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JAC • Class X • Social Science • Ch 19
Estimated Time: 45 Mins
Study Progress: In Progress

Federalism

संघवाद लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का वह सशक्त ढांचा है जिसके अंतर्गत सत्ता का विभाजन एक केंद्रीय प्राधिकरण और उसकी विभिन्न घटक इकाइयों (राज्यों/प्रांतों) के मध्य किया जाता है। एकात्मक शासन (Unitary System) के विपरीत, जहाँ शासन का एक ही स्तर होता है और बाकी इकाइयाँ उसके अधीन होती हैं (जैसे ब्रिटेन व श्रीलंका), संघीय शासन (Federal System) में केंद्र और राज्य दोनों सरकारें संविधान द्वारा प्रदत्त अपनी स्वतंत्र शक्तियों का उपयोग करती हैं और अपने-अपने अधिकार-क्षेत्र में जनता के प्रति सीधे जवाबदेह होती हैं। संघवाद के दोहरे उद्देश्य होते हैं: देश की एकता की सुरक्षा व उसे बढ़ावा देना तथा साथ ही क्षेत्रीय और भाषाई विविधताओं का पूरा सम्मान करना। भारत एक 'सबको साथ लेकर चलने वाला संघ' (Holding Together Federation) है, जिसके संविधान में भारत को 'राज्यों का संघ' (Union of States) कहा गया है। संविधान की तीन विधायी सूचियाँ—संघ सूची (रक्षा, विदेश, बैंकिंग), राज्य सूची (पुलिस, कृषि, व्यापार), और समवर्ती सूची (शिक्षा, वन, विवाह)—शक्तियों का स्पष्ट, त्रिस्तरीय और विवाद-रहित बंटवारा करती हैं, जबकि नए विषयों (जैसे कंप्यूटर सॉफ्टवेयर) को 'अवशिष्ट शक्तियों' (Residuary Powers) के तहत केंद्र को सौंपा गया है। भारत में संघवाद की वास्तविक सफलता भाषाई राज्यों के निर्माण, लचीली त्रिभाषी भाषा नीति (22 अनुसूचित भाषाएं), और 1990 के बाद उभरे 'गठबंधन सरकारों के दौर' द्वारा केंद्र-राज्य संबंधों में आई स्वायत्तता पर टिकी है। 1992 के ऐतिहासिक 73वें और 74वें संविधान संशोधन ने स्थानीय स्वशासन (पंचायती राज और नगरपालिकाएं) को संवैधानिक दर्जा देकर तथा महिलाओं को 1/3 आरक्षण देकर दुनिया के सबसे बड़े 'लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण' की नींव रखी। इस अध्याय में हम इन सभी संघीय आयामों का विस्तृत, प्रामाणिक और परीक्षा-उन्मुख अध्ययन करेंगे।

क्या दिल्ली में बैठा प्रधानमंत्री आपके गांव की नाली और स्कूल का फैसला कर सकता है?

जरा सोचिए: यदि देश की सेना की तैनाती, परमाणु बम का बटन, और आपके गांव की कच्ची सड़क व हैंडपंप की मरम्मत—सबके लिए केवल नई दिल्ली के एक दफ्तर से हुक्म जारी हो, तो क्या कोई देश चल सकता है? भारत जैसे 140 करोड़ आबादी और 28 राज्यों वाले विशाल महादेश में ऐसा सोचना भी असंभव है! इसीलिए हमारे संविधान निर्माताओं ने जादुई व्यवस्था बनाई जिसे 'संघवाद' कहते हैं। देश की सरहद की रक्षा केंद्र सरकार करेगी, राज्य की पुलिस राज्य सरकार संभालेगी, और आपके मोहल्ले की रोशनी आपकी चुनी हुई पंचायत या नगरपालिका करेगी! आइए जानें कि कैसे संघवाद भारत की विविधता को एकता की अटूट डोर में पिरोता है!

Why This Chapter Matters

JAC और CBSE कक्षा 10वीं बोर्ड परीक्षा में 'संघवाद' नागरिक शास्त्र खंड का सर्वाधिक अंक-भार वाला तकनीकी अध्याय है। एकात्मक बनाम संघीय शासन व्यवस्था में अंतर, संघवाद की प्रमुख सात विशेषताएं, 'साथ आकर संघ बनाना' (Coming Together) बनाम 'सबको साथ लेकर संघ बनाना' (Holding Together) की तुलना, संविधान की तीन विधायी सूचियां (संघ, राज्य, समवर्ती सूची व अवशिष्ट शक्तियां), भारत की भाषाई नीति और भाषाई राज्यों का गठन, 1990 के बाद केंद्र-राज्य संबंधों में बदलाव, तथा 1992 के 73वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज विकेंद्रीकरण के प्रावधानों पर 3 से 5 अंकों के विश्लेषणात्मक प्रश्न प्रतिवर्ष अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।

Before You Begin (Prerequisites)

  • संविधान, संसद और राज्य विधानसभाओं की प्राथमिक अवधारणा।
  • केंद्र सरकार (प्रधानमंत्री) और राज्य सरकार (मुख्यमंत्री) के कार्यक्षेत्र का सामान्य ज्ञान।
  • गांवों में मुखिया/प्रधान (पंचायत) और शहरों में वार्ड पार्षद की भूमिका से सामान्य परिचय।

What You Will Learn (Core Objectives)

  • संघवाद की परिभाषा, एकात्मक शासन से इसकी भिन्नता और संघवाद की सात प्रमुख विशेषताओं का विश्लेषण करना।
  • 'साथ आकर संघ बनाना' (USA) और 'सबको साथ लेकर संघ बनाना' (भारत) के मध्य संरचनात्मक अंतर स्पष्ट करना।
  • भारतीय संविधान की त्रि-स्तरीय विधायी सूचियों (संघ, राज्य, समवर्ती सूची) और अवशिष्ट शक्तियों का परीक्षण करना।
  • भाषाई राज्यों के निर्माण, 22 अनुसूचित भाषाओं वाली भारत की भाषा नीति और 1990 के बाद गठबंधन युग में संघवाद के सुदृढ़ीकरण की व्याख्या करना।
  • 1992 के 73वें व 74वें संविधान संशोधन के तहत लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण (पंचायती राज व स्थानीय शासन) के संवैधानिक प्रावधानों का मूल्यांकन करना।

Chapter Roadmap & Progression

1 1. संघवाद क्या है? एकात्मक बनाम संघ...
2 2. संघों के गठन के दो ऐतिहासिक तरीक...
3 3. भारत में संघीय व्यवस्था: तीन विध...
4 4. भारत में संघवाद का व्यवहारिक संच...
5 5. भारत में विकेंद्रीकरण: 1992 का 7...

Complete Concept Guide (100% Curriculum Coverage)

1. संघवाद क्या है? एकात्मक बनाम संघीय शासन व्यवस्था

1.1 संघवाद की परिभाषा एवं एकात्मक व्यवस्था से अंतर

संघवाद (Federalism): शासन की वह व्यवस्था है जिसमें सत्ता का विभाजन एक केंद्रीय सत्ता और उसकी विभिन्न घटक इकाइयों (राज्यों या प्रांतों) के बीच होता है।

तुलना का आधारसंघीय शासन व्यवस्था (Federal System)एकात्मक शासन व्यवस्था (Unitary System)
सरकारों के स्तरशासन के दो या दो से अधिक स्तर होते हैं (जैसे केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकार)।शासन का केवल एक ही स्तर होता है; बाकी उप-इकाइयाँ उसके पूरी तरह अधीन होकर काम करती हैं।
संवैधानिक शक्तियांराज्य सरकारों की अपनी शक्तियां होती हैं जो उन्हें सीधे संविधान द्वारा दी जाती हैं; केंद्र सरकार उन्हें मनमाने ढंग से छीन नहीं सकती।केंद्रीय सरकार प्रांतीय या स्थानीय सरकारों को कोई भी आदेश दे सकती है या जब चाहे उन्हें भंग कर सकती है।
जवाबदेहीराज्य सरकारें अपने अधिकार क्षेत्र के कार्यों के लिए केंद्रीय सरकार के प्रति नहीं, बल्कि सीधे जनता के प्रति जवाबदेह होती हैं।स्थानीय या प्रांतीय सरकारें पूरी तरह केंद्रीय सरकार के प्रति जवाबदेह होती हैं।
प्रमुख उदाहरणभारत, बेल्जियम, अमेरिका, स्विट्जरलैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया।ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, श्रीलंका, जापान।

1.2 संघवाद की सात प्रमुख विशेषताएं (Key Features of Federalism)

  1. सरकारों के दो या अधिक स्तर: यहाँ सरकार के दो या उससे अधिक स्तर (टियर) होते हैं।
  2. अलग-अलग अधिकार-क्षेत्र (Jurisdiction): अलग-अलग स्तर की सरकारें एक ही नागरिक समूह पर शासन करती हैं, परंतु कानून बनाने, कर वसूलने और प्रशासन का उनका अपना विशिष्ट अधिकार-क्षेत्र होता है।
  3. संवैधानिक गारंटी: विभिन्न स्तरों की सरकारों के अधिकार-क्षेत्र संविधान में स्पष्ट रूप से दर्ज होते हैं; अतः उनके अस्तित्व और प्राधिकार की संवैधानिक गारंटी होती है।
  4. संविधान में एकतरफा बदलाव असंभव: संविधान के मौलिक प्रावधानों को किसी एक स्तर की सरकार अकेले नहीं बदल सकती। ऐसे बदलावों के लिए केंद्र और राज्यों दोनों की सहमति आवश्यक होती है।
  5. अदालतों की सर्वोच्चता (स्वतंत्र न्यायपालिका): अदालतों को संविधान और विभिन्न स्तर की सरकारों के अधिकारों की व्याख्या करने का अधिकार है। यदि विभिन्न स्तरों के बीच अधिकारों का टकराव हो, तो सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) एक निष्पक्ष अंपायर (Deciding Umpire) की भूमिका निभाता है।
  6. वित्तीय स्वायत्तता: वित्तीय स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न स्तरों की सरकारों के लिए राजस्व के अलग-अलग स्रोत संविधान में स्पष्ट रूप से निर्धारित होते हैं।
  7. संघीय व्यवस्था के दोहरे उद्देश्य: (क) देश की एकता की रक्षा करना और उसे सुदृढ़ करना, तथा (ख) क्षेत्रीय और सांस्कृतिक विविधताओं का पूरा सम्मान और समायोजन करना।

2. संघों के गठन के दो ऐतिहासिक तरीके: साथ आना बनाम सबको साथ रखना

2.1 'साथ आकर संघ बनाना' बनाम 'सबको साथ लेकर संघ बनाना'

विभिन्न देशों में संघों का गठन दो बिल्कुल अलग ऐतिहासिक संदर्भों में हुआ है:

तुलना का बिंदु1. साथ आकर संघ बनाना (Coming Together)2. सबको साथ लेकर संघ बनाना (Holding Together)
गठन की प्रक्रियादो या अधिक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र अपनी इच्छा से एक साथ आकर एक बड़ा संघ बनाते हैं, ताकि वे अपनी संप्रभुता को साझा करते हुए और अपनी अलग पहचान बनाए रखते हुए अपनी सुरक्षा को बढ़ा सकें।एक बड़ा और विविधतापूर्ण देश अपनी आंतरिक विविधताओं और विशालता को ध्यान में रखते हुए सत्ता का बंटवारा राज्यों (प्रांतों) और राष्ट्रीय सरकार के बीच कर देता है।
प्रांतों के अधिकारआमतौर पर सभी घटक राज्यों (प्रांतों) को समान अधिकार प्राप्त होते हैं और वे केंद्र के मुकाबले काफी अधिक शक्तिशाली और स्वायत्त होते हैं।अक्सर घटक राज्यों को समान अधिकार नहीं होते; केंद्र सरकार राज्यों की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली होती है। कुछ विशेष राज्यों को विशेष संवैधानिक दर्जे (जैसे पूर्वोत्तर राज्यों को अनुच्छेद 371) दिए जाते हैं।
प्रमुख उदाहरणसंयुक्त राज्य अमेरिका (USA), स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रेलिया।भारत, स्पेन और बेल्जियम।

3. भारत में संघीय व्यवस्था: तीन विधायी सूचियां एवं अवशिष्ट शक्तियां

3.1 भारत: राज्यों का संघ (Union of States)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को 'राज्यों का संघ' घोषित किया गया है। यद्यपि संविधान में 'फेडरेशन' (संघ) शब्द का उपयोग नहीं हुआ है, परंतु भारतीय संघ का ढांचा पूरी तरह संघीय सिद्धांतों पर आधारित है।

3.2 संविधान की तीन विधायी सूचियां (Three Lists)

संविधान ने केंद्र और राज्य सरकारों के बीच विधायी शक्तियों को तीन सूचियों में स्पष्ट रूप से विभाजित किया है:

सूची का नामविषयों की प्रकृतिकानून बनाने का अधिकार एवं प्रमुख विषय
1. संघ सूची (Union List)
(मूलतः 97, वर्तमान में 100 विषय)
राष्ट्रीय महत्व के विषय, जिनके लिए पूरे देश में एक समान नीति होना अनिवार्य है।इस पर कानून बनाने का अनन्य अधिकार केवल केंद्र सरकार (संसद) को है।
प्रमुख विषय: देश की रक्षा, विदेश नीति, बैंकिंग, संचार, मुद्रा (करेंसी), और रेलवे।
2. राज्य सूची (State List)
(मूलतः 66, वर्तमान में 61 विषय)
प्रांतीय और स्थानीय महत्व के विषय, जो राज्य स्तर की जरूरतों से जुड़े होते हैं।इस पर कानून बनाने का सामान्य अधिकार केवल राज्य विधानमंडल को होता है।
प्रमुख विषय: पुलिस, व्यापार, वाणिज्य, कृषि, सिंचाई, और जेल।
3. समवर्ती सूची (Concurrent List)
(मूलतः 47, वर्तमान में 52 विषय)
वे विषय जो केंद्र और राज्य दोनों के साझे हित और सरोकार से संबंधित हैं।इस पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
विवाद की स्थिति: यदि दोनों के कानूनों में कोई टकराव या विरोधाभास होता है, तो केंद्र सरकार द्वारा बनाया गया कानून ही मान्य होगा और राज्य का कानून उस सीमा तक निरस्त हो जाएगा।
प्रमुख विषय: शिक्षा, वन, मजदूर संघ (ट्रेड यूनियन), विवाह, गोद लेना, और उत्तराधिकार।

3.3 अवशिष्ट शक्तियां (Residuary Powers)

अवशिष्ट शक्तियां: वे सभी विषय जो संविधान बनते समय अस्तित्व में नहीं थे और किसी भी सूची (संघ, राज्य या समवर्ती) में शामिल नहीं हैं—जैसे कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, इंटरनेट और साइबर कानून। भारतीय संविधान के अनुसार इन अवशिष्ट विषयों पर कानून बनाने का पूरा अधिकार केवल केंद्र सरकार (संसद) के पास है।

4. भारत में संघवाद का व्यवहारिक संचालन: भाषाई राज्य, भाषा नीति एवं केंद्र-राज्य संबंध

4.1 भाषाई राज्यों का गठन (Creation of Linguistic States)

1947 में भारत की स्वतंत्रता के समय पुराने कई प्रांतों की सीमाएं बदली गईं ताकि एक ही भाषा बोलने वाले लोग एक राज्य में आ सकें (जैसे आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात):

  • आरंभिक भय: आजादी के समय हमारे नेताओं को डर था कि भाषा के आधार पर राज्य बनाने से देश टूट जाएगा या बिखर जाएगा। इसलिए कुछ समय के लिए भाषाई राज्यों की मांग को टाला गया।
  • सकारात्मक परिणाम: परंतु अनुभव ने सिद्ध कर दिया कि भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन से देश टूटा नहीं, बल्कि देश पहले से अधिक एकीकृत, मजबूत और सुशासित हुआ। इससे प्रशासन चलाना भी कहीं अधिक सरल हो गया।

4.2 भारत की संतुलित भाषा नीति (Language Policy)

श्रीलंका की तरह भारत ने किसी एक भाषा को पूरे देश पर थोपने की गलती नहीं की:

  • कोई राष्ट्रभाषा नहीं: हमारे संविधान में किसी एक भाषा को 'राष्ट्रभाषा' (National Language) का दर्जा नहीं दिया गया।
  • हिंदी राजभाषा: हिंदी को आधिकारिक राजभाषा (Official Language) घोषित किया गया, परंतु हिंदी भारत की केवल लगभग 40% आबादी की ही मातृभाषा है।
  • 22 अनुसूचित भाषाएं (Eighth Schedule): संविधान की आठवीं अनुसूची में हिंदी के अतिरिक्त 21 अन्य भाषाओं को 'अनुसूचित भाषाएं' (Scheduled Languages) के रूप में मान्यता दी गई है (कुल 22 भाषाएं)। केंद्र सरकार की किसी भी नौकरी की परीक्षा का उम्मीदवार इनमें से किसी भी भाषा में परीक्षा दे सकता है।
  • अंग्रेजी का प्रयोग जारी: 1965 में जब गैर-हिंदी भाषी राज्यों (विशेषकर तमिलनाडु) में हिंसक आंदोलन भड़का, तो केंद्र सरकार ने हिंदी के साथ-साथ सरकारी कामकाजों में अंग्रेजी के प्रयोग को जारी रखने की अनुमति दी। इस लचीली नीति ने भारत को श्रीलंका जैसे भाषाई गृहयुद्ध से बचा लिया।

4.3 केंद्र-राज्य संबंध एवं 1990 के बाद का बदलाव

काफी लंबे समय तक भारत में केंद्र और अधिकांश राज्यों में एक ही राजनीतिक दल (कांग्रेस) का शासन रहा। उस दौर में केंद्र सरकार अक्सर संविधान के अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग करके विपक्षी दलों की राज्य सरकारों को मनमाने ढंग से बर्खास्त कर देती थी, जिससे संघवाद की भावना आहत होती थी।

1990 के बाद का नया दौर (गठबंधन सरकारों का युग):
1. क्षेत्रीय दलों का उभार: 1990 के बाद देश के अनेक राज्यों में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का जोरदार उभार हुआ।
2. गठबंधन सरकारें (Coalition Governments): केंद्र में किसी एक दल को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत न मिलने के कारण राष्ट्रीय दलों को अनेक क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर केंद्र में सरकार बनानी पड़ी।
3. स्वायत्तता का सम्मान: इससे सत्ता में साझेदारी और राज्य सरकारों की स्वायत्तता का आदर करने की एक नई राजनीतिक संस्कृति पनपी।
4. सर्वोच्च न्यायालय का कड़ा रुख: सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले द्वारा केंद्र सरकार के लिए राज्य सरकारों को मनमाने ढंग से बर्खास्त करना कानूनी रूप से अत्यंत कठिन बना दिया। परिणामस्वरूप, आज भारत में संघवाद 1950 या 1970 के दशक की तुलना में कहीं अधिक मजबूत और जीवंत है।

5. भारत में विकेंद्रीकरण: 1992 का 73वां संविधान संशोधन एवं पंचायती राज

5.1 विकेंद्रीकरण (Decentralisation) की आवश्यकता

विकेंद्रीकरण का अर्थ: जब केंद्र और राज्य सरकारों से कुछ शक्तियां और अधिकार लेकर स्थानीय स्तर की सरकारों (पंचायतों और नगरपालिकाओं) को सौंप दिए जाते हैं, तो इसे 'सत्ता का विकेंद्रीकरण' कहते हैं।

विकेंद्रीकरण के पीछे मुख्य तर्क:
1. अनेक समस्याओं और मुद्दों का निपटारा स्थानीय स्तर पर ही सबसे बेहतर तरीके से हो सकता है。
2. स्थानीय लोगों को अपने इलाके की समस्याओं (जैसे पानी की टंकी, स्कूल, नाली) की सबसे अच्छी समझ होती है。
3. उन्हें इस बात की बेहतर जानकारी होती है कि पैसा कहाँ खर्च किया जाए और चीजों का इस्तेमाल कुशलता से कैसे हो。
4. यह नागरिकों को सीधे शासन और निर्णय प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर देता है जिससे 'लोकतांत्रिक सहभागिता' की आदत पड़ती है।

5.2 1992 का 73वां एवं 74वां संविधान संशोधन (पंचायती राज का कायाकल्प)

1992 से पहले स्थानीय निकाय केवल कागजों पर थे; उनके नियमित चुनाव नहीं होते थे और उनके पास न कोई शक्ति थी और न ही अपने वित्तीय संसाधन। 1992 के संशोधन ने स्थानीय स्वशासन को वास्तविक और शक्तिशाली बनाया:

प्रावधान1992 के संविधान संशोधन के प्रमुख बिंदु
1. नियमित चुनाव की अनिवार्यताअब स्थानीय स्वशासी निकायों के चुनाव हर 5 वर्ष में नियमित रूप से कराना संवैधानिक बाध्यता बना दिया गया।
2. वंचित वर्गों हेतु आरक्षणनिर्वाचित निकायों के सदस्य और पदाधिकारियों के पदों में अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST) और अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के लिए सीटें आरक्षित की गईं।
3. महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षणसभी स्तरों पर कम से कम एक-तिहाई (1/3 या 33%) पद महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए (वर्तमान में कई राज्यों जैसे बिहार, झारखंड में यह 50% है)। इसने महिला सशक्तीकरण में क्रांति ला दी।
4. राज्य चुनाव आयोग (State Election Commission)हर राज्य में पंचायतों और नगरपालिकाओं के निष्पक्ष व स्वतंत्र चुनाव कराने के लिए एक स्वतंत्र 'राज्य चुनाव आयोग' का गठन किया गया।
5. राजस्व और शक्तियों का बंटवाराराज्य सरकारों के लिए अपने राजस्व और अधिकारों का कुछ हिस्सा इन स्थानीय निकायों को सौंपना अनिवार्य किया गया।

5.3 स्थानीय शासन की त्रिस्तरीय संरचना (ग्रामीण एवं शहरी)

  • ग्रामीण स्थानीय शासन (पंचायती राज):
    • ग्राम स्तर (ग्राम पंचायत): प्रत्येक गांव में एक ग्राम पंचायत होती है जिसके राजनीतिक मुखिया को 'सरपंच' या 'मुखिया' कहते हैं। इसके सभी मतदाता 'ग्राम सभा' के सदस्य होते हैं जो साल में 2-3 बार बैठक कर बजट और विकास कार्यों की समीक्षा करते हैं।
    • प्रखंड / ब्लॉक स्तर (पंचायत समिति / मंडल): कई ग्राम पंचायतों को मिलाकर एक पंचायत समिति बनती है। इसके सदस्यों का चुनाव उस इलाके के सभी पंचायत सदस्य करते हैं।
    • जिला स्तर (जिला परिषद): किसी जिले की सभी पंचायत समितियों को मिलाकर जिला परिषद बनती है। लोकसभा सांसद, विधायक और जिले के बड़े अधिकारी इसके सदस्य होते हैं; इसका राजनीतिक प्रमुख 'जिला परिषद अध्यक्ष' होता है।
  • शहरी स्थानीय शासन: छोटे शहरों में नगरपालिका (Municipality) होती है जिसका प्रमुख 'नगरपालिका अध्यक्ष' होता है; और बड़े महानगरों में नगर निगम (Municipal Corporation) होता है जिसके राजनीतिक प्रमुख को 'मेयर' (महापौर) कहा जाता है।

Key Historical Terms, Chronology & Administrative Principles

संघवाद (Federalism)
केंद्रीय सत्ता और विभिन्न घटक राज्यों के बीच सत्ता का संवैधानिक विभाजन।
संघवाद के 2 उद्देश्य
देश की एकता की रक्षा व संवर्धन + क्षेत्रीय विविधताओं का सम्मान।
Coming Together संघ
स्वतंत्र राष्ट्र मिलकर संघ बनाते हैं (USA, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रेलिया)।
Holding Together संघ
बड़ा देश आंतरिक विविधता हेतु सत्ता बांटता है (भारत, स्पेन, बेल्जियम)।
संघ सूची (100 विषय)
रक्षा, विदेश, बैंकिंग, मुद्रा, रेलवे; कानून केवल संसद बनाती है।
राज्य सूची (61 विषय)
पुलिस, व्यापार, वाणिज्य, कृषि, सिंचाई; कानून राज्य विधानमंडल बनाता है।
समवर्ती सूची (52 विषय)
शिक्षा, वन, विवाह, ट्रेड यूनियन; टकराव में केंद्र का कानून मान्य।
अवशिष्ट शक्तियां (Cyber)
कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, इंटरनेट; कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र को।
22 अनुसूचित भाषाएं
संविधान की 8वीं अनुसूची; भारत में किसी एक भाषा को राष्ट्रभाषा नहीं बनाया गया।
1992 का 73वां संशोधन
पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा; नियमित चुनाव, राज्य चुनाव आयोग।
1/3 महिला आरक्षण
स्थानीय निकायों (पंचायतों व नगरपालिकाओं) में 33% सीटें महिलाओं हेतु आरक्षित।
ग्राम सभा व मेयर
ग्राम पंचायत की मतदाता सभा (ग्राम सभा); नगर निगम का राजनीतिक प्रमुख (मेयर)।

Conceptual Solved Examples & Case Studies

Example 1
संघीय शासन व्यवस्था (Federal System) और एकात्मक शासन व्यवस्था (Unitary System) में क्या मूलभूत अंतर है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
Step-by-Step Solution:
संघीय और एकात्मक शासन व्यवस्था में मुख्य अंतर शासन के स्तरों और शक्तियों के विभाजन में निहित है:

तुलना का बिंदुसंघीय शासन व्यवस्था (Federal)एकात्मक शासन व्यवस्था (Unitary)
सरकारों के स्तरशासन के दो या दो से अधिक स्तर (केंद्र, राज्य, स्थानीय निकाय) होते हैं।शासन का केवल एक केंद्रीय स्तर होता है; शेष इकाइयाँ उसके अधीन होती हैं।
शक्तियों का स्रोतराज्य सरकारों को शक्तियां सीधे संविधान द्वारा प्रदान की जाती हैं जिन्हें केंद्र अपनी मर्जी से नहीं छीन सकता।प्रांतीय सरकारों को शक्तियां केंद्र सरकार की दया पर मिलती हैं; केंद्र जब चाहे उन्हें समाप्त कर सकता है।
जवाबदेहीराज्य सरकारें केंद्र के अधीन नहीं होतीं, बल्कि वे अपने कार्यों के लिए सीधे जनता के प्रति जवाबदेह होती हैं।सभी उप-इकाइयाँ केवल केंद्रीय सरकार के प्रति जवाबदेह होती हैं।
उदाहरणभारत, अमेरिका, बेल्जियम, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया।ब्रिटेन, चीन, श्रीलंका, फ्रांस, जापान।
Example 2
भारतीय संविधान में शक्तियों का त्रि-स्तरीय बंटवारा किस प्रकार किया गया है? तीनों सूचियों का सविस्तार वर्णन कीजिए।
Step-by-Step Solution:
भारतीय संविधान ने केंद्र और राज्यों के बीच विधायी अधिकारों को तीन सूचियों में स्पष्ट रूप से बांटा है ताकि कोई टकराव न हो:

1. संघ सूची (Union List):
• इसमें राष्ट्रीय महत्व के विषय शामिल हैं जिनके लिए पूरे देश में एक समान नीति होना आवश्यक है।
• इन विषयों पर कानून बनाने का अनन्य अधिकार केवल संसद (केंद्र सरकार) को प्राप्त है।
• प्रमुख विषय: देश की रक्षा, विदेशी मामले, बैंकिंग, संचार, मुद्रा और रेलवे。

2. राज्य सूची (State List):
• इसमें प्रांतीय और स्थानीय महत्व के विषय आते हैं।
• इन पर सामान्य परिस्थितियों में कानून बनाने का अधिकार राज्य विधानमंडल को होता है।
• प्रमुख विषय: पुलिस, व्यापार, वाणिज्य, कृषि, सिंचाई और जेल प्रशासन。

3. समवर्ती सूची (Concurrent List):
• इसमें वे विषय आते हैं जो केंद्र और राज्यों दोनों के साझे सरोकार के हैं।
• इन पर केंद्र और राज्य दोनों सरकारें कानून बना सकती हैं।
• टकराव की स्थिति: यदि केंद्र और राज्य के बनाए कानून में कोई विरोध या टकराव होता है, तो केंद्र सरकार का कानून मान्य होगा और राज्य का कानून रद्द माना जाएगा।
• प्रमुख विषय: शिक्षा, वन, मजदूर संघ (ट्रेड यूनियन), विवाह, उत्तराधिकार और गोद लेना。

4. अवशिष्ट शक्तियां (Residuary Subjects): जो विषय संविधान निर्माण के समय मौजूद नहीं थे (जैसे कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, आईटी और साइबर अपराध), उन पर कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।
Example 3
भारत की 'भाषा नीति' (Language Policy) की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं? इसने देश को भाषाई गृहयुद्ध से किस प्रकार बचाया?
Step-by-Step Solution:
भारत की भाषा नीति हमारे लोकतंत्र की सबसे संवेदनशील और परिपक्व नीतियों में से एक है। इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

1. किसी एक भाषा को राष्ट्रभाषा न बनाना: भारत के संविधान में किसी भी एक भाषा को 'राष्ट्रभाषा' (National Language) घोषित नहीं किया गया। यद्यपि हिंदी को राजभाषा (Official Language) बनाया गया, परंतु यह ध्यान रखा गया कि हिंदी केवल 40% भारतीयों की ही मातृभाषा है।
2. 22 अनुसूचित भाषाएं (Scheduled Languages): संविधान की आठवीं अनुसूची में हिंदी के अतिरिक्त 21 अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को मान्यता दी गई है। केंद्र सरकार की नौकरियों की प्रतियोगी परीक्षा में उम्मीदवार इनमें से किसी भी भाषा में पर्चा लिख सकता है।
3. राज्यों की अपनी आधिकारिक भाषा: प्रत्येक राज्य को अपनी आधिकारिक भाषा चुनने की छूट है (जैसे तमिलनाडु में तमिल, बंगाल में बांग्ला)। राज्य सरकार का सारा आधिकारिक कामकाज उसकी अपनी भाषा में होता है।
4. अंग्रेजी का विवेकपूर्ण प्रयोग: 1965 में संविधान के अनुसार सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का उपयोग बंद होना था, परंतु दक्षिण भारत (विशेषकर तमिलनाडु) में हिंसक विरोध के बाद केंद्र सरकार ने हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखने का लचीला निर्णय लिया。

गृहयुद्ध से बचाव: श्रीलंका ने अपनी बहुसंख्यक भाषा (सिंहली) को अल्पसंख्यकों पर जबरन थोपकर खूनी गृहयुद्ध झेला; इसके विपरीत भारत के नेताओं ने लचीलापन दिखाकर सभी क्षेत्रीय भाषाओं को सम्मान दिया, जिससे देश की राष्ट्रीय एकता अटूट बनी रही।
Example 4
1990 के बाद भारत में केंद्र-राज्य संबंधों में क्या बड़े बदलाव आए? इसने संघवाद को किस प्रकार मजबूत किया?
Step-by-Step Solution:
1990 से पूर्व भारत में केंद्र और अधिकांश राज्यों में एक ही दल का प्रभुत्व था। केंद्र सरकार अक्सर संविधान के अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग कर राज्यों की विपक्षी सरकारों को बर्खास्त कर देती थी। परंतु 1990 के बाद निम्नलिखित ऐतिहासिक बदलाव आए:

1. क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का अभूतपूर्व उभार: 1990 के दशक में देश के विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों (जैसे सपा, बसपा, द्रमुक, अन्नाद्रमुक, तृणमूल, जदयू, राजद, झामुमो) ने भारी ताकत हासिल की।
2. गठबंधन सरकारों का दौर (Era of Coalition Governments): केंद्र में किसी भी एक राष्ट्रीय दल को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। सरकार बनाने के लिए राष्ट्रीय दलों को इन क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करना पड़ा।
3. राज्यों की स्वायत्तता का सम्मान: गठबंधन की राजनीति के कारण केंद्र सरकार राज्यों की उपेक्षा या उनकी सरकारों को मनमाने ढंग से गिराने का दुस्साहस नहीं कर सकी। क्षेत्रीय आकांक्षाओं और राज्यों की स्वायत्तता का सम्मान करने की एक स्वस्थ लोकतांत्रिक संस्कृति विकसित हुई।
4. सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय (बोम्मई केस): सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा फैसला सुनाते हुए राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) लगाने के नियमों को अत्यंत कठोर और न्यायिक समीक्षा के अधीन बना दिया। इससे केंद्र की मनमानी पर हमेशा के लिए लगाम लग गई और भारतीय संघवाद वास्तव में स्वायत्त और सुदृढ़ हो गया।
Example 5
1992 के 73वें और 74वें संविधान संशोधन द्वारा भारत में 'लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण' (पंचायती राज) को किस प्रकार मजबूत बनाया गया? प्रमुख पांच बिंदुओं की विवेचना कीजिए।
Step-by-Step Solution:
1992 से पहले स्थानीय स्वशासी निकाय केवल राज्यों की दया पर निर्भर थे और अत्यंत निष्प्रभावी थे। 1992 के ऐतिहासिक संविधान संशोधन ने स्थानीय स्वशासन (पंचायती राज और नगरपालिकाओं) को वास्तविक शक्तियां देकर दुनिया के सबसे बड़े विकेंद्रीकरण की स्थापना की:

1. नियमित चुनावों की संवैधानिक बाध्यता: स्थानीय स्वशासी निकायों के चुनाव हर 5 वर्ष में नियमित रूप से कराना राज्य सरकारों के लिए कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया। अब चुनाव टालना संभव नहीं रहा।
2. कमजोर वर्गों (SC/ST/OBC) के लिए आरक्षण: ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों और जिला परिषदों में अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST) और अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित की गईं।
3. महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण: सभी स्तरों पर कम से कम एक-तिहाई (33%) सीटें और अध्यक्ष पद महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए। आज देश की पंचायतों और नगरपालिकाओं में 14 लाख से अधिक निर्वाचित महिलाएं नेतृत्व कर रही हैं, जिसने ग्रामीण भारत में महिला सशक्तीकरण की मूक क्रांति ला दी।
4. स्वतंत्र राज्य चुनाव आयोग का गठन: हर राज्य में पंचायतों और नगरपालिकाओं के स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध चुनाव संपन्न कराने हेतु एक संवैधानिक 'राज्य चुनाव आयोग' (State Election Commission) का गठन किया गया।
5. राजस्व और अधिकारों का अनिवार्य हस्तांतरण: राज्य सरकारों के लिए यह अनिवार्य किया गया कि वे अपने राजस्व (टैक्स) और प्रशासनिक शक्तियों का एक निश्चित हिस्सा इन स्थानीय निकायों को सौंपें ताकि वे स्वतंत्र रूप से अपने गांवों और शहरों का विकास कर सकें।

Common Misconceptions & Examiner Traps

Common Misconception

भारत को संविधान में 'फेडरेशन' लिखा हुआ मानना।

Scientific Reality & Correction

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को 'राज्यों का संघ' (Union of States) कहा गया है, यद्यपि इसकी संरचना पूर्णतः संघीय सिद्धांतों पर आधारित है।

Common Misconception

हिंदी को भारत की 'राष्ट्रभाषा' (National Language) लिख देना।

Scientific Reality & Correction

भारतीय संविधान में किसी भी एक भाषा को 'राष्ट्रभाषा' का दर्जा नहीं दिया गया है; हिंदी को भारत की 'राजभाषा' (Official Language) घोषित किया गया है।

Common Misconception

समवर्ती सूची पर केंद्र और राज्य में विवाद होने पर राज्य के कानून को मान्य समझना।

Scientific Reality & Correction

समवर्ती सूची के विषय पर केंद्र और राज्य के कानून में टकराव होने पर हमेशा 'केंद्र सरकार का कानून' ही मान्य होता है और राज्य का कानून निरस्त हो जाता है।

Common Misconception

USA और भारत दोनों को एक ही प्रकार का संघ मानना।

Scientific Reality & Correction

USA 'साथ आकर संघ बनाने' (Coming Together) का उदाहरण है जहाँ राज्यों को ज्यादा ताकत है; भारत 'सबको साथ लेकर संघ बनाने' (Holding Together) का उदाहरण है जहाँ केंद्र अधिक शक्तिशाली है।

Common Misconception

पंचायती राज में महिलाओं के आरक्षण को केवल 10% समझना।

Scientific Reality & Correction

1992 के 73वें संविधान संशोधन के तहत स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए कम से कम 'एक-तिहाई' (33%) सीटें आरक्षित की गई हैं (कई राज्यों में 50% तक)।

संघवाद: विशेषताएं, सूचियां, भाषा नीति एवं 1992 विकेंद्रीकरण

संघवाद: त्रि-स्तरीय सूचियां, भाषा नीति एवं 1992 का विकेंद्रीकरण1. तीन विधायी सूचियांशक्तियों का स्पष्ट बंटवारा• संघ सूची (100 विषय):रक्षा, विदेश, बैंकिंग, मुद्रा, रेलवे(केवल संसद द्वारा कानून)• राज्य सूची (61 विषय):पुलिस, व्यापार, कृषि, सिंचाई, जेल• समवर्ती सूची (52 विषय):शिक्षा, वन, विवाह; केंद्र मान्य• अवशिष्ट शक्तियां: IT व साइबर (केंद्र)2. भाषा नीति व केंद्र-राज्यलचीलापन व एकता• भाषाई राज्यों से देश सुदृढ़ हुआ• संतुलित भाषा नीति:कोई एक राष्ट्रभाषा नहीं;हिंदी राजभाषा + 21 अनुसूचित भाषाएंसरकारी कामकाज में अंग्रेजी जारी• 1990 के बाद बदलाव:गठबंधन युग, क्षेत्रीय दलों का उभार,धारा 356 के दुरुपयोग पर रोक• राज्यों की स्वायत्तता का सम्मान3. 1992 विकेंद्रीकरणपंचायती राज व स्थानीय शासन• 73वां व 74वां संशोधन (1992):1. नियमित चुनाव संवैधानिक बाध्यता2. SC, ST, OBC आरक्षण3. 1/3 (33%) सीटें महिलाओं हेतु आरक्षित4. स्वतंत्र राज्य चुनाव आयोग5. राजस्व व अधिकारों का बंटवारा• पंचायती राज संरचना:ग्राम पंचायत (मुखिया/सरपंच) <-पंचायत समिति <- जिला परिषद (अध्यक्ष)• नगर निगम प्रमुख: मेयर (महापौर)बोर्ड परीक्षा के प्रमुख संप्रत्यय (Golden Federalism Capsule)Holding Together संघ:भारत आंतरिक विविधता को साधने हेतु सत्ता बांटता है; केंद्र अधिक शक्तिशाली।समवर्ती सूची टकराव:शिक्षा, वन पर केंद्र व राज्य में विवाद होने पर संसद का कानून ही प्रभावी रहेगा।1992 विकेंद्रीकरण क्रांति:पंचायतों को संवैधानिक दर्जा, नियमित चुनाव व 14 लाख+ महिलाओं की सत्ता में भागीदारी।

Chapter Summary & 10 Key Takeaways

Takeaway 1
संघवाद में सत्ता का संवैधानिक विभाजन केंद्रीय सत्ता और उसकी विभिन्न घटक इकाइयों (राज्यों) के बीच होता है।
Takeaway 2
एकात्मक व्यवस्था में सत्ता केंद्र के पास होती है, जबकि संघवाद में राज्य सरकारें सीधे जनता के प्रति जवाबदेह होती हैं।
Takeaway 3
संघवाद की 7 विशेषताएं हैं: दो या अधिक स्तर, अलग-अलग अधिकार-क्षेत्र, संवैधानिक गारंटी, न्यायालय की सर्वोच्चता और वित्तीय स्वायत्तता।
Takeaway 4
अमेरिका 'साथ आकर संघ बनाने' (Coming Together) और भारत 'सबको साथ लेकर संघ बनाने' (Holding Together) का उदाहरण है।
Takeaway 5
संविधान की संघ सूची (रक्षा, विदेश, बैंकिंग), राज्य सूची (पुलिस, कृषि), और समवर्ती सूची (शिक्षा, वन) शक्तियों का बंटवारा करती हैं।
Takeaway 6
अवशिष्ट शक्तियां (कंप्यूटर, साइबर कानून) केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आती हैं।
Takeaway 7
भाषाई राज्यों के गठन और 22 अनुसूचित भाषाओं वाली लचीली भाषा नीति ने भारत की राष्ट्रीय एकता को अटूट बनाया।
Takeaway 8
1990 के बाद गठबंधन सरकारों और क्षेत्रीय दलों के उभार ने केंद्र-राज्य संबंधों में राज्यों की स्वायत्तता को मजबूत किया।
Takeaway 9
1992 के 73वें और 74वें संशोधन ने स्थानीय स्वशासन (पंचायती राज व नगर निगम) को संवैधानिक दर्जा और नियमित चुनाव की गारंटी दी।
Takeaway 10
स्थानीय निकायों में 1/3 (33%) सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं जिससे 14 लाख से अधिक निर्वाचित महिलाएं नेतृत्व कर रही हैं।

Check Your Understanding (Diagnostic Practice Questions)

Diagnostic questions testing core conceptual clarity. Answers are hidden initially — solve each problem first, then click to reveal the step-by-step verified solution.

1
संघीय शासन व्यवस्था (Federal System) की किन्हीं दो प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
Reveal Answer & Explanation
Answer:
  1. यहाँ शासन के दो या दो से अधिक स्तर (केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकार) होते हैं। 2. विभिन्न स्तरों की सरकारों के अधिकार-क्षेत्र संविधान में स्पष्ट दर्ज होते हैं और उनके अस्तित्व की संवैधानिक गारंटी होती है।

2
'साथ आकर संघ बनाना' (Coming Together) और 'सबको साथ लेकर संघ बनाना' (Holding Together) में क्या अंतर है? प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दीजिए।
Reveal Answer & Explanation
Answer: साथ आकर संघ बनाने में दो या अधिक स्वतंत्र देश मिलकर बड़ा संघ बनाते हैं और राज्यों को ज्यादा ताकत होती है (उदा: अमेरिका)। सबको साथ लेकर संघ बनाने में एक बड़ा देश आंतरिक विविधता के कारण केंद्र और राज्यों में सत्ता बांटता है और केंद्र ज्यादा शक्तिशाली होता है (उदा: भारत)।
3
समवर्ती सूची (Concurrent List) के विषय पर केंद्र और राज्य सरकार के कानूनों में टकराव होने पर क्या होता है?
Reveal Answer & Explanation
Answer: यदि समवर्ती सूची के किसी विषय (जैसे शिक्षा या वन) पर केंद्र और राज्य के बनाए कानूनों में कोई टकराव या विरोधाभास होता है, तो केंद्र सरकार द्वारा बनाया गया कानून ही मान्य होता है और राज्य का कानून निरस्त हो जाता है।
4
भारत की 'भाषा नीति' में हिंदी के अलावा कितनी भाषाओं को 'अनुसूचित भाषाएं' माना गया है?
Reveal Answer & Explanation
Answer: भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में हिंदी के अतिरिक्त 21 अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को अनुसूचित भाषाओं के रूप में मान्यता दी गई है (अर्थात कुल 22 अनुसूचित भाषाएं हैं)।
5
1992 के 73वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के लिए क्या विशेष प्रावधान किया गया?
Reveal Answer & Explanation
Answer: सभी स्तरों पर पंचायतों और स्थानीय स्वशासी निकायों के निर्वाचित सदस्यों और अध्यक्ष पदों में से कम से कम एक-तिहाई (1/3 या 33%) सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं।
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