(क) शारीरिक रूप एवं वेशभूषा का रेखाचित्र
लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी बालगोबिन भगत का अत्यंत जीवंत शब्द-चित्र खींचते हुए लिखते हैं:
- आयु एवं कद: बालगोबिन भगत लगभग साठ से ऊपर के गोरे-चिट्टे, मंझोले कद के आदमी थे। उनके बाल पककर बिल्कुल सफेद हो चुके थे। चेहरा हमेशा सफेद बालों की चमक से जगमगाता रहता था।
- पहनावा: वे बहुत कम कपड़े पहनते थे। कमर में केवल एक लंगोटी मात्र और सिर पर कबीरपंथियों की तरह कनफटी टोपी (कानों के पास से कटी हुई टोपी) पहनते थे।
- शीत ऋतु में वेश: जब जाड़ा आता, तो ऊपर से एक काली 'कमली' (छोटा कंबल) ओढ़ लेते थे।
- माथे का तिलक एवं कंठी: उनके माथे पर हमेशा एक चमकता हुआ रामानंदी श्रीचंदन का टीका लगा रहता था, जो नाक के एक छोर से शुरू होकर औरतों के टीके की तरह ऊपर तक जाता था। गले में तुलसी की गोल जड़ों की एक बेडौल माला बंधी रहती थी।
(ख) गृहस्थ होते हुए भी 'साधु' क्यों?
ऊपर की तस्वीर से ऐसा लग सकता है कि बालगोबिन भगत कोई संन्यासी या वैरागी थे, किंतु लेखक स्पष्ट करता है कि वे बिल्कुल साधु नहीं थे! उनकी अपनी गृहस्थी थी। लेखक ने उनके बेटे और पतोहू (पुत्रवधू) को देखा था। उनके पास थोड़ी खेती-बारी थी और एक साफ-सुथरा अच्छा मकान था।
फिर भी वे साधु थे, क्योंकि उनमें साधुता की समस्त परिभाषाएं चरितार्थ होती थीं:
- कबीर को 'साहब' मानना: वे कबीरदास जी को अपना गुरु और ईश्वर (साहब) मानते थे। उन्हीं के पदों को गाते और उन्हीं के आदर्शों पर चलते थे।
- सत्य और खरा व्यवहार: वे कभी झूठ नहीं बोलते थे और सबके साथ खरा (स्पष्ट व निष्पक्ष) व्यवहार रखते थे।
- निरपेक्षता: वे न तो किसी से व्यर्थ में झगड़ा करते थे और न ही किसी से अकारण दो-टूक बात करने में संकोच करते थे।
- पराई वस्तु का स्पर्श न करना: वे किसी की वस्तु को बिना पूछे कभी हाथ नहीं लगाते थे और न ही व्यवहार में लाते थे। इस नियम का पालन वे इतनी सूक्ष्मता से करते थे कि कभी दूसरों के खेत में शौच के लिए भी नहीं बैठते थे।
- ईश्वरार्पण बुद्धि: उनकी जो कुछ भी कमाई या खेत की उपज होती, उसे वे अपनी संपत्ति नहीं मानते थे। वे सब कुछ अपने 'साहब' (कबीर) का मानते थे।