(क) कस्बे का स्वरूप एवं नगरपालिका की कार्य-शैली
कहानी की शुरुआत एक छोटे से सामान्य कस्बे के जीवंत चित्रण से होती है। कस्बे में कुछ ही पक्के मकान थे, एक छोटा सा बाजार था, लड़के और लड़कियों का एक-एक स्कूल था, एक सीमेंट का छोटा कारखाना, दो ओपन-एयर सिनेमाघर और एक नगरपालिका (म्यूनिसिपैलिटी) थी।
नगरपालिका कुछ न कुछ काम हमेशा करवाती रहती थी—कभी कोई सड़क पक्की करवा दी, कभी कुछ पेशाबघर बनवा दिए, कभी कबूतरों की छतरी बनवा दी, तो कभी कवि-सम्मेलन करवा दिया।
(ख) मूर्ति निर्माण का उहापोह और ड्राइंग मास्टर मोतीलाल जी:
एक बार नगरपालिका के किसी उत्साही प्रशासनिक अधिकारी (बोर्ड या सचिव) के मन में विचार आया कि कस्बे के मुख्य चौराहे पर देश के अमर स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की एक संगमरमर की प्रतिमा लगवाई जाए।
किंतु यहाँ हमारे देश की प्रशासनिक कार्य-प्रणाली का कटु यथार्थ सामने आता है:
- नगरपालिका के पास अच्छे मूर्तिकारों की न तो कोई सटीक जानकारी थी और न ही उनके बजट में इतना पैसा था कि देश के किसी बड़े मूर्तिकार से प्रतिमा बनवाई जा सके।
- बजट का एक बड़ा हिस्सा तो केवल पत्राचार (चिट्ठी-पत्री) और प्रशासनिक फाइलों में ही बर्बाद हो गया।
- जब बोर्ड की 'शासनावधि' (कार्यकाल) समाप्त होने को आई, तो हड़बड़ाहट में यह निर्णय लिया गया कि कस्बे के इकलौते हाई स्कूल के इकलौते ड्राइंग मास्टर मोतीलाल जी को ही यह कार्य सौंप दिया जाए।
- मास्टर जी ने भी अधिकारियों को विश्वास दिला दिया कि वे "महीने भर में मूर्ति बनाकर पटक देंगे" (अर्थात कार्य पूरा कर देंगे)।
लेखक ने यहाँ सरकारी योजनाओं में होने वाली लालफीताशाही (Red-tapism), बजट की बर्बादी, समय-सीमा के दबाव और खानापूर्ति करने की प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य किया है। राष्ट्रीय महापुरुषों के सम्मान के कार्यों को भी केवल औपचारिकता मानकर कैसे निपटाया जाता है, यह मूर्ति निर्माण के प्रसंग से स्पष्ट होता है।