(क) सुषिर वाद्यों में शहनाई का सर्वोच्च स्थान
वैदिक काल में जिन वाद्यों को फूंककर बजाया जाता था, उन्हें 'सुषिर वाद्य' (Aerophones) कहा जाता था। अरब देशों में ऐसे वाद्यों को जिनमें नाड़ी (नरकट/नली) होती है, 'नय' कहा जाता है।
जब ईरानी दरबार में 'नय' वाद्य को विशेष रूप से परिष्कृत करके बजाया गया, तो इसे 'शाह की नय' अर्थात 'शाहनय' (शहनाई) कहा गया। भारत में शहनाई को सभी मांगलिक अवसरों (विवाह, उत्सव, मंदिर-पूजा) पर बजाई जाने वाली 'मंगलध्वनि का सर्वोपरि वाद्य' माना जाता है।
(ख) डुमराँव और बिस्मिल्ला खाँ का भौगोलिक व ऐतिहासिक संबंध:
शहनाई के सम्राट उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जन्म बिहार के डुमराँव कस्बे में हुआ था। लेखक रेखांकित करता है कि डुमराँव का ऐतिहासिक दृष्टि से कोई बड़ा महल या किला नहीं है, किंतु संगीत के इतिहास में इसका नाम सदैव स्वर्णाक्षरों में अमर रहेगा। इसके दो प्रमुख कारण हैं:
- बिस्मिल्ला खाँ की जन्मभूमि: शहनाई के विश्वविख्यात जादूगर अमीरुद्दीन (बिस्मिल्ला खाँ) के परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ डुमराँव के ही निवासी थे।
- 'नरकट' घास की उपलब्धता: शहनाई बजाने के लिए जिस 'रीड' (Reed - नली) की आवश्यकता होती है, वह अंदर से पोली (खोखली) होती है। यह रीड एक विशेष प्रकार की घास 'नरकट' से बनाई जाती है, जो केवल डुमराँव में सोन नदी के कछारों (किनारों) पर ही प्रचुर मात्रा में उगती है। बिना उस नरकट के शहनाई से कोई सुर निकल ही नहीं सकता।