्क उत्पन्न किया।
  2. गैसें एवं तापमान: फ्लास्क में $CH_4, NH_3, H_2$ ($2:1:2$ अनुपात में) तथा जलवाष्प ($H_2O$) लेकर तापमान $800^\circ\text{C}$ रखा गया।
  3. प्रक्रिया: उबलते जल के फ्लास्क से भाप लगातार प्रवाहित की गई तथा गैसीय उत्पादों को संघनित्र द्वारा ठंडा करके यू-आकार की नली में एकत्र किया गया।
  4. रासायनिक निष्कर्ष: एक सप्ताह बाद एकत्र द्रव का विश्लेषण करने पर उसमें ग्लाइसीन, ऐलैनिन, एस्पार्टिक एसिड जैसे अमीनो अम्ल मिले।
  5. सिद्धांत का सत्यापन: इस प्रयोग ने सिद्ध किया कि आदिम पृथ्वी पर विद्यमान अपचायक वातावरण में अकार्बनिक गैसों से बिजली कड़कने और पराबैंगनी विकिरण द्वारा स्वतः जटिल कार्बनिक यौगिक (अमीनो अम्ल) बन सकते थे, जो जीवन की आधारशिला हैं।
अंक योजना (Marking Scheme): नामांकित चित्र/वर्णन (1.5 अंक) + गैसों का अनुपात व 800°C तापमान (1.5 अंक) + प्राप्त अमीनो अम्ल व निष्कर्ष (2 अंक) = कुल 5 अंक।
उदाहरण 4
अनुकूली विकिरण (Adaptive Radiation) से आप क्या समझते हैं? गैलापागोस द्वीप समूह की डार्विन फिंचों के संदर्भ में इस परिघटना की विस्तृत विवेचना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. परिभाषा: किसी एक भौगोलिक क्षेत्र में एक मूल पूर्वज प्रजाति से प्रारंभ होकर विभिन्न पारिस्थितिक आवासों एवं जीवन-शैलियों के अनुकूलन हेतु अनेक नवीन प्रजातियों के क्रमिक विकिरण को अनुकूली विकिरण कहते हैं।
  2. डार्विन की फिंचों का अध्ययन:
    • 1835 में एच. एम. एस. बीगल जहाज की यात्रा के दौरान चार्ल्स डार्विन ने दक्षिण अमेरिकी तट से 900 किमी दूर स्थित गैलापागोस द्वीप समूह पर छोटी काली चिड़ियों (फिंचों) की आश्चर्यजनक विविधता देखी।
    • मूल रूप से दक्षिण अमेरिका की मुख्य भूमि से एक सामान्य बीज-भक्षी फिंच (Seed-eating ground finch) इन द्वीपों पर पहुंची थी।
    • अलग-अलग द्वीपों पर विभिन्न प्रकार के खाद्य संसाधन उपलब्ध थे (जैसे कैक्टस, कठोर बीज, वृक्षों की छाल के कीड़े, फल आदि)।
    • प्रतिस्पर्धा से बचने हेतु प्राकृतिक वरण के प्रभाव से फिंचों की चोंच के आकार और माप में रूपांतरण हुआ:
      • कुछ की चोंच कठोर बीज फोड़ने हेतु मोटी और मजबूत हो गई,
      • कुछ की चोंच कीड़ों को पकड़ने हेतु नुकीली और पतली (Warbler-like) हो गई,
      • कुछ कैक्टस के कांटे निकालने वाली तथा कुछ शाकाहारी फलभक्षी बन गईं।
  3. निष्कर्ष: इस प्रकार एक ही पूर्वज प्रजाति से 13 से अधिक विभिन्न प्रजातियां विकसित हो गईं, जो अनुकूली विकिरण और अपसारी विकास का उत्कृष्ट प्रमाण है।
अंक योजना (Marking Scheme): अनुकूली विकिरण की सटीक परिभाषा (1.5 अंक) + डार्विन की फिंचों के मूल रूप व चोंच के अनुकूलनों की व्याख्या (2 अंक) + अपसारी विकास का निष्कर्ष (0.5 अंक) = कुल 4 अंक।
उदाहरण 5
मानव विकास के विभिन्न चरणों का उनके मस्तिष्क क्षमता (Cranial Capacity) तथा मुख्य लक्षणों के आधार पर कालानुक्रमिक सारणीबद्ध विवरण दीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: मानव विकास का कालानुक्रमिक विवरण:

मानव पूर्वजसमय (काल)कपाल गुहा (Cranial Capacity)मुख्य लक्षण एवं आहार
ड्रायोपिथेकस~15 मिलियन वर्ष पूर्वअल्पविकसित (~400 cc)कपी-समान, घने बालों वाला, चार पैरों पर चलने वाला।
रामापिथेकस~15 मिलियन वर्ष पूर्वअल्पविकसित (~450 cc)मानव-समान, सीधा चलने वाला, दंत विन्यास मानव सदृश।
ऑस्ट्रेलोपिथेकस~2 मिलियन वर्ष पूर्व~500 ccसीधा खड़ा द्विपाद गमन, पत्थर के औजार, फलाहारी।
होमो हैबिलिस~2 से 1.5 मिलियन वर्ष पूर्व650 – 800 ccप्रथम मानव-समान प्राणी (Tool maker), शाकाहारी (मांस नहीं खाता था)।
होमो इरेक्टस~1.5 मिलियन वर्ष पूर्व~900 ccजावा मानव, पूर्ण सीधा गमन, मांसाहारी, अग्नि का उपयोग।
निएंडरथल मानव1,00,000 से 40,000 वर्ष पूर्व~1400 ccखाल के वस्त्र, मृतकों को दफनाना, गुहावासी।
होमो सेपियंस75,000 वर्ष पूर्व से वर्तमान~1350 – 1450 ccआधुनिक प्रबुद्ध मानव, भाषा, गुफा चित्रकला (18,000 वर्ष), कृषि (10,000 वर्ष)।
अंक योजना (Marking Scheme): सभी 7 पूर्वजों का सही कालक्रम (1 अंक) + होमो हैबिलिस, इरेक्टस, निएंडरथल की कपाल गुहा (1.5 अंक) + आहार व मुख्य लक्षणों की तुलना (1.5 अंक) = कुल 4 अंक।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

समजात और समवृत्ति अंगों में 'अपसारी' और 'अभिसारी' विकास को उलट देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

समजात अंग = अपसारी विकास (Homologous = Divergent, HD); समवृत्ति अंग = अभिसारी विकास (Analogous = Convergent, AC)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

होमो हैबिलिस को मांसाहारी लिख देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

एनसीईआरटी के अनुसार होमो हैबिलिस संभवतः मांस नहीं खाता था (शाकाहारी था); जबकि होमो इरेक्टस स्पष्ट रूप से मांस खाता था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

हार्डी-वाइनबर्ग में p और p² में अंतर न समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

p और q एलील की आवृत्तियां हैं; जबकि p², 2pq और q² जीनोटाइप (व्यक्तियों) की आवृत्तियां हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

आदिम पृथ्वी के वायुमंडल को ऑक्सीकारक (Oxidizing) समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

आदिम पृथ्वी का वायुमंडल अपचायक (Reducing) था क्योंकि उसमें मुक्त ऑक्सीजन (O₂) का पूर्ण अभाव था।

जैव विकास के प्रमुख मील के पत्थर एवं मानव विकास (Evolution & Human Lineage)

जैव विकास का समग्र वैज्ञानिक परिदृश्य (Evolutionary Biology)जीवन की उत्पत्ति • मिलर-उरे प्रयोग • समजातता • हार्डी-वाइनबर्ग • मानव विकास1. जीवन की उत्पत्तिआदिम पृथ्वी वातावरण:• 4.5 अरब वर्ष पूर्व उत्पत्ति• अपचायक वातावरण (No Free O₂)• तप्त तनु सूप (Haldane Soup)मिलर-उरे प्रयोग (1953):• स्पार्क डिस्चार्ज (800°C)• CH₄ : NH₃ : H₂ = 2:1:2 + H₂O• उत्पाद: अमीनो अम्ल (ग्लाइसीन, एलानिन, एस्पार्टिक)रासायनिक विकास का प्रत्यक्ष प्रमाण2. विकास के प्रमाणसमजात अंग (Homologous):• उत्पत्ति समान, कार्य भिन्न• अपसारी विकास (Divergent)• मानव हाथ, व्हेल फ्लिपर, चमगादड़समवृत्ति अंग (Analogous):• उत्पत्ति भिन्न, कार्य समान• अभिसारी विकास (Convergent)• तितली व पक्षी के पंखअनुकूली विकिरण:• डार्विन की फिंचें (Galapagos)• ऑस्ट्रेलियाई मार्सुपियल्स3. हार्डी-वाइनबर्ग नियमसंतुलन समीकरण:• p + q = 1• p² + 2pq + q² = 1 p² = AA, 2pq = Aa, q² = aaसंतुलन को बदलने वाले कारक:1. जीन प्रवाह / आप्रवासन2. आनुवंशिक विचलन (Genetic Drift) (संस्थापक व बॉटलनैक प्रभाव)3. उत्परिवर्तन (Mutation)4. आनुवंशिक पुनर्योजन5. प्राकृतिक वरण (3 प्रकार)औद्योगिक मेलेनिनता = दिशात्मक वरण4. मानव का विकासरामापिथेकस (~15 mya):• अधिक मानव समान, सीधा गमनऑस्ट्रेलोपिथेकस (~2 mya):• ~500 cc, पत्थर औजार, फलभक्षीहोमो हैबिलिस (प्रथम मानव):• 650-800 cc, शाकाहारीहोमो इरेक्टस (~1.5 mya):• 900 cc, मांसाहारी, अग्नि खोजनिएंडरथल (1 लाख वर्ष पूर्व):• 1400 cc, मृतकों को दफनानाहोमो सेपियंस (आधुनिक):• 75,000-10,000 वर्ष पूर्व• गुफा कला व कृषि का विकास

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
पृथ्वी की उत्पत्ति 4.5 अरब वर्ष पूर्व हुई; आदिम वायुमंडल अपचायक था जिसमें स्वतंत्र ऑक्सीजन अनुपस्थित थी।
मुख्य बिंदु 2
ओपेरिन-हाल्डेन के रासायनिक विकास सिद्धांत का प्रायोगिक सत्यापन मिलर और उरे (1953) ने 800°C पर CH₄, NH₃, H₂ के मिश्रण से अमीनो अम्ल बनाकर किया।
मुख्य बिंदु 3
समजात अंग (उत्पत्ति समान, कार्य भिन्न) अपसारी विकास दर्शाते हैं; समवृत्ति अंग (उत्पत्ति भिन्न, कार्य समान) अभिसारी विकास दर्शाते हैं।
मुख्य बिंदु 4
गैलापागोस द्वीप समूह पर डार्विन की फिंचें अनुकूली विकिरण (Adaptive Radiation) का सजीव उदाहरण हैं।
मुख्य बिंदु 5
लैमार्क ने उपार्जित लक्षणों की वंशागति दी जिसे वीज़मैन ने जननद्रव्य सिद्धांत द्वारा नकारा; डार्विन ने प्राकृतिक वरण तथा ह्यूगो डी व्रीज ने साल्टेशन/उत्परिवर्तन दिया।
मुख्य बिंदु 6
इंग्लैंड में औद्योगिक मेलेनिनता (Biston betularia) दिशात्मक प्राकृतिक वरण का उत्कृष्ट प्रमाण है।
मुख्य बिंदु 7
हार्डी-वाइनबर्ग साम्यता (p² + 2pq + q² = 1) स्थिर रहती है जब तक जीन प्रवाह, आनुवंशिक विचलन, उत्परिवर्तन, पुनर्योजन या प्राकृतिक वरण न हो।
मुख्य बिंदु 8
आनुवंशिक विचलन (Genetic Drift) छोटी समष्टियों में होता है तथा संस्थापक प्रभाव व बॉटलनैक प्रभाव उत्पन्न करता है।
मुख्य बिंदु 9
प्राकृतिक वरण के तीन प्रकार हैं: स्थिरकारी (औसत का वरण), दिशात्मक (एक चरम का वरण), तथा विदारक (दो चरमों का वरण)।
मुख्य बिंदु 10
मानव विकास का क्रम: ड्रायोपिथेकस → रामापिथेकस → ऑस्ट्रेलोपिथेकस → होमो हैबिलिस (650-800 cc) → होमो इरेक्टस (900 cc) → निएंडरथल (1400 cc) → होमो सेपियंस।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
स्टेनली मिलर के प्रयोग में फ्लास्क में मेथेन, अमोनिया तथा हाइड्रोजन गैसों का अनुपात क्या था?
(A) 2 : 1 : 2
(B) 1 : 2 : 1
(C) 2 : 2 : 1
(D) 1 : 1 : 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: A
मिलर ने CH₄, NH₃ तथा H₂ को 2:1:2 के अनुपात में 800°C पर जलवाष्प के साथ विद्युत विसर्जन हेतु प्रयुक्त किया था।
2
बोगेनविलिया के कांटे तथा कुकरबिटा के प्रतान किस प्रकार के अंगों के उदाहरण हैं?
(A) समवृत्ति अंग (Analogous organs)
(B) समजात अंग (Homologous organs)
(C) अवशेषी अंग (Vestigial organs)
(D) संयोजी कड़ी
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
दोनों ही कक्षीय कलिका (Axillary bud) के रूपांतरण हैं (समान उत्पत्ति), अतः ये समजात अंग और अपसारी विकास के उदाहरण हैं।
3
हार्डी-वाइनबर्ग साम्यता में यदि समयुग्मजी अप्रभावी जीनोटाइप की आवृत्ति 0.09 है, तो विषमयुग्मजी (Aa) की आवृत्ति क्या होगी?
(A) 0.42
(B) 0.49
(C) 0.21
(D) 0.70
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: A
q² = 0.09 ⇒ q = 0.3 ⇒ p = 1 - 0.3 = 0.7 ⇒ विषमयुग्मजी 2pq = 2 × 0.7 × 0.3 = 0.42।
4
प्रथम मानव-समान प्राणी 'होमो हैबिलिस' (Homo habilis) की कपाल गुहा (मस्तिष्क क्षमता) कितनी थी?
(A) 650 – 800 cc
(B) 900 cc
(C) 1400 cc
(D) 500 cc
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: A
होमो हैबिलिस की कपाल गुहा 650–800 cc थी (होमो इरेक्टस की 900 cc तथा निएंडरथल की 1400 cc थी)।
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कक्षा 12 Biology के सभी अध्याय

अध्याय 1: पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन (Sexual Reproduction in Flowering Plants) अध्याय 2: मानव जनन (Human Reproduction) (Human Reproduction) अध्याय 3: जनन स्वास्थ्य (Reproductive Health) (Reproductive Health) अध्याय 4: वंशागति तथा विविधता के सिद्धांत (Principles of Inheritance and Variation) अध्याय 5: वंशागति के आणविक आधार (Molecular Basis of Inheritance) अध्याय 6: विकास (Evolution) (Evolution) अध्याय 7: मानव स्वास्थ्य और रोग (Human Health and Disease) अध्याय 8: मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव (Microbes in Human Welfare) अध्याय 9: जैव प्रौद्योगिकी - सिद्धांत व प्रक्रम (Biotechnology: Principles and Processes) अध्याय 10: जैव प्रौद्योगिकी एवं इसके अनुप्रयोग (Biotechnology and its Applications) अध्याय 11: जीव और समष्टियां (Organisms and Populations) अध्याय 12: पारितंत्र (Ecosystem) (Ecosystem) अध्याय 13: जैव विविधता एवं संरक्षण (Biodiversity and Conservation)

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