जब दो उपयुक्त पदार्थों को आपस में रगड़ा जाता है, तो इलेक्ट्रॉनों के स्थानांतरण के कारण दोनों वस्तुएँ आवेशित हो जाती हैं। इसे घर्षण द्वारा आवेशन (Charging by Friction / Rubbing) कहते हैं:
- उदाहरण: जब प्लास्टिक के रिफिल को पॉलीथीन से रगड़ा जाता है, तो दोनों पर विद्युत आवेश आ जाता है। जब कंघी को सूखे बालों से रगड़ा जाता है, तो कंघी आवेशित होकर कागज के छोटे टुकड़ों को आकर्षित करने लगती है।
- आवेशों के दो प्रकार: 1. धनावेश (Positive Charge, +) तथा 2. ऋणावेश (Negative Charge, −)।
- परंपरानुसार, रेशम से रगड़ी गई काँच की छड़ के आवेश को धनावेश माना जाता है।
- पॉलीथीन या ऊन से रगड़े गए प्लास्टिक स्ट्रॉ के आवेश को ऋणावेश माना जाता है।
- आवेशों का मौलिक नियम: सजातीय (समान) आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित (Repel) करते हैं, जबकि विजातीय (असमान) आवेश एक-दूसरे को आकर्षित (Attract) करते हैं। (+ और + प्रतिकर्षण; + और − आकर्षण)।
विद्युतदर्शी (Electroscope) एवं भू-संपर्कन (Earthing):
स्वर्ण-पत्र विद्युतदर्शी (Gold-leaf Electroscope):
यह एक ऐसा उपकरण है जिसका उपयोग यह परीक्षण करने के लिए किया जाता है कि कोई वस्तु आवेशित है या नहीं। इसमें काँच की बोतल में एक धातु की छड़ लगी होती है, जिसके ऊपरी सिरे पर धातु की चकती और निचले सिरे पर सोने या एल्युमिनियम की दो पतली पन्नियाँ लटकी होती हैं। जब किसी आवेशित वस्तु को धातु की चकती से छुआ जाता है, तो आवेश छड़ से होकर दोनों पन्नियों में पहुँच जाता है। समान आवेश पाने के कारण पन्नियाँ एक-दूसरे से दूर फैल (अपसरित हो) जाती हैं।
भू-संपर्कन (Earthing):
किसी आवेशित वस्तु से आवेश को पृथ्वी में भेजने की प्रक्रिया को भू-संपर्कन कहते हैं। जब हम विद्युतदर्शी की चकती को उंगली से छूते हैं, तो पन्नियों का आवेश हमारे शरीर से होकर पृथ्वी में चला जाता है और पन्नियाँ सिकुड़ जाती हैं। हमारे घरों में विद्युत उपकरणों को करंट के झटके से बचाने के लिए भू-संपर्कन किया जाता है।