Follow Us
CBSE • कक्षा X • Hindi • अध्याय 9
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

Lakhnavi Andaaz

प्रगतिवादी हिंदी कथा-साहित्य के अग्रदूत, मार्क्सवादी विचारक और यथार्थवादी उपन्यासकार यशपाल (1903 - 1976 ई.) अपनी पैनी सामाजिक दृष्टि, सशक्त व्यंग्य और रूढ़ि-विरोधी वैचारिकता के लिए प्रसिद्ध हैं। प्रस्तुत प्रसिद्ध व्यंग्य-रचना 'लखनवी अंदाज़' (Lakhnavi Andaaz) एक ओर सामंती वर्ग की खोखली, बनावटी और हास्यास्पद जीवन-शैली पर तीखा कटाक्ष करती है, तो दूसरी ओर समकालीन साहित्य में बिना कथानक व पात्रों के लिखी जाने वाली 'अमूर्त नई कहानी' पर भी गहरा व्यंग्य करती है: कथानक एवं रेल यात्रा का प्रसंग: लेखक ने भीड़ से बचने, एकांत में नई कहानी के संबंध में सोचने और खिड़की से प्राकृतिक दृश्य देखने के लिए सेकंड क्लास का टिकट खरीदा। जब वे डिब्बे में चढ़े, तो सामने की बर्थ पर लखनऊ के एक सफेदपोश भद्र व्यक्ति (नवाब साहब) पालथी मारे बैठे थे। उनकी सामने की तौलिया पर दो ताजे, चिकने खीरे रखे थे। लेखक के अचानक आ जाने से नवाब साहब के चेहरे पर एकांत-चिंतन में विघ्न पड़ने का असंतोष स्पष्ट दिखाई दिया। उन्होंने लेखक से कोई बात नहीं की और खिड़की से बाहर देखते रहे। खीरे की रईसी तैयारी और 'लखनवी नफासत': अचानक नवाब साहब ने लेखक से खीरा खाने का आग्रह किया, जिसे लेखक ने आत्मसम्मान की रक्षा हेतु विनम्रता से अस्वीकार कर दिया। इसके बाद नवाब साहब ने बड़े यत्न और नजाकत से खीरों को धोया, तौलिए से पोंछा, सिर काटकर झाग निकाला, छीलकर फांकों पर जीरा-नमक व लाल मिर्च बुरकी। उनके मुख में स्वाद के कारण पानी भर आया था। चरम व्यंग्य: सूंघकर खिड़की से बाहर फेंकना: नवाब साहब ने खीरे की एक-एक फांक को उठाया, नाक के पास ले जाकर गहरी सांस से सूंघा, स्वाद के आनंद में आंखें मूंद लीं और फिर खिड़की से बाहर फेंक दिया! सभी फांकों को फेंकने के बाद उन्होंने हाथ-होंठ पोंछे और लेखक की ओर गर्व से देखकर एक जोरदार 'डकार' ली! लेखक के ज्ञान-चक्षु और साहित्यिक निष्कर्ष: यह देखकर लेखक के ज्ञान-चक्षु खुल गए। लेखक ने सोचा—यदि खीरे की केवल गंध और स्वाद की कल्पना से पेट भर सकता है और डकार आ सकती है, तो बिना किसी विचार, घटना और पात्रों के केवल लेखक की इच्छा मात्र से 'नई कहानी' क्यों नहीं रची जा सकती? झारखंड अधिविद्य परिषद् (CBSE Class 10) की बोर्ड परीक्षा में 'लखनवी अंदाज़' से गद्यांश व्याख्या (5 अंक), पतनशील सामंती वर्ग की मानसिकता (3 अंक), नवाब साहब द्वारा खीरे को सूंघकर फेंकने का प्रतीकार्थ, तथा बिना विचार-कथानक के नई कहानी के सृजन पर 3 से 5 अंकों के प्रश्न प्रतिवर्ष पूछे जाते हैं।

🥒 क्या आपने कभी किसी ऐसे रईस को देखा है जो बाजार से स्वादिष्ट खाना खरीदे, उसे छील-काटकर उस पर मसाले बुरके, लेकिन खाए बिना केवल सूंघकर कचरे में फेंक दे और फिर पेट भरने की डकार ले?

सुनने में यह किसी पागलखाने का किस्सा लग सकता है, किंतु सामंती समाज के बनावटीपन का यह सबसे सटीक और नंगा सच है! जब राजे-रजवाड़े छिन गए, जमींदारी समाप्त हो गई और नवाबों की हवेलियां खंडहर हो गईं—तब भी कुछ लोग समाज को यह दिखाने के लिए मरे जा रहे थे कि वे कितने 'खानदानी रईस' हैं! यशपाल ने सेकंड क्लास के एक रेलगाड़ी के डिब्बे में इस खोखली शान-शौकत का ऐसा सजीव एक्स-रे किया कि पूरा सामंती वर्ग नंगा हो गया! और सबसे बड़ा मजा तो तब आता है जब लेखक इस 'खीरा कांड' को साहित्य के उन लेखकों से जोड़ देता है जो बिना किसी कहानी या पात्र के खुद को महान लेखक साबित करने का नाटक करते हैं! आइए, इस गुदगुदाने वाले और आंखें खोल देने वाले व्यंग्य का आनंद लें!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

इस अध्याय का अध्ययन आपके लिए क्यों अनिवार्य है?

  1. बोर्ड परीक्षा में 6-8 अंकों का सीधा योगदान: CBSE 10वीं बोर्ड परीक्षा में व्यंग्य विधा से यह पाठ सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है; इसके तार्किक व समीक्षात्मक प्रश्न अनिवार्य होते हैं।
  2. दिखावे की संस्कृति (Show-off Culture) से मुक्ति: आज के सोशल मीडिया के युग में लोग जिस 'दिखावे और फेक लाइफस्टाइल' के शिकार हैं, यह पाठ उस पर गहरा आत्ममंथन कराता है।
  3. व्यंग्य विधा और भाषा-शिल्प का ज्ञान: उर्दू-फारसी के सुरुचिपूर्ण शब्दों (नफासत, नजाकत, सफेदपोश, किबला, एहतियात) और वक्रोक्ति का अद्भुत प्रयोग सीखने को मिलता है।
  4. साहित्यिक चेतना का विकास: विद्यार्थियों को यह समझ आता है कि किसी भी रचना में यथार्थ, विचार और सामाजिक सरोकार क्यों अनिवार्य हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • प्रगतिवादी कथाकार यशपाल के यथार्थवादी साहित्य-दर्शन का सामान्य परिचय।
  • व्यंग्य (Satire) विधा की प्रकृति (हास्य के माध्यम से समाज की विद्रूपताओं पर तीखा प्रहार करना)।
  • उर्दू और अवधी शब्दावली का ज्ञान (जैसे: सफेदपोश = भद्र/सभ्य, नफासत = स्वच्छता, नजाकत = कोमलता, एहतियात = सावधानी, तस्लीम = सम्मान में सिर झुकाना, खयाल = विचार, गुमान = घमंड, तलब = इच्छा/प्यास, मेदा = आमाशय/पेट, शकील = भारी/कठिन पचने वाला)।
  • सामंतवाद और स्वतंत्र्योत्तर भारत के सामाजिक बदलाव की समझ।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • पाठ के महत्वपूर्ण प्रसंगों की सप्रसंग व्याख्या करते हुए लेखक के व्यंग्यात्मक उद्देश्य को स्पष्ट कर सकेंगे।
  • नवाब साहब की शारीरिक चेष्टाओं, नफासत और उनके खीरा खाने की कृत्रिम विधि का विश्लेषणात्मक विवरण दे सकेंगे।
  • पतनशील सामंती वर्ग की झूठी शान और दिखावे की प्रवृत्ति पर समीक्षात्मक निबंध लिख सकेंगे।
  • खीरे की घटना और "बिना विचार व पात्रों की नई कहानी" के बीच लेखक द्वारा स्थापित संबंध की व्याख्या कर सकेंगे।
  • CBSE बोर्ड परीक्षा में पूछे जाने वाले दीर्घ-उत्तरीय प्रश्नों के प्रामाणिक उत्तर लिख सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. सेकंड क्लास का डिब्बा, लेखक का प...
2 2. खीरा तैयार करने की 'लखनवी नफासत'...
3 3. चरम व्यंग्य: फांकों को सूंघकर खि...
4 4. लेखक के ज्ञान-चक्षु: 'नई कहानी'...
5 5. पतनशील सामंती संस्कृति: झूठी शान...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. सेकंड क्लास का डिब्बा, लेखक का प्रवेश और नवाब साहब की असहजता

(क) लेखक द्वारा सेकंड क्लास का टिकट लेने का कारण

लेखक को पास के ही स्टेशन तक जाना था। गाड़ी छूट रही थी। यद्यपि सेकंड क्लास का किराया अधिक था, फिर भी लेखक ने दो विशेष कारणों से सेकंड क्लास का टिकट खरीदा:

  1. भीड़-भाड़ से बचकर एकांत में यात्रा करना ताकि वे नई कहानी के संबंध में सोच सकें।
  2. खिड़की से प्राकृतिक दृश्यों का आनंद ले सकें।

(ख) डिब्बे में नवाब साहब की उपस्थिति एवं असहजता:

लेखक यह सोचकर डिब्बे में चढ़ा था कि वह खाली होगा, किंतु डिब्बे में पहले से ही एक सज्जन बैठे थे। वे एक सफेदपोश लखनवी नवाब थे, जो पालथी मारे बर्थ पर विराजमान थे। उनके सामने एक तौलिए पर दो ताजे, चिकने खीरे रखे हुए थे।

लेखक के अचानक आ जाने से नवाब साहब की आंखों में एकांत-चिंतन में विघ्न का गहरा असंतोष छा गया। लेखक ने तुरंत भांप लिया कि नवाब साहब को उनका आना अच्छा नहीं लगा। इसके दो मनोवैज्ञानिक कारण थे:

  • संभवतः वे भी एकांत में नई कहानी जैसी किसी बात पर विचार कर रहे थे।
  • या फिर वे 'खीरे' जैसी साधारण और सस्ती खाद्य-वस्तु को अकेले में खाने की फिराक में थे और अब किसी भद्र व्यक्ति के सामने खीरा खाने में उन्हें 'संकोच और हेठी' (झूठी शर्म) महसूस हो रही थी।

नवाब साहब ने लेखक से कोई बातचीत नहीं की, न संगति के लिए कोई उत्साह दिखाया। वे खिड़की से बाहर देखते रहे। लेखक ने भी उनके प्रति बेरुखी दिखाकर अपने आत्मसम्मान में आंखें चुरा लीं।

2. खीरा तैयार करने की 'लखनवी नफासत' एवं औपचारिक संवाद

काफी देर तक खिड़की से बाहर देखने के बाद अचानक नवाब साहब ने डिब्बे का मौन तोड़ा और अत्यंत औपचारिक व सुरुचिपूर्ण शैली में लेखक से कहा:

"आदाब-अर्ज, जनाब! खीरे का शौक फरमाएंगे?"

(क) लेखक का इनकार एवं आत्मसम्मान:

नवाब साहब का यह अचानक भाव-परिवर्तन लेखक को अच्छा नहीं लगा। लेखक समझ गया कि नवाब साहब अपनी शराफत का गुमान बनाए रखने के लिए और अपनी रईसी का पर्दा खींचने के लिए लेखक को भी साधारण लोगों की श्रेणी में घसीटना चाहते हैं। अतः लेखक ने शुक्रिया अदा करते हुए विनम्रता से कहा—*"किबला शौक फरमाएं! (आप ही खाइए!)"*

(ख) खीरा काटने की नफासत और कलात्मक तैयारी:

इसके बाद नवाब साहब ने बड़े ही संयम और नजाकत से खीरा तैयार किया:

  1. खिड़की से बाहर लोटे के पानी से दोनों खीरों को धोया और तौलिए से पोंछा।
  2. जेब से एक चमचमाता चाकू निकाला।
  3. दोनों खीरों के सिर काटे, उन्हें गोदकर झाग निकाला (कड़वापन दूर करने की पारंपरिक विधि)।
  4. खीरों को बड़े एहतियात से छीलकर उनकी पतली-पतली फांकों को तौलिए पर करीने से सजाया।
  5. फिर उन फांकों पर जीरा मिला पिसा हुआ नमक और लाल मिर्च की सुर्खी (पाउडर) बुरक दी।

उनकी प्रत्येक भाव-भंगिमा और जबड़ों के स्फुरण से स्पष्ट था कि खीरे की उस मसालेदार फांक को देखकर उनके मुंह में पानी का सैलाब आ रहा था। लेखक कनखियों से देखकर सोच रहा था—*"मियाँ रईस बनते हैं, लेकिन लोगों की नजरों से बचने के ख्याल में अपनी असलियत पर उतर आए हैं!"*

3. चरम व्यंग्य: फांकों को सूंघकर खिड़की से फेंकना एवं रईसी डकार

नवाब साहब ने एक बार फिर लेखक से आग्रह किया—*"वल्लाह, शौक कीजिए! लखनऊ का बालम खीरा है!"* किंतु लेखक पहले एक बार मना कर चुका था, अतः अपने आत्मसम्मान और संकोच को बनाए रखने के लिए लेखक ने दूसरी बार कहा—*"शुक्रिया! इस वक्त तलब महसूस नहीं हो रही, मेदा (आमाशय/पेट) भी जरा कमजोर है, किबला शौक फरमाएं!"*

(क) नवाब साहब का अस्वाभाविक एवं कृत्रिम आचरण:

नवाब साहब ने सजल आंखों से नमक-मिर्च लगी खीरे की फांकों की ओर देखा। खिड़की के बाहर देखकर एक गहरी सांस ली। और फिर जो हुआ, वह पूरे हिंदी साहित्य में अद्वितीय है:

  • नवाब साहब ने खीरे की एक फांक उठाई।
  • उसे होंठों तक ले गए।
  • फांक को नाक से सूंघा।
  • स्वाद के आनंद में उनकी पलकें मुंद गईं। मुंह में भर आए पानी के घूंट को गले से नीचे उतार लिया।
  • और फिर उस फांक को खिड़की से बाहर रेल की पटरी पर फेंक दिया!

इसी प्रकार नवाब साहब ने खीरे की सभी फांकों को एक-एक करके उठाया, सूंघा, स्वाद की कल्पना में आंखें मींचीं और खिड़की से बाहर फेंकते चले गए!

(ख) खानदानी रईसी की तृप्ति और डकार:

सारी फांकों को फेंकने के बाद नवाब साहब ने बड़े आराम से तौलिए से हाथ और होंठ पोंछे और गुलाबी आंखों से लेखक की ओर ऐसे गर्व से देखा मानो कह रहे हों—"यह है खानदानी रईसों का तरीका (तरीका-ए-तहज़ीब)!"

नवाब साहब इस सूक्ष्म, नफीस और अमूर्त प्रयोग से थककर लेट गए। और तभी उनके पेट से एक जोरदार 'डकार' का शब्द सुनाई दिया! नवाब साहब ने लेखक की ओर देखकर कहा—*"खीरा लजीज होता है लेकिन होता है सकील (भारी), नामुराद मेदे पर बोझ डाल देता है!"*

4. लेखक के ज्ञान-चक्षु: 'नई कहानी' और अमूर्त साहित्य पर व्यंग्य

नवाब साहब की उस कृत्रिम डकार को सुनते ही लेखक के 'ज्ञान-चक्षु' (आंतरिक आंखें) खुल गए। लेखक ने अपने मन में एक अत्यंत गहरा साहित्यिक और सामाजिक विश्लेषण किया:

तालिका: खीरा प्रसंग बनाम अमूर्त 'नई कहानी' का समानांतर तुलनात्मक विश्लेषण

घटक नवाब साहब का खीरा कांड समकालीन अमूर्त 'नई कहानी'
1. सामग्री (Content) खीरे की वास्तविक फांकें मौजूद थीं, किंतु उन्हें खाया नहीं गया। समाज में वास्तविक घटनाएं, दुख-दर्द और पात्र मौजूद हैं, किंतु लेखक उनसे बचता है।
2. प्रक्रिया (Method) केवल सूंघना और कल्पना में स्वाद का सुख लेना (अमूर्त उपभोग)। केवल शब्दों की बाजीगरी और हवाई कल्पनाओं में उलझना, जमीन से कट जाना।
3. परिणाम (Outcome) बिना खाए ही पेट भरने की झूठी तृप्ति और बनावटी डकार लेना। बिना किसी कथानक, विचार और उद्देश्य के केवल रूपवादी (Formalist) कहानी गढ़ना।
💡 यशपाल का वैचारिक निष्कर्ष (The Core Satire):

लेखक निष्कर्ष निकालता है: "पहचाने ये हैं नई कहानी के लेखक! खीरे की सुगंध और स्वाद की कल्पना से पेट भर जाने का डकार आ सकता है, तो बिना विचार, घटना और पात्रों के, लेखक की इच्छा मात्र से 'नई कहानी' क्यों नहीं बन सकती?" यहाँ यशपाल उन आधुनिकतावादी लेखकों पर व्यंग्य कर रहे हैं जो सामाजिक यथार्थ और यथार्थवादी कथानक को त्यागकर केवल शैली और आडंबर के बल पर साहित्य रचने का दावा करते हैं।

5. पतनशील सामंती संस्कृति: झूठी शान, दिखावा और सामाजिक यथार्थ

यशपाल ने 'लखनवी अंदाज़' के माध्यम से जिस सामंती मानसिकता को उजागर किया है, वह आज भी हमारे समाज में किसी न किसी रूप में विद्यमान है:

1. पतनशील सामंतवाद के प्रमुख लक्षण:

  • यथार्थ से पलायन: सामंत वर्ग वास्तविकता को स्वीकार नहीं करना चाहता। वे सेकंड क्लास में यात्रा कर रहे हैं और खीरा खा रहे हैं, किंतु स्वीकार नहीं करना चाहते कि वे आम आदमी की तरह साधारण हैं।
  • झूठी शान और प्रतिष्ठा का आडंबर: अपनी गरीबी और हकीकत को छुपाने के लिए वे विचित्र और अस्वाभाविक व्यवहार करते हैं। खीरे को सूंघकर फेंकना इसी मानसिक विकृति का प्रतीक है।
  • प्रदर्शन-प्रियता (Snobbery): उनका प्रत्येक कार्य दूसरों को प्रभावित करने, अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने और दूसरों को हीन दिखाने के उद्देश्य से होता है।
⚠️ CBSE Board High-Yield Answer Key:

प्रश्न: क्या बिना विचार, घटना और पात्रों के कहानी लिखी जा सकती है? यशपाल के इस विचार से आप कहाँ तक सहमत हैं?

उत्तर: हम यशपाल के विचार से पूर्णतः सहमत हैं। जिस प्रकार भोजन के बिना केवल सुगंध से भूख नहीं मिट सकती, उसी प्रकार बिना किसी सामाजिक यथार्थ, विचार, घटना और पात्रों के कोई सार्थक कहानी नहीं लिखी जा सकती। कहानी का मूल उद्देश्य जीवन की किसी संवेदना, समस्या या यथार्थ को पाठकों तक पहुंचाना होता है। यदि कहानी में कोई घटना या पात्र ही न हो, तो वह केवल शब्दों का खोखला खेल बनकर रह जाएगी, जिसका समाज के लिए कोई महत्व नहीं होगा।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

लेखक का सेकंड क्लास में जाने का उद्देश्य
भीड़ से बचना + नई कहानी के बारे में एकांत में सोचना + खिड़की से प्राकृतिक दृश्य देखना।
नवाब साहब की उपस्थिति
सफेदपोश लखनवी सज्जन, पालथी मारे बर्थ पर, सामने तौलिए पर दो ताजे लखनवी बालम खीरे।
नवाब साहब की असहजता का कारण
एकांत भंग होना + साधारण खीरा खाते हुए किसी भद्र व्यक्ति द्वारा देखे जाने का संकोच।
खीरा तैयार करने की प्रक्रिया
धोना → पोंछना → सिर काटकर झाग निकालना → छीलना → फांकों पर जीरा-नमक व मिर्च बुरकना।
खीरे का लखनवी अंदाज़ (चरम क्रिया)
फांक उठाना → नाक से सूंघना → आंखें मूंदकर स्वाद लेना → खिड़की से बाहर फेंक देना।
नवाब साहब की डकार
बिना खाए केवल सूंघकर पेट भरने की झूठी तृप्ति की डकार = सामंती खोखलेपन का चरम प्रमाण।
नवाब साहब का तर्क
"खीरा लजीज होता है लेकिन होता है सकील (भारी), मेदे पर बोझ डाल देता है!"
प्रथम व्यंग्य (सामाजिक)
पतनशील सामंती वर्ग की झूठी शान, बनावटी जीवन-शैली और यथार्थ से पलायन पर प्रहार।
द्वितीय व्यंग्य (साहित्यिक)
बिना कथानक, घटना और पात्रों के केवल शैली के बल पर लिखी जाने वाली अमूर्त "नई कहानी" पर प्रहार।
भाषा-शिल्प सूत्र
उर्दू-फारसी युक्त तत्सम खड़ी बोली, सूक्ष्म मनोविश्लेषण, वक्रोक्ति एवं उच्च-स्तरीय व्यंग्यात्मक शैली।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1 (CBSE Board 2021, 2023): लेखक को नवाब साहब के किन हाव-भावों से महसूस हुआ कि वे उनसे बातचीत करने के लिए तनिक भी उत्सुक नहीं हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

लेखक को नवाब साहब के निम्नलिखित हाव-भावों और शारीरिक चेष्टाओं से स्पष्ट अनुभव हुआ कि वे बातचीत के लिए बिल्कुल उत्सुक नहीं हैं:

  1. अचानक असंतोष की अभिव्यक्ति: जब लेखक अप्रत्याशित रूप से डिब्बे में चढ़ा, तो नवाब साहब के चेहरे पर एकांत-चिंतन में बाधा पड़ने का असंतोष और झुंझलाहट साफ दिखाई दी।
  2. दृष्टि चुराना और खिड़की से बाहर देखना: नवाब साहब ने लेखक की ओर एक बार भी मुस्कुराकर या सामान्य शिष्टाचार से नहीं देखा। वे लगातार खिड़की के बाहर रेल की पटरियों और प्राकृतिक दृश्यों को देखने का दिखावा करने लगे।
  3. संगी-साथी के प्रति उपेक्षा: उन्होंने लेखक से न तो कोई कुशल-क्षेम पूछी और न ही बैठने का कोई औपचारिक संकेत दिया। उनका यह मौन और खिंचाव स्पष्ट कर रहा था कि वे लेखक की उपस्थिति को एक अनचाहा बोझ समझ रहे थे।
उदाहरण 2
प्रश्न 2 (CBSE Board 2020, 2024): नवाब साहब ने बहुत ही यत्न से खीरा काटा, नमक-मिर्च बुरका, अंततः सूंघकर ही खिड़की से बाहर फेंक दिया। उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा? उनका ऐसा करना उनके कैसे स्वभाव को दर्शाता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

सूंघकर बाहर फेंकने का कारण: नवाब साहब ऐसा करके लेखक के सामने अपनी 'खानदानी रईसी', नफासत और उच्च कुलीनता का प्रदर्शन करना चाहते थे। वे यह दिखाना चाहते थे कि नवाब लोग खीरे जैसी साधारण और सस्ती चीज को आम लोगों की तरह खाते नहीं हैं, बल्कि वे इतने सूक्ष्म और नफीस हैं कि केवल उसकी सुगंध से ही तृप्त हो जाते हैं।

स्वभाव की विशेषताएं:

  1. झूठी शान और प्रदर्शन-प्रियता: उनका यह आचरण उनके खोखले अहंकार, दिखावे की प्रवृत्ति और आत्म-मुग्धता (Narcissism) को दर्शाता है।
  2. यथार्थ से भागने की मानसिकता: उनके पास भले ही राजसी वैभव न बचा हो, किंतु वे अपनी पुरानी सामंती मानसिकता को त्याग नहीं पाए थे।
  3. कृत्रिम और अस्वाभाविक जीवन-शैली: खीरे जैसी प्राकृतिक वस्तु का उपभोग न करके उसे फेंक देना उनके मानसिक खोखलेपन और बनावटीपन का परिचायक है।
उदाहरण 3
प्रश्न 3: बिना विचार, घटना और पात्रों के भी क्या कहानी लिखी जा सकती है? यशपाल के इस विचार से आप कहाँ तक सहमत हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

हम यशपाल के इस विचार से पूर्णतः सहमत हैं कि बिना विचार, घटना और पात्रों के सार्थक और उद्देश्यपूर्ण कहानी कदापि नहीं लिखी जा सकती:

  1. कहानी के अनिवार्य तत्व: कहानी जीवन का दर्पण होती है। किसी भी कहानी का निर्माण किसी विचार (उद्देश्य), किसी घटना (कथानक) और उन घटनाओं को जीने वाले मनुष्यों (पात्रों) के अंतर्संबंधों से ही संभव है।
  2. अमूर्तता की विफलता: जिस प्रकार नवाब साहब खीरे को बिना खाए केवल सूंघकर अपनी वास्तविक भूख नहीं मिटा सकते थे, ठीक उसी प्रकार केवल शब्दों के आडंबर और अमूर्त शैली से पाठकों को कोई जीवन-संदेश या आनंद नहीं दिया जा सकता।
  3. व्यंग्य का संदेश: यशपाल ने उन आधुनिकतावादी लेखकों पर करारा तमाचा जड़ा है जो सामाजिक सरोकारों से कटकर केवल प्रयोग के नाम पर खोखली रचनाएं लिख रहे थे। अतः कहानी के लिए कथानक और यथार्थ अनिवार्य हैं।
उदाहरण 4
प्रश्न 4: "लखनवी अंदाज़" पाठ में सामंती वर्ग की किस विडंबना पर प्रहार किया गया है? क्या आज के समाज में भी ऐसी प्रवृत्ति दिखाई देती है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

सामंती वर्ग की विडंबना: पाठ में पतनशील सामंती वर्ग की इस दुखद विडंबना पर प्रहार किया गया है कि उनकी रियासतें, धन-दौलत और हवेलियां समाप्त हो चुकी हैं, किंतु उनके भीतर की झूठी शान, झूठा बड़प्पन और दिखावे की सनक नहीं गई है। वे साधारण सेकंड क्लास में सफर करते हैं और सस्ता खीरा खाते हैं, फिर भी खुद को असाधारण और विशिष्ट सिद्ध करने के लिए हास्यास्पद नाटक रचते हैं।

वर्तमान समाज में प्रासंगिकता: हाँ, आज के समाज में भी यह प्रवृत्ति 'शो-ऑफ कल्चर' (दिखावे की संस्कृति) के रूप में व्यापक स्तर पर दिखाई देती है:

  • लोग अपनी हैसियत से अधिक महंगे स्मार्टफोन, ब्रांडेड कपड़े और गाड़ियां केवल समाज में रौब जमाने के लिए कर्ज लेकर खरीदते हैं।
  • सोशल मीडिया पर बनावटी मुस्कान और झूठी रईसी की तस्वीरें पोस्ट करना उसी 'लखनवी अंदाज़' का आधुनिक डिजिटल रूप है।
उदाहरण 5
प्रश्न 5: पाठ के आधार पर बताइए कि नवाब साहब के खीरा खाने की तैयारी देखकर लेखक के मुंह में पानी क्यों आ रहा था, फिर भी उन्होंने खाने से क्यों मना कर दिया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

मुंह में पानी आने का कारण: नवाब साहब ने खीरों को बड़े सलीके से धोकर, छीलकर और उनकी फांकों पर जिस प्रकार जीरा-नमक और लाल मिर्च की सुर्खी बुरकी थी, वह दृश्य अत्यंत आकर्षक और क्षुधावर्धक (भूख बढ़ाने वाला) था। उस ताजे बालम खीरे की रसदार फांकों को देखकर किसी के भी मुंह में पानी आना स्वाभाविक था, अतः लेखक के मुंह में भी पानी आ गया था।

मना करने का कारण: लेखक ने खाने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि:

  1. आत्मसम्मान की रक्षा: जब नवाब साहब ने पहली बार पूछा था, तब लेखक ने उनकी बेरुखी से आहत होकर मना कर दिया था। अब दोबारा हाँ कहना लेखक को अपने स्वाभिमान और गरिमा के विरुद्ध लगा।
  2. नवाब साहब के दिखावे को चुनौती: लेखक नवाब साहब की झूठी शराफत और बड़प्पन के पाखंड का हिस्सा नहीं बनना चाहता था। इसलिए उसने पेट खराब होने का बहाना बनाकर अपनी मर्यादा बचाए रखी।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझ लेना कि नवाब साहब सचमुच किसी शाही महल के वर्तमान शासक थे।

सही वैज्ञानिक तथ्य

नवाब साहब उस पतनशील सामंती वर्ग के प्रतिनिधि हैं जिनकी नवाबी छिन चुकी थी, किंतु वे अभी भी अपनी खोखली शान और रईसी के भ्रम में जी रहे थे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि लेखक को वास्तव में खीरा पसंद नहीं था या उसका पेट खराब था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

लेखक को खीरा पसंद था और उसके मुंह में पानी भी आ रहा था। उसने केवल अपने आत्मसम्मान की रक्षा और नवाब साहब के पाखंड का भागीदार न बनने के लिए पेट खराब होने का बहाना बनाया था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

कहानी को केवल एक हास्यप्रद यात्रा-वृत्तांत मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह केवल यात्रा-वृत्तांत या हास्य नहीं है। यह एक तीखा व्यंग्य है जिसका मुख्य उद्देश्य सामंती दिखावे और तत्कालीन साहित्य में बिना कथानक के लिखी जाने वाली "नई कहानी" की निरर्थकता को उजागर करना है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

नवाब साहब की डकार को वास्तविक पाचन की डकार समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह डकार शारीरिक पाचन की नहीं, बल्कि अपने खानदानी रईसी के प्रदर्शन की बनावटी और मनोवैज्ञानिक डकार थी, जो उनके ढोंग की पराकाष्ठा को दिखाती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

लेखक द्वारा सेकंड क्लास का टिकट लेने को केवल फिजूलखर्ची समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

लेखक ने भीड़ से बचने, एकांत में नई कहानी के बारे में सोचने और खिड़की से प्राकृतिक दृश्य देखने के लिए सेकंड क्लास का टिकट लिया था।

लखनवी अंदाज़: सामंती पाखंड एवं 'नई कहानी' पर दोहरे व्यंग्य का ढांचा

यशपाल: लखनवी अंदाज़ (सामंती पाखंड एवं साहित्यिक अमूर्तता पर प्रहार) सेकंड क्लास का डिब्बा: खीरे की सूंघ से पेट भरने की डकार बनाम बिना विचार-पात्रों की 'नई कहानी' 👑 पतनशील सामंती नवाब सेकंड क्लास में उपस्थिति: • सफेदपोश भद्र व्यक्ति, पालथी मारे • तौलिए पर दो ताजे लखनवी खीरे असहजता एवं संकोच: • लेखक के आने से एकांत भंग • साधारण खीरा खाते पकड़े जाने की लज्जा • खिड़की से बाहर देखकर उपेक्षा का ढोंग दिखावटी शराफत: • "आदाब-अर्ज! खीरे का शौक फरमाएंगे?" • लेखक का इनकार व आत्मसम्मान • नवाबी नफासत का प्रदर्शन प्रारंभ झूठी शान व संकीर्ण मानसिकता 🥒 खीरे का लखनवी अंदाज़ कलात्मक तैयारी: • खिड़की से लोटे के पानी से धोना • सिर काटना, गोदना व झाग निकालना नमक-मिर्च की सुर्खी: • फांकों को करीने से सजाना • जीरा-नमक व मिर्च बुरकना • मुंह में पानी के घूंट का आना सूंघकर खिड़की से फेंकना: • फांक उठाना, नाक से सूंघना • आनंद में आंखें मूंदना व बाहर फेंकना • हाथ पोंछकर संतुष्टि की 'डकार' लेना हास्यास्पद कृत्रिम रईसी 🎯 वैचारिक व साहित्यिक व्यंग्य सामाजिक व्यंग्य: • पतनशील सामंतों की झूठी शान • यथार्थ व जमीनी सच से पलायन साहित्यिक व्यंग्य (नई कहानी): • बिना विचार, घटना व पात्रों के रचना • केवल शैली व अमूर्तता का ढोंग • सूंघकर तृप्ति = बिना कथ्य के साहित्य लेखक के ज्ञान-चक्षु: • "पहचाने ये हैं नई कहानी के लेखक!" • यथार्थ और सरोकार के बिना कला व्यर्थ • समाज को यथार्थवादी दृष्टि देना यथार्थवादी प्रगतिशील चेतना

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
प्रस्तुत व्यंग्य-रचना "लखनवी अंदाज़" के लेखक प्रगतिवादी कथाकार यशपाल हैं।
मुख्य बिंदु 2
लेखक ने भीड़ से बचने, एकांत में नई कहानी सोचने और प्राकृतिक दृश्य देखने के लिए सेकंड क्लास का टिकट लिया था।
मुख्य बिंदु 3
डिब्बे में पहले से उपस्थित लखनवी सफेदपोश नवाब साहब के चेहरे पर लेखक को देखकर असंतोष की छाया आ गई।
मुख्य बिंदु 4
नवाब साहब खीरे जैसी साधारण वस्तु को अकेले में खाने की फिराक में थे और अब उन्हें संकोच हो रहा था।
मुख्य बिंदु 5
नवाब साहब ने बड़े यत्न से खीरों को धोया, सिर काटकर झाग निकाला, छीला और फांकों पर जीरा-नमक व मिर्च बुरकी।
मुख्य बिंदु 6
लेखक ने अपने आत्मसम्मान की रक्षा हेतु खीरा खाने से विनम्रतापूर्वक दो बार इनकार कर दिया।
मुख्य बिंदु 7
नवाब साहब ने खीरे की प्रत्येक फांक को उठाया, नाक से सूंघा, आंखें मूंदकर स्वाद लिया और खिड़की से बाहर फेंक दिया।
मुख्य बिंदु 8
सभी फांकों को फेंकने के बाद नवाब साहब ने हाथ-होंठ पोंछे और पेट भरने की तृप्ति की एक जोरदार डकार ली।
मुख्य बिंदु 9
यह देखकर लेखक ने सोचा कि जब सूंघने मात्र से पेट भर सकता है, तो बिना विचार, घटना और पात्रों के नई कहानी भी लिखी जा सकती है।
मुख्य बिंदु 10
यह पाठ सामंती वर्ग के खोखलेपन के साथ-साथ बिना कथानक व उद्देश्य के लिखी जाने वाली अमूर्त "नई कहानी" पर तीखा व्यंग्य करता है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
1. लेखक ने सेकंड क्लास का टिकट क्यों खरीदा था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: भीड़ से बचने, एकांत में नई कहानी के बारे में सोचने और खिड़की से प्राकृतिक दृश्य देखने के लिए।
2
2. नवाब साहब के सामने तौलिए पर कौन-सी वस्तु रखी थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: दो ताजे, चिकने लखनवी बालम खीरे।
3
3. नवाब साहब ने खीरे की फांकों को खाने के स्थान पर क्या किया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: प्रत्येक फांक को होंठों तक ले जाकर सूंघा, स्वाद की कल्पना में आंखें मूंदीं और खिड़की से बाहर फेंक दिया।
4
4. नवाब साहब की डकार सुनकर लेखक के मन में क्या विचार आया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: कि यदि सूंघने से पेट भर सकता है, तो बिना विचार, घटना और पात्रों के लेखक की इच्छा मात्र से "नई कहानी" भी लिखी जा सकती है।
5
5. "लखनवी अंदाज़" पाठ का मुख्य व्यंग्य किस पर है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पतनशील सामंती वर्ग की झूठी शान व बनावटी जीवन-शैली पर तथा अमूर्त व कथानक-विहीन "नई कहानी" पर।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

ऑनलाइन CBT टेस्ट देकर तैयारी का मूल्यांकन करें

झारखण्ड बोर्ड परीक्षा पैटर्न पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्नों का ऑनलाइन टेस्ट दें। तुरंत परिणाम, समय विश्लेषण और प्रत्येक प्रश्न का विस्तृत हल प्राप्त करें।