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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा XII • Biology • अध्याय 4
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

वंशागति तथा विविधता के सिद्धांत (Principles of Inheritance and Variation)

आनुवंशिकी (Genetics) जीवविज्ञान की वह अत्यंत महत्वपूर्ण शाखा है जो सजीवों में लक्षणों के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में संचरण अर्थात् वंशागति (Inheritance / Heredity) तथा जनकों एवं उनकी संतानों के मध्य उपस्थित असमानताओं अर्थात् विविधता (Variation) के जैविक, रासायनिक एवं सांख्यिकीय नियमों का गहन अध्ययन करती है। ऑस्ट्रियाई पादरी एवं महान प्रकृतिविज्ञानी ग्रेगर जोहान मेंडल (Gregor Johann Mendel, 1822–1884) को आनुवंशिकी का जनक (Father of Genetics) कहा जाता है, जिन्होंने उद्यान मटर (Pisum sativum) के सात विपर्यासी लक्षणों पर 1856 से 1863 तक संकरण प्रयोग करके आनुवंशिकी के मूलभूत नियमों की सुदृढ़ नींव रखी। प्रस्तुत अध्याय आनुवंशिकी के ऐतिहासिक प्रयोगों से लेकर आधुनिक गुणसूत्रीय एवं आणविक सिद्धांतों का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है: 1. मेंडल के वंशागति के नियम: एक जीन की वंशागति (मोनोहाइब्रिड क्रॉस) के आधार पर प्रभाविता का नियम (Law of Dominance) तथा युग्मकों के विसंयोजन अथवा शुद्धता का नियम (Law of Segregation); दो जीनों की वंशागति (डाइहाइब्रिड क्रॉस) के आधार पर स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment)। 2. मेंडलवाद के विचलन (Post-Mendelian Genetics): अपूर्ण प्रभाविता (Incomplete Dominance) जैसे श्वानपुष्प (स्नैपड्रैगन / Antirrhinum majus), सहप्रभाविता (Codominance) एवं बहुविकल्पता (Multiple Allelism) जैसे मानव ABO रक्त समूह (जीन $I^A, I^B, i$), तथा बहुजीनी वंशागति (Polygenic Inheritance) व प्लीओट्रॉपी (Pleiotropy)। 3. वंशागति का गुणसूत्र सिद्धांत: सटन एवं बोवेरी (Sutton & Boveri, 1902) द्वारा गुणसूत्रों एवं मेंडेलियन कारकों के समानांतर व्यवहार का प्रतिपादन, तथा टी. एच. मॉर्गन (T.H. Morgan) द्वारा फलमक्खी (Drosophila melanogaster) पर प्रायोगिक सत्यापन, सहलग्नता (Linkage) एवं पुनर्योजन (Recombination)। 4. लिंग निर्धारण एवं उत्परिवर्तन: मानव में XX-XY, पक्षियों में ZZ-ZW, टिड्डों में XX-XO तथा मधुमक्खियों में अगुणित-द्विगुणित (Haplodiploid) प्रणाली; जीन उत्परिवर्तन (बिंदु उत्परिवर्तन / Point Mutation) एवं फ्रेमशिफ्ट उत्परिवर्तन। 5. वंशावली विश्लेषण (Pedigree Analysis) एवं आनुवंशिक विकार: मेंडेलियन विकार (हीमोफीलिया, सिकल सेल एनीमिया, फिनाइलकेटोन्यूरिया, थैलेसीमिया) तथा गुणसूत्रीय विकार (डाउन सिंड्रोम, क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम, टर्नर सिंड्रोम)।

मटर के दानों से लेकर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग तक: मेंडल के उन गुप्त प्रयोगों का रहस्य जो 35 वर्षों तक दुनिया से छिपे रहे!

क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि जिस वैज्ञानिक ने आधुनिक आनुवंशिकी और जैव-प्रौद्योगिकी की नींव रखी, उसे जीते जी कभी कोई सम्मान नहीं मिला? 1865 में जब ग्रेगर मेंडल ने मटर के पौधों पर अपने गणितीय परिणाम प्रकाशित किए, तो उस समय के जीवविज्ञानी यह समझ ही नहीं पाए कि पौधों के जीवन को गणित और प्रायिकता (Probability) से कैसे समझाया जा सकता है! 1900 में—मेंडल की मृत्यु के 16 वर्ष बाद—जब तीन वैज्ञानिकों (डी व्रीस, कोरेंस और शेरमाक) ने स्वतंत्र रूप से मेंडल के नियमों को पुनर्खोजा, तब जाकर दुनिया को अहसास हुआ कि आंखों का रंग, बालों की बनावट, रक्त समूह, और यहाँ तक कि हीमोफीलिया जैसी जानलेवा बीमारियां भी इन्हीं अचूक गणितीय नियमों से नियंत्रित होती हैं!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

JAC बोर्ड, CBSE तथा NEET-UG मेडिकल परीक्षा में यह अध्याय आनुवंशिकी इकाई का सबसे अधिक अंक भार (8 से 10 अंक) वाला अध्याय है: 1. 5-अंकीय दीर्घ उत्तरीय प्रश्न: मेंडल के द्विसंकर संकरण (Dihybrid Cross) का चेकर बोर्ड सहित वर्णन, अथवा वंशागति का गुणसूत्र सिद्धांत और मॉर्गन का सहलग्नता प्रयोग। 2. 3-अंकीय लघु उत्तरीय प्रश्न: अपूर्ण प्रभाविता बनाम सहप्रभाविता में अंतर, मानव में ABO रक्त समूह की वंशागति, अथवा सिकल सेल एनीमिया में बिंदु उत्परिवर्तन का आणविक कारण। 3. NEET-UG का हॉटस्पॉट: आनुवंशिक अनुपात ($3:1, 1:2:1, 9:3:3:1, 9:7, 12:3:1$), वंशावली चार्ट (Pedigree Analysis) की पहचान, तथा क्लाइनफेल्टर ($44+XXY$), टर्नर ($44+XO$), और डाउन सिंड्रोम (ट्राइसोमी 21) के गुणसूत्रीय संघटन पर हर वर्ष 4–5 प्रश्न निश्चित रूप से पूछे जाते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • कोशिका विभाजन: अर्धसूत्री विभाजन प्रथम में समजात गुणसूत्रों (Homologous Chromosomes) का युग्मन एवं क्रॉसिंग ओवर।
  • जीन, युग्मविकल्पी (Allele), समयुग्मजी (Homozygous), एवं विषमयुग्मजी (Heterozygous) की मूलभूत शब्दावली।
  • प्रायिकता (Probability) एवं बुनियादी बीजीय अनुपातों की समझ।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • मेंडल के एकसंकर एवं द्विसंकर संकरण के जीनोटाइपिक व फीनोटाइपिक अनुपातों की गणना करना।
  • सहलग्नता (Linkage) और स्वतंत्र अपव्यूहन (Independent Assortment) के बीच मूलभूत अंतर को स्पष्ट करना।
  • मानव में लिंग निर्धारण तथा विभिन्न जीवों (कीट, पक्षी, मधुमक्खी) में लिंग निर्धारण प्रणालियों का सचित्र विश्लेषण करना।
  • बिंदु उत्परिवर्तन के आणविक आधार (जैसे हीमोग्लोबिन की बीटा-शृंखला में GAG से GUG परिवर्तन) को समझाना।
  • वंशावली चार्ट (Pedigree) का विश्लेषण कर आनुवंशिक विकार के प्रकार (ऑटोसोमल प्रभावी/अप्रभावी, लिंग-सहलग्न) का सटीक निर्धारण करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. मेंडल के वंशागति के नियम एवं एकस...
2 2. द्विसंकर संकरण एवं मेंडलवाद के व...
3 3. वंशागति का गुणसूत्र सिद्धांत, सह...
4 4. लिंग निर्धारण की क्रियाविधियां (...
5 5. आनुवंशिक विकार एवं वंशावली विश्ल...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. मेंडल के वंशागति के नियम एवं एकसंकर संकरण (Monohybrid Cross)

ग्रेगर मेंडल ने उद्यान मटर (Pisum sativum) को अपने प्रयोगों के लिए चुना क्योंकि इसमें स्पष्ट विपर्यासी लक्षण (Contrasting Traits) उपस्थित थे, यह एकवर्षीय शाकीय पौधा था जिसका जीवन चक्र छोटा था, इसमें प्राकृतिक रूप से स्वपरागण होता था किंतु कृत्रिम रूप से विपुंसन (Emasculation) एवं थैलीकरण (Bagging) द्वारा परपरागण सरलतापूर्वक कराया जा सकता था, तथा संकरण से प्राप्त बीज पूर्णतः जननक्षम (Fertile) थे।

मटर के सात विपर्यासी लक्षण (Seven Contrasting Characters):

  • तने की ऊंचाई: लंबा (Tall, $T$ - प्रभावी) बनाम बौना (Dwarf, $t$ - अप्रभावी)
  • फूल का रंग: बैंगनी (Violet - प्रभावी) बनाम सफेद (White - अप्रभावी)
  • फूल की स्थिति: अक्षीय (Axial - प्रभावी) बनाम अंत्य (Terminal - अप्रभावी)
  • फली का आकार: फूली हुई (Inflated - प्रभावी) बनाम संकुचित (Constricted - अप्रभावी)
  • फली का रंग: हरा (Green - प्रभावी) बनाम पीला (Yellow - अप्रभावी)
  • बीज का आकार: गोल (Round, $R$ - प्रभावी) बनाम झुर्रीदार (Wrinkled, $r$ - अप्रभावी)
  • बीज का रंग (बीजपत्र): पीला (Yellow, $Y$ - प्रभावी) बनाम हरा (Green, $y$ - अप्रभावी)

एकसंकर संकरण (Monohybrid Cross):

जब एक समय में केवल एक ही लक्षण की वंशागति का अध्ययन किया जाता है, तो उसे एकसंकर संकरण कहते हैं। मेंडल ने शुद्ध लंबे ($TT$) और शुद्ध बौने ($tt$) पौधों के बीच संकरण कराया। प्रथम संतति पीढ़ी ($F_1$) में सभी पौधे लंबे ($Tt$) प्राप्त हुए। जब $F_1$ पौधों में स्वपरागण (Selfing) कराया गया, तो द्वितीय संतति पीढ़ी ($F_2$) में लंबे और बौने दोनों प्रकार के पौधे प्राप्त हुए:

  • फीनोटाइपिक अनुपात (Phenotypic Ratio): $3 : 1$ (3 लंबे : 1 बौना)
  • जीनोटाइपिक अनुपात (Genotypic Ratio): $1 : 2 : 1$ ($1\,TT : 2\,Tt : 1\,tt$)

एकसंकर संकरण से प्रतिपादित नियम:

  1. प्रभाविता का नियम (Law of Dominance): लक्षणों का नियंत्रण विविक्त इकाइयों द्वारा होता है जिन्हें कारक (जीन) कहते हैं। कारक सदैव जोड़ों (Pairs) में पाए जाते हैं। विषमयुग्मजी अवस्था ($Tt$) में कारक युग्म का एक सदस्य दूसरे पर प्रभावी (Dominant) होता है और अप्रभावी (Recessive) कारक के प्रभाव को दबा देता है।
  2. विसंयोजन अथवा विसंकेतन का नियम (Law of Segregation): इसे 'युग्मकों की शुद्धता का नियम' (Law of Purity of Gametes) भी कहते हैं। जनक में दोनों युग्मविकल्पी (Alleles) उपस्थित होते हैं, किंतु युग्मक निर्माण (Meiosis) के समय गुणसूत्र अलग हो जाते हैं, जिससे प्रत्येक युग्मक में दो में से केवल एक ही युग्मविकल्पी प्रवेश करता है। यह नियम सार्वभौमिक (Universal) है और इसका कोई अपवाद नहीं है।

परीक्षार्थ संकरण (Test Cross):

अज्ञात जीनोटाइप वाले प्रभावी लक्षणप्ररूपी पौधे ($TT$ अथवा $Tt$) का संकरण जब समयुग्मजी अप्रभावी जनक ($tt$) के साथ कराया जाता है, तो उसे टेस्ट क्रॉस कहते हैं। यदि संतति में 100% पौधे लंबे प्राप्त हों, तो अज्ञात जनक समयुग्मजी ($TT$) है। यदि लंबे और बौने का अनुपात $1:1$ प्राप्त हो, तो अज्ञात जनक विषमयुग्मजी ($Tt$) है।

2. द्विसंकर संकरण एवं मेंडलवाद के विचलन (Post-Mendelian Genetics)

द्विसंकर संकरण (Dihybrid Cross) में दो जोड़ी विपर्यासी लक्षणों की वंशागति का एक साथ अध्ययन किया जाता है। मेंडल ने गोल व पीले बीज वाले पौधे ($RRYY$) का संकरण झुर्रीदार व हरे बीज वाले पौधे ($rryy$) से कराया। $F_1$ पीढ़ी में सभी पौधे गोल व पीले बीज वाले ($RrYy$) प्राप्त हुए। $F_1$ पौधों में स्वपरागण कराने पर $F_2$ पीढ़ी में 16 संयोजन प्राप्त हुए:

  • $F_2$ फीनोटाइपिक अनुपात: $9 : 3 : 3 : 1$ (9 गोल-पीला : 3 गोल-हरा : 3 झुर्रीदार-पीला : 1 झुर्रीदार-हरा)
  • $F_2$ जीनोटाइपिक अनुपात: $1:2:1 : 2:4:2 : 1:2:1$ (कुल 9 विभिन्न जीनोटाइप)

स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment):

जब किसी संकरण में लक्षणों के दो या दो से अधिक जोड़ों को एक साथ लिया जाता है, तो किसी एक लक्षण युग्म का विसंयोजन (Segregation) दूसरे लक्षण युग्म के विसंयोजन से पूर्णतः स्वतंत्र होता है। (ध्यान दें: यह नियम केवल उन्हीं जीनों के लिए सत्य है जो भिन्न-भिन्न गुणसूत्रों पर स्थित होते हैं; सहलग्न जीनों पर यह नियम लागू नहीं होता)।

मेंडलवाद के विचलन (Non-Mendelian Inheritance):

  • अपूर्ण प्रभाविता (Incomplete Dominance): जब दोनों युग्मविकल्पियों में से कोई भी पूर्णतः प्रभावी नहीं होता और विषमयुग्मजी अवस्था में दोनों का मध्यवर्ती लक्षण प्रकट होता है। उदाहरण: Antirrhinum majus (स्नैपड्रैगन / डॉग फ्लावर) तथा Mirabilis jalapa (4 ओ'क्लॉक)। लाल पुष्प ($RR$) $\times$ सफेद पुष्प ($rr$) $\rightarrow$ $F_1$ गुलाबी पुष्प ($Rr$)। $F_2$ में फीनोटाइपिक और जीनोटाइपिक दोनों अनुपात समान होते हैं: $1\text{ लाल} : 2\text{ गुलाबी} : 1\text{ सफेद}$ ($1:2:1$)।
  • सहप्रभाविता (Codominance): जब विषमयुग्मजी में दोनों युग्मविकल्पी अपने-अपने लक्षणों को बिना किसी मिश्रण के समान रूप से स्वतंत्र अभिव्यक्त करते हैं। सर्वोत्तम उदाहरण: मानव ABO रक्त समूह। रक्त समूह का निर्धारण जीन $I$ करता है, जिसके तीन युग्मविकल्पी होते हैं: $I^A, I^B, i$। $I^A$ और $I^B$ दोनों शर्करा बहुलक (एंटीजन) बनाते हैं, जबकि $i$ कोई एंटीजन नहीं बनाता। $I^A$ और $I^B$ दोनों $i$ पर प्रभावी हैं, किंतु जब $I^A$ और $I^B$ एक साथ आते हैं (जीनोटाइप $I^A I^B$), तो दोनों प्रकार के एंटीजन बनते हैं और रक्त समूह AB होता है।
  • बहुविकल्पता (Multiple Allelism): जब किसी एक लक्षण को नियंत्रित करने के लिए समष्टि (Population) में दो से अधिक युग्मविकल्पी पाए जाते हैं। मानव ABO रक्त समूह में 3 एलील ($I^A, I^B, i$) से कुल 6 जीनोटाइप और 4 फीनोटाइप (A, B, AB, O) बनते हैं।
  • प्लीओट्रॉपी (Pleiotropy - बहुप्रभाविता): जब एक एकल जीन एक से अधिक दृश्यप्ररूपी (Phenotypic) लक्षणों को प्रभावित करता है। उदाहरण: फिनाइलकेटोन्यूरिया (PKU) रोग—फिनाइलएलैनिन हाइड्रॉक्सिलेस एंजाइम की कमी से मानसिक मंदता, बालों व त्वचा के रंजक में कमी आदि अनेक लक्षण एक साथ उत्पन्न होते हैं।
  • बहुजीनी वंशागति (Polygenic Inheritance): जब कोई लक्षण तीन या अधिक स्वतंत्र जीनों के संचयी (Cumulative) प्रभाव द्वारा नियंत्रित होता है। उदाहरण: मानव की त्वचा का रंग (तीन जीन A, B, C द्वारा नियंत्रित) तथा मानव की लंबाई। इसमें लक्षण का वितरण घंटी के आकार का वक्र (Bell-shaped curve) बनाता है।

3. वंशागति का गुणसूत्र सिद्धांत, सहलग्नता एवं पुनर्योजन (Linkage & Recombination)

1900 में मेंडल के नियमों के पुनर्खोज के बाद, 1902 में वाल्टर सटन (Walter Sutton) तथा थियोडोर बोवेरी (Theodore Boveri) ने देखा कि अर्धसूत्री कोशिका विभाजन के समय गुणसूत्रों का पृथक्करण मेंडल के कारकों (जीन) के समान ही होता है। उन्होंने गुणसूत्रों की गति और मेंडल के नियमों को मिलाकर वंशागति का गुणसूत्रीय सिद्धांत (Chromosomal Theory of Inheritance) प्रस्तुत किया।

जीन एवं गुणसूत्रों के व्यवहार में समानता:

  • जीन जोड़े (Pair) में पाए जाते हैं; समजात गुणसूत्र भी जोड़े में पाए जाते हैं।
  • युग्मक निर्माण (Meiosis) के समय गुणसूत्रों का विसंयोजन होता है; उसी प्रकार युग्मविकल्पी भी अलग-अलग युग्मकों में चले जाते हैं।
  • भिन्न-भिन्न जोड़ों के गुणसूत्र स्वतंत्र रूप से विसंयोजित होते हैं; उसी प्रकार भिन्न-भिन्न जीन भी स्वतंत्र अपव्यूहन दर्शाते हैं।

टी. एच. मॉर्गन का प्रायोगिक सत्यापन एवं फलमक्खी (Drosophila):

थॉमस हंट मॉर्गन (T.H. Morgan) ने फलमक्खी (Drosophila melanogaster) पर कार्य करके वंशागति के गुणसूत्र सिद्धांत का प्रायोगिक सत्यापन किया। मॉर्गन को 'प्रायोगिक आनुवंशिकी का जनक' (Father of Experimental Genetics) कहा जाता है। उन्होंने ड्रोसोफिला को इसलिए चुना क्योंकि:

  1. इन्हें प्रयोगशाला में सरल संश्लेषित माध्यम (पके केले, यीस्ट) पर आसानी से पाला जा सकता है।
  2. इनका जीवन चक्र अत्यंत छोटा (लगभग 2 सप्ताह) होता है।
  3. एक ही मैथुन से भारी संख्या में मक्खियाँ उत्पन्न होती हैं।
  4. नर व मादा मक्खी में स्पष्ट लैंगिक द्विरूपता (Sexual Dimorphism) होती है (मादा आकार में नर से बड़ी होती है)।
  5. इनमें केवल 4 जोड़ी गुणसूत्र होते हैं जिन्हें निम्न आवर्धन वाले सूक्ष्मदर्शी से भी स्पष्ट देखा जा सकता है।

सहलग्नता (Linkage) एवं पुनर्योजन (Recombination):

जब मॉर्गन ने ड्रोसोफिला में दो जीनों (जैसे पीले शरीर व श्वेत नेत्र वाली मादा $\times$ भूरे शरीर व लाल नेत्र वाले नर) का संकरण कराया, तो $F_2$ पीढ़ी में मेंडल का $9:3:3:1$ अनुपात प्राप्त नहीं हुआ, बल्कि जनक प्रकार (Parental type) $98.7\%$ और पुनर्योजक प्रकार (Recombinant type) केवल $1.3\%$ प्राप्त हुए!

  • सहलग्नता (Linkage): एक ही गुणसूत्र पर स्थित दो या दो से अधिक जीनों का एक साथ अगली पीढ़ी में वंशागत होने की भौतिक प्रवृत्ति को सहलग्नता कहते हैं। सहलग्नता मेंडल के स्वतंत्र अपव्यूहन के नियम का प्रत्यक्ष अपवाद है।
  • पुनर्योजन (Recombination): अर्धसूत्री विभाजन की प्रोफेज-I की पैकीटीन अवस्था में गैर-सहभागीय क्रोमैटिड्स (Non-sister chromatids) के बीच जीन विनिमय (Crossing Over) के कारण संततियों में जनकों से भिन्न नवीन संयोजनों का बनना पुनर्योजन कहलाता है।
  • जीन मैपिंग (Gene Mapping): मॉर्गन के छात्र अल्फ्रेड स्टर्टवेंट (Alfred Sturtevant) ने दो जीनों के बीच पुनर्योजन की आवृत्ति (Recombination Frequency) को गुणसूत्र पर उनके बीच की दूरी का माप माना और प्रथम आनुवंशिक मानचित्र (Genetic Map) तैयार किया। ($1\%$ पुनर्योजन $= 1\text{ सेंटीमॉर्गन / cM} = 1\text{ मैप यूनिट}$)।

4. लिंग निर्धारण की क्रियाविधियां (Sex Determination Mechanisms)

जीवों में लिंग निर्धारण अनुवांशिक अथवा गुणसूत्रीय आधार पर होता है। हेनकिंग (Henking, 1891) ने कुछ कीटों में शुक्रजनन के दौरान एक विशिष्ट केंद्रीय संरचना को देखा और इसे 'X-काय' (X-body) नाम दिया, जिसे बाद में X-गुणसूत्र (लिंग गुणसूत्र) पहचाना गया। कोशिका में दो प्रकार के गुणसूत्र होते हैं: ऑटोसोम (Autosomes - कायिक गुणसूत्र) तथा एलोसोम (Allosomes / Sex Chromosomes - लिंग गुणसूत्र)।

विभिन्न जीवों में लिंग निर्धारण के प्रकार:

  • 1. XX-XY प्रणाली (नर विषमयुग्मकता / Male Heterogamety): मानव तथा ड्रोसोफिला में पाई जाती है। मादा में दो समजात X-गुणसूत्र ($XX$) होते हैं (समयुग्मकी), अतः मादा केवल एक प्रकार के अंडाणु ($22 + X$) बनाती है। नर में एक X और एक छोटा Y-गुणसूत्र ($XY$) होता है (विषमयुग्मकी), अतः नर दो प्रकार के शुक्राणु $50\%$ ($22 + X$) तथा $50\%$ ($22 + Y$) बनाता है। यदि X-शुक्राणु निषेचित करे तो पुत्री ($XX$), यदि Y-शुक्राणु निषेचित करे तो पुत्र ($XY$) उत्पन्न होता है। अतः मानव में लिंग निर्धारण पूर्णतः पिता के शुक्राणु द्वारा होता है, माता का इसमें कोई जैविक योगदान नहीं होता।
  • 2. XX-XO प्रणाली: टिड्डों (Grasshoppers) एवं कुछ कीटों में। मादा में $XX$ गुणसूत्र होते हैं, जबकि नर में केवल एक X-गुणसूत्र ($XO$) होता है। नर दो प्रकार के शुक्राणु बनाता है: आधे X-युक्त तथा आधे गुणसूत्र-विहीन।
  • 3. ZZ-ZW प्रणाली (मादा विषमयुग्मकता / Female Heterogamety): पक्षियों (Birds) तथा सरीसृपों में। यहाँ नर समयुग्मकी ($ZZ$) होता है और केवल एक प्रकार का शुक्राणु बनाता है, जबकि मादा विषमयुग्मकी ($ZW$) होती है और दो प्रकार के अंडाणु ($Z$ और $W$) बनाती है। अतः पक्षियों में लिंग निर्धारण मादा (माँ) द्वारा होता है।
  • 4. मधुमक्खियों में अगुणित-द्विगुणित प्रणाली (Haplodiploid Sex Determination): रानी मधुमक्खी (मादा) द्विगुणित ($2n = 32$) होती है, जबकि नर (ड्रोन) अनिषेचित अंड से अनिषेकजनन (Parthenogenesis) द्वारा विकसित होकर अगुणित ($n = 16$) होता है। नर में समसूत्री विभाजन द्वारा शुक्राणु बनते हैं। ड्रोनों के पिता नहीं होते और न ही उनके पुत्र हो सकते हैं; उनके नाना (Grandfather) होते हैं और नवासे (Grandson) हो सकते हैं!

5. आनुवंशिक विकार एवं वंशावली विश्लेषण (Genetic Disorders & Pedigree Analysis)

वंशावली विश्लेषण (Pedigree Analysis): मानव में नियंत्रित संकरण संभव नहीं है, अतः कई पीढ़ियों में किसी विशेष लक्षण या आनुवंशिक विकार के संचरण का पारिवारिक इतिहास के रूप में आरेखीय निरूपण वंशावली विश्लेषण कहलाता है। इसमें वर्ग ($\\square$) नर को, वृत्त ($\\bigcirc$) मादा को, तथा रंगे हुए प्रतीक प्रभावित व्यक्ति को दर्शाते हैं।

मानव आनुवंशिक विकारों का वर्गीकरण:

A. मेंडेलियन विकार (Mendelian Disorders - एकल जीन उत्परिवर्तन):

  1. हीमोफीलिया (Hemophilia - 'रॉयल डिजीज'): X-सहलग्न अप्रभावी (X-linked Recessive) विकार। रक्त के थक्के बनने के लिए आवश्यक कारक (कारक VIII या IX) की कमी हो जाती है, जिससे मामूली चोट पर भी अनियंत्रित रक्तस्राव होता है। महारानी विक्टोरिया इसकी वाहक (Carrier) थीं। विषमयुग्मजी मादा ($X^H X^h$) वाहक होती है, जबकि नर ($X^h Y$) सदैव रोगी होता है।
  2. सिकल सेल एनीमिया (Sickle Cell Anemia - दात्र कोशिका अरक्तता): ऑटोसोमल अप्रभावी (Autosomal Recessive) विकार। हीमोग्लोबिन की $\\beta$-ग्लोबिन शृंखला के 6वें स्थान पर स्थित कोडॉन में बिंदु उत्परिवर्तन द्वारा ग्लूटैमिक एसिड (GAG) का स्थान वैलीन (GUG) ले लेता है। कम ऑक्सीजन तनाव में लाल रक्त कोशिकाएं हँसिए के आकार (Sickle-shaped) की हो जाती हैं, जिससे केशिकाओं में अवरोध और तीव्र एनीमिया हो जाता है। जीनोटाइप: $Hb^A Hb^A$ (सामान्य), $Hb^A Hb^S$ (वाहक / मलेरिया प्रतिरोधी), $Hb^S Hb^S$ (गंभीर रोगी)।
  3. फिनाइलकेटोन्यूरिया (PKU): ऑटोसोमल अप्रभावी विकार। इसमें यकृत का एंजाइम फिनाइलएलैनिन हाइड्रॉक्सिलेस अनुपस्थित होता है, जिससे अमीनो अम्ल फिनाइलएलैनिन, टायरोसीन में नहीं बदल पाता और फिनाइलपाइरुविक अम्ल में बदलकर मस्तिष्क में जमा होता है, जिससे मानसिक दुर्बलता आती है।
  4. थैलेसीमिया (Thalassemia): ऑटोसोमल अप्रभावी रुधिर विकार। इसमें हीमोग्लोबिन की ग्लोबिन शृंखला ($\\alpha$ या $\\beta$) का संश्लेषण कम मात्रा में होता है (मात्रात्मक दोष / Quantitative defect, जबकि सिकल सेल गुणात्मक दोष / Qualitative defect है)।

B. गुणसूत्रीय विकार (Chromosomal Disorders - गुणसूत्रों की संख्या में परिवर्तन):

कोशिका विभाजन के समय क्रोमैटिड्स के अवियोजन (Non-disjunction) के कारण गुणसूत्रों की संख्या में कमी या वृद्धि हो जाती है (असुगुणिता / Aneuploidy)।

  • डाउन सिंड्रोम (Down's Syndrome - 21वीं ट्राइसोमी): लैंगडन डाउन (1866) द्वारा खोजा गया। 21वें क्रोमोसोम की एक अतिरिक्त प्रतिलिपि आ जाने से कुल 47 गुणसूत्र ($45 + XX$ या $45 + XY$) हो जाते हैं। लक्षण: छोटा कद, गोल सिर, खांचेदार जीभ, खुला मुंह, हथेली में चौड़ी क्रीज (पाम क्रीज), तथा मंद मानसिक विकास।
  • क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम (Klinefelter's Syndrome): लिंग गुणसूत्र की ट्राइसोमी के कारण नर में कुल 47 गुणसूत्र ($44 + XXY$) होते हैं। यह व्यक्ति पुरुष होता है किंतु उसमें मादा के लक्षण जैसे स्तनों का विकास (गाइनेकोमास्टिया / Gynecomastia) दिखाई देता है और वह बंध्य (Sterile) होता है।
  • टर्नर सिंड्रोम (Turner's Syndrome): लिंग गुणसूत्र की मोनोसोमी के कारण मादा में केवल एक X-गुणसूत्र ($44 + XO$) होता है (कुल 45 गुणसूत्र)। लक्षण: मादा बंध्य होती है, अंडाशय अल्पविकसित होते हैं, गर्दन पर जालदार त्वचा (Webbed neck) तथा द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का अभाव होता है।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

मोनोहाइब्रिड क्रॉस अनुपात (Monohybrid Ratios)
फीनोटाइपिक = 3 : 1 | जीनोटाइपिक = 1 : 2 : 1
F2 पीढ़ी में एकल लक्षण वंशागति हेतु (TT : 2Tt : tt)
डाइहाइब्रिड क्रॉस अनुपात (Dihybrid Ratios)
फीनोटाइपिक = 9 : 3 : 3 : 1 | जीनोटाइपिक = 1:2:1:2:4:2:1:2:1
F2 पीढ़ी में दो स्वतंत्र लक्षणों की वंशागति हेतु (कुल 16 संयोजन, 9 जीनोटाइप)
टेस्ट क्रॉस अनुपात (Test Cross Ratios)
मोनोहाइब्रिड टेस्ट क्रॉस = 1 : 1 | डाइहाइब्रिड टेस्ट क्रॉस = 1 : 1 : 1 : 1
विषमयुग्मजी जनक का समयुग्मजी अप्रभावी जनक से संकरण कराने पर
अपूर्ण प्रभाविता एवं सहप्रभाविता अनुपात
फीनोटाइपिक = 1 : 2 : 1 | जीनोटाइपिक = 1 : 2 : 1
स्नैपड्रैगन में लाल:गुलाबी:सफेद तथा मानव MN रक्त समूह में
पुनर्योजन आवृत्ति सूत्र (Recombination Frequency)
RF (%) = (पुनर्योजक संततियों की संख्या / कुल संततियों की संख्या) × 100
1% पुनर्योजन = 1 मैप यूनिट (cM); जीन मैपिंग का आधार
सिकल सेल एनीमिया का आणविक उत्परिवर्तन
डीएनए: CTC → CAC | एमआरएनए: GAG → GUG | पेप्टाइड: ग्लूटैमिक एसिड → वैलीन (6वाँ स्थान)
बीटा-ग्लोबिन शृंखला का एकल क्षारक प्रतिस्थापन (Point Mutation)

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
यदि एक सामान्य दृष्टि वाले पुरुष का विवाह एक ऐसी महिला से होता है जिसके पिता वर्णांध (Colorblind) थे, तो उनकी संतानों में वर्णांधता की क्या प्रायिकता होगी? चेकर बोर्ड बनाकर समझाइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

विश्लेषण:

  • वर्णांधता एक X-सहलग्न अप्रभावी विकार है। जीन: $X^C$ (सामान्य), $X^c$ (वर्णांध)।
  • सामान्य पुरुष का जीनोटाइप: $X^C Y$
  • महिला के पिता वर्णांध ($X^c Y$) थे, अतः महिला को अपने पिता से अनिवार्य रूप से $X^c$ प्राप्त हुआ। चूंकि महिला स्वयं सामान्य है, उसका जीनोटाइप वाहक ($X^C X^c$) होगा।

संकरण चेकर बोर्ड (Punnett Square):

युग्मक$X^C$ (शुक्राणु)$Y$ (शुक्राणु)
$X^C$ (अंडाणु)$X^C X^C$ (सामान्य पुत्री - 25%)$X^C Y$ (सामान्य पुत्र - 25%)
$X^c$ (अंडाणु)$X^C X^c$ (वाहक पुत्री - 25%)$X^c Y$ (वर्णांध पुत्र - 25%)

निष्कर्ष:

  1. कुल संतानों में वर्णांधता की संभावना = 25% (केवल पुत्रों में)।
  2. सभी पुत्रियों में से कोई भी रोगी नहीं होगी (50% सामान्य, 50% वाहक)।
  3. पुत्रों में वर्णांध होने की संभावना = 50% (1 सामान्य : 1 वर्णांध)।
अंक योजना (Marking Scheme): जनकों के जीनोटाइप लिखने पर (1 अंक) + पुनेट वर्ग/चेकर बोर्ड सही बनाने पर (2 अंक) + संतानों के अनुपात व अंतिम निष्कर्ष पर (2 अंक) = कुल 5 अंक।
उदाहरण 2
सिकल सेल एनीमिया का आणविक आधार क्या है? इसे 'बिंदु उत्परिवर्तन' का उदाहरण क्यों माना जाता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. आणविक आधार: सिकल सेल एनीमिया हीमोग्लोबिन अणु की $\beta$-ग्लोबिन पॉलीपेप्टाइड शृंखला के छठे (6th) स्थान पर स्थित अमीनो अम्ल के परिवर्तन के कारण होता है।
  2. डीएनए स्तर पर परिवर्तन: सामान्य $\beta$-ग्लोबिन जीन के छठे कोडॉन पर डीएनए का क्रम CTC (सेंस रज्जुक) होता है, जो अनुलेखन द्वारा एमआरएनए पर GAG कोडॉन बनाता है। यह GAG कोडॉन जल-स्नेही (Hydrophilic) अमीनो अम्ल ग्लूटैमिक एसिड (Glutamic Acid) को कोड करता है।
  3. उत्परिवर्तन: उत्परिवर्तन के कारण डीएनए के छठे कोडॉन में थायमीन ($T$) का प्रतिस्थापन एडेनिन ($A$) द्वारा हो जाता है, जिससे क्रम CAC हो जाता है।
  4. एमआरएनए एवं पेप्टाइड प्रभाव: उत्परिवर्तित जीन से निर्मित एमआरएनए पर कोडॉन GUG बनता है, जो जल-विरोधी (Hydrophobic) अमीनो अम्ल वैलीन (Valine) को कोड करता है।
  5. बिंदु उत्परिवर्तन (Point Mutation): चूंकि यह संपूर्ण विकार डीएनए हेलिक्स के केवल एक एकल क्षारक युग्म (Single Base Pair: A $\rightarrow$ T) के प्रतिस्थापन से उत्पन्न होता है, इसलिए इसे बिंदु उत्परिवर्तन का उत्कृष्ट उदाहरण कहा जाता है।
अंक योजना (Marking Scheme): बीटा ग्लोबिन शृंखला व 6वें स्थान का उल्लेख (1 अंक) + DNA व mRNA कोडॉन (CTC→CAC, GAG→GUG) का सही क्रम (1 अंक) + ग्लूटैमिक एसिड से वैलीन प्रतिस्थापन व बिंदु उत्परिवर्तन की व्याख्या (1 अंक) = कुल 3 अंक।
उदाहरण 3
एक बच्चे का रक्त समूह 'O' है। यदि पिता का रक्त समूह 'A' तथा माता का रक्त समूह 'B' है, तो जनकों के जीनोटाइप ज्ञात कीजिए तथा अन्य संभावित संतानों के रक्त समूहों की व्याख्या कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

हल:

  • बच्चे का रक्त समूह 'O' है, जिसका जीनोटाइप अनिवार्य रूप से $ii$ होगा।
  • चूंकि बच्चे को एक '$i$' युग्मविकल्पी पिता से तथा दूसरा '$i$' माता से मिला है, इसलिए पिता और माता दोनों के पास कम से कम एक '$i$' एलील अवश्य उपस्थित होना चाहिए।
  • पिता का रक्त समूह 'A' है, अतः पिता का जीनोटाइप विषमयुग्मजी $I^A i$ होगा।
  • माता का रक्त समूह 'B' है, अतः माता का जीनोटाइप विषमयुग्मजी $I^B i$ होगा।

संकरण चेकर बोर्ड:

शुक्राणु \ अंडाणु$I^B$$i$
$I^A$$I^A I^B$ (रक्त समूह AB)$I^A i$ (रक्त समूह A)
$i$$I^B i$ (रक्त समूह B)$ii$ (रक्त समूह O)

संभावित संतानों के रक्त समूह: इस दंपत्ति की संतानों में चारों रक्त समूह (AB, A, B, O) होने की समान संभावना (प्रत्येक 25% या अनुपात $1:1:1:1$) है।

अंक योजना (Marking Scheme): बच्चे के जीनोटाइप (ii) के आधार पर जनकों के जीनोटाइप निर्धारित करने पर (1.5 अंक) + चेकर बोर्ड व 4 रक्त समूहों के अनुपात पर (1.5 अंक) = कुल 3 अंक।
उदाहरण 4
सहलग्नता (Linkage) तथा पुनर्योजन (Recombination) में विभेद कीजिए। मॉर्गन ने ड्रोसोफिला पर अपने संकरण प्रयोगों द्वारा इसे कैसे सिद्ध किया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

लक्षणसहलग्नता (Linkage)पुनर्योजन (Recombination)
परिभाषाएक ही गुणसूत्र पर स्थित जीनों का एक साथ अगली पीढ़ी में वंशागत होने की प्रवृत्ति।क्रॉसिंग ओवर के फलस्वरूप संतानों में नए जीन संयोजनों का निर्माण।
प्रभावयह जनक प्रकार (Parental type) के लक्षणों को बनाए रखती है।यह संतानों में विविधता (Variation) उत्पन्न करता है।
दूरी से संबंधजीनों के बीच दूरी कम होने पर सहलग्नता प्रबल होती है।जीनों के बीच दूरी बढ़ने पर पुनर्योजन की दर बढ़ती है।

मॉर्गन का प्रयोग: मॉर्गन ने जब पीले शरीर व श्वेत नेत्र वाली मादा ड्रोसोफिला का संकरण भूरे शरीर व लाल नेत्र वाले नर से कराया, तो $F_2$ पीढ़ी में स्वतंत्र अपव्यूहन ($9:3:3:1$) के स्थान पर जनक संयोजन 98.7% तथा पुनर्योजक संयोजन केवल 1.3% मिले। इससे सिद्ध हुआ कि ये दोनों जीन X-गुणसूत्र पर बहुत पास-पास स्थित थे और अत्यधिक सहलग्न थे।

अंक योजना (Marking Scheme): सहलग्नता और पुनर्योजन में 3 स्पष्ट अंतर (1.5 अंक) + मॉर्गन के ड्रोसोफिला प्रयोग का अनुपात व निष्कर्ष (1.5 अंक) = कुल 3 अंक।
उदाहरण 5
टर्नर सिंड्रोम तथा क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम के गुणसूत्रीय संघटन एवं लक्षणों का तुलनात्मक विवरण दीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

लक्षणटर्नर सिंड्रोम (Turner's Syndrome)क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम (Klinefelter's Syndrome)
गुणसूत्र संख्या45 गुणसूत्र (मोनोसोमी)47 गुणसूत्र (ट्राइसोमी)
गुणसूत्रीय संघटन$44 + XO$ (एक X-गुणसूत्र की कमी)$44 + XXY$ (एक अतिरिक्त X-गुणसूत्र)
लिंगमादा (Female)पुरुष (Male)
शारीरिक लक्षणछोटा कद, अल्पविकसित अंडाशय, जालदार गर्दन (Webbed neck), बंध्य (Sterile)।लंबा कद, अल्पविकसित वृषण, स्तनों का विकास (Gynecomastia), बंध्य पुरुष।
कारणअंडजनन या शुक्रजनन में लिंग गुणसूत्र का अवियोजन (Non-disjunction)।अतिरिक्त X-गुणसूत्र युक्त युग्मक का सामान्य युग्मक से संलयन।
अंक योजना (Marking Scheme): गुणसूत्र संख्या व संघटन (1.5 अंक) + शारीरिक लक्षण व जनन क्षमता पर तुलना (1.5 अंक) = कुल 3 अंक।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि मेंडल के सभी तीनों नियम सार्वभौमिक (Universal) हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

केवल 'विसंयोजन का नियम' (Law of Segregation) सार्वभौमिक और अपवाद-रहित है। 'स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम' सहलग्नता (Linkage) के कारण विफल हो जाता है, तथा 'प्रभाविता का नियम' अपूर्ण प्रभाविता व सहप्रभाविता के कारण विफल होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सिकल सेल एनीमिया में GAG और GUG के प्रतिस्थापन को उल्टा लिख देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य हीमोग्लोबिन में GAG (ग्लूटैमिक एसिड) होता है, जो बिंदु उत्परिवर्तन के कारण GUG (वैलीन) में बदल जाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

क्लाइनफेल्टर और टर्नर सिंड्रोम के गुणसूत्र संघटन में भ्रम होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

क्लाइनफेल्टर = 44 + XXY (47 गुणसूत्र, पुरुष); टर्नर सिंड्रोम = 44 + XO (45 गुणसूत्र, मादा)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

अपूर्ण प्रभाविता (Incomplete Dominance) और सहप्रभाविता (Codominance) को एक ही समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

अपूर्ण प्रभाविता में दोनों का मिश्रित/मध्यवर्ती लक्षण बनता है (लाल + सफेद = गुलाबी), जबकि सहप्रभाविता में दोनों जनक लक्षण स्वतंत्र रूप से एक साथ स्पष्ट दिखते हैं (जैसे AB रक्त समूह में A और B दोनों एंटीजन)।

वंशागति एवं आनुवंशिक विकारों का एकीकृत वैज्ञानिक मानचित्र (Genetics & Chromosomal Disorders)

आनुवंशिकी के मूलभूत सिद्धांत एवं विकार (Principles of Genetics & Disorders)मेंडलवाद • सहलग्नता • बिंदु उत्परिवर्तन • गुणसूत्रीय विकार1. मेंडल के नियमएकसंकर संकरण (3:1):• प्रभाविता का नियम• विसंयोजन का नियम (1:2:1)• युग्मकों की शुद्धता (अकाट्य)द्विसंकर संकरण (9:3:3:1):• स्वतंत्र अपव्यूहन नियम• 4 युग्मक, 16 संयोजनविचलन (Deviations):• अपूर्ण प्रभाविता (1:2:1)• सहप्रभाविता (ABO रक्त)• बहुविकल्पता (Multiple Alleles)2. सहलग्नता व लिंगसहलग्नता (Linkage):• T.H. Morgan (Drosophila)• जनक प्रकार > 50%• स्वतंत्र अपव्यूहन का अपवादपुनर्योजन (Recombination):• क्रॉसिंग ओवर (Pachytene)• 1% RF = 1 Map Unit (cM)लिंग निर्धारण प्रणालियां:• मानव/ड्रोसोफिला: XX-XY• पक्षी: ZZ(नर) - ZW(मादा)• मधुमक्खी: अगुणित-द्विगुणित3. मेंडेलियन विकारसिकल सेल एनीमिया (HbS):• $\beta$-शृंखला के 6वें स्थान पर• GAG → GUG (Glu → Val)• बिंदु उत्परिवर्तन (Point Mutation)हीमोफीलिया (Royal Disease):• X-सहलग्न अप्रभावी विकार• थक्का कारक VIII/IX की कमीअन्य प्रमुख विकार:• फिनाइलकेटोन्यूरिया (PKU)• थैलेसीमिया (मात्रात्मक दोष)• वर्णांधता (Red-Green Color)4. गुणसूत्रीय विकारडाउन सिंड्रोम (47 क्रोमोसोम):• 21वें गुणसूत्र की ट्राइसोमी• गोल सिर, पाम क्रीज, मंद बुद्धिक्लाइनफेल्टर सिंड्रोम (47):• 44 + XXY (पुरुष)• गाइनेकोमास्टिया (स्तन विकास)• बंध्य पुरुष (Sterile)टर्नर सिंड्रोम (45):• 44 + XO (मादा मोनोसोमी)• अल्पविकसित अंडाशय, बंध्य

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
ग्रेगर मेंडल को आनुवंशिकी का जनक कहा जाता है, जिन्होंने मटर (Pisum sativum) पर 7 जोड़ी विपर्यासी लक्षणों का अध्ययन किया।
मुख्य बिंदु 2
प्रभाविता के नियम के अनुसार विषमयुग्मजी में केवल प्रभावी कारक ही अभिव्यक्त होता है।
मुख्य बिंदु 3
विसंयोजन का नियम (युग्मकों की शुद्धता) सार्वभौमिक है; युग्मक निर्माण के समय दोनों एलील अलग हो जाते हैं।
मुख्य बिंदु 4
द्विसंकर संकरण में स्वतंत्र अपव्यूहन के नियम के अनुसार दो जोड़ी लक्षणों की वंशागति एक-दूसरे से स्वतंत्र होती है (F2 अनुपात 9:3:3:1)।
मुख्य बिंदु 5
अपूर्ण प्रभाविता (स्नैपड्रैगन) और सहप्रभाविता (ABO रक्त समूह) मेंडल के 3:1 अनुपात के प्रमुख विचलन हैं जहाँ 1:2:1 अनुपात प्राप्त होता है।
मुख्य बिंदु 6
सटन एवं बोवेरी ने वंशागति का गुणसूत्र सिद्धांत प्रतिपादित किया तथा टी. एच. मॉर्गन ने ड्रोसोफिला पर इसका प्रायोगिक प्रमाण दिया।
मुख्य बिंदु 7
सहलग्नता मेंडल के स्वतंत्र अपव्यूहन का अपवाद है; एक ही गुणसूत्र पर स्थित पास-पास के जीन एक साथ वंशागत होते हैं।
मुख्य बिंदु 8
मानव में लिंग निर्धारण नर विषमयुग्मकता (XX-XY) द्वारा होता है, जबकि पक्षियों में मादा विषमयुग्मकता (ZZ-ZW) पाई जाती है।
मुख्य बिंदु 9
सिकल सेल एनीमिया बीटा-ग्लोबिन के छठे कोडॉन में बिंदु उत्परिवर्तन (GAG से GUG) के कारण ग्लूटैमिक एसिड के स्थान पर वैलीन आने से होता है।
मुख्य बिंदु 10
गुणसूत्रीय विकारों में डाउन सिंड्रोम (21वीं ट्राइसोमी, 47), क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम (XXY, 47) तथा टर्नर सिंड्रोम (XO, 45) प्रमुख हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
द्विसंकर परीक्षार्थ संकरण (Dihybrid Test Cross) का लक्षणप्ररूपी अनुपात क्या होता है?
(A) 9 : 3 : 3 : 1
(B) 1 : 1 : 1 : 1
(C) 3 : 1
(D) 1 : 2 : 1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
द्विसंकर टेस्ट क्रॉस (RrYy × rryy) में चारों संयोजनों का अनुपात सदैव 1:1:1:1 प्राप्त होता है।
2
मानव में ABO रक्त समूह किस परिघटना का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है?
(A) केवल अपूर्ण प्रभाविता
(B) सहप्रभाविता एवं बहुविकल्पता दोनों
(C) केवल बहुजीनी वंशागति
(D) सहलग्नता
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
ABO रक्त समूह में IA और IB सहप्रभावी हैं तथा तीन एलील्स (IA, IB, i) की उपस्थिति बहुविकल्पता को दर्शाती है।
3
सिकल सेल एनीमिया में हीमोग्लोबिन की बीटा शृंखला के 6वें स्थान पर कौन सा अमीनो अम्ल प्रतिस्थापित होता है?
(A) वैलीन के स्थान पर ग्लूटैमिक एसिड
(B) ग्लूटैमिक एसिड के स्थान पर वैलीन
(C) ग्लाइसीन के स्थान पर एलानिन
(D) लायसीन के स्थान पर वैलीन
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
बिंदु उत्परिवर्तन (GAG → GUG) के कारण ग्लूटैमिक एसिड का स्थान वैलीन ले लेता है।
4
टर्नर सिंड्रोम से ग्रसित मादा का गुणसूत्रीय संघटन क्या होता है?
(A) 44 + XXY
(B) 44 + XO
(C) 45 + XX
(D) 44 + XXX
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
टर्नर सिंड्रोम में एक X गुणसूत्र की कमी (मोनोसोमी) के कारण संघटन 44 + XO (कुल 45 गुणसूत्र) होता है।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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अध्याय 1: पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन (Sexual Reproduction in Flowering Plants) अध्याय 2: मानव जनन (Human Reproduction) (Human Reproduction) अध्याय 3: जनन स्वास्थ्य (Reproductive Health) (Reproductive Health) अध्याय 4: वंशागति तथा विविधता के सिद्धांत (Principles of Inheritance and Variation) अध्याय 5: वंशागति के आणविक आधार (Molecular Basis of Inheritance) अध्याय 6: विकास (Evolution) (Evolution) अध्याय 7: मानव स्वास्थ्य और रोग (Human Health and Disease) अध्याय 8: मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव (Microbes in Human Welfare) अध्याय 9: जैव प्रौद्योगिकी - सिद्धांत व प्रक्रम (Biotechnology: Principles and Processes) अध्याय 10: जैव प्रौद्योगिकी एवं इसके अनुप्रयोग (Biotechnology and its Applications) अध्याय 11: जीव और समष्टियां (Organisms and Populations) अध्याय 12: पारितंत्र (Ecosystem) (Ecosystem) अध्याय 13: जैव विविधता एवं संरक्षण (Biodiversity and Conservation)

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