'साखी' (कबीरदास) - दोहे, भावार्थ एवं दार्शनिक मर्म:
संत कबीरदास जी निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा के सर्वोच्च कवि हैं। उनकी भाषा सधुक्कड़ी (पंचमेल खिचड़ी) है। 'साखी' का अर्थ है 'साक्षी' (प्रत्यक्ष ज्ञान का साक्षात्कार)।
प्रमुख दोहे एवं विस्तृत व्याख्या:
दोहा 1:
"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥"
भावार्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि यदि मेरे समक्ष गुरु और साक्षात् ईश्वर दोनों एक साथ प्रकट हो जाएं, तो मैं पहले किसके चरण स्पर्श करूँ? यह एक धर्मसंकट की स्थिति है। किंतु कबीर विवेकपूर्वक निर्णय लेते हुए कहते हैं कि मैं सर्वप्रथम अपने सद्गुरु के चरणों में शीश नवाऊंगा, क्योंकि गुरु ही वह महान पथप्रदर्शक हैं जिन्होंने मुझे ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाया है। अतः गुरु का स्थान ईश्वर से भी उच्चतर है।
दोहा 2:
"जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माहिं॥"
भावार्थ: यहाँ 'मैं' शब्द अहंकार (Ego) का प्रतीक है तथा 'हरि' परमात्मा के प्रतीक हैं। कबीर कहते हैं कि जब तक मेरे हृदय में अहंकार का वास था, तब तक ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकी। किंतु जैसे ही ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश अंतःकरण में प्रज्वलित हुआ, अज्ञान का सारा अंधकार छंट गया और अहंकार विलीन हो गया। ईश्वर और अहंकार दोनों एक ही हृदय में एक साथ नहीं रह सकते।
दोहा 3:
"कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूंढ़ै बन माहिं।
ऐसैं घटि-घटि राम हैं, दुनिया देखै नाहिं॥"
भावार्थ: कस्तूरी नामक सुगंधित पदार्थ हिरण की अपनी नाभि (कुंडल) में ही विद्यमान रहता है, किंतु वह उसकी मनमोहक सुगंध से आकर्षित होकर उसे समूचे जंगल में ढूँढ़ता फिरता है। ठीक इसी प्रकार, परमात्मा प्रत्येक प्राणी के हृदय में घट-घट में वास करते हैं, किंतु अज्ञानी मानव बाह्य आडंबरों, तीर्थों और मंदिरों में उन्हें खोजता फिरता है।
दोहा 4:
"पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥"
भावार्थ: सांसारिक मनुष्य भारी-भरकम धार्मिक ग्रंथों और पोथियों को पढ़ते-पढ़ते मृत्यु को प्राप्त हो गए, किंतु कोई भी वास्तविक ज्ञानी न बन सका। कबीर के अनुसार जिसने ईश्वर और मानवता के प्रति निष्काम 'प्रेम' के ढाई अक्षर को आत्मसात कर लिया, वही वास्तव में सच्चा पंडित और प्रबुद्ध है।