पारिस्थितिकी के अध्ययन में पर्यावरण के अजैविक (भौतिक-रासायनिक) कारक जीवों के वितरण और जीवन को निर्धारित करते हैं:
प्रमुख अजैविक कारक:
- 1. तापमान (Temperature): सर्वाधिक पारिस्थितिकीय रूप से प्रासंगिक कारक। ध्रुवों से भूमध्य रेखा की ओर तथा मैदानों से पर्वतों की ओर तापमान बदलता है।
• पृथुतापापी (Eurythermal): वे जीव जो तापमान के व्यापक परास (Wide range) को सहन कर सकते हैं (उदा. अधिकांश स्तनधारी व पक्षी)।
• तनुतापापी (Stenothermal): वे जीव जो तापमान के केवल संकीर्ण परास (Narrow range) तक ही सीमित रहते हैं (उदा. ध्रुवीय भालू, प्रवाल, मेंढक)। - 2. जल (Water): जीवन जल में ही प्रारंभ हुआ। जलीय जीवों हेतु जल की रासायनिक संरचना और लवणता (Salinity - भागों प्रति हजार ppt में) महत्वपूर्ण है: अंतःस्थलीय जल ($< 5$ ppt), समुद्र ($30-35$ ppt), अतिलवणीय लैगून ($> 100$ ppt)।
• पृथुलवणी (Euryhaline) लवणता के व्यापक परास को तथा तनुलवणी (Stenohaline) संकीर्ण परास को सहन कर सकते हैं। - 3. प्रकाश (Light): प्रकाश-संश्लेषण, दीप्तिकालिता (पुष्पन हेतु) तथा जंतुओं की दैनिक व मौसमी गतिविधियों (चारा खोजने, प्रवास, प्रजनन) का नियमन करता है।
- 4. मृदा (Soil): मृदा की प्रकृति, कणों का माप, जल धारण क्षमता (Water holding capacity) तथा खनिज संघटन वहां उगने वाली वनस्पति को निर्धारित करते हैं।
अजैविक कारकों के प्रति जीवों की 4 अनुक्रियाएं:
- नियमन करना (Regulate): कुछ जीव कायिकीय एवं व्यावहारिक साधनों द्वारा शरीर का आंतरिक पर्यावरण स्थिर (स्थिर ताप $37^\circ\text{C}$ व परासरणी सांद्रता) बनाए रखते हैं जिसे समस्थापन (Homeostasis) कहते हैं। सभी पक्षी, स्तनधारी तथा कुछ निम्न अकशेरुकी समतापी (Endotherms) होते हैं। मनुष्य गर्मियों में पसीना बहाकर तथा सर्दियों में कंपकंपी (कांपने) द्वारा $37^\circ\text{C}$ ताप बनाए रखता है।
- संरूपण रखना (Conform): लगभग 99% जंतु तथा लगभग सभी पौधे अपने आंतरिक पर्यावरण को स्थिर नहीं रख सकते। इनका शारीरिक तापमान परिवेशी ताप के अनुसार बदलता रहता है (असमतापी / Ectotherms)। उष्मा हानि या उष्मा लाभ पृष्ठीय क्षेत्रफल का कार्य है; छोटे जंतुओं (जैसे छछूंदर, गुंजन पक्षी) का पृष्ठीय क्षेत्रफल आयतन की तुलना में बहुत अधिक होता है, अतः ध्रुवीय क्षेत्रों में छोटे जंतु बहुत कम पाए जाते हैं।
- प्रवास करना (Migrate): जीव तनावपूर्ण प्रतिकूल आवास से अस्थायी रूप से अनुकूल क्षेत्र में चले जाते हैं और प्रतिकूल काल बीतने पर वापस लौट आते हैं। उदाहरण: प्रत्येक शीतकाल में राजस्थान का प्रसिद्ध केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (भरतपुर) साइबेरिया तथा अत्यधिक ठंडे उत्तरी क्षेत्रों से आने वाले हजारों प्रवासी पक्षियों की मेजबानी करता है।
- निलंबित करना (Suspend): प्रतिकूल परिस्थितियों में जीव अपनी उपापचयी क्रियाओं को न्यूनतम कर विकास रोक देते हैं:
• जीवाणु, कवक व निम्न पादप मोटी भित्ति वाले बीजाणु बनाते हैं।
• उच्च पादपों के बीज सुप्तावस्था (Dormancy) में चले जाते हैं।
• शीतनिष्क्रियता (Hibernation): सर्दियों में भालू का शीत निद्रा में चले जाना।
• ग्रीष्मनिष्क्रियता (Aestivation): गर्मी और जल की कमी से बचने हेतु घोंघे (Snails) और मछलियों का ग्रीष्म निद्रा में जाना।
• उपरति (Diapause): झीलों व तालाबों में प्राणिप्लवक (Zooplankton) जातियों का प्रतिकूल परिस्थितियों में अपने परिवर्धन को अस्थायी रूप से निलंबित कर देना।