Follow Us
माध्यम चुनें / Select Medium:
Eng (English) Hindi (हिन्दी)
झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 8 • Social Science • अध्याय 17
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

न्यायपालिका (Judiciary) (Judiciary)

झारखण्ड शैक्षणिक परिषद् (JAC) एवं NCERT पाठ्यक्रम पर आधारित कक्षा 8 नागरिक शास्त्र का चौथा अध्याय "न्यायपालिका" (Judiciary) भारत की स्वतंत्र, निष्पक्ष व एकीकृत न्यायिक व्यवस्था का संपूर्ण प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करता है। न्यायपालिका कानून के शासन (Rule of Law) की संरक्षक और संविधान की अंतिम व्याख्याकार है। इस अध्याय में यह गहराई से उद्घाटित किया गया है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ क्या है—कार्यपालिका और विधायिका का न्यायाधीशों की नियुक्ति और कार्यप्रणाली में दखल न होना, तथा न्यायाधीशों के पद की सुरक्षा। अध्याय में भारत की एकीकृत न्यायिक संरचना के तीन स्तरों—(1) भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India, नई दिल्ली - शीर्ष अदालत), (2) उच्च न्यायालय (High Courts - जैसे राँची स्थित झारखण्ड उच्च न्यायालय), तथा (3) अधीनस्थ या जिला न्यायालय (Subordinate/District Courts)—का पदानुक्रम और अपीलीय व्यवस्था (Appellate System) स्पष्ट की गई है। इसके साथ ही फौजदारी कानून (Criminal Law) और दीवानी कानून (Civil Law) का विस्तृत तुलनात्मक अंतर, 1980 के दशक में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शुरू की गई जनहित याचिका (PIL - Public Interest Litigation) की युगांतरकारी क्रांति (जिससे स्कूली बच्चों को मिड-डे मील का अधिकार मिला), तथा "देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है" (Justice Delayed is Justice Denied) की व्यावहारिक चुनौतियों का व्यापक व परीक्षा-उन्मुख विश्लेषण संकलित है।

⚡ यदि किसी ताकतवर राजनेता या खरबपति उद्योगपति के खिलाफ किसी गरीब किसान या आम नागरिक का विवाद हो जाए, तो कौन सी ऐसी संस्था है जो बिना किसी डर के न्याय का तराजू सीधा रखती है?

कल्पना कीजिए एक ऐसी अदालत की जहाँ जज को किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के फोन पर फैसला सुनाना पड़े—क्या वहाँ किसी आम नागरिक को कभी न्याय मिल पाएगा? बिल्कुल नहीं! यही कारण है कि भारत के संविधान ने न्यायपालिका को सरकार और नेताओं के नियंत्रण से 100% स्वतंत्र रखा है। जब दिल्ली में जहरीला प्रदूषण फैला या जब अकाल के समय गोदामों में अनाज सड़ रहा था और लोग भूख से मर रहे थे, तो सुप्रीम कोर्ट के एक पोस्टकार्ड ने सरकार को सभी सरकारी स्कूलों में दोपहर का भोजन (Mid-Day Meal) मुफ्त देने का आदेश दे दिया! भारत की यह चमत्कारी न्यायिक प्रणाली कैसे कार्य करती है? आइए समझें!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

न्यायपालिका नागरिकों के मौलिक अधिकारों की ढाल है। झारखण्ड के राँची स्थित उच्च न्यायालय और जिला अदालतों ने विस्थापन, भूमि अधिग्रहण और मानवाधिकारों के संरक्षण में अनेक ऐतिहासिक फैसले देकर समाज के सबसे कमजोर तबके की रक्षा की है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • कानून के शासन (Rule of Law) का सिद्धांत।
  • संविधान में उल्लिखित मौलिक अधिकार (विशेषकर अनुच्छेद 32)।
  • सरकार के तीन अंगों में विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों की बुनियादी समझ।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा और इसके आवश्यक संवैधानिक सुरक्षा उपायों की व्याख्या कर सकेंगे।
  • भारत की एकीकृत न्यायिक व्यवस्था के तीन स्तरों (सर्वोच्च, उच्च और अधीनस्थ अदालतें) और अपीलीय तंत्र को समझ सकेंगे।
  • फौजदारी कानून (आपराधिक) और दीवानी कानून (नागरिक) के बीच के मूलभूत अंतरों को सोदाहरण स्पष्ट कर सकेंगे।
  • जनहित याचिका (PIL) के उद्भव, प्रक्रिया और आम जनता के अधिकारों पर इसके क्रांतिकारी प्रभावों का मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • न्याय तक आम जनता की पहुँच में आने वाली चुनौतियों (न्यायिक देरी, अदालती खर्च) का आलोचनात्मक विश्लेषण कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. न्यायपालिका की क्या भूमिका है? (...
2 2. स्वतंत्र न्यायपालिका क्या होती ह...
3 3. भारत में अदालतों की संरचना और अप...
4 4. फौजदारी बनाम दीवानी कानून और जनह...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. न्यायपालिका की क्या भूमिका है? (Role of the Judiciary)

न्यायपालिका देश में कानून का राज बनाए रखने के लिए मुख्य रूप से तीन प्रकार के कार्य करती है:

  • 1. विवादों का निपटारा (Dispute Resolution): यह नागरिकों के बीच, नागरिक और सरकार के बीच, दो या दो से अधिक राज्य सरकारों के बीच, तथा केंद्र और राज्य सरकार के बीच उत्पन्न विवादों को सुलझाती है।
  • 2. न्यायिक समीक्षा (Judicial Review): न्यायपालिका संविधान की अंतिम व्याख्याकार है। यदि उसे लगता है कि संसद द्वारा पारित कोई कानून संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है, तो वह उसे असंवैधानिक घोषित कर निरस्त कर सकती है।
  • 3. मौलिक अधिकारों का संरक्षण (Enforcing Fundamental Rights): यदि किसी नागरिक को लगता है कि उसके मौलिक अधिकारों का हनन हुआ है, तो वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय या अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय जा सकता है (जैसे हाकिम शेख केस में स्वास्थ्य के अधिकार को जीवन का अधिकार माना गया)।

2. स्वतंत्र न्यायपालिका क्या होती है? (What is an Independent Judiciary?)

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ है कि न्यायाधीश बिना किसी राजनीतिक दबाव या पक्षपात के निष्पक्ष न्याय दे सकें:

  • शक्तियों का पृथक्करण: विधायिका और कार्यपालिका अदालतों के दैनिक कार्यों में दखल नहीं दे सकतीं। जज सरकार के कर्मचारी नहीं होते।
  • नियुक्ति की स्वायत्तता: सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप न्यूनतम होता है।
  • पद की सुरक्षा (Security of Tenure): एक बार नियुक्त होने के बाद किसी न्यायाधीश को उसके पद से हटाना अत्यंत कठिन है। किसी जज को केवल संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत द्वारा "महाभियोग" (Impeachment) प्रस्ताव पारित करके ही हटाया जा सकता है।

3. भारत में अदालतों की संरचना और अपीलीय व्यवस्था (Structure of Courts & Appellate System)

भारत में एकीकृत (Integrated) न्यायिक प्रणाली है, जिसका अर्थ है कि ऊपरी अदालत के फैसले निचली अदालतों पर बाध्यकारी होते हैं:

न्यायालय का स्तरक्षेत्राधिकार व स्थितिअपीलीय भूमिका
1. सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court)नई दिल्ली (प्रधान न्यायाधीश - CJI की अध्यक्षता में)देश की सबसे बड़ी अपील अदालत; इसके फैसले भारत की सभी अदालतों को मानने होते हैं।
2. उच्च न्यायालय (High Court)राज्यों की शीर्ष अदालत (झारखण्ड उच्च न्यायालय, राँची)जिला अदालतों के फैसलों के विरुद्ध अपील सुनती है; रिट जारी करने की शक्ति।
3. अधीनस्थ / जिला अदालतें (Subordinate Courts)प्रत्येक जिले में जिला एवं सत्र न्यायाधीश (District & Sessions Judge)अधिकांश आम नागरिकों का वास्ता इसी स्तर पर मुकदमों की सुनवाई से पड़ता है।

अपीलीय व्यवस्था (Appellate System): यदि किसी व्यक्ति को निचली अदालत का फैसला न्यायसंगत नहीं लगता, तो वह उसके खिलाफ उच्च न्यायालय और अंत में सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकता है (जैसे लक्ष्मण कुमार बनाम दिल्ली प्रशासन दहेज हत्या केस)।

4. फौजदारी बनाम दीवानी कानून और जनहित याचिका (Criminal vs Civil Law & PIL)

भारतीय विधि व्यवस्था दो मुख्य शाखाओं में बँटी है, साथ ही जनहित याचिका ने न्याय तक आम जन की पहुँच को सुगम बनाया है:

बिंदुफौजदारी कानून (Criminal Law)दीवानी कानून (Civil Law)
विषय वस्तुऐसे अपराध जो समाज के विरुद्ध माने जाते हैं (चोरी, हत्या, डकैती, दहेज प्रताड़ना)व्यक्तियों के आपसी अधिकारों के उल्लंघन के मामले (जमीन विवाद, किराया, तलाक, अनुबंध)
प्रक्रियापुलिस में प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज होने से शुरुआत; पुलिस जांच करती है।प्रभावित पक्ष द्वारा सीधे दीवानी अदालत में याचिका (Petition) दायर की जाती है।
अदालती निर्णयदोषी पाए जाने पर जेल की सजा, जुर्माना या मृत्युदंड।मुआवजा, बकाया किराया वसूली, संपत्ति की वापसी या अनुबंध का पालन।

जनहित याचिका (PIL): 1980 के दशक में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पी. एन. भगवती और वी. आर. कृष्णा अय्यर द्वारा शुरू की गई। इसके तहत कोई भी व्यक्ति या संस्था ऐसे गरीबों और वंचितों की ओर से सीधे सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में पत्र या टेलीग्राम भेजकर न्याय की गुहार लगा सकती है जिनके अधिकारों का हनन हो रहा हो। इसी से स्कूलों में मिड-डे मील की व्यवस्था लागू हुई।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court)
स्थापना: 26 जनवरी 1950 | स्थान: तिलक मार्ग, नई दिल्ली
देश का शीर्ष न्यायालय, जिसके प्रमुख भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) होते हैं।
अदालतों की त्रिस्तरीय संरचना
सर्वोच्च न्यायालय (शीर्ष) → उच्च न्यायालय (राज्य स्तर) → जिला व अधीनस्थ अदालतें (जिला स्तर)
भारत में एकीकृत न्यायपालिका है; ऊपर की अदालत के निर्णय निचली अदालतों पर बाध्यकारी होते हैं।
झारखण्ड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court)
स्थापना: 15 नवंबर 2000 | स्थान: राँची (डोरंडा/धुर्वा)
झारखण्ड राज्य के गठन के साथ ही राँची में राज्य के शीर्ष उच्च न्यायालय की स्थापना हुई।
प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR)
First Information Report (धारा 154, CrPC)
फौजदारी मामलों में पुलिस FIR दर्ज होने के बाद ही औपचारिक जांच प्रारंभ करती है।
जनहित याचिका (PIL)
Public Interest Litigation (अनुच्छेद 32 एवं 226)
गरीबों और वंचितों के मानवाधिकारों के संरक्षण हेतु न्यायिक प्रक्रिया का सरलीकरण।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1: स्वतंत्र न्यायपालिका (Independent Judiciary) से क्या अभिप्राय है? इसे सुनिश्चित करने के दो संवैधानिक उपाय लिखिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: स्वतंत्र न्यायपालिका का अर्थ है कि देश की अदालतें किसी भी राजनीतिक दल, सरकार, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के दबाव में काम नहीं करतीं और कानून के अनुसार पूरी निष्पक्षता से फैसला सुनाती हैं। इसे सुनिश्चित करने के दो संवैधानिक उपाय:

  1. शक्तियों का पृथक्करण: सरकार के अन्य दो अंग—विधायिका और कार्यपालिका—अदालत के कार्यों में तनिक भी हस्तक्षेप नहीं कर सकते।
  2. न्यायाधीशों के पद की सुरक्षा: जजों को एक बार नियुक्त करने के बाद उनके पद से हटाना लगभग असंभव होता है। उन्हें केवल संसद में दोनों सदनों के दो-तिहाई बहुमत द्वारा महाभियोग (Impeachment) प्रस्ताव पास करके ही हटाया जा सकता है।
उदाहरण 2
प्रश्न 2: भारत की एकीकृत न्यायिक व्यवस्था (Integrated Judicial System) में "अपीलीय प्रणाली" क्या है? उदाहरण देकर समझाइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: एकीकृत न्यायिक व्यवस्था का अर्थ है कि देश की सभी अदालतें एक सूत्र में जुड़ी हैं और शीर्ष अदालत का निर्णय नीचे की सभी अदालतों पर बाध्यकारी होता है। अपीलीय प्रणाली: यदि किसी मुकदमे में किसी नागरिक को लगता है कि निचली अदालत (जैसे जिला अदालत) ने उसके साथ न्याय नहीं किया है या गलत फैसला दिया है, तो वह उस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय (High Court) में अपील कर सकता है। यदि वह हाई कोर्ट के फैसले से भी असंतुष्ट है, तो वह अंतिम अपील सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में कर सकता है। उदाहरण: दिल्ली के सुधा गोयल दहेज हत्या मामले में निचली अदालत ने आरोपियों को मौत की सजा दी, हाई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया, लेकिन अंततः सुप्रीम कोर्ट ने पति और सास को दोषी मानकर उम्रकैद की सजा सुनाई।
उदाहरण 3
प्रश्न 3: फौजदारी कानून (Criminal Law) और दीवानी कानून (Civil Law) में कोई तीन मुख्य अंतर लिखिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: दोनों में मुख्य अंतर इस प्रकार हैं:

  1. अपराध का स्वरूप: फौजदारी कानून ऐसे कृत्यों से संबंधित है जिन्हें समाज के विरुद्ध अपराध माना जाता है (जैसे हत्या, डकैती, चोरी, दहेज प्रताड़ना)। जबकि दीवानी कानून दो व्यक्तियों के निजी अधिकारों के हनन से संबंधित होता है (जैसे जमीन का विवाद, किराया समझौता, तलाक)।
  2. शुरुआत की प्रक्रिया: फौजदारी मामलों की शुरुआत पुलिस थाने में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने से होती है जिसके बाद पुलिस जांच करती है। जबकि दीवानी मामलों में पीड़ित पक्ष सीधे अदालत में याचिका (Petition) दायर करता है।
  3. परिणाम / फैसला: फौजदारी मामले में दोषी को जेल की सजा या जुर्माना होता है। दीवानी मामले में अदालत नुकसान की भरपाई, मुआवजा देने या मकान खाली कराने का आदेश देती है।
उदाहरण 4
प्रश्न 4: जनहित याचिका (PIL) क्या है और इसने आम जनता तक न्याय की पहुँच को कैसे बदला?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: जनहित याचिका (Public Interest Litigation - PIL): 1980 के दशक में सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित याचिका की क्रांतिकारी व्यवस्था शुरू की। इसके अनुसार, यदि किसी गरीब, अशिक्षित या शोषित वर्ग के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा हो और वे अदालत जाने में असमर्थ हों, तो उनकी ओर से कोई भी अन्य नागरिक या सामाजिक संगठन सीधे हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सकता है। बदलाव:

  1. इसके लिए भारी फीस या वकीलों के लंबे तामझाम की जरूरत नहीं है; एक साधारण पत्र या पोस्टकार्ड को भी अदालत रिट याचिका मान सकती है।
  2. इसके माध्यम से बिहार के विचाराधीन कैदियों की रिहाई, बंधुआ मजदूरों की मुक्ति और सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए दोपहर के भोजन (Mid-Day Meal) की व्यवस्था जैसे ऐतिहासिक जन-कल्याणकारी फैसले हुए।
उदाहरण 5
प्रश्न 5: "देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है" (Justice Delayed is Justice Denied)—इस कथन की समीक्षा भारतीय अदालतों के संदर्भ में कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: इस कथन का अर्थ है कि यदि किसी पीड़ित को न्याय मिलने में कई दशक बीत जाएँ, तो उस न्याय का कोई मानवीय या व्यावहारिक मूल्य नहीं रह जाता। भारतीय संदर्भ में चुनौतियाँ:

  1. मुकदमों का भारी अंबार: भारत की अदालतों में करोड़ों मुकदमे वर्षों से लंबित (Pending) हैं।
  2. न्यायाधीशों की कमी: देश की जनसंख्या के अनुपात में जजों की संख्या बहुत कम है, जिससे मुकदमों की सुनवाई में तारीख पर तारीख मिलती रहती है।
  3. आम जनता की पीड़ा: कई मामलों में पीड़ित या गवाह की पूरी जिंदगी बीत जाती है, भारी धन खर्च हो जाता है और न्याय मिलने तक उसकी मृत्यु हो जाती है। अतः अदालतों में त्वरित न्याय (Fast-track justice) की व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

छात्र अक्सर मान लेते हैं कि पुलिस ही अदालत की तरह सजा सुना सकती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पुलिस का कार्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना, FIR दर्ज करना और अपराध की जांच करना है। किसी को दोषी या निर्दोष ठहराने और सजा सुनाने का एकमात्र अधिकार न्यायपालिका (अदालत) को है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह भ्रम होना कि PIL केवल वही व्यक्ति दायर कर सकता है जिसका व्यक्तिगत नुकसान हुआ हो।

सही वैज्ञानिक तथ्य

PIL की यही खासियत है कि कोई भी जागरूक नागरिक या गैर-सरकारी संगठन (NGO) किसी अन्य वंचित समूह के जनहित के मुद्दे पर अदालत जा सकता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि हाई कोर्ट का फैसला सुप्रीम कोर्ट से बड़ा या अंतिम होता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) देश की शीर्ष अदालत है। इसका फैसला सभी हाई कोर्ट्स और निचली अदालतों पर अंतिम और सर्वोपरि होता है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

भारत की एकीकृत न्यायपालिका का पदानुक्रम (Hierarchy of Indian Judiciary) स्वतंत्र, निष्पक्ष व एकीकृत अपीलीय प्रणाली (Integrated Appellate System) 1. भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India - नई दिल्ली) • देश की शीर्ष अदालत • मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता में • संविधान का अंतिम व्याख्याकार • इसके फैसले देश की सभी अदालतों पर अंतिम व बाध्यकारी अपीलीय मार्ग 2. उच्च न्यायालय (High Courts - जैसे झारखण्ड उच्च न्यायालय, राँची) • प्रत्येक राज्य की सर्वोच्च अदालत • मुख्य न्यायाधीश व अन्य जज • जिला अदालतों के फैसलों के विरुद्ध अपील की सुनवाई • मौलिक अधिकारों हेतु रिट जारी करने की शक्ति 3. अधीनस्थ एवं जिला अदालतें (Subordinate & District Courts) फौजदारी अदालतें (सत्र न्यायालय - Sessions Court) • अपराध, हत्या, चोरी, डकैती, मारपीट के मुकदमे पुलिस FIR से प्रक्रिया शुरू • सजा या कारावास दीवानी अदालतें (सिविल कोर्ट - Civil Court) • जमीन, संपत्ति, अनुबंध, किराया, तलाक के विवाद पीड़ित द्वारा अर्जी • क्षतिपूर्ति व राहत का आदेश

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. न्यायपालिका देश में कानून के शासन (Rule of Law) की संरक्षक और संविधान की अंतिम व्याख्याकार संस्था है।
मुख्य बिंदु 2
  1. स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए शक्तियों का पृथक्करण और न्यायाधीशों के पद की संवैधानिक सुरक्षा (महाभियोग प्रक्रिया) आवश्यक है।
मुख्य बिंदु 3
  1. भारत में एकीकृत त्रिस्तरीय न्यायिक व्यवस्था है: सर्वोच्च न्यायालय (शीर्ष), उच्च न्यायालय (राज्य स्तर), और जिला व अधीनस्थ अदालतें।
मुख्य बिंदु 4
  1. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय देश की सभी निचली अदालतों पर अनिवार्य और अंतिम रूप से बाध्यकारी होते हैं।
मुख्य बिंदु 5
  1. अपीलीय प्रणाली के तहत यदि कोई नागरिक निचली अदालत के निर्णय से असंतुष्ट है, तो वह उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकता है।
मुख्य बिंदु 6
  1. फौजदारी कानून समाज के विरुद्ध गंभीर अपराधों (हत्या, चोरी, दहेज उत्पीड़न) से संबंधित है, जिसकी शुरुआत पुलिस FIR से होती है।
मुख्य बिंदु 7
  1. दीवानी कानून व्यक्तियों के निजी अधिकारों (जमीन विवाद, अनुबंध, किराया, तलाक) से संबंधित है जिसमें सीधे अदालत में याचिका दायर की जाती है।
मुख्य बिंदु 8
  1. 1980 के दशक में शुरू हुई जनहित याचिका (PIL) ने न्याय तक आम और गरीब जनता की पहुँच को क्रांतिकारी रूप से सुलभ बना दिया।
मुख्य बिंदु 9
  1. जनहित याचिका के ऐतिहासिक फैसलों द्वारा ही देश के सभी सरकारी स्कूलों में बच्चों को दोपहर का मुफ्त भोजन (Mid-Day Meal) मिलना शुरू हुआ।
मुख्य बिंदु 10
  1. अदालतों में लंबित करोड़ों मुकदमे और जजों की कमी "देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है" की सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना किस तिथि को हुई थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 26 जनवरी 1950
भारत के गणतंत्र बनने के साथ ही 26 जनवरी 1950 को सर्वोच्च न्यायालय की विधिवत स्थापना हुई थी।
2
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और सर्वोच्च न्यायालय के जजों को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या कहलाती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: महाभियोग (Impeachment)
न्यायाधीशों को केवल संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत द्वारा महाभियोग प्रस्ताव पारित करके ही हटाया जा सकता है।
3
फौजदारी (आपराधिक) कानून के मामलों में अदालती या पुलिस प्रक्रिया किस दस्तावेज के दर्ज होने से शुरू होती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR - First Information Report)
पुलिस किसी भी संज्ञेय अपराध की जांच थाने में FIR दर्ज करने के बाद ही विधिवत प्रारंभ करती है।
4
जनहित याचिका (PIL) का पूरा नाम क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (Public Interest Litigation)
PIL का अर्थ जनहित याचिका है, जो गरीबों और वंचितों के सामूहिक अधिकारों की रक्षा हेतु कोई भी नागरिक दायर कर सकता है।
5
झारखण्ड उच्च न्यायालय (High Court) किस शहर में स्थित है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: राँची
15 नवंबर 2000 को झारखण्ड राज्य निर्माण के साथ ही राजधानी राँची में झारखण्ड उच्च न्यायालय स्थापित किया गया।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

ऑनलाइन CBT टेस्ट देकर तैयारी का मूल्यांकन करें

झारखण्ड बोर्ड परीक्षा पैटर्न पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्नों का ऑनलाइन टेस्ट दें। तुरंत परिणाम, समय विश्लेषण और प्रत्येक प्रश्न का विस्तृत हल प्राप्त करें।

कक्षा 8 Social Science के सभी अध्याय

अध्याय 1: कैसे, कब और कहाँ (How, When and Where) अध्याय 2: व्यापार से साम्राज्य तक (From Trade to Territory) अध्याय 3: ग्रामीण क्षेत्र पर शासन चलाना (Ruling the Countryside) अध्याय 4: आदिवासी, दीकु और एक स्वर्ण युग की कल्पना (Tribals, Dikus and the Vision of a Golden Age) अध्याय 5: जब जनता बगावत करती है (1857 और उसके बाद) (When People Rebel) अध्याय 6: देशी जनता को सभ्य बनाना, राष्ट्र को शिक्षित करना (Civilising the Native, Educating the Nation) अध्याय 7: महिलाएं, जाति एवं सुधार (Women, Caste and Reform) अध्याय 8: राष्ट्रीय आंदोलन का संघटन: 1870 के दशक से 1947 तक (The Making of the National Movement: 1870s-1947) अध्याय 9: संसाधन (Resources) (Resources) अध्याय 10: भूमि, मृदा, जल, प्राकृतिक वनस्पति और वन्य जीवन संसाधन (Land, Soil, Water, Natural Vegetation and Wildlife Resources) अध्याय 11: कृषि (Agriculture) अध्याय 12: उद्योग (Industries) (Industries) अध्याय 13: मानव संसाधन (Human Resources) (Human Resources) अध्याय 14: भारतीय संविधान (The Indian Constitution) (The Indian Constitution) अध्याय 15: धर्मनिरपेक्षता की समझ (Understanding Secularism) अध्याय 16: संसद तथा कानूनों का निर्माण (Parliament and the Making of Laws) अध्याय 17: न्यायपालिका (Judiciary) (Judiciary) अध्याय 18: हाशियाकरण की समझ (Understanding Marginalisation) अध्याय 19: हाशियाकरण से निपटना (Confronting Marginalisation) अध्याय 20: जनसुविधाएं (Public Facilities) (Public Facilities) अध्याय 21: कानून और सामाजिक न्याय (Law and Social Justice)

AI अध्ययन मित्र

त्वरित शंका समाधान

न्यायपालिका (Judiciary) (Judiciary) में कोई संदेह या प्रश्न है? हमारे AI अध्ययन मित्र से तुरंत समझें।