(क) मूल कविता: पद्यांश-1
वह आवाज़ सुंदर कमजोर काँपती हुई थी
वह मुख्य गायक का छोटा भाई है
या उसका शिष्य
या पैदल चलकर सीखने आने वाला दूर का कोई रिश्तेदार
मुख्य गायक की गरज में
वह अपनी गूँज मिलाता आया है प्राचीन काल से।
शब्दार्थ:
चट्टान जैसा भारी स्वर: गंभीर, ओजस्वी, आत्मविश्वास से परिपूर्ण और दृढ़ आवाज। गरज: ऊँची, प्रभावशाली और गम्भीर ध्वनि। गूँज: प्रतिध्वनि (Echo), जो मुख्य आवाज के पीछे गूंजकर उसे भरा-पूरा बनाती है। प्राचीन काल से: युगों-युगों से चली आ रही सुदीर्घ परंपरा।
संदर्भ एवं प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'क्षितिज भाग-2' में संकलित कविता 'संगतकार' से लिया गया है। इसके रचयिता समकालीन कवि मंगलेश डबराल हैं। इस अंश में कवि मुख्य गायक के गायन में संगतकार की अविभाज्य भूमिका और उनकी प्राचीन सहभागिता का सुंदर चित्र प्रस्तुत करते हैं।
विस्तृत भावार्थ:
कवि वर्णन करता है कि जब संगीत की महफिल में मुख्य गायक अपने चट्टान के समान भारी, गंभीर और आत्मविश्वास से भरे स्वर में गाता है, तो उसके स्वर के साथ-साथ एक अन्य आवाज भी सुनाई देती है। वह आवाज अत्यंत कोमल, सुंदर, लेकिन थोड़ी कमजोर और कांपती हुई प्रतीत होती है। वह आवाज मुख्य गायक के सहयोगी 'संगतकार' की होती है।
कवि अनुमान लगाता है कि वह संगतकार कौन हो सकता है? संभवतः वह मुख्य गायक का कोई छोटा भाई हो सकता है जो अपने बड़े भाई से संगीत की दीक्षा ले रहा हो, अथवा उसका कोई अत्यंत समर्पित शिष्य हो सकता है, या फिर मीलों पैदल चलकर सीखने आने वाला दूर का कोई निर्धन रिश्तेदार हो सकता है।
वह चाहे जो भी हो, उसकी निष्ठा अद्वितीय है। वह कोई आज का साथी नहीं है, बल्कि वह तो प्राचीन काल से ही मुख्य गायक की गरजती हुई बुलंद आवाज में अपनी मधुर गूंज मिलाता आया है। वह मुख्य गायक के एकाकीपन को दूर करता है और उसके गायन को भव्यता प्रदान करता है।
- उपमा अलंकार: 'चट्टान जैसे भारी स्वर' में उपमा अलंकार है (गायक के स्वर की गंभीरता की तुलना दृढ़ चट्टान से)।
- विरोधाभास एवं संतुलन: एक ओर 'चट्टान जैसा भारी स्वर' (पौरुष, अहंकार, दृढ़ता) तो दूसरी ओर 'सुंदर कमजोर काँपती हुई आवाज़' (कोमलता, समर्पण, विनम्रता)।
- भाषा: सरल, सहज, आडंबरहीन समकालीन खड़ी बोली; मुक्त छंद का सधा हुआ प्रयोग।