(क) नामकरण का रहस्य: तारकेश्वरनाथ से 'भोलानाथ'
लेखक का वास्तविक नाम 'तारकेश्वरनाथ' था। उनके पिता बड़े तड़के (भोर में) उठकर स्नान-ध्यान करते और भोलानाथ को भी साथ ही जगाकर नहला-धुला देते थे।
पूजा के समय पिता भोलानाथ के चौड़े माथे पर भभूत का 'त्रिपुंड' (तीन आड़ी रेखाओं वाला शैव तिलक) लगा देते थे। भोलानाथ के सिर पर लंबी-लंबी जटाएं थीं, भभूत लगाने से वे बिल्कुल 'छोटे बम-भोला' बन जाते थे। इसी कारण उनके पिता उन्हें बड़े प्यार से 'भोलानाथ' कहकर पुकारने लगे और उनका यही नाम सर्वत्र प्रसिद्ध हो गया।
(ख) पिता की अनूठी आध्यात्मिक दिनचर्या एवं क्रीड़ा:
- रामनामा बही पर लेखन: पूजा समाप्त करने के बाद पिता अपनी 'रामनामा बही' पर पांच सौ या हजार बार 'राम' नाम लिखते थे।
- मछलियों को दाना: इसके बाद वे छोटे-छोटे कागजों पर 'राम' लिखकर उन्हें आटे की गोलियों में लपेटते और उन पांच सौ गोलियों को लेकर गंगाजी के तट पर जाते थे। भोलानाथ पिता के कंधे पर सवार होकर जाते थे। पिता जब गंगा में एक-एक गोली फेंककर मछलियों को खिलाते, तो भोलानाथ उनके कंधे पर बैठे-बैठे ताली बजाकर हंसते थे।
- लौटते समय की बाल-क्रीड़ाएं: घर लौटते हुए पिता उन्हें रास्ते में पड़ने वाले पेड़ों की झुकी डालों पर झूला झुलाते थे। कभी-कभी वे भोलानाथ से कुश्ती लड़ते और बच्चे के नन्हे हाथों से छाती पर मुक्के खाकर जानबूझकर ओंधे मुंह गिरकर हार जाते थे। जब भोलानाथ उनकी मूंछें खींचता, तो पिता नकली रोना रोते और बच्चे को चूम लेते थे।
(ग) भोजन का प्रसंग: पिता का प्रेम बनाम माँ का ममतामयी कौर:
पिता जब भोलानाथ को फूल के कटोरे में गोरस (दूध-दही) और भात सानकर अपने हाथों से खिला देते और बच्चा तृप्त हो जाता, तभी माँ बीच में आ जाती थी। माँ पिता से कहती—"मर्द क्या जानें कि बच्चों को कैसे खिलाया जाता है! महतारी (माँ) के हाथ से खाने पर ही बच्चों का पेट भरता है!"
माँ थाली में गोरस-भात सानती और तोता, मैना, कबूतर, हंस और मोर के नाम के बड़े-बड़े कौर (निवाले) बनाकर कहती—"जल्दी खा लो, नहीं तो उड़ जाएंगे!" और भोलानाथ उड़ने से पहले ही उन्हें खा जाते थे।