संक्रामक रोग वे रोग हैं जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में वायु, जल, भोजन या शारीरिक संपर्क द्वारा आसानी से संचरित होते हैं।
A. जीवाणुजनित रोग (Bacterial Diseases):
- 1. टाइफाइड (Typhoid / मियादी बुखार):
• रोगजनक: Salmonella typhi (साल्मोनेला टाइफी)।
• संचरण: संदूषित भोजन एवं जल द्वारा यह छोटी आंत में प्रवेश करता है तथा रुधिर द्वारा अन्य अंगों में पहुंचता है।
• लक्षण: लगातार तेज बुखार ($39^\circ\text{C}$ से $40^\circ\text{C}$), कमजोरी, पेट दर्द, कब्ज, सिरदर्द, भूख न लगना; गंभीर स्थिति में आंतों में छेद (Intestinal perforation) तथा मृत्यु।
• पुष्टि परीक्षण: विडाल टेस्ट (Widal Test)।
• ऐतिहासिक तथ्य: 'टाइफाइड मैरी' (Mary Mallon) पेशे से रसोइया थी जो स्वयं स्वस्थ वाहक थी और कई वर्षों तक भोजन द्वारा टाइफाइड फैलाती रही। - 2. न्यूमोनिया (Pneumonia):
• रोगजनक: Streptococcus pneumoniae तथा Haemophilus influenzae।
• संचरण: संक्रमित व्यक्ति की छींक/खांसी की बूंदों (Droplets) अथवा बर्तनों के साझा प्रयोग से।
• लक्षण: यह फेफड़ों की वायु कूपिकाओं (Alveoli) को संक्रमित करता है, जिससे कूपिकाओं में तरल भर जाता है और श्वसन में गंभीर कठिनाई होती है। बुखार, ठंड लगना, खांसी, सिरदर्द; गंभीर मामलों में होंठ और उंगलियों के नाखून धूसर से नीले (Gray to bluish) पड़ जाते हैं।
B. विषाणुजनित रोग (Viral Diseases):
- सामान्य जुकाम (Common Cold):
• रोगजनक: राइनोवायरस (Rhino viruses) समूह।
• लक्षण: यह नासा तथा श्वसन मार्ग को संक्रमित करता है, किंतु फेफड़ों को कभी प्रभावित नहीं करता। नाक में जमाव, बहती नाक, गले में खराश, स्वरभंग (कर्कश आवाज), खांसी, सिरदर्द; 3 से 7 दिन में स्वतः ठीक हो जाता है।
C. प्रोटोजोआजनित रोग (Protozoan Diseases):
- 1. मलेरिया (Malaria):
• रोगजनक: Plasmodium की विभिन्न जातियां (P. vivax, P. malariae, P. falciparum)। P. falciparum द्वारा उत्पन्न दुर्दम (Malignant) मलेरिया सबसे घातक एवं जानलेवा होता है।
• वाहक: मादा एनाफलीज मच्छर (Female Anopheles mosquito)।
• प्लाज्मोडियम का द्विपोषी जीवन चक्र:- मच्छर जब मानव को काटता है, तो लार के साथ संक्रामक अवस्था स्पोरोज़ोआइट (Sporozoites / बीजाणुज) मानव रक्त में प्रविष्ट होती है।
- स्पोरोज़ोआइट रक्त से यकृत कोशिकाओं (Liver cells) में पहुंचते हैं और अलैंगिक रूप से बहुविभाजन कर यकृत कोशिकाओं को फोड़ते हैं।
- यकृत से मुक्त होकर परजीवी लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) पर हमला करते हैं। RBCs में अलैंगिक जनन कर उन्हें फोड़ते हैं। RBCs के फटने पर हीमोग्लोबिन के विखंडन से एक विषाक्त पदार्थ हीमोज़ोइन (Haemozoin) निकलता है। यह हीमोज़ोइन ही प्रत्येक 3 से 4 दिन में होने वाली कंपकंपी (ठंड) तथा तेज बुखार के लिए उत्तरदायी है।
- RBCs में कुछ परजीवी लैंगिक अवस्थाओं—युग्मकजनकों (Gametocytes: नर व मादा) में विकसित होते हैं।
- जब कोई अन्य मादा एनाफलीज मच्छर संक्रमित मनुष्य को काटती है, तो ये युग्मकजनक मच्छर के शरीर में पहुंच जाते हैं।
- मच्छर के आमाशय (Stomach) में निषेचन तथा परिवर्धन होता है, जिससे गतिशील युग्मनज (ऊकाइनीट) बनता है।
- ऊकाइनीट से ऊसिस्ट बनता है और बहुत सारे स्पोरोज़ोआइट बनकर आमाशय भित्ति को फोड़कर मच्छर की लार ग्रंथियों (Salivary glands) में चले जाते हैं। अब यह मच्छर पुनः नए मानव को संक्रमित करने हेतु तैयार है।
- 2. अमीबता / अमीबी पेचिश (Amoebiasis / Amoebic Dysentery):
• रोगजनक: Entamoeba histolytica (एंटअमीबा हिस्टोलिटिका)।
• लक्षण: बड़ी आंत को संक्रमित करता है। कब्ज, मरोड़, पेट दर्द, श्लेष्मा (Mucus) और रक्त के थक्कों से युक्त मल।
• यांत्रिक वाहक: घरेलू मक्खियां (Houseflies)।
D. कृमिजनित एवं कवकजनित रोग:
- एस्केरिसता (Ascariasis): आंत्र परजीवी गोलकृमि Ascaris lumbricoides द्वारा। संदूषित जल, सब्जियों, फलों द्वारा संचरण। आंतरिक रक्तस्राव, पेशीय दर्द, आंत्र में अवरोध।
- फाइलेरिया / हाथीपांव (Filariasis / Elephantiasis): फाइलेरिया कृमि Wuchereria bancrofti एवं W. malayi द्वारा। वाहक: मादा क्यूलेक्स मच्छर (Culex mosquito)। निचले पादों (पैरों) की लसिका वाहिकाओं में धीरे-धीरे दीर्घकालिक शोथ (Chronic inflammation) हो जाता है, जिससे पैर हाथी के पैर समान अत्यधिक सूज जाते हैं तथा जननांग विकृत हो जाते हैं।
- दाद (Ringworm): Microsporum, Trichophyton, Epidermophyton कवकों द्वारा। त्वचा, नाखूनों और सिर पर सूखी, शल्की विक्षतियां (Dry, scaly lesions) तथा तीव्र खुजली। ऊष्मा और नमी कवकों की वृद्धि में सहायक होती है।