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CBSE • कक्षा X • Hindi • अध्याय 11
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

Naubatkhane Mein Ibadat

सुप्रसिद्ध कवि, संगीत-मर्मज्ञ और सांस्कृतिक चिंतक यतींद्र मिश्र (जन्म: 1977 ई.) भारतीय कलाओं, शास्त्रीय संगीत और सांस्कृतिक धरोहरों के बेजोड़ व्याख्याता हैं। प्रस्तुत व्यक्ति-चित्र 'नौबतखाने में इबादत' (Naubatkhane Mein Ibadat) भारत रत्न से सम्मानित शहनाई के विश्वविख्यात जादूगर उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ (1916 - 2006 ई.) के पावन, समर्पित और गंगा-जमुनी तहज़ीब से परिपूर्ण जीवन का अत्यंत आत्मीय और भावपूर्ण दस्तावेज़ है: शहनाई, डुमराँव और 'नरकट' का रिश्ता: बिस्मिल्ला खाँ (बचपन का नाम 'अमीरुद्दीन') का जन्म बिहार के डुमराँव में हुआ था। शहनाई बजाने के लिए जिस 'रीड' (नरकट/घास की नली) का उपयोग होता है, वह डुमराँव में सोन नदी के किनारों पर ही पाई जाती है। इसी कारण शहनाई और डुमराँव का संबंध अविभाज्य है। काशी का बालाजी मंदिर और गंगा-जमुनी संस्कृति: अमीरुद्दीन का ननिहाल काशी (वाराणसी) में था। उनके मामा अलीबख्श खाँ और सादिक हुसैन काशी के प्रसिद्ध बालाजी मंदिर के 'नौबतखाने' (प्रवेश द्वार के ऊपर संगीत बजाने का स्थान) में रियाज़ करते थे। बिस्मिल्ला खाँ एक सच्चे मुसलमान थे जो पांचों वक्त नमाज़ अदा करते थे और मुहर्रम में आठवें दिन दालमंडी से फातमान तक आठ किलोमीटर पैदल नौहा गाते और रोते हुए जाते थे। इसके साथ ही वे काशी विश्वनाथ और संकटमोचन बालाजी के परम भक्त थे। जब भी वे काशी से बाहर जाते, सबसे पहले काशी विश्वनाथ की दिशा में मुंह करके बैठते और शहनाई का पहला सुर उन्हीं के चरणों में अर्पित करते थे। सुर की इबादत एवं परम सादगी: भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' पाने के बाद भी वे फटी तहमद (लुंगी) पहनते थे। जब उनकी शिष्या ने फटी लुंगी पहनने पर टोका, तो खाँ साहब ने ऐतिहासिक उत्तर दिया—"धत् पगली! भारत रत्न हमको शहनइया पर मिला है, लुंगिया पर नहीं! मालिक से यही दुआ है कि फटा सुर न बख्शे; लुंगिया का क्या है, आज फटी है तो कल सिल जाएगी, पर अगर सुर फट गया तो कोई नहीं सिल सकता!" काशी की बदलती संस्कृति पर चिंता: खाँ साहब काशी की लुप्त होती परंपराओं—मलाई-बर्फ, देशी घी की कचौड़ियों और गायकों-संगीतकारों के प्रति घटते आदर को लेकर अत्यंत चिंतित थे, किंतु वे अंतिम सांस तक सुर और साझी संस्कृति के सच्चे उपासक बने रहे। झारखंड अधिविद्य परिषद् (CBSE Class 10) की बोर्ड परीक्षा में बिस्मिल्ला खाँ का गंगा-जमुनी रूप (5 अंक), 'फटा सुर न बख्शे' का आशय (3 अंक), डुमराँव व काशी का महत्व, तथा मुहर्रम व काशी विश्वनाथ के प्रति उनकी श्रद्धा पर विश्लेषणात्मक प्रश्न प्रतिवर्ष पूछे जाते हैं।

🎺 क्या आपने कभी किसी ऐसे इंसान को देखा है जिसे देश का सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न' मिला हो, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जिसके सम्मान में खड़े होते हों, लेकिन वह भगवान से केवल एक फटा हुआ सुर न देने और एक फटी लुंगी में जीने की दुआ मांगता हो?

यह कहानी है काशी के उस फकीर की, जिसने बांस की एक खोखली नली में फूंक मारकर दुनिया के सात सुरों को अपने वश में कर लिया था! एक ऐसा सच्चा मुसलमान—जो पांचों वक्त खुदा के सामने सजदा करता था, मुहर्रम में अपने आंसुओं से धरती को भिगो देता था; और वही इंसान जब सुबह बालाजी के मंदिर की सीढ़ियों पर बैठता था, तो उसकी शहनाई से मां गंगा की लहरें और बाबा विश्वनाथ का डमरू गूंज उठता था! यतींद्र मिश्र का यह पाठ हमें सिखाता है कि सच्चा धर्म नफरत की दीवारों में नहीं, बल्कि संगीत के सात सुरों, सादगी और हिंदुस्तान की साझी गंगा-जमुनी तहज़ीब में सांस लेता है! आइए, शहनाई के शहंशाह उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की इबादत में शामिल हों!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

इस अध्याय का अध्ययन आपके लिए क्यों अनिवार्य है?

  1. बोर्ड परीक्षा में 6-8 अंकों का सीधा योगदान: CBSE 10वीं बोर्ड परीक्षा में बिस्मिल्ला खाँ के जीवन-दर्शन, काशी-प्रेम और सादगी पर दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न निश्चित रूप से पूछे जाते हैं।
  2. सांप्रदायिक सौहार्द एवं गंगा-जमुनी तहज़ीब की शिक्षा: हिंदू-मुस्लिम एकता, साझा सांस्कृतिक विरासत और सर्वधर्म समभाव का सबसे प्रामाणिक उदाहरण मिलता है।
  3. सादगी और समर्पण का महत्व: भौतिक चकाचौंध और दिखावे के युग में केवल अपनी कला और साधना के प्रति निष्ठावान रहने की प्रेरणा मिलती है।
  4. भारतीय शास्त्रीय संगीत और लोक-परंपराओं का ज्ञान: शहनाई की उत्पत्ति, 'सुषिर वाद्य', नौबतखाना, राग-रागिनियों और काशी की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का परिचय होता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के संगीत-योगदान और भारत रत्न सम्मान का सामान्य परिचय।
  • शास्त्रीय संगीत शब्दावली (सुषिर वाद्य = फूंक कर बजाए जाने वाले वाद्य; रीड = नरकट से बनी पतली नली; नौबतखाना = राजमहलों या मंदिरों के मुख्य द्वार के ऊपर संगीत वादन का कक्ष; रियाज़ = अभ्यास; तान व राग)।
  • कठिन शब्दों के अर्थ (जैसे: इबादत = ईश्वर की पूजा/प्रार्थना, मुहर्रम = शहादत का गमगीन महीना, नौहा = शोकगीत, तहमद = लुंगी, नेमत = ईश्वर का उपहार, सजदा = नतमस्तक होना)।
  • काशी (वाराणसी) की सांस्कृतिक एवं धार्मिक पृष्ठभूमि।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • पाठ के महत्वपूर्ण अनुच्छेदों की संदर्भ, प्रसंग और भावार्थ सहित समीक्षात्मक व्याख्या कर सकेंगे।
  • उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व में हिंदू-मुस्लिम समन्वय (गंगा-जमुनी संस्कृति) को प्रमाणित कर सकेंगे।
  • "फटा सुर न बख्शे; लुंगिया का क्या है..." कथन के दार्शनिक और कलात्मक महत्व को स्पष्ट कर सकेंगे।
  • शहनाई के निर्माण में डुमराँव और "नरकट" के अनिवार्य योगदान का वैज्ञानिक व भौगोलिक विश्लेषण कर सकेंगे।
  • काशी की लुप्त होती परंपराओं और बिस्मिल्ला खाँ की चिंताओं पर अपने विचार व्यक्त कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. शहनाई की मंगलध्वनि, 'सुषिर वाद्य...
2 2. काशी का बालाजी मंदिर, रसूलनबाई-ब...
3 3. मुहर्रम का मातम एवं काशी विश्वना...
4 4. 'फटा सुर न बख्शे; लुंगिया का क्य...
5 5. काशी की बदलती संस्कृति पर खाँ सा...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. शहनाई की मंगलध्वनि, 'सुषिर वाद्यों में शाह' एवं डुमराँव का संबंध

(क) सुषिर वाद्यों में शहनाई का सर्वोच्च स्थान

वैदिक काल में जिन वाद्यों को फूंककर बजाया जाता था, उन्हें 'सुषिर वाद्य' (Aerophones) कहा जाता था। अरब देशों में ऐसे वाद्यों को जिनमें नाड़ी (नरकट/नली) होती है, 'नय' कहा जाता है।

जब ईरानी दरबार में 'नय' वाद्य को विशेष रूप से परिष्कृत करके बजाया गया, तो इसे 'शाह की नय' अर्थात 'शाहनय' (शहनाई) कहा गया। भारत में शहनाई को सभी मांगलिक अवसरों (विवाह, उत्सव, मंदिर-पूजा) पर बजाई जाने वाली 'मंगलध्वनि का सर्वोपरि वाद्य' माना जाता है।

(ख) डुमराँव और बिस्मिल्ला खाँ का भौगोलिक व ऐतिहासिक संबंध:

शहनाई के सम्राट उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जन्म बिहार के डुमराँव कस्बे में हुआ था। लेखक रेखांकित करता है कि डुमराँव का ऐतिहासिक दृष्टि से कोई बड़ा महल या किला नहीं है, किंतु संगीत के इतिहास में इसका नाम सदैव स्वर्णाक्षरों में अमर रहेगा। इसके दो प्रमुख कारण हैं:

  1. बिस्मिल्ला खाँ की जन्मभूमि: शहनाई के विश्वविख्यात जादूगर अमीरुद्दीन (बिस्मिल्ला खाँ) के परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ डुमराँव के ही निवासी थे।
  2. 'नरकट' घास की उपलब्धता: शहनाई बजाने के लिए जिस 'रीड' (Reed - नली) की आवश्यकता होती है, वह अंदर से पोली (खोखली) होती है। यह रीड एक विशेष प्रकार की घास 'नरकट' से बनाई जाती है, जो केवल डुमराँव में सोन नदी के कछारों (किनारों) पर ही प्रचुर मात्रा में उगती है। बिना उस नरकट के शहनाई से कोई सुर निकल ही नहीं सकता।

2. काशी का बालाजी मंदिर, रसूलनबाई-बतूलनबाई और संगीत का बीजारोपण

(क) काशी आगमन और मामाओं का रियाज़

अमीरुद्दीन जब मात्र छह वर्ष के थे, तब वे अपने ननिहाल काशी (वाराणसी) आ गए। उनके मामा अलीबख्श खाँ और सादिक हुसैन काशी के प्रसिद्ध संगीतकार थे।

वे दोनों भाई पंचगंगा घाट पर स्थित 'बालाजी के मंदिर' के नौबतखाने (प्रवेश द्वार का ऊपरी संगीत कक्ष) में शहनाई बजाते थे। रोज सुबह-सुबह जब वे बालाजी मंदिर के नौबतखाने में बैठकर विभिन्न रागों (भैरवी, ललित, रामकली) का रियाज़ करते, तो नन्हा अमीरुद्दीन चुपचाप बैठकर अपने मामाओं की उंगलियों की थिरकन और सुरों के आरोह-अवरोह को विस्मय से देखता था। जब मामा किसी सुर पर दाद देते, तो बालक भी उसी समय पत्थर फेंककर अपनी खुशी प्रकट करता था।

(ख) रसूलनबाई और बतूलनबाई की गायकी का प्रभाव:

बालाजी के मंदिर जाने के लिए अमीरुद्दीन जिस रास्ते का चुनाव करते थे, वह रास्ता गायिका बहनों रसूलनबाई और बतूलनबाई के घर के सामने से होकर गुजरता था।

रोज सुबह जब वे उस रास्ते से निकलते, तो कानों में रसूलनबाई और बतूलनबाई के कंठ से फूटती हुई ठुमरी, दादरा और टप्पे की स्वर-लहरियाँ सुनाई देती थीं—"अमीरुद्दीन को संगीत की पहली प्रेरणा इन्हीं गायिका बहनों के गानों से मिली।" बिस्मिल्ला खाँ जीवन भर इस बात को कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करते रहे कि उनके सुरों में जो कशिश और मिठास आई, वह रसूलनबाई के गाए गीतों के प्रभाव से ही संभव हुई थी।

3. मुहर्रम का मातम एवं काशी विश्वनाथ की अनन्य भक्ति (गंगा-जमुनी समन्वय)

उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का व्यक्तित्व भारतीय संस्कृति की 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' (हिंदू-मुस्लिम समन्वय) का सबसे पवित्र और जीवंत प्रतीक है:

तालिका: बिस्मिल्ला खाँ की धार्मिक निष्ठा एवं सर्वधर्म समभाव का तुलनात्मक स्वरूप

धार्मिक पक्ष धार्मिक अनुष्ठान एवं परंपरा अंतर्निहित भाव एवं साधना
1. इस्लाम धर्म के प्रति अगाध निष्ठा पांचों वक्त की नमाज़ पाबंदी से पढ़ना; अल्लाह के सामने सजदा करना और केवल 'सच्चा सुर' मांगना। ईश्वर को एक मानना; संगीत को खुदा की इबादत (प्रार्थना) का माध्यम बनाना।
2. मुहर्रम का गमगीन मातम मुहर्रम के दस दिनों तक कोई राग-रंग या शहनाई नहीं बजाना। आठवीं तारीख को दालमंडी से फातमान तक 8 किमी पैदल नौहा गाते हुए आंसुओं से रोते हुए जाना। हज़रत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की शहादत के प्रति अत्यंत गहरी और आत्मीय शोक-संवेदना।
3. काशी विश्वनाथ व बालाजी की भक्ति काशी से बाहर जाते समय सबसे पहले विश्वनाथ व बालाजी की दिशा में मुंह करके बैठना और शहनाई की पहली फूंक उन्हीं के चरणों में अर्पित करना। काशी को अपनी मां और शिव-हनुमान को अपना रक्षक मानना। सांप्रदायिक सीमाओं से परे जाकर ईश्वर के विराट रूप की उपासना।
💡 सांस्कृतिक मर्म:

जब एक बार उनके किसी शिष्य ने पूछा कि—"खाँ साहब! आप तो पक्के नमाज़ी मुसलमान हैं, फिर विश्वनाथ मंदिर के सामने शहनाई क्यों बजाते हैं?" तो खाँ साहब ने सहज भाव से कहा था—"ई काशी है भइया! यहाँ विश्वनाथ और बिस्मिल्ला खाँ एक दूसरे के बिना अधूरे हैं! हमारा सुर बाबा विश्वनाथ के दरबार में ही तो पक्का हुआ है!"

4. 'फटा सुर न बख्शे; लुंगिया का क्या है...' - सादगी और सुर की इबादत

बिस्मिल्ला खाँ साहब को भारत सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से अलंकृत किया। इसके अतिरिक्त पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण और संगीत नाटक अकादमी जैसे अनगिनत पुरस्कार उनकी झोली में थे। किंतु वे जीवन भर एक फकीर की तरह जिए:

शिष्या का संकोच और खाँ साहब की अमर सीख:

एक दिन उनकी एक युवा शिष्या ने देखा कि खाँ साहब घर में एक अत्यंत पुरानी और जगह-जगह से फटी हुई तहमद (लुंगी) पहने बैठे हैं। शिष्या ने संकोचपूर्वक और प्यार से उलाहना देते हुए कहा:

"बाबा! अब तो आपको 'भारत रत्न' भी मिल चुका है! देश-विदेश के बड़े-बड़े लोग आपसे मिलने आते हैं। कम से कम आप यह फटी हुई लुंगी तो न पहना कीजिए! अच्छी नई धोती पहन लिया कीजिए!"

इस पर खाँ साहब मुस्कुराए और अपनी ठेठ बनारसी बोली में जो उत्तर दिया, वह भारतीय दर्शन का अमर उपदेश बन गया:

"धत् पगली! भारत रत्न हमको शहनइया पर मिला है, लुंगिया पर नहीं! हमारी मालिक से यही दुआ है कि फटा सुर न बख्शे! लुंगिया का क्या है, आज फटी है तो कल सिल जाएगी, पर अगर सुर एक बार फट गया तो जिंदगी भर नहीं जुड़ेगा!"

सुर की इबादत का अर्थ:

खाँ साहब अस्सी वर्ष की उम्र में भी पांचों वक्त नमाज़ के बाद सजदे में गिरकर अल्लाह से केवल एक ही नेमत मांगते थे—"सच्चा सुर!" वे धन-दौलत, महल, गाड़ी या यश नहीं मांगते थे। वे कहते थे—"हे परवरदिगार! मेरे सुर में ऐसा तासीर (असर) भर दे कि जब मेरी शहनाई बजे, तो सुनने वालों की आंखों से सच्चे आंसुओं की अनमोल बूंदें छलक पड़ें!"

5. काशी की बदलती संस्कृति पर खाँ साहब की चिंता एवं शाश्वत विरासत

अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में बिस्मिल्ला खाँ काशी के बदलते स्वरूप और लुप्त होती सांस्कृतिक धरोहरों को देखकर अत्यंत व्यथित रहते थे:

(क) काशी की लुप्त होती परंपराएं:

  • अब पहले जैसी मलाई-बर्फ बेचने वाले फेरीवाले नहीं रहे।
  • कुलसुम हलवाइन की कड़ाही में छनने वाली देशी घी की कचौड़ी और जलेबी की वह पुरानी सोंधी खुशबू और स्वाद गायब हो गया। (खाँ साहब कहते थे कि जब कुलसुम कचौड़ी को खौलते घी में डालती थी, तो छन्न की आवाज में उन्हें संगीत का 'स' सुनाई देता था!)
  • अब गायकों और संगीतकारों के प्रति वह पुराना सम्मान और कद्रदानी नहीं बची थी। समाज केवल चकाचौंध और त्वरित लाभ के पीछे भाग रहा था।

(ख) खाँ साहब का अमर संदेश:

21 अगस्त 2006 को जब 90 वर्ष की आयु में इस महान फकीर ने अंतिम सांस ली, तो देश ने एक ऐसा कलाकार खो दिया जिसकी शहनाई में हिंदुस्तान की साझी आत्मा धड़कती थी। उन्हें उनकी प्रिय शहनाई के साथ ही सुपुर्द-ए-खाक किया गया।

यतींद्र मिश्र सिद्ध करते हैं कि बिस्मिल्ला खाँ केवल एक संगीतकार नहीं थे; वे भारत की उस सांस्कृतिक एकता के साक्षात अवतार थे जहाँ अजान और आरती का स्वर एक होकर ईश्वर के चरणों में समर्पित हो जाता है।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

सुषिर वाद्य एवं शहनाई का नामकरण
सुषिर वाद्य = फूंककर बजने वाले वाद्य; शाह की नय = शाहनय → शहनाई (मांगलिक उत्सवों का शिरोमणि वाद्य)।
डुमराँव का महत्व
बिस्मिल्ला खाँ की जन्मभूमि + सोन नदी के किनारों पर उगने वाली "नरकट" घास (जिससे रीड बनती है)।
काशी का नौबतखाना
पंचगंगा घाट पर स्थित बालाजी मंदिर का प्रवेश द्वार; मामा अलीबख्श व सादिक हुसैन का रियाज़ स्थल।
संगीत का बीजारोपण
गायिका बहनों रसूलनबाई और बतूलनबाई की ठुमरी व टप्पे सुनकर बालक अमीरुद्दीन में सुरों की ललक जागना।
मुहर्रम का अनुष्ठान
10 दिनों का संगीत-त्याग; 8वीं तारीख को दालमंडी से फातमान तक 8 किमी पैदल नौहा गाकर रोना।
काशी विश्वनाथ के प्रति श्रद्धा
काशी से बाहर जाने पर विश्वनाथ व बालाजी की दिशा में बैठकर पहली शहनाई फूंकना।
अमर दार्शनिक सूत्र
"धत् पगली! भारत रत्न शहनइया पर मिला है, लुंगिया पर नहीं! मालिक फटा सुर न बख्शे; लुंगिया तो सिल जाएगी।"
सजदे में एकमात्र प्रार्थना
धन-दौलत नहीं, केवल "सच्चा सुर" मांगना ताकि सुनने वालों की आंखों से अनमोल आंसू छलक पड़ें।
काशी की सांस्कृतिक धरोहर
मलाई-बर्फ + कुलसुम हलवाइन की देशी घी की कचौड़ी-जलेबी (छन्न की आवाज में संगीत) + साझी तहज़ीब।
व्यक्तित्व का निचोड़
सर्वोच्च पद (भारत रत्न) + परम सादगी (फकीरी) + हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय का सजीव प्रतीक।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1 (CBSE Board 2020, 2023): बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगलध्वनि का नायक क्यों कहा गया है? उनके जीवन की सादगी का एक उदाहरण दीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

मंगलध्वनि का नायक कहे जाने का कारण:

  1. मांगलिक अवसरों का पर्याय: भारतीय परंपरा में शहनाई सभी शुभ कार्यों (विवाह, मुंडन, उत्सवों और मंदिर-पूजा) पर बजाई जाने वाली मंगलध्वनि का सर्वोच्च वाद्य है।
  2. अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा: बिस्मिल्ला खाँ ने शहनाई को केवल महफिलों और शादियों के दायरे से बाहर निकालकर देश और दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित शास्त्रीय संगीत के मंचों पर प्रतिष्ठित किया। उनके जैसी सुरों की पवित्रता और प्रभाव किसी अन्य में नहीं था।

सादगी का उदाहरण: भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' प्राप्त करने के बाद भी वे घर में फटी हुई तहमद (लुंगी) पहनते थे। जब उनकी शिष्या ने उन्हें नई धोती पहनने की सलाह दी, तो उन्होंने कहा कि—"भारत रत्न हमको शहनइया पर मिला है, लुंगिया पर नहीं! मालिक से बस यही दुआ है कि फटा सुर न बख्शे; लुंगिया तो सिल जाएगी, पर सुर फट गया तो कभी नहीं जुड़ेगा!" यह उनकी अपार सादगी का साक्षात प्रमाण है।

उदाहरण 2
प्रश्न 2 (CBSE Board 2021, 2024): मुहर्रम पर्व से बिस्मिल्ला खाँ के जुड़ाव को अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए। वे इस अवसर पर क्या करते थे?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

मुहर्रम पर्व से बिस्मिल्ला खाँ का अत्यंत गहरा, भावुक और रूहानी जुड़ाव था:

  1. दस दिनों का संगीत-त्याग: मुहर्रम के पूरे दस दिनों तक बिस्मिल्ला खाँ और उनके खानदान का कोई भी व्यक्ति न तो शहनाई बजाता था और न ही किसी संगीत के कार्यक्रम में भाग लेता था। इन दिनों वे किसी भी राग-रागिनी का गायन नहीं करते थे।
  2. आठवीं तारीख का ऐतिहासिक शोक-जुलूस: मुहर्रम की आठवीं तारीख उनके लिए सबसे पवित्र और गमगीन दिन होती थी। इस दिन खाँ साहब खड़े होकर शहनाई बजाते थे और दालमंडी से फातमान के कर्बला तक लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पैदल तय करते थे।
  3. आंसुओं की धारा: वे रोते हुए, छाती पीटते हुए इमाम हुसैन और उनके शहीदों की याद में शोकगीत (नौहा) गाते जाते थे। उनकी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बहती थी। यह प्रसंग उनके धार्मिक समर्पण और संवेदनशीलता का शिखर है।
उदाहरण 3
प्रश्न 3: बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व में काशी और हिंदू-मुस्लिम समन्वय (गंगा-जमुनी तहज़ीब) का जो रूप दिखाई देता है, उसकी समीक्षा कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

बिस्मिल्ला खाँ का संपूर्ण जीवन भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत (गंगा-जमुनी तहज़ीब) का सर्वोत्तम उदाहरण है:

  1. पक्के नमाज़ी और विश्वनाथ-भक्त: वे एक ओर पांचों वक्त नमाज़ अदा करने वाले सच्चे मुसलमान थे, तो दूसरी ओर काशी विश्वनाथ और संकटमोचन बालाजी के परम भक्त थे।
  2. पहली फूंक का समर्पण: जब भी वे काशी से बाहर किसी भी देश या शहर में कार्यक्रम करने जाते, तो मंच पर सबसे पहले काशी विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की दिशा की ओर मुंह करके बैठते थे और अपनी शहनाई का पहला सुर उन्हीं के चरणों में अर्पित करते थे।
  3. काशी को स्वर्ग मानना: जब एक बार किसी ने उन्हें अमेरिका में बसने का प्रस्ताव दिया, तो उन्होंने साफ मना कर दिया कि—"क्या आप मेरी काशी, मेरे गंगा मैया और मेरे बालाजी के मंदिर को अमेरिका ले जा सकते हैं? यदि नहीं, तो मैं काशी छोड़कर कहीं नहीं जा सकता!" उनका यह रूप सिद्ध करता है कि धर्म मनुष्य को बांटता नहीं, बल्कि सुरों की तरह सबको एक सूत्र में पिरोता है।
उदाहरण 4
प्रश्न 4: शहनाई और डुमराँव के पारस्परिक संबंध को स्पष्ट कीजिए। संगीत के इतिहास में डुमराँव क्यों अमर है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

शहनाई और डुमराँव के बीच गहरा भौगोलिक और ऐतिहासिक संबंध है:

  1. 'नरकट' घास की अनिवार्यता: शहनाई को फूंकने के लिए जिस 'रीड' (नली) का उपयोग किया जाता है, वह अंदर से पोली होती है। यह रीड 'नरकट' नाम की विशेष घास से बनती है, जो केवल डुमराँव में सोन नदी के किनारों पर ही प्राकृतिक रूप से पाई जाती है। यदि डुमराँव की यह नरकट न हो, तो शहनाई का वादन संभव ही नहीं है।
  2. बिस्मिल्ला खाँ की जन्मस्थली: शहनाई को विश्व पटल पर अमर करने वाले उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जन्म डुमराँव में ही हुआ था। उनके पूर्वज सलार हुसैन खाँ भी यहीं के रहने वाले थे। अतः डुमराँव ने शहनाई को उसका शरीर (रीड) भी दिया और उसकी आत्मा (बिस्मिल्ला खाँ) भी दी। इसलिए संगीत के इतिहास में डुमराँव सदैव अमर रहेगा।
उदाहरण 5
प्रश्न 5: "काशी में संगीत का आयोजन एक प्राचीन एवं अद्भुत परंपरा है।" इस कथन के आलोक में काशी की सांस्कृतिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

काशी (वाराणसी) को भारत की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता है, जिसकी विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  1. संकटमोचन संगीत समारोह: काशी के प्रसिद्ध संकटमोचन हनुमान मंदिर में प्रतिवर्ष शास्त्रीय संगीत का विशाल समारोह आयोजित होता है, जिसमें देश के शीर्षस्थ हिंदू-मुस्लिम संगीतकार पूरी श्रद्धा से भाग लेते हैं। बिस्मिल्ला खाँ इसमें अनिवार्य रूप से शहनाई बजाते थे।
  2. गंगा के घाटों पर सुर-साधना: काशी के पंचगंगा घाट और अस्सी घाट पर सुबह और शाम राग-रागिनियों की साधना की प्राचीन परंपरा है।
  3. कला और खान-पान का समन्वय: काशी केवल धर्म की नगरी नहीं है; यहाँ मलाई-बर्फ, देशी घी की कचौड़ी-जलेबी और पान की परंपरा संगीत और साहित्य के साथ एकाकार हो चुकी है।
  4. आनंदकानन का स्वरूप: काशी को 'आनंदकानन' कहा गया है, जहाँ बाबा विश्वनाथ और मां अन्नपूर्णा का साक्षात् वास है। यहाँ जीवन और मृत्यु दोनों को एक उत्सव और मुक्ति का साधन माना जाता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

बिस्मिल्ला खाँ को केवल एक साधारण शहनाई वादक मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वे केवल वादक नहीं थे, वे शहनाई को शास्त्रीय संगीत के सर्वोच्च मंचों तक पहुंचाने वाले युगांतरकारी साधक और "भारत रत्न" विभूषित महापुरुष थे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि बिस्मिल्ला खाँ हिंदू मंदिर में जाने के कारण सच्चे मुसलमान नहीं थे।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वे एक सच्चे और निष्ठावान मुसलमान थे जो पांचों वक्त नमाज़ पढ़ते थे और मुहर्रम में रोते थे। वे ईश्वर को एक मानते थे और मंदिर में शहनाई बजाना उनकी सर्वधर्म समभाव की दृष्टि थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

"फटा सुर न बख्शे" का अर्थ ईश्वर द्वारा सुर छीन लेना समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

इसका अर्थ है ईश्वर से यह प्रार्थना करना कि उनके कंठ या शहनाई से कभी कोई बेसुरा, अशुद्ध या खंडित सुर न निकले; उनका सुर हमेशा पवित्र और सच्चा बना रहे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

डुमराँव को केवल एक पिछड़ा हुआ कस्बा समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

डुमराँव भले ही एक छोटा कस्बा हो, किंतु संगीत के इतिहास में इसका महत्व अद्वितीय है क्योंकि यहीं सोन नदी के किनारे शहनाई की रीड बनाने वाली "नरकट" घास उगती है और यह बिस्मिल्ला खाँ की जन्मस्थली है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

रसूलनबाई और बतूलनबाई को केवल पड़ोसी मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वे दोनों सुप्रसिद्ध गायिका बहनें थीं जिनके शास्त्रीय गायन (ठुमरी, दादरा) को सुनकर बालक बिस्मिल्ला खाँ के मन में संगीत की पहली प्रेरणा और सुरों की समझ उत्पन्न हुई थी।

नौबतखाने में इबादत: बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व एवं साधना का त्रिकोण

यतींद्र मिश्र: नौबतखाने में इबादत (उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ) शहनाई की मंगलध्वनि: डुमराँव की नरकट, मुहर्रम का मातम एवं काशी विश्वनाथ की साझी गंगा-जमुनी तहज़ीब 🎺 शहनाई एवं डुमराँव सुषिर वाद्यों में शाह: • शाहनय → शहनाई (मंगलध्वनि) • मांगलिक उत्सवों का शिरोमणि वाद्य डुमराँव व नरकट घास: • सोन नदी के कछार में नरकट • रीड (Reed) के बिना शहनाई असंभव • खाँ साहब की जन्मभूमि प्रेरणा के स्रोत: • मामा अलीबख्श व सादिक हुसैन • रसूलनबाई व बतूलनबाई की ठुमरी • बालाजी नौबतखाने में रियाज़ शहनाई के साक्षात शहंशाह 🕌 इबादत एवं मुहर्रम पाँचों वक्त नमाज़: • खुदा के आगे सजदे में गिरना • केवल "सच्चा सुर" मांगना मुहर्रम का 10 दिन मातम: • कोई राग-रंग या शहनाई नहीं • इमाम हुसैन की शहादत पर शोक • खानदान भर का मौन व्रत आठवीं तारीख का जुलूस: • दालमंडी से फातमान (8 किमी) • पैदल नौहा गाते हुए रोना • आंसुओं से धरती को भिगोना सच्चे मुसलिम व खुदा के बंदे 🕉️ काशी-भक्ति व सादगी विश्वनाथ-चरणों में अर्पण: • काशी से बाहर जाने पर मुख-दिशा • पहली शहनाई बाबा विश्वनाथ को अमर जीवन-दर्शन: • भारत रत्न vs फटी लुंगी • "मालिक फटा सुर न बख्शे! • लुंगिया का क्या, कल सिल जाएगी" गंगा-जमुनी समन्वय: • अजान और आरती का संगम • कुलसुम की कचौड़ी में 'सा' • काशी से विलग होने से इनकार गंगा-जमुनी तहज़ीब का मुकुट

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
प्रस्तुत व्यक्ति-चित्र "नौबतखाने में इबादत" के लेखक सुप्रसिद्ध संगीत-मर्मज्ञ यतींद्र मिश्र हैं।
मुख्य बिंदु 2
यह पाठ शहनाई के विश्वविख्यात जादूगर भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के पावन जीवन का सजीव चित्रण है।
मुख्य बिंदु 3
शहनाई को सभी सुषिर वाद्यों में "शाह की नय" (शाहनय) और मंगलध्वनि का शिरोमणि वाद्य माना जाता है।
मुख्य बिंदु 4
डुमराँव में सोन नदी के किनारे उगने वाली "नरकट" घास से शहनाई की रीड बनती है, जो बिस्मिल्ला खाँ की जन्मस्थली है।
मुख्य बिंदु 5
काशी के पंचगंगा घाट पर बालाजी मंदिर के नौबतखाने में मामा अलीबख्श व सादिक हुसैन से उन्होंने शहनाई सीखी।
मुख्य बिंदु 6
गायिका बहनों रसूलनबाई और बतूलनबाई के शास्त्रीय गीतों से बालक अमीरुद्दीन में संगीत की पहली रुचि जागी।
मुख्य बिंदु 7
मुहर्रम में वे 10 दिनों तक शहनाई नहीं बजाते थे और 8वीं तारीख को 8 किमी पैदल रोते हुए नौहा गाते जाते थे।
मुख्य बिंदु 8
काशी से बाहर जाने पर वे सबसे पहले विश्वनाथ व बालाजी की ओर मुंह करके पहली शहनाई का सुर समर्पित करते थे।
मुख्य बिंदु 9
भारत रत्न मिलने पर भी वे फटी लुंगी पहनते थे और कहते थे—"मालिक फटा सुर न बख्शे, लुंगिया तो कल सिल जाएगी।"
मुख्य बिंदु 10
बिस्मिल्ला खाँ का जीवन हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक सौहार्द और भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब का अमर प्रतीक है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
1. शहनाई बजाने के लिए आवश्यक "रीड" किस चीज से बनती है और यह कहाँ पाई जाती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: रीड "नरकट" नाम की घास से बनती है जो बिहार के डुमराँव में सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है।
2
2. बिस्मिल्ला खाँ के बचपन का नाम क्या था और उनके मामा कहाँ शहनाई बजाते थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: बचपन का नाम "अमीरुद्दीन" था; उनके मामा काशी के पंचगंगा घाट पर स्थित बालाजी मंदिर के नौबतखाने में शहनाई बजाते थे।
3
3. मुहर्रम के महीने में बिस्मिल्ला खाँ का क्या नियम था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: वे 10 दिनों तक कोई संगीत नहीं बजाते थे और 8वीं तारीख को दालमंडी से फातमान तक 8 किमी पैदल रोते हुए नौहा गाते जाते थे।
4
4. फटी लुंगी पर शिष्या द्वारा टोकने पर खाँ साहब ने क्या कहा?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: उन्होंने कहा—"भारत रत्न शहनइया पर मिला है, लुंगिया पर नहीं! मालिक फटा सुर न बख्शे, लुंगिया तो सिल जाएगी।"
5
5. बिस्मिल्ला खाँ को किस महान भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक माना जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: हिंदू-मुस्लिम एकता एवं साझी गंगा-जमुनी तहज़ीब का।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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