ग्रेगर मेंडल ने उद्यान मटर (Pisum sativum) को अपने प्रयोगों के लिए चुना क्योंकि इसमें स्पष्ट विपर्यासी लक्षण (Contrasting Traits) उपस्थित थे, यह एकवर्षीय शाकीय पौधा था जिसका जीवन चक्र छोटा था, इसमें प्राकृतिक रूप से स्वपरागण होता था किंतु कृत्रिम रूप से विपुंसन (Emasculation) एवं थैलीकरण (Bagging) द्वारा परपरागण सरलतापूर्वक कराया जा सकता था, तथा संकरण से प्राप्त बीज पूर्णतः जननक्षम (Fertile) थे।
मटर के सात विपर्यासी लक्षण (Seven Contrasting Characters):
- तने की ऊंचाई: लंबा (Tall, $T$ - प्रभावी) बनाम बौना (Dwarf, $t$ - अप्रभावी)
- फूल का रंग: बैंगनी (Violet - प्रभावी) बनाम सफेद (White - अप्रभावी)
- फूल की स्थिति: अक्षीय (Axial - प्रभावी) बनाम अंत्य (Terminal - अप्रभावी)
- फली का आकार: फूली हुई (Inflated - प्रभावी) बनाम संकुचित (Constricted - अप्रभावी)
- फली का रंग: हरा (Green - प्रभावी) बनाम पीला (Yellow - अप्रभावी)
- बीज का आकार: गोल (Round, $R$ - प्रभावी) बनाम झुर्रीदार (Wrinkled, $r$ - अप्रभावी)
- बीज का रंग (बीजपत्र): पीला (Yellow, $Y$ - प्रभावी) बनाम हरा (Green, $y$ - अप्रभावी)
एकसंकर संकरण (Monohybrid Cross):
जब एक समय में केवल एक ही लक्षण की वंशागति का अध्ययन किया जाता है, तो उसे एकसंकर संकरण कहते हैं। मेंडल ने शुद्ध लंबे ($TT$) और शुद्ध बौने ($tt$) पौधों के बीच संकरण कराया। प्रथम संतति पीढ़ी ($F_1$) में सभी पौधे लंबे ($Tt$) प्राप्त हुए। जब $F_1$ पौधों में स्वपरागण (Selfing) कराया गया, तो द्वितीय संतति पीढ़ी ($F_2$) में लंबे और बौने दोनों प्रकार के पौधे प्राप्त हुए:
- फीनोटाइपिक अनुपात (Phenotypic Ratio): $3 : 1$ (3 लंबे : 1 बौना)
- जीनोटाइपिक अनुपात (Genotypic Ratio): $1 : 2 : 1$ ($1\,TT : 2\,Tt : 1\,tt$)
एकसंकर संकरण से प्रतिपादित नियम:
- प्रभाविता का नियम (Law of Dominance): लक्षणों का नियंत्रण विविक्त इकाइयों द्वारा होता है जिन्हें कारक (जीन) कहते हैं। कारक सदैव जोड़ों (Pairs) में पाए जाते हैं। विषमयुग्मजी अवस्था ($Tt$) में कारक युग्म का एक सदस्य दूसरे पर प्रभावी (Dominant) होता है और अप्रभावी (Recessive) कारक के प्रभाव को दबा देता है।
- विसंयोजन अथवा विसंकेतन का नियम (Law of Segregation): इसे 'युग्मकों की शुद्धता का नियम' (Law of Purity of Gametes) भी कहते हैं। जनक में दोनों युग्मविकल्पी (Alleles) उपस्थित होते हैं, किंतु युग्मक निर्माण (Meiosis) के समय गुणसूत्र अलग हो जाते हैं, जिससे प्रत्येक युग्मक में दो में से केवल एक ही युग्मविकल्पी प्रवेश करता है। यह नियम सार्वभौमिक (Universal) है और इसका कोई अपवाद नहीं है।
परीक्षार्थ संकरण (Test Cross):
अज्ञात जीनोटाइप वाले प्रभावी लक्षणप्ररूपी पौधे ($TT$ अथवा $Tt$) का संकरण जब समयुग्मजी अप्रभावी जनक ($tt$) के साथ कराया जाता है, तो उसे टेस्ट क्रॉस कहते हैं। यदि संतति में 100% पौधे लंबे प्राप्त हों, तो अज्ञात जनक समयुग्मजी ($TT$) है। यदि लंबे और बौने का अनुपात $1:1$ प्राप्त हो, तो अज्ञात जनक विषमयुग्मजी ($Tt$) है।